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सूक्ष्म की असीमित शक्ति को समझने का सरल सा प्रयास

हम अक्सर कहते रहते हैं कि “ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार” जैसा छोटा सा परिवार केवल समर्पित साथिओं के निस्वार्थ समर्पण एवं कर्तव्यनिष्ठा से ही चल रहा है। हर कोई समर्पित साथी यथासंभव योगदान कर रहा है जिसके लिए हम सदैव आभारी हैं। 

इसी योगदान ने आज के लेख को जन्म दिया है। 

हमारी आदरणीय पुष्पा बहिन जी ने हमें जुलाई 2026 की अखंड ज्योति के पृष्ठ 3 पर प्रकाशित कंटेंट का स्क्रीनशॉट भेजा।  स्क्रीनशॉट का शीर्षक था “सूक्ष्मीकरण की सूक्ष्मसाधना”, जिसके अंतर्गत गुरुदेव बता रहे हैं कि जो कुछ विश्व में हो रहा है उसके लिए साधना का सामान्य बल पर्याप्त नहीं है। ऐसी स्थिति को निपटने के लिए “संपूर्ण एकांत” ही समाधान है।

1984 से 1987 के एकांत के तीन वर्षों में उन्होंने “असुरता से संघर्ष” की सामर्थ्य रखने वाले पाँच वीरभद्र प्रकट किए। विश्व कुंडलिनी साधना को संपूर्ण किया। गायत्री महाविद्या के उच्चतम स्वरूप सावित्री महाशक्ति के प्रयोग में उन्होंने नए आयाम जोड़े। तीन वर्ष की साधना के बाद 1987 से 1990  के मध्य तक उन्होंने गायत्री परिवार का विशाल संगठन, शांतिकुंज की व्यवस्था के सभी सूत्र माताजी को सौंप दिए। गुरुदेव का  नीति-निश्चय निर्धारण यही था कि स्थूल शरीर का त्याग करके, सूक्ष्म शरीर से सूक्ष्म साधना को संपन्न करके असुरता  का अंत करेंगे। इस नीति का पालन करते हुए गुरुदेव ने स्वेच्छा से गायत्री जयंती 2 जून,1990 को अपने स्थूल शरीर का त्याग कर दिया एवं उनका यह नवीन साधना- संकल्प साकार हुआ।

स्थूल शरीर द्वारा की जाने वाली साधना का “सामान्य बल” पर्याप्त नहीं है, उसका एक उदाहरण  उन पर हुआ आक्रमण भी हो सकता है जब  एक सिरफिरे ने पहले पिस्तौल से हमले की कोशिश की, असफल होने पर उसने उन पर चाकू से ताबड़तोड़ कई वार किए। गुरुदेव  ने इस आक्रमण के वार अपने हाथ पर झेलकर आक्रमणकारी को क्षमा करके जाने दिया लेकिन इस घटना ने एक बात तो स्पष्ट कर दी कि “असुरता किसी को भी माध्यम बनाकर साधना में व्यतिक्रम-व्यवधान उत्पन्न कर सकती है।” 

अखंड ज्योति के इस स्क्रीनशॉट ने लेखक के अतःकरण में प्रश्नों की ऐसी झड़ी लगा दी कि आज तक समाधान ढूंढ रहे,कितना सफल हो पाए हैं कुछ नहीं पता लेकिन विश्वास है कि ज्ञानप्रसाद लेखों के समर्पित एवं योग्य पाठक कमेंट करते हुए आगे आने वाले कंटेंट को समझने/समझाने में सहायता करते रहेंगें। 

हमारे ह्रदय में ऐसे विचार उठने के पीछे एक ही कारण है कि सूक्ष्मीकरण जैसा जटिल विषय कोई सरल विषय नहीं है। इसे समझने के लिए अखंड ज्योति के जिन अंकों की सहायता ली गयी एवं असंख्य पाठकों की प्रतिक्रिया देखी गयी तो यही स्पष्ट हुआ कि अधिकतर लोग केवल प्रथा-पूर्वक, बिना समझे, बिना चिंतन किये पढ़ते ही जा रहे हैं,एक दूसरे को सैंकड़ों संदेश प्रतिदिन फॉरवर्ड किए जा रहे हैं, अंगूठे लगाकर वाहवाही बटोर रहे हैं। उन्होंने न  तो सूक्ष्मीकरण/वीरभद्र जैसे शब्दों को समझने की ज़रुरत समझी,न ही समझने के लिए कोई प्रयास किया। ऐसी स्थिति में गलत धारणाएं बनना स्वाभाविक है। 

वर्तमान विषय पर रिसर्च करते समय हम अपनेआप से पूछे जा रहे थे कि असुरता से संघर्ष लेने वाले पांच वीरभद्र, गायत्री परिवार के कोई वरिष्ठ कार्यकर्ता थे?, गुरुदेव के पांच स्थूल शरीरों में कार्यरत लीलापत शर्मा जी, शुक्ला बाबा जैसे समर्पित शिष्य थे? गुरुदेव के पांच स्थूल शरीर थे? यां फिर हम और आप जैसे साधारण से कार्यकर्ता थे? इन प्रश्नों के पीछे एक ही धारणा थी कि सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया से अर्जित हुई असाधारण शक्ति तो सभी बच्चों को उपलब्ध है, मूल्यांकन के लिए पात्रता तो है ही लेकिन गुरुदेव कभी कोई भेदभाव कहां करते हैं?

गुरुदेव ने इन प्रश्नों का समाधान करते हुए ही 1997 की अखंड ज्योति में एक लेख लिखा। लेख का शीर्षक था “गुरुसत्ता के पांच सूक्ष्म शरीर, वीरभद्र जो हम सबकी रक्षा में जुटे हुए हैं”,इस लेख के पृष्ठ 32 पर गुरुदेव लिखते हैं:

मोटी बुद्धि सूक्ष्मीकरण को या पाँच सूक्ष्म शरीरों,वीरभद्रों को समझ नहीं पाती। कोई पूज्यवर के आस-पास कार्य करने वाले पाँच वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं को इनके  वीरभद्र समझने लगे तो कोई उनकी व्याख्या अपनी-अपनी बुद्धि के अनुरूप भिन्न-भिन्न ढंग से करने लगे। वस्तुतः ये “शक्ति के पुंज” थे, जिनको मोटे रूप में निम्नलिखित पांच दायित्व पूरे करने थे। 

पहला:लोगों की उल्टी बुद्धि को उलट कर सीधा करना, विचार संशोधन करना। 

दूसरा: किसी भी कीमत पर नवनिर्माण के लिए प्रचुर साधन जुटाने के लिए समर्थ बनना। 

तीसरा: दुरात्माओं के लिए भय का वातावरण उत्पन्न कर उनका मनोबल पस्त करना।  

चौथा: जिन भावी परिजनों को प्रज्ञा परिवार में जुड़ना था उन्हें अधिकाधिक सामर्थ्य व सुरक्षा प्रदान करने के लिए विकास करना।

पाँचवाँ: उपरोक्त चारों दायित्वओं के लिए उपयुक्त “तप-रूपी खुराक जुटाना।” इस “वीरभद्र” को विशुद्धतः तपश्चर्या में निरत रहना था। 

आगे बढ़ने से पहले “सूक्ष्म शरीर रुपी वीरभद्रों” की परिभाषा समझना बहुत ही आवश्यक है,यह भी जानना बहुत आवश्यक है कि उनके पास “असुरता से संघर्ष” करने की समर्था कहाँ से आएगी।

हमारे साथिओं ने पुराणों में वर्णित वीरभद्र की कथा तो सुनी ही होगी जो भगवान शिव के एक भयंकर और रौद्र अवतार थे, जिन्हें शिवजी ने  क्रोध में आकर अपनी एक जटा उखाड़कर जमीन पर पटकने से उत्पन्न किया था। 

माता सती ने अपने पिता दक्ष की इच्छा के विरुद्ध जाकर भगवान शिव से विवाह किया था। राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ किया, जिसमें शिव और सती को निमंत्रण नहीं दिया गया। पिता के घर अपमानित होने पर माता सती यज्ञ की अग्नि में समा गईं (सती हो गईं)। इस दुःख  और भारी क्रोध में शिवजी ने अपनी जटा के एक बाल से वीरभद्र और भद्रकाली को प्रकट किया। वीरभद्र इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने अपने गणों के साथ राजा दक्ष के यज्ञ का विध्वंस किया, अहंकार में चूर राजा दक्ष का सिर काट दिया और बाद में देवताओं की प्रार्थना पर शिवजी ने दक्ष को बकरे का सिर लगाकर पुनर्जीवित किया।

यहाँ पर इस कथा का वर्णन करने का उद्देश्य वीरभद्र की शक्ति दर्शाना ही है। 

बात फिर वहीँ पर जाकर अटक जाती है कि जिन उपरोक्त पांच उद्देश्यों को सूक्ष्म में पूर्ण करना है, उन्हें असाधारण शक्ति किस प्रकार एवं कहाँ से मिल पायेगी? साफ़ दिख रहा है कि गुरुदेव ही अपनी तप शक्ति स्थानांतरित करेंगें। इतना तो स्पष्ट है कि यह शक्ति सूक्ष्म में ही स्थान्तरित होगी लेकिन किसी व्यक्ति विशेष को न होकर संगठन को,परिवार को,संस्था आदि को ही होगी। इसीलिए जहाँ गुरुदेव अपने परिजनों को अपने अंग-अवयव मानते हैं वहीँ गुरुदेव अपने पांच स्थूल शरीरों की बात भी करते हैं। गुरुदेव की जन्मस्थली आँवलखेड़ा, गायत्री तपोभूमि मथुरा,अखंड ज्योति संस्थान मथुरा, युगतीर्थ शांतिकुंज और ब्रह्मवर्चस रिसर्च सेंटर, गुरुदेव के पांच स्थूल शरीर हैं। इन पंक्तियों को पढ़ रहे पाठक,गुरुदेव के इन पांच स्थूल शरीरों की शक्ति से भलीभांति परिचित हैं। अनेकों परिजनों ने इन संस्थानों की शक्ति का अनुभव किया है। 

आने वाले दिनों में इन स्थूल शरीरों की चर्चा करने की भी योजना है क्योंकि परिजन इनके बारे में बहुत कुछ जानते हैं लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है जिनसे वोह अनजान हैं। ऐसा करने में यदि कुछ जानकारी रिपीट हुई भी अनुभव होगी तो अनुचित नहीं होगी।

अब तक की चर्चा से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न तो यही उभर कर आ रहा है कि आखिर “सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया” है क्या?  

आइए अध्यात्म के इस टेक्निकल शब्द को “Common man language (साधारण भाषा)” में, रोज़मर्रा के उदाहरण से समझने का प्रयास करें।

विज्ञान के अनुसार “बर्फ,पानी और भाप”, पानी की तीन ( Solid, liquid और gas) forms हैं। चूल्हे पर पानी गर्म करते हैं,वोह उबलना शुरू हो जाता है,उबलते पानी से भाप पैदा होती है वोह आकाश में जाती है, हल्की होने के कारण न जाने कहाँ से कहाँ पंहुच जाती है। भाप के कण बहुत ही छोटे (सूक्ष्म) होने के कारण हल्के होते हैं,आकाश से वापिस धरती पर वर्षा  की शक्ल में बरस कर अनेकों हृदयों में ठंडक प्रदान करते हैं। 

सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया को अंग्रेजी में Micronisation process कहते हैं। भाप के उदाहरण की ही तरह Aspro और Microfined Aspro के अंतर् को समझते हुए देखा जाता है कि Microfined Aspro में refine करके छोटे-छोटे से कण बनाए जाते हैं जो गोली लेते ही अपना असर शुरू कर देते हैं,सिस्टम में घुल जाते हैं, इसीलिए Microfined  Aspro को Fast-acting कहा गया है जबकि नार्मल Aspro को Slow-release कहते हैं। जब गोलियां असर दिखाने में समय लगा रही होती हैं तो इंजेक्शन दिए जाते हैं,कण का साइज कम होने के कारण फौरन असर होता है। 

तो साथिओ,“सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया” को समझने के लिए इस Fast acting medicinal action का सहारा लेना अनुचित नहीं है।

दादागुरु ने हमारे गुरुदेव को 1984 की चौथी एवं अंतिम हिमालय यात्रा में “एक से पांच” होने के लिए कहा था, सूक्ष्म होकर संसार में फैल जाने को कहा था। स्थूल शरीर की शक्ति सीमित होने के कारण गुरुदेव को निर्देश दिया गया था कि तुम अपनी शक्ति को पांच शरीरों में बांट दोगे और उनसे कार्य करवा कर संसार के दुःखों का निवारण करोगे। दादागुरु ने यह भी कहा था कि इस बार की यात्रा सूक्ष्म में की गई है एवं इसके बाद सारे कृतत्व सूक्ष्म में ही होंगे।

सूक्ष्म में की गई इस यात्रा का वर्णन “Gurudev Prophet of New Era” पुस्तक में पृष्ठ 116 पर वर्णित है।

इसी पृष्ठ पर “वीरभद्र” का भी वर्णन है जो गुरुदेव को नंदनवन से तपोवन तक ले गए थे।

यहां हम इसी मंच से प्रकाशित, इस पुस्तक पर आधारित 2021 के लेख का लिंक  देना उचित समझते हैं जिसमें अनेकों तथ्यों का अनावरण किया गया है।

आशा करते हैं कि इस प्रक्रिया का एक पक्ष समझाने में हम सफल हुए होंगें। लेकिन दूसरा पक्ष “सूक्ष्मीकरण साधना” का है जो गुरुदेव के मार्गदर्शक ने उन्हें सौंपा हुआ है। जब तीन वर्ष तक गुरुदेव ने एकांत में सूक्ष्मीकरण साधना की तो उन्होंने सावित्री साधना जैसे कई नाम दिए, उन Technicalities में न जाते हुए इतना ही कहना काफी होगा कि उन्होंने ने पांच कोशों को विकसित किया था।  इस संर्दभ में गुरुदेव बताते हैं कि 

इस बार सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया और साधना विधि तो ठीक तरह समझ में आ गई और जिस प्रकार कुन्ती ने अपने शरीर में से देव संतानें पैदा की थीं, ठीक उसी प्रकार अपनी काया में विद्यमान पाँच कोशों, अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोषों को पाँच वीरभद्रों को शक्तिपुंज रूप में विकसित करना पड़ेगा। जब तक वे पाँचों पूर्ण समर्थ न हो जाएँ तब तक वर्तमान स्थूल शरीर को कोशों के  घोंसले की तरह बनाए रखने  का आदेश है। हमारे गुरु का निर्देश है कि कोशों का विकास  होने तक अपनी जिम्मेदारियाँ स्थूल शरीर से शांतिकुंज में रहकर ही पूर्ण करनी हैं। 

यही कारण है कि गुरुदेव ने 1987 में सूक्ष्मीकरण साधना के समापन पर अपनी स्थूल काया के समेटने के संकेत देने शुरू कर दिए थे जो 2 जून 1990 वाले दिन सूक्ष्म में विलीन हो गयी। स्थूल की तुलना में  सूक्ष्म की शक्ति अनेकों गुना अधिक होने के कारण गुरुदेव अपने बच्चों के लिए कहीं अधिक उपलब्ध हैं। 

आशा करते हैं कि इस प्रेरणादायक लेख से अनेकों साथिओं को गुरुकार्य में जुट जाने की प्रेरणा मिलेगी। 

धन्यवाद, जय गुरुदेव


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