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परम पूज्य गुरुदेव पांच शरीरों से जीते थे-परम वंदनीय माता जी द्वारा दिया गया  दिव्य वर्णन 

जुलाई 1997 की अखंड ज्योति में एक लेख प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक था “विराट प्रज्ञापुरुष गुरुदेव जिनके पांच स्थूल शरीर अभी भी हमारे बीच हैं।” इन पंक्तियों के लेखक ने मात्र 4 पन्नों के लेख को जब देखा तो उसकी आँखें ही चुंधियाँ सी गयीं। लेख में समाहित अद्भुत,विस्तृत ज्ञान, अनेकों Cross references के बारे में क्या ही कहा जाए। यथासंभव सभी References का अध्यन किया गया और गुरु से मार्गदर्शन मिला कि इस दिव्य कंटेंट को दो भागों में पाठकों के समक्ष लाया जाये। आज प्रस्तुत किये गए प्रथम भाग में परम पूज्य गुरुदेव की पांच शरीरों जितनी शक्ति का विवरण एवं दूसरे भाग में गुरुदेव के पांच स्थूल शरीरों  (पांच संस्थान) की चर्चा करने की योजना है। पाठकों की धारणा हो सकती है कि पांच संस्थानों के बारे में बहुत कुछ प्रकाशित हो चुका  है,उन्हें जानकारी भी है लेकिन जानकारी कभी भी कम्पलीट नहीं होती, उसका अनवरत विकास और विस्तार होता रहता है।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की 6 अगस्त 2026 की गुरुकक्षा में स्वागत है, इस गुरुकक्षा में प्रवाहित हो रही ज्ञानगंगा में डुबकी लगाना एक दुर्लभ सौभाग्य है।       

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परम पूज्य गुरुदेव के जीवन की हर श्वास गायत्री महाशक्ति को अर्पित थी। जीवनभर वे इसी के लिए संघर्ष करते रहे कि गायत्री महामन्त्र जन-जन तक पहुँच जाए। इसके लिए उन्हें प्रतिकूलताओं से, कट्टरवाद से कितना टकराना पड़ा है, यह सभी जानते हैं। गायत्री उन्हें सिद्ध थी। जीवन के दृश्यमान स्वरूप का पटाक्षेप स्थूल शरीर के पंचतत्वों में विलीन होने के रूप में उन्होंने  गायत्री जयन्ती के दिन किया, यह मात्र एक संयोग नहीं, एक सुनियोजित जीवन-साधना है। पंचमुखी गायत्री के पंचकोशों को पूज्य गुरुदेव ने जाग्रत कर अपने जीवन में उनका न केवल साक्षात्कार किया बल्कि  औरों को भी इस महत्साधना का मार्ग दिखा गए।   

ऐसा कहा जाता है कि गुरुदेव पाँच शरीरों से जीते थे। 

ऐसे कई घटनाक्रम मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि जिन तिथियों में गुरुदेव किसी एक स्थान पर थे उसी समय वोह अपनी लीला किसी  और स्थान पर परामर्श देने के रूप में, प्रवचन देने के रूप में दिखा रहे थे। वे एक दिखते  हुए भी पाँच थे। परम वन्दनीय माताजी जिन्हें उनकी अभिन्न सहचरी होने का अवसर मिला है,लिखती हैं:

मैं नहीं जानती कि इन घटनाओं में कितनी सच्चाई थी लेकिन  इतना अवश्य कह सकती हूँ कि  वे जीवन भर पाँच शरीरों जितना कार्य, भिन्न-भिन्न प्रकार के पाँच कार्यों को एक साथ करते थे।  वे लिखती हैं कि उनके स्थूल शरीर की उपलब्धि देखकर नहीं लगता कि एक व्यक्ति, एक शरीर से इतना काम कभी कर सकता है। इसकी व्याख्या  वन्दनीय माताजी ने उनकी दिनचर्या का विस्तृत विश्लेषण करके अखण्ड-ज्योति नवम्बर 1971 के अंक में की है:

(1) गुरुदेव 6 घण्टे प्रतिदिन नियमित उपासना  करते थे। गायत्री मन्त्र की उनकी सिद्धि का स्रोत उनके तप की पूँजी का विराट भण्डागार, 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरणों के रूप में था  इसके बावजूद उनकी नित्य की यह साधना कभी भी न छूटी। आखिरी श्वास तक चलती रही। वे नित्य कमाते थे और सोते समय तक खाली हो जाते थे।

(2) 1970-71 तक उनके पास देश-विदेश से  प्रायः 400-500 पत्र आते थे। इनको स्वयं खोलना, लगभग 100 के उत्तर स्वयं देना, विभिन्न जटिलताओं से भरे शेष पत्रों का जवाब कार्यकर्ताओं को नोट कराना, किसी भी पत्र को 24 घण्टे से अधिक न रोककर पूर्णतः समाधानपरक उत्तर तुरन्त भिजवा देना, व्यवस्था-बुद्धि की कुशलता का परिचायक था। यह कार्य जो एक व्यक्ति के लिए 10 घण्टे से कम में नहीं निपट सकता, कैसे चुटकियों में निबट जाता था, कोई कल्पना नहीं कर सकता। बाद में 1980-81 तक वे शान्तिकुँज में भी इसी कार्य को करते  रहे, सारे पत्र फिर परम वन्दनीय माता जी की ओर से जाते थे। आज उन दिनों के पत्रों से संख्या पाँच-छह गुनी अधिक हो गयी है एवं लगभग 100 व्यक्तियों का पत्राचार विभाग उसे सम्भालता है। सोचा जा सकता है कि पूज्यवर ने कितने व्यक्तियों के बराबर कार्य एक दिन में किया होगा। यह डाटा वर्ष 1997 के अनुसार है, जब यह अखंड ज्योति जिस पर यह लेख आधारित है,लिखी गयी थी।  

(3) गुरुदेव द्वारा किया गया लेखन उनके वजन की तोल  से दुगुना है। मात्र 1959 से 1971 तक लिखे कार्य एवं फिर हिमालय यात्रा से लौटकर 1972 से लेकर 1990 में अन्तिम श्वास तक लिखे गये कार्य को कोई देखे तो आश्चर्यचकित होकर रह जायेगा। यदि कोई यह कार्य पूरे 24  घण्टे भी करे तो जीवनावधि के 100 तो क्या 300  वर्षों में भी पूरा नहीं कर सकता। हज़ारों पुस्तकों का लेखन-प्रकाशन, आर्ष-ग्रन्थों का अनुवाद ,भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों से लेकर वैज्ञानिक आध्यात्मवाद एवं आध्यात्मिक समाजवाद जैसे गूढ़ विषयों पर संदर्भों सहित लेखन, प्रज्ञापुराण की रचना, गायत्री यज्ञ विधा का विज्ञान-सम्मत प्रस्तुतीकरण एवं जीवन-विद्या के विभिन्न पक्षों पर बहुमुखी लेखन वे जीवन भर करते रहे। अपने स्वयं के हाथों से उन्होंने  अगस्त 1969 की अखण्ड ज्योति पत्रिका के “युग परिवर्तन के छोटे किन्तु महान शस्त्रागार” लेख में लिखा है:

“चेतना के उच्चतम स्वर से अवतरित हुए, अन्तःकरण की करुणा में धारण किये गये, बौद्धिक तीक्ष्णता से सँवारे गए इन विचारों में कितनी आभा है, कितनी रोशनी है, यह कहने की नहीं, अनुभव करने की बात है। जिन्होंने इन्हें पढ़ा, तड़प कर रह गए। रोते हुए आँसुओं की स्याही से जलते हृदय ने इन्हें लिखा है, सो इनका प्रभाव होना ही चाहिए, हो रहा है और होकर रहेगा।” 

(4 ) व्यक्तिगत सम्पर्क: स्नेह का आदान-प्रदान, शक्ति वितरण, दूसरों के कष्टों में सहभागिता का कार्य वे नित्य प्रात: 6 से रात्रि 8  तक मात्र दिन में एक घण्टे के विश्राम के अतिरिक्त सतत करते रहे । कभी भी इसमें व्यवधान नहीं आया । प्रतिदिन 9-10  घण्टे सारे भारत व विदेशों के कष्ट-पीड़ितों, जिज्ञासुओं से लेकर नवनिर्माण योजना में संलग्न कर्मठ कार्यकर्त्ताओं, साहित्यकारों, दार्शनिकों, विद्वानों, साधकों की भारी भीड़ में वे सदा घिरे ही रहे । यह कार्य उनका चौथा शरीर करता था, यह कहना अत्युक्तिपूर्ण न होगा । 

(5)  इतने सब कार्यों के बावजूद देशभर के कार्यकर्त्ताओं तक सम्मेलनों में पहुँचना, प्रचार, जनसम्पर्क करना, विभिन्न लायब्रेरीज में जाकर गहन स्वाध्याय करना, महत्वपूर्ण व्यक्तियों से व्यक्तिगत साधना परामर्श करना, यह कार्य 1971 तक सतत् चलते रहना एक आश्चर्य का विषय है । 1972 में भी वे वर्षांत में 3  माह के लिए विदेश यात्रा पर गए एवं 1980 से 1982 तक भारत भर के प्रवासक्रम में, शक्तिपीठों के शिलान्यास, प्राणप्रतिष्ठा क्रम में घूमते रहे । यह कार्य उनका पाँचवाँ शरीर करता रहा होगा, ऐसा कहना अतिशयोक्ति न माना जाए।

परमवन्दनीया माताजी लिखती हैं कि गुरुदेव  एक दिखते  हुए भी पाँच थे । गायत्री माता के पाँच मुख और दस भुजाएँ बताए भर जाते हैं लेकिन  उसके अनन्य उपासकों  ने प्रत्यक्ष करके दिखा दिया कि एक शरीर से पाँच गुनी स्तर की क्रियाशक्ति का उपार्जन कैसे सम्भव हो सकता है। इसी तथ्य को परमपूज्य गुरुदेव ने जीवन के उत्तरार्द्ध में 1987  से 1990  की अवधि में लिखे सम्पादकियों  “अपनों से अपनी बात” में इस तरह लिखा:

“हमारे पाँच स्थूल शरीर एवं पाँच सूक्ष्म शरीर हैं। ये दोनों ही अपना कार्य सन् 2000  तक एवं उसके बाद भी सक्रियतापूर्वक करते रहेंगे लेकिन 2000 के बाद इनका स्वरूप विराटतम होता देखा जाएगा।  हमारे पाँच कारण शरीर सक्रिय हो सारी विश्ववसुधा को अपनी लपेट में ले लेंगे।” 

समझने वाले समझ पाए कि नहीं लेकिन पाँच स्थूल व पाँच सूक्ष्म शरीर यदि हम गुरुवर के कर्तृत्त्व/संकल्पों के रूप में देखें तो हमें प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने लगेंगे । वंदनीय माताजी इस चर्चा का समापन यह कहते हुए कर रही हैं कि कारण शरीरों के बारे में हम अपनी लेखनी से अभी कुछ नहीं कह सकते, क्योंकि वह भविष्यत् की बात है एवं अभी उस पर प्रकाश डालने पर प्रतिबन्ध है ।

परमपूज्य गुरुदेव के पांचों  स्थूल शरीरों (संस्थानों) को समझने से पूर्व यह समझ लें कि 1911 में जन्मी हमारी गुरुसत्ता ने सुनियोजित ढंग से अपनी जीवन-अवधि  को निम्नलिखित चार भागों में बाँट दिया: 

क)1911 से 1926  तक की 15  वर्ष की बाल्यकाल की अवधि जब उनकी गुरुसत्ता से उनका साक्षात्कार हुआ। 

ख)1926  से 1941  तक की 15  वर्ष की अवधि जिनमें स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय प्रवेश करने से लेकर जेल जाने तक, गायत्री महापुरश्चरण आरंभ करने से लेकर बापू, कवीन्द्र रवीन्द्र नाथ टैगोर, श्री अरविन्द जैसे महापुरुषों के साथ मिलन-सत्संग  का क्रम एवं अखण्ड ज्योति पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ। यह कार्य विभिन्न जेलों, आँवलखेड़ा व आगरा के ग्रामीण क्षेत्रों से आगरा नगर में सम्पन्न हुआ। 1941 से 1971 में वे मथुरा प्रयाण कर गए।

 ग)1941 से 1971  तक की 30  वर्ष तक की अवधि जिसमें अखण्ड ज्योति संस्थान एवं गायत्री तपोभूमि की स्थापना हुई। परम वन्दनीय माताजी उनके जीवन में आयीं, तीन बार वे 1-1  वर्ष के लिए हिमालय गए। 24  लक्ष के अनुष्ठानों की महापूर्णाहुति सम्पन्न हुई। 1958  का ऐतिहासिक सहस्रकुण्डीय महायज्ञ हुआ जो “गायत्री परिवार की स्थापना” का मूलभूत आधार बना। इसी अवधि में गायत्री महाविज्ञान लिखा गया एवं आर्ष ग्रन्थों का आदि से अंत तक अनुवाद  कार्य सम्पन्न किया गया। युग निर्माण योजना के सूत्रपात से लेकर भारत भर में गायत्री परिवार की  शाखाओं की स्थापना इसी अवधि में हुई। 

घ)1971 से 1990  की अंतिम 20  वर्ष की अवधि में  वे मथुरा से विदाई लेकर हरिद्वार होकर हिमालय चले गए। बाद में 1972  की जून में लौटकर उनने ऋषि परम्परा का बीजारोपण कर गायत्री तीर्थ के रूप में एक सिद्धपीठ की स्थापना का संकल्प लिया। इस अवधि में प्राण-प्रत्यावर्तन से लेकर कल्प-साधना संजीवनी साधनाएँ, नारी जागरण, वानप्रस्थ युगशिल्पी शिक्षण, सत्र सम्पन्न हुए। स्वयं पूज्यवर प्रवासी भारतीयों के लिए संदेश लेकर 3  माह के लिए 1972  के अंत से 1973  के प्रारंभ तक विदेश यात्रा पर पानी के जहाज से गए। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान व शक्तिपीठ निर्माण की प्रक्रियाएँ, नारी जागरण अभियान के अंतर्गत देव कन्याओं की पूरे भारत में प्रव्रज्या एवं प्रज्ञापुराण सृजन जैसा महत्कार्य इसी अवधि में हुआ। उन्होंने सूक्ष्मीकरण साधना में प्रवेश शक्तिपीठ उद्घाटन प्रवास के तुरन्त बाद किया एवं यही भावी निर्धारण का आधार बना। राष्ट्रीय एकता सम्मेलन, विराट दीपयज्ञों की क्राँतिकारी श्रृंखला  से लेकर क्रान्तिधर्मी साहित्य का निर्माण इसी अवधि में सम्पन्न हुआ। 2 जून 1990  गायत्री जयन्ती को उन्होंने पूर्व घोषणा के साथ महाप्रयाण किया।

इस प्रकार 15 वर्ष, 15 वर्ष, 30 वर्ष एवं 20  वर्ष के चार खण्डों में उनका 80  वर्षीय जीवन बाँटा जा सकता है। महाप्रयाण के कुछ दिन पूर्व, अप्रैल 1990  में पूज्यवर ने   लिखा कि 

“कोई यह न समझे कि दीप बुझ गया और प्रगति का क्रम रुक गया। दृश्य शरीररूपी गोबर की मशक चर्मचक्षुओं से दिखे या न दिखे विशेष प्रयोजनों के लिए नियुक्त किया गया यह प्रहरी अगली शताब्दी तक पूरी जागरूकता के साथ अगली जिम्मेदारी वहन करता रहेगा।” 

उपरोक्त दिव्य पंक्तियों के साथ आज के लेख का यहीं पर समापन करना उचित रहेगा। कल वाले लेख में गुरुदेव की पांच स्थापनाओं, को पाँच स्थूल शरीरों को समझने का प्रयास करेंगें। इन पांच स्थापनाओं के बारे में पाठकों को बहुत कुछ जानकारी है लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है जिनसे पाठक अनजान होंगें। ऐसे ज्ञान का जितनी बार भी अध्ययन हो जाये कम ही रहेगा। 

धन्यवाद्,जय गुरुदेव 


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