वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

चार प्रकार की प्रतिभाओं का संक्षेप में वर्णन 

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की तीसरी पुस्तक “युग की मांग-प्रतिभा परिष्कार-भाग 1” के पहले  ज्ञानप्रसाद लेख का अमृतपान करने के लिए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में आपका स्वागत है। 

56 पन्नों की इस लघु पुस्तिका को समझाने के लिए गुरुवर ने हम शिष्यों  के लिए आरम्भ में ही सारांश प्रकाशित कर दिया है ताकि हमें Step by step पता चलता रहे कि हम किस ओर बढ़ रहे हैं। 

सारांश के बाद, प्रतिभा के आधार पर चार प्रकार ( हीन,प्रजाजन,प्रतिभावान और देवमानव) के मनुष्य वर्णित किये गए हैं जिन्हें समझ पाना बहुत ही आवश्यक है क्योंकि आने वाले ज्ञानप्रसाद लेखों का  यही (प्रतिभा) आधार है, पुस्तिका का शीर्षक भी तो प्रतिभा-परिष्कार ही है। 

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सारांश:      

मनुष्य सारा जीवन ईश्वर को पाने के लिए,उसे पहचानने के लिए मारा-मारा फिरता रहता है,भटकता रहता है लेकिन अज्ञानता के कारण उसे कुछ भी प्राप्त नहीं हो पाता क्योंकि भगवत्सत्ता का सबसे निकट और सुनिश्चित स्थान तो उसका अंतराल है। इसी अंतराल में एक प्राणाग्नि विद्यमान है जो समस्त क्रियाकलापों की जननी है। इस प्राणाग्नि को जानने, उभारने से वह सब कुछ मिल सकता है जिसे पाने के लिए  मनुष्य दर-दर भटकता है। मनुष्य इस शक्ति को  धारण करने की क्षमता लिए बैठा है लेकिन उसे इस तथ्य का ज्ञान ही नहीं है। 

प्राणवान्, प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों में इस  प्राणाग्नि की अनुपात सामान्यों से अधिक होती है, इसी बड़ी हुई अनुपात को “आत्मबल/संकल्पबल” कहा गया है। 

कल ही ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से “व्यसन मुक्त भारत अभियान” के अंतर्गत कुछ “संकल्प प्रमाण पत्र” शेयर किये गए,  गुरुदेव द्वारा रचित साहित्य एवं मार्गदर्शन अवश्य ही साथिओं के संकल्पों की पूर्ति कराएगा    

पारस को छूकर लोहा सोना बन जाता है या नहीं, इसमें किसी को सन्देह हो सकता है लेकिन  यह तो सुनिश्चित है कि महाप्रतापी, आत्मबल-सम्पन्न व्यक्ति असंख्यों को अपना अनुयायी एवं सहयोगी बना लेते हैं। इन्हीं प्रतिभावानों ने सदा से जमाने को बदला है, परिवर्तन की पृष्ठभूमि बनाई है। 

गुरुदेव इस सारांश में बताते हैं कि प्रतिभा किसी भी मनुष्य  पर आकाश  से नहीं बरसती, वह तो अन्दर से (अंतर्मन से) जागती है। प्रतिभा तो सवर्ण जाति (जनरल केटेगरी)  को छोड़कर, कबीर (जुलाहे) और रविदास( चर्मकार/चमार) को भी वरण कर सकती है। प्रतिभा ही बलवानों और सुन्दरों को छोड़कर, गाँधी जी जैसे कमजोर शरीर वाले, चाणक्य जैसे साँवले कुरूपों के ऊपर बरसती है। जिस किसी व्यक्ति में भी प्रतिभा जाग जाती है, उसके लिए सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खुल जाता है। प्रतिभा-परिष्कार, तेजस्विता का निखार ही आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है, जिसके पास प्रतिभा है उसका ही बोलबाला है एवं  नवयुग की आधारशिला इसी पॉइंट पर रखी  जानी है। 

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आज के समय की माँग के अनुरूप, इन दिनों दो दबाव निरन्तर बढ़ते जा रहे हैं:

1. व्यापक अवांछनीयताओं से जूझना और उन्हें परास्त करना,जैसे कि  समाज में फैल रही बुराइओं और हिंसा को कैसे रोका जाए।  

2.नवयुग के सृजन के लिए समर्था कहाँ से आए ? 

समाज,देश,विश्व की तो बात बाद में आती है, विरोध ने तो मनुष्य और मनुष्य के बीच संबंधों को ही तार-तार कर दिया है।   

गुरुदेव का एक ही फार्मूला है कि प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए उसके अनुरूप  योग्यता,कर्तव्यनिष्ठा और कर्मनिष्ठा उत्पन्न करनी पड़ती है, साधन जुटाने पड़ते हैं। इन सभी विशेषताओं के आभाव में मनुष्य को सामान्य स्थिति में रहते हुए, किसी प्रकार दिन काटते ही पड़ते हैं। कठिनाइयों से जूझने, अड़चनों के निरस्त करने और मार्ग रोककर बैठे हुए अवरोधों को किसी प्रकार हटाने के लिए समुचित साहस, शौर्य और सूझ-बूझ का परिचय देना पड़ता है। आए दिन अनेकों समस्याएँ और कठिनाइयाँ, त्रास और संकट भरी परिस्थितियाँ बनाती रहती हैं। ऐसी परिस्थितिओं में जो व्यक्ति कठिनाइयों से जूझ सकता है, प्रगति की दिशा में बढ़ चलने के साधन जुटा सकता है, उसी को प्रतिभावान् कहते हैं।

निजी जीवन के विकास में एवं अवरोधों को निरस्त करने में प्रतिभा की निरन्तर आवश्यकता पड़ती है। जो भी व्यक्ति आगे बढ़े हैं,ऊँचे उठे हैं,उन्होंने प्रतिभा के विकास से ही किया है।  उत्कर्ष की सूझ-बूझ और कठिनाइयों से लड़ सकने की हिम्मत,ऐसी दो विशेषताएं हैं जिनके बिना प्रगतिशील  जीवन जी सकना सम्भव ही नहीं होता। सामुदायिक, सार्वजनिक क्षेत्र में सुव्यवस्था बनाने के लिए तो और भी अधिक प्रखरता चाहिए। यह विशाल क्षेत्र, आवश्यकताओं और गुत्थियों की दृष्टि से तो और भी बढ़ा-चढ़ा होता है।

1.देखने में तो सभी मनुष्यों की आकृति,प्रकृति एक जैसी होती है लेकिन प्रत्येक मनुष्य के  प्रतिभा स्तरों में भारी भिन्नता पाई जाती है। हीन स्तर (Low level)  के लोग Self-dependent होने के बजाए दूसरों पर ही निर्भर होते हैं। वे आँख बन्द करके दूसरों के पीछे चलते रहते हैं। बिना किसी लॉजिक के फॉलो करना उनकी प्रवृति बन चुकी होती है , यह सोचना उनके लिए संभव ही नहीं होता कि हम  क्यों फॉलो किये जा रहे हैं। साधनों के लिए, मार्गदर्शन के लिए दूसरों पर निर्भर रहना उनकी प्रवृति बन चुकी होती है, यहाँ तक कि जीवनोपयोगी साधन तक अपनी स्वतंत्र चेतना के बलबूते जुटा नहीं पाते। ऐसी स्थिति में वोह अपने  उत्थानऔर पतन का कारण दूसरों को ही मानते हैं । गुरुदेव तो ऐसे लोगों को परजीवी (Parasite) ही कह कर पुकारते हैं। अधिकतर मनुष्य इसी प्रवृति के होते हैं,नक़ल करते रहना,निर्भर रहना उनके DNA में ही घुसा हुआ होता है, उनके स्वभाव का अंग ही बन जाता है,खुद निर्णय लेना तो उनकी प्रवृति ही नहीं होती है। 

गुरुदेव इस वर्ग को “हीन वर्ग” कहते हैं, सब कुछ होते हुए भी दीन-दुःखी-निर्धन ही कहा जा सकता है।

2.समाज का दूसरा वर्ग वह है जो समझदार होते हुए भी घटिया सी  स्वार्थपरता से घिरा रहता है। योग्यता और तत्परता जैसी विशेषताएँ होते हुए भी वे उन्हें मात्र लोभ, मोह, अहंकार की पूर्ति के लिए ही नियोजित किए रहते हैं। उनकी नीति “अपने मतलब से मतलब” रखने की होती है। आदर्श उन्हें प्रभावित नहीं करते, कायरता के वशीभूत  वे पुण्य परमार्थ की बात तो सोच ही नहीं पाते, अवसर मिलने पर अनुचित कर बैठने से भी नहीं चूकते, महत्त्व न मिलने पर अनर्थ कर बैठते हैं। बुद्धिमान और धनवान् होते हुए भी इन लोगों को निर्वाह भर में समर्थ ‘प्रजाजन (राजा की प्रजा) ही कहा जाता है। वे जैसे-तैसे  जी तो लेते हैं लेकिन  श्रेय सम्मान जैसी किसी मानवोचित उपलब्धि के साथ उनका कोई सम्बन्ध ही नहीं जुड़ता है। उन्हें जनसंख्या का एक यूनिट  भर माना जाता है। फिर भी वे दीन-हीनों की तरह किसी पर निर्भर नहीं होते। उनकी गणना व्यक्तित्व की दृष्टि से अपंग, अविकसित और असहायों में नहीं होती। कम-से-कम अपना बोझ अपने कन्धों पर तो उठा ही लेते हैं।

3.तीसरा वर्ग प्रतिभाशालियों का है। वे भौतिक क्षेत्र में कार्यरत रहते हैं,अनेक व्यवस्थाएँ बनाते हैं, अनुशासन में रहते और अनुबन्धों से बँधे रहते हैं, अपनी नाव अपने बलबूते ही चलाते  हैं और उसमें बिठाकर अन्य कितनों को ही पार कराते हैं, बड़ी योजनाएँ बनाते और चलाते हैं। कंपनियों  के व्यवस्थापक और शासनाध्यक्ष प्राय: इन्हीं विशेषताओं से सम्पन्न होते हैं क्योंकि  जिन्होंने महत्त्वपूर्ण सफलताएँ पाईं, उपलब्धियाँ हस्तगत की, प्रतिस्पर्धाएँ जीतीं, उनमें ऐसी ही मौलिक सूझ-बूझ होती है। सामान्य प्रयोग की भाषा में उन्हें ही प्रतिभावान कहते हैं। अपने वर्ग का नेतृत्व भी वही करते हैं। गुत्थियाँ सुलझाते और सफलताओं का पथ प्रशस्त करते हैं। मित्र और शत्रु सभी उनका लोहा मानते हैं। मरुस्थल में उद्यान खड़े करने जैसे चमत्कार भी उन्हीं से बन पड़ते हैं। भौतिक प्रगति का विशेष श्रेय यदि उन्हें ही दिया जाए तो अत्युक्ति न होगी। सूझ-बूझ के धनी, एक साथ अनेक पक्षों पर दृष्टि रख सकने की क्षमता भी तो उन्हीं में होती है। 

समय सबके पास 24 घंटे ही  है। कुछ लोग उसे ऐसे ही दैनिक ढर्रों के कार्यों में गुजार देते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो एक ही समय में,एक ही शरीर, मस्तिष्क से, अनेकों ताने-बाने बुनते और अनेकों जाल-जंजाल सुलझाते हैं। सफलता और प्रशंसा उनके आगे-पीछे फिरती है। अपने क्षेत्र, समुदाय या देश की प्रगति ऐसे सुव्यवस्थित प्रतिभावानों पर ही निर्भर रहती है।

4.सबसे ऊँची श्रेणी देवमानवों की है, जिन्हें महापुरुष भी कहते हैं। प्रतिभा तो उनमें भरपूर होती है लेकिन  वे उसका उपयोग “आत्म-परिष्कार से लेकर लोकमंगल” तक के उच्चस्तरीय प्रयोजनों में ही किया करते हैं। निजी आवश्यकताओं और महत्त्वाकांक्षाओं को घटाते हैं, ताकि बचे हुए शक्ति भण्डार को परमार्थ में नियोजित कर सकें। समाज के उत्थान और सामयिक समस्याओं के समाधान का श्रेय उन्हें ही जाता है। किसी देश की सच्ची सम्पदा वे ही समझे जाते हैं। अपने कार्यक्षेत्र को नन्दनवन जैसा सुवासित करते हैं। वे जहाँ भी बादलों की तरह बरसते हैं, वहीं मखमली हरीतिमा का फर्श बिछा देते हैं। वे वसन्त की तरह अवतरित होते हैं। अपने प्रभाव से वृक्ष-पादपों को सुगन्धित, सुरभित पुष्पों से लाद देते हैं। वातावरण में ऐसी उमंगें भरते हैं, जिससे कोयलें कूकने, भौंरे गूँजने और मोर नाचने लगें।

कल तक के लिए,आज के लेख का यहीं पर मध्यांतर होता है। 

जय गुरुदेव 


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