आज का ज्ञानप्रसाद लेख परम पूज्य गुरुदेव के पांच स्थूल शरीरों का संक्षिप्त सा वर्णन प्रस्तुत कर रहा है। अखंड ज्योति के जुलाई 1997 अंक में प्रकाशित हुए लेख पर आधरित आज के कि लगभग 30 वर्ष में सभी संस्थानों का इतना विकास एवं विस्तार हो चुका है कि क्या कहा जाए। साथिओं से निवेदन है कि गूगल का सहारा लेकर इन पांच संस्थानों के बारे में यथासंभव जानकारी अवश्य प्राप्त करें। युगतीर्थ शांतिकुंज के बारे में हमारे लिए कुछ भी लिखना असम्भव सा ही प्रतीत हुआ। आइये एक-एक करके गुरुदेव के पांचों शरीरों के बारे में अति संक्षिप्त जानकरी का यथासंभव अवलोकन करें
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परमपूज्य गुरुदेव अक्सर चर्चा प्रसंगों में अपने निकटस्थ घनिष्ठ शिष्यगणों के समक्ष वार्तालाप करते हुए कहते थे:
“मेरे पाँच शरीर स्थूल हैं और पाँच ही सूक्ष्म हैं। पाँच स्थूल तो वे हैं जो मेरी स्थापनाएं हैं जिन्हें केन्द्रीय संचालन तंत्र (Central operating mechanism) के रूप में माना जा सकता है। सारे भारत व विश्व भर में फैले शक्तिपीठ, प्रज्ञासंस्थान, प्रज्ञापीठ, चलते-फिरते प्राणवान कार्यकर्ता इन्हीं शरीरों के विभिन्न अंग-अवयव हैं।” पाँच सूक्ष्म शरीर वोह हैं जो पांच वीरभद्रों के रूप में सूक्ष्मीकरण साधना के बाद से ही कार्य कर रहे हैं।”
इसी मंच से पांच वीरभद्रों को समझाता एक लेख प्रस्तुत किया गया है जिसका लिंक यहाँ देना उचित समझते हैं :
1.युगतीर्थ आँवलखेड़ा, परम पूज्य गुरुदेव का प्रथम स्थूल शरीर
वर्ष 1911 की आश्विन कृष्ण त्रयोदशी के ब्रह्ममुहूर्त में एक युग पुरुष का आंवलखेड़ा नामक ग्राम में अवतरण हुआ। पं. रूपकिशोर शर्मा एवं माता दानकुँवरि जी के घर जन्मा यह बालक अपनी लीला बाल्यकाल से ही साधना करने, दलित वर्ग के पिछड़े वर्ग के समुदाय में जाकर उनकी सेवा के कृत्य दिखाने लगा। 12 वर्ष की आयु में मदनमोहन मालवीय जी से दीक्षा लेकर, गायत्री ब्राह्मण को कामधेनु है का शिक्षण प्राप्त कर बालक श्रीराम ने 15 वर्ष की आयु में अपनी मार्गदर्शक सत्ता से साक्षात्कार किया। इतनी छोटी सी आयु में ही अपना वास्तविक स्वरूप एवं जीवन की राह का बोध हो गया।
पूज्यवर की जन्मस्थली जो कभी एक हवेली हुआ करती थी,आज एक भव्य स्मारक के रूप में विकसित हो चुकी है। देश-विदेश के करोड़ों व्यक्ति (इन शब्दों के लेखक समेत) आकर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर चुके हैं/कर रहे हैं। स्मारक के परिसर में गुरुदेव के करकमलों से ही लगाया गया एक नीम का पेड़ व हाथों से खोदा मीठे पानी का कुआँ स्थित है उनकी याद बराबर दिलाता है। आंवलखेड़ा से आगरा आने पर गुरुदेव ने 200 बीघे से अधिक जमीन गरीबों में बाँट दी एवं एक भाग पर अपनी माताजी के नाम पर “दानकुँवरि इंटर कालेज” स्थापित किया। आगरा से मथुरा व मथुरा से हरिद्वार आने तक पूज्यवर ने जन्मभूमि को अधिक महत्व न दिया किन्तु शिष्यों एवं वंदनीया माताजी के आग्रह पर वे एक बार 1979-80 में गाँव गए एवं जाने के बाद वहाँ एक गायत्री शक्तिपीठ, एक कन्या इंटर कालेज एवं एक चिकित्सालय की रूपरेखा बनायी। यहाँ का गायत्री शक्तिपीठ अब एक विराट आकार ले चुका है एवं आसपास के प्रायः 108 मील की परिधि तक के व्यक्तियों के लिए संस्कारित सिद्धपीठ है। इसी परिसर में स्थापित इंटर कालेज अब कन्या डिग्री कालेज बन गया है जो कि पूज्यवर का स्वप्न था।
1995 की अर्द्धमहापूर्णाहुति जिसमें लगभग 60 लाख लोगों व राजतंत्र से लेकर संस्कृति प्रबुद्ध वर्ग की प्रतिभाओं ने भागीदारी की एक ऐतिहासिक आयोजन बनकर रह गया। नवंबर 1995 की कार्तिक पूर्णिमा पर आयोजित इस आयोजन से गायत्री परिवार ने एक नई करवट ली है। पिछले दिनों 30 बिस्तरों का एक सामुदायिक चिकित्सा केन्द्र यहाँ आरंभ हो चुका है। आंवलखेड़ा को “एक आदर्श ग्राम” घोषित किया गया है। 2021 में दैनिक जागरण में प्रकाशित न्यूज़ आइटम के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार ने इस गाँव के विकास के लिए लगभग 47 लाख रुपए की घोषणा की है।
2.अखण्ड-ज्योति संस्थान,घीआ मंडी मथुरा- परम पूज्य गुरुदेव का दूसरा स्थूल शरीर
1926 में प्रज्ज्वलित अखण्ड-ज्योति दीपक के साथ गुरुदेव 1941 में आगरा से मथुरा आए। उन दिनों भुतहा कही जाने वाली बिल्डिंग में से पूज्यवर को अपनी प्राणचेतना के विस्तार के लिए अखण्ड ज्योति पत्रिका के प्रकाशन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना था। 1938 में प्रारंभ की गयी किन्तु व्यवस्थित रूप में बसंत पंचमी 1940 में फ्रीगंज आगरा से आरंभ की गयी यह पत्रिका हैंडमेड कागज पर पैर से चलाने वाली मशीनों पर छपने लगी। छोटी−छोटी किताबें भी लागत मूल्य पर छापी जाने लगीं। प्रेम की पाती पत्रिका व पूज्यवर की चिट्ठिओं के माध्यम से जन−जन तक जाने लगी। यह व्यक्तिगत स्पर्श जो पूज्यवर एवं वंदनीय माताजी द्वारा स्नेह भरे आतिथ्य के रूप में दिया गया, गायत्री परिवार की स्थापना का मूलभूत आधार बना। प्रारंभिक स्तर पर मिशन की नींव के पत्थर के रूप में ढेरों कार्यकर्ताओं ने यहीं आत्मीयता भरा प्रसाद माताजी से एवं जीवन-विद्या का शिक्षण पूज्यवर से पाया है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में बहुप्रचलित कमेंट-काउंटर कमेंट प्रक्रिया ऐसी ही सम्पर्क साधना का प्रारूप है, “संपर्क टूटा संबंध छूटा” के तथ्य से भला कौन अपरिचित है। माँ के साथ रजाई में बैठकर, आत्मीयता की अनुभूति आधुनिक युग की वीडियो कॉल कहां कर सकती है।
इसी बिल्डिंग से आरंभ हुआ यह संस्थान जिसने “गायत्री महाविज्ञान” जैसा “गायत्री महाविद्या पर एनसाइक्लोपीडिया” जैसे ग्रन्थ का प्रकाशन किया आज एक विराट रूप ले चुका है। वह कोठरी जहाँ पूज्य गुरुदेव ने अपना अखण्ड दीपक स्थापित किया, वंदनीय माताजी ने जिसकी रक्षा की एवं पूज्यवर ने कठोर तप-साधना की, आज इस उर्जाकेंद्र के दर्शन करने करोड़ों साधक आते हैं। जहाँ अखण्ड ज्योति पत्रिका का कार्यालय था अब वह एक विशाल पत्राचार कार्यालय ही नहीं साढ़े पाँच लाख (1997 के आंकड़े) से अधिक संख्या में प्रकाशित अखण्ड ज्योति पत्रिका का प्रकाशन वितरण केन्द्र बन चुका है। कभी यहीं पर गायत्री तपोभूमि के निर्माण की, वहाँ चलने वाले सत्रों की एवं 1958 में सम्पन्न हुए 1008 कुण्डीय यज्ञ की रूपरेखा बनी थी। 2026 में लिखी जा रही इन पंक्तियों से समय इस 100 वर्ष पुरानी बिल्डिंग का जीर्णोद्धार हो रहा है और सारे तंत्र का सञ्चालन जयसिंह पूरा मथुरा से हो रहा है।
3.गायत्री तपोभूमि,मथुरा-परम पूज्य गुरुदेव का तीसरा शरीर
दुर्वासा ऋषि की तपःस्थली पर गायत्री तपोभूमि की पावन स्थापना चौबीस लक्ष की चौबीस महापुरश्चरण पूर्णाहुति पर विनिर्मित की गयी थी। 2400 तीर्थों के जल व रज को संग्रहित कर, अखण्ड अग्नि को स्थापित कर, यहाँ गायत्री महाशक्ति का एक मंदिर विनिर्मित किया गया। यहीं बैठकर पूज्यवर ने गायत्री परिवार रूपी विराट वटवृक्ष का बीजारोपण, सतत् जनसंपर्क/लोकशिक्षण के माध्यम से किया। 1956 में यहाँ नरमेध यज्ञ हुआ। जीवनदानी कार्यकर्ताओं के आने का क्रम इसी के बाद आरंभ हुआ। 1958 में यहाँ से सहस्रकुण्डीय विराट गायत्री महायज्ञ हुआ। इस यज्ञ में लगभग 6 लाख से अधिक साधकों ने भाग लिया एवं एक सुव्यवस्थित गायत्री परिवार की आधारशिला रखी गयी।
1962 में हिमालय प्रवास से लौटकर, परमपूज्य गुरुदेव ने यहीं से युगनिर्माण योजना की घोषणा की। शतसूत्री कार्यक्रम के साथ एक सत्संकल्प की घोषणा भी की गयी। छोटे ट्रैक्ट, गायत्री यज्ञ की प्रेरणाओं से लेकर क्रान्तिकारी चेतना का संवाहक साहित्य यहीं लिखा गया। मुद्रण हेतु यहाँ एक व्यापक प्रकाशन तंत्र बनाया गया। साथ ही एक स्वावलम्बन विद्यालय भी विनिर्मित हुआ जिसमें बालकों को रोजगार परक अनौपचारिक शिक्षा दी जाती है। यह अभी भी सफलतापूर्वक कुशल मार्गदर्शन में चल रहा है। 1953 से 1971 तक परमपूज्य गुरुदेव की कर्मभूमि यही स्थान रहा है। पूज्यवर की विद्या-विस्तार योजना को पूरे भारत में फैलाने हेतु यह संस्थान सक्रिय रहा है।
एक विराट सम्मेलन में परमपूज्य गुरुदेव एवं परम वन्दनीय माताजी को 17 से 20 जून 1971 के दौरान के ऐतिहासिक मर्मस्पर्शी आयोजन में विदाई दी गयी। वंदनीय माताजी के लिए शाँतिकुँज हरिद्वार निर्धारित हो चुका था। पूज्यवर दुर्गम हिमालय चले गए जहाँ से वे एक वर्ष बाद हरिद्वार वापस लौटे एवं उन्होंने पुनः मथुरा लौटकर न जाने का संकल्प अंत तक निभाया।
आजकल (2026 में) इस बिल्डिंग का जीर्णोद्धार हो रहा है,एक भव्य मंदिर बन रहा है।
4.गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज,हरिद्वार- परम पूज्य गुरुदेव का चौथा स्थूल शरीर
मुनि विश्वामित्र की तपस्थली पर स्थित युगतीर्थ शांतिकुंज से भला कौन ऐसा होगा जो परिचित न होगा। पाठकों से करबद्ध निवेदन है कि गूगल सर्च में केवल शांतिकुंज ही टाइप कर लें तो ज्ञान का अपार कोष उपलब्ध होगा।
5.ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान- परम पूज्य गुरुदेव का पांचवां स्थूल शरीर
विज्ञान एवं अध्यात्म के समन्वय को संकल्पित यह स्थान परम पूज्य गुरुदेव द्वारा महर्षि कणाद की तपःस्थली में स्थापित सप्त सरोवर में बह रही गंगा की सात धाराओं के सामने शान्तिकुँज से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसका शुभारंभ 1979 में हुआ था। परम पूज्य गुरुदेव इसे भविष्य के धर्म की स्थापना हेतु विनिर्मित “अपना मस्तिष्क” कहा करते थे। तीन मंजिलों का यह भवन अपनी स्थापत्य कला के कारण सभी को आकर्षित करता है। मध्य में यज्ञशाला बनी हुई है जहाँ सतत् वनौषधि यजन प्रक्रिया पर वैज्ञानिक अनुसंधान चल रहा है। यज्ञोपैथी नाम से लोकप्रिय विधा यहीं से प्रचलित हुई है।
बिल्डिंग के प्रथम तल पर गायत्री की चौबीस मूर्तियाँ स्थापित की गयी हैं। प्रत्येक प्रतिमा के साथ बीज मंत्र यंत्र व उनकी फलश्रुतियाँ अंकित की गयी हैं। द्वितीय तल पर चौबीस कमरों में एक विशाल प्रयोगशाला बनी हुई है। ब्लड एनालिसिस से लेकर शरीर के विभिन्न एन्जाइम हारमोन्स काया व मन की विद्युत तरंगों पर मंत्रशक्ति, योग साधना, आहार प्रार्थना, यज्ञ प्राणायाम आदि के पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण अध्ययन करने का एक व्यापक तंत्र यहाँ आधुनिकतम उपकरणों के माध्यम से बनाया गया है।
शान्तिकुँज में साधक ठहरते हैं व उनका माह में दो बार परीक्षण होता है। साधकों पर विभिन्न प्रकार के मनोवैज्ञानिक प्रयोग भी यहाँ संपन्न होते रहते हैं। तीसरी मंजिल पर 45000 से अधिक ग्रन्थों वाली एक विशाल लाइब्रेरी है। इस लाइब्रेरी में विश्व भर में वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर हुए शोध कार्य एवं रिसर्च पत्रिकाओं को इक्क्ठा किया गया है।
साथिओं को जानकारी होगी कि इस संस्थान की अधिकतर रिसर्च देव संस्कृति यूनिवर्सिटी में ही हो रही है। अखंड ज्योति में नियमित तौर से इस विषय पर लेख प्रस्तुत किये जा रहे हैं।
इस परिचय मात्र से ही किसी को अनुमान हो सकता है कि परम पूज्य गुरुदेव, माताजी का व्यक्तित्व कर्तृत्व कितना विराट रहा होगा। वे जो भी कुछ स्थापनाएं कर गए आज सारे भारतवासियों, विदेश के संस्कृति प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं । यदि इन पाँच स्थापनाओं (पाँच स्थूल शरीर) के साथ वे सभी स्थापनाएं जोड़ ली जाएँ जो विश्व भर में फैले शक्तिपीठों के तंत्र के रूप में विद्यमान है तो हिमालय के समान एक गगनचुम्बी व्यक्तित्व के रूप में ऋषियुग्म की सत्ता का बोध होता है। ऐसी महान गुरुसत्ता के हम लीला-सहचर रहे हैं यह सोच-सोचकर ही मन प्रमुदित होता रहता है।
समापन,जय गुरुदेव
