Leave a comment

अखंड ज्योति आई हस्पताल- एक प्रेरणादायक कथा –Part 2

12  अप्रैल  2021 का ज्ञानप्रसाद 

आशा करते हैं कि हमारे समर्पित और सूझवान सहकर्मियों के ह्रदय में अखंड ज्योति आई हस्पताल के बारे में पृष्ठभूमि बन गयी होगी। हमारा सात मास का अथक प्रयास तभी सफल होगा जब हमारे  सहकर्मियों के ह्रदय में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा घड़ित  शिष्यों का समर्पण उभर कर प्रेरणा देगा और कहेगा “अरे क्या सोच रहा है ,कहीं सोच -सोच में ही यह अनमोल जीवन व्यतीत न हो जाये “ इस लेख को लिखने में हमने क्या -क्या प्रयास किये ,किस -किस से फ़ोन पर सम्पर्क किया, कैसे ऑनलाइन रिसर्च की इत्यादि का कल वर्णन करेंगें। 

तो आओ  चलें लेख के दूसरे और अंतिम भाग की ओर :

_____________________________________  

तिवारी जी  का कहना है कि उन्हें  ग्रामीण परिवारों को इस बात के लिए राजी करने में बहुत परिश्रम करना पड़ा  कि लड़कियों की छोटी आयु में  शादी (early marriage ) की न  सोचें बल्कि उन्हें मस्तीचक भेजें जहां उनके लिए छह साल तक मुफ्त रहने और प्रशिक्षण की व्यवस्था है। एक दशक में 150 लड़कियों को प्रशिक्षण देकर ऑप्टीमीट्रिस्ट बनाया गया है और सात लड़कियों ने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में बिहार का प्रतिनिधित्व किया है।  यह कार्यक्रम इतना सफल रहा है कि बिहार भर के गांवों से करीब 500 लड़कियां यहां दाखिले के लिए वेटिंग लिस्ट में हैं। बिहार में सीवान, पीरो, गोपालगंज और डुमरांव में चार प्राथमिक दृष्टि जांच केंद्र और एक उत्तर प्रदेश के बलिया में चल रहा है।  भोजपुर के कस्बे पीरो का जांच केंद्र तो पूरी तरह महिलाएं चला रही हैं।  इसका नेतृत्व 22 वर्षीया दिलकुश शर्मा करती हैं, जिन्होंने अखंड ज्योति के विज्ञापन को पढ़कर उनसे  संपर्क किया था।  

तिवारी जी  कहते हैं: 

”हमारी सोच है कि अगले चार साल में महिलाएं ही अस्पताल के कम से कम 50 प्रतिशत कार्यों का नेतृत्व करें ” 

तिवारी जी अपने दादा प्रसिद्ध समाज सुधारक और आध्यात्मिक गुरु  श्री रमेश चंद्र शुक्ला जी  की शिक्षाओं का अनुसरण कर रहे हैं।  यह एक भली प्रकार स्थापित तथ्य है कि किसी भी चिकित्सा देखभाल कार्यक्रम की सफलता के लिए समर्पित कर्मियों का एक पूल  इस  कार्यक्रम की  एक  रीढ़ की हड्डी होता  है। यह भी सच है कि भर्ती करना, उन्हें प्रशिक्षित करना  और फिर retain  रखना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। ऐसे मानव संसाधनो का उच्च कारोबार समस्या को और भी महत्वपूर्ण बनाता है। चुनौतीपूर्ण भूगोल के तहत गरीब बुनियादी ढांचे  इसे और भी   अधिक जटिल बना देते  हैं । तो कहाँ से आयेंगें इस प्रतिभा वाले एक्सपर्ट।  यहाँ काम आयी out -of – the box तकनीक और एक नवीन  सोच। 

Out of the box : 

आउट-ऑफ-द-बॉक्स (Out of the box) सोचने से हमें अखंड  ज्योति नेत्र अस्पताल में भर्ती करने, प्रशिक्षित करने और स्थानीय प्रतिभा को सफलतापूर्वक बनाए रखने में मदद मिली है। Out -of -the box का  अर्थ  उन विचारों का पता लगाने के लिए प्रयोग में लाया जाता हैं  जो रचनात्मक और असामान्य हैं और जो नियमों या परंपरा द्वारा सीमित या नियंत्रित नहीं हैं। संभवतः हम रुपया -पैसा खर्च करते हैं , इतने अधिक वर्ष खर्च करने के उपरांत हम फिर नौकरी के लिए आवेदन करते हैं ,फिर भी कोई पता नहीं कि नौकरी मिलेगी य नहीं। गुरुदेव की  दूरदर्शिता ने यहाँ काम किया। 

आओ देखें यह स्कीम कैसे काम में आयी। 

Football to Eyeball :

“फुटबॉल टू आईबॉल” कार्यक्रम 2010 में शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम के तहत, स्थानीय गांवों की लड़कियों को पेशेवर ऑप्टोमेट्रिस्ट के रूप में ट्रेनिंग  प्राप्त करने के लिए फुटबॉल खेलने और प्रशिक्षित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जिससे उन्हें अंधापन को ठीक करने और एक बहुत ही पितृसत्तात्मक समाज में व्यापक सामाजिक प्रभाव बनाने के लिए सशक्त बनाया जाता है। पितृसत्तात्मक समाज का अर्थ है कि जैसे एक पिता परिवार का मुखिया होता है ,माता क्यों नहीं।  यह अनूठा कार्यक्रम युवा लड़कियों के लिए एक आइसब्रेकर के रूप में फुटबॉल का उपयोग करता है। 12-16 वर्ष की आयु के बीच की लड़कियों का पालन-पोषण अस्पताल द्वारा पेशेवर फुटबॉल खिलाड़ी या ऑप्टोमेट्रिस्ट या दोनों बनने के लिए किया जाता है।

मृत्युंजय जी  का फुटबॉल के प्रति जुनून था परन्तु किसी दुर्घटना के कारणवश अब वह फुटबॉल खेल नहीं सकते। उन्होंने जब देखा  कि  एक घर की छत पर कुछ लड़कियों को नीचे  ग्राउंड में लड़कों को फुटबॉल खेलते देखा तो उनके मन में आया कि  क्यों न लड़कियों को भी फुटबॉल खेलने में प्रेरित किया जाये।  यह आईडिया तो ठीक था लेकिन बिहार जैसे प्रदेश में जहाँ लड़कियों को घर से बाहर निकलने की इज़ाज़त नहीं थी ,उनको shorts पहन कर किसने खेलने देना था।  कार्य तो बहुत ही कठिन था।  परिवारों का विरोध अवश्य ही आड़े आना था और आया भी, लेकिन मृतुन्जय जी का तो एकमात्र उदेश्य था कि किसी प्रकार इन बच्चियों को घर के बाहर निकाला   जाये  और उन्हें भी खुली वायु में सांस लेने दिया जाये।  इस प्रकार  जागृति आने से कई समस्याओं का निवारण हो सकता था और हुआ भी। नारी शोषण और  बाल विवाह जैसे अभिशाप को समाप्त या  कम करने में  सहयोग मिलेगा   

तो हैं न मृतुन्जय जी के अन्तःकरण में परमपूज्य गुरुदेव की  शिक्षा।  

पूर्वी भारतीय राज्य बिहार के एक दूरदराज के गाँव मस्तीचक में   केवल  दस-बेड के अस्पताल से  आरम्भ होकर 4000 वार्षिक सर्जरी  करने वाला यह अस्पताल केवल 15  वर्षों में  100,000  सर्जरियां करने में समर्थ है और सबसे बड़ी बात है कि इस 100,000  में से  85000  निशुल्क हैं।  इस सारे समय में  इसे कभी भी नेत्र रोग विशेषज्ञों, विशेष रूप से ऑप्टोमेट्रिस्ट और नेत्र सहायक के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा।

युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य चेरिटेबल ट्रस्ट:

परमपूज्य गुरुदेव  के आदर्शों और शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर  2004  के शुरू में युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य चेरिटेबल ट्रस्ट का आरम्भ किया गया। यह ट्रस्ट  बिहार में गरीबों और दलितों के कल्याण के लिए काम करने के लिए  में बनाया गया था  क्योंकि राज्य  सरकार हमेशा से  मानव कल्याण के पहलू पर चुप्पी साधे थी । इस  ट्रस्ट का गठन श्री रमेश चंद्र शुक्ला (1917-) ने किया था जो  हमारे गुरुदेव कि शिष्य थे।  ट्रस्ट का एक उद्देश्य संचालित दृष्टिकोण है जो मूल्यों और विश्वासों के प्रति असम्बद्ध रवैया रखता है। उपासना, साधना और आराधना जैसे गुरुदेव के तीन स्तम्भ इस ट्रस्ट के pillar हैं।  स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला जागरण, पर्यावरण, सामाजिक बुराइयों को खत्म करना, उद्यमशीलता और आध्यात्मिकता को बढ़ावा देना इस ट्रस्ट के मुख्य  उद्देश्य  हैं। लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है ताकि उनकी गतिविधियों से लोगों को सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक बाधाओं को दूर करने में मदद मिले और सकारात्मक बदलाव आए। 

इसीलिए हमने इस लेख के आरम्भ में पाठकों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया था कि स्वयं भी गूगल सर्च करके इस में अधिक जानकारी प्राप्त करें। 

” सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।  

जय गुरुदेव 

Leave a comment

जब महात्मा आनंद स्वामी ने परमपूज्य गुरुदेव के चरण पकड़ लिए – ऑनलाइन ज्ञानरथ

शांतिकुंज वीडियो द्वारा प्रकाशित और ऑनलाइन ज्ञानरथ द्वारा शेयर की जा रही इस पांच मिंट की वीडियो में आपको गुरुदेव की शक्ति का अनुभव करने का एक और स्वर्ण अवसर मिल रहा है। आदरणीय महेंद्र भाई साहिब ,व्यवस्थापक युगतीर्थ शांतिकुंज के शब्दों में महात्मा जी ने उस समय परमपूज्य गुरुदेव के चरण पकड़ लिए जब उन्हें गुरुदेव की शक्ति पर विश्वास हो गया। गायत्री माता के सामने 100 रुपए का नोट चढ़ाते हुए गुरुदेव ने कहा -रूक जाओ, मुझे कैमरा वाले को बुला लेने दो ताकि वह भी देख ले कि मूर्ति पूजा का विरोध करने वाले आर्यसमाजी कैसे मूर्ति पूजा कर रहे हैं। 92 वर्ष का अतिसफल जीवन व्यतीत करने वाले महात्मा आनंद स्वामी सरस्वती एक उच्च व्यक्तित्व के मनुष्य थे, गायत्री उपासक थे । उनके बारे में जितना कहा जाये कम है। ऑनलाइन ज्ञानरथ के कर्मठ ,समर्पित सहकर्मी इस महान शक्ति के चरणों में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। आने वाले लेखों में महात्मा जी के जीवन पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जायेगा। आइये हम सब इक्क्ठे होकर गुरुवर की शक्ति का विश्वभर में प्रचार-प्रसार करते हुए इस वीडियो को अधिक से अधिक परिजनों में शेयर करें। जय गुरुदेव

Leave a comment

भगवान शिव के  नेत्र -राक्षसताल और मानसरोवर

22 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद : भगवान शिव के  नेत्र -राक्षसताल और मानसरोवर

आज का लेख  ” गुरुदेव की हिमालय यात्रा सीरीज ” का अंतिम लेख है। इन लेखों को लिखते-लिखते दिव्यता का आभास तो होता ही रहा लेकिन चेतना की शिखर यात्रा 2 शीर्षक पुस्तक को बार -बार पढ़ने का मन होता रहा। पेजले भी एक बार लिखा था कि अगर जानकारी बहुत अधिक हो तो उसे कम शब्दों में compile बहुत ही कठिन कार्य  होता है।  पिछले कई घंटों में हमें तो स्मरण ही नहीं है कि कितनी वीडियोस देख डालीं , कितनी वेबसाइट देख डालीं , इतना विस्तृत ज्ञान है कि हम तो यही कह कर बंद कर रहे हैं कि ज्ञान असीमित है और इसको सीमाबद्ध करना हमारे हाथ में है। 

तो आइये  एक बार फिर से चलते हैं  गुरुदेव के साथ-साथ कैलाश मानसरोवर क्षेत्र में :

राक्षसताल और मानसरोवर झील :

चेतना की शिखर यात्रा 2 में वर्णित गुरुदेव राक्षसताल के मार्ग से कैलाश मानसरोवर पहुंचे थे। कैलाश पर्वत ( ग्लेशियर ) पर विराजमान भगवान भोले नाथ जहाँ हम सबको दिव्यता प्रदान करते हैं ,वहीँ मानसरोवर झील एक दिव्य वातावरण देकर मानवता का पोषण करती है। 

ज्ञानगंज से निकल कर गुरुदेव  को करीब चालीस मील चलना पड़ा होगा। पठार पर उतरते हुए उन्हें दूर पक्षी उड़ते दिखाई दिए। पक्षी विविध प्रकार के नहीं थे। सफेद रंग के ये पक्षी पास आने पर पता चला कि हंस हैं। वहां बताने वाला कोई  था नहीं केवल  अनुमान ही लगाया जा सकता था। पठार से उतरते हुए  गुरुदेव ने मनुष्य के नेत्र के समान एक विशाल सरोवर देखा जिसका आकर ऐसा था कि  आंखों के आसपास पलकों, कोरों और कनपटियों तक जैसी रेखाएं फैली होती है।  पहाड़ी से उतरते हुए तालाब स्पष्ट रूप से आंख की तरह लगता था।

इस सरोवर का नाम राक्षसताल झील है । उसके आकार प्रकार और पहले मिले वर्णन से गुरुदेव  ने अनुमान लगाया कि इसी ताल के बारे में शास्त्रों ने “शिव का नेत्र” होने की बात कही है।पौराणिक ग्रंथों के आधार पर मानसरोवर झील का विचार सृष्टि के रचियता ब्रह्मा जी के मन में सबसे पहले आया था। मानसरोवर का शाब्दिक अर्थ मानस -सरोवर है यानि “मन का सरोवर।” मान्यता है कि यहाँ देवी सती का दायां हाथ गिरा था ,झील के बाहिर एक शिला को उसी का रूप मान कर पूजा जाता है। मानसरोवर झील  के पास ही दूसरी झील है जिसका नाम राक्षसताल है । इसे रावणताल भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है की रावण ने भगवान भोले नाथ की भक्ति करके इसी झील में अपने शीश अर्पण किये थे। पौराणिक मान्यताओं के साथ -साथ हम वैज्ञानिक तथ्यों को नज़रअंदाज तो नहीं कर सकते।Geology के वैज्ञानिकों के मुताबिक राक्षसताल और मानसरोवर दोनों एक ही झीलें थीं और धरती के हलचल से अलग हो गयीं। मानसरोवर का जल मीठा परन्तु राक्षसताल का जल खारा है।  समुद्र तल से 15000 फुट की ऊंचाई पर स्थित यह पौराणिक और आधुनिकmasterpiece साधकों और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। चार सम्प्रदाओं -हिन्दू ,जैन ,बौद्ध और बोन धर्म या बॉन धर्म ( तिब्बत का धर्म  ) में इस क्षेत्र की बहुत अधिक मान्यता है। गुरुदेव ने मानसरोवर झील के तट पर बैठ कर कुछ देर ध्यान किया और फिर परिक्रमा भी की। एक परिक्रमा में लगभग 3 घंटे लगते हैं। गुरुदेव देख रहे थे कि हंस मोती खा रहे हैं कि नहीं। हंस मोती तो खाते दिखे नहीं लेकिन चुन-चुन कर ही  खा रहे थे। भावार्थ तो फिर भी यही बनता है कि हंस इतना बुद्धिमान है कि चुन -चुन कर खा रहा है। हमारे पाठकों/ सहकर्मियों ने यह बहुचर्चित भजन तो अवश्य ही सुना  होगा : रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा,हंस चुगेगा दाना-दुनका, कौआ मोती खाएगा। हंस इतना विवेकशील है की वह ठीक और ग़लत का अंतर् करने में सक्षम है। वह जानता   है कि मानसरोवर झील में से मछली खानी है या वनस्पति। इस भजन की पंक्तियों में कलयुग की बात हो रही है जब विवेकशील ,बुद्धिमान लोग ,हंस वृति  वाले लोग दाने खांयेंगें और कौओ वाली वृति के चालक लोग मोती खायेंगें। “निर्मल चेतना शुद्ध और सत्य को ही ग्रहण करती है, शेष को नकार देती है।” कैलाश पर्वत मानसरोवर से दिखाई तो देता है लेकिन इतना पास भी नहीं है। यह हम इसलिए कह रहे हैं कि गूगल सर्च से अलग -अलग परिणाम आए तो हमने इस दूरी को अपने सूझवान पाठकों पर ही छोड़ दिया। शिवलिंग के आकार का प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण कैलाश पर्वत एक आध्यात्मिक स्रोत होने के कारण पुरातन काल से ही हमारा मार्गदर्शन कर रहा है। इस के आसपास के पर्वतों  की संख्या 16 है। 16 पंखुड़ियों वाले कमल के बीच विराट शिवलिंग एक अद्भुत दृश्य दिखते हैं। आप इस दृश्य के satellite image गूगल से देख सकते हैं। शिवलिंग आकार वाला कैलाश पर्वत सबसे ऊँचा है और काले पत्थर  का बना हुआ है और आस पास की 16 पंखुड़ियां लाल और मटमैले पत्थर  की हैं। कैलाश पर्वत की परिक्रमा करना अपने में एक महत्व लिए हुए है। धारणा है की इसकी परिक्रमा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।  गुरुदेव को परिक्रमा करते कुछ तिब्बती मिले। उनमें से कइयों की आयु 60 वर्ष के लगभग होगी, उनमें से एक ने गुरुदेव को पूछा – आप भारतीय हैं ? हमारे गुरु को आपने क्या दर्ज़ा दिया हुआ है ? उन दिनों तिब्बत से लामा लोग भारत आया करते थे। चीन ने तिब्बत की सभ्यता में घुसपैठ की और उसका परिणाम हम आज भी देख रहे हैं। उस वृद्ध ने फिर पूछा – बताओ न ,आप तो अपने आदि गुरु को प्रणाम करने जा रहे हो। हमारे लामा भी तो कैलाश के ही रूप हैं। गुरुदेव ने कहा –

” कोई भी गुरु तिब्बत या भारत का होने कारण पूजनीय नहीं होता। यह नियति का विधान भी हो सकता है। अगर हम एक ही दिशा में प्रगति करते रहें और दूसरी दिशा की उपेक्षा करें तो प्रकृति का उल्लंघन कर रहे हैं। तिब्बत के शासकों और धर्मगुरुओं ने चेतना के क्षेत्र में तो बहुत प्रगति की परन्तु लौकिक पक्ष छोड़ दिया। उसका परिणाम यह हुआ कि व्यवाहरिक जगत में वह कमज़ोर हो गया। उसकी प्रगति एकांगी हो गयी और इसी का दंड तिब्बत को भुगतना पड़ा। “

गुरुदेव का तर्क सुनकर वह वृद्ध आशान्वित हुआ। उसने फिर पूछा – क्या तिब्बत को अपना गौरव फिर से वापिस मिल सकेगा ?

गुरुदेव कहने लगे :

” कोई भी जाति हमेशा एक ही दशा में नहीं रहती , जाति ही क्यों ,व्यक्ति यां इस प्रकृति का कोई भी घटक हमेशा एक जैसा नहीं रहता। उत्थान और पतन दोनों ही स्थितियां सभी के जीवन में आती हैं। “

यह सुनकर वह वृद्ध तिब्बती गुरुदेव के समक्ष नतमस्तक हो गया। गुरुदेव उससे छोटी आयु के थे और न ही कोई योगी ,सन्यासी लग रहे थे। उसने फिर एक और जिज्ञासा व्यक्त की। कहने लगा – “भगवान शिव का दिव्यधाम कैलाश क्या यही है ?” यह कह कर वह वृद्ध करबद्ध मुद्रा में गुरुदेव के सामने खड़ा हो गया। गुरुदेव ने उस पर एक दृष्टि डाली और कहने लगे ;

” जिस लोक को भगवान शिव का दिव्यधाम कहते हैं वह तो अपार्थिव ( अलौकिक ) है। उसका कोई रूप थोड़े ही है। इसी तरह अयोध्या भगवान राम और ब्रजधाम भगवान कृष्ण के प्रतिरूप हैं। “

हम अपने पाठकों को आग्रह करेंगें कि वह इसके बारे में डिटेल से मनन करें क्योंकि त्रुटिपूर्ण या अधूरी धारणा प्रायः गलत निष्कर्ष ही निकालती है।

कैलाश पर्वत की परिक्रमा अपने सामर्थ्य के अनुसार कुछ दिनों में ही पूरी होती है। इसके शिखर पर जाने का दुःसाहस तो अभी तक किसी ने नहीं किया। लगभग 22000 फुट ऊँचे शिखर तक पहुँचने के लिए डेढ़ मील सीधी चढ़ाई है। तिब्बत में होने के कारण गुरुदेव को विचार आया कि अदिबद्री की और रुख किया जाये। बौद्ध सम्प्रदाय के धूलिंग मठ और अदिबद्री का आपस में कुछ सम्बन्ध तो है लेकिन इस पुस्तक ” चेतना की शिखर यात्रा 2 ” में बहुत ही संक्षिप्त वर्णन है। हाँ इतना वर्णन अवश्य है कि लगभग 1500 वर्ष पूर्व बद्रिकाश्रम धूलिंग मठ में ही था। 

तो मित्रो हम गुरुदेव की इस वाली हिमालय यात्रा को यहीं पर पूर्ण विराम देते हैं।

इस लेख को मिला कर हमने केवल हिमालय यात्रा पर ही कुल 15  लेख आपके समक्ष प्रस्तुत किये। लगभग 6 0 पन्नों ,25 000 शब्दों  के यह लेख हमने अपने विवेक और सहकर्मियों की सहायता से घोर चिंतन ,मनन और रिसर्च से तैयार किये, अनगनित वीडियो देखीं ,कई परिजनों से सम्पर्क करके गुरुदेव के  बारे में जानने का प्रयास किया। इन लेखों द्वारा जिन्होंने भी दादा गुरु, उदासीन बाबा , निखिल , महावीर स्वामी ,सत्यानन्द , कालीपद बौद्ध परिजन ,संदेशवाहक ,प्रतिनिधि के सानिध्य में हुए वार्तालाप का आनंद प्राप्त किया वह सब अत्यंत सौभाग्यशाली हैं। जो इस सौभाग्य से वंचित रह गए उनके लिए यह सारे लेख  हमारी  वेबसाइट   पर सुरक्षित हैं। वेबसाइट पर एडिटिंग options होने के कारण यह लेख पढ़ने में  अधिक आनंद प्राप्त हो सकता है। 

इन सीरीज को समाप्त करते हुए हमें बहुत ही प्रसन्नता और आत्मिक शांति का आभास  हो रहा  है लेकिन एक बहुत ही बहुत ही छोटा  सा टॉपिक जिससे किसी लेख में शामिल करना  संभव न हो सका हम यह एक पैराग्राफ में लिखने की अनुमति कहते हैं। यह टॉपिक हैं ब्रह्मकमल का।  हिमालय क्षेत्र में परमपूज्य ने कई छोटी बड़ी झीलें देखीं ,वैसे तो कड़ाके की सर्दी और मौसम के कारण इन पहाड़ों पर कोई भी वनस्पति होने की बहुत ही कम सम्भावना होती है लेकिन झील में ब्रह्मकमल के दर्शन करना कोई साधारण बात नहीं है।  गुरुदेव ने कई बार देखे।  गुरुदेव एक बार झील के किनारे बैठे कितनी ही देर तक खिले ब्रह्मकमल पुष्पों को देखते रहे ,निहारते रहे।  गुरुदेव ब्रह्मकमल के पास गए ,स्पर्श किया और एकदम हल्का महसूस करने लगे , उन्हें लगा जैसे शरीर स्वयं ही चल रहा हो। केवल इच्छामात्र से ही कदम चल रहे हों ,कोई भी प्रयत्न करने की आवश्यकता न थीं। उस दिन जब गुरुदेव को दादा  गुरु ने आवाज़ लगाई थी , उस समय भी गुरुदेव झील के तट पर इन पुष्पों से आत्मसात कर रहे थे। उनकी चेतना को आभास हो रहा था जैसे एक पुष्प स्वयं ही हवा में तैरता हुआ निकट आ गया हो , इतना निकट कि गुरुदेव के ह्रदय पटल पर अपनी छाप छोड़ रहा हो।  थोड़ी देर में ही उन्हें ऐसा लगा कि जैसे अपना आपा  भी ब्रह्मकमल की तरह सुगन्धित हो गया हो और आस पास कितने ही  दिव्य ब्रह्मकमल खिल गया हों। 

ब्रह्मकमल की दिव्यता :

ब्रह्मकमल यानि ब्रह्मा जी का कमल का अंग्रेजी नाम    night blooming cereus, queen of the night, lady of the night का नाम है।  यह एक दुर्लभ,दिव्य  पुष्प है और हिमालयी क्षेत्र में  देखा गया है। हरे रंग के  इस पुष्प की विशेषता है कि यह वर्ष में केवल एक ही बार सूर्यास्त के बाद खिलता है और 2 घंटे में  पूरा 8 इंच खिल जाता है। उत्तराखंड प्रशासन ने इस पुष्प को प्रदेश पुष्प का दर्ज़ा दिया है।  ऐसी मान्यता है कि अगर आप भाग्यशाली हैं तो उत्तराखण्ड की यात्रा करते समय आपको इस दिव्य, इच्छा-पूर्ती करने वाले पुष्प के दर्शन हो सकते हैं। पौरोणिक मान्यताओं के आधार पर इस पुष्प को ब्रह्मा जी के साथ भी जोड़ा गया है,जो सृष्टि के रचनाकार हैं।  हम सबने ब्रह्मा जी को एक कमल में विराजित हुए  देखा होगा जो विष्णु जी की नाभि से पैदा होता है। जब हम यह सारी  रिसर्च कर रहे थे तो हमें 16 जून 2020 की एक वीडियो मिली जिसमें दिखाया गया है कि Mysore   के किसी घर में  दुर्लभ ब्रह्मकमल के सैंकड़ों फूल देखे गए है।  ऐसा माना गया है कि कोविड के कारण अधिकतर लोग  घरों के अंदर रहे , पर्यावरण में शुद्धि आयी और इसी कारण यह सब कुछ हुआ है।  जय गुरुदेव

हम कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें और आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें 

Leave a comment

दादा गुरु ने पूज्यवर को  दी गुरुपूर्णिमा की गुरुदक्षिणा

21 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद :दादा गुरु ने पूज्यवर को  दी गुरुपूर्णिमा की गुरुदक्षिणा https://drive.google.com/file/d/1QdR29v1N6UoS-eZAuYCTxIZTfmsFoYBp/view?usp=sharing

हम सब बॉलीवुड से भलीभांति परिचित हैं।  बॉलीवुड की फिल्में अक्सर ढाई -तीन घंटे की होती हैं और इनमें एक मध्यांतर यानि interval होता है।  1970 में आयी राज कपूर जी की फिल्म मेरा नाम जोकर पांच घंटे की थी और  इसमें 2 मध्यांतर थे।  हमें तो समझ ही नहीं आ रहा कि हमारी फिल्म में जिसका आंखों देखा हाल ( live show ) आप आजकल के ज्ञानप्रसाद में देख रहे हैं कितने मध्यांतर होंगें।  अगर शब्दों की सीमाबद्धता न हो तो हम तो खाना -पीना, सोना तो क्या सबकुछ ही भूल जाएँ और लिखते ही जाएँ – अपने मित्र और सहकर्मी सविंदर पल जी की तरह। परमपूज्य गुरुदेव की हिमालय यात्रा  एक ऐसा रोचक और दिव्य टॉपिक है कि इसको लिखते-समय ,पढ़ते-समय पूरी तरह डूब कर ही आनंद और आत्मिक तृप्ति का आभास  होता है। ऐसी फीलिंग  हमारे कुछ समर्पित पाठकों ने भी व्यक्त की, जब उन्होंने हमें मैसेज किये  “जय गुरुदेव, लेकिन इसको आराम से तस्सली से पढ़ेंगें – इस  ज्ञानप्रसाद का ज्ञानपान  चलते-चलाते करने वाला नहीं है।” आँखों देखा हाल का चित्रिण करने में हम कितने सफल हुए कमेंट करके अवश्य बताएं और अगर आपके ह्रदय को छुए तो औरों को भी ज्ञानपान करवाएं – आखिर  हमारे गुरु का प्रसाद सभी को मिलना चाहिए।  इस आँखों देखा हाल को और lively बनाने के लिए हम कैलाश मानसरोवर क्षेत्र का एक वीडियो लिंक दे रहे हैं जिसमें आप देख सकते हैं परमपूज्य गुरुदेव किस क्षेत्र में गए थे -केवल हम सबके लिए -अपने बच्चों के लिए। 

तो चलते हैं लेख की ओर :         

_____________________________

आज के लेख को हमने दादा गुरु द्वारा दर्शाये गए विराट स्वरुप में सम्माहित विश्व की समीक्षा , गुरु -शिष्य समर्पण और विश्वभर में फैले गायत्री परिवार का मार्गदर्शन करने के निर्देश को आधार बनाया है । लगभग 6 दशक पूर्व दिए गए निर्देशों का आज 2021 में भी पूर्णरूप से पालन किया जा रहा। गायत्री परिवार का प्रत्येक सदस्य गुरुदेव के निर्देश का पालन करना अपना कर्तव्य ही नहीं अपना धर्म समझता है।

तो आइये सुनें उस दिव्य गुरु -शिष्य वार्तालाप को :

जब मार्गदर्शक सत्ता ने गुरुदेव के सिर से अपना हाथ हटाया तो गुरुदेव बिल्कुल मौन होकर दादा गुरु को टकटकी लगा कर देख रहे थे। कोई प्रश्न और जिज्ञासा नहीं ,केवल तृप्ति और शांति का भाव था। दादा गुरु कहने लगे :

” यह जो दिव्य रूप आपने देखा है वह परमसत्ता है जो अपनी अनंत भुजाओं से समस्त लोकों को आलिंगन कर रही है। अपने लाखों हाथों से वह इस सृष्टि का निर्माण कर रही है ,पोषण कर रही है और संहार भी इन्ही भुजाओं से होता है। सूर्य और चन्द्रमा जैसे उस परमसत्ता के नेत्रों में एक साथ भस्म कर देने वाला तेज और दाहक ताप को शांत करने वाली सौम्य शीतलता प्रदान करने की क्षमता है। कल -कल बहते झरनों का मधुर संगीत और उनके सहित वेगवती नदियों की धाराएं उस परमसत्ता के ही स्फुलिंग ( sparks ) हैं। “

दादा गुरु थोड़ा रुककर मौन हुए तो गुरुदेव ने जिज्ञासा भरे नेत्रों से नतमस्तक होकर उनके चरणों की ओर देखा ,जैसे पूछ रहे हों अब आगे क्या आदेश है। दादा गुरु कहने लगे :

” सर्वशास्त्रमयी  मंत्र -गायत्री मंत्र  जिसने तुम्हारी चेतना को इस शिखर तक पहुँचाया है , उसके माध्यम से इस विराट विश्व की, विशाल पुरष की आराधना करो। विश्वरूप परमसत्ता के रोम -रोम को इन अक्षरों से सजाओ। “

जब हमने गूगल से सर्वशास्त्रमयी का अर्थ जानना चाहा तो सबसे उचित अर्थ जी हमें मिला वह था –सभी शास्त्रों के ज्ञान से सम्पन्न। तो गायत्री मन्त्र ही सब शास्त्रों के ज्ञान से सम्पन्न है।  

गुरुदेव फिर नतमस्तक हुए ,यह उनकी आज्ञा शिरोधार्य करने का प्रतीक था। दादा गुरु फिर कहने लगे :

” महाकाल एक बार फिर अवांछनीय को नष्ट करने का संकेत कर चुका है। इस नष्ट और ध्वंस से जो स्थान रिक्त होगा उसे भरने के लिए सृजन की देवी गौरी तैयार हो गयी है। जाओ और जागृत आत्माओं को नियंता के इस सन्देश से अवगत कराओ। ”  

यही है  गायत्री परिवार का दिव्य सन्देश जो हमारे पूज्यवर को दादा गुरु ने दिया और हमारे गुरुदेव ने समस्त विश्व में फैले  हम सब बच्चों  को दिया। ऑनलाइन ज्ञानरथ का प्रत्येक सहकर्मी सोई हुई आत्मााओं को जगाने में और जागृत आत्माओं को अपने गुरु के इस सन्देश /निर्देश से अवगत कराने  का यथाशक्ति- यथासंभव प्रयास कर रहा है। सभी सहकर्मियों को हमारा नमन वंदन। जब गुरुदेव दादा गुरु के साथ इन  सारी लीलायों  और संदेशों का आनंद उठा रहे थे उन्हें  याद ही नहीं रहा कि आषाढ़ मास  का शुक्ल पक्ष आरम्भ हुए दो सप्ताह हो गए हैं और आज गुरु पूर्णिमा की वेला है। आकाश में पूर्णचन्द्र खिला  हुआ था। बिना किसी पूजा ,उपचार और कर्मकांड सम्पन्न किए गुरुदेव ने दादा गुरु  के समक्ष आत्मनिवेदन किया कि मुझे  आज सारी रात्रि आप के सानिध्य में व्यतीत करनी है। इसके लिए कोई शब्दों का उपयोग तो नहीं किया परन्तु दादा गुरु  ने इस निवेदन को पढ़ लिया। कहने लगे :

” एक रात्रि क्यों ? यह चेतना तो सम्पूर्ण जीवन भर  तुम्हे प्रतिनिधित्व प्रदान करता रहेगा। यहाँ से मिलने वाले सभी निर्देशों का समर्पण भाव से पालन करना ही तुम्हारी गुरुपूर्णिमा की दक्षिणा है।

जब दादा गुरु ने ” यह चेतना “ का सम्बोधन किया था तो अपनी ओर संकेत किया था। अब का निर्देश तो यही था कि अभी कुछ समय हिमालय में ही व्यतीत करना है। मन में बिल्कुल शांति और आश्वासन का भाव था। आगे की यात्रा के लिए कोई मार्गदर्शक की आवश्यकता नहीं थी। कोई पता नहीं था आगे कहाँ जाना है,किस दिशा में जाना है । संवाद और सम्पर्क यहीं पर समाप्त हुआ और दादा गुरु यहाँ से प्रस्थान कर गए।

हमारे पाठकों को गुरु -शिष्य समर्पण के स्तर का आभास तो अवश्य ही हो गया होगा और साथ में ही इस परीक्षा की कठिनता का भी जिसमें दादा गुरु इस बियाबान क्षेत्र में  गुरुदेव को अकेले छोड़ कर चले गए।  प्राचीन शिक्षक इस स्तर के  कठिन कार्यपालक ( hard task master ) होते थे। और इसी कारण शिष्य की योग्यता भी चरम स्तर की होती थी। इसका अर्थ कदापि यह  नहीं निकलता कि आज के शिष्य में किसी प्रकार की  कमी है। जब हम देख रहे हैं कि गुरु -शिष्य का मिलन गुरु पूर्णिमा के पावन दिवस को हो रहा है तो  विश्वास कर सकते हैं  कि यह  मिलन भी दादा गुरु ने ही नियत किया होगा। विधि का विधान अटल है , ऐसा कहना ग़लत नहीं होगा

दादा गुरु के जाने के उपरांत गुरुदेव ने कैलाश मानसरोवर की ओर प्रस्थान किया। रास्ता देखा नहीं था ,न किसी से पूछा  जा सकता था। वहां कोई था भी तो नहीं। दादा गुरु ने तो अंतरात्मा से इस तरफ जाने का निर्देश दिया था। तापस ऋषि तो चले गए थे ,हवन कुंड भी ठन्डे हो चुके थे। कालीपद नाम के  गुरुभाई जो नंदनवन से गुरुदेव को लेकर  आए थे, उन्होंने ज़्यादा बात तो की नहीं थी पर इतना शायद कहा था राक्षसताल होते हुए मानसरोवर पहुंचा जा सकता है। यह रास्ता करीब 50 मील दूर है परन्तु है बहुत ही  दुष्कर। कोई संकेत नहीं ,यह भी पता नहीं किस दिशा में जाना है और इस समय कहाँ पर हैं।  दादा गुरु ने भी  जाते समय कोई संकेत नहीं दिया था। इसी उधेड़बुन में गुरुदेव उसी दिशा में चल पड़े जिस तरफ दादा गुरु गए थे।

इस तरफ जा रहे थे तो लगा कि रास्ता भटक गए हैं किसी ने कहा तो नहीं ,मन में ही ऐसा प्रबोध उठा। गुरुदेव तिब्बत की सीमा तक पहुँच गए थे,लेकिन यह नहीं पता कि कहाँ पर हैं। कुछ दूर चलते हुए इक्का -दुक्का युवक दिखाई दिए। यहाँ तक पहुँचने में प्रबल सामर्थ्य होना चाहिए ,पर गुरुदेव  कैसे पहुँच गए ,यह तो दादा गुरु का सामर्थ्य ही है। उन युवकों से  पूछा- “कैलाश मानसरोवर जाना है ,क्या ठीक जा रहे हैं ?” उन्होंने कहा – “नहीं आप कैलाश मानसरोवर से अलग रास्ते की तरफ निकल आये  हैं। यह मार्ग थोड़ा भिन्न है पर इस रास्ते से भी आप कैलाश मानसरोवर पहुँच सकते हैं।”

तिब्बत का ज्ञानगंज:

गुरुदेव इन युवकों की बातें अनमने मन से सुन रहे थे ,जैसे कुछ समझ ही न आ रहा हो। युवकों ने कहा- आप एक ऐसे क्षेत्र में  आ गए हैं यहाँ हर किसी का प्रवेश नहीं हो सकता। जो ऋषि सत्ताएं इस प्रदेश की व्यवस्था कर रही हैं वहीँ आत्मएं उन्हें आमंत्रित करती हैं और  जिन्हे वह आमंत्रित करती हैं वहीँ यहाँ पहुँच सकते हैं और कोई कदापि नहीं। वे युवक इसी प्रदेश के निवासी थे और उन्होंने अपना परिचय ” ज्ञानगंज के योगाश्रम के साधक “ के रूप में दिया। ज्ञानगंज योगाश्रम का उल्लेख और स्थानों पर भी आया है। योग साधना के मार्ग पर बहुत आगे बढ़ चुके यतियों के अनुसार यह क्षेत्र परलोक (supernatural ) साधना स्थली है। यहाँ निवास करने वाले योगी दूसरे साधकों की सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहते  हैं। कहते हैं इस सिद्धभूमि की स्थापना प्राचीन काल में हुई थी। मध्यकाल में महृषि महातपा के शिष्य स्वामी ज्ञानानंद ने सिद्धयोगियों के लिए यह क्षेत्र तीर्थ की तरह बनाया हुआ है। उन युवा साधकों की चर्चा करते -करते गुरुदेव ज्ञानगंज आश्रम की सीमा में पहुंचे। उन्ही ने बताया कि महातपा की आयु लगभग 1500 वर्ष है। किसी भी तरह की आवश्यकतायें उन्हें नहीं होती ,वे दिव्य देहधारी हैं ,किसी भी स्थान पर वे किसी भी गति से जा सकते हैं। आश्रम के कई साधकों की आयु 150 वर्ष के भी अधिक है। 

कैलाश मानसरोवर की यात्रा कई दिशाओं और रास्तों से की जा सकती है और इस यात्रा में लगभग डेढ़ महीने का समय लगता है। कम से कम 400 मील पैदल य घोड़े /याक की पीठ पर पूरी करनी होती है। यह विवरण चेतना की शिखर यात्रा 2,  2004 वाले एडिशन के आधार पर दिए जा रहे हैं लेकिन आजकल (2021) कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए 12 -15  दिन के कई पैकेज उपलब्ध हैं। इन  पैकेज की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध है। 

हमारे परमपूज्य गुरुदेव गोमुख, नंदनवन,कलाप, सिद्धक्षेत्र ,ज्ञानगंज से होते हुए भूलते -भूलते दो माह बाद पहुंचे थे। यह दूरी उन्होंने अधिकतर अकेले ही पूरी की थी ,कभी कभार कोई मिल भी गया था। 

हमारे सहकर्मियों ने पहले वाले लेख में ज्ञानगंज को जानने की जिज्ञासा जताई थी , हमने तो इसको व्यक्तिगत निर्णय पर छोड़ दिया था। इस तरह के सिद्धाश्रम विभिन्न नामों से कई जगह पर हैं। ज्ञानगंज के रहस्य पर कई तरह की पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं ,कई तरह की वीडियो बन चुकी हैं ,सिद्ध करने के कई तरह के क्लेम ( claim ) आ चुके हैं। यहाँ तक कि अमरीकन राष्ट्रपति फ्रेंक्लिन रूज़वेल्ट से लेकर हिटलर तक जिसने अपना आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास किया था, कहीं न कहीं ज्ञानगंज के साथ जुड़े हुए थे। रूज़वेल्ट ने तो अपने गुप्त वेकेशन (vacation ) स्थान का नाम ही शांगरिला रख दिया था। US नेवी के एयरक्राफ्ट का नाम भी शांगरिला है। इधर टोरंटो में तो एक लक्ज़री होटल का नाम भी शांगरिला है। शांगरिला ( शंबाला ) का अर्थ ” धरती का स्वर्ग ” है। आज तक सभी के प्रयास कुछ भी पक्का कहने में असमर्थ ही साबित हुए हैं। हम अपने व्यक्तिगत भाव केवल इतना ही कह कर विराम करेंगें कि ज्ञानगंज या किसी और सिद्धाश्रम को अध्ययन करना अतयंत मनोरंजक है लेकिन इस मनोरंजन की आंधी में हमारे लक्ष्य का खो जाना स्वाभाविक है। इसलिए इसका यह निर्णय अपने पाठकों पर ही  छोडते हुए कल राक्षसताल और मानसरोवर की यात्रा पर चलेंगें।  जय गुरुदेव 

हम कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें।

To be continued .

Leave a comment

आध्यात्मिक तरंगों का क्षेत्र है हिमालय 

20 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद -आध्यात्मिक तरंगों का क्षेत्र है हिमालय 

आज का ज्ञानप्रसाद अपने सहकर्मियों को दिए वचन को पूरा कर रहा है। आज हम गुरुदेव और दादा गुरु के साथ हिमालय के सिद्ध  क्षेत्र का आँखों देखा  हाल ( live show ) वर्णन करेंगें। ऐसा लाइव शो जिसे  केवल दिव्य आत्माएँ  ही देख सकती हैं। चेतना की शिखर यात्रा 2 के अनुसार  जिस क्षेत्र में गुरुदेव जा रहे थे वहां आध्यात्मिक तरंगों (spiritual vibrations)  का वर्णन भी मिलता है। दादा गुरु द्वारा भेजा गया प्रतिनिधि जिसे गुरुदेव वीरभद्र कह कर सम्बोधन कर रहे थे असल में उसका नाम कालीपद था। पौराणिक कथाओं के अनुसार वीरभद्र भगवान्  शिव के बहादुर गण थे जिन्होंने शिवजी के कहने पर दक्ष प्रजापति का सर धड़ से अलग कर दिया था।     

गुरुदेव और कालीपद  साथ -साथ इस बर्फानी प्रदेश में चल रहे थे। गुरुदेव के मन में प्रश्न आया कि पिछली बार तो दादा गुरु नंदनवन में मिल गए थे परन्तु इस बार तो इन घुमावदार पहाड़ों की यात्रा करवा रहे हैं। कालीपद  ने गुरुदेव के मन को भांप लिया और कहा,

“ इस प्रदेश का परिचय और यहाँ की  ऋषि सत्ताओं का परिचय करवाने के लिए ही मुझे नंदनवन से यहाँ तक भेजा है। कालीपद  चुपचाप साथ चल रहे थे । कुछ देर बाद उन्होंने संकेत कर के गुरुदेव को रुकने को कहा और स्वच्छ शिला देख कर उसके ऊपर बैठ जाने को कहा और बिना कुछ कहे दूसरी दिशा में चले गए। कुछ ही मिंट में वापस आये और हाथ में कुछ फल थे। गुरुदेव को देते हुए कहा -”ये फल खा लो बहुत देर से कुछ खाया नहीं है ,भूख लगी होगी। उनके याद दिलाते ही गुरुदेव को भूख का अनुभव हुआ। स्मरण हुआ कि कलाप ग्राम पहुँचने से पहले कुछ कंदमूल लिए थे। प्रतिनिधि ने सेब जैसा यह फल देने के बाद कहा -मैं अब विदा लूँगा, दादा गुरु यहाँ से आगे का मार्ग दिखाएंगें। यह सुनकर मन में एकदम उल्लास फूटा ,उत्सुकता भरा रोमांच हुआ। 30 वर्ष पुराना अनुभव एकदम जाग्रत हो उठा। उस समय प्रतिनिधि ने कहा था कहीं दूर मत जाना। अगर जाना भी पड़े तो केवल एक योजन तक ही जाना। एक योजन 12 से 15 किलोमीटर के लगभग होता है। 

 दादा गुरु  की पुकार  :

गुरुदेव पिछली यात्रा की स्मृतियों में डूबे हुए थे कि दादा गुरु की पुकार सुनाई दी ,नाम लेकर पुकारा था, साथ ही उठ कर चलने को भी कहा। गुरुदेव मार्गदर्शक सत्ता को देखकर उठ खड़े हुए और पीछे- पीछे चल दिए। गुरुदेव ने सावधान किया कि यहाँ से जो भी शक्तियां अर्जित करेंगें उन्हें अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए कभी मत प्रयोग करना। यह केवल उनलोगों के कर्मबंध काटने के लिए होंगीं जिनकी चेतना में दैवी उभार आया है और जो आने वाले दिनों में युग प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इन शक्तियों का उपयोग उनके लिए उन्हें बताये बिना करना है।

 दादा गुरु के साथ चलते हुए गुरुदेव को अपना शरीर बिल्कुल निरभार ( weightless ) ,एकदम रुई की तरह लग रहा था।दादा गुरु  का शरीर तो बिल्कुल एक प्रकाश की लौ के रूप जैसे दिखाई दे रही था । गुरुदेव का शरीर भी एक लौ की तरह था पर इसको स्पर्श किया जा सकता था। गुरुदेव ने अपने शरीर को स्पर्श करके चैक भी किया। अगर शरीर हल्का हो तो गुर्त्वाकर्षण ( gravity ) का प्रभाव उतना नहीं पड़ता और अपनी इच्छा से किसी भी वेग से यात्रा की जा सकती है। यही कारण है कि चाँद की सतह पर अंतरिक्ष यात्री उड़ते हुए दिखाई देते हैं। इसी कारण यात्रा बहुत ही सहज हो रही थी। आधे घण्टे में ही 100 मील से अधिक क्षेत्र की यात्रा हो गयी।  इस बार तो कुछ- कुछ सिद्ध योगी भी साधना करते हुए दिखे। गुरुदेव के मन में विचार आया कि यह सिद्ध योगी इस एकांत ,निर्जन स्थान पर साधना क्यों कर रहे हैं, संसार में भी तो जाकर साधना कर सकते हैं ,वहां प्रलोभन भी होगा और परीक्षा भी होगी। दादा गुरु ने एक दम गुरुदेव की विचार तरंग पकड़ ली परन्तु  कहा कुछ नहीं ,केवल एक बार दृष्टि भर डाली और गुरुदेव को उत्तर मिल गया। 

उत्तर आया -“इन सिद्ध योगियों को अपने लिए साधना की आवश्यकता नहीं है। वे स्वयं तो मोक्ष के द्वार पर पहुँच चुके हैं परन्तु जगत कल्याण के लिए यहाँ पर तप-अनुष्ठान कर रहे हैं “

हमारे पाठकों को गुरुदेव और दादा गुरुदेव के बीच वायरलेस कनेक्शन का आभास हो गया होगा ,यह आत्मा का संबंध है , अगर हम भी इस तरह का सम्बन्ध बनाना चाहते हैं तो हमें भी गुरुदेव जैसा समर्पण दिखाना पड़ेगा। अगर समर्पण है तो गुरु अपने शिष्य को लेने ठीक उसी प्रकार स्वयं भागते हुए आते है जैसे दादा गुरु 1926 की वसंत को आंवलखेड़ा की उस कोठरी में आए थे।

गुरुदेव ने दादा गुरु को आदरपूर्वक निहारा। दादा गुरु ने गुरुदेव को नीचे बैठने को कहा। गुरुदेव बैठ गए ,दादा गुरु भी सामने बैठ गए। गुरुदेव ने इधर -उधर देखा , कोई उचस्थान न दिखाई दिया ,उन्हें लग रहा था कि दादा गुरु को उन से ऊँचे स्थान पर होना चाहिए। उन्होंने अपने कंधे से अंगवस्त्र उतारा और बिछाते हुए दादा गुरु को उस पर बैठ जाने को कहा। शिष्य का मन रखने के लिए दादा गुरु उस आसन पर बैठ गए लेकिन कहने लगे :

 ” गुरु और शिष्य में कोई अंतर नहीं है ,केवल कक्षा का ही अंतर होता है। गुरु जिस वृक्ष का पका हुआ फल होता है शिष्य उसी वृक्ष की कच्ची और हरी टहनी है। दोनों एक ही सत्ता के समतुल्य अंग हैं। “

 यह उद्भोधन सुनकर गुरुदेव ने कहा ,

 ” यह वक्तव्य आपकी ओर से आया है ,आप आराध्य हैं आप कह सकते हैं परन्तु मैं तो शिष्य के अधिकार से ही बोल सकता हूँ। मुझे अपने श्रीचरणों में बना रहने दीजिये “

दादा गुरु ने सामने पूर्व दिशा की ओर संकेत किया और गुरुदेव ने जब उस ओर देखा तो सामने घाटी में कई तापस जप ,तप और ध्यान में लगे हुए थे। क्षेत्र में चौबीस यज्ञ कुंड बने थे। उनमें यज्ञधूम्र उठ रहा था, अग्नि शिखाएं उठ रही थीं जैसे कि अभी कुछ समय पूर्व ही साधक अग्निहोत्र करके उठे हों। अग्नि शिखाएं स्वर्मिण आभा लिए हुए थीं। उन पर नील आभा छाई हुई थी। कुछ कुंडों पर अभी भी आहुतियां दी जा रहीं थीं। जप तप करते जो सन्यासी दिखाई दिए उनमें कुछ नए थे। शरीर की अवस्था से उनकी आयु 30 से 80 वर्ष के बीच लगती थी। कुछ सन्यासियों को गुरुदेव पहचानने का प्रयास करने लगे। एक को तो पहचान भी लिया। गुरुदेव ने स्मरण किया ,15 वर्ष पूर्व रामेश्वरम में गायत्री महायज्ञ में गुरुदेव का समर्थन करने आए थे। स्थानीय लोगों का विरोध शांत करने गुरुदेव के पक्ष में लोगों को संगठित करने आए थे। उन्ही के कारण स्थानीय पुरातन -पंथी पंडितों को बाहुबल से हस्तक्षेप करने का साहस नहीं हुआ था। उसने एक दृष्टि गुरुदेव की तरफ देखा और पहचान लिया और अगले ही पल अग्निहोत्र कर्म में लग गया। दादा गुरु ने गुरुदेव की ओर देखा और कहने लगे :

 “हाँ हाँ ,यह वही साधक है जिसने रामेश्वरम में तुम्हारी सहायता की थी। तुम अभी और भी संतों को पहचानोगे जो तुम्हारी सहायता करने आयेंगें “

यज्ञ कर रहे कुछ ऋषियों को सहस्र कुंडीय गायत्री महायज्ञ में देखा था। पूर्व दिशा में सूर्य भगवन अपनी स्वर्मिण आभा प्रकट करने लगे और सविता देव बर्फ पर अपनी किरणे बिखेरते हुए क्षितिज पर चढ़ आए। गुरुदेव ने उठकर सविता देव को प्रणाम किया ,गुरुवंदना करते हुए खड़े हो गए। दादा गुरु ने गुरुदेव को अपने पास आकर बैठने का संकेत किया। गुरुदेव बैठ गए तो दादा गुरु ने अपना दाहिना हाथ उठाया और उसका अंगूठा धीरे से भँवों (eyebrows ) के मध्य लगाया और उँगलियाँ बालों में फेरीं। इतना करते ही गुरुदेव की ऑंखें मूंदने लगीं और भीतर कोई और ही जगत दिखाई देने लगा। ऐसा लगा की कोई आकृति उभर रही है जो धीरे धीरे विस्तृत होती जा रही थी और फिर विराट रूप धारण कर लिया। यह आकृति बहुत डरावनी थी लेकिन बहुत ही प्रिय लग रही थी। अगर इस आकृति की तुलना हम अपने आस -पास के जगत के साथ करें तो इसमें सब कुछ दिखाई दे रहा था। लगता था उस दृश्य में अग्नि ,सूर्य ,पृथ्वी ,गृह नक्षत्र ,अपने आप दृष्टिगोचर हो रहे हैं। ऐसा दृश्य था जैसे कि तीनो लोक इसमें समा गए हों। इस रूप के बाहिर अनेकों ऋषि ,योगी ,देवता ,दानव ,विद्वान और योद्धा हाथ जोड़ कर स्तुति करते खड़े थे। उस विराट स्वरूप को देखते हुए बाहिर से कुछ रूप थर -थर कांपते अंदर जा रहे हैं और कुछ उड़ते हुए दिख रहे हैं। उस स्वरुप का हमारे आस पास के ब्रह्माण्ड की तरह विस्तार हो रहा है ,कहीं कोई अवकाश था ही नहीं। ठीक ब्रह्माण्ड की भांति इस में मधुर ,दिव्य ,आकर्षक ,विकराल, भयावह ,भीषण और अलैकिक सब कुछ था। फिर लगा कि सब कुछ सिमट रहा है , सिकुड़ते -सिकुड़ते सब लुप्त हो गया है ,तिरोहित ( अदृश्य ) हो गया है। तिरोहित होते ही गुरुदेव ने देखा कि दादा गुरु खड़े हैं ,उन्होंने कपाल और शीश से अपना हाथ हटा लिया है। गुरुदेव के पास कोई प्रश्न ,कोई जिज्ञासा नहीं थी ,वह पूर्ण रूप से तृप्त और शांत दिखाई दे रहे थे।

हम यहाँ थोड़ा रुक कर अपने पाठकों की इस विराट स्वरुप की अनुभूति को और परिपक्व करने के लिए बी आर चोपड़ा जी के बहुचर्चित टीवी सीरियल महाभारत में चित्रित किये गए विराट स्वरुप के साथ जोड़ना चाहते हैं। भगवान कृष्ण ने जब अर्जुन को रण भूमि में विराट रूप के दर्शन करवाए थे तो कुछ इस तरह की ही पिक्चर बनी थी। अर्जुन को भी भगवान ने दिव्य चक्षु ( नेत्र ) प्रदान किये थे तभी तो वह दिव्य स्वरुप का आनंद उठा सका था और उसने भी यही कहा था -मैं तृप्त हो गया हूँ। हमने इन अक्षरों के माध्यम से , अपनी लेखनी से चुन -चुन कर अक्षरों का चयन करके आप के लिए ऐसा दृश्य चित्रित करने का प्रयास किया है कि आपको,सभी को भी दिव्यता की अनुभूति हो। जिस तरह दर्शकों ने टीवी सीरियल के उस एपिसोड को बार -बार रिवाइंड कर -कर के विराट स्वरुप का आनंद लिया था ठीक उसी तरह आप इन पंक्तियों को भी बार -बार पढ़ने को बाधित होंगें ऐसा हमारा विश्वास है। और जितनी प्रसन्नता चोपड़ा साहिब को हुई थी उससे कहीं अधिक हम भी अनुभव कर रहे हैं।

 आज के लेख को हम यहीं पर विराम देने की अनुमति ले रहे हैं क्योंकि हम चाहते हैं कि कोई भी लेख 3 पृष्ठों से अधिक और 2000 शब्दों  से अधिक न हो। यह लिमिट हमने अपने पाठकों व्यस्तता को ध्यान में रख कर बनाई है क्योंकि लेखों को केवल पढ़ने का उदेश्य नहीं है ,इनको अपने ह्रदय में उतारने का उदेश्य है। इन लेखों को पढ़ने से आपको ऐसे आनंद की अनुभूति होनी चाहिए कि आप उस छोटे से बच्चे की भांति अपनी प्रसन्नता भाग -भाग कर सभी को वर्णन करें जब उसे 100 में से 100 अंक प्राप्त होते हैं। ऐसा होना चाहिए हम सबका  संकल्प और समर्पण। जय गुरुदेव 

हम कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें।

To be continued .

Leave a comment

गुरुदेव के साहित्य के प्रचार -प्रसार में आ रही रुकावटों पर चर्चा

18 सितम्बर 2021 – गुरुदेव के साहित्य के प्रचार -प्रसार में आ रही रुकावटों पर चर्चा https://youtu.be/yDzizXMkJAY
आज का ज्ञानप्रसाद “अपनों से अपनी बात” तो नहीं है लेकिन कल वाले लेख पर दिए गए दो कमैंट्स पर चर्चा है। इस ज्ञानप्रसाद के साथ ही शांतिकुंज से कुछ समय प्रीमियर हुई लगभग 22 मिंट की वीडियो है जिसे ध्यान से देखना, चिंतन-मनन करना उतना ही आवश्यक है जितना हमारे लेखों को पढ़ना। यह हम इसलिए कह रहे हैं कि इस वीडियो को देखने -सुनने और चिंतन -मनन करने से आज के ज्ञानप्रसाद का सबसे बड़ा प्रश्न ” लोग सुनते ही नहीं हैं, हम क्या करें ? ” का उत्तर मिलने की सम्भावना है। युगतीर्थ शांतिकुंज की महिमा ,परमपूज्य गुरुदेव का साहित्य , उनका व्यक्तित्व इत्यादि इत्यादि इतना सरल नहीं है कि इसको चलते -चलाते, कभी -कभार पढ़ लिया तो हम परिजनों को convince करने में दक्ष हो गए। यह बहुत ही विशाल ,गूढ़, रहस्मय, चिंतन -योग्य साहित्य है जिसका बार -बार उसी प्रकार अध्यन करना आवश्यक है जिस प्रकार एक समर्पित विद्यार्थी अपनी परीक्षा में न केवल उत्तीर्ण होने के लिए बल्कि टॉप करने के लिए दिन-रात कड़ा प्रयास करता है।

धीरप बेटे ने कल वाले लेख पर कमेंट करते हुए लिखा कि बाकि लोगों की तो बात बाद में , हम गायत्री परिवार के लोग भी गुरुदेव का साहित्य पढ़ने में रूचि नहीं दिखा रहे। हम कहते हैं समय नहीं है ,बाद में पढेंगें। ऐसी धारणा तो केवल वही रख सकते हैं जिन्हे यह proverb याद नहीं है -TIME IS MONEY – य फिर “गया हुआ समय लौट कर वापस नहीं आता”। जिन्हे समय का मूल्यांकन करना नहीं आता य Time Management नहीं आता वही ऐसी बातें कर सकते हैं। गुरुदेव ने तो स्वयं ऐसी स्थिति में कहा है – यह कोरी बहानेबाज़ी है ,मेरे पास यह बात बिलकुल नहीं चलेगी – तू मेरा काम करने आया है ,समय तो निकालना ही पड़ेगा । क्या हम इस तरह सोच सकते हैं कि हमारे गुरुदेव की अदृश्य सत्ता ,अदृशय उपस्थिति हमें ऐसा कह रही है। और उन्होंने तो हमें टाइम-टेबल बना कर दिया हुआ है , एक घंटा ,केवल एक घंटा प्रतिदिन – 24 घंटों में से केवल एक घंटा गुरुकार्य के लिए निकालना कोई कठिन नहीं है। इतिहास साक्षी है ,जितने भी महान पुरुष हुए हैं, जिनको भी हम हम आज याद करते हैं ,जिनसे हम प्रेरणा लेते हैं ,जो हमारे मार्गदर्शक हैं उन्होंने समय के महत्त्व को पहचाना , priorities को पहचाना और ऊपर से ऊपर चलते हुए शिखर तक पहुँच गए।
लोग हमारी बात क्यों नहीं सुनते ? यह इसलिए है कि उन्हें परमपूज्य गुरुदेव का साहित्य समझ ही नहीं आता। यह एक तथ्य है जो हम सबके साथ स्कूल टाइम से चलता आ रहा है। जो subject हमें अच्छा नहीं लगता ,उसे हम य तो छोड़ देते हैं य पूरे जी-जान से परिश्रम करते हैं ,ट्यूशन रखते हैं आदि और फिर हम इसमें सफल हो कर ही रहते हैं क्योंकि हम प्रण ले लेते हैं। हम सबको भी प्रण लेना है – यह प्रण कि जब तक हम सफल नहीं हो जाते तब तक सांस नहीं लेंगें – आखिर अपने गुरु को जवाब जो देना है ,बताना जो है कि हमने उनके लिए क्या किया। यही कारण है कि हम गुरुदेव का साहित्य ,इतना विशाल साहित्य बार -बार पढ़कर समझने का प्रयास करते हैं और जब समझ आ जाता है तो ही आपके समक्ष लेकर आते हैं।
धीरप बेटे ने एक और सुझाव दिया है कि घर के बड़े बुज़ुर्गों की सहायता ली जाये। अगर युवा नहीं सुनते तो वरिष्ठों को, बुज़ुर्गों को सुनाया जाये ,वह अधिक रूचि दिखा सकते हैं। बिलकुल ठीक कहा है – बुज़ुर्ग तो इतना ही देख कर प्रसन्न हो जायेंगें कि आज का युवा , आज की युवा शक्ति कितनी सामर्थ्यवान , बुद्धिमान और दूरदर्शी है। इसका सीधा उदाहरण तो हम सब प्रतिदिन ज्ञानरथ में देख ही रहे हैं। प्रेरणा बिटिया ,पिंकी बेटी ,धीरप बेटा का कार्य कितना सराहा जा रहा है , संजना बेटी की कविता को कितना सराहा गया है , अखंड ज्योति नेत्र हस्पताल की बच्चियों की श्रद्धा को कितना पसंद किया जाता है ,बाल संस्कार शाला के नन्हे -नन्हे बच्चों की कार्यशैली को उनके माता -पिता लोगों को बता कर कितना गौरव महसूस करते हैं। ऑनलाइन ज्ञानरथ के सभी बच्चे अपना -अपना कार्य करते हुए योगदान दे रहे हैं , यह कोई छोटी बात नहीं है। अभी भी जब हम इस ज्ञानप्रसाद पर कार्य कर रहे हैं तो धीरप बेटा रिप्लाई कर रहे हैं। हम जानते हैं कि भारत में इस समय रात के 11 -1130 का समय होगा।
ऑनलाइन ज्ञानरथ की समर्पित सहकर्मी आदरणीय रेनू श्रीवास्तव बहिन जी अपने कमेंट में लिखा है कि so called high society के लोगों के पास अय्याशी के लिए पैसे हैं लेकिन नेक कार्य के लिए समय नहीं है। वह लिखती है कि मुफ्त में गुरुदेव का साहित्य बांटती रही हूँ लेकिन जब देखा कि उनके पास समय नहीं है तो बंद कर दिया। बहिन जी की मनःस्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है, जब अपने गुरु के साहित्य का (जिसे उन्होंने अपने अंग अवयव कहा है ) अपमान होता है ,अनादर होता है तो ह्रदय में जो व्यथा की टीस उठती है उसे केवल फील ही क्या जा सकता है ,बयान नहीं। बहिन रेनू लिखती हैं कि दुर्भाग्यवश वे लोग गुरुजी के साहित्य का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।
मैं तो गुरुजी से यही प्रार्थना करूंगी कि लोगों को सदग्यान दें ताकि अधिक से अधिक लोग लाभ ले सके । हाँ बहिन यह उनका दुर्भाग्य ही है जो अपना मूल्यवान समय व्यर्थ में खर्च कर रहे हैं – अगर किसी और अच्छे कार्य के लिए ,परमार्थ में लगा रहे हैं तो दूसरी बात है। गुरुदेव का सद्ज्ञान अवश्य ही कार्य करेगा क्योंकि गुरु का कार्य करने का सौभाग्य भी तो हर किसी को नसीब नहीं होता। हम बहुत ही सौभाग्यशाली हैं जिन्हे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है – हमारा चयन हमारे किसी पूर्वजन्म के संस्कारों के आधार पर गुरुदेव ने लाखों करोड़ों लोगों में से स्वयं किया है। हर किसी को गुरुअनुग्रह प्राप्त भी तो नहीं होता। हमारे ,आप सबके ,ऑनलाइन ज्ञानरथ में कितने ही लोग आये ,एक दो दिन ,महीना दो महीने देखे , शायद कुछ चमत्कार हो जाये, शायद उनके जीवन का कायाकल्प हो जाये – लेकिन तब एकदम ऐसे गायब हो गए जैसे कभी जानते तक नहीं। हम तो सभी के साथ एक जैसी आत्मीयता ,अपनत्व दिखाते हैं ,उनके लिए परिश्रम करते हैं , अपना समय भी उन पर लगाते हैं, लेकिन ऐसे लोग कुछ लेने के लिए आये थे। उन्हें शायद यह मालूम नहीं कि ऑनलाइन ज्ञानरथ केवल देने का प्लेटफॉर्म है ,दान का प्लेटफॉर्म है , लेने का नहीं। अगर कोई समयदान कर सकता है ,प्रतिभादान कर सकता है , श्रमदान कर सकता है य कुछ और भी उसके पास है तो उसके लिए यहाँ आनंद ही आनंद है। हम तो कहेंगें कि -आनद की चरमसीमा ( climax ) ultimate bliss है। हमारे साथ जितनी भी पुण्य आत्माएं जुड़ी हुई हैं उन पर अवश्य ही गुरु अनुग्रह हुआ है।
गुरुदेव के अनमोल विचार ,अमूल्य साहित्य के प्रचार -प्रसार में आने वाली रुकावटों में एक और बड़ा हिस्सा अज्ञानता का है , इच्छा शक्ति का है। अगर कोई हमारे गुरु को जानता तक नहीं है , उनके बारे में उसे कुछ पता ही नहीं है तो वह हमसे क्यों बात करेगा ,क्यों अखंड ज्योति पढ़ेगा। उसे अखंड ज्योति देना तो इस अमृत का अनादर ही होगा। युगतीर्थ शांतिकुंज के बारे में हम तो जानते हैं कि यह ऋषियों की तपस्थली है। लेकिन वह जो वहां पहली बार जा रहा है उसके लिए तो यह युगतीर्थ भी हरिद्वार में अनेकों आश्रमों की तरह ही होगा जहाँ पंडों की भरमार है और लूटमार मची हुई है -ऐसा लिखते समय हम क्षमा प्रार्थी हैं क्योंकि हम किसी की श्रद्धा और मान्यता पर ऊँगली नहीं उठा रहे हैं – हमारे लिए हर कोई आदरणीय है। हमारा लिखने का अभिप्राय है कि किसी भी व्यक्तित्व को समझने के लिए , किसी भी विषय को समझने के लिए समय देने की आवश्यकता होती है नर्सरी के बच्चे से अगर आप केमिस्ट्री के भारी भरकम फॉर्मूले पूछेंगें तो वह भागेगा नहीं तो और क्या करेगा। नर्सरी का अर्थ ही नर्स करना है – ठीक उसी तरह जैसे Florence Nightingale नर्स करती रही। तो हमें भी प्रचार -प्रसार में आत्मीयता तो लानी ही है लेकिन परिजनों को समय भी देना है।
तो आज की चर्चा जहाँ से आरम्भ हुई थी , वहीँ पर समाप्त हो रही है – “समय”। महाभारत सीरियल का हरीश भिमानी ” मैं समय हूँ ” सभी को मालूम है। सबसे निर्धन कौन -जिसके पास समय नहीं है। और अधिकतर लोगों के पास समय नहीं है – इसका अर्थ यही निकलता है – अधिकतर लोग निर्धन हैं। निर-धन – ऐसे लोग जो केवल धन कमाने में ही अपना सर्वस्व लगाए हुए हैं , धन का आनंद तो उनका परिवार ले रहा है।
आज भी दोनों बच्चे प्रेरणा और धीरप ,आपसे यथाशक्ति सम्पर्क बनाये रखे हुए थे – हमारा आशीर्वाद। सविंदर भाई साहिब का handwritten कमेंट और किसी और से बैटरी लेकर फ़ोन चार्ज करने का कमेंट भी आया था। गुरुदेव से प्रार्थना करते हैं कि शीघ्र ही सब ठीक हो।
इन्ही शब्दों के साथ हम आपसे आज का ज्ञानप्रसाद समाप्त करने की आज्ञा लेते हैं। आप प्रतीक्षा कीजिये सोमवार को आने वाले लेख –
गुरुदेव की कैलाश पर्वत के क्षेत्र में यात्रा – बहुत ही रोचक एवं आँखें खोलने वाला विषय है। हम कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें।
जय गुरुदेव

Leave a comment

साहित्य प्रचार -प्रसार में परमपूज्य गुरुदेव का मार्गदर्शन ,निर्देश। 

17 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद – साहित्य प्रचार -प्रसार में परमपूज्य गुरुदेव का मार्गदर्शन ,निर्देश। 

कई बार परिस्थितिवश हमें आपसे नियमित लेख के इलावा भी संपर्क करने का सौभाग्य  प्राप्त हो जाता है ,जैसा  कि पिछले 24 घंटों में हुआ।  यूट्यूब के पाठकों के साथ हमने मानसून के कारण आयी स्थिति और फिर सविंदर भाई साहिब के कमेंट करने  का नवीन विकल्प  शेयर कर दिया था ,दूसरे  सोशल मीडिया पर अपडेट नहीं किया था। रेनू श्रीवास्त्व बहिन जी ने भी ऐसी ही स्थति झेली है। आशा करते हैं अब तक स्थिति ठीक हो गयी होगी। 

आज का लेख 50 -60 पुराने  झोला पुस्तकालय concept  पर आधारित है लेकिन उसके साथ ही साहित्य प्रचार के आज के युग के नवीन विकल्पों की भी चर्चा की गयी है। अवश्य ही हमारे सहकर्मी इन विकल्पों को  प्रयोग करके ऑनलाइन ज्ञानरथ को नई ऊंचाइयों पर लेकर जायेंगें।      


झोला पुस्तकालय ( Bag Library )

परमपूज्य गुरुदेव का  झोला पुस्तकालय आन्दोलन बहुत ही  महत्त्वपूर्ण है। इसे ज्ञान-यज्ञ का आधार स्तम्भ ( basic pillar ) कहना चाहिये। 60 -70  के दशक में गुरुदेव ने युग-निर्माण योजना के अंतर्गत लगभग 300 छोटी पुस्तिकाओं के  ट्रैक्ट प्रकाशित किये  जिनमें जीवन जीने की कला, सामाजिक विकास के आधार सूत्र और राष्ट्रीय समर्थता के समस्त बीजमंत्रों का समावेश है। पुस्तिकाएँ छोटी-छोटी हैं पर वे जिस दर्द, जिस तथ्य और जिस तर्क के साथ लिखी गई हैं, उससे उनमें एक सजीव चित्रकारी का समर्थ कर्तव्य सम्पन्न कर सकने की शक्ति भरी हुई  है। यही कारण है कि यह छोटी -छोटी पुस्तकें  जहाँ भी पढ़ी और सुनी जाती हैं,  युग परिवर्तन की भूमिका प्रस्तुत कर सकने की समग्र क्षमता दर्शाती हैं। इनके पढ़ने सुनने से हमारे जीवन में  जो हलचलें उत्पन्न हुई हैं, उन्हें देखते हुए, यह अति आवश्यक हो जाता  है कि इनका अधिकाधिक प्रचार किया जाय। और उन्हें घर-घर, जन-जन के पास तक पहुंचाया जाय।

आज भी जहाँ कहीं भी गायत्री परिवार का कोई  समारोह होता है तो पुस्तक प्रदर्शनी होती ही है और साधकों को गुरुदेव के  प्रसाद के रूप में  कम से कम एक पुस्तक घर ले जाने के लिए अवश्य ही प्रेरित किया जाता है।यहाँ  कनाडा में भी जब शांतिकुंज से टोली आती है य प्रज्ञा मंडल के कार्यकर्ता कोई कार्यक्रम करते हैं तो हमेशा ही उनके कंधे पर यह पीले रंग का बैग अवश्य ही होता है। हम तो  यही कहते हैं कि यह गायत्री परिजनों की वर्दी है।      

आज का अधिकांश  मानव स्ट्रेस से ग्रस्त है, स्ट्रेस के निवारण के लिए नाना प्रकार की  गोलिआं खा  सकता है, gym में घंटों लगा सकता है , व्यसन में फंस सकता है  लेकिन जीवन समस्याओं को सुलझाने वाले प्रकाशपूर्ण साहित्य में  उसे कोई रुचि नहीं है। लागत  से भी कम मूल्य पर बिकने वाली इन  पुस्तकों में जीवन की हर समस्या का निवारण है। जब पुस्तक प्रदर्शनियों में  परमपूज्य गुरुदेव के  साहित्य  को उपेक्षित और तिरस्कृत होते देखते हैं तो बहुत ही व्यथित  फील करते हैं।  6 -7  दशक पूर्व जब यह पुस्तकें लिखी गयी थीं भारत में अधिकतर लोग  अशिक्षित थे, शायद 70 -80  प्रतिशत, लेकिन आज ऐसी दशा नहीं है। अधिकतर लोग शिक्षित है परन्तु इन शिक्षितों में अधिकांश को रोजी-रोटी  के काम आने जितनी पढ़ाई ही  याद रहती है। बाकी स्कूल से निकलते ही विस्मरण हो जाती है। जो थोड़े से लोग साहित्य पढ़ने में रुचि लेते भी हैं, वह  कामुकता, अश्लीलता जासूसी, तिलस्मी, किस्से-कहानियों उपन्यासों को पढ़कर काम चला लेते हैं । शिक्षा के साथ-साथ ऐसे ही अवांछनीय साहित्य का प्रकाशन और विक्रय बढ़ा है जो मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को ही भड़का सकता है। व्यक्ति और समाज की मूलभूत समस्याओं को समझाने और सुलझाने में सहायता करने वाला साहित्य बहुत ही स्वल्प मात्रा में दिखाई पड़ता है। प्रकाशक य लेखक-बेचारा करे भी क्या जब बाज़ार में उनकी  माँग ही नहीं तो उनके लिए समय और पूँजी कौन घेरे? इस  स्थिति का सामना करना आवश्यक है। कैसे ? अन्यथा लोग प्रकाश- पूर्ण विचार-धारा के अभाव में वर्तमान कूपमण्डूकता (कुँए के मेंढ़क की तरह ) और क्षुद्रता ( छोटापन ) की कीचड़ में पड़े हुए कीड़ों की तरह ही जीवन बिताते रहेंगे, उन्हें ऊँचे उठने की न तो प्रेरणा मिलेगी, न दिशा।  

क्रांतिकारी विचार ही मनोभूमियाँ बदलते हैं और बदली हुई मनोभूमि से ही महान् जीवन एवं समर्थ समाज की सम्भावनायें समाविष्ट रहती हैं। ऑनलाइन ज्ञानरथ के सारे के सारे सहकर्मी इन्ही संभावनाओं को जुटाने में कार्यरत हैं। अगर हम प्रयत्न करके, रिसर्च करके सरल करके लेख और वीडियो लाते हैं तो आप कमैंट्स के माध्यम से  विचारों के अदान- प्रदान में सहयोग देते हैं जिससे अनेकों नए विचार , नई  संभावनाएं निकल कर सामने आती हैं , “यही है विचार क्रांति – Thought revolution .”   

परमपूज्य गुरुदेव की प्रेरणा और मार्गदर्शन से ही झोला पुस्तकालय से ऊँचे स्तर का प्रयास मोबाइल वीडियो रथ है जो देश के भिन्न -भिन्न क्षेत्रों में वीडियो के माध्यम से गुरुदेव के विचारों का प्रचार प्रसार कर रहा है। इस वीडियो रथ के बाहिर ही एक बड़ा सा LCD स्क्रीन लगा हुआ है जिसमें परमपूज्य गुरुदेव के विचार ,साहित्य दर्शाये जाते हैं। ऐसे ही एक   वीडियो रथ की विदाई हमारी उपस्थिति में शांतिकुंज प्रांगण से हुई थी। आप इस लिंक को क्लिक करके वीडियो रथ के बारे में और जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 

हम बार -बार कहते आये हैं कि आज का युग प्रतक्ष्यवाद का युग है , लोगों को प्रतक्ष्य परिणाम चाहियें और वह भी इंस्टेंट ,instant coffee की तरह। विश्व गुरु  स्वामी विवेकानंद जी ने 124 वर्ष पूर्व अपने मद्रास उद्बोधन में घोषणा कर दी थी कि “अगले दिनों एक मसीहा आएगा जब ज्ञान के देवता का रथ सड़कों पर निकलेगा और एक  निर्माण योजना काम करेगी।’इस से बड़ा प्रमाण  और क्या हो सकता है कि ऑनलाइन ज्ञानरथ ,झोला पुस्तकालय ,रेहड़ी -बग्गी ज्ञानरथ ,वीडियो रथ,सामूहिक संपर्क ,व्यक्तिगत संपर्क ,व्हाट्सप्प मैसेज ,वीडियोस ,फ़ोन कॉल इत्यादि  सब गुरुदेव की  सीधी-सादी योजना के  महान् प्रयोजन की पूर्ति के लिये है। यह सब  हमारी आँखों के सामने चल रहे हैं। अगर हम फिर भी विश्वास नहीं करते तो यह हमारा दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है ?   

परमपूज्य गुरुदेव ने कई बार कहा है कि  जनमानस तक प्रेरणाप्रद समर्थ एवं प्रकाशपूर्ण विचारधारायें पहुँचाने  के लिए युग-निर्माण योजना ने अपने साधन अति स्वल्प रहते हुए भी, अभाव-ग्रस्त परिस्थितियों में भी किसी प्रकार व्यक्ति और समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन प्रस्तुत कर सकने वाला साहित्य विनिर्मित किया है। व्यक्ति की सीमा इतनी ही है। हम इतना ही कर सकते थे, सो कर लिया। ज्ञान के प्रकाश को अब उपयुक्त स्थानों तक पहुँचाने के विशाल कार्यक्रम में दूसरे हाथ और कन्धे भी लगने चाहिये। एक घण्टा समय और दस पैसा रोज निकालने की माँग इसी दृष्टि से की गई थी कि  यह विचार-धारा व्यापक क्षेत्र में अपना प्रकाश पहुँचा सकने में समर्थ हो सकें। 

गुरुदेव के मार्गदर्शन का लाभ हम आज की परिस्थितियों के परिपेक्षप में उठा रहे हैं। इस साहित्य का ,मार्गदर्शन का लाभ आप स्वयं तो  उठा ही सकते हैं ,आप अपने  परिवार के लोगों को  पढ़ाकर  या सुनाकर   अपने विचार संस्थान में ऐसा प्रकाश उत्पन्न कर सकते हैं, जिससे आपके  घर, परिवार का भविष्य स्वर्गीय बन सके। अपने बच्चों और कुटुम्बियों के लिए यह एक अनुपम उपहार है। कोई अपने उत्तराधिकारियों के लिए और कोई  सम्पदा भले ही न छोड़ सकें पर यदि यह युग-निर्माण  साहित्य का एक छोटा सा  पुस्तकालय छोड़ सके  तो समझना चाहिये कि उसने अपने कुटुम्बियों के साथ एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ ग्रह-संचालक का कर्तव्य निभा दिया। आज नहीं तो कभी भी यदि घर के लोग इस साहित्य को पढ़ने में रुचि लेने लगें तो वे देखेंगे कि हमारे लिए एक बहुमूल्य धरोहर सँजोकर रखी गई है।

इस  साहित्य के संग्रह को झोला पुस्तकालय  इसलिये कहा जाता है कि यह पुस्तक खरीद लेने से ही काम नहीं चलता वरन् इन्हें पढ़ाने के लिए अपने मित्रों, परिचितों एवं सम्बन्धियों पर दबाव भी डालना पड़ता है ( जैसा हम पर डालते रहते हैं )। उनसे अनुरोध भी करना पड़ता है और इस अरुचिकर प्रसंग में रुचि उत्पन्न करने के लिए बहुत कुछ “बुद्धि- कौशल” दिखाना पड़ता है, अन्यथा इस रूखे विषय को  कोई भी पढ़ने के लिए  तैयार न होगा। इस साहित्य का प्रभाव और परिणाम अतीव श्रेयस्कर होगा पर कठिनाई एक ही है कि परिजनों  के गले यह कड़वी गोली उतारी कैसे जाये। जिन्हें पढ़ने में ही रुचि नहीं है और  low-level   की वस्तुएँ तलाश करते हैं, ऐसी दशा मैं यह प्राणवर्धक जीवन साहित्य” इनके गले कैसे उतरे? 

उपाय एक ही है : जिस प्रकार चाय कम्पनियों ने आज से 100  वर्ष पूर्व मुफ्त चाय पिला- पिलाकर, घर-घर जाकर चाय का प्रचार किया और लोगों में चाय के लिए इतनी दिलचस्पी  पैदा कर दी कि आज किसी का भी काम चाय के बिना  नहीं चलता। कई दफ्तरों में तो चाय के एक कप से ही आप काम करवा सकते हैं – यही रिश्वत गुरुदेव के साहित्य को घर -घर पहुँचाने के लिए प्रयोग की जा सकती है।  झोला पुस्तकालय ( ऑनलाइन ज्ञानरथ ) यही पुण्य प्रयत्न है।  जिस प्रकार हमारे बुज़ुर्ग घर से बाहिर जाते समय छाता ,छड़ी ,घड़ी नहीं भूलते थे इसी तरह आप अगर किसी को मिलने जाते हैं य आपसे कोई मिलने आता है तो उसे गुरुदेव का साहित्य प्रसाद के रूप में देना न भूलें। जब हम किसी से मिलते हैं तो रोचक बातें/ समस्याएं discuss करते हैं , इन्ही के अनुरूप आप गुरुदेव का साहित्य , अनमोल- वचनों पर चर्चा कर सकते हैं।  जब उस सम्बन्ध में आकर्षण उत्पन्न हो तो  पढ़ने के लिए उपयुक्त पुस्तिका दी जाय। वापिस लेने जाते समय उस संदर्भ की फिर चर्चा छेड़ी जाय। इस प्रकार प्रयत्न करते रहने पर सम्बन्धित लोगों में इस साहित्य के पढ़ने की अभिरुचि जगाई जा सकती है। एक बार अभिरुचि जग गयी तो उसके बाद तो वह स्वयं ही  माँगने आयेंगे। माँगने तक ही सीमित न रहकर आगे तो वे खरीदेंगे भी और अपनी ही तरह झोला पुस्तकालय भी चलाने लगेंगे।- ऐसा हमारे ऑनलाइन ज्ञानरथ में हुआ है ,हमने प्रतक्ष्य देखा है।  

शिक्षितों को पढ़ाने और अशिक्षितों को सुनाने के लिए यह साहित्य हर दृष्टि से अति उपयोगी है, विश्वास किया जाना चाहिये कि जो कोई इसे एक बार भी पढ़ लेगा, उनकी मनःस्थिति मूढ़ता में  जकड़ी नहीं रह सकती। उसे कुछ ऐसे प्रगतिशील कदम उठाने की अन्तः प्रेरणा अवश्य  मिलेगी  जो उसके तथा समस्त समाज के लिए श्रेयस्कर हो।

झोला पुस्तकालय ज्ञान-यज्ञ का एक अति महत्त्वपूर्ण आधार है। यह पुष्प प्रक्रिया हममें से हर एक के द्वारा चलाई जाय। गुरुदेव  चाहते थे कि हमारा ज्ञान-यज्ञ असंख्य झोला पुस्तकालयों द्वारा घर-घर सद्ज्ञान का प्रकाश पहुँचाने और नैतिक साँस्कृतिक पुनरुत्थान की पुष्प प्रक्रिया गतिशील करने में सहयोगी हो । 

गुरुदेव कहते हैं :अपने जीवन के प्रमुख संकल्प सफलतापूर्वक फलित होते देखकर हर किसी को प्रसन्नता होती है , संतोष होता है।  उपासनात्मक प्रक्रिया यज्ञ, जप और धर्म प्रेमियों को एक मंच पर इकट्ठा करने की प्रक्रिया के साथ सफलता की दिशा में इतनी आगे बढ़ गई हैं कि हमें इस संदर्भ में सन्तोष है और विश्वास है कि वह प्रक्रिया आगे भी अपने आप गतिशील रहेगी। पर साधनात्मक दिशा का हमारा दूसरा संकल्प ज्ञान-यज्ञ अभी बहुत अधूरा, लँगड़ा और असंतोषजनक स्थिति में पड़ा है। 

हम अपने परिजनों से लड़ते-झगड़ते भी रहते हैं और अधिक काम करने के लिए उन्हें भला-बुरा भी कहते रहते हैं,( अभी ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में यह स्थिति नहीं आई है ) पर वह सब इस विश्वास के कारण ही करते हैं कि उनमें पूर्वजन्मों के महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक संस्कार विद्यमान हैं।  आज वे संस्कार  प्रसुप्त पड़े हैं पर उन्हें झकझोरा जाय तो जगाया जा सकना असम्भव नहीं है। कड़वे-मीठे शब्दों से हम अक्सर अपने परिवार को इसलिये झकझोरते रहते हैं कि वे अपनी अंतःस्थिति और गरिमा के अनुरूप कुछ अधिक साहसपूर्ण कदम उठा सकने में समर्थ हो सकें। 

इन्ही शब्दों के साथ  हम आपसे आज का ज्ञानप्रसाद समाप्त करने की आज्ञा लेते हैं। आप प्रतीक्षा कीजिये आने  वाले एक और नवीन  लेख की और हम कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें।

जय गुरुदेव 

____________

Leave a comment

अखंड दीप ,अखंड अग्नि ,ज्ञान- प्रसार और यज्ञों का आपसी सम्बन्ध 

16  सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद – अखंड दीप ,अखंड अग्नि ,ज्ञान- प्रसार और यज्ञों का आपसी सम्बन्ध 

अखंड ज्योति अगस्त 1969 के अंक में परमपूज्य गुरुदेव ने अपनों से अपनी बात करते लिखा था कि हमारे जीवन में यज्ञों की ,अनुष्ठानों की , ज्ञानप्रचार की  बहुत ही भागीदारी  रही  है। लेकिन लोगों को इस बात का भी ज्ञान होना बहुत ही आवश्य है कि जब परमपूज्य  गुरुदेव यज्ञ करवाते थे तो उसके पीछे केवल उपासना का ही अंश होता था य कोई और भी उदेश्य था। कहीं हम यह तो नहीं सोच रहे कि वह  लाखों लोगों की भीड़ इकठ्ठा करके वाह -वाही लूटना चाहते थे।  हालाँकि हम सब भली भांति जानते हैं कि गुरुदेव जैसे महापुरष संत के लिए  इस  तरह के विचार रखना संभव नहीं है लेकिन इस संसार में भांति -भांति की धारणा  के मनुष्यों का वास् है।  अभी ही हमने आदरणीय महेंद्र  भाई साहिब की वीडियो देखि जिस में  वह बता रहे थे कि परमपूज्य गुरुदेव के मुंह पर आकर लोग  कह देते थे कि किसी और का साहित्य अपने नाम से प्रकाशित करके वाह-वाही लूट रहे हैं।  क्या हमें इस बात का अनुमान भी है गुरुदेव को इस धारणा  से  कितनी ठेस पहुंची होगी।  हमारा ऑनलाइन ज्ञानरथ ऐसे ही परिजनों की भावनाओं को बदलने का प्रयास कर रहा है।  हम सब सामूहिक और व्यक्तिगत यह प्रण तो ले ही सकते हैं कि गुरुदेव की शक्ति विश्व के हर घर में पहुंचा कर ही दम लेंगें। आज का  लेख सरलीकरण और अपने विचारों को add करने के  बाद  गुरुदेव के शब्दों  में ही  प्रस्तुत है। हाँ एक बात और : पहले भी कई बार कह चुके हैं ,आज फिर दोहराना चाहते हैं – कॉपीराइट न होने कारण तिथियों और वर्षों के बारे में कहना बहुत ही कठिन है।  इन दोनों यज्ञों के वर्ष अखंड ज्योति में कुछ और हैं और दूसरे  स्थानों पर कुछ और । हमारी गहन रिसर्च इस विषय पर बहुत ही  कम काम करती है , इसलिए क्षमा प्रार्थी हैं।  हमारे पाठक 1956 /1958 को ignore तो नहीं आकर सकते लेकिन भावना और परिणामों पर अधिक ध्यान  दें  तो ठीक रहेगा। 

तो आइये सुने परमपूज्य गुरुदेव के दिव्य वचन :     


गुरुदेव कहते हैं :

अपने परिवार  द्वारा दो बड़े यज्ञ शान और सफलतापूर्वक सम्पन्न हो चुके। एक यज्ञ 1956   का शतकुण्डी ( 100 कुंड )नरमेध यज्ञ  जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता और दूसरा 1958 का  सहस्त्र कुण्डीय (1008  कुंड )  गायत्री महायज्ञ था।    

1956 वाले  यज्ञ में  24 व्यक्तियों ने अपना जीवन नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए अर्पित किया था । यह  यज्ञ केवल  शतकुण्डी होते हुए भी अनुपम था। हवाई जहाजों से विदेशों में बसने वाले भारतीय धर्मानुयायी भी उसमें सम्मिलित होने आये थे। “नरमेध की प्रक्रिया” देखने के लिए जनसमूह समुद्र की तरह उमड़ पड़ा था।  क्रोध और आवेश आकर कितने ही व्यक्ति हत्या और आत्म-हत्या करने पर उतारू हो जाते हैं, पर धैर्य, प्रेम, त्याग और करुणा से परिपूर्ण अन्तःकरण लेकर युग संस्कृति के पुनरुत्थान में जीवन की बलि देना उस पतंगे का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो प्रकाश में लय हो जाने के आनन्द का मूल्यांकन करता हुआ, शरीर सुख को तिनके की तरह तोड़कर फेंक देता है। उन 24 बलिदानियों का ऐसा “प्रभाव” पड़ा कि उनसे  प्रभावित होकर और भी सहस्त्रों व्यक्ति पूरा तथा आँशिक जीवन लोक-मंगल में लगाने के लिए प्रस्तुत हो गये और अपनी युग निर्माण योजना तेजी से आगे बढ़ चली। 

नरमेध  यज्ञ के प्रभाव :

इस यज्ञ की सफलता और प्रतिक्रिया भी बहुत ही आशाजनक हुई। धार्मिक जगत् में एक ऐसी हलचल उत्पन्न हुई  जिसके पीछे प्राचीनकाल की तरह सतयुग वापिस लाने की उमंग हिलोरें मार रही थी। यह  उत्साह पानी के बुलबुले  की तरह समाप्त नहीं हो गया वरन् जंगल की आग   की तरह व्यापक होता चला गया। 

अपनी यज्ञीय प्रक्रिया बहुत ही सरल है  उसमें रूढ़िवादिता, जाति -वर्ग और पैसे  के लालच के लिए कोई स्थान नहीं। हमारे देशों में तिल, घी चावल नहीं केवल सुगन्धित जड़ी बूटियाँ और औषधियों द्वारा हवन होते हैं। खाद्य पदार्थ न जलाने की सामयिक आवश्यकता को हम समझते हैं। घी की भी उतनी ही नपी-तुली मात्रा व्यय करते हैं, जो आज की विपन्न परिस्थितियों और धार्मिक कर्मकाण्ड की आवश्यकता को देखते हुए न्यूनतम हो सकती है। यही कारण है कि राष्ट्रीय खाद्य समस्या के प्रति सजग लोगों में से कभी किसी को हमारे कार्यक्रमों पर उँगली उठाने का साहस नहीं हुआ।” हमारे यज्ञ विवेक का अवतरण करने के लिए हैं। इन यज्ञों में  ब्राह्मण वर्ग को आर्थिक लाभ पहुँचाने  की भी कोई व्यवस्था नहीं रहती। यह जनजीवन में प्रकाश एवं जनमानस में उल्लास भरने वाला आयोजन हैं। इसलिये इन यज्ञों में शामिल होने वाले सभी परिजन धर्म प्रेमी होते हैं। हम व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में यज्ञीय वृत्तियाँ जागृत करने के महान् आदर्श और उद्देश्य को लेकर चले हैं। 

1958  में सहस्त्र कुण्डीय (1008  कुंड )  गायत्री महायज्ञ के रूप में प्रस्तुत हुआ दूसरा यज्ञ था । इसी यज्ञ को ब्रह्मस्त्र यज्ञ भी कहा जाता है।  इस यज्ञ की तुलना  चक्रवर्ती केन्द्रीकरण की भावना से किये जाने वाले अश्वमेध यज्ञ से की जा सकती है।  जब राज सत्तायें विश्रृंखलित हो जाती थीं, तब उनका केन्द्रीकरण तथा पुनः निर्माण करने के लिए प्राचीनकाल में अश्वमेध यज्ञ किये जाते थे। इन दिनों सारा तंत्र ही अस्त-व्यस्त हो रहा है तो उसको centralise करने , केन्द्रीकरण करने और एक क्रमबद्धता उत्पन्न करने के लिए यह सहस्त्र  कुण्डीय यज्ञ था। उसमें भारत के हर प्रान्त से और विदेशों में फैले लगभग चार लाख प्रबद्ध परिजन आहुतियां  देने आये थे। आयोजन बहुत ही  बडा था। कहते हैं कि  इतना विश्वास, इतनी  व्यवस्था  और इतना उद्देश्यपूर्ण आयोजन महाभारत के राजसूय यज्ञ  के बाद पिछले पाँच हजार वर्षों में कोई और  नहीं हुआ। सात नगरों में बसे हुए-सात मील की परिधि में फैले हुए चार लाख साधकों  और  दस गुने दर्शकों के उस विशाल आयोजन को देख कर  यदि इस युग का अद्भुत और अनुपम धार्मिक उत्सव कहा  जाता है तो इसमें कोई शेखी मारने  वाली बात नहीं है। इस यज्ञ की  सभी बातें अनोखी थीं। धन के लिए किसी भी  मनुष्य के सामने हाथ न पसारने की कठोर प्रतिभा थी।  40 लाख लोगों का इतना बड़ा आयोजन, आप अनुमान लगा सकते हैं कि कितना बड़ा खर्चा हुआ होगा। ऐसे बड़े आयोजन को  सम्पन्न कर लेना कोई साधारण बात न थी। इतने विशाल जनसमुदाय में  सभी के लिए  निवास और अन्य  व्यवस्था जुटा सकना हमारे जैसे अकेले  और साधन रहित व्यक्ति के लिए एक प्रकार से असम्भव ही समझा जाता था, पर यह आश्चर्य ही माना जाएगा कि वह धर्मानुष्ठान सानन्द सम्पन्न हुआ। देखने वालों में से कितनों ने ही उस अवसर पर  एक से एक अद्भुत चमत्कार देखे।

सहस्त्र कुण्डीय यज्ञ के प्रभाव :

उस धर्म-तन्त्र द्वारा आयोजित अश्वमेध के समकक्षी सहस्र कुण्डीय गायत्री महायज्ञ का धार्मिक जागरण की दृष्टि से चमत्कारी प्रभाव हुआ। धार्मिक जगत में  नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान की एक ऐसी  उल्लास भरी लहर पैदा हुई जिसने  रचनात्मक दृष्टि से अविश्वसनीय कार्य किया।  

ऐसे दिव्य प्रयासों  पर विश्वास हो भी कैसे ? प्रतक्ष्यवाद का युग जो है , हम सब परिणाम अपने चरम चक्षुओं से देखना चाहते  हैं क्योंकि हमारी मन की ऑंखें तो बंद हैं ,अन्तःकरण का तो पता तक नहीं किस चिड़िया  का नाम है। यही कारण है कि आज 2021  में वैज्ञानिक अध्यात्मवाद ( Scientific spirituality ) का इतना बोलबाला है।  परिजनों को अगर यज्ञ के लिए प्रेरित करना है तो उन्हें scientific logic  देना पड़ेगा , तर्क देना पड़ेगा कि हम यह क्यों कर रहे हैं और यह  कैसे प्रभावित करेगा। वैसे तो  Scientific Spirituality का विषय इतना नया  भी नहीं है लेकिन उसे समझने के लिए शिक्षित भी तो होना आवश्यक है। आज शिक्षा और टेक्नोलॉजी  के प्रसार ने  इस विषय को समझना कुछ सरल बना दिया  है।आँखों के सामने प्रस्तुत घटनायें दीखती हैं-पर विस्तृत विश्व में जन-जन के अन्तःकरण में  होने वाली हलचलों और उनके द्वारा विनिर्मित प्रक्रियाओं का ब्यौरा नहीं रखा जा सकता और न उन्हें देखा जा सकता है। इसलिये लोग भले ही उस प्रतिक्रिया का अनुमान न लगा सकें पर इतना निश्चित है कि “जो महान् कार्य उस सहस्त्र  कुण्डीय गायत्री महायज्ञ के फलस्वरूप सम्पन्न हुआ, वह निस्सन्देह अनुपम था।”

गायत्री यज्ञ और युग-निर्माण एक ही पक्ष के दो पहलू बन गये। इस आधार पर देश के कोने-कोने में सहस्त्रों आयोजन सम्पन्न हुए हैं और विदेशों में भी उसका बहुत ही स्वागत सहयोग हुआ है। 

उन आयोजनों के पीछे सूक्ष्म देव-शक्तियों का जगना और जनमानस की दिशा मोड़ना तथा भारतीय तत्त्व-ज्ञान के वर्चस्व के अनुरूप परिस्थितियाँ उत्पन्न करना इन यज्ञों का ऐसा रहस्यमय पहलू है जिसे समझ सकना और उस पर विश्वास कर सकना हर किसी के बस की बात नहीं। फिर भी वे एक रहस्यमय सच्चाइयाँ है जो समयानुसार अपनी वास्तविकता प्रकट कर रही हैं 

इन्ही  यज्ञों  के स्तर का ही हम दूसरा धर्मानुष्ठान ज्ञान-यज्ञ चलाते रहे हैं। हमारा जीवन क्रम इन दो पहियों पर ही लुढ़कता आ रहा है। उपासना और साधना यही तो दो आत्मिक प्रगति के आधार हैं। उपासना पक्ष, गायत्री जप एवं यज्ञ से पूरा होता रहा है। साधना का प्रकरण ज्ञान-यज्ञ से सम्बन्धित है। यह स्वाध्याय से आरम्भ होकर सद्ज्ञान प्रसार के लिए किये जाने वाले प्रबल प्रयत्न तक फैलता है। जो इस दिशा में भी हम चुप  नहीं बैठे रहे हैं। रथ के दोनों पहियों की तरह, नाव के दोनों डंडों की तरह ध्यान उस दूसरे पक्ष का भी रखा है और ज्ञान-यज्ञ के लिए भी यथासम्भव प्रयत्न करते रहे हैं। क्योंकि वह पक्ष भी उपासना पक्ष से कम महत्व का नहीं वरन् सच पूछा जाय तो और भी अधिक समर्थ एवं शक्तिशाली है। 

“ज्ञान ही है, जो पशु को मनुष्य-मनुष्य को देवता और देवता को भगवान् बनाने में समर्थ होता है। ज्ञान से ही प्रसुप्त मनुष्यता जागती है और वही आत्मा को अज्ञान के अन्धकार में भटकने से उतार कर कल्याणकारी प्रकाश की ओर उन्मुख करता है। उपासना में दीपक, अगरबत्ती का, अग्नि की स्थापना-ज्ञान रूपी प्रकाश का प्रतिनिधित्व करने के लिए करते हैं, बिना ज्ञान का, बिना भावना का कर्मकाण्ड तो केवल शारीरिक श्रम भाव रह जाता है और उसका प्रतिफल नगण्य ही होता है।”

हमारा 43 वर्ष से प्रज्वलित अखण्ड घृत दीप जीवन में सदज्ञान का प्रकाश ज्वलित किये रहने का प्रतीक है। अपनी यज्ञशाला में अखण्ड अग्नि की स्थापना इसी तथ्य का प्रतीक मानी जा सकती हैं कि हवन कुण्ड की तरह हमारे अन्तःकरण में भी “सद्ज्ञान की ऊष्मा” अनवरत  रूप से बनी रहे। उपासना के घण्टों के अतिरिक्त अपने पास जितना भी समय बच जाता है, उसमें से  स्नान, भोजन, शयन आदि को छोड़ कर शेष सारा ही समय ज्ञानयज्ञ के लिए लगाते हैं। छ: घण्टे उपासनात्मक कृत्य में लगे तो ज्ञानयज्ञ  के लिए उससे दूने बारह घन्टे लगते हैं। ज्ञानयज्ञ के  महत्व को देखते हुए इस तरह की Time-management  तो  उचित ही था। विगत 43 वर्षों  से  हम अपनी जीवन नौका को  इसी क्रम से-इन्हीं दो डंडों ( 1. उपासना 2. साधना -स्वाध्याय  ) के सहारे  चलाते  आ रहे हैं। 24 लक्ष के 24 गायत्री महापुरश्चरण और यज्ञ, संगठन एवं प्रचार कार्यों को तो असंख्य लोग जानते ही हैं  क्योंकि वह प्रतक्ष्य हैं ,लोगों की आँखों  के सामने हैं लेकिन  हमारी ज्ञान साधना, जिसमें हम  दुगना  श्रम कर रहे हैं , कम ही लोगों की जानकारी में है।

अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाएँ अपने लम्बे जीवनकाल में लाखों व्यक्तियों को प्रेरक प्रकाश देने और उनके जीवनों में आशाजनक कायाकल्प प्रस्तुत करने में समर्थ हुई है। संसार भर का शायद ही ऐसा कोई कालेज, विश्वविद्यालय हो जहाँ  हमारे अनुवादित भारतीय धर्म-ग्रन्थ न हों। चारों वेद, 108 उपनिषद, छहों दर्शन, बीस स्मृतियाँ, 18 पुराण छप चुके। ब्राह्मण ग्रन्थ और आराध्य हमारे जाने से पूर्व प्रकाशित हो जायेंगे। भारत में ही नहीं संसार भर में भारतीय समस्त धर्म-ग्रन्थों का समग्र परिचय प्रस्तुत करने का यह ऐतिहासिक प्रयत्न है। अब तक एक व्यक्ति द्वारा ऐसा दुःसाहस कभी भी नहीं किया गया है। थोड़े ही समय में देश और विदेश में भारतीय तत्त्व-ज्ञान की साँगोपाँग जानकारी कराने की अपने ज्ञान-यज्ञ की एक महत्त्वपूर्ण धारा है, जिससे बहुतों ने बहुत कुछ पाया है।

क्या हमारा ऑनलाइन ज्ञानरथ इस ज्ञानयज्ञ की मशाल अपने असंख्य हाथों में लेकर विश्व में अलख जगाने में समर्थ है ? कृपया कमेंट करके बताने का कष्ट करें। 

जय गुरुदेव 

आप प्रतीक्षा कीजिये आने  वाले एक और नवीन  लेख की और हम कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें।

Leave a comment

कहां से आ गया यह ऑनलाइन  ज्ञानरथ by आद. सविंदर पल जी -भाग 2

15 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद : कहां से आ गया यह ऑनलाइन  ज्ञानरथ by आद. सविंदर पल जी -भाग 2

“कहाँ से आ गया यह ऑनलाइन ज्ञानरथ” शीर्षक वाले लेख का प्रथम भाग हमने कल प्रस्तुत किया था।  बहुत ही अच्छा रिस्पांस मिला, बहुत ही उच्च कोटि के कमेंट , ज्ञान से भरपूर कमेंट, आप सभी ने पोस्ट किये , बहुत ही प्रेरणा मिली , बहुत ही मार्गदर्शन मिला ,इसके लिए हम आप सबका ह्रदय से नमन वंदन,धन्यवाद करते हैं। प्रसन्नता के साथ- साथ  हमें इस बात का खेद भी है कल बहुत देर रात तक हम आप सबके कमैंट्स का चिंतन ,मनन और विश्लेषण करते रहे और रिप्लाई करने का समय ही नहीं मिला।  कुछ भाई -बहनों के कमेंट तो ऐसे भावनात्मक थे कि एक -एक का रिप्लाई करने के लिए कुछ एक पंक्तियाँ नहीं ,पूरा लेख भी कम पढ़  सकता था। 

संध्या कुमार  जी ने हमारी कार्य शैली का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि :महाकाल गुरुदेव के साहित्य को प्रस्तुत करने के लिए उसे गहराई से अध्ययन करना होता होगा और यह कार्य एक बार पढ़ने से नही होता है,उसे लिखने हेतु कई बार पढ़ना होता है,इससे आसानी से समझा जा सकता है कि आप एवं आपके सहयोगी कई कई घंटे लगाकर ज्ञान रथ के माध्यम ज्ञान रस का पान् जन जन तक पहुंचाकर पवित्र कार्य कर रहे हैँ। 

आपने बिल्कुल  ही सत्य लिखा  है बहिन जी , यह तो नए सिरे से लिखने वाले लेखों  की बात है।  सविंदर भाई  साहिब जी द्वारा लिखा लेख आपके समक्ष लाने से पूर्व याद  नहीं कितनी बार पढ़ा होगा और जब निश्चय कर  लिया कि इसे ज्ञानप्रसाद के रूप में परोसा जाये,  तो कम से कम 5 घंटे एडिटिंग में तो  लगे ही होंगें। इसे यह कतई न समझा जाये कि  भाई साहिब के लिखने में कोई समस्या थी, उनके द्वारा व्यक्त की गयी भावनाओं को अपने अन्तःकरण में ढालना,समझना भी अत्यंत आवश्यक था। हमारे पाठक इतने सूझवान और ज्ञानवान हैं कि उन्हें  कोई भी ढील सहन नहीं होती। 

रेनू श्रीवास्त्व जी ने कमैंट्स के प्रति हमारी भावनाओं और प्रयासों की सराहना करते लिखा  है:  सभी सहकर्मियों के कमेंट पढ़ना और सबको अलग-अलग उत्तर देना।सबके वश का बात नहीं है।उन्हें जितना भी धन्यवाद दें कम ही है।बच्चों का सहयेाग को कम नहीं आका जा सकता।इस छोटी उम्र में गुरु जी के प्रति समर्पण और बड़ेां के प्रति आदर की भावना परिवार का संस्कार का भी असर है।गुरुदेव से करवद्ध प्रार्थना है कि सभी पर कृपा दृष्टि बनाये रखें। 

एक -एक कमेंट को पढ़ना ,  रिप्लाई करना , निसंदेह ही कठिन है लेकिंन रिप्लाई किये बिना  हमारा अंतःकरण बैचैन रहता है। अगर परमपूज्य गुरुदेव की प्रेरणा हुई तो एक लेख केवल कमेंन्ट्स और उनके रिप्लाईज़ पर ही लिखेंगें ,देखेंगें आपका क्या रिस्पांस है। आखिर संपर्क साधना के बिना यह दिव्य ज्ञानरथ कैसे चल सकेगा।   

अपनी तरफ से यही प्रयास रहता है आपके समक्ष जो भी कंटेंट प्रस्तुत किया जाये उसमें “किन्तु -परन्तु” की सम्भावना बिल्कुल ही  न हो ,क्योंकि मीन-मेख निकालने वालों की तो भीड़ लगी हुई है। 

तो मित्रो आपकी प्रतीक्षा का अंत करते हुए हम आपको लिए चलते हैं  सविंदर भाई साहिब की क्लास में जहाँ ऑनलाइन ज्ञानरथ के उदेश्यों को क्रियान्वन्त किया जा रहा है ।     

Over to Savinder Bhai sahib :

_____________________________

ऑनलाइन ज्ञानरथ  परिवार अनेक दिव्य व जागृत आत्माओं का जमावड़ा है: कैसे ?

जिस प्रकार परम पूज्य गुरुदेव व परम पूज्य वन्दनीया माता जी ने कभी भी अपने परिवार को , गायत्री परिवार को बड़ा परिवार बनाने की बात नहीं सोची, उसी प्रकार आदरणीय अरुन भइया जी ने भी आनलाइन ज्ञान रथ परिवार को बड़ा परिवार बनाने की बात कभी नहीं सोची, वरन  सदैव यह सोचा कि यह परिवार महामानवों का एक दिव्य  समूह बने। जिस प्रकार परम पूज्य गुरुदेव को महापुरुषों के एक दिव्य समाज को  देखने की अभिलाषा हमेशा से ही थी,उसी तरह की अभिलाषा आदरणीय अरुन भइया जी की भी है ताकि  परम पूज्य गुरुदेव का सपना सार्थक हो। 

सही अर्थो में मनुष्य जीवन की सार्थकता महामानव बनने में ही है 

आज समाज में ऐसे ही व्यक्तियों के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई  नजर आती  है। धरती से आकाश  तक उन्ही देवमानवों के लिए पुकार है। महाकाल से लेकर महामाया तक हर शक्ति उन्ही महामानवों का आवाहन करती नजर आती है। हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि हमारे  सभी आत्मीय पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन महाकाल की यह पुकार अनसूनी नहीं करेंगे।  आनलाइन ज्ञान रथ परिवार का जन्म  इन्ही घड़ियों के लिए  हुआ है।  जिस प्रकार  युद्ध का  ढ़ोल  बजते देख सैनिकों के शस्त्र स्वयं ही  निकल आते हैं, बदलते वातावरण को अनुभव करते हुए हम जैसे युग सैनिकों को स्वतः ही परिवर्तन के लिए कमर कस कर तैयार हो जाना चाहिए।  आज महामानवों की कमी के कारण ही सामाजिक असंतुलन दिखाई पड़ता है।  पैसे और पद के भूखे लोग मक्खी-मच्छर की तरह बढ़ते दिखाई पड़ते हैं। कुरीतियों व कुसंस्कारों में वृद्धि हो रही है और इनको समूल उखाड़ने वाले परशुराम कहीं भी  दिखाई नहीं दे रहे । महामानवों की भूमि रहा हमारा भारत देश , क्या सो गया है? भेड़ियों,गिद्धो व सियारों के झुण्ड दिखाई पड़ते हैं तो सिंहो की गुफाएँ खाली क्यों हैं? अनीति,आत्याचार व अपराध संगठित दिखते हैं तो महामानवों का जमावड़ा दिखाई क्यों नहीं पड़ता? इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता “महामानवों के एकत्रीकरण” की है।  

वे उठेंगें ,आगे बढ़ेंगें  तो सारी वैश्विक समस्याओं व उलझनों का समूल नाश होगा। 

युग परिवर्तन जैसा महान अभियान तुच्छ व बुरी सोच वाले व्यक्तियों से नहीं,बस महापुरुषों जैसा चिन्तन व जीवन रखने वाले पुरुषों से ही संभव है। इस संसार में कोई भी वस्तु बिना मोल नहीं मिलती  और दैवी अनुदान भी पात्रता की कीमत पर ही  मिलते हैं इसलिए हम सबको आगे बढ़कर महामानवों की तरह प्रयत्न करना होगा।  हमें पूर्ण आशा व विश्वास है कि ऐसी ताकत आनलाइन ज्ञान रथ परिवार का प्रत्येक पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन रखता है। आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के हर सूझवान व समर्पित सहकर्मी को इन दिनों ऐसे आत्मबल संपन्न प्रयोगों को करने की आवश्यकता है जो सृष्टि में झंझावात ला दें।ऐसे प्रचण्ड तपस्वियों की आवश्यकता है जिनके अंतःकरण से निकली अग्नि भूमण्डल को जलाकर रख दे।  ऐसे भागीरथों  की आवश्यकता है जिनके तप से गंगा को भूमण्डल पर उतारने को  विवश कर दें। इससे कम में महामानव होने की पात्रता विकसित कर पाना सम्भव नहीं है।  महामानव बनने के लिए त्याग-बलिदान का मूल्य चुकाना पड़ता है,आत्मपरिष्कार का प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। आनलाइन ज्ञान रथ परिवार का प्रत्येक पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन यह योग्यता  रखता है। इस  परिवार का उद्देश्य अपने मानवीय मूल्यों का पालन करते हुए श्रद्धा व समर्पण भाव से, आदरपूर्वक परम पूज्य गुरुदेव के विचारों को आत्मसात् कर जन-जन तक पहुँचाकर सार्थक परिवर्तन दृष्टिगोचर करना है। आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में भौतिक लाभ व मौज मस्ती कर वाहवाही लूटने वालों  का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।  जो स्वयं को सच्चे हृदय से परम पूज्य गुरुदेव का अंग मानते हों, बड़प्पन की अभिलाषा छोड़,महानता की उपासना साधना व आराधना प्रारंभ कर दें।

“हम बदलेंगे-युग बदलेगा” व “हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा जैसे नारे लगाने का नहीं”

यह  समय “हम बदलेंगे-युग बदलेगा” व “हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा” जैसे नारे लगाने का नहीं वरन इस चिन्तन को अपनी जीवनशैली में समाविष्ट करने का है। निसन्देह अपने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में सार्थक रूप से वे बदलाव आ जाएं तो फिर इस ब्रह्माण्ड की कोई भी शक्ति युग परिवर्तन को सच में बदलने से अब नहीं रोक सकती है। इसके लिए हम सबको दो संकल्प अवश्य ही लेने चाहिए।  

1 . यदि हम सबके परिवार का गुजारा एक निश्चित संपदा से चल सकता है तो सात पीढ़ियों के लिए सोचते हुए नाहक धन-संग्रह करने का क्या औचित्य  ? हम सबको  उस बचाए हुए  धन को लोक-मंगल के लिए लगाने का प्रण लेना चाहिए।  बिना परिश्रम के यदि नाती-पोतों को संपदा मिल भी जाए तो वह उनके व्यक्तित्व को कुन्द ही बनाएगी और हम सबके, स्वयं के लिए पाप-पतन का द्वार खोलेगी, सो अलग।  वैसे तो अपने अधिकतर पाठकगण व सहकर्मी  भाई बहन पहले से ही “सादा जीवन-उच्च विचार” और “जो प्राप्त है वही पर्याप्त है “ के भावों को लेकर आगे चलते आये  हैं, उन्हें यह प्रयत्न-पुरुषार्थ करने में कोई समस्या तो  आने वाली है नहीं , परंतु यदि कोई सहकर्मी कदाचित भूले-भटके इस सोच से अछूता रह भी  गया हो तो उसे आज ही इस संकल्प को मूर्तरूप देने की आवश्यकता है। 

 2 . दूसरा प्रयास गायत्री परिजनों व आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के सभी आत्मीय पाठकगण व सहकर्मी भाइयों व बहनों को मूढ़मान्यताओं से बाहर आकर सत्पुरुषार्थ करने का है।  ईश्वर हर प्राणी में विराजमान है  और उच्च  आदर्शो के समुच्चय के रूप में विश्व- ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।  पूजा-उपासना साधना व आराधना का मूल उद्देश्य अंतःकरण पर चढ़े हुए कर्म-विक्षेपों को धोकर, उतार फेंक देने का  है, न कि काल्पनिक ईश्वर की खुशामद में समय गँवा देने का। जो सारी सृष्टि का स्वामी है,उसका कार्य क्या हमारे धूपबत्ती दिखाने से ही चल सकेगा? परम पूज्य गुरुदेव का उद्देश्य यज्ञ,संस्कार व कर्मकांड द्वारा आंतरिक सत्प्रवृतियों का जागरण है, न कि मात्र कर्मकांड के जाल में लोगों को भटका देना है। जब तक हम एक अच्छा इंसान बनने का प्रयत्न नहीं करते, तब तक भगवान हम सबकी आँखों के सामने भी बैठा हो, दिखने  वाला नहीं  है।  

आज की सर्वोपरि आवश्यकता “भावनात्मक नवनिर्माण” ही  है और उसे ही युगधर्म मानकर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के प्रत्येक पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन को अहर्निश चलने की आवश्यकता है। हमें वाहवाही लूटने के बजाए आगे बढ़कर ये कार्य हाथ में लेने चाहिए क्योंकि मानव जाति का भाग्य व भविष्य इन्ही सत्प्रयासों पर निर्भर है।  जिन परिजनों के हृदय में अपार साहस है और जो लोग मोह के बंधनों👫को त्यागकर इस पथ पर चलने का पराक्रम दिखा सकते हैं उनके लिए इस आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में  ह्रदय से स्वागत है। ऐसे ही परिजनों के लिए यह पंक्तियां आवाहन हैं ,वे ही सच्चे महामानव बनने की पात्रता रखते हैं और आने वाले वर्षो में युग परिवर्तन के माध्यम बनेगे। 

इन पंक्तियों के लिखे जाने के पीछे हमारा मनोभाव यही है कि युग परिवर्तन के महामानवों की टुकड़ी, अपने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के सूझवान व समर्पित सहकर्मी, देवतुल्य भाइयों व देवीतुल्य बहनों से सजी हो क्योंकि आनलाइन ज्ञान रथ परिवार उत्पत्ति का मूल प्रयोजन यही है। इस छोटे से  परिवार के सभी आत्मीय पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन अपने 12 स्तम्भों व मानवीय मूल्यों का पूर्णतया पालन करते हुए परम पूज्य गुरुदेव के युग परिवर्तन के महासंग्राम में एक सशक्त युग सैनिक बन कर अधिक न सही तो गिलहरी की भूमिका में अपना  उत्तरदायित्व समझकर योगदान देने की कृपा करें, महान दया होगी। जिन स्तम्भों की बात हम अक्सर करते आए  हैं वह 1. शिष्टाचार, 2. स्नेह,3.  समर्पण, 4. आदर, 5. श्रद्धा ,6. निष्ठा,7. विश्वास ,8. आस्था,9. सहानुभति ,10.  सहभागिता,11. सद्भावना एवं 12. अनुशासन हैं।  

इस  परिवार से जुड़ कर आदरणीय अरुन भइया जी के साथ कंधा से कंधा मिलाकर परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक व क्रान्तिकारी विचारों को घर -घर में, जन-जन तक पहुँचाने में अपना योगदान देकर अपने जीवन को कृतार्थ करें।  यही हमारा आप सबसे भाव भरा निवेदन है।  जय गुरुदेव  

आप प्रतीक्षा कीजिये आने  वाले एक और नवीन  लेख की और हम कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें।

Leave a comment

कहंI से आ गया यह ऑनलाइन ज्ञानरथ by आद. सविंदर पल जी -भाग 1

14 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद – कहंI से आ गया यह ऑनलाइन ज्ञानरथ by आद. सविंदर पल जी -भाग 1 

आज का ज्ञानप्रसाद एक प्रकार से अपडेट  और अपनों से अपनी बात ही है। इतने अधिक लेख lineup होने के कारण अपडेट लिखना तो टाईमटेबल में नहीं था परन्तु हमारे (कनाडा के) समयानुसार आज सुबह पिता-पुत्री जोड़ी के messages ने हमें इसी दिशा में कार्यरत होने की प्रेरणा दी। इस समर्पण और सहकारिता के लिए हमारी छोटी बेटी पिंकी  और उनके  पापा सविंदर जी को हमारा ह्रदय से स्नेहिल धन्यवाद्।

आज का लेख इसी समर्पण जैसे और भी मानवीय मूल्यों पर आधारित है जिसे आदरणीय सविंदर भाई साहिब ने कुछ दिन पूर्व हमें लिख कर भेजा था।  उन्हें तो हमने उसी दिन रिप्लाई करके कह  दिया था कि इस अमूल्य लेख को ऑनलाइन ज्ञानरथ में समय आने पर शामिल करेंगें। सविंदर जी द्वारा लिखे गए लगभग 2300 शब्दों का एक लेख तो यूट्यूब भी आज्ञा नहीं देता, इसलिए हम इनको दो भागों में बाँट रहे हैं।  आज पहला भाग और कल इसका दूसरा भाग प्रस्तुत करेंगें। ऑनलाइन ज्ञानरथ की उत्पति और इसके उदेश्यों पर आधारित यह लेख अखंड ज्योति के लेखों से किसी भी प्रकार कम नहीं हैं।  इसलिए हम आपके समर्पण और श्रद्धा की आशा कर रहे हैं। 

अब आती है बात पिता -पुत्री जोड़ी की।  सुबह पांच बजे पिंकी बेटी का और साढ़े छै बजे सविंदर भाई साहिब का  मैसेज आया  कि यूट्यूब पर अरुण वर्मा जी की उपस्थिति नहीं दिख रही ,क्या वह ठीक तो हैं न ,हमें चिंता हो रही है।  हमारे पास उनका कोई फ़ोन नंबर भी नहीं है ,आप कृपया सम्पर्क करके हमें बताएं। हमने रिप्लाई कर दिया कि कल वाली वीडियो अपलोड करने के बाद  उनका हमें मैसेज आया था लेकिन यूट्यूब पर हमने  उन्हें नहीं देखा।  फिर सविंदर जी ने यूट्यूब पर अरुण वर्मा  जी को  कमेंट किया  और पूछा।  अरुण जी ने तुरंत रिप्लाई करते अपनी सारी स्थिति शेयर की। यह रिप्लाई आप यूट्यूब पर देख सकते हैं ,अगर पूरा विस्तार से लिखें तो लेख की लंबाई कम रह जाएगी।  प्रीती भारद्वाज जी भी बड़े दिनों से  यूट्यूब  में  दिख नहीं रही  थीं , उनको भी मैसेज किया तो उनके बेटे अभिषेक ने बताया कि मम्मी मामु के घर गयी हैं और हमारे exam चल रहे थे, इसलिए पोस्ट पढ़ने य कमेंट करने का समय नहीं मिला।  इन सभी messages को आपके  साथ शेयर करने का उदेश्य केवल  मानवीय मूल्यों का आदर करते हुए अपने साथियों को  हर पल अपने अन्तःकरण में स्थापित किए  रखना है।  हाँ इस क्रिया में समय तो लगता ही है लेकिन कुछ  पाने के लिए बलिदान तो करना ही पड़ता है। आज हमें अक्सर लोग बोलते हुए मिल जायेंगें – समय किस के पास है ? हम तो बहुत ही busy हैं – इत्यादि।  लेकिन अंदाज़ा लगाए आज से पांच- छे  पुराने समय की स्थिति को जब परमपूज्य गुरुदेव वंदनीय माताजी के साथ मथुरा के घर-घर में जाकर अखंड ज्योति पत्रिका वितरित करते थे ,  पहले सप्ताह पत्रिका छोड़ आते थे ,दुसरे सप्ताह जब लेने जाते तो यह सुनिश्चित करते कि पत्रिका पढ़ी भी है कि नहीं , दोनों बार परिवार के साथ संपर्क बनाने का प्रयास करते ,बच्चों का ,परिवार का पूछते।  यही एक अपनत्व की प्रक्रिया है जिससे परमपूज्य गुरुदेव ने इतना विशाल परिवार खड़ा कर दिया है।  इसी roadmap पर हम सब , ऑनलाइन ज्ञानरथ के सहकर्मी चलने का प्रयास कर रहे हैं।  जो मानवीय मूल्य लुप्त होते दिख रहे हैं, हर कोई अनजान सी भेड़ -चाल  में ,मृगतृष्णा के भेड़- चाल में भाग  रहा है, उसे स्वयं ही नहीं मालूम की वह चाहता क्या है – यही है भटके  हुए  देवता  की परिभाषा। ऑनलाइन ज्ञानरथ में बहुत ही उच्स्तरीय देवात्माओं का  वास् है।  उन्ही की अंतर्वाणी ,अंतरात्मा को टटोल कर , छिपी प्रतिभा को उजागर करना हमारा सबका परम् उदेश्य है। 

तो आइये परमपूज्य गुरुदेव के इस संकल्प को और परिपक्व करते हुए देखें हमारे सविंदर भाई साहिब की लेखनी से  क्या अमृतवर्षा हो रही है।  एक बार फिर कहेंगें – यह अखंड ज्योति के किसी लेख से कम नहीं है।  

____________   

ॐ श्री गुरु सत्ताय नमः!! अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक व संचालक युगद्रष्टा,युगऋषि,वेदमूर्ति,तपोनिष्ठ परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी,परम पूज्य वन्दनीया माता जी भगवती देवी शर्मा व आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ भगवती गायत्री माता जी  की असीम अनुकम्पा से हम सब पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन आपस में मिलकर एक परिवार, “आनलाइन ज्ञान रथ परिवार” में जुड़कर गुरु कार्य कर रहे हैं। इस ज्ञानरथ के  सूत्राधार व संचालक आदरणीय अरुन भइया जी हैं  जो हम सबका निरंतर उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर प्रेरणा व प्रोत्साहन देते हुए गुरु कार्य हेतु मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य करके पुरुषार्थ कमाने का सराहनीय व प्रशंसनीय कार्य कर रहे हैं। अरुण जी की  प्रेरणा व आशीर्वाद द्वारा  हम सब पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन का अनवरत आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हो रहा है और लाभ भी मिल रहा है। यह लाभ  आजीवन मिलता रहेगा,  कभी कम नहीं होगा।  इसका मुख्य कारण यह है कि  आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में अपनत्व की भावना से ओतप्रोत, परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक व क्रान्तिकारी विचारों का आदान-प्रदान किया जाता है। हम सब पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन परम पूज्य गुरुदेव का अमृत तुल्य ज्ञान प्रसाद आत्मसात कर अपने जीवन का कायाकल्प कर अपनेआप को कृतार्थ कर रहे हैं। सभी सहकर्मी इस अमृत तुल्य ज्ञान प्रसाद को घर -घर में, जन-जन तक पहुँचाने का सराहनीय व प्रशंसनीय कार्य कर रहे हैं जिससे समस्त विश्व वसुधा का कल्याण हो और परम पूज्य गुरुदेव का “मनुष्य में देवत्व का उदय व धरती पर  स्वर्ग का अवतरण” का सपना साकार हो।

 “आनलाइन ज्ञान रथ परिवार” क्या है और यह कहाँ से आ गया।” 

अब बात आती है कि यह “आनलाइन ज्ञान रथ परिवार” क्या है और यह कहाँ से आ गया।  यह हमारी “अपनों से अपनी बात” हो रही है और हम बताना चाहते हैं कि अखिल विश्व गायत्री परिवार को आप सब भली-भाँति जानते व पहचनते हैं जिसकी उत्पत्ति परम पूज्य गुरुदेव ने की है, इसी का एक छोटा सा अंश आनलाइन ज्ञान रथ परिवार है जिसकी उत्पत्ति परम पूज्य गुरुदेव के परम शिष्य आदरणीय अरुन भइया जी ने परम पूज्य गुरुदेव की असीम अनुकम्पा से की है , इन्हें  हम सब पाठकगण व सहकर्मी भाई-बहन डा.अरुन त्रिखा जी के नाम से जानते व पहचानते हैं।  यह एक  छोटा सा परिवार,आनलाइन ज्ञान रथ परिवार बड़ी श्रद्धा,निष्ठा व समर्पण भाव से परम पूज्य गुरुदेव का कार्य निस्वार्थ भावना से निरंतर-अनवरत  कर रहा है।  यह वर्षो के सतत संरक्षण,दिव्यसत्ता के मार्गदर्शन, पाठकगणों के श्रद्धा-समर्पण का  ही परिणाम है कि आज आनलाइन ज्ञान रथ परिवार एक विश्वव्यापी प्रभावशाली संगठन के रूप मे  दिखाई पड़ता है।  दिखने में अपना यह भवन आलीशान दिखाई जरूर पड़ता है,परंतु इसके निर्माण में आदरणीय अरुन भइया जी व हम सब पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन का श्रम,समर्पण व रक्त लगा है।  यदि इसकी रूपरेखा त्याग और बलिदान की न रही होती तो इसे नींव  डालते ही उजड़ जाना चाहिए था।  यदि अपना आनलाइन ज्ञान रथ परिवार सतत प्रगति की राह पर अग्रसर दिखाई पड़ता है तो  इसका एकमात्र  कारण यही है कि इसे बनाने में, इस उद्यान को सींचनें  में आत्मीयता व अपनत्व  का पोषण अनवरत मिल रहा है। यही  कारण है कि  अपनी इस बगिया का प्रत्येक पुष्प ऐसा प्रतीत होता है मानो विधाता ने इसे  अपने ही हाथों से बनाया है और बड़ी कोशिशों  के बाद जागृत आत्माओं का एक समूह, एक स्थान पर एकत्रित हो पाया है। ऑनलाइन ज्ञानरथ में  हम सबके कुछ समर्पित सहकर्मी हैं जो निस्वार्थ भाव से अपना अमूल्य समय निकालकर बड़ी श्रद्धा,निष्ठा व समर्पण की भावना से ओतप्रोत होकर अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर सहकारिता,सहानुभूति व सद्भावना का परिचय दे रहे हैं और  अपने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार का नाम रोशन कर रहे हैं। ऐसे सहकर्मी दो चार य दस नही हैं , सूची बहुत ही लम्बी है लेकिन हमारी समर्था केवल कुछ एक  नाम लेने की  आज्ञा दे रही है। 

हमारे  समर्पित ,श्रद्धावान सहकर्मी : 

प्रेरणा कुमारी,पिंकी पाल,संजना कुमारी,धीरप सिंह तँवर,अरूण कुमार वर्मा,रेनू श्रीवास्तव,रेणुका जंजीर,रेनू राज,सुमन लता, राजकुमारी,संध्या कुमारी,सुधा सिंह,प्रीती भारद्वाज,विनीता पाल,सुमन सिंह,सुमन देपुरा,साधना सिंह,प्रज्ञा सिंह, पुष्पा पाठक,पुष्पा सिंह,विदुषी बन्टा,शशी पांडेय,नीलू सारना,मनीषा सिंह,कीर्ति बहन जी,अंजू गुप्ता,प्रगणा बहन जी,प्रेमिला बहन जी,प्रेमशीला मिश्रा,हेमलता बहन जी,कैलाश दुबे, प्रमोद कुमार, अरुण कुमार मिश्ना,सत्यभामा शुकला,अनुपम सिंह,सत्यम भूषण आदि-आदि। 

यह नाम केवल उन समर्पित  सहकर्मियों में से कुछ एक  हैं जो यूट्यूब /व्हाट्सप्प पर जुड़े हैं। दूसरे  सोशल मीडिया चैनल वालों का वर्णन करना इससे कहीं  कठिन  है।  ऑनलाइन ज्ञानरथ के  इस विस्तार की सार्थकता इसके श्रेष्ठतम उपयोग, भाव भरे स्नेह एवं  प्यार में है,अन्यथा “बड़े परिवार” को “दुखी परिवार” बनते देर नहीं लगती है। 

आज इस परिवार के अतिरिक्त कही भी दृष्टि दौड़ाई जाए तो 12 स्तम्भों व मानवीय मूल्यों का पतन व्यापक स्तर पर होता दिखाई पड़ता है और बड़ा व्यक्ति   बनने की हवस हर किसी के  मन में गहरी  बैठ गई है।  जब प्रश्न बड़प्पन का होता है  तो ऐसा करने में भला किसे आपत्ति होती,पर जब बड़प्पन की परिभाषा-वासना और तृष्णा की अंधी दौड़ बन गई हो,किसी भी कीमत पर किसी भी माध्यम से धन का उपार्जन, समाज में नीति के रूप में स्वीकार्य हो,धन,पद,इन्द्रिय सुख के लिए तड़प भरी महात्वाकान्क्षा को महानता माना जाने लगे तो ऐसे में सत्कर्म,धर्म न्याय की ज्योति जलाए रखने का कार्य कौन करेगा? आज जहाँ भी  देखें, स्वार्थ और संकीर्णता की सोच प्रगतिशीलता के झूठे  नाम से मानवता का नुकसान करने में लगी हुई है।  ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि अपने इस छोटे से  परिवार के सभी आत्मीय पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन पेट व प्रजनन की दौड़ से बाहर निकलकर लोक मंगल की दिशा में सोचें। 

जय गुरुदेव – भाग 2  कल प्रस्तुत किया जायेगा – वह भाग इससे कहीं अधिक रोचक और ज्ञानवर्धक होने वाला है – आप प्रतीक्षा कीजिये कल वाले लेख की और हम कामना करते हैं कि आपकी सुबह को सविता देवता ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। 

Leave a comment

13 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद-शिष्य शिरोमणि शुक्ला बाबा की मूर्तिस्थापना वीडियो

https://youtu.be/dboaUL4Yf2Y

ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार की तरफ से सभी सहकर्मियों का ह्रदय से अभिनन्दन। इस संक्षिप्त 18.30 मिनट की वीडियो में आपको परमपूज्य गुरुदेव के प्रथम शिष्यों में से एक की स्मृति में मूर्तिस्थापना समारोह का वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से देखने का परम् सौभाग्य प्राप्त होगा। साथ में ही आप गायत्रीकुञ्ज छात्रावास और श्री रमेश चंद्र शुक्ला बाल विद्यालय का शुभारम्भ भी देखेंगें। इसी विषय पर हमारी और भी वीडियो हैं जिनके लिंक हम यहाँ दे रहे हैं ,कृपया इन्हे भी अवश्य देखें और पुण्य के भागी बने। जय गुरुदेव

https://youtu.be/4XqQ4BoexW8 (शुक्ला बाबा की अनुभूति)

https://youtu.be/ML7cfjz5_zk (नारी शक्ति का जीवंत प्रतीक है अखंड ज्योति नेत्र हॉस्पिटल )

https://youtu.be/EAWBRZMWALg (वंदनीय माता जी ने कहा -जा आंख बना)

https://youtu.be/1LEWony8wx0 ( एक ही दिन में मिले तीन जीवनदान 1)

https://youtu.be/guClO2IcK60 ( एक ही दिन में मिले तीन जीवनदान 2)

https://youtu.be/JRyN9yriwH8 (गुरुदेव ने कहा -शुक्ला हम तेरी बेटी को मरने नहीं देंगें)

https://life2health.org/ ( Our website)

https://www.facebook.com/arun.trikha.58 ( Our facebook page)

https://twitter.com/onlinegyanrath

Leave a comment

गायत्री मंत्र  के 24 अक्षर और उनसे सम्बंधित शक्तियां

11 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद – गायत्री मंत्र  के 24 अक्षर और उनसे सम्बंधित  शक्तियां

आज के ज्ञानप्रसाद में हम आपके समक्ष गायत्री महामंत्र  के 24 अक्षरों की स्टडी करेंगें और उनके साथ सम्बंधित शक्तियों को जानने का प्रयास करेंगें।  गायत्रीमंत्र के सम्बन्ध में जब भी गूगल सर्च करते  हैं तो सबसे ऊपर परमपूज्य गुरुदेव का ही नाम उभर कर आता है। यह लेख परमपूज्य गुरुदेव द्वारा दिए गए ज्ञान पर ही आधारित है लेकिन हमने अपने अल्प ज्ञान का प्रयोग करके अधिक से अधिक सरल करने का प्रयास किया है। कुछ technical शब्द यथावत हो छोड़ दिए हैं क्योंकि उन्हें समझने ,explain करने में और अधिक ज्ञान और योग्यता की आवश्यकता है। जो ज्ञान इस लेख में दिया गया है इसको ही समझ लिया जाये तो बहुत है ,ऐसा हमारा विश्वास है। 

तो चलते हैं लेख की ओर :    


गायत्री मंत्र में 24 अक्षर हैं।हम प्रतिदिन इन्हें मिलाकर पढ़ने से, जपने से गायत्री मंत्र के  शब्दार्थ और भावार्थ को समझते हैं। पर शक्ति-साधना के सन्दर्भ में इनमें से प्रत्येक अक्षर का अपना स्वतंत्र अस्तित्व और महत्व है। इन अक्षरों को परस्पर मिला देने से “परम तेजस्वी सविता देवता से सद्बुद्धि को प्रेरित करने के लिए प्रार्थना की गई है” और साधक को प्रेरणा दी गई है कि वह जीवन की सबसे बड़ी  सम्पदा सद्बुद्धि का ,ऋतम्भरा प्रज्ञा का, महत्व समझे।  यह बात जितनी  महत्वपूर्ण है उससे भी अधिक  रहस्यमय  है कि इस महामन्त्र का प्रत्येक अक्षर शिक्षाओं  और सिद्धियों से भरा हुआ है। क्या रहस्य है ? कैसे इस मन्त्र के जपने से ऋद्धि -सिद्धि की प्राप्ति होती है ? 

आज इस विषय पर चर्चा करने की आवश्यकता है। 

शिक्षा की दृष्टि से गायत्री मन्त्र के प्रत्येक अक्षर में प्रमुख सदगुणों का उल्लेख किया गया है और बताया गया है कि उनको आत्मसात करने पर मनुष्य देवों जैसी  विशेषताओं से भर जाता है। अपना कल्याण तो  करता ही है , साथ में अन्य असंख्यों को अपनी नाव में  बिठाकर पार लगाता है। कैसे ? हाड़-मांस से बनी और मल-मूत्र से भरी हमारी  काया में जो कुछ भी खासियत  दिखाई दे रही  है वह इस काया में समाहित  सत्प्रवृत्तियों, गुणों ( virtues)  के कारण ही हैं। यही  सत्प्रवृत्तियां मनुष्य को उत्कृष्ट ( excellent ) बनाती हैं। जिस मनुष्य के  गुण-कर्म एवं  स्वभाव में जितनी उत्कृष्टता है वह उसी अनुपात से महत्वपूर्ण बनता है।  

सद्गुणों की उपलब्धि का मार्ग इन सदगुणों की उपलब्धि के लिए लोक शिक्षण, सम्पर्क एवं वातावरण का  योगदान तो है ही  किन्तु अध्यात्म-विज्ञान ( Spiritual Science ) के अनुसार साधना के  द्वारा भी जिस सद्गुण की कमी होती है  उसकी  पूर्ति के उपचार किये जा सकते हैं। उदाहरण के तौर पर हम सब जानते हैं कि अगर हमारे शरीर में किसी  रासायनिक पदार्थ (विटामिन B12 )  के  कम पड़ जाने से स्वास्थ्य लड़खड़ाने लगता है और डॉक्टर B12 की गोलिआं य इंजेक्शन की सलाह देते हैं, ठीक उसी प्रकार सद्गुणों में से किसी की  भी कमी  हो जाने  पर व्यक्तित्व त्रुटिपूर्ण हो  जाता है। उस सद्गुण के अभाव के कारण प्रगतिपथ पर बढ़ने में रुकावट खड़ी  हो जाती हैऔर  परिणामवश उन उपलब्धियों का लाभ नहीं मिल पाता जिनके लिए यह अनमोल मनुष्य-जीवन हमें मिला  था। तो क्या उस सद्गुण की पूर्ति के लिए भी कोई इंजेक्शन है ?,गोली है ? 

सदगुणों की पूर्ति करने वाला इंजेक्शन है गायत्री उपासना :

गायत्री उपासना के विशिष्ट उपचारों से सत्प्रवृत्तियों की कमी पूरी की जा सकती है। उस अभाव को पूरा करने पर  प्रखरता एवं प्रतिभा बढ़ती है और मनुष्य अधिक पुरुषार्थ करता है।  शारीरिक तत्परता और मानसिक तन्मयता बढ़ने से अभीष्ट प्रयोजन पूरा करने में और सफलता मिलने लगती है। सत्प्रवृत्तियों की इसी क्रिया को, process  को सिद्धियां कहते हैं। अनेक साधना शास्त्रों में  गायत्री मंत्र की  शक्तियां और उनकी प्रतिक्रियाओं के नामों का उल्लेख अनेक प्रकार से हुआ है। इन शक्तियों के नामों, रूपों में भिन्नता दिखाई पड़ती है। लेकिन ऐसी भिन्नता के बावजूद कुछ भी फर्क नहीं पड़ता क्योंकि एक ही शक्ति को विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त करने पर उसके विभिन्न परिणाम निकलते हैं। इस point को समझने के लिए नीचे दिया गया उदाहरण बहुत ही सार्थक है। 

पहलवान ,विद्यार्थी,योगी और प्रसूता चारों दूध का सेवन करते हैं लेकिन चारों  के प्रयोजन और लाभ बिलकुल अलग-अलग  हैं। व्यायाम प्रिय व्यक्ति  दूध पीने पर  पहलवान बनता है, विद्यार्थी की स्मरण शक्ति बढ़ती है, योगी को उस सात्विक आहार से साधना में मन लगता है और प्रसूता के स्तनों में दूध बढ़ता है। यह लाभ एक दूसरे से भिन्न हैं। इससे तो यह  प्रतीत होता है कि दूध के गुणों में मतभेद है और हर किसी को अलग -अलग लाभ देता है।  

क्यों खा गए न चक्र ?

यह भिन्नता केवल  ऊपरी है, superficial है । इस स्थिति को गहराई में  समझने पर यों कहा जा सकता है कि हर स्थिति के व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुसार” इससे लाभ पहुंचता है। कई बार शब्दों के अन्तर से भी वस्तु की भिन्नता मालूम पड़ती है। एक ही पदार्थ के विभिन्न भाषाओं में विभिन्न नाम होते हैं। उन्हें सुनने पर सहज बुद्धि को भी  भ्रम हो सकता है। पर जब यह समझ आ जाती है  कि एक ही वस्तु के अनेक उच्चारण हो रहे हैं तो इस  अन्तर को समझने में देर नहीं लगती। एकता को अनेकता में समझने के लिए ऐसे उदाहरण ही सहायक होते हैं। 

एक और उदाहरण :

अलग -अलग लोगों के लिए धन की प्राप्ति के प्रतिफल अलग हो सकते हैं। यह प्रतिफल उनकी  मनःस्थिति के अनुरूप होते हैं । बिजनेसमैन का धन प्राप्त करना, दानी का धन प्राप्त करना और  खर्चीले मनुष्य  का धन प्राप्त करना- सभी के प्रतिफल अलग-अलग हैं।   बिजनेसमैन की लाटरी निकलती है तो वह पैसा व्यापार  में  लगाएगा , दानी की लॉटरी निकलती है तो वह मंदिर  बनवाएगा ,खर्चीले की लॉटरी निकलती है तो वह  शॉपिंग करेगा ,holidaying करेगा। धन के इन गुणों को देखकर उसकी भिन्न-भिन्न  प्रतिक्रियाएं झांकने की बात अवास्तविक (unreal ) है। वास्तविक (real ) बात यह है कि हर व्यक्ति अपनी इच्छानुसार धन का उपयोग करके अभीष्ट प्रयोजन पूरे करता  है। यही कारण है कि गायत्री मंत्र (धन ) का लाभ हर किसी को उसके प्रयोजन के अनुसार ही मिलता है।  

आन्तरिक उत्कर्ष या देवी अनुग्रह क्या  होता है ? 

गायत्री मंत्र  के 24 अक्षरों में सन्निहित चौबीस शक्तियों का भाव यह है कि मनुष्य की मौलिक विशिष्टताओं को उभारने में असाधारण सहायता मिलती है। इसे आन्तरिक उत्कर्ष या देवी अनुग्रह” दोनों में से किसी भी  नाम से पुकारा जा सकता है। आंतरिक उत्कर्ष को internal excellence कहते हैं और दैवी य दिव्य अनुग्रह को भगवान की कृपा  कहा जा सकता है  कहने-सुनने में इन दोनों शक्तियों में जमीन-आसमान जैसा अन्तर दिखता है और दो भिन्न बातें कही जाती प्रतीत होती हैं, किन्तु वास्तविकता यह है कि व्यक्तित्व में ,personality  में  बढ़ी हुई विशिष्टताएं सुखद परिणाम उत्पन्न करती हैं और प्रगतिक्रम में सहायक सिद्ध होती हैं। भीतरी उत्कर्ष और बाहरी अनुग्रह वस्तुतः एक ही तथ्य के दो प्रतिपादन भर हैं। उन्हें एक दूसरे  पर inter-dependent  भी कहा जा सकता है। अंदर से ख़ुशी होती है  तो हम कहते हैं भगवान  की बड़ी कृपा है ,भगवान की कृपा होती है तो आंतरिक प्रसन्नता अपनेआप मिलती है। 

गायत्री मंत्र  की 24 शक्तियों का वर्णन : 

गायत्री की 24 शक्तियों का वर्णन शास्त्रों  ने अनेक नाम और  रूपों से किया है। उनके क्रम में भी अन्तर है। इतने पर भी इस मूल  तथ्य में रत्ती भर भी अन्तर नहीं आता कि इस महाशक्ति के अपनाने  से मनुष्य की उच्चस्तरीय प्रगति का द्वार खुलता है और जिस दिशा में भी उसके कदम बढ़ते हैं उसमें सफलता का सहज दर्शन होता है। गायत्री मंत्र  की 24 शक्तियों की उपासना करने के लिए “शारदा तिलक-तंत्र” का मार्गदर्शन इस प्रकार है : 

शारदा तिलक-तंत्र के बारे में हम केवल इतना ही कहेंगें कि यह एक बहुत सारे मंत्रों  का संग्रह है जिसकी रचना आज से 1200 वर्ष पूर्व  नासिक महाराष्ट्र के श्रीलक्ष्मणदेसिकेन्द्र द्वारा की गयी थी। 

ॐ भूर्भुवः स्व: ( physical ,mental, celestial )

तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्

गायत्री के 24 अक्षर :

1-तत, 2-स, 3-वि, 4-तु, 5-4, 6-रे, 7-णि, 8-1,9-भ, 10-गों, 11-दे, 12-व, 13-स्य, 14-धी, 15-म, 16-हि, 17-धि, 18-यो, 19-यो, 20-न: 21-प्र, 22चो, 23-द, 24-यात 

24 अक्षरों से सम्बन्धित 24 कलाएं:

(1) तापिनी (2) सफला (3) विवा(4) तुष्टश (5) वरदा (6) रेवती (1) शूक्ष्मा (8) ज्ञाना (9) भर्गा (10) गोमती(11) दर्विका (12) धरा (13) सिंहिका (14) ध्येया (15) मर्यादा (16) स्फुरा (17) बुद्धि (18) योगमाया (19) योगात्तरा (20) धरित्री (21) प्रभवा (22) कुला (23) दृष्या (24) ब्राह्मी 

24 अक्षरों से सम्बन्धित 24 मातृकाएं:

(1) चन्द्रकेशवरी (2) अजतवला (3) दुरितारि (4) कालिका (5) महाकाली (6) श्यामा (1) शान्ता (8) ज्वाला (9) तारिका (10) अशोका (11) श्रीवत्सा (12) चण्डी(13) विजया (14) अंकुशा (15) पन्नगा (16) निक्षिी (17) वेला (18) धारिणी (19) प्रिया (20) नरदता (21) गन्धारी (22) अम्बिका (23) पद्मावती (24) 

सिद्धायिका सामान्य दृष्टि से कलाएं और मातृकाएं अलग- अलग प्रतीत होती हैं  किन्तु तात्विक दृष्टि  से देखने पर उन दोनों का अन्तर समाप्त हो जाता है। उन्हें श्रेष्ठता की सामर्थ्य कह सकते हैं और उनके नामों के अनुरूप उनके द्वारा उत्पन्न होने वाले सत्परिणामों का अनुमान लगा सकते हैं।

समग्र गायत्री को सर्व विघ्न विनासिनी-सर्व सिद्धि प्रदायनी कहा गया है। संकटों का सम्वरण और सौभाग्य संवर्धन के लिए माँ गायत्री का  आश्रय लेना सदा सुखद परिणाम ही उत्पन्न करता है। तो भी विशेष प्रयोजनों के लिए उसके 24 अक्षरों में अलग-अलग  प्रकार की विशेषताएं भरी हैं। किसी विशेष प्रयोजन की सामयिक आवश्यकता पूरी करने के लिए उसकी विशेष शक्ति धारा का भी आश्रय लिया जा सकता है। चौबीस अक्षरों की अपनी  विशेषताएं और प्रतिक्रियाएं हैं जिन्हें सिद्धियां भी कहा जा सकता है। 

यह सिद्धियां इस प्रकार बताई गई हैं:

(1) आरोग्य (2) आयुष्य (3) तुष्टि (4) पुष्टि (5) शान्ति (6) वैभव (7) ऐश्वर्य (8) कीर्ति (9) अनुग्रह (10) श्रेय (11) सौभाग्य (12) ओजस् (13) तेजस् (14) गृहलक्ष्मी (15) सुसंतति। (16) विजय (17) विद्या (18) बुद्धि (19) प्रतिभा (20) ऋद्धि (21) सिद्धि (22) संगति (23) स्वर्ग (24) मुक्ति।

जहां उपलब्धियों की चर्चा होती है वहां शक्तियों का उल्लेख भी  होता है। शक्ति की चर्चा सामर्थ्य का स्वरूप निर्धारण करने के सन्दर्भ में होती है। बिजली एक शक्ति है। विज्ञान के विद्यार्थी उसका स्वरूप और प्रभाव अपने पाठ्यक्रम में पढ़ते हैं। इस जानकारी के बिना उसके प्रयोग करते समय जो अनेकानेक समस्याएं पैदा होती हैं उनका समाधान नहीं हो सकता। विद्यार्थी  की जानकारी  जितनी अधिक होगी वह उतनी ही सफलता पूर्वक उस शक्ति का सही रीति से प्रयोग करने तथा अभीष्ट लाभ उठाने में सफल हो सकेगा। 

“प्रयोग के परिणाम को सिद्धि कहते हैं।” सिद्धि अर्थात् लाभ। शक्ति अर्थात् पूंजी। शक्तियां सिद्धियों की आधार हैं। शक्ति के बिना सिद्धि नहीं मिलती। दोनों को interdependent  कहा जा सकता है यानि शक्ति और  पूँजी एक दूसरे  पर निर्भर रहते  हैं। अपनी रोज़मर्रा के जीवन में भी हम बड़ी ही आसानी से कह सकते है जिसके पास पूँजी है वही शक्तिशाली है।  यह पूँजी एक बिजनेसमैन के लिए धन हो सकता है ,एक शिक्षिक  के लिए ज्ञान हो सकता है और एक कृषक के लिए परिश्रम करने का सामर्थ्य हो सकता है। 

जय गुरुदेव 

Leave a comment

परमपूज्य गुरुदेव ने कहा : हम तो पांचवी पास है ,हम क्या कर पायेंगें ? Look for the video, in video section.

10 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद : आज के ज्ञानप्रसाद में हम आपके समक्ष युगतीर्थ शांतिकुंज के व्यवस्थापक आदरणीय महेंद्र शर्मा जी के उद्बोधन के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहे हैं। उनकी वाणी के साथ -साथ आपको परमपूज्य गुरुदेव के जीवन के दुर्लभ चित्रों को भी देखने का सौभाग्य प्राप्त होगा। यह सब चित्र ऑनलाइन ज्ञानरथ के सूझवान सहकर्मियों के अथक परिश्रम और स्नेह का प्रतीक है जो उन्होंने अपने साथ कई -कई वर्षों से सुरक्षित रखे हुए हैं। हमें केवल आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि जो स्नेह और श्रद्धा हमारे सहकर्मी लेखों को दे रहे हैं वही एवं उससे भी अधिक इस वीडियो को भी देंगें। इस वीडियो को देखना ,शेयर करना घर-घर पहुँचाना हम सबका केवल कर्तव्य ही नहीं बल्कि धर्म भी है। जय गुरुदेव

Leave a comment

गायत्री साधना आत्मबल बढ़ाने का अचूक आध्यात्मिक व्यायाम है। 

9 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद : गायत्री साधना आत्मबल बढ़ाने का अचूक आध्यात्मिक व्यायाम है। 

जैसा हमने कल वाले अपडेट में लिखा था , आज का  ज्ञानप्रसाद सरविन्द भाई साहिब द्वारा  लिखा गया है, हाँ हमने कुछ एडिटिंग करके paragraphing अवश्य ही की है। हमारे  बारे में  जो स्नेहिल भावनाएं उन्होंने व्यक्त की हैं ,उन्हें  यथावत रखा है क्योंकि वह लेख के साथ मेल खाती हैं और आप सभी पर भी फिट बैठती हैं। 

पिछले कुछ दिनों से हम सब परिवारजन गायत्री साधना पर चर्चा कर रहे हैं , यह एक ऐसी चर्चा है जिसका कोई अंत है ही नहीं। गायत्री महाविज्ञान जैसे महान ग्रंथों का अध्यन, चिंतन ,मनन करना भी कोई आसान कार्य नहीं है।  सरविन्द जी ने इसी ग्रन्थ में से  कुछ portion चुन कर ,उसका विश्लेषण बहुत ही आसान -सरल ढंग से किया है। यह विश्लेषण पढ़ते समय हमें ऐसा लगा कि  यह तो हर किसी पर लागु होता है आप भी इसको तन्मयता से पढ़िये , औरों को भी पढ़ाइये , इसका भरपूर प्रचारप्रसार कीजिए – अपने गुरु के श्रीचरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करने का  केवल यही एक मार्ग है।     

__________________________

युगऋषि,युगदृष्टा,वेदमूर्ति,तपोनिष्ठ व परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी,परम पूज्य वन्दनीया माता जी व आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ भगवती गायत्री माता दी के श्री चरणों में नतमस्तक होकर भाव भरा सादर प्रणाम व हार्दिक कोटिस नमन वन्दन करते हुए परम पूज्य व परम स्नेहिल व परम आदरणीय अरुन भइया जी आपके श्री चरणों में नतमस्तक होकर भाव भरा सादर प्रणाम व हार्दिक नमन वन्दन करते हैं।  आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के सभी आत्मीय पाठकगण व सहकर्मी भाइयों व बहनो को भी भाव भरा सादर प्रणाम व हार्दिक नमन वन्दन करते हैं जिसे आप अपने अनुज का स्नेह व प्यार समझकर स्वीकार करें महान कृपा होगी हम सदैव आपके आभारी रहेंगे।  

परम आदरणीय अरुन भइया जी जब भी आपका भाव भरा लेख पढ़ता हूँ तो हमारा अंतःकरण प्रसन्नता के नसे में डूब जाता है और असीम आनंद की अनुभूति होती है, अंतःकरण हिल उठता है व अंतरात्मा हमें लिखने के लिए विवस कर देती है।  लिखते-लिखते अपने आपको भूल जाता हूँ और you tube की क्षमता को पार कर जाता हूँ , पता तब  चलता है, जब अपनी अभिव्यक्ति को Done करता हूँ और वह जवाब देने लगता है।  ऐसा हमारे साथ अक्सर होता रहता है।  इसके लिए आदरणीय अरुन भइया जी हम आपसे क्षमाप्रार्थी हैं। हम कभी भी अपने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के 12 स्तम्भ व मानवीय मूल्यों से हटकर अनुशासनहीनता का काम नहीं करेंगे और हम बहुत कम शब्दों में विश्लेषण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। धीरे-धीरे परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि से सब ठीक हो जाएगा। 

आज अभी हम गायत्री महाविज्ञान प्रथम भाग का स्वाध्याय कर रहे थे तो कुछ बड़ा लिखने की इच्छा हुई।  Whats app पर  लिखना शुरू कर दिया जिसे आप अपने अनुज का स्नेह व प्यार समझकर स्वीकार करने की कृपा करें, महान दया होगी। 

अब चलते हैं लेख की ओर:  गायत्री महामंत्र के जाप से जीवन का कायाकल्प होना सुनिश्चित है 

गायत्री महामंत्र के जाप से जीवन का कायाकल्प होना सुनिश्चित है, यह एक  कटु सत्य है।  यह विचार हमारे नहीं, परम पूज्य गुरुदेव के हैं।  हम तो केवल  सुन्दर शब्दों में विश्लेषण कर अपने विचारों की अभिव्यक्ति लिख रहे हैं। यह सब परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि से ही सम्भव हो रहा है।परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है किगायत्री मंत्र से मनुष्य का आंतरिक कायाकल्प हो जाता है और इस महामंत्र की उपासना, साधना व आराधना आरम्भ करते ही साधक को ऐसा अनुभव होता है कि मेरे अंतःकरण में एक नई हलचल एवं रद्दोबदल आरम्भ हो गई है।”  सतोगुणी तत्वों की अभिवृद्धि होने से दुर्गुण, कुविचार, दुस्वभाव, एवं दुर्भाव घटने शुरू हो जाते हैं और संयम, नम्रता, पवित्रता, उत्साह, श्रमशीलता, मधुरता,ईमानदारी,सत्यनिष्ठा,उदारता,प्रेम,संतोष,शान्ति,सेवा-भाव,आत्मीयता आदि सद्गुणों की मात्रा दिन-दिन बड़ी तेजी से बढ़ती जाती है। इसके  फलस्वरूप लोग स्वभाव एवं आचरण से संतुष्ट होकर बदले में प्रशंसा,कृतज्ञता,श्रद्धा एवं सम्मान के भाव रखते हैं।  इसके अतिरिक्त यह सद्गुण स्वयं इतने मधुर होते हैं कि जिस हृदय में इनका निवास होगा,वहाँ आत्मसंतोष की परम शांतिदायक निर्झरिणी सदा बहती रहेगी।  गायत्री साधना के साधक के मनःक्षेत्र में असाधारण परिवर्तन हो जाता है।  विवेक, तत्व-ज्ञान ऋतम्भरा, बुद्धि की अभिवृद्धि हो जाने के कारण अनेक अज्ञानजन्य दुखों का निवारण हो जाता है।  प्रारब्धवश  अनिवार्य कर्म फल के कारण कष्टसाध्य परिस्थितियां हर एक के जीवन में आती रहती हैं। हानि,शोक,वियोग, आपत्ति ,रोग, आक्रमण, विरोध,आघात आदि की विभिन्न परिस्थितियों में जहाँ साधारण मनोभूमि के लोग मृत्यु तुल्य भोग कष्ट पाते हैं वहां आत्मबल संपन्न गायत्री साधक अपने विवेक, ज्ञान, वैराग्य, साहस, आशा, धैर्य, संतोष, संयम, ईश्वर- विश्वास के आधार पर इन कठिनाइयों को हँसते-हँसते आसानी से काट लेता है। गायत्री साधक  बुरी अथवा साधारण परिस्थितियों में भी अपने आनंद का मार्ग खोज निकाल लेता  हैऔर   मस्ती एवं प्रसन्नता का जीवन बिताता है।  वर्तमान में हम इसी विषम परिस्थिति का सामना सहर्ष कर रहे हैं। 

परम पूज्य गुरुदेव आगे कहते हैं :गायत्री साधक को  संसार का सबसे बड़ा लाभ “आत्मबल”  को प्राप्त होता है, इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के संसारिक लाभ भी होते देखे गए हैं। बीमारी, कमजोरी, बेकारी, घाटा, गृह-क्लेश,मुकदमा,शत्रुओं का आक्रमण,दांपत्य सुख का अभाव,मस्तिष्क की निर्बलता,चित्त की अस्थिरता, संतान-सुख,कन्या के विवाह की कठिनाई,बुरे भविष्य की आशंका,परीक्षा में उत्तीर्ण न होने का भय,बुरी आदतों के बंधन जैसी कठिनाईयों से ग्रसित अगणित व्यक्तियों ने आराधना करके अपने दुखों से छुटकारा पाया है।

कारण यह है कि हर कठिनाई के पीछे,जड़ में निश्चय ही कुछ न कुछ अपनी त्रुटियाँ,अयोग्यताएं एवं खराबियाँ रहती हैं।  सद्गुणों की वृद्धि के साथ अपने आहार-विहार,दिनचर्या,दृष्टिकोण,स्वभाव एवं कार्यक्रम में परिवर्तन होता है और यह परिवर्तन ही आपत्तियों के निवारण का,सुख-शान्ति की स्थापना का राजमार्ग बन जाता है।  कई बार हमारी इच्छाएं,तृष्णाएं,लालसाएं,कामनाएं ऐसी होती हैं, जो अपनी योग्यता एवं परिस्थितियों से मेल नहीं खाती हैं।  मस्तिष्क शुद्ध होने पर बुद्धिमान व्यक्ति उन बुरे विचारों व भावनाओं को त्यागकर अकारण दुखी रहने से व भ्रम-जंजाल से छूट जाता है। अवश्यम्भावी,न टलने वाले प्रारब्ध का भोग जब सामने आता है, तो साधारण व्यक्ति बुरी तरह रोते-चिल्लाते हैं, किन्तु गायत्री साधक में इतना आत्मबल एवं साहस बढ़ जाता है कि वह उन्हें हँसते-हँसते झेल लेता है।  किसी विशेष आपत्ति का निवारण करने एवं किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए भी गायत्री साधना की जाती है, अक्सर इसका परिणाम बड़ा ही आश्चर्यजनक होता है।  देखा गया है कि जहाँ चारों ओर निराशा,असफलता,आशंका और भय का अंधकार ही छाया हुआ था, वहाँ वेदमाता गायत्री की कृपा दृष्टि से एक दैवी प्रकाश उत्पन्न हुआ और निराशा आशा में बदल ही गई”, बड़े ही कष्ट साध्य कार्य तिनके की तरह सुगम हो गए। ऐसे अनेकों अवसर अपनी आँखों के सामने देखने के कारण हमारा यह अटूट विश्वास हो गया कि कभी किसी की गायत्री उपासना, साधना व आराधना निष्फल ही  जाती  है।  गायत्री साधना आत्मबल बढ़ाने का अचूक आध्यात्मिक व्यायाम है।  किसी को कुश्ती में पछाड़ने एवं दंगल में जीतकर इनाम पाने के लिए कितने ही लोग पहलवानी व व्यायाम का अभ्यास करते हैं, लेकिन अगर  कोई अभ्यासी किसी कुश्ती  को हार जाए तो भी ऐसा नहीं समझना चाहिए कि उसका प्रयत्न निष्फल गया।  इसी बहाने उसका शरीर  मजबूत तो  हो गया और वह जीवन भर अनेक प्रकार से अनेक अवसरों पर बड़े-बड़े लाभ उपस्थित करता रहेगा।  निरोगिता,सौन्दर्य,दीर्घ-जीवन,कठोर परिश्रम करने की क्षमता, दांपत्य-सुख, सुसन्तति,शत्रुओं से निर्भयता आदि कितने ही लाभ ऐसे हैं,जो कुश्ती पछाड़ने से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।  उपासना, साधना व आराधना से यदि कोई विशेष प्रयोजन प्रारब्धवश  पूरा  न भी  हो, तो भी इतना तो निश्चय है कि किसी न किसी प्रकार साधना की अपेक्षा कई गुना लाभ अवश्य मिलकर रहेगा।  इसमें कोई शक व सन्देह नहीं है क्योंकि “आत्मा स्वयं अनेक ऋद्धि-सिध्दियों का केन्द्र है जो शक्तियां परमात्मा में हैं, वे ही उसके अमर युवराज आत्मा में हैं।”  समस्त ऋद्धि-सिध्दियों के केन्द्र आत्मा में हैं, किन्तु जिस प्रकार राख से ढका हुआ अंगार मंद हो जाता है, वैसे ही आंतरिक मलीनताओं के कारण आत्म-तेज  कुन्ठित हो जाता है।  गायत्री- साधना से मलीनता का पर्दा हटता है और राख हटा देने से जैसे अंगार अपने  प्रज्वलित स्वरूप में दिखाई पड़ने लगता है, वैसे ही साधक की आत्मा भी अपने ऋद्धि-सिध्दि समन्वित ब्रह्मतेज के साथ प्रकट होती है। जो लाभ   योगियों को दीर्घकाल तक कष्ट साध्य तपस्याएं करने से प्राप्त होता है, वही लाभ गायत्री साधक को स्वल्प प्रयास में प्राप्त हो जाता है।  गायत्री उपासना, साधना व आराधना का यह प्रभाव इस समय भी समय-समय पर दिखाई पड़ता है।  पिछले सौ-पचास वर्षो में ही सैकड़ों व्यक्ति इसके फलस्वरूप आश्चर्यजनक सफलताएं प्राप्त कर  चुके हैं। अपने जीवन को कृतार्थ कर इतना उच्च और सार्वजनिक दृष्टि से कल्याणकारी तथा परोपकारी बना चुके हैं कि उनसे अन्य हजारों लोगों को प्रेरणा मिली हुई है। 

गायत्री साधना में आत्मोत्कर्श का गुण इतना अधिक पाया जाता है कि उससे  कल्याण और जीवन सुधार के सिवाय और कोई सम्भावना बचती ही नहीं है। प्राचीन काल में महर्षियों ने बड़ी-बड़ी तपस्याएं और योग साधनाएं करके अणिमा,महिमा आदि ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त की थी।  उनकी चमत्कारी शक्तियों के वर्णन से इतिहास-पुराण भरे पड़े हैं। उस  तपस्या और योग साधना को उन्होंने गायत्री के आधार पर ही किया था।  आज भी अनेकानेक महात्मा मौजूद हैं जिनके पास दैवी-शक्तियों और सिद्धियों का भंडार है। उन महात्माओं का कथन है कि आज भी योगमार्ग में सुगमतापूर्वक सफलता प्राप्त करने का गायत्री से बढ़कर दूसरी कोई साधना या मार्ग नहीं है। 

सिद्ध पुरुषों के अतिरिक्त सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी सभी चक्रवर्ती राजा गायत्री उपासक रहे हैं और ब्रह्मण लोग गायत्री की ब्रह्म-शक्ति के बल पर जगद्गुरू,क्षत्रिय, गायत्री के भर्ग तेज को धारण करके चक्रवर्ती सम्राट बने थे और यह सनातन सत्य आज भी वैसा ही है। यह एक कटु सत्य है की गायत्री माता का आंचल श्रद्धा पूर्वक पकड़ने वाला मनुष्य कभी भी निराश नहीं रहता। 

यह सब परम पूज्य गुरुदेव की कृपा और आप सब सहकर्मियों के  आशीर्वाद से गायत्री महाविज्ञान का ही विश्लेषण है। इसको विस्तृत विवरण के साथ विश्लेषण किया है इसके लिए हम आपसे पुनः क्षमाप्रार्थी हैं क्योंकि आप आज अस्वस्थ भी हैं फिर भी हम आपको विस्तृत लिखकर भेज रहे हैं,यह आपके लिए हमारा स्नेह व प्यार है। यह एक  ऐसा अमृत तुल्य महाप्रसाद है जिसे पढ़ कर मन गदगद हो जाएगा और आपको आत्मशान्ति मिलेगी। आपका स्वास्थ्य भी अविलंब ठीक हो जाएगा। ऐसा  हमारा पूर्ण विश्वास है और यही हमारी आपके अच्छे स्वास्थ्य व उज्जवल भविष्य की शुभ मंगल कामना भी है। परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे, यही हमारी गुरू सत्ता से विनम्र प्रार्थना व पवित्र शुभ मंगल कामना है और हम इसी आशा व विश्वास के साथ अपनी लेखनी को विराम देते हुए अपनी हर किसी गलती के लिए आपसे क्षमाप्रार्थी हैं। 

धन्यवाद। जय गुरुदेव जय माता जी सादर प्रणाम!आपका अपना गुरु भाई व शुभचिन्तक अनुज सरविन्द कुमार पाल, संचालक गायत्री परिवार, शाखा करचुलीपुर कानपुर नगर उत्तर प्रदेश

Leave a comment

ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार के साथ संपर्क साधना 

8 सितम्बर 2021  का ज्ञानप्रसाद – ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार के साथ संपर्क साधना 

पिछले 2 -3  दिन से हमारा  स्वास्थ्य हमारा सहयोग नहीं दे  रहा था, अब गाड़ी बिल्कुल  पटड़ी पर आ चुकी   है और पूरी स्पीड से भाग रही है।  हम बिल्कुल स्वस्थ हैं ,ऊर्जावान हैं ,फ्रेश हैं और ऑनलाइन ज्ञानरथ में अपने  तुच्छ से  समर्पण के लिए तत्पर हैं। सब आपकी शुभकामनाओं और परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म शक्ति का ही परिणाम है।  ह्रदय से हम आप सबके बहुत ही आभारी हैं -किन शब्दों  में आप सबका धन्यवाद् करें, हमें स्वयं समझ नहीं आ रहा। जब हम कुछ अस्वस्थ थे तो परमपूज्य गुरुदेव के शब्द हमारे कानों में बार-बार  गूँज रहे थे जो उन्होंने शिरोमणि शुक्ला बाबा  को मथुरा में कहे थे जब सुनैना दीदी ( शुक्ला बाबा की बेटी ) जीवन- मृत्यु से जूझ रहीं थीं। उन्होंने कहा था “ शुक्ला हम तेरी बेटी को मरने नहीं देंगें ,अगर वह मर गयी तो तू हमारा काम नहीं करेगा।” हमारे सहकर्मी तो हमारे बारे में कई बार लिख चुके हैं परन्तु हमारा भी एकमात्र उदेश्य यही है कि हम इस जीवन के अंतिम समय तक गुरुदेव को समर्पित रहकर उनके विचारों का ,साहित्य का प्रचार- प्रसार द्वारा इस  विश्वरूपी उद्यान को सींचते रहें।               

बच्चों के कमेंट ,बड़ों के कमेंट ,वरिष्ठों के आशीर्वाद ,एक एक कमेंट को पढ़ा है। अगर ईमानदारी से  अपने भावों को व्यक्त करना हो तो सबको अलग -अलग व्यक्तिगत रिप्लाई करना चाहिए – शिष्टाचार तो इसी की मांग करता है ,लेकिन हम आपसे क्षमा मांगते हुए ऑनलाइन ज्ञानरथ के 12 स्तम्भों में से एक स्तम्भ  – “शिष्टाचार” -की उलंघना करते हुए सामूहिक तौर पर सबका धन्यवाद् करने का प्रयास करेंगें।  हमें विश्वास है कि इस उलंघना में  आपकी स्वीकृति हमारे साथ है।  हम इस दोष को भी सहर्ष  अपने ऊपर ले लेंगें:  “आपने स्वयं ही स्तम्भों की रक्षा न करते हुए उलंघना कर दी, आप हमें  इनकी रक्षा करने को कैसे बाधित कर सकते हैं।”  हम कैसे किसी को बाधित कर सकते हैं ? ऑनलाइन ज्ञानरथ के उदेश्यों के कारण , इसमें छिपे विचारों की  शक्ति आपको- हमसे ,हमसे -आपको इस तरह जोड़े हुए है जिसका उदाहरण केवल एक माला के मोती ही हो सकते हैं , परमपूज्य गुरुदेव और वंदनीय माता जी चरणों में अर्पित अलग -अलग रंगों के पुष्पों की माला ही हो सकती है। भिन्न -भिन्न वाटिकाओं से एकत्रित किये गए पुष्पों की भांति, हमारे समर्पित सहकर्मी, परिवारजन बिल्कुल ऐसा ही आभास करवाते हैं। बहुत कम सहकर्मी हैं जिनसे हमारा फ़ोन से य वीडियो से संपर्क हो सका है। अधिकतर के बारे में तो हम कुछ भी नहीं जानते -लेकिन ऐसा लगता है जैसे कब के जानते हों।  यह अन्तःकरण का मिलन  है, आत्मा का मिलन है , विचारों का मिलन है।  कल वाले लेख में ही  जब  मस्तिष्क के पोषण की बात हो रही थी तो हमने  विचारों की बात की थी।  यह विचार ही हैं जिनसे हमारी मनःस्थिति  कण्ट्रोल होती है।  नेगेटिव विचारों से नेगेटिविटी और पॉजिटिव विचारों  से पाजिटिविटी का जन्म होता है। अब यह हम पर ,केवल और केवल हम पर ही निर्भर करता है कि हमने अपने मस्तिष्क को पौष्टिक भोजन देना है य नहीं। हमारे मस्तिष्क के लिए  सकारात्मक विचार  ही  सबसे बड़ा पौष्टिक भोजन है।  

आप सबको हमारे ऑनलाइन ज्ञानरथ के विचार अच्छे लगे , आपने उनको पढ़ा , सुना , औरों के साथ शेयर  किया , परमपिता परमात्मा द्वारा रचित इस विश्वरूपी उद्यान को सुन्दर बनाने में अपना योगदान किया , अपना रोल अदा  किया और परमपिता  द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन किया, हर सुबह अमृत वचनों का पान किया , अपने अंदर शक्ति का संचार किया , इस शक्ति में से कुछ अंश औरों को भी अर्पित किये , उनको भी कृतार्थ किया – आप सबको कितनी शांति मिली ? इस शांति का अंदाज़ा तो हम आपके कमैंट्स से लगा ही  लेते हैं। इतने बड़े -बड़े कमेंट और वह भी अन्तःकरण से लिखे जाने, कोई आसान कार्य नहीं है।  हमें तो अत्यंत प्रसन्नता होती है कि हमारा – two-way- traffic वाला प्रयोग सफल हो रहा है। लेकिन “भटके हुए देवताओं” के बारे में सोच कर दया आती है ,चमत्कार की आशा में हमसे जुड़ने वालों का दुर्भाग्य है कि ऐसे परिजन गुरुदेव के विचरों का अमृतपान करने से वंचित रह जाते हैं।  विश्वास -विश्वास -विश्वास, केवल विश्वास और आस्था से ही कुछ हो सकता है नहीं तो हम भटकते ही रहेंगें।  

सोशल मीडिया साइटस पर दिए गए कमैंट्स से हम किसी  बिज़नेस की लोकप्रियता का अनुमान लगा सकते हैं , किसी स्पेशलिस्ट डॉक्टर के पास जाने से पहले उसकी capability का अनुमान लगा सकते हैं – ठीक उसी प्रकार आपके कमैंट्स से और फिर हमारे समर्पित सहकर्मियों द्वारा  दिए गए counter -comments से हमारे लेखों का मूल्यांकन हो सकता है।  जितने अधिक  कमैंट्स होंगें ,जितने अच्छे कमैंट्स होंगें ,जितने अधिक शेयर होंगें, उतने अधिक लोग हमसे जुडेंगें ,उतना अधिक हमारे परिवार का विस्तार  होगा  -उतना अधिक ज्ञान का प्रसार होगा।  परमपूज्य गुरुदेव ने  बार-बार इस दिशा में हमारा मार्गदर्शन किया है ,आगे भी करते रहेंगें।    

आज की संपर्क साधना समाप्त करने से पूर्व हम आपसे दो बातें करना चाहेंगें।  एक बात तो है हमारे समर्पित आदरणीय सहकर्मी सरविंदर पाल जी के बारे में। हमारे स्वास्थ्य का पूछते हुए उन्होंने कमेंट किया जिसकी हम जितनी सराहना करें कम है।  अन्तःकरण से निकले शब्द , सुन्दर -ज्ञानपूर्ण शैली – अवश्य ही कोई दैवी शक्ति उनकी उँगलियाँ पकड़ कर लिखवा रही है।  स्वास्थ्य को गायत्री महाविज्ञान की शिक्षा के साथ जोड़ते हुए उनका कमेंट 1642 शब्दों का था।  अगर हम स्वास्थ्य वाला भाग  निकल दें ,तो भी 1200 शब्दों से कम नहीं है।  हम चाहते हैं कि कल वाले ज्ञानप्रसाद में आप उनके द्वारा लिखी गायत्री महाविज्ञान की शिक्षा को ग्रहण करें।  हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि सरविंदर  जी जैसे   और बहुत से सहकर्मी हैं जिनका रक्त सागर की लहरों की तरह कुछ करने को आतुर है।  ऑनलाइन ज्ञानरथ प्लेटफॉर्म  हर किसी की प्रतिभा को प्रोत्साहित  करने में संकल्पित है।  दूसरी बात शिरोमणि शुक्ला बाबा जी की मस्तीचक शक्तिपीठ में मूर्ति स्थापना समारोह की वीडियो के संदर्भ में है।  शीघ्र ही हम सभी क्लिप्स को एडिट करके आपके समक्ष लेकर आयेंगें। 

तो इन्ही शब्दों के साथ हम कामना करते हैं कि  सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।  जय गुरुदेव

Leave a comment

त्रिपदा गायत्री एवं उसके तीन चरण -ज्ञानपक्ष

7 सितंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – त्रिपदा गायत्री एवं उसके तीन चरण -ज्ञानपक्ष – Source- Guruvar Ki Dharohar 1

आज का  लेख आरम्भ करने से पहले हम ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार के  उन सभी परिजनों का ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं जिन्होंने हमारे  द्वारा लिखित केवल एक वाक्य “ स्वास्थ्य कुछ अधिक लिखने को रोक रहा है “ को पढ़ कर हमारे स्वास्थ्य लाभ की कामना की ,व्हाट्सप्प मैसेज भेजे।  प्रेरणा बिटिया ने तो फ़ोन करने की भी इच्छा व्यक्त की।  हमने उनका मैसेज सुबह उठकर ही देखा जबकि उन्होंने तो हमें रात के चार बजे मैसेज करके स्वास्थ्य का पूछा  था। हमारे रिप्लाई में उन्होंने क्षमा याचना भी की , लेकिन इनकी कोई भी गलती नहीं है। ऐसा हमारे साथ अक्सर होता रहता है क्योंकि कनाडा में 6 तरह के टाइम( time zone )  हैं , भारत में केवल एक ही है। सविंदर भाई साहिब ने भी अपनी शुभकामना भेजीं।  यही है इस छोटे से परिवार की सबसे बड़ी और गौरवशाली विशेषता- एक पारिवारिक सहकारिता और स्नेह।  हम हर्ष और गर्व से कह सकते हैं की ऑनलाइन ज्ञानरथ के 12 स्तम्भों का पालन बड़ी ही श्रद्धा और समर्पण से हो रहा है। 

आज के लेख में हम त्रिपदा गायत्री के  ज्ञान पक्ष को  जानने का प्रयास करेंगें।  कल वाले लेख में हमने वैज्ञानिक पक्ष का विश्लेषण किया था। इन लेखों के लिखते समय हमने कुछ न कुछ एडिटिंग तो अवश्य ही की है लेकिन भावनाएं परमपूज्य गुरुदेव की ही हैं , गुरुदेव की भावनाओं में हस्तक्षेप करना हमारे लिए असहनीय होगा।  हमने कई बार नोटिस किया है कि जहाँ से हम यह लेख  चयन करते हैं ,पढ़ते हैं, किसी न किसी एडिटिंग की मांग अवश्य की कर रहे होते हैं।  शायद यह कहना ठीक न हो कि उनमें कोई गलती है , हर  किसी के लिखने का स्टाइल ,व्यक्त करने की शैली अलग हो सकती है।  यह इसलिए होता है कि परमपूज्य गुरुदेव का साहित्य copyright protected न होने के कारण बहुत से परिजन ( हम भी ) इसके प्रचार -प्रसार में व्यस्त हैं।  एक बार परमपूज्य गुरुदेव को किसी ने यह प्रश्न किया था कि अगर आपका इतना विशाल  साहित्य कोई अपने नाम से प्रकाशित कर दे तो आपको कैसा लगेगा।  गुरुदेव ने बड़े ही सहज और शालीन भाव से उत्तर देते हुए कहा  था – इससे तो यही प्रमाणित होता है कि आपको हमारे विचार कितने अच्छे लगते हैं और अच्छे विचारों का जितना भी प्रचार हो अच्छा ही तो है।        

तो इसी भूमिका के साथ जानते हैं त्रिपदा गायत्री के तीन  ज्ञानपक्ष :

___________________________________

यह मेरा 70 वर्ष का अनुभव है कि गायत्री के तीन पाद-तीन चरण में तीन शिक्षाएँ भरी हैं और ये तीनों शिक्षाएँ ऐसी हैं कि अगर उन्हें मनुष्य अपने व्यक्तिगत जीवन में समाविष्ट कर सके तो धर्म और अध्यात्म का सारे का सारा रहस्य और तत्त्वज्ञान उसके जीवन में समाविष्ट होना सम्भव है। त्रिपदा गायत्री के तीन ज्ञानपक्ष हैं आस्तिकता, आध्यात्मिकता और  धार्मिकता। इन तीनों को मिला कर त्रिवेणी संगम बन जाता है।  आइये देखें क्या हैं ये  तीनों?

1.आस्तिकता:

गायत्री मन्त्र का प्रथम ज्ञानचरण है आस्तिकता। आस्तिकता का अर्थ है ईश्वर का विश्वास। भजन-पूजन तो कई आदमी कर लेते हैं, पर ईश्वर-विश्वास का अर्थ यह है कि सर्वत्र जो भगवान समाया हुआ है, उसके सम्बन्ध में यह दृष्टि रखें कि उसका न्याय का पक्ष, कर्म फल देने वाला पक्ष इतना समर्थ है कि उसका कोई बीच-बचाव नहीं हो सकता। भगवान सर्वव्यापी है, सर्वत्र है, सबको देखते हैं , अगर यह विश्वास हमारे भीतर हो तो हमारे लिए पाप कर्म करना सम्भव नहीं होगा। हम हर जगह भगवान को देखेंगे और समझेंगे कि उनकी  न्याय, निष्पक्षता हमेशा शाश्वत रही है। इसलिए आस्तिक का, ईश्वर-विश्वासी का पहला क्रियाकलाप यह होना चाहिए कि हमको कर्मफल मिलेगा, इसलिए हम भगवान से डरें। जो भगवान से डरता है, उसको संसार में और किसी से डरने की जरूरत नहीं होती। आस्तिकता ही चरित्रनिष्ठा और समाजनिष्ठा का मूल है। आस्तिकता का अंकुश हर इंसान  को ईमानदार बनने के लिए, अच्छा बनने के लिए प्रेरणा देता है, प्रकाश देता है।

ईश्वर की उपासना का अर्थ है—जैसा ईश्वर महान है वैसे ही महान बनने के लिए हम कोशिश करें। हम अपने आपको भगवान में मिलाएँ। यह विराट् विश्व” भगवान का रूप है और हम इसकी सेवा करें, सहायता करें और इस विश्व-उद्यान को समुन्नत बनाने की कोशिश करें, क्योंकि हर जगह भगवान समाया हुआ है। सर्वत्र भगवान विद्यमान है, यह भावना रखने से ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ (अपनी तरह सबको देखना ) की भावना मन में पैदा होती है। जिस प्रकार  गंगा  अपना समर्पण व्यक्त करने के लिए समुद्र की ओर चल पड़ती है ठीक उसी प्रकार  आस्तिक व्यक्ति, ईश्वर का विश्वासी व्यक्ति अपने आपको भगवान में समर्पित करने के लिए इस विश्व रुपी सागर में विलय होने का प्रयास करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि भगवान की इच्छाएँ मुख्य हो जाती हैं। ईश्वर के संदेश, ईश्वर की आज्ञाएँ ही हमारे लिए सब कुछ होनी चाहिए। हमें अपनी इच्छा भगवान पर थोपने की अपेक्षा, भगवान की इच्छा को अपने जीवन में धारण करना चाहिए। आस्तिकता के ये बीज हमारे अन्दर जमे हुए हों तो जिस तरीके से वृक्ष से लिपटकर बेल उतनी ही ऊँची हो जाती है जितना कि ऊँचा वृक्ष है उसी प्रकार भगवान से लिपट कर हम भगवान  की ऊँचाई के बराबर ऊँचे चढ़ सकते हैं। जिस प्रकार पतंग अपनी डोरी बच्चे के हाथ में थमाकर आसमान में ऊँचे उड़ती चली जाती है, कठपुतली के धागे बाजीगर के हाथ में बँधे रहने से कठपुतली अच्छे से अच्छा नाच-तमाशा दिखाती है, उसी प्रकार  ईश्वर का विश्वास, ईश्वर की आस्था  स्वीकारने से,  अपने जीवन की दिशा-धाराएँ भगवान के हाथ में सौंप देने से हमारा जीवन उच्चस्तरीय बन सकता है और हम इस लोक में शांति और परलोक में सद्गति प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते हैं।

2 . आध्यात्मिकता :

गायत्री मंत्र का दूसरा ज्ञानचरण है आध्यात्मिकता। आध्यात्मिकता का अर्थ होता है- आत्मबोध। अपने आपको जानना। अपने आपको न जानने से हम बाहर-बाहर भटकते रहते हैं। कई अच्छी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए, अपने दुःखों का कारण बाहर तलाश करते-फिरते रहते हैं। जानते नहीं कि हमारी मनःस्थिति के कारण ही हमारी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। अगर हम यह जान लें तो अवश्य ही  अपने आपको सुधारने के लिए कोशिश करेंगें । स्वर्ग और नर्क हमारे भीतर ही  हैं। हम अपने ही भीतर स्वर्ग दबाए हुए हैं, अपने ही भीतर नर्क दबाए हुए हैं। हमारी मनःस्थिति के आधार पर ही परिस्थितियाँ बनती हैं। कस्तूरी का हिरण चारों तरफ खुशबू की तलाश करता फिरता था, लेकिन जब उसको पता चला कि वह तो नाभि में ही है, तब उसने इधर-उधर भटकना त्याग दिया और अपने भीतर ही ढूँढ़ने लगा।

फूल जब खिलता है तब भौंरे आते ही हैं, तितलियाँ भी आती हैं। बादल बरसते तो हैं लेकिन जिसके आँगन में जितना पात्र होता है, उतना ही पानी देकर के जाते हैं। चट्टानों के ऊपर बादल बरसते रहते हैं, लेकिन घास का एक भी  तिनका  पैदा नहीं होता। छात्रवृत्ति उन्हीं को मिलती है जो अच्छे नंबर से पास होते हैं। संसार में सौंदर्य तो बहुत हैं, पर हमारी आँख न हो तो उसका क्या मतलब? संसार में संगीत-गायन तो बहुत हैं, शब्द बहुत हैं, पर हमारे कान न हों तो उन शब्दों का क्या मतलब। संसार में ज्ञान-विज्ञान तो बहुत है, पर हमारा मस्तिष्क न हो तो उसका क्या मतलब? ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करते हैं। इसलिए आध्यात्मिकता का संदेश है कि हर मनुष्य  को अपने आपको पहचानने का, समझने का , सुधारने का  भरपूर प्रयत्न करना चाहिए। अपने आपको हम जितना सुधार लेते हैं, उतनी ही परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल बनती चली जाती हैं ,कुछ भी बुरा ,गलत नहीं दिखेगा – नज़रें बदलते ही नज़ारा बदल जाता है। 

3 . धार्मिकता :
गायत्री मन्त्र का तीसरा चरण है धार्मिकता। धार्मिकता का अर्थ होता है—कर्तव्यपरायणता, कर्तव्यों का पालन करना। मनुष्य में और पशु में सिर्फ इतना ही अन्तर है कि पशु किसी मर्यादा से बँधा हुआ नहीं है। मनुष्य के ऊपर हजारों मर्यादाएँ और नैतिक नियम बाँधे गए हैं और जिम्मेदारियाँ लादी गईं हैं। जिम्मेदारियाँ को, कर्तव्यों को पूरा करना मनुष्य का कर्तव्य है। शरीर के प्रति हमारा कर्तव्य है कि हम इसे  निरोग रखें। मस्तिष्क के प्रति हमारा कर्तव्य है कि इसमें नेगेटिव  विचारों को न आने दें, यानि इसको भी निरोग रखें ,स्वस्थ रखें । पॉजिटिव विचार हमारे मस्तिष्क का सबसे बड़ा पोषण करते हैं।  हमें अच्छी नींद आती है ,हम हर समय ऊर्जावान  रहते हैं और कर्तव्यों का पालन करते हैं। अगर हम सद्गुणी होंगें तो ही परिवार को ,समाज को सद्गुणी बना सकते हैं । देश, धर्म, समाज और संस्कृति के प्रति हमारा कर्तव्य है कि उन्हें भी समुन्नत बनाने के लिए भरपूर ध्यान रखें। लोभ और मोह से अपने आपको छुड़ा करके अपनी जीवात्मा का उद्धार करना भी हमारा कर्तव्य है। भगवान ने जिस काम के लिए हमको इस संसार में भेजा है, जिस काम के लिए मनुष्य योनि में जन्म दिया है, उस काम को पूरा करना भी हमारा कर्तव्य है। धार्मिकता के लिए  इन सारे  कर्तव्यों का पालन करना हमारा दाइत्व है। 

हमने अपने सारे जीवन में गायत्री मंत्र के बारे में जितना भी विचार किया, शास्त्रों को पढ़ा, सत्संग किया, चिंतन-मनन किया, उसका सारांश यह निकला कि बहुत सारा विस्तार ज्ञान का ही है। इस ज्ञान के दो पक्ष हैं -विज्ञानपक्ष और ज्ञानपक्ष।  इन दोनों  की तीन-तीन धाराएं (कुल 6) क्रमशः -1  श्रद्धा, 2 परिष्कृत व्यक्तित्व ,3 दृष्टिकोण और महत्वकांक्षाएं :4 आस्तिकता ,5 आध्यमिकता ,6 धार्मिकता-जो कोई भी इन पक्षों को  प्राप्त कर सकता हो, गायत्री मंत्र की कृपा से निहाल हो  सकता है और ऊँची से ऊँची स्थिति प्राप्त करके इसी लोक में स्वर्ग और मुक्ति का अधिकारी बन सकता है। ऐसा हमारा अनुभव,विचार और विश्वास है।

सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।”  जय गुरुदेव 

Leave a comment

 त्रिपदा गायत्री एवं उसके तीन चरण -वैज्ञानिक पक्ष

6 सितम्बर 2021 का ज्ञान प्रसाद – त्रिपदा गायत्री एवं उसके तीन चरण -वैज्ञानिक पक्ष

स्वास्थ्य कुछ अधिक लिखने को रोक रहा है , इसलिए सीधा लेख की और ही चलते हैं।  आज आप पढ़िए।  परमपूज्य गुरुदेव को सुनिए :

मित्रो! हमारा सत्तर वर्ष का सम्पूर्ण जीवन सिर्फ एक काम में लगा है और वह है—भारतीय धर्म और संस्कृति की आत्मा की शोध। भारतीय धर्म और संस्कृति का बीज है—गायत्री मंत्र। इस छोटे-से चौबीस अक्षरों के मंत्र में वह ज्ञान और विज्ञान भरा हुआ पड़ा है, जिसके विस्तार में भारतीय तत्त्वज्ञान और भारतीय नेतृत्व विज्ञान दोनों को खड़ा किया गया है। ब्रह्माजी ने चार मुखों से चार चरण गायत्री का व्याख्यान चार वेदों के रूप में किया। वेदों से अन्यान्य धर्मग्रंथ बने। जो कुछ भी हमारे पास हैं, इस सबकी मूल जड़ हम चाहें तो गायत्री मंत्र के रूप में देख सकते हैं। इसीलिए इसका नाम गुरुमंत्र रखा गया है, बीजमंत्र रखा गया है। बीजमंत्र के नाम से, गायत्री मंत्र के नाम से इसी एक मंत्र को जाना जा सकता है और गुरुमंत्र इसे कहा जा सकता है। हमने प्रयत्न किया कि सारे भारतीय धर्म और विज्ञान को समझने की अपेक्षा यह अच्छा है कि इसके बीज को समझ लिया जाए, जैसे कि विश्वामित्र ने तप करके इसके रहस्य और बीज को जानने का प्रयत्न किया। हमारा पूरा जीवन एक क्रियाकलाप में लग गया। जो बचे हुए जीवन के दिन हैं, उसका भी हमारा प्रयत्न यही रहेगा कि हम इसी की शोध और इसी के अन्वेषण और परीक्षण में अपनी बची हुई जिंदगी को लगा दें।

बहुत सारा समय व्यतीत हो गया। अब लोग जानना चाहते हैं कि आपने इस विषय में जो शोध की, जो जाना, उसका सार-निष्कर्ष हमें भी बता दिया जाए। बात ठीक है, अब हमारे महाप्रयाण का समय नजदीक चला आ रहा है तो लोगों का यह पूछताछ करना सही है कि हर आदमी इतनी शोध नहीं कर सकता। हर आदमी के लिए इतनी जानकारी प्राप्त करना तो संभव भी नहीं है। हमारा सार और निष्कर्ष हर आदमी चाहता है कि बताया जाए। क्या करें? क्या समझा आपने? क्या जाना? अब हम आपको बताना चाहेंगे कि गायत्री मंत्र के ज्ञान और विज्ञान में, जिसकी कि व्याख्या स्वरूप ऋषियों ने सारे का सारा तत्त्वज्ञान खड़ा किया है, क्या है?

गायत्री को त्रिपदा कहते हैं। त्रिपदा का अर्थ है—तीन चरण वाली, तीन टाँग वाली। तीन टुकड़े इसके हैं जिनको समझ करके हम गायत्री के ज्ञान और विज्ञान की आधारशिला को ठीक तरीके से जान सकते हैं। इसका एक भाग है “विज्ञान वाला पहलू।” विज्ञान वाले पहलू में आते हैं तत्त्वदर्शन, तप, साधना, योगाभ्यास, अनुष्ठान, जप, ध्यान आदि। इससे शक्ति पैदा होती है। गायत्री मंत्र का जप करने से उपासना और ध्यान करने से उसके जो महात्म्य बताए गए हैं कि इससे यह लाभ होता है, अमुक लाभ होते हैं, अमुक कामनाएँ पूरी होती हैं।  “अब यह देखा जाए कि यह कैसे पूरी होती हैं और कैसे पूरी नहीं होतीं? कब यह सफलता मिलती है और कब नहीं मिलती?” 

किसी भी चीज को पैदा करने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है।भूमि ,पानी और खाद – हवा तो है ही।  अगर यह तीनों चीजें न होंगी, तब तो  मुश्किल है। तब  वह बीज पल्लवित होगा कि नहीं, कहा नहीं जा सकता। गायत्री मंत्र के बारे में भी यही तीन बातें हैं, यदि गायत्री मंत्र के साथ तीन चीजें मिला दी जाएँ तो उसके ठीक परिणाम निकलने  सम्भव हैं। अगर यह तीन चीजें नहीं मिलाई जाएँगी तब फिर यही कहना पड़ेगा कि इसमें सफलता की आशा कम है।

1 . श्रद्धा :

गायत्री उपासना के सम्बन्ध में हमारा लम्बे समय का जो अनुभव है वह यह है कि जप करने की विधियाँ और कर्मकाण्ड तो वही हैं, जो सामान्य पुस्तकों में लिखे हुए हैं या बड़े से लेकर छोटे लोगों ने किए हैं। किसी को फलित होने और किसी को न फलित होने का मूल कारण यह है कि उन तीन तत्वों का समावेश करना लोग भूल जाते हैं,” जो किसी भी उपासना का प्राण है। उपासना के साथ एक तथ्य यह जुड़ा हुआ है कि अटूट श्रद्धा होनी चाहिए। श्रद्धा की अपनेआप में शक्ति है। बहुत सारी शक्तियाँ हैं जैसे बिजली की शक्ति है, भाप की शक्ति है, आग की शक्ति है, उसी तरीके से श्रद्धा की भी एक शक्ति है। श्रद्धा हो तो  पत्थर में से भगवन  पैदा हो जाते हैं, रस्सी में से साँप हो जाता है। श्रद्धा के आधार पर न जाने क्या-क्या हो जाता है । अगर हमारा और आपका किसी मंत्र के ऊपर, जप, उपासना के ऊपर अटूट विश्वास, प्रगाढ़ निष्ठा और श्रद्धा है तो मेरा अब तक का अनुभव यह है कि उसको” चमत्कार मिलना ही  चाहिए और उसके लाभ सामने आने ही चाहिए। जिन लोगों ने श्रद्धा के बिना  उपासनाएँ की हैं, श्रद्धा से रहित केवल मात्र कर्मकाण्ड सम्पन्न किए हैं, केवल जीभ की नोक से जप किए हैं, और अँगुलियों की सहायता से मालाएँ घुमाई हैं, लेकिन मन में वह श्रद्धा उत्पन्न न कर सके, विश्वास उत्पन्न न कर सके, ऐसे लोग खाली ही  रहेंगे। 

2 .परिष्कृत व्यक्तित्व :

उपासना को सफल बनाने के लिए परिष्कृत व्यक्तित्व का होना नितांत आवश्यक है। परिष्कृत व्यक्तित्व का मतलब यह है कि आदमी चरित्रवान हो, लोकसेवी हो, सदाचारी हो, संयमी हो, अपने व्यक्तिगत जीवन को श्रेष्ठ और समुन्नत बनाने वाला हो। अब तक ऐसे ही लोगों को सफलताएँ मिली हैं। अध्यात्म का लाभ स्वयं पाने और दूसरों को दे सकने में केवल वही साधक सफल हुए हैं जिन्होंने कि जप, उपासना के कर्मकाण्डों के साथ  अपने व्यक्तिगत जीवन को शालीन, समुन्नत, श्रेष्ठ और परिष्कृत बनाने का प्रयत्न किया है। संयमी व्यक्ति, सदाचारी व्यक्ति जो भी जप करते हैं, उपासना करते हैं, उनकी प्रत्येक उपासना सफल हो जाती है। दुराचारी मनुष्य , दुष्ट मनुष्य , नीच, पापी और पतित मनुष्य  भगवान का नाम लेकर यदि पार होना चाहें तो पार नहीं हो सकते। भगवान का नाम लेने का परिणाम यह होना चाहिए कि मनुष्य  का व्यक्तित्व सही हो और वह शुद्ध बने। अगर व्यक्ति को शुद्ध और समुन्नत बनाने में राम नाम सफल नहीं हुआ तो जानना चाहिए कि उपासना की विधि में बहुत भारी भूल रह गई और नाम के साथ में काम करने वाली बात को भुला दिया गया। परिष्कृत व्यक्तित्व उपासना का दूसरा वाला पहलू है—गायत्री उपासना के सम्बन्ध में अथवा अन्यान्य उपासनाओं के सम्बन्ध में।

3. दृष्टिकोण और महत्वकांक्षाएं :

हमारा अब  तक का अनुभव यह है कि उच्चस्तरीय जप और उपासनाएँ तब ही  सफल होती हैं जब मनुष्य  का दृष्टिकोण और महत्त्वाकांक्षाएँ भी ऊँची हों। घटिया उद्देश्य लेकर, निकृष्ट कामनाएँ लेकर,वासनाएँ लेकर अगर भगवान की उपासना की जाए और देवताओं का द्वार खटखटाया जाए तो देवता सबसे पहले कर्मकाण्डों की विधि और विधानों को देखने की अपेक्षा यह मालूम करने की कोशिश करते हैं कि इसकी उपासना का उद्देश्य क्या है? किस काम के लिए उपासना कर रहा है ? अगर परिश्रम को छोड़ कर, सरल और सस्ते तरीके से उदेश्य  पूरा कराने के लिए देवताओं का पल्ला खटखटाता है तो देवता समझ जाते हैं कि यह कोई घटिया आदमी है और घटिया काम के लिए हमारी सहायता चाहता है। देवता भी बहुत व्यस्त हैं। देवता सहायता तो करना चाहते हैं, लेकिन सहायता करने से पहले यह तलाश करना चाहते हैं कि हमारा उपयोग कहाँ किया जाएगा? किस काम के लिए किया जाएगा? यदि घटिया काम के लिए उनका उपयोग किया जाने वाला है, तो वे कदाचित ही, कभी किसी की सहायता करने को तैयार होते हैं। ऊँचे उद्देश्यों के लिए देवताओं ने हमेशा सहायता की है।

मंत्रशक्ति और भगवान की शक्ति केवल उन्हीं लोगों के लिए सुरक्षित रही है, जिनका दृष्टिकोण ऊँचा रहा है। जिन्होंने किसी अच्छे काम के लिए, ऊँचे काम के लिए भगवान की सेवा और सहायता चाही है, उनको बराबर सेवा और सहायता मिली है। इन तीनों बातों को हमने प्राणपण से प्रयत्न किया और हमारी गायत्री उपासना में प्राण-संचार होता चला गया। प्राण-संचार अगर होगा तो हर चीज प्राणवान और चमत्कारी होती चली जाती है और सफल होती जाती है। हमने अपने व्यक्तिगत जीवन में चौबीस लाख के चौबीस साल में चौबीस महापुरश्चरण किए। जप और अनुष्ठानों की विधियों को संपन्न किया। 

“एक वर्ष में 24 लाख गायत्रीमंत्र का अर्थ है एक दिन में लगभग  6000  मन्त्र , 60 मालाएं।”

सभी के साथ जो नियमोपनियम थे, उनका पालन किया, यह भी सही है, लेकिन हर एक को यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारी उपासना में कर्मकाण्डों का, विधि-विधानों का जितना ज्यादा स्थान है, उससे कहीं ज्यादा स्थान इस बात के ऊपर है कि हमने उन तीन बातों को जो आध्यात्मिकता की प्राण समझी जाती हैं, उन्हें पूरा करने की कोशिश की है। अटूट श्रद्धा और अडिग विश्वास गायत्री माता के प्रति रख करके और उसकी उपासना के सम्बन्ध में अपनी मान्यता और भावना रख करके प्रयत्न किया है और उसका परिणाम पाया है। व्यक्तित्व को भी जहाँ तक संभव हुआ है परिष्कृत करने के लिए पूरी कोशिश की है। एक ब्राह्मण को और एक भगवान के भक्त को जैसा जीवन जीना चाहिए हमने भरसक प्रयत्न किया है कि उसमें किसी तरह से कमी न आने पावे। हम उसमें पूरी-पूरी सावधानी  बरतते रहे हैं। अपने आपको धोबी के तरीके से धोने में और धुनिए के तरीके से धुनने में हमने आगा-पीछा नहीं किया है। यह हमारी उपासना को फलित और चमत्कृत बनाने का एक बहुत बड़ा कारण रहा है। उद्देश्य हमेशा से ऊँचा रहे। उपासना हम किस काम के लिए करते हैं, हमेशा यह ध्यान बना रहा। पीड़ित मानवता को ऊँचा उठाने के लिए, देश-धर्म, समाज और संस्कृति को समुन्नत बनाने के लिए हम उपासना करते हैं, अनुष्ठान करते हैं। भगवान की प्रार्थना करते हैं। भगवान ने देखा कि यह आदमी  किस नीयत से  कर रहा है। भगीरथ की नीयत को देखकर के गंगाजी स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हो गई थीं और शंकर भगवान् उनकी सहायता करने के लिए तैयार हो गए थे। हमारे सम्बन्ध में भी वैसा ही हुआ। ऊँचे उद्देश्यों को सामने रख करके चले तो दैवी-शक्तियों की भरपूर सहायता मिली।

हम देखते हैं कि अकेला बीज बोना सार्थक नहीं हो सकता। उससे फसल नहीं आ सकती। फसल कमाने के लिए बीज एक, भूमि दो और खाद-पानी  निशाना लगाने के लिए बंदूक 

जिस प्रकार फसल कमाने के लिए भूमि ,पानी-हवा  और बीज चाहिए ,बन्दुक  से निशाना लगाने के लिए बन्दुक ,कारतूस और अभ्यास चाहिए ,मूर्ति बनाने के लिए पत्थर ,छैनी-हथोड़ा और  कलाकारिता चाहिए , लेखन के लिए कागज़,कलम-स्याही  और शिक्षा चाहिए – उसी  प्रकार  उपासना के चमत्कार  देखने के लिए श्रद्धा ,परिष्कृत व्यक्तित्व, दृष्टिकोण और महत्वकांक्षाएं होनी चाहिए।  

गायत्री मंत्र के सम्बन्ध में हम यही प्रयोग और परीक्षण आजीवन करते रहे और पाया कि गायत्री मंत्र सही है, शक्तिशाली  है। गायत्री को कामधेनु कहा जाता है, यह सही है। गायत्री को कल्पवृक्ष कहा जाता है, यह भी  सही है। गायत्री को पारस कहा जाता है, इसको छूकर के लोहा सोना बन जाता है, यह भी सही है। गायत्री को अमृत कहा जाता है, जिसको पीकर हम  अमर हो जाते हैं, यह भी सही है। यह सब कुछ सही उसी हालत में हैं जबकि गायत्री रूपी कामधेनु को चारा भी खिलाया जाए, पानी पिलाया जाए, उसकी रखवाली भी की जाए। गाय को चारा  खिलाएँ नहीं और दूध पीना चाहें तो यह कैसे सम्भव होगा? पानी पिलाएँ नहीं ठंड से उसका बचाव करें नहीं, तो कैसे सम्भव होगा? गाय दूध देती है, यह सही है, लेकिन साथ-साथ में यह भी सही है कि इसको परिपुष्ट करने के लिए गाय की सेवा भी करनी पड़ेगी। 

जय गुरुदेव

Leave a comment

परमपूज्य गुरुदेव का मथुरा  का  ऐतिहासिक  अंतिम  उध्बोधन -पार्ट 2 

4 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद –  परमपूज्य गुरुदेव का मथुरा  का  ऐतिहासिक  अंतिम  उध्बोधन -पार्ट 2 

तीन दिन पूर्व हमने परमपूज्य गुरुदेव का तपोभूमि मथुरा वाला  अंतिम उध्बोधन आरम्भ किया था।  यह उध्बोधन उन्होंने  1971 की गायत्री जयंती वाले दिन 3 जून को दिया था  और गुरुवर  की धरोहर पार्ट 1 में 14 scanned पन्नों की में प्रकाशित हुआ था।  हमारे सहकर्मी चाहें तो इसी पुस्तक को लेकर स्वयं भी पढ़  सकते हैं, लेकिन पुस्तक में से स्वयं पढ़ना, बिना किसी चर्चा के पढ़ना ,बिना किसी analysis के पढ़ना , कितना लाभ देता है -एक  चिंतन-योग्य प्रश्न है। इसीलिए कक्षाओं में ग्रुप discussion का प्रचलन पॉपुलर होता जा रहा है। एक ही पैराग्राफ को  अलग-अलग विद्यार्थी, अलग -अलग तरीके से  analyse कर सकते हैं और कई बार परिणाम गलत भी हो सकते हैं। हम अपनी  अल्प  बुद्धि से जो लेख आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं , उनका यथाशक्ति  कई -कई दिन तक analysis होता रहता है और अपलोड के उपरांत कमैंट्स के द्वारा जो 2 -way ट्रैफिक आरम्भ होती है उससे कितना ज्ञानप्रसार -ज्ञानविस्तार होता है आप स्वयं इसके साक्षी हैं। आज के युग की सबसे बड़ी समस्या -प्रतक्ष्यवाद और इंस्टेंट परिणाम है ,बिल्कुल इंस्टेंट कॉफ़ी ( coffee ) की तरह।  गुरुदेव ने  अनवरत 24 वर्ष तक साधना की , जो गुरु ने कहा, बिना किसी प्रश्न के करते रहे ,लेकिन आज के युग में हम  24 दिन में ही चमत्कार की आशा करते हैं।  हम एक बार फिर यही कहेंगें – यह उपासना नहीं है -भटकन है। गुरुदेव द्वारा लिखित साहित्य के  एक -एक अक्षर को ,एक -एक शब्द को, एक एक वाक्य को अंतःकरण में ढालने  की आवश्यकता है। यही कारण है कि हम साधारण से  विषय की  इतनी  विस्तृत चर्चा करते हैं। आपके पास तो 400 पेज का गायत्री महाविज्ञान पढ़ने  का भी तो विकल्प है।  हम अपने किसी भी सहकर्मी की योग्यता और ज्ञान पर प्रश्न नहीं कर रहे लेकिन एक क्लास में हर प्रकार के विद्यार्थी होते हैं ,सभी का ख्याल रखना ही एक अच्छे अध्यापक की खूबी  होती है। आपके कमैंट्स साक्षी हैं कि चर्चाओं से ,सम्पर्क से ,बातचीत से ज्ञानप्रसार की  धारा का प्रवाह अविरल वेगपूर्ण चले जा रहा है 

तो चलिए करें कुछ और चर्चा : 

________________________  

परमपूज्य गुरुदेव कह रहे हैं :

गायत्री कामधेनु है ,गायत्री  पारस है ,गायत्री  कल्पवृक्ष है-  कैसे      

गायत्री कामधेनु है ,गायत्री  पारस है ,गायत्री  कल्पवृक्ष है  आदि जो भी लाभ गायत्री उपासना के बताए गए हैं, उसके लिए मुझे जिंदगी का जुआ खेलना ही पड़ेगा और खेलना ही चाहिए। कामधेनु जिसे सुरभि के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में सभी गायों की मां गौ माता के रूप में वर्णित एक दिव्य गोजातीय-देवी है। वह एक चमत्कारी (Cow of Plenty)   है जो अपने मालिक को वह सब कुछ प्रदान करती है जो वह चाहता है और अक्सर अन्य मवेशियों की मां के रूप में चित्रित किया जाता है। कल्पवृक्ष, जीवन का वृक्ष, जिसका अर्थ “विश्व वृक्ष”  भी है, का उल्लेख वैदिक शास्त्रों में मिलता है। समुद्र मंथन के दौरान  कल्पवृक्ष कामधेनु के साथ  जल से उभरा। कल्पवृक्ष  को Milky  Way  या सीरियस सितारों का जन्मस्थान भी कहा जाता है। रात को सबसे चमकदार दिखने वाले इस सितारा  समूह को रूद्र सितारा भी कहा  गया है। पारस वह अद्भुत पत्थर है जिसे छूने से कोई भी वस्तु स्वर्ण बन जाती है। तो मित्रो आपने देख ही लिया कि गायत्री उपासना की ,गायत्री मंत्र की तुलना कैसी -कैसी  आश्चर्यजनक वस्तुओं के साथ की गयी है। इन रोचक वैज्ञानिक  कथाओं पर भी कभी एक लेख लिखने की इच्छा  है।

चार-पाँच वर्ष में ही भगवान ने मेरी इच्छा  पूरी  कर दी। मेरे गुरु मेरे पास आए और उन्होंने जो बातें बताईं उससे जीवन का  मूल्य   समझ में आ गया। जीवन  का मूल्य और महत्त्व समझकर मैं चौंक पड़ा कि चौरासी लाख योनियों में घूमने के बाद मिलने वाली यह जिंदगी मखौल है क्या? इसके पीछे महान  उद्देश्य छिपे हुए हैं।भगवान ने हमारे हाथ में यह मानव जीवन” देकर हमें एक सुनहरी सौभाग्य प्रदान  किया है , पर क्या हम और आप उसका सही  इस्तेमाल कर पाते हैं ? मालवीय जी ने मुझे सबसे मूल्यवान  एक ही बात बताई थी कि अगर आप  गायत्री मंत्र का संबल पकड़ लें तो पार हो सकते हैं। मालवीय जी  मेरे दीक्षा गुरु हैं और गुरुदेव सर्वेश्वरानन्द जी जो हिमालय में रहते हैं मेरे आध्यात्मिक गुरु  हैं। उन्होंने बताया कि जिंदगी की कीमत समझ ले , जिंदगी का ठीक से  इस्तेमाल करना सीख ले । जिंदगी की कीमत मैंने पूरे तरीके से वसूल कर ली है। एक-एक साँस को इस तरीके से खर्च किया है कि कोई  मुझ पर आरोप  नहीं लगा सकता कि हमने  जिंदगी के साथ मखौल किया है, दिल्लगी की है। जीवन देवता पारस है, अमृत है और कल्पवृक्ष है। इसका ठीक से इस्तेमाल करता हुआ मैं जीवन की परीक्षा में उत्तीर्ण  होता चला गया और इसी प्रकार चलते -चलते अभी साठ  वर्ष  की मंजिल पूरी करने में समर्थ हो गया। क्या-क्या किया? क्या-क्या पाया? कैसे पाया? मैं चाहता हूँ कि आपको वह सब कुछ बता दूँ , अपने सारे  भेद और रहस्य बता दूँ  कि गायत्री मंत्र कितना सामर्थ्यवान है।” यह मन्त्र इतना कीमती है कि  मात्र माला घुमाने से ही  इसके लाभ नहीं प्राप्त किए जा सकते। इसके लिए कुछ ज्यादा ही कीमत चुकानी पड़ेगी। कल्प वृक्ष ,कामधेनु और पारस  ऐसे ही नहीं मिल जाते।  

गायत्री मंत्र के बारे में ऋषि  क्या कहते हैं?

शास्त्रकारों ने क्या कहा है? यह जानने के लिए मित्रो, मैंने पढ़ना शुरू किया और पढ़ते-पढ़ते सारी उम्र निकाल दी। अध्यन में  क्या-क्या पढ़ा? भारतीय धर्म और संस्कृति में जो कुछ भी है, वह सब पढ़ा। वेद पढ़े, आरण्यक पढ़ीं, उपनिषदें पढ़ीं, दर्शन पढ़े और दूसरे ग्रंथ भी पढ़ डाले, देखू तो सही गायत्री के बारे में ग्रंथ क्या कहते हैं? खोजते-खोजते सारे ग्रंथों में जो पाया, उसे नोट करता चला गया। बाद मन में यह आया कि जैसे मैंने फायदा उठाया है, दूसरे भी फायदा उठा लें, तो क्या नुकसान है। उसे छपा भी डाला। लोग उससे फायदा भी उठाते हैं। असल में मैंने ग्रंथों को, ऋषियों की मान्यताओं को जानने के लिए पढ़ा और पढ़ने के साथ-साथ में यह प्रयत्न भी किया कि जो कोई भी गायत्री के जानकार हैं, उनसे जानें कि गायत्री क्या है? और प्रयत्न करूँ कि जिस तरीके से खोज और शोध उन्होंने  की थी, उसी तरीके से मैं भी खोज और शोध करने का प्रयत्न करूँ। उसी शोध में मैंने पढ़ा है कि बहुत पहले एक आदमी हुआ था  जिसने  गायत्री में पी०एच०डी० और डी०लिट् किया था? कौन था वह  महान  आदमी ?, कौन था वह महापुरुष ?  उस महापुरुष का  नाम था- विश्वामित्र। विश्वामित्र उस व्यक्ति का नाम है, जिसको जब हम संकल्प बोलते हैं, तो हाथ में जल लेकर गायत्री मंत्र से पहले विनियोग बोलना पड़ता है। 

आपको तो हमने नहीं बताया। जब आप आगे-आगे चलेंगे, ब्रह्मवर्चस की उपासना में चलेंगे, तब हम गायत्री के रहस्यों को भी बताएँगे। अभी तो आपको सामान्य बालबोध नियम भर बताए हैं, जो गायत्री महाविज्ञान में छपे हैं। बालबोध नियम जो सर्वसाधारण के लिए हैं, उतना ही छापा है,लेकिन जो जप हम करते हैं, उसमें एक संकल्प भी बोलते हैं, जिसका नाम है-‘विनियोग’ प्रत्येक बीज मंत्र के पूर्व एक विनियोग लगा रहता है। विनियोग में हम तीन बातें बोलते हैं-“गायत्री छन्दः, सविता देवता। विश्वामित्र ऋषिः गायत्री जपे विनियोगः।” संकल्प जल छोड़ करके तब हम जप करते हैं । यह क्या हो गया? इसमें यह बात बताई गई है कि गायत्री का दक्ष, अति शिक्षित आदमी  कौन  था, गायत्री का अध्ययन किसने किया था, गायत्री की जानकारियाँ किसने प्राप्त की, गायत्री की उपासना किसने की? “गायत्री के संबंध में  जो आदमी प्रामाणिक है  उसका नाम विश्वामित्र है।” मेरे मन में आया कि क्या मेरे लिए ऐसा संभव नहीं कि मैं भी विश्वामित्र के तरीके से ही  प्रयास करूं। मित्रो! मैं उसी काम में लग गया। पंद्रह वर्ष की उम्र से उन्तालीस वर्ष की उम्र  तक, चौबीस वर्ष बराबर एक ही काम में लगा रहा, लोग पूछते रहे कि यह आप क्या किया करते हैं हमें भी कुछ बताइए। हमने कहा-प्रयोग कर रहे हैं, रिसर्च कर रहे हैं और रिसर्च करने के बाद अगर  कोई  काम  की चीज़  मिली  तो फिर आपको बताएंगे कि आप भी गायत्री की उपासना कीजिए।  अगर नहीं मिली  तो मना कर देंगे।

मित्रो,  24  साल की उपासना के बाद , संशोधन के बाद  कितने साल  और हो गए हैं, जब से गायत्री के प्रचार का कार्य हमने लिया,जबसे  हमको हमारी जीवात्मा ने यह आज्ञा दी कि यह बहुत ही  काम की चीज है, उपयोगी चीज है, लाभदायक चीज है, इसको लोगों को बताया जाना चाहिए और समझाया जाना चाहिए। जो जितना अधिकारी हो, उतनी ही खुराक दी जानी चाहिए। हम उपासना सिखाते रहे हैं, छोटी समझ  वालों को छोटी मात्रा देते रहे हैं, बड़ी समझ वालों  को बड़ी मात्रा देते हैं । हमने छोटे बच्चों को दूध में पानी मिले हुए से लेकर बड़ों को घी और शक्कर मिली हुई खुराक दी है।  इन वर्षों में हमारा विश्वास अटूट होता चला गया है, श्रद्धा मजबूत होती चली गई है। यह वह ताकत  है, वह आधार है कि अगर ठीक तरीके से कोई पकड़ सकने में समर्थ हो सकता हो, तो उसके लिए नफा ही नफा है, लाभ ही लाभ है।

ठीक तरीका क्या है ? अगले लेख में। 

सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।”  जय गुरुदेव

क्रमशः जारी -To be continued

Leave a comment

शांतिकुंज और मस्तीचक की तीर्थ यात्रा वीडियो के माध्यम से 

https://drive.google.com/file/d/1EJIFoh6R6tDuQe2KD5Rbpys34kQri1qy/view?usp=sharing https://drive.google.com/file/d/19sfNHKCp6ivobGmm2r_sy6PcPd23L0uq/view?usp=sharinghttps://drive.google.com/file/d/1Z16Riy3aW28i-TbTyWOzY6Bgi1Tbxaoj/view?usp=sharing https://drive.google.com/file/d/1vUZ31yxKGBFKQhu13DzMuBzqRL6_bai1/view?usp=sharing https://drive.google.com/file/d/1dDWRSrnCotiFAzcbObFQEiv1wV_WIM4G/view?usp=sharinghttps://drive.google.com/file/d/1TEvlhkCK8aq4aBM_-i_x09j92yqSWRqq/view?usp=sharing https://drive.google.com/file/d/1HMeG3Lb12c-QdRMjtYgJfpy9T1Q01AQx/view?usp=sharing

3  सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद – शांतिकुंज और मस्तीचक की तीर्थ यात्रा वीडियो के माध्यम से 

आज के ज्ञानप्रसाद में हम आपको बिहार स्थित  पावन तीर्थ मस्तीचक शक्तिपीठ की भूमि पर लेकर जायेंगें, युगतीर्थ शांतिकुंज में श्रेध्य डॉक्टर प्रणव पंड्या जी ,आदरणीय शैल जीजी के साथ मिलायेंगें और देव संस्कृति यूनिवर्सिटी हरिद्वार में डॉक्टर चिन्मय पंड्या जी का सन्देश सुनायेंगें। आपके लिए हमने  सात वीडियो  वीडियो लिंक्स create  किये जिनका चुनाव हमने हमारे ही  द्वारा रिकॉर्ड की गयी वीडियो से, मस्तीचक की टीम द्वारा  रिकॉर्ड की गयी वीडियो से ( जो बिकाश बेटे ने शेयर की )  में से बहुत ही परिश्रम से किया है।  इन सात वीडियोस में आप आदरणीय चिन्मय भैया का सन्देश ,श्रद्धेय डॉक्टर साहिब का सन्देश , दो ऊर्जावान जुडवां बेटियों द्वारा  विद्या मंदिर की प्लेट के साथ, आदरणीय शुक्ला बाबा की प्रतिमा के साथ और थैंक्स वीडियो देख पायेंगें। हम आपसे करबद्ध निवेदन करेंगें कि आप इन वीडियोस को देख कर आदरणीय ,स्वर्गीय शुक्ला बाबा के चरणों में अपने  श्रद्धा सुमन अर्पित करें। सभी वीडियोस बहुत ही छोटी हैं ( जैसे कि हमारी प्रवृति है ) आप एक बार में ही देख सकते हैं नहीं तो 2 -3  बार में भी देख सकते हैं लेकिन देखें  अवश्य, पावन भूमियों से आशीवार्द प्राप्त करें। हम इन वीडियोस को देखने के लिए इस कारण भी कह रहे हैं कि आप मस्तीचक के  वातावरण से परिचित हो जाएँ ,क्या मालूम आपका ज्ञान  किसी को सहायक सिद्ध हो जाये। मृतुन्जय भाई साहिब का समर्पण ,शुक्ला बाबा का सूक्ष्म संरक्षण , परमपूज्य गुरुदेव का प्यार  मस्तीचक को कैसा वातावरण प्रदान कर रहा है ,हमारे परिवार स्वयं देख कर आये हैं। इस तीर्थस्थली में कार्य करने का सौभाग्य  प्राप्त होना अपनेआप में ही एक बड़ी बात है-खासकर ऐसे समय में जब बच्चियों की सुरक्षा, इतनी महंगी शिक्षा ,और फिर शिक्षा के बाद नौकरी की समस्या हर माता पिता की चिंता का विषय हो।     

हर दो तीन  लेख के बाद हम “अपनों से अपनी बात” शीर्षक से आपसे बाते करते हैं और आप कमैंट्स और फ़ोन से अपनी बाते बताते हैं – एक पारिवारिक सा वातावरण बना रहता है ,बहुत ही अपनत्व और स्नेह की भावना का अनुभव होता है। ज़ूम लिंक में बाबा की प्रतिमा आवरण का समय सुबह 9 बजे लिखा था ,इसके अनुसार हमारा कनाडा का समय रात 11 :30 बनता था।  हम तो अपना कैमरा वगैरह लेकर पूरे समय से तैयार हो गए थे लेकिन 12 बजे से पहले  कार्य आरम्भ नहीं हुआ था।  लगभग डेढ़ बजे तक यह कार्यक्रम  चलता रहा।  उसके बाद हम सोने का प्रयत्न करने लगे तो काफी देर तक जब नींद नहीं आयी तो हमने इन वीडियो की एडिटिंग आरम्भ कर दी ,सुबह के पांच बज गए।  फिर कोई आधा घंटा का पावर नैप आया और भारत से हमें मैसेज और वीडियो आने आरम्भ हो गए।  बीएस फिर हम इसी कार्य में लग  गए और कुछ  वीडियो फेसबुक पर और मैसेंजर पर शेयर भी कीं।  सारी रात में केवल आधा घंटा सोने के बावजूद ऊर्जा का संचार पूरा है – गुरु कार्य जो है।              

गायत्री मन्त्र के वैज्ञानिक पक्ष पर इतने educative कमेंट आये हैं कि सभी को  शेयर  करना चाहिए।  सभी कमेंट एक -एक करके देखे हैं कइयों को तो रिप्लाई भी किया है लेकिन हमारे सरविंदर भाई साहिब का  1200 शब्दों का व्हाट्सप्प  कमेंट बहुत ही अद्भुत है।  इनके कमेंट अक्सर अंतरात्मा से ही आते हैं , इन्हे लिखने में कितना समय लगाते होंगें। हमें तो पूर्ण विश्वास है की सरविंदर जी की यह वाली प्रतिभा उन्हें लेख  लिखने में सहायक हो सकती है। ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में एक से बढ़कर एक प्रतिभाशाली हीरे छुपे हैं।  

तो मित्रो इन्ही शब्दों के साथ हम अपनी लेखनी को विराम देते हैं और कल आपके समक्ष एक और ऊर्जावान लेख लेकर आयेंगें। सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।

Leave a comment

गायत्री मन्त्र के द्वारा अपनेआप को सर्वशक्तिमान के साथ tune करें।

2  सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रासद -आइये गायत्री मन्त्र के द्वारा अपनेआप को सर्वशक्तिमान के साथ tune करें।

आज एक लेख इतना साइंटिफिक है कि यदि आप इसे अक्षर ब अक्षर नहीं पढ़ेंगें , रुक -रुक कर नहीं पढ़ेंगें तो आपको न तो समझ आएगा और न ही कोई लाभ होगा।  हम आपसे निवेदन करते हैं कि आप इस  लेख को इस तरीके से पढ़िए कि  पढ़ कर अपने टीचर तो assignment बना कर देनी है और अपनी क्लास में टॉप करना है। 

तो लेख आरम्भ करने से पूर्व हम आपको शिरोमणि शुक्ला बाबा की मरती स्थापना का ज़ूम लिंक देना चाहेंगें जिसे क्लिक करके (य कॉपी पेस्ट करके ) आप इसमें शामिल हो सकते हैं।  समारोह प्रातः 9 बजे आरम्भ होगा , हमारे यहाँ तो रात के 11 :30 बजे होंगें लेकिन हम शामिल होने का प्रयास करेंगें। 

____________________________________   

भगवान के पास कई अदृश्य ऊर्जा धाराएं हैं जिन्हें योग और अध्यात्म विज्ञान के वैज्ञानिक शिक्षकों ने अपनी सूक्ष्म दिव्य दृष्टि के माध्यम से देखा और समझा है।इन्ही  विशेषताओं के आधार पर इनका नामकरण किया गया है जिन्हे हम देवी/ देवता कहते हैं। भगवान की धन ऊर्जा को लक्ष्मी कहा जाता है, बौद्धिक ऊर्जा को सरस्वती कहा जाता है, सृजन  ऊर्जा को ब्रह्मा कहा जाता है, पालन  ऊर्जा को विष्णु कहा जाता है, विलय  ऊर्जा को शिव कहा जाता है आदि आदि । व्यक्ति की यह एक मानसिक प्रवृति है कि जो कुछ भी उसके  लिए लाभदायक है  और आत्मसात करने योग्य है, उसके साथ वह  संपर्क स्थापित  करना चाहता है और एक बंधन ( relation ) बनाना चाहता है। भगवान  ने हमारे लाभ के लिए हमारे शरीर में  कई प्रकार के ऊर्जा केंद्र (Energy  Centres)  प्रदान किये हैं जिसके द्वारा  हम उस सर्वशक्तिमान के साथ relation बना सकते हैं, बंधन स्थापित कर सकते हैं : ऐसा करने की विधि को हीभगवान की पूजा” कहा जाता है। आगे चल कर हम tuning की भी बात करेगें लेकिन अब तक के लिए आप संकल्प लीजिये कि पूजास्थली में ,साधना कक्ष में हम अपने परमपिता परमात्मा से रिलेशन बनाने ही जायेंगें,बंधन बनाने ही जायेंगें  माला चाहे एक ही करें।  

जिस प्रकार पशुओं में गाय,नदियों में गंगा और जड़ी-बूटियों में तुलसी हमारे लिए विशेष रूप से लाभकारी हैं, उसी प्रकार ईश्वर की छिपी दिव्य शक्तियों में  गायत्री मानव जाति के लिए सबसे उपयोगी है।गायत्री वह ज्ञान आधारित अदृश्य चेतना” है जो पवित्रता,शांति और आनंद के साथ प्रबल होती है। अध्यात्म विज्ञान और योग विधियां ऐसी वैज्ञानिक तकनीकें हैं जिन्हें हमारे पूज्य पूर्वजों ने घोर तपस्या के साथ युगों तक शोध करने के बाद खोजा था। महान ऋषियों ने देखा कि सूक्ष्म शक्तियाँ उस वर्ग की हैं जो हमारी आत्मा का वर्ग है। इसलिए आत्मा को स्वयं एक विशेष स्थिति में ढाला जाना चाहिए जो इन दैवीय ऊर्जाओं के लिए अनुकूल हो। इस प्रकार उनके बीच चुंबकीय आकर्षण का एक पारस्परिक बंधन बन जाता है जिससे इन शक्तियों को पकड़ना  या आत्मसात करना संभव है। हजारों वर्षों तक आत्मा विज्ञान ( Soul  Sciences)  के क्षेत्र में असंख्य ऋषि-वैज्ञानिकों ने गहन प्रयास और तपस्या के साथ इस पर शोध करना जारी रखा और अंततः उन्हें मीठी सफलता का स्वाद मिला।उन्होंने उन तरीकों का पता लगाया जिनके  आधार पर हमारे आंतरिक अस्तित्व को ऐसी क्षमताओं और विशेषताओं के साथ ढाला गया है कि यदि हम किसी विशेष दैवीय ऊर्जा के साथ एक बंधन बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले उसके साथ संगतिकरण होना आवश्यक है  ताकि हम अपने चुंबकत्व के माध्यम से उसे पकड़ सकें और उसे आत्मसात कर सकें।  इसका उदाहरण हम मोम के पिघलने से कर सकते हैं।  ठोस  मोम कभी भी तेल के साथ नहीं मिल सकता है लेकिन अगर यह मोम आग से पिघलाया जाये , तो यह तुरंत तेल के साथ मिल जाएगा। इसी प्रकार दिव्य सूक्ष्म शक्तियाँ साधारण तौर पर  सभी को प्राप्त नहीं होती हैं, फिर भी यदि साधना/ तपस्या के माध्यम से आंतरिक मानस और आत्मा को “पिघला”  दिया जाता है, तो यह दिव्य ऊर्जा ग्रहण की जा सकती है। आध्यात्मिक शब्दावली में इस पद्धति और तकनीक को साधना या spiritual practice कहा जाता है।

सुपर साइंस योग (Super Science Yoga)के आधार पर अब तक असंख्य लोगों ने सर्वशक्तिमान ईश्वर की वांछित ऊर्जाओं को प्राप्त करने के लिए स्वयं को सक्षम बनाया है। प्राचीन इतिहास और पुराणों या पौराणिक कथाओं में विविध विवरण मिलते हैं जो कहते हैं कि विभिन्न देवताओं और साधना के तरीकों के माध्यम से कई लोगों ने कई प्रकार के वरदान प्राप्त किए हैं। इसका मतलब है कि इन लोगों ने आध्यात्मिक तपस्या के माध्यम से अपनी आंतरिक चेतना को इतना सक्षम बना दिया कि वे मनवांछित ईश्वरीय ऊर्जाओं को पकड़ सकें और उनका लाभ उठा सकें।

गायत्री साधना वह वैज्ञानिक विधि है जिसके द्वारा ज्ञान नामक ईश्वर की संयुक्त ऊर्जाओं को आत्मसात करके अपनी तरफ  आकर्षित करके, भव्यता और शक्ति को अपने भीतर इकट्ठा किया जा सकता है और इसके आधार पर व्यक्ति कई मानसिक और भौतिक सुखों का आनंद ले सकता है। गायत्री तो त्रिपदा कहा गया है ,क्यों कहा गया है -इस लेख की लम्बाई तो देखते हुए हम इस विषय की  किसी और लेख में चर्चा करेंगें।  

जब हम superficially  सोचते हैं तो यही कह सकते  हैं कि  गायत्री साधनाएँ सामान्य क्रियाओं की तरह प्रतीत होती हैं और यह समझना कठिन और अविश्वसनीय प्रतीत होता है  कि कोई इन क्रियाओं से  इतने बड़े लाभ कैसे प्राप्त कर  सकता है। लेकिन जब इनके सुपर परिणाम नोट किए जाते हैं तो हम यह कहने पर विवश हो जाते  हैं कि अवश्य ही ,वास्तव में इन प्रथाओं में वैधता (validity) है। गायत्री मंत्र के 24 अक्षर आपस में इस प्रकार गुंथे हुए हैं कि इस मन्त्र के  जाप करने से हमारी जीभ, मुख, कंठ और तालु की नसें इस प्रकार कार्य करने लगती हैं कि हमारे शरीर के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे यौगिक चक्र (Yogic Chakras -subtle plexus- )  उपस्थित हो जाते हैं। शरीर सक्रिय ( activate ) हो जाता है। जिस प्रकार 6  चक्रों को सक्रिय करने से कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है, उसी प्रकार गायत्री मन्त्र का जाप करने मात्र से ये छोटी-छोटी ग्रन्थियाँ जाग्रत होने पर बहुत अच्छे परिणाम दिखाती हैं। शरीर के किस क्षेत्र में किस प्रकार की छिपी ग्रंथियां मौजूद होती हैं? गायत्री के किस अक्षर के जाप से कौन सी ग्रंथियां सक्रिय हो जाती हैं? इन ग्रंथि उन्मुख चक्रों ( gland oriented chakras ) के जागरण के बाद कौन-सी शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं? बेशक यह सब यहाँ वर्णित नहीं किया जा सकता है लेकिन हम कह सकते हैं कि प्राचीन काल के महान ऋषियों ने गायत्री मंत्र के इन 24 अक्षरों को बहुत रहस्यमय तरीके से गुंथा है। इसके एकाग्र नामजप से शरीर में ऐसा सूक्ष्म कार्य” प्रारंभ हो जाता है जिसे  हमारी अंतरात्मा बहुत ही  आसानी से ग्रहण कर लेती है। इस सूक्ष्म कार्य से हमारा शरीर इतनी चुंबकीय शक्ति ग्रहण कर लेता है कि ईश्वर की महाशक्ति (गायत्री) को बड़ी मात्रा में सहज ही ग्रहण करने में सक्षम हो  सकता है।

सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक असंख्य मानसिक रूप से शक्ति- शाली संतों ने गायत्री साधना को अंजाम दिया है। मनोवैज्ञानिक (Psychologists ) और मनोचिकित्सक(Psychiatrists ) अच्छी तरह जानते हैं कि महान आत्मा-संचालित-संतों” के पास कितने  लंबे समय के लिए कितनी  इच्छा-शक्ति होती है। ऐसा इसलिए है कि  गायत्री मंत्र लगातार  संचित आध्यात्मिक धन ( spiritual  wealth ) के कारण बहुत अधिक शक्तिशाली हो गया है। 

विचार कभी नष्ट नहीं होते क्योंकि विचारों के  बादल आकाश में घूमते रहते हैं। जब भी ये विचारों के बादल अपने ही प्रकार के तीव्र विचारों को देखते हैंअनुभव करते हैं , तो वे फूट पड़ते हैं और वर्षा की तरह बरस पड़ते हैं। इस प्रकार अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के विचार अदृश्य रूप से गति प्राप्त करते हैं। इसीलिए हम नकारात्मक विचारों को सकारात्मक विचारों से काटने के लिए प्रेरित रहते हैं। यह विज्ञान का सिद्धांत है की जब भी इस ब्रह्माण्ड में नेगेटिव एनर्जी की  भरमार होती है तो उथल -पुथल होना स्वाभाविक है। यही है हमारे परमपूज्य गुरुदेव का विचार क्रांति अभियान।” पिछले महान गायत्री भक्तों के विचार के बादल नए गायत्री भक्तों पर बरसते हैं और इस प्रकार बाद वाले बहुत तेजी से सफलता का स्वाद चखते हैं।

रेडियो स्टेशन का उदाहरण :

विभिन्न रेडियो स्टेशनों में हर पल विभिन्न कार्यक्रम प्रसारित होते रहते  हैं। लेकिन इन कार्यक्रमों को सुनने के लिए एक रेडियो सेट का होना तो ज़रूरी है न, और फिर उससे भी बढ़कर अगर हमें अपनी पसंद का  विविध भारती  कार्यक्रम सुनना है तो हम रेडियो की सुई को इधर -उधर चला कर एक विशेष frequency ढूंढते हैं।  यही वह  frequency है जहाँ विविध भारती  क्लियर सुनाई देता है। इस क्रिया को हम tuning कहते हैं , जिसमें हम रेडियो सेट में से एक विशेष फ्रीक्वेंसी को रेडियो स्टेशन की फ्रीक्वेंसी के साथ मैच करते हैं।आजकल  TV का चलन रेडियो से अधिक है तो frequency वाला  विवरण हम TV  पर भी प्रयोग कर सकते हैं।  

ठीक उसी प्रकार  सर्वशक्तिमान ईश्वर की अनंत शक्तियाँ कई केंद्रों से फैलकर लौकिक और सर्वव्यापी हो जाती हैं।  इन शक्तियों को  केवल वही व्यक्ति  ग्रहण कर सकता है जिसने साधना के माध्यम से अपने मानस को ‘रेडियो/ TV’ में बदल दिया है।  हम ऐसा भी कह सकते हैं इन शक्तियों को केवल वही व्यक्ति ग्रहण कर सकता है जिसकी tuning सर्वशक्तिमान ईश्वर के साथ हो गयी हो। रोज़मर्रा की भाषा में हम अक्सर कहते हैं मेरी tuning मेरे बॉस के साथ बहुत ही अच्छी है।  बॉलीवुड में तो इस tuning को chemistry का नाम भी दे दिया गया है ,चाहे वह बिलकुल उसी तरह की नहीं है लेकिन यहाँ  समझने के लिए ठीक है। इस पद्धति के माध्यम से हम भगवान के “सुपर एनर्जी महासागर और अनकही आध्यात्मिक संपदा” से आवश्यक ऊर्जा और आध्यात्मिक भव्यता प्राप्त कर सकते हैं। सर्वशक्तिमान ईश्वर की अविनाशी दिव्य तिजोरी” में लगभग किसी भी चीज की कमी नहीं है। मनुष्य, जो ईश्वर का एक राजकुमार है,उसका अपने पिता (ईश्वर) की हर सामग्री पर अधिकार है।आवश्यकता केवल यह है कि वह राजकुमार अपने प्रयासों से, कठिन परिश्रम से, तपस्या से  और आध्यात्मिक प्रयासों के माध्यम से अपनी पात्रता साबित करने में समर्थ हो। जब यह पात्रता साबित हो जाती है तो यह राजकुमार मनवांछित चीजों का  असली उत्तराधिकारी बन जाता है। हमारे माता पिता भी तो उसी को वारिस बनाते हैं जो उनके विरसे की/सम्पति की  रक्षा करने में सक्ष्म होता है। 

इस प्रकार कोई कारण नहीं है कि हमें संतोषजनक आनंद और शांति नहीं मिल सकती है।अध्यात्म विज्ञान की ठोस, वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित गायत्री साधना एक अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीक है। यदि सम्पूर्ण  विश्वास के साथ इसकी परीक्षा ली जाए, तो परिणाम अवश्य ही आशा से भरे होंगे।

जय गुरुदेव 

Leave a comment

परमपूज्य गुरुदेव का मथुरा  का  ऐतिहासिक  अंतिम  उध्बोधन -पार्ट 1 

1 सितम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद -परमपूज्य गुरुदेव का मथुरा  का  ऐतिहासिक  अंतिम  उध्बोधन -पार्ट 1 

मित्रो आज का  ज्ञानप्रसाद गुरुदेव के उस ऐतिहासिक उध्बोधन पर आधारित है जो उन्होंने 3 जून 1971 गायत्री जयंती वाले दिन मथुरा में  दिया था।  आपने देखा है – हम लिख रहे हैं “आधारित है” – इसका अर्थ यह है कि इस 14 scanned  पन्नों के उध्बोधन को जो गुरुवर की धरोहर -1  में प्रकाशित हुआ था ऐसे  ही  “as it is” आपके समक्ष प्रस्तुत नहीं कर रहे  हैं । कई – कई बार पढ़कर, समझकर , वीडियो देखकर , गूगल की सहायता लेकर सरल करके आपके लिए तैयार किया है।   इसका कारण केवल एक ही था -गायत्री मन्त्र के विषय को अगर systematically, step by step न पढ़ा जाये तो यह  चर्चा इतनी विशाल और complex होती है कि इसको -पढ़ते -पढ़ते  भटकना स्वाभाविक ही होता है। इस पुस्तक की केवल scanned कॉपी ही उपलब्ध है ,text  कॉपी को जब क्लिक करते हैं तो पुस्तक का दूसरा भाग आ जाता है।  हममें  से शायद ही कोई होगा जो गायत्री मन्त्र का जाप न करता हो , लेकिन क्या हम सभी इस महामंत्र में छिपे ज्ञान को,  ज्ञान के रहस्यों को समझते हैं यं फिर ऐसे ही माला फेरे जा रहे हैं , एक माला ,दस माला य कितनी ही माला।  क्या हमें इसके  वैज्ञानिक पक्ष का  ,scientific aspect का ज्ञान है। कैसे यह मंत्र हमें प्राणऊर्जा प्राप्त करवाते हुए सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है। कैसे हम  सूर्य भगवान के सूक्ष्म रूप से प्राणऊर्जा प्राप्त करते हैं।  गुरुदेव ने बहुत ही  सरल शब्दों में इन प्रश्नों का समाधान  किया है और उन्ही के सूक्ष्म  मार्गदर्शन ने हमें भी इस कार्य के लिए प्रेरित किया। परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि मेरे चले जाने पर अगर आप यह विचार करें कि गायत्री मन्त्र सामर्थ्यवान है और अपनी मान्यताओं में एक और अंश -अध्यात्म -जोड़ लें तो मैं समझूंगा मेरा कहना और आपका सुनना सार्थक  हो गया।  जिन महामानवों ने इस मन्त्र के ऊपर इतनी रिसर्च की , उनका उदेश्य और प्रयोजन पूरा हो गया। आप इस लेख में और आने वाले लेखों में देखेंगें कि गुरुदेव ने जितने भी तथ्य वर्णन किये हैं ,अपने ऊपर अनुसन्धान के बाद ही प्रकाशित किये हैं। 

तो चलते है आज के लेख की ओर :        

_________________

वेदमाता देवमाता माँ गायत्री के पावन अनुग्रह से हमें वैदिक तत्वज्ञान  प्राप्त  करने का सुअवसर प्राप्त होता है और  यही हम सबके हृदय की एकमात्र कामना है।  तत्वज्ञान का अर्थ है अज्ञान से दूर जाना । जब हम अज्ञान से दूर जाते हैं तो ज्ञान अपनेआप ही पास आता है।  अथर्ववेद के अनुसार इसी से हमारी अन्य सभी इच्छाओं की परिपूर्ति हो जाती है। 

स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रोच्दयन्ताम् द्विजानाम, आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्ति द्रविणं ब्रह्मवर्चसं मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम।  यह  वरदायिनी वेदमाता की स्तुति  है।  

यह हम सब को पवित्र करने वाली है। इसका अर्थ बताना  हमारा कर्तव्य बनता है जो कि  इस प्रकार है:  हमारी प्रार्थना है कि यह हम  सबको पवित्र जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करें  जो मानवीय संस्कारों से संपन्न हैं। यह हमें लम्बी आयु, प्राणशक्ति, श्रेष्ठ संतानें, पशु समृद्धि तथा ब्रह्मतेज प्रदान करें। 

गायत्री मंत्र से हम सभी सुपरिचित हैं, जो इस प्रकार है : 

ॐ  भूर्भुवः स्वः तत्सवितु र्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात। 

मंत्र का सामान्य अर्थ इस प्रकार है : किसी भी वेद मंत्र का उच्चारण करने से पूर्व ‘ओsम’ ( ॐ )का उच्चारण करना आवकश्यक हैं। ओsम परमात्मा का श्रेष्ठ नाम हैं, इसमें तीन वर्ण हैं। ओsम’ अथवा ओंकार विश्व के प्रायः बहुत से धार्मिक मतों में किसी ना किसी प्रकार से विद्यमान हैं।  ‘भूः’ का अर्थ है पृथ्वी , ‘भुवः’ का अर्थ है अंतरिक्ष  और ‘स्वः’ का अर्थ है स्वर्ग -ये तीनो महाव्याहृतियाँ हैं।  

“हम सभी (सवितुः देवस्य) सबको प्रेरित करने वाले देदीप्यमान सविता (सूर्य) देवता  (तत)  सर्वव्यापक (वरेण्यम) वरन करने योग्य अर्थात अत्यंत श्रेष्ठ (भर्गः) भजनीय तेज़ का (धीमहि) ध्यान करते हैं,  (यो ) जो (नः) हमारी (धियः) बुद्धि  को (प्रचोदयात) सन्मार्ग की दिशा में प्रेरित करता हैं।” 

इस मंत्र को  गायत्री मंत्र इसलिए कहा जाता है कि  यह  मन्त्र जप करने से प्राणों की रक्षा होती है। ‘गायन्तं त्रायते’ यह वेद का प्रथम छंद हैं जिसमे 24  अक्षर और तीन पाद होते हैं।  इसके प्रत्येक पाद में आठ-आठ अक्षर  होते हैं। प्राण ही तो सब कुछ है।  जिस व्यक्ति में ऊर्जा है ,शक्ति है ,चेतना है उसे हम प्राणवान कहते हैं, विचारशील ,विचारवान ,बुद्धिमान ,समझदार व्यक्ति ही प्राणवान कहलाने के हक़दार होते हैं।  प्राण निकलते ही इंसान एक ज़िंदा लाश बन जाता है। प्राण ही सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है जिससे सब कुछ चल रहा है। और जब हम गायत्री मन्त्र का जाप करते हैं तो हम सविता देवता -सूर्य देवता से प्राणों की ही मांग ही तो कर रहे हैं।  सूर्य की शक्ति, सूर्य की ऊर्जा , पाने अंदर धारण करने के लिए प्रार्थना  करते हैं।  सूर्य  भगवान  का स्थूल रूप जिसे हम प्रतिदिन  देख रहे हैं ,हमें रौशनी दे रहा है , ऊष्मा दे रहा है , स्फूर्ति दे रहा है। लेकिन दूसरा रूप जिसे हम सूक्ष्म रूप कहते हैं , सविता कहते हैं , आदित्य कहते हैं ,गायत्री मन्त्र के माध्यम से  हमारे शरीर को प्राणऊर्जा प्रदान कर रहा है। कल्पना कीजिये अगर सूर्य भगवान न हों तो सृष्टि कैसी होगी।  न कोई प्राणी होगें ,न photosynthesis होगा ,न वनस्पति होंगी , सब कुछ एक दम रुक सा जायेगा। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के देशों में जहाँ  रात और दिन का बहुत बड़ा अंतर् होता है , कैसा वातावरण होता है ,कैसा जीवन है -कभी इस  विषय पर भी चर्चा करेंगें।    

गायत्री  मंत्र को देवता के आधार पर सावित्री मंत्र भी कहा जाता हैं, क्योंकि इसके देवता सविता हैं।  सामान्यरूप से सविता सूर्य का ही नामान्तर ( name -sake ) है, जो मानव  जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले देवता हैं। अधिक गहराई में जाने पर सविता को सूर्य-मण्डल के विभिन्न देवोँ में से एक माना जा सकता हैं।  गायत्री मंत्र हमारी परम्परा में सर्वाधिक पवित्र और उत्प्रेरक (catalyst ) मंत्र हैं।  इसका जप करते समय भगवान सूर्य के अरुण ( सूर्य की लाली ) का ध्यान करना चाहिए। जप करते समय मंत्र के अर्थ का भलीभांति मनन करना चाहिए। जैसा कि महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्र में कहा है –‘तज्जपस्तदर्थभावनाम!’ किसी भी मंत्र के जप का अभिप्राय है,  बार-बार उसके अर्थ की भावना करना, उसे मन और मस्तिष्क में बैठाना।  परम्परा के अनुसार इस मंत्र का साक्षात्कार  सर्वप्रथम महर्षि विश्वामित्र ने किया था।  वही इस मंत्र के द्रष्टा अथवा ऋषि हैं।  वैदिक पारम्परिक मान्यता के अनुसार वेद-मन्त्रों में कोई रचयिता नहीं हैं।  सृष्टि के प्रारम्भ , समाधि अथवा गंभीर ध्यान की अवस्था में ये ऋषियों के अंतःकरण में स्वयं प्रकट हुए थे।  जिस ऋषि ने जिस मंत्र का दर्शन किया वही उसका द्रष्टा हो गया।  इस मंत्र का जप विश्व भर में कोई भी अनुयायी कर सकता हैं, क्योंकि बुद्धि की प्रेरणा की आवकश्यकता तो सभी सामान रूप से अनुभव करते हैं। 

गुरुदेव का उध्बोधन, हमारी रिसर्च : 

देवियो! भाइयो! मेरे पिताजी गायत्री मंत्र की दीक्षा दिलाने के लिए मुझे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में महामना मालवीय जी के पास ले गए। महामना मालवीय जी और हमारे पिताजी सहपाठी थे। उनका विचार था कि लड़के का यज्ञोपवीत संस्कार और गायत्री मंत्र की दीक्षा महामना मालवीय जी से कराई जाए। पिताजी मुझे वहीं ले गए, तब मैं दस-ग्यारह वर्ष का रहा होऊँगा। मालवीय जी के मुंह से जो वाणी सुनी, वह अभी तक मेरे कानों में गूंजती है। हृदय के पटल और मस्तिष्क पर वह जैसे लोहे के अक्षरों से लिख दी गई है, जो कभी मिट नहीं सकेगी। उनके वे शब्द मुझे ज्यों के त्यों याद हैं, जिसमें उन्होंने कहा था-“भारतीय संस्कृति की जननी गायत्री है। यज्ञ भारतीय धर्म का पिता है। इन माता-पिता की हम सभी को श्रवणकुमार की तरह से कंधे पर रखकर सेवा करनी चाहिए।” __गायत्री मंत्र बीज है और इसी से वृक्ष के रूप में सारा-का-सारा भारतीय धर्म विकसित हुआ है। बीज छोटा-सा होता है बरगद का

और उसके ऊपर वृक्ष इतना बड़ा विशाल होता हुआ चला जाता है। गायत्री  मंत्र से चारों वेद बने। वेदों के व्याख्यान स्वरूप ब्रह्माजी ने, ऋषियों ने और ग्रंथ बनाए, उपनिषद् बनाए, स्मृतियाँ बनाईं,  आरण्यक बनाए। इस तरह हिंदू धर्म का विशालकाय वाङ्गमय बनता चला गया। हिंदू धर्म की जो कुछ भी विशेषता दिखाई पड़ती है साधनापरक, ज्ञानपरक अथवा विज्ञानपरक, वह सब गायत्री के बीज से ही विकसित हुई है। सारे-का-सारा विस्तार गायत्री बीज से ही हुआ है। बीज वही है, टहनियाँ बहुत सारी हैं। हिंदू धर्म में चौबीस अवतार हैं। ये चौबीस अवतार क्या हैं? एक-एक अक्षर गायत्री का एक-एक अवतार के रूप में, उनके जीवन की विशेषताओं के रूप में, उनकी शिक्षाओं के रूप में है। हर अवतार गायत्री का  एक अक्षर है , जिसमें क्रियाएँ और लीलाएँ करके दिखाई गई हैं। उनके जीवन का जो सार है वही एक-एक अक्षर गायत्री का है। हिंदू धर्म के दो अवतार मुख्य हैं-एक का नाम राम और दूसरे का कृष्ण है। रामचरित का वर्णन करने के लिए वाल्मीकि रामायण लिखी गई जिसमें 24000  श्लोक हैं और प्रति 1000  श्लोक के पीछे गायत्री मंत्र के एक अक्षर का संमुट लगा हुआ है । श्रीकृष्ण चरित भागवत में लिखा है। श्रीमद्भागवत में भी चौबीस हजार श्लोक हैं और एक हजार श्लोक के पीछे गायत्री मंत्र के एक अक्षर का संपुट लगा हुआ है अर्थात गायत्री मंत्र के एक अक्षर की व्याख्या एक हजार श्लोकों में। रामचरित हो अथवा कृष्ण चरित, दोनों का वर्णन इस रूप में मालवीय जी ने किया कि मेरे मन में बैठ गया कि यदि ऐसी विशाल गायत्री है, तो मैं उसकी  खोज करूँगा  और अनुसंधान करके लोगों को यह बताकर रहँगा कि ऋषियों की बातें, शास्त्रों की बातों में कितनी सच्चाई है , यं  फिर कोई सच्चाई है भी कि  नहीं। 

सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।”  जय गुरुदेव

क्रमशः जारी -To be continued 

Leave a comment

वह अविस्मरणीय दिवस  गायत्री जयंती 2 जून 1990 

वह अविस्मरणीय दिवस  गायत्री जयंती 2 जून 1990 

गुरुदेव के जीवन-यज्ञ की पूर्णाहुति : अखंड ज्योति मई 2002  पृष्ठ 49 -50 

गुरुदेव ने अपना महाप्रयाण अपनी स्वेच्छा से किया ,यह तो हमारे परिजनों को विदित ही है परन्तु जो  दिन चुना वह भी अतिपावन।  एक तो उस दिन गंगा दशहरा का पर्व था और दूसरा गायत्री जयंती।  गंगा दशहरा का दिन वह दिन है जब स्वर्ग से उतर कर माँ गंगा महाकाल भगवान शिव  की  जटाओं में से  इस धरती पर अवतरित हुई थी। दूसरा है गायत्री जयंती। गायत्री वेदमाता कही जाती है  प्रजापति   ब्रह्मा के मुख से चारों  वेद गायत्री मन्त्र के रूप में प्रकट हुए। गायत्री जयंती के इन पुण्य पलों में युग शक्ति के प्रेरक प्रवाह  जन-मन में आज भी  है। भावनाएँ उन भगीरथ को ढूँढ़ रही है, जिनके महातप से गायत्री की प्रकाश धाराएँ बहीं। महाशक्ति जिनके प्रचंड तप से प्रसन्न होकर इस युग में अवतरित हुई। वेदमाता के उन वरदपुत्र को भावनाएँ विकल हो खोज रही हैं। आज युग के उन तप-सूर्य की यादें उन्हीं की सहस्र रश्मियों की तरह मन-अंतः करण को घेरे हैं। 

यादों के इस उजाले में वर्ष 1990 की गायत्री जयंती (2 जून) की भावानुभूति प्रकाशित हो उठती है  जिस दिन एक युग का पटाक्षेप  हुआ था। पटाक्षेप का अर्थ  नाटक का पर्दा गिरना होता है। सच ही तो है गुरुदेव अपनी नाटक लीला का पर्दा गिरा कर  साकार ( shape  से निराकार (shapeless ) हो गए थे।  आज ही वह दिन था जब गुरुदेव अपने अनेकों भावमय  भक्तों की भावनाओं में विलीन हुए थे। उस दिन न जाने कितनी भावनाएँ उमगी थीं, तड़पी थीं, छलकी थीं, बिखरी थीं। इन्हें बटोरने वाले, सँजोने वाले अंतःकरण के स्वामी इन्हीं भावनाओं में ही कहीं अंतर्ध्यान हो गए थे।

 सब कुछ प्रभु की पूर्व नियोजित योजना थी। महीनों पहले उन्होंने इसके संकेत दे दिए थे। इसी वर्ष वसंत पर्व  (31 जनवरी) उन्होंने सबको बुलाकर अपने मन की बात कह दी थी। दूर-दूर से अगणित शिष्यों-भक्तों ने आकर उनके चरणों में अपनी व्याकुल भावनाएँ उड़ेली थीं। सार्वजनिक भेंट और मिलन का यहीं अंतिम उपक्रम था। तब से लेकर लगातार सभी के मन में ऊहापोह थी। सब के सब व्याकुल और बेचैन थे। शाँतिकुँज के परिसर में ही नहीं, शाँतिकुँज के बाहर भी सबका यही हाल था। भारी असमंजस था, अनेकों मनों में प्रश्न उठते थे, 

“क्या गुरुदेव सचमुच ही शरीर छोड़ देंगे ? “

अंतर्मन की गहराइयों से जवाब उठता था- हाँ, पर ऊपर का मोहग्रस्त मन थोड़ा अकुलाकर सोचता, हो सकता है सर्वसमर्थ गुरुदेव अपने भक्तों पर कृपा कर ही दें और अपना देह वसन छोड़े। मोह के कमजोर तंतुओं से भला भगवान की  योजनाएँ कब बंधी हैं ! विराट् भी भला कहीं क्षुद्र बंधनों में बंधा करता है।  गायत्री जयंती से एक दिन पहले रात में, यानि  1 जून 1990 की रात में किसी कार्यकर्त्ता ने स्वप्न देखा :

हिमाच्छादित हिमालय के श्वेत हिमशिखरों पर सूर्य उदय हो रहा है। प्रातः के इस सूर्य की स्वर्णिम किरणों से बरसते सुवर्ण से सारा हिमालय स्वर्णिम आभा से भर जाता है, तभी अचानक परमपूज्य गुरुदेव हिमालय  पर नजर आते हैं, एकदम स्वस्थ-प्रसन्न । उसकी तेजस्विता की प्रदीप्ति कुछ अधिक ही प्रखर दिखाई देती है। आकाश में चमक रहे सूर्यमंडल में माता गायत्री की कमलासन पर बैठी दिव्य मूर्ति झलकने लगती है। एक अपूर्व मुस्कान है माँ के चेहरे पर। वह कोई संकेत करती हैं। और परमपूज्य गुरुदेव सूर्य की किरणों के साथ  ऊपर उठते हुए माता गायत्री के पास पहुँच जाते हैं। थोड़ी देर तक गुरुदेव की दिव्य छवि माता के हृदय में हलकी-सी दिखती है। फिर वेदमाता गायत्री एवं गुरुदेव सूर्यमंडल में समा जाते हैं। सूर्य किरणों से उनकी चेतना झरती रहती है। देखने  वाले का यह स्वप्न कुछ ही क्षणों में सुबह की दिनचर्या में विलीन हो गया। उसी दिन ब्रह्मवर्चस् के एक कार्यकर्त्ता भाई के संबंधी की शादी थी। वंदनीया माताजी ने दो-एक दिन पहले से ही निर्देश दिया था कि शादी सुबह ही निबटा ली जाए। सामान्य क्रम में शाँतिकुँज में यज्ञमंडप में शादियाँ दस बजे प्रारंभ होती हैं, लेकिन उस दिन के लिए के लिए माताजी का आदेश कुछ अलग था। गायत्री जयंती के दिन यह शादी काफी सुबह संपन्न हुई। अन्य कार्यक्रम भी यथावत् संपन्न हो रहे थे। वंदनीया माताजी प्रवचन करने के लिए प्रवचन मंच पर पधारी थीं। प्रवचन से पहले संगीत प्रस्तुत करने वाले कार्यकर्त्ता जगन्माता गायत्री की महिमा का भक्तिगान कर रहे थे-’माँ तेरे चरणों में हम शीश झुकाते हैं,’ गीत की कड़ियाँ समाप्त हुई। माताजी की भावमुद्रा में हलके से परिवर्तन झलके। ऐसा लगा कि एक पल के लिए वह अपनी अंतर्चेतना के किसी गहरे अहसास में खो गई, लेकिन दूसरे ही पल उनकी वाणी से जीवन-सुधा छलकने लगी।  प्रवचन के बाद प्रणाम का क्रम चलना था। माँ अपने आसन पर अपने बच्चों को ढेर सारा प्यार और आशीष बाँटने के लिए बैठ गई। प्रणाम की पंक्ति चल रही थी, माताजी स्थिर बैठी थीं। उनके सामने अस्तित्व से वात्सल्य-संवेदना झर रही थी।प्रणाम समाप्त होने के कुछ ही क्षणों बाद शाँतिकुँज एवं ब्रह्मवर्चस् का कण-कण, यहाँ निवास करने वाले सभी कार्यकर्त्ताओं का तन-मन-जीवन बिलख उठा। अब सभी को बता दिया गया था कि 

 “गुरुदेव ने देह छोड़ दी है।”

अगणित शिष्य संतानों एवं भक्तों के प्रिय प्रभु अब देहातीत हो गए हैं। काल के अनुरोध पर भगवान महाकाल ने अपनी लोक-लीला का संवरण कर लिया है। जिसने भी, जहाँ पर यह खबर सुनी, वह वहीं पर अवाक् खड़ा रह गया। एक पल के लिए हर कोई निःशब्द, निस्पंद हो गया। सबका जीवन-रस जैसे निचुड़ गया। थके पाँव उठते ही न थे, लेकिन उन्हें उठना तो था ही। असह्य वेदना से भीगे जन परमपूज्य गुरुदेव के अंतिम दर्शनों के लिए चल पड़े।

उस समय के  शाँतिकुँज के कंप्यूटर कक्ष के ऊपर जो बड़े हॉल के रूप में परमवंदनीय माताजी का कक्ष है, वहीं पर गुरुदेव का पार्थिव शरीर रखा गया था। आज कल तो कंप्यूटर कक्ष भोजनालय के सामने आ  गया है  महायोगी की महत् चेतना का दिव्य आवास रही, उनकी देह आज चेतनाशून्य थी। पास बैठी हुई वंदनीया माताजी एवं परिवार के सभी स्वजन वेदना से विकल और व्याकुल थे। 

माताजी की अंतर्चेतना को तो प्रातः प्रवचन में ही गुरुदेव के देह छोड़ने की बाते पता थी तब से लेकर अब तक वह अपने कर्तव्यों में लीन थीं। सजल श्रद्धा की सजलता जैसे हिमवत् हो गई थी, अब वह महावियोग के ताप से पिघल रही थी। अंतिम प्रणाम भी समाप्त हो गया, परंतु कुछ लोग अभी हॉल में रुके थे। प्रणाम करके नीचे उतर रहे एक कार्यकर्ता को एक वरिष्ठ भाई ने ही इशारे से रोक लिया। परमपूज्य गुरुदेव की पार्थिव देह को उठाते समय माताजी ने उसे बुलाया एवं भीगे स्वरों में कहा

  “बेटा! तू भी कंधा लगा ले।” 

माँ के इन स्वरों को सुनकर उसका रोम-रोम कह उठा ,”धन्य हो माँ! वेदना की इस विकल घड़ी में भी तुम्हें अपने सभी बच्चों की भावनाओं का ध्यान है।”

सजल श्रद्धा एवं प्रखर प्रज्ञा के पास आज जहाँ चबूतरा बना है, तब वहाँ खाली जगह थी। वहीं चिता के महायज्ञ की वेदिका सजाई गई थी। ठीक सामने स्वागत कक्ष के पास माताजी तख्त पर बिछाए गए आसन पर बैठी थीं। पास ही परिवार के अन्य सभी सदस्य खड़े थे। आस-पास कार्यकर्त्ताओं की भारी भीड़ थी। सभी की वाणी मौन थी, पर हृदय मुखर थे। हर आँख अश्रु का निर्झर बनी हुई थी। आसमान पर भगवान् सूर्य इस दृश्य के साक्षी बने हुए थे। कण-कण में बिखरी माता गायत्री की समस्त चैतन्यता उसी दिन उसी स्थल पर सघनित हो गई थी। भगवान सविता देव एवं उनकी अभिन्न शक्ति माता गायत्री की उपस्थिति में गायत्री जयंती के दिन यज्ञपुरुष गुरुदेव अपने जीवन की अंतिम आहुति दे रहे थे। 

   ” यह उनके जीवन-यज्ञ की पूर्णाहुति थी।”

 आज वह अपने शरीर को ‘इदं न मम् ‘ कहते हुए यज्ञवेदी में अर्पित कर चुके थे। यज्ञ ज्वालाएँ धधकीं। अग्निदेव अपने समूचे तेज के साथ प्रकट हुए। वातावरण में अनेकों की अनेक सिसकियाँ एक साथ मंद रव के साथ विलीन हुईं। समूचे परिवार का कण-कण और भी अधिक करुणार्द्र हो गया, सभी विह्वल खड़े थे। परमतपस्वी गुरुदेव का तेज अग्नि और सूर्य से मिल रहा था। सूर्य की सहस्रों रश्मियों से उनकी चेतना के स्वर झर रहे थे। कुछ ऐसा लग रहा था, जैसे वह स्वयं कह रहें हों,

“तुम सब परेशान न हो, मैं कहीं भी 

नहीं हूँ, यहीं पर हूँ और यहीं पर

रहूँगा। मैंने तो केवल पुरानी पड़ गई 

देह को छोड़ा है, मेरी चेतना तो यहीं 

पर है। वह युगों-युगों तक यहीं रहकर 

यहाँ रहने वालों को, यहाँ आने वालों 

 को प्रेरणा व प्रकाश देती रहेगी। मैं 

 तो बस साकार से निराकार हुआ हूँ, 

 पहचान सको तो मुझे शाँतिकुँज के 

 क्रियाकलापों में पहचानो! ढूँढ़ो!” 

वर्ष 1990 की गायत्री जयंती में साकार से निराकार हुए प्रभु के इन स्वरों की सार्थकता इस (2020 ) गायत्री जयंती की पुण्य वेला में प्रकट हो रही है। हम सबको उन्हें शाँतिकुँज रूपी उनके विराट् शरीर की गतिविधियों में पाना है और स्वयं को इनके विस्तार के लिए अर्पित कर देना है।आइये  हर  गायत्री जयंती की तरह इस बार भी हम सब संकल्प लें। 

जय गुरुदेव 

Leave a comment

15 वर्षीय ग्रामीण  बालक सरविन्द  पाल के ऊपर परमपूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद , भाग 2 

31 अगस्त 2021 का ज्ञानप्रसाद- 15 वर्षीय ग्रामीण  बालक सरविन्द  पाल के ऊपर परमपूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद , भाग 2 

मित्रो, आज का लेख सरविन्द  पाल  जी के गायत्री महायज्ञ के संदर्भ में दूसरा और अंतिम भाग है।  हमने बहुत प्रयास किया है कि आपके समक्ष प्रस्तुत करने से पहले इस लेख में कोई भी त्रुटि दर्शित न हो लेकिन फिर भी अगर अनजाने में कोई भी त्रुटि  रह गयी हो तो हम क्षमा प्रार्थी हैं। लेख के दोनों भागों  में लेखनी का कमाल तो सरविन्द   भाई  साहिब का ही है परन्तु  हमने कुछ एक स्थानों पर अपने विवेक के अनुसार   एडिटिंग की है। कल वाले लेख पर अनुराधा बेटी और आयुष बेटे ने कमेंट करके अपने पापा के प्रति गौरव का आभास व्यक्त किया है – हो भी  क्यों न –  इतनी छोटी आयु में यह कोई छोटा कार्य नहीं है।  हमें सविन्दर जी से अवश्य ही प्रेरणा लेनी चाहिए।  

हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि हमारे सहकर्मी सरविन्द  जी के इस पुरुषार्थ से अवश्य ही प्रोत्साहित होंगें और आने वाले दिनों में इसी तरह के लेख लिख कर भेजेंगें।  

कल वाले लेख को ही आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत है पार्ट 2 

_______________    

अच्छे मार्गदर्शक की खोज :

उस समय हमारा विद्यार्थी जीवन था, उम्र लगभग 14-15 वर्ष की थी।  अध्यात्म में हमारी रुचि बाल्यावस्था से थी,हमारे बुजुर्गो में हमारे परदादा आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे वह हमेशा स्नान-ध्यान के पश्चात ही भोजन ग्रहण करते थे, हम भी उनके साथ नकल किया करते थे तो घर में सब लोग मना किया करते थे, कहते थे कि अभी तुम्हारी यह सब-कुछ करने की उम्र नहीं है, तुम्हारा भविष्य खराब हो जाएगा लेकिन हम किसी की बात नहीं मानते थे।  हम सिर्फ अपने परदादा की बात मानते थे और वह हमसे बहुत प्यार करते थे। जब तक वह  जीवित रहे कोई ज्यादा आपत्ति नहीं हुई।उनके  स्वर्गवास के पश्चात्  हमारे नियम-संयम पर प्रतिबंध लग गया। अब हम सबकी तरह परिवार के माहौल में ढल गए।   प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा भी चल रही थी फिर भी अध्यात्म से रुचि कम नहीं हुई , कहीं भी सत्संग होता तो हम चोरी छिपे  सुनने जरूर जाते , जानकारी हो जाने पर चाहे मार ही  क्यों न पड़ जाती।  यह सिलसिला चलता रहता था लेकिन  अंतःकरण में  किसी अच्छे मार्गदर्शक की तलाश रहती थी और फिर मिला आदरणीय डॉक्टर राम कुमार गुप्ता साहिब का सहयोग। 

आदरणीय डॉक्टर गुप्ता साहिब  जी से हमारी पहली  मुलाकात  चिकित्सा के दौरान हुई और उन्होंने हमसे हमारे विषय में जानकारी ली, पढ़ाई-लिखाई के बारे में भी पूछताछ की तो हमने सारी जानकारी दी, वह हमसे बहुत प्रभावित हुए।  तत्पश्चात उन्होंने हमें आध्यात्मिक चर्चा में परम पूज्य गुरुदेव के विषय में, उनके मिशन के विषय में व गायत्री परिवार के विषय में बहुत कुछ बताया।  उस दिन से आदरणीय डॉक्टर गुप्ता जी से हमारी आध्यात्मिक दोस्ती हो गई और फिर हम हमेशा उनकी क्लीनिक जाने लगे और घंटो परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक विचारों व मिशन के कार्यक्रमों की चर्चा किया करते। इन चर्चाओं से  हम आनंदमय हो जाते और  हमें बहुत ही अच्छा लगता।  हम आदरणीय डाक्टर गुप्ता जी से परम पूज्य गुरुदेव के बारे  में हर  प्रकार की जानकारी लिया करते थे।   सर्वप्रथम उन्होंने  हमें आदिशक्ति जगत् जननी माँ गायत्री  के महामंत्र की उपासना करने को कहा।  उन्होंने कहा  इस महामंत्र के जाप करने से विद्या आएगी और तुम्हें वह सब-कुछ मिलेगा जो तुम चाहते हो।  चाहत तो हमारी बहुत बड़ी थी, वह भी सांसारिक सुखों की। हम आदरणीय डाक्टर गुप्ता जी के कथनानुसार प्रातःकाल गायत्री महामंत्र की उपासना करने लगे, एक खूबी हमारे पास प्राकृतिक थी, वह थी प्रातःकाल ब्रह्म मुहुर्त में जागना और शौचादि-क्रिया से निवृत्त होकर उसी समय स्नान कर अपनी प्रातःकालीन पढ़ाई में बैठ जाना, वही नियम आज भी कायम है। हमने डॉक्टर साहिब से परमपूज्य गुरुदेव का  कार्यकम करवाने की जिज्ञासा  रखी।  डॉक्टर साहिब ने इस योजना के बारे में हमारे परम आदरणीय श्री रामबहादुर कुदैशिया जी पूर्व व प्रथम प्रधानाचार्य ,आदर्श इन्टर कालेज कोड़ा जहानाबाद  से अवगत कराया।   कुदेशिया जी ने  नवलकिशोर मिश्रा जी से बात कर हमें तीन दिवसीय पंच कुंडीय गायत्री महायज्ञ का कार्यक्रम दिलवा दिया जिसकी  तिथि भी दिनांक 13,14 व 15 जनवरी 1995 के लिए निर्धारित हो गई। 

तो ऐसी है माँ गायत्री की कृपा ,परमपूज्य  गुरुदेव द्वारा रचा गया यह अद्भुत दृश्य अवश्य ही अविश्वसनीय  था ,तीन पीढ़ीयां एक साथ एक ही मंच पर, एक ही पावन कार्य के लिए , एक ही समर्पण के साथ एकत्र  हुईं। इतने छोटे से बच्चे से  जिसकी  अभी तो  पात्रता भी विकसित नहीं हुई होगी, इतना बड़ा  कार्य करवाना अपनेआप में  अविश्वसनीय, आश्चर्यजनक तो लगता ही है परन्तु है बिलकुल सत्य। गुरुदेव हमारा नमन ,वंदन स्वीकार  करें,अपने चरणों में स्थान दें।   

पंच कुण्डीय गायत्री महायज्ञ में अति प्रसन्नता का माहौल था।  कार्यक्रम के व्यवस्थापक परम आदरणीय श्री रामबहादुर कुदैशिया जी, कार्यक्रम का उद्घाटन कर रहे थे , माननीय राकेश सचान जी विधायक घाटमपुर कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे,हमारे शैक्षिक गुरु प्रधानाचार्य श्री जयनारायण पाल जी और हम सरविन्द  पाल एक साथ एक मंच में उपस्थित होने का संयोग परम पूज्य गुरूदेव के आशीर्वाद से अदभुत था।  मंच में उपस्थित चार प्राणवान आत्माओ में से तीन आत्माए महान थी, जिनमें  सबसे श्रेष्ठ व वरिष्ठ परम आदरणीय  श्री रामबहादुर कुदैशिया जी थे जो विधायक राकेश सचान जी और  प्रधानाचार्य श्री जयनारायण पाल के गुरु थे।  इतना सुखद एवं रुचिकर दृश्य कि  शब्द कम पड़  गए हैं।   कार्यक्रम का माहौल  एकदम ही  बदल गया था।  चारों तरफ आनंद ही आनंद था क्योंकि कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोग उन महान आत्माओ के सम्बन्ध से परिचित थे I माननीय विधायक श्री राकेश सचान जी के कर-कमलों द्वारा कार्यक्रम सम्पन्न किया गया।  सबने अपने-अपने विचार रखे , हम सबका मार्गदर्शन कर उत्साहवर्धन किया।  कार्यक्रम परम पूज्य गुरूदेव की कृपा से तीनों दिन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।  कार्यक्रम में हमारे पूरे गांव का व आस-पास के गाँव का बहुत अच्छा सहयोग व समर्थन मिला जिसकी हमें कभी कल्पना भी नहीं थी कि  हम पहली बार और इतनी छोटी आयु में , विद्यार्थी जीवन में इतना बड़ा कार्यक्रम सम्पन्न करवा पायेंगें। लेकिन यह सब परम पूज्य गुरुदेव की प्रेरणा व आशीर्वाद था कि उन्होंने  हमें इतनी कम उम्र में इतना विशाल  दायित्व सौंपा, यह हमारे लिए परम्  सौभाग्य की बात है।  हम अपने गाँव में अकेले ही गायत्री परिवार में थे।  हमारे गाँव के आस-पास दूर-दूर तक लोग मिशन से अपरिचित थेI कार्यक्रम का दायित्व अपने कन्धों पर  लेने के उपरांत ही अपने गाँव में सभी लोगों से सम्पर्क स्थापित किया तो  हमारे गाँव के मुखिया व ग्राम पंचायत प्रधान श्री मद्दीलाल पाल  जी का बहुत बड़ा सहयोग मिला था।  गाँव के और सम्भ्रान्त लोग जैसे कृष्ण कुमार पाल, दिलबहार पाल, क्षेत्रपाल, राजेन्द्र कुमार पाल, रामशंकर पाल भरुआ सुमेरपुर जिला हमीरपुर एवं समस्त ग्रामवासियों का भी बहुत अच्छा सहयोग मिला।  कार्यक्रम में प्रथम दिन थोड़ी समस्या  आयी, समापन के बाद शाम को व्यवस्था सम्पन्न करने में  भी परेशानी आयी। उस दिन रात को भयंकर कुहरा था लेकिन परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से समस्या का समाधान आसानी से हो गया।  नवल किशोर मिश्रा जी के हाथ कार्यक्रम की कमान थी , कार्यक्रम तीनो दिन सुचारू रूप से चला, फिर किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं आयी।  हमें सम्पूर्ण विश्वास हो गया कि इस तरह परम पूज्य गुरूदेव द्वारा रचित कार्य  सम्पन्न  होता है , उनके आशीर्वाद से कोई कमी नहीं रहती।  

पंच कुण्डीय  गायत्री महायज्ञ में सहकर्मियों का सहयोग :

पंच कुण्डीय गायत्री महायज्ञ में हमारी माताओं -बहिनों  का भी बहुत बड़ा सहयोग रहा।  कार्यक्रम में भोजन व्यवस्था उन्हीं के हाथों में थी जिसके कारण भोजन व्यवस्था में कोई कमी आ ही नहीं पायी। श्रीमती राजपती पाल, श्रीमती फूलमती पाल, श्रीमती सावित्री देवी, कुमारी रानी पाल, सरोज देवी पाल, सुनीता देवी, फूलन देवी, सुषमा देवी, रूबी देवी, अनीता देवी, शशी देवी, साधना सिंह, सुशीला देवी, नीलम कुशवाहा आदि आदि का कार्यक्रम में बहुत बड़ा योगदान था जो बहुत ही सराहनीय व प्रशंसनीय था।  माताओं और बहनों की इतनी लंबी  सूची है कि सबका विवरण देना असंभव सा लग रहा है 

युगतीर्थ शांतिकुंज  से आयी गायत्री परिवार की टोली का भी बहुत बड़ा सहयोग था।  दो दिन पहले से ही आकर, घूम-घूमकर आस-पास के गाँवों में कार्यक्रम का प्रचार-प्रसार किया जिसमें कुछ प्रमुख नाम हैं – बाबूराम कश्यप, चन्द्रिका कुशवाहा, अनिल कुशवाहा, रमेश सचान, रामबाबू शिकौहला, डा. राम प्रकाश पाल सूलपुर, विमल पाल असेनियाँ,रामजीवन पाल भर्थुवा नेवादा, रामआसरे बुढ़ावां। कार्यक्रम में भीड़ बहुत थी  जिसको देखते हुए माननीय विधायक राकेश सचान जी ने पुलिस प्रशासन की व्यवस्था की थी व आर्थिक सहयोग भी दिया था।  कई अधिकारियों व ग्राम प्रधानों का भी सहयोग था।  हमारे ब्लॉक भीतरगांव के ए. डी. ओ. , पंचायत माननीय श्रीराम गुप्ता जी, जहानाबाद से डा.प्रभात कुमार निगम, योगेन्द्र कुमार सक्सेना अंग्रेजी प्राध्यापक  आदर्श इन्टर कालेज कोड़ा जहानाबाद , हमें गायत्री परिवार में लाने वाले परम पूज्य आदरणीय डाक्टर रामकुमार गुप्ता जी। परम पूज्य गुरूदेव के कार्यक्रम में शामिल और भी भाई-बंधु, माताएं-बहनें  आदि सभी प्राणवान आत्माओ को ह्रदय से साधुवाद, हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई देते हुए सादर प्रणाम व नमन-वंदन करता हूँ जिनका तहेदिल से स्नेह्,प्यार व सहयोग मिला। सभी को  बारम्बार स्वागत व अभिनन्दन करता हूँ।  

परम पूज्य गुरूदेव, वन्दनीया माता जी व आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ भगवती गायत्री माता की कृपा सदैव इन सब पवित्र आत्माओ पर  सदैव बरसती रहे,यही हमारी परम पूज्य गुरूदेव से  मंगल कामना है।  साथ ही परम आदरणीय अरुण भैया जी को व आनलाइन ज्ञानरथ के सभी पाठकगण व सहकर्मी भाइयों को सादर प्रणाम व हार्दिक शुभकामनाएँ जो ज्ञानरथ के माध्यम से परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक विचारों को जन-जन तक पहुंचाने में निस्वार्थ भाव से अपना पूरा सहयोग दे रहे हैं।  सभी को हमारी तरफ से हार्दिक अभिनन्दन, सभी का  हार्दिक स्वागत।  

अपनी लेखनी को विराम देते हुए आप सभी से अपनी हर किसी गलती के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।  धन्यवाद।   जय गुरुदेव जय माता दी सादर प्रणाम I 

सरविन्द कुमार पाल संचालक गायत्री परिवार शाखा करचुलीपुर कानपुर नगर उत्तर प्रदेश

____________________________________________________

तो मित्रो सविंदर कुमार जी के विस्तृत विवरण के उपरांत हमारे कहने के लिए तो कुछ भी बाकी नहीं रहता।  हम इस शुभकामना के साथ  अपनी लेखनी को विराम देते हैं :  ” सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।”  जय गुरुदेव

Leave a comment

15 वर्ष के बालक सरविंदर  पाल के ऊपर परमपूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद , भाग 1 

30 अगस्त 2021 का ज्ञानप्रसाद -15 वर्ष के बालक सरविंदर  पाल के ऊपर परमपूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद , भाग 1 

मित्रो लेख आरम्भ करने से पूर्व हम सबको बधाई देना चाहते हैं जिन्होंने महेंद्र शर्मा जी की वीडियो जिसका शीर्षक था “ कौन बताएगा गुरुदेव के तप का प्रमाण” को अविश्वसनीय रिस्पांस दिलवाया। इस  वीडियो को   3200  के करीब व्यूज और 300 से ऊपर कमैंट्स मिले हैं और अभी भी परिजन देख रहे हैं और respond कर रहे हैं। इन सारे नंबरों का श्रेय आप सबको ,हमारे समर्पित साधकों को ,सहकर्मियों को जाता है। धन्यवाद् -धन्यवाद् एवं धन्यवाद्। 

अब आती है शीर्षक की – कौन बताएगा गुरुदेव के तप का प्रमाण – आदरणीय सरविंदर पाल भाई साहिब  जैसे समर्पित सहकर्मी बताएंगें , जिन्हे हम अब तो अच्छी प्रकार जानते हैं।  30 मार्च का दो पार्ट का यह लेख आप सबके लिए  केवल इसी  धारणा  के साथ रिपीट  रहे हैं  कि जिस बालक को परमपूज्य गुरुदेव ने केवल 15 वर्ष की आयु में अपनी उपस्थिति और शक्ति का  आभास दिलवा दिया वह पुरुष भला कैसे गुरुदेव को भूल पायेगा  और भाग -भाग कर सभी को बताएगा -मेरा गुरु ऐसा है। हमें अपने गुरु को आश्वासन देने की कोई आवश्यकता नहीं  क्योंकि हमारा सबका समर्पण – सरविंदर पाल जी  जैसा ही है। महेंद्र भाई  साहिब बता  रहे थे: “गुरुदेव कहते थे मुझे तुम लोगों  पर  विश्वास नहीं है, आप बताओगे नहीं कि  मेरा गुरु कैसा है” तो मित्रो गुरुदेव का साहित्य ,गुरुदेव के विचार गुरुदेव के अंगसंग रहे सहकर्मी ,महान  विभूतिआँ जिन्हे हम विश्व के कोने -कोने से ढूंढ कर आपके समक्ष ला रहे हैं , गुरुदेव के बारे में बताने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं – यही अपने गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा है।       

यह अविस्मरणीय संस्मरण सरविंदर पाल जी के जीवन के वर्ष  1995 का है  जब वह केवल 15 वर्ष के थे और हाई  स्कूल के विद्यार्थी  थे। आज का  लेख दो भागों का प्रथम भाग  है, कल इसका दूसराऔर अंतिम भाग प्रस्तुत करेंगें। आशा  करते हैं कि इन दोनों लेखों को अत्यंत श्रद्धा से पढ़ा जायेगा और चिंतन तो किया ही जायेगा कि ऐसी कौन सी दिव्य शक्ति  थी जिसने प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद तीन पीढ़ियों के साधकों को एक ही स्थान पर, एक ही दिन  इकठा किया और सरविंदर जी ने  26 वर्ष तक यह विवरण कैसे लिख कर रखा ,संभाल  कर रखा।  हमें तो यह भी याद नहीं रहता सुबह नाश्ते में क्या खाया था।  – नतमस्तक है हम।  

करचुलीपुर ( उत्तर प्रदेश ) नामक  जिस ग्राम की यह घटना है आज भी बहुत ही  छोटी जगह है।  हमने जिज्ञासावश गूगल में देखना चाहा तो पता चला कि 2011 की जनसंख्या केआधार पर केवल 228  घर हैं और  1230  के करीब लोग रहते हैं।   सरविंदर  जी ने  हमें सभी घटना कर्मों को पूर्ण विस्तार से लिख कर भेजा था, हमने कई बार पढ़ा था  और और आज फिर पढ़कर एडिट करने के उपरांत ही आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। अपने विवेक के अनुसार कुछ एडिटिंग की है, कुछ औरअधिक पंक्तियाँ भी जोड़ी हैं।  आज वाला लेख 30 अगस्त वाले लेख का ही edited version है।  यह हम इसलिए करह रहे हैं कि अगर आपने वोह वाला लेख पहले पढ़ा भी है तो भी इसको अवश्य पड़ें और कमेंट करें। एडिटिंग में अगर कोई त्रुटि हो गयी हो तो क्षमा प्रार्थी  हैं। 

हम आशा करते हैं कि इस लेख को पढ़ने के उपरांत ऑनलाइन ज्ञानरथ के और भी सहकर्मी आगे आयेंगें और अपने संस्मरण ,कथाएं आदि लिखने में प्रोत्साहित होंगें। 

___________________________________

सरविंदर पाल  भाई साहिब  के शब्दों में :

प्रातःकाल ब्रम्ह्मुहुर्त में उठ जाने की प्रक्रिया हमारी आज भी अनवरत चल रही है इसमें किसी भी तरह की कोई लापरवाही नहीं है उसी क्रम में आदरणीय डाक्टर गुप्ता  साहब  जी हमारा मार्गदर्शन करते रहते थे I हमारा सपना साकार दिखता नजर आ रहा था पूज्य गुरूदेव के प्रति हमारी निष्ठा व श्रद्धा-विश्वास निरंतर बढ़ रही थी धीरे-धीरे परम पूज्य गुरूदेव के प्रति समर्पित होते जा रहे थे।  

हम अपने घर का विरोध  भी झेल रहे थे।   हमारे सामने घोर संकट था।   बहुत ज्यादा उम्र भी नहीं थी कि हम अपने घर वालों का सामना कर सकें।  विरोध के बावजूद भी हमने अपना पथ नहीं छोड़ा,  हम लुक-छिपकर परम पूज्य गुरूदेव का काम पूरा करते रहे।  हम अपने गाँव में अकेले ही गायत्री परिवार में थे उस समय हमारे सिवा दूसरा कोई व्यक्ति नहीं था जो हमारा समर्थन कर सहयोग कर सके। 

अचानक हमारे अंतःकरण में कुछ ऐसे भाव जागृत हुए कि परम पूज्य गुरूदेव के काम को आगे बढ़ाने में पूर्णतया सहयोग गाँव का लिया जाए तो हमने अपने गाँव में परम पूज्य गुरूदेव का एक कार्यक्रम कराने की योजना बनाई  और इस योजना के बारे में आदरणीय डाक्टर गुप्ता  साहब   के समक्ष अपनी जिज्ञासा रखी। उन्होंने हमारे परम आदरणीय श्री रामबहादुर कुदैशिया जी पूर्व व प्रथम प्रधानाचार्य  जी ,आदर्श इन्टर कालेज कोड़ा जहानाबाद को अवगत कराया। कुदेशिया जी ने  नवलकिशोर मिश्रा जी से बात कर हमें तीन दिवसीय पंच कुंडीय गायत्री महायज्ञ का कार्यक्रम दिलवा दिया जिसकी  तिथि दिनांक 13,14 व 15 जनवरी 1995 के लिए निर्धारित हो गई।  हमारे लिए यह काम बहुत बड़ा  था क्योंकि उस समय हम मिशन में अकेले ही थे।  कार्यक्रम के लिए गाँव में किसी से पहले सलाह मशविरा भी नहीं लिया था केवल  परम पूज्य गुरुदेव का कार्य करने की अभिलाषा थी और उन्हीं का मार्गदर्शन था।  यही मार्गदर्शन और आशीर्वाद था जिसने हमसे इतना बड़ा कार्यक्रम करवा  लिया और उन्हीं की कृपा से सफलता पूर्वक सम्पन्न भी हो गया।  हम स्वयं नहीं समझ पाए कि यह सब कैसे हो गया I 

“ उस समय हम बेरोजगार थे, विद्यार्थी जीवन था।   हमारे घर से किसी भी तरह का कोई सहयोग नहीं था , न आर्थिक न शारीरिक  बल्कि विरोध भयंकर था। ” 

आप सभी मित्र ,भाई , बहिनें , माताएं – पाठकगण एवं ज्ञानरथ  सहकर्मी   खुद समझदार हैं कि हाई स्कूल में पढ़ने वाला  विद्यार्थी  क्या कर सकता है यह सब परम पूज्य गुरूदेव का ही आशीर्वाद था। हमें  गाँव व पास-पड़ोस का भरपूर सहयोग मिला।  तीन दिन तक लगातार भंडारा चलता रहा , कार्यक्रम में किसी प्रकार की कमी नहीं हुई, काफी धन व अनाज बच गया जिसे शान्तिकुन्ज हरिद्वार के तत्वावधान में आयोजित नेत्र शिविरों में भेज दिया गया। 

उस समय को कभी नहीं भूलते और न ही कभी भूलेगे।  वह दिन हमारी इस छोटी सी उम्र की प्रेरणादायी घटना है।

कार्यक्रम उसी विद्यालय के प्रांगण में सम्पन्न हुआ था जहाँ उस समय हम पढ़ रहे  थे जिसके प्रधानाचार्य आदरणीय श्री जयनारायण पाल जी थे उनका  कार्यक्रम में अच्छा सहयोग था , जिनके माध्यम से कार्यक्रम मिला था आदरणीय  श्री रामबहादुर कुदैशिया जी भी कार्यक्रम में शामिल हुए और कार्यक्रम का उद्घाटन माननीय राकेश सचान जी विधायक घाटमपुर के कर-कमलों द्वारा सम्पन्न

होना निश्चित हुआ था। वह भी कार्यक्रम में आये, अब तीन महान हस्तियाँ एक साथ एक मंच में विराजमान थी, कार्यक्रम के संचालक चौथे हम थे। 

“उस समय का द्रष्य हमारी जिन्दगी की पहली खुशी थी जो परम पूज्य गुरूदेव के आशीर्वाद से मिली हम आनंद से ओतप्रोत हो गए, कृतार्थ हो गए।”

अब अपनी इस अपार खुशी का कारण बता रहे हैं :

यह घटना कार्यक्रम में प्रथम दिन की है।  कार्यक्रम के संचालक हम सरविन्द कुमार पाल कक्षा 10 के विद्यार्थी, अपने प्रधानाचार्य श्री जयनारायण पाल जी, हमारे प्रधानाचार्य जी के शिक्षण काल के प्रधानाचार्य  श्री रामबहादुर कुदैशिया जी अपने शिष्य के विद्यालय में आए थे  जो कार्यक्रम की व्यवस्था देख रहे थे तथा माननीय श्री राकेश सचान जी  विधायक घाटमपुर जिनके कर-कमलों से कार्यक्रम का उद्घाटन सम्पन्न होना था और  उनके भी शिक्षण काल के प्रधानाचार्य कुदैशिया जी ही थे, इन सभी के सहयोग से हमारे विद्यालय में  यह तीन दिवसीय समारोह सम्पन्न करवाया गया।  यह सब परम पूज्य गुरूदेव का आशीर्वाद ही  था जो इस तरह का संयोग  मिला कि तीन पीढ़ियां एक ही मंच पर एक साथ अपने गुरु का कार्य करने के लिए बैठीं थीं। हमें खुशी है कि हमारे प्रधानाचार्य जी ने हमारा भरपूर सहयोग दिया और उन्हें खुशी है  कि हमारे शिष्य ने इतनी छोटी सी उम्र में इतना बड़ा कार्यक्रम तो  सम्पन्न करवाया और  वह भी हमारे विद्यालय में  और हमारे प्रधानाचार्य जी को ख़ुशी कि उनके शिक्षण काल के प्रधानाचार्य और इसी विद्यालय के विद्यार्थी विधायक राकेश सचान जी सब एक साथ कैसे इक्क्ठे हो गए।  अवश्य ही परमपूज्य गुरुदेव की कृपा ही होगी जिन्होंने तीन पीढ़ीओं  को एक साथ एक ही मंच पर ,एक ही समय पर, एक ही पुनीत कार्य को सम्पन्न करने को प्रोत्साहित किया। केवल इतना ही नहीं ,हम तो बेझिझक यह भी कह सकते हैं कि गुरुदेव ने यह भी सुनिश्चित किया कि  एक छोटे से बच्चे द्वारा इतने विशाल कार्य को बिना किसी अड़चन के सम्पन्न करवाया जाये। अवश्य ही परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म सत्ता इस महान आयोजन में कार्यरत होगी।  

हमारा यह कहना अत्यंत तर्कसंगत है – क्योंकि गुरुदेव का महाप्रयाण  1990 में हो गया था और यह घटना 1995 की है। गुरुदेव ने कहा था कि इस हाड़ -मास  के चोगे को त्यागने के उपरांत और भी सक्रीय हो कर अपने बच्चों के कार्य करूँगा, और  गुरुदेव ने अपने साहित्य में कितनी ही बार दोहराया है “ तू  मेरा काम कर  मैं तेरा कार्य करूँगा” हमें  बार -बार कमेंट करके ,फ़ोन करके निवेदन किया जाता है कि मैं शांतिकुंज में  जीवनदान देकर गुरुदेव का कार्य करना चाहता हूँ। हम तो यही कहते  हैं कि उस महान गुरु का कार्य करने के लिए शांतिकुंज जाने की तो तभी आवश्यकता पड़ेगी अगर वह विश्व्यापी न हों , आप कहीं भी रहकर , अपने घर में ही , उस महान गुरु के विचारों का प्रचार -प्रसार कर सकते हैं।  हमने आपको कितना सरल मार्ग “ऑनलाइन ज्ञानरथ” उपलब्ध करवाया है।   

इन्ही शब्दों के साथ इस  लेख के प्रथम भाग को विराम देने की आज्ञा लेते हैं और आपको सूर्य भगवान की प्रथम किरण में सुप्रभात कहते हैं। जय गुरुदेव।  परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित 

क्रमश जारी : दूसरा और अंतिम भाग   कल प्रस्तुत करेंगें।

Leave a comment

पांडुकेश्वर ,बद्रीनाथ और माणा  गांव – भारत का अंतिम गांव

27 अगस्त 2021 का ज्ञानप्रसाद : पांडुकेश्वर ,बद्रीनाथ और माणा  गांव – भारत का अंतिम गांव https://drive.google.com/file/d/1RCMP6yp0Chl6Kqa6JeUrbFJsQQ_eKsGG/view?usp=sharing

आज का लेख आरम्भ तो किया तो उदेश्य केवल पांडुकेश्वर ग्राम के बारे में लिखना ही था क्योंकि परमपूज्य गुरुदेव की हिमालय यात्रा का इसके साथ सम्बन्ध था, लेकिन रिसर्च  करते-करते इतना विस्तृत विवरण मिलता गया कि डर लगने लगा कि कहीं  देवभूमि उत्तराखंड में ही न खो जाएँ। इस दिव्य भूमि का क्या कहें, शब्द नहीं हैं ,चप्पे -चप्पे पर भगवान  का वास् है।  इस भूमि को हमारा नमन ,इसे समझने के लिए कई जन्म लेने पड़ेंगें – एक जन्म में असम्भव ही लगता है। और इतनी सारी जानकारी को दो पन्नों के लेख में compile करना बहुत ही  बड़ा कार्य है। किसी  बात  को अधिक शब्दों में बयान करना बहुत ही आसान है लेकिन जब बात आती है कम शब्दों की तो दुविधा में पड़  जाते हैं। इसीलिए हमारी इस capability को judge करने के लिए अक्सर इंटरव्यू में  बहुत ही स्टैण्डर्ड प्रश्न  पूछा  जाता है- Tell us about yourself in 2 minutes .

लेख के साथ ढाई मिंट की वीडियो attach की है क्योंकि 5 -6 फोटो और वीडियो लगाने का और कोई विकल्प नहीं था।हम अनुभव कर सकते हैं कि  आप लगातार इतने बड़े- बड़े लेख पढ़  रहे हैं और फिर इतने बड़े -बड़े कमेंट भी लिख रहे हैं आप अवश्य ही थक चुके होंगें ,इसलिए कल कोई  लेख नहीं होगा, केवल महेंद्र भाई साहिब की एक वीडियो होगी।  हर बार की तरह आपसे आज ही संकल्प लेते हैं  कि वीडियो की description अवश्य पढ़ें और परमपूज्य गुरुदेव को श्रद्धा और आदर  के पुष्प अर्पित करते हुए अधिक से अधिक लोगों में शेयर  करें ,कमेंट करें।  

तो आओ चलें उत्तराखंड की दिव्य भूमि की ओर।            

पांडुकेश्वर ग्राम :

पांडुकेश्वर ग्राम असंख्य आलेखों  के लिए लोकप्रिय है।महाभारत के  सबसे लोकप्रिय आलेखों में एक का उल्लेख किया गया है जिसमें कहा गया है कि यह वह स्थान है जहां पांडवों के पिता राजा पांडु ने ऋषियों की हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए  प्रयाश्चित में गहरी तपस्या की थी। पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि  पांडु  जो धृतराष्ट्र  के   छोटे भाई थे अपना सिंहासन धृतराष्ट्र को  देने के बाद इसी  पांडुकेश्वर में अपनी पत्नियों माद्री और कुंती के साथ रहने का प्रण लिया था । ऐसा कहा जाता है कि एक दिन राजा पांडु  शिकार पर गये  और उन्होंने  गलती से एक ऋषि को मार डाला जो हिरण के रूप में अपनी पत्नी के साथ प्रेम कर  रहे थे । मरते समय ऋषि ने पांडु को  श्राप दिया कि वह भविष्य में किसी से प्रेम नहीं कर पायेंगें  और यदि उन्होंने  ऐसा करने की कोशिश की तो उनकी  मृत्यु हो जाएगी। इस पाप से छुटकारा पाने के लिए राजा पांडु ने “योगध्यान बद्री” का दौरा किया और भगवान विष्णु की एक कांस्य मूर्ति स्थापित की और वहां गहन ध्यान किया। इस बीच योगध्यान के माध्यम से माद्री और कुंती ने पांडवों को जन्म दिया। बाद में, एक दिन जब माद्री अलकनंदा नदी में स्नान कर रही थी तो राजा पांडु उनकी ओर आकर्षित हुए और ऋषि के श्राप के अनुसार उनकी मृत्यु हो गई। पांडव अपने 12 साल के वनवास के दौरान अपने पिता का अंतिम संस्कार करने के लिए पांडुकेश्वर आए थे। ऐसा माना जाता है कि अर्जुन ने भी वनवास के दौरान  यहीं पर  ध्यान लगाया था और भगवान इंद्र को प्रसन्न करने के लिए उनका आशीर्वाद लिया था। बाद में  पांडवों ने वासुदेव मंदिर का निर्माण किया और इसे भगवान विष्णु, माद्री और देवी लक्ष्मी को समर्पित किया। 

साथ में दिए हुए नक्शे में आप देख सकते हैं  कि पांडुकेश्वर, बद्रीनाथ और जोशीमठ के बीच स्थित है। बद्रीनाथ से  पांडुकेश्वर की दूरी  23 किलोमीटर

और जोशीमठ से पांडुकेश्वर की दूरी 18 किलोमीटर है।  यहाँ पहुँचने के लिए  ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से लगभग 274 किलोमीटर और देहरादून से 302 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। समुद्र तल से लगभग 6000 फुट  की ऊंचाई पर स्थित और भगवान विष्णु के पवित्र मंदिर बद्रीनाथ  के रास्ते में, पांडुकेश्वर देवभूमि में सबसे लोकप्रिय दिव्य स्थानों में से एक है। पांडुकेश्वर दो पवित्र धामों योगध्यान बद्री और भगवान वासुदेव मंदिर का घर है। हिंदू पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि वासुदेव मंदिर का निर्माण बहादुर पांडवों ने भगवान वासुदेव के सम्मान में किया था।

बद्रीनाथ धाम :

गढ़वाल हिमालय पर्वतमाला के बीच प्रकितिक सौंदर्य  में  बसा “बद्रीनाथ धाम दर्शन” विष्णु उपासकों के सबसे प्रमुख स्थलों में से एक माना जाता है। समुद्र तल  से लगभग 11000 फुट ऊंचाई पर स्थित  बद्रीनाथ मंदिर एक महान धार्मिक महत्व रखता है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण मूल रूप से महान हिंदू दार्शनिक आदि शंकराचार्य ने 7वीं शताब्दी  में किया था। योगध्यान बद्री मंदिर, जो सप्त बद्रियों में से सबसे महत्वपूर्ण बद्री के रूप में माना जाता है, पांडुकेश्वर में स्थित है। जैसा नाम से ही विदित है सप्तबद्री भगवान विष्णु को समर्पित सात मंदिरों  का समूह है। यह सातों मंदिर उत्तराखंड के गढ़वाल  क्षेत्र में स्थित हैं और इनके नाम इस प्रकार हैं :  बद्रीनाथ मंदिर ,अदि बद्री ,वृद्धा बद्री ,ध्यान बद्री ,अर्ध बद्री , भविष्य बद्री और योगध्यान बद्री। योगध्यान बद्री मंदिर में भक्त भगवान कुबेर और भगवान उधव को श्रद्धांजलि देने के लिए आते हैं और सर्दियों के मौसम में, भगवान विष्णु की लेटी हुई मूर्ति को श्रद्धांजलि देते हैं । हम सब भलीभांति जानते हैं कि मौसम के कारण भगवान बद्रीनाथ के दर्शन वर्ष के केवल  कुछ एक  महीनों में ही हो पाते हैं, और शरद ऋतु में इस मंदिर के कपाट ( द्वार ) बंद रहते हैं। इन दिनों में मूर्तियों को स्थानांतरित करके योगध्यान बद्री में स्थापित किया जाता है। मूर्तियों को बद्रीनाथ से  स्थानांतरित करने के दिन स्थानीय लोग और पुजारी “देववर” नामक एक प्रमुख उत्सव का आयोजन करते हैं। इसी तरह के एक और उत्सव का आयोजन तब  किया जाता है जब मूर्तियों को वापस  बद्री मंदिर में ले जाया जाता है।

माणा  गांव – भारत का अंतिम गांव 

उत्तराखंड में भारत-चीन सीमा से सटा एक सुप्त गाँव माणा, नवम्बर के दिनों में गतिविधियों से चहल पहल कर रहा होता है।  इसके निवासी 18 नवंबर तक पैकिंग कर गांव छोड़ने की तैयारी कर रहे होते  हैं। चीन की सीमा से लगा भारत का आखिरी गांव माना  जाने वाला “माणा” अगले छह महीने तक सोने के लिए तैयार है। यह अभ्यास हर साल सर्दियों की शुरुआत में दोहराया जाता है। प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त  पहाड़ों में बसा, समुद्र तल से 10,500 फीट की ऊंचाई पर बसे इस ग्राम में  सर्दियों के दौरान बर्फ  पड़ी रहती है और यह ग्राम सोया रहता है।  बद्रीनाथ मंदिर से मात्र 3 किमी की दूरी पर स्थित इस बस्ती  का जीवन तीर्थयात्रा पर ही  निर्भर करता है।मंदिर के कपाट बंद होने से गांव में गतिविधियां भी ठप हो जाती हैं और सर्दी के मौसम में एक भयानक सन्नाटा सा छा जाता है। गांव के सभी निवासी छै मॉस के लिए स्थानांतरण  कर जाते हैं। गांव से स्थानांतरण  के कुछ दिन पहले सभी परिवार एक विशेष पूजा में शामिल होते हैं। अनुष्ठान के बाद, गाँव को “स्थानीय देवता -घंटाकरण-” के संरक्षण में छोड़ दिया जाता है। फिर ग्रामीण गोपेश्वर, पांडुकेश्वर, जोशीमठ, आदि में अपने अन्य घरों के लिए निकल जाते हैं।  इस छोटी सी बस्ती जैसे गांव में इंटर कॉलेज भी है जो बाकि सैशन केलिए पांडुकेश्वर में स्थानांतरित हो जाता है। और जैसे ही अप्रैल में बर्फ पिघलनी  शुरू होती  है, लोगों के लौटते ही गाँव में फिर से जान आ जाती है। प्राचीन शास्त्रों में माणा  का पौराणिक महत्व है, जहां इसे मणिभद्रपुरम कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि पांडव “स्वर्ग” (स्वर्ग) की यात्रा में  इस गांव से गुजरे थे। भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार महर्षि वेद व्यास ने  इस गांव में महाभारत का वर्णन किया था और भगवान ब्रह्मा के निर्देश पर भगवान गणेश ने इसे लिखा था। महाभारत काल के व्यास और गणेश गुफाओं के अवशेषों के अलावा, सरस्वती नदी का उत्पति स्थल और 140 मीटर ऊंचा वसुधारा नामक वॉटरफॉल  यहां के मुख्य पर्यटक आकर्षण हैं। दो पहाड़ी गुफाएं और चट्टानों पर प्राचीन भारतीय ग्रंथों  की खुदाई पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। एक चाय की दुकान पर “भारत की आखिरी दुकान” का साइनबोर्ड  पर्यटकों के लिए एक मनोरंजन है और लोग इसके सामने सेल्फी लेते देखे गए हैं। एक समय में यह ग्राम  भारत और तिब्बत में  व्यापार का मुख्य केंद्र हुआ करता था, लेकिन तिब्बत के चीन में  विलय के बाद यह व्यापर  समाप्त हो गया। ऐसा माना जाता है कि तिब्बत में इस ग्राम के कई निवासियों  की संपत्ति थी और कैलाश मानसरोवर जाने के लिए एक मार्ग इसी गांव से होकर जाता था ।  माणा निवासी जड़ी-बूटियों, पश्मीना, कंबल, ऊनी, कालीन आदि के व्यापार में लगे हुए हैं। अन्य सीमावर्ती गांवों के विपरीत, यह ग्राम  विभिन्न सरकारी योजनाओं के सौजन्य से अच्छी तरह से विकसित है।

जय गुरुदेव 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं  कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो।

Leave a comment

आइये कुछ अपनी कहें ,कुछ आपकी सुनें -अखिर हम एक परिवार ही तो हैं 

 26  अगस्त 2021  -आइये कुछ अपनी कहें ,कुछ आपकी सुनें -अखिर हम एक परिवार ही तो हैं 

बहुत ही प्रसन्नता होती है कि  ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार का प्रत्येक सदस्य , अपना बहुमूल्य समय निकाल  कर इस पुनीत कार्य में अपना योगदान दे रहा है। हम तो यह कहेंगें कि यह  योगदान केवल  कमेंट लिख कर ही नहीं दे रहा, शेयर करके और शेयर करने के बाद उन्हें प्रेरित करने का प्रयास भी कर रहा है।  व्हाट्सप्प पर आये मैसेज के स्क्रीनशॉट इस बात के साक्षी हैं कि आपने गुरुकार्य में कितना समयदान किया और उसके क्या परिणाम आये।  अरुण वर्मा जी ने फ़ोन करके बताया था वह हर लेख अपने मित्रों में शेयर करते हैं और  उन्हें कहते भी हैं कि कमेंट करके अपनी  श्रद्धा और ज्ञान व्यक्त करें। क्योंकि यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहाँ सबका आदर सम्मान करते हुए हर एक सदस्य की प्रतिभा को उभारने  का प्रयास किया जाता है।  इसका ही परिणाम है कि इतने बड़े बड़े लेख अनवरत पढ़े जा रहे हैं , उनकी प्रतीक्षा की जा रही है  – इतना ही नहीं,  बड़े बड़े कमेंट  भी लिखे जा रहे हैं। आदरणीय सरविंदर भाई साहिब का कमेंट तो हर बार ही सराहनीय होता है और  हम बार  अपडेट में शेयर  भी कर चुके हैं।  लेकिन आज हम उनसे -दोनों से – पिता -पुत्री जोड़ी से करबद्ध क्षमा याचना करेंगें क्योंकि कमैंट्स की लम्बाई देखकर तो लगता है कि  अगर इन्हे शेयर किया तो हम  और कुछ भी नहीं लिख पायेंगें ,यूट्यूब आज्ञा ही नहीं देगा।  सरविंदर जी का कमेंट 1100 शब्दों का और पिंकी बेटी का 710 शब्दों  का था।  कितना बड़ा समयदान किया है दोनों ने –  इस जोड़ी ने जो आदर ,सम्मान और श्रद्धा व्यक्त की है उसने हमें  निशब्द  कर दिया है । पिंकी बेटी अब धीरे धीरे स्वस्थ हो रही है ,पढ़कर और संपर्क से पता चलता ही रहता है।  परमपूज्य गुरुदेव की शक्ति से हम पूरी तरह परिचित हैं – वह सब ठीक कर देंगें। 

24 अगस्त वाले लेख पर creative brain से एक कमेंट पोस्ट हुआ था , बहुत ही ज्ञानप्रद और  उच्च स्तर का था , हमने तो उन्हें रिप्लाई कर  दिया था लेकिन आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं – अवश्य ही मार्गदर्शन मिलगा – हमारे बारे में  जो भी  लिखा है कृपया  उस पर ध्यान न दें। 

Creative  Brain : 

बहुत बढ़िया, अरुण त्रिखा जी की कृति भी तपोबल का ही रूप है। उन्होंने आंतरिक  तपोबल के संदर्भ में अनुकरणीय रूप दिखाया है। सोचना और ज्ञान बाँटना  और सबसे महत्वपूर्ण बात इसे लोगों तक पहुंचाना भी तपोबल का एक रूप है जो उपवास की तपस्या के बाहरी तपोबल की तुलना में बहुत अधिक उत्पादन या महत्व है। आज गायत्री परिवार के अंदर और बाहर के लोगों को लगता है कि व्रत उपवास केवल साधना और तपोबल का रूप है लेकिन वास्तविक तपोबल ज्ञान योग है। यही आज के समय की असली जरूरत है। इसे ही  वास्तव में आचार्य पंडित श्रीराम शर्मा विचारक्रांति अभियान मानते हैं। मैं अरुण त्रिखाजी से अनुरोध करता हूं कि वे इसी लेख को fb और what’s app पर भी पोस्ट करें। उन्हें बहुत सी  शुभकामनाएं। “ज्ञान योग तपोबल पानी के कुएं की तरह है जो न केवल इसे  बनाने में  कड़ी मेहनत करने वाले व्यक्ति की ही नहीं  बल्कि दूसरों की भी प्यास पूरी करता है,” उसी तरह हमारे आचार्यश्री  ने लेखन का मार्ग दिखाया और सबसे महत्वपूर्ण बात – आचरण के साथ। अरूण त्रिखा ने इस बात को बखूबी समझा और वह उस विचार की एकता में शामिल हो गए, जिसे हम ब्रह्म कहते हैं। 

____________

विश्वास पर हमारा पक्ष :

परमपूज्य गुरुदेव को जब दादा गुरु ने निर्देश दिए तो उन्होंने आँख बंद करके ,बिना कोई प्रश्न किये एक मूक साधक की तरह  24 वर्ष/जीवन भर  अनवरत तप किया।  मूक साधक का अर्थ महेंद्र जी भी समझा रहे थे कि गुरुदेव ने हमें कभी भी कोई concrete plan of action नहीं बताया। सुबह को कोई  काम ,शाम को कोई काम , हिमालय में मार्गदर्शक भी कुछ नहीं बोले, कहाँ जा रहे हैं।  इन सब उदाहरणों का एक ही निचोड़ निकलता है कि – उनको  अपने गुरु की शक्ति पर विश्वास था ,  संशय की कोई गुंजाईश ही नहीं थी।  पिता अपने बच्चों का अनर्थ कैसे कर सकता है  ? कदापि नहीं।  इसी अविश्वास ने हमें संशय , मृगतृष्णा, stress  और न जाने कौन से उपहार दिए हैं।  और इन सबका आरोपी हम दूसरों को ठहराने में एक क्षण भी नहीं लगाते। आज के युग में ,इंटरनेट युग में ,साधन- प्रधान युग में ,कंप्यूटर युग में  हम अपनी दिशा ढूंढ तो लेते हैं लेकिन भटक -भटक कर – क्योंकि जिस मार्गदर्शक ने अपना पूरा जीवन उस क्षेत्र में तपाया उस पर हमें विश्वास नहीं है।  लेखों के माध्यम से हम  इसी अविश्वास को हटा कर उन तथ्यों की पुष्टि करने का प्रयास  कर रहे हैं जिन्हे आधुनिक प्राणी मानने को तैयार नहीं है। जब हमने किसी से कहा – महाप्रयाण  के समय कीना राम जी  की आयु 170 वर्ष  थी तो प्रतिक्रिया मिली -This is all wrong , totally unbelievable. Yes it is unbelievable क्योंकि यह दिव्य आत्माएं हैं कोई साधारण मानव नहीं। शुक्ला  बाबा द्वारा स्थापित अखंड ज्योति नेत्र हस्पताल ,रावल जी द्वारा स्थापित मसूरी इंटरनेशनल स्कूल , शशि संजय शर्मा द्वारा जयपुर कारावास में  स्थापित गायत्री मंदिर, गायत्री तपोभूमि मथुरा , युगतीर्थ शांतिकुंज , देव संस्कृति यूनिवर्सिटी इत्यादि ,इत्यादि सभी दिव्यता के प्रतीक हैं। इन पावन भूमियों की रज अपने मस्तक पर लगाने वाले बहुत ही सौभाग्यशाली हैं। जिस प्रकार हिमालय के सिद्ध क्षेत्र में गुरुदेव को अद्भुत अनुभव हुए थे ठीक उसी प्रकार इन तीर्थों में भी हर किसी को होने चाहिए- शर्त केवल एक ही है  – श्रद्धा।, विश्वास और पात्रता । दोनों परिवार जो अभी -अभी मस्तीचक शक्तिपीठ होकर आये हैं अवश्य ही किसी पूर्वजन्म के कर्मों का ही फल  होगा।

“Orbis विश्व का एकमात्र फ्लाइंग नेत्र हस्पताल :”

कल वाले ज्ञान प्रसाद के साथ ही हमने व्हाट्सप्प और फेसबुक पर एक लिंक शेयर किया था जिसने हमें बहुत दिनों से प्रेरित किया हुआ था।  विश्व के एकमात्र फ्लाइंग हस्पताल का यह लिंक छाया और छवि तिवारी ,दो जुड़वां ,अनाथ बच्चियों की कहानी  बयान तो करता ही है साथ में मृतुन्जय तिवारी, शुक्ला बाबा ,परमपूज्य गुरुदेव की शक्ति पर भी मुहर लगाता है। आने वाले किसी लेख में यह हृदयस्पर्शी प्रसंग आप सबके समक्ष लाने का प्रयास करेंगें।  कुछ दिन पहले ही हमने अखंड ज्योति नेत्र हस्पताल की  शशि मिश्रा और छवि तिवारी से वीडियो काल की और उन दोनों जुड़वां बेटियों की कहानी कैप्चर करने का प्रयास किया।  बिहार की बस व्यवस्था के कारण छाया समय पर नहीं पहुँच सकी ,इसलिए हमें वीडियो कैप्चर स्थगित करना पड़ा।  दिल्ली स्थित Dr. Shroff’s Charity Eye Hospital में इन दोनों बहिनों ने ट्रेनिंग प्राप्त की जिसमें Orbis का सहयोग सराहनीय था। Orbis का सहयोग आज भी अखंड ज्योति नेत्र हस्पताल में सराहनीय है।  इस सन्दर्भ में मृतुन्जय भाई साहिब का व्हाट्सप्प मैसेज भी आया है। कितने सहयोग और सहकारिता से यह पुनीत और पुण्य कार्य सम्पन्न किया जा रहा है , एक बार तो विश्वास नहीं होता है परन्तु यह तीन शब्द -अविश्वसनीय ,आश्चर्यजनक किन्तु सत्य इसके प्रमाण हैं। हमारे दोनों परिवारों के  सदस्य तो स्वयं मस्तीचक होकर आये हैं ,उन्होंने देख ही लिया होगा कैसे शुक्ला बाबा के आशीर्वाद से यह सारे कार्य निशुल्क सम्पन्न करवाए जा रहे हैं। विश्व प्रसिद्ध कोरियर कंपनी FEDEX द्वारा जहाज़ दान करना और Orbis  द्वारा 92 देशों में मेडिकल ट्रेनिंग उपलब्ध करवाना ,अखंड ज्योति नेत्र हस्पताल को फंडिंग  provide करना – सच में अविश्वसनीय है। इसीलिए हम पिछली कुछ पंक्तियों में विश्वास का राग आलाप रहे थे। शशि मिश्रा , मनीषा द्विवेदी , ज्योति शुक्ला , मृतुन्जय तिवारी सभी को विश्वास दिलाने का प्रयास तो कर रहे हैं लेकिन —— हमारा वीडियो बनाना , इंटरव्यू करना ,लेख लिखना , वीडियो कॉल  करना इसी दिशा में एक प्रयास है कि हम अपने स्तर पर अगर किसी की सहायता कर सकें तो हमारा सौभाग्य होगा और गुरुकार्य में सहयोग।  Orbis का यह लिंक हम आपके लिए यहाँ  शेयर कर रहे हैं ताकि जब तक हम इसको स्टडी कर रहे हैं , आप स्वयं इसको browse कर लें। इन बेटियों की कहानी CNN के किसी इंटरव्यू में शेयर हुई  थी।  हम तो नतमस्तक हैं मृतुन्जय तिवारी जी के प्रयास पर जिन्होंने आजीवन अपनेआप को  शुक्ला बाबा ,परमपूज्य गुरुदेव के लिए समर्पित कर दिया है ,विश्वास इतना अटूट  कि कभी  पीछे मुड़कर देखा ही नहीं। हम तो चाहेंगें कि मृतुन्जय जी का Football to Eyeball प्रोग्राम अवश्य देखें।  इतना सबकुछ उपलब्ध कराने  का उदेश्य यही है कि आप अपनेआप को शिक्षित करें ताकि आने वाले दिनों में आपको भी अपनी  बेटियों  के करियर मार्गदर्शन की ज़रूरत पड़ेगी। बिल्कुल समय पर रिसर्च करने से कुछ हाथ नहीं लगता। 

अंत में हम  अपने सहकर्मियों का धन्यवाद् करेंगें कि ऑनलाइन ज्ञानरथ के स्तंभों की रक्षा और पालन करते हुए सब अपना योगदान दे रहे हैं। सरविंदर  जी का बहुत ही धन्यवाद् करते हैं जिन्हे हमारा मार्गदर्शन पसंद आया , हमारी सहायता की कहीं भी , किसी समय भी आवश्यकता हो तो बेझिझक बता  दें। 

जय गुरुदेव

Leave a comment

संत सत्यानंद और कीना राम जी एवं परम पूज्य गुरुदेव

25 अगस्त 2021  का ज्ञानप्रसाद-  संत सत्यानंद और कीना राम जी एवं परम पूज्य गुरुदेव

आज के लेख में शब्दों की सीमा ने हमें अपनी भावनाएं और विचार नहीं रखने दिए। अब तो यही हो सकता है  कि कल वाले लेख में आप सभी से अपनी कुछ बातें करें ,कुछ आपकी सुने -आपके कमैंट्स के माध्यम से।  तो आइये चलें इन दो विभूतियों को जाने   

__________________________

संत सत्यानंद जी कथा :

पिछले लेख को ही जारी रखते हुए आगे चलते हैं : सत्यानंद जी अपने बारे में  बताने लगे कि पिछले साठ वर्षों से यहां निवास कर रहा हूँ। 

आइये थोड़ा सा रुक जाएँ और चिंतन करें :

अगर हम गुरुदेव की यात्रा का वर्ष 1960 समझें तो सत्यानंद जी 1900 से यहाँ रह रहे थे ,इसका अर्थ यही निकलता है कि हम  जिस  घटना का विवरण दे रहे हैं आज 2021 में 121 वर्ष पुरानी है। यह पंक्तियाँ हमें इस लिए लिखनी पड़ीं कि जैसे महेंद्र जी कह रहे थे “ कौन विश्वास करेगा इस गपबाजी को” आज इंटरनेट युग में सबसे बड़ी समस्या विश्वास की ही है। आज प्रतक्ष्यवाद  और वादविवाद का युग है, संशय का युग है।  5000 वर्ष पुरातन घटनाओं पर आधारित बी आर चोपड़ा द्वारा  निर्देशित मैगा सीरियल महाभारत हम देखकर विश्वास कर सकते हैं क्योंकि वह मनोरंजन है।  लेकिन क्या हमने कभी भी विचार किया कि डॉक्टर राही मासूम रज़ा  ने कितना अथक परिश्रम करके,रिसर्च करके इसकी स्क्रिप्ट लिखी थी।  

विश्वास -विश्वास -केवल विश्वास ,जैसे परमपूज्य गुरुदेव ने दादा गुरु पर किया। 

अब चलते हैं  आगे :

सत्यानन्द जी कह रहे हैं :महायोगी त्र्यंबक बाबा ने मुझे यहां दीक्षा दी थी और साधन मार्ग की शेष यात्रा यहीं पूरी करने के लिए कहा था। तब से कलाप ग्राम छोड़कर कहीं और जाना नहीं हुआ।’ अपनी बात बीच में रोककर सत्यानंद गुरुदेव  से पूछने लगे, ‘तुमने भागवत शास्त्र में कलाप ग्राम का उल्लेख पढ़ा है न।’ गुरुदेव  ने सिर हिलाकर “हां” कहा। 

सत्यानंद को बचपन से ही धुन सवार थी कि जीवन को परमसत्य की खोज में ही व्यतीत करना है। परंपरा के अनुसार आयु के तेरहवें वर्ष मे यज्ञोपवीत हुआ और तभी से नियमित संध्या गायत्री का जप और पूजा पाठ करने लगे। यज्ञोपवीत संस्कार के डेढ़ साल बाद उन्हें मलेरिया बुखार हुआ। उस समय मलेरिया का कोई इलाज ढूंढा नहीं जा सका था। सत्यानंद की हालत दिनोदिन खराब होती गई। डॉक्टर ने बचने की उम्मीद छोड़ दी और  कह दिया कि रोगी जो भी खाना चाहे, खाने दें, जैसे रहना चाहे रहने दें। परहेज और इलाज से कोई  फायदा नहीं होगा। घर के लोग रोने पीटने लगे। सत्यानंद तब अर्धचेतन अवस्था में थे। सिरहाने बैठी मां भगवद्गीता का पाठ सुनाने लगी। उस अवस्था में ही “सत्यानंद ने अनुभव किया कि एक कन्या सिरहाने बैठी है और कह रही है कि आप चिंता न करें आपका मृत्यु योग टल गया है। कन्या सत्यानंद के सिर पर हाथ भी फेरती जा रही थी।” उसके हाथ फेरने के कुछ ही क्षण बाद  बुखार उतरने लगा, घरवालों के चेहरे पर प्रसन्नता खिलने लगी। तीन दिन में बुखार  पूरी तरह ठीक हो गया। डाक्टरों ने देखा तो उन्हें भी आश्चर्य हुआ। सत्यानंद को बाद में बोध हुआ कि रुग्ण अवस्था में उन्हें दर्शन देने और ढाढ़स बंधाने वाली शक्ति कोई और नहीं “स्वयं वेदमाता गायत्री ही थी।” इस घटना से  सत्यानंद को माँ गायत्री पर इतना विश्वास हो गया कि उन्होंने आगे पढ़ना छोड़ दिया। सत्यानंद का मन ही नहीं हुआ कि परीक्षा दें। वैराग्य जाग गया और सात आठ महीने बाद हिमालय की ओर निकल गये। त्र्यंबक बाबा ने यहीं दर्शन दिए। उन्हीं के दिए संकेतों के आधार पर कलाप ग्राम पहँचे और इसे अपनी साधना भूमि बनाया। जब गुरुदेव ने कलाप ग्राम में प्रवेश किया तो उन्होंने देखा बस्ती में शान्ति व्याप्त थी। लेकिन वह शांति सन्नाटे का प्रतिरूप नहीं थी। उसमें उल्लास का पुट था। गांव में पैतीस-चालीस कुटियाएं थीं। प्रत्येक कुटिया में एक साधक परिवार था। परिवार का अर्थ गुरु और उनके शिष्य से है। 

सत्यानंद ने स्वयं कहा और भागवत का उल्लेख भी किया। यह उल्लेख इस प्रकार था :

भागवत  के  दशम स्कंध में नारद आदि ऋषियों के यहां आने और सृष्टि के बारे में विचार करने का उल्लेख आता है। द्वापर के अंत में आसुरी आतंक बढ़ने लगा और सत्ता की होड़ में नीति अनीति, पुण्य पाप, धर्म अधर्म का भेद भुलाया जाने लगा। स्वार्थ और आपाधापी ने मनुष्य को नरपिशाच बना दिया तो इसी कलाप ग्राम में मुनियों का सत्र आयोजित हुआ। उसमें नारद, व्यास, मैत्रेय, जमदग्नि, गौतम आदि ऋषियों ने अपने समय की समस्याओं पर गहन विचार किया। पृथ्वी पर ईश्वरीय चेतना से हस्तक्षेप की रूपरेखा बनाई और सृष्टि का संरक्षण, पोषण करने वाली “दिव्य चेतना” को स्थूल रूप में व्यक्त होने के लिए मनाया गया। सत्यानंद ने कहा कि कृष्णावतार या उनसे भी पहले राम, परशुराम आदि अवतारों को सृष्टि में संतुलन के लिए दैवी हस्तक्षेप के रूप में ही समझना चाहिए।  पृथ्वी पर जब भी कोई संकट आता है या बड़े परिवर्तन आते हैं तो सिद्ध संत ( ऋषियों की संसद ) यहां मिल बैठते और सूक्ष्म जगत में संतुलन लाने के लिए विचार करते हैं। ऐसी संसद का वर्णन हम अपने अन्य लेखों में भी कर चुके हैं।  सत्यानंद ने कहा, ‘यह अकेला स्थान नहीं है। सिद्धाश्रम, ज्ञानगंज, शांगरिला ,शम्भाला  इसी तरह के केन्द्र हैं। इनके अलावा और क्षेत्र भी होंगे। शांगरिला का अर्थ “धरती का स्वर्ग” होता है ,यहाँ हमारे टोरंटो में इसी नाम से एक फाइव स्टार होटल भी है। 

इस  चर्चा के बाद योगी और गुरुदेव  कलाप ग्राम से बाहर निकले और आगे की यात्रा पर निकल पड़े। यह यात्रा पैदल ही हो रही थी। कहीं ऊंची चढ़ाई चढ़ना होती तो कहीं उतार 

होता। खड्डु खाइयों से बचने के लिए पर्याप्त सावधानी आवश्यक थी।गुरुदेव  को इसकी चिंता नहीं थी। दादा गुरु  के भेजे हुए प्रतिनिधि इसहिमालय क्षेत्र से परिचित थे। गौरीशंकर पर्वत (जो नेपाल में है ) के पास पहुँचते-पहुँचते चारों ओर बर्फ ही बर्फ दिखाई देने लगी। वृक्ष वनस्पति या जीवजंतु का कहीं नामनिशान नहीं था। योगी ने एकाध स्थान पर सावधान किया कि संभल कर चलना। यहां बर्फ पर पांव फिसल सकता है। गुरुदेव  ने मज़ाक में कहा  कि अपने गुरु  के संरक्षण में यात्रा हो रही होऔर आप जैसा सिद्ध संन्यासी साथ में हो तो फिसलने का भी क्या भय है? कदाचित कोई पांव उलटा सीधा पड़ गया तो आप संभाल ही लेंगे। वाह  रे वाह – कैसी है यह गुरु भक्ति ,कैसा है यह विश्वास। योगी ने इस मज़ाक को आगे बढ़ाया, ‘अगर तुम्हारी बात का सचमुच यही आशय है तो यह भी ध्यान रखना चाहिए कि गुरुदेव पांव की हड्डी को चटखने की अनुमति भी दे देंगे।’ 

बाबा कीना राम जी की कथा :

एक स्थान पर बर्फ की बनी हुई गुफा दिखाई दी। उसमें से हर हर महादेव की ध्वनि आ रही थी। यह ध्वनि जप साधना में लगे किसी साधक के मुंह से निकली हुई आवाज नहीं थी। लग रहा था जैसे कोई स्नान कर रहा हो। गुरुदेव  ने विस्मित होते हुए कहा, ‘इस गुफा में भी कोई झरना है क्या? लगता है कोई तपस्वी स्नान कर रहा हो।’ उत्तर मिला ‘नहीं। कोई तपस्वी नहीं बल्कि तपोनिष्ठ विभूति है बाबा कीनाराम । प्रत्यक्ष जगत से छुटकारा  होने के बाद इसी सिद्ध क्षेत्र में रमण कर रहे बाबा कीनाराम के बारे में गुरुदेव  ने अच्छी तरह पढ़ा हुआ था। इस संत ने औघड़ संप्रदाय का आरम्भ  भले ही न किया हो लेकिन अघौड़  परंपरा में उनकी ख्याति सबसे ज्यादा है। 2017 में  CNN पर  Reza Aslan, द्वारा  इस सम्प्रदाय  पर एक डॉक्यूमेंट्री प्रस्तुत की गयी थी।  इस डॉक्यूमेंण्ट्री के  बारे में अगर कुछ कहें तो अपने आज के विषय से भटक जायेंगें। कीना राम का  जन्म लगभग चार सौ साल पहले चंदौली में  हुआ था। तंत्र और योग मार्ग के सिद्ध साधकों में लगभग प्रत्येक ने उनसे कभी न कभी मार्गदर्शन पाया था। चार सौ वर्ष पूर्व उनका जन्म और जीवन भी असाधारण ही था। औघड़पन उनमें बचपन से ही था और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के प्रति भक्ति भी। उनके संबंध में कई चमत्कारी घटनाएँ प्रसिद्ध हैं। इनमें कई बड़ा चढ़ाकर भी  बताई गयी होंगी लेकिन फिर भी लोग उन्हें बहुत  ही श्रद्धा से स्मरण करते हैं। 

बचपन की एक घटना : 

बचपन की एक घटना तो यही विख्यात है कि उन्हें अपनी पत्नी के निधन का तत्क्षण पता चल गया था। उन दिनों छोटी उम्र में विवाह हो जाना आम बात थी। बारह वर्ष की उम्र में ही उनका विवाह हो गया और तीन साल बाद गौने की तिथि तय हो गई। यात्रा के एक दिन पहले कीनाराम ने अपनी मां से दूध और भात मांगा। मां ने मना किया कि दूध भात नहीं, दही भात खा लो। कीनाराम नहीं माने। मां को लाचारी से दूध भात ही देना पड़ा। अगले दिन जब गौने के लिए रवाना होने लगे तो खबर आई कि पत्नी का निधन हो गया है। मां रोने लगी और कीनाराम को कोसते हुए कहा, ‘मैं समझ गई थी कि कोई न कोई अशुभ होना ही है। यात्रा के समय कोई -भात खाता है क्या?’

कीनाराम ने कहा, नहीं माँ मैने तुम्हारी बहू के मरने के बाद ही दूध भात खाया। विश्वास नहीं हो तो किसी से पूछ लो। वह कल शाम को ही मर गई थी। मैंने तो रात को दूध भात खाया है। मां के माध्यम से यह बात पूरे गांव में फैल गई थी। लोगों को भी आश्चर्य हुआ कि कीनाराम को आखिर इस बात की जानकारी कैसे हुई।’ इस घटना के कुछ दिन बाद ही पुर्नविवाह की बात चलने लगी लेकिन कीनाराम ने इनकार कर दिया। घर के लोगों का दबाव फिर बढ़ता ही गया। इन दबावों से पिंड छुड़ाने के लिए कीनाराम घर से भाग  गये। घूमते घामते गाजीपुर आए। उन दिनों गाजीपुर में रामानुजी सम्प्रदाय के अनुयायी सन्त शिवराम रहते थे। कीनाराम ने उनसे कहा कि आपके पास रहने और साधना करने की इच्छा थी। शिवराम जी ने उन्हें अपने यहां रख लिया। गुरु की सेवा के बाद जितना समय मिलता था वे उतनी देर भजन करते और मस्त रहते। एक दिन उन्होंने दीक्षा देने के लिए कहा पर शिवराम जी ने उसे टाल दिया। कुछ दिन बाद फिर अनुरोध किया। शिवराम जी ने फिर टाल दिया। कीनाराम बराबर याद दिलाते रहे। अन्ततः कई महीनों बाद परीक्षा लेने पर शिवराम ने कहा कीनाराम चलो गंगा तट पर तुम्हें दीक्षा देते हैं।’ गुरु का आदेश पाते ही कीनाराम प्रसन्न मन उनके साथ चल दिए। रास्ते में अपना आसन, कमण्डल कीनाराम को देते हुए उन्होंने कहा ‘तुम यह सब लेकर घाट पर चलो, मैं आता हूँ।’ गुरुदेव शिवराम जी  की सामग्री लेकर कीनाराम घाट पर आकर बैठ गए । थोड़ी देर बाद उन्होंने महसूस किया कि गंगा की लहरें उनके पैरों पर आकर टकरा रही है। कीनाराम ने आचमन किया और कुछ ऊपर जाकर बैठ गए। थोड़ी देर बाद फिर वैसा ही हुआ। कीनाराम फिर उठे और काफी ऊपर जाकर बैठे। वहां भी गंगा आकर उनके पैरों से टकराने लगी। इस घटना को देखकर वह हक्के बक्के रह गए। उनके पीछे बाबा शिवराम मौन खड़े यह दृश्य देख रहे थे। उन्हें लगा कि कीनाराम अवश्य ही असाधारण व्यक्ति है। यह विलक्षण घटना थी। स्नान करने के बाद बाबा शिवराम कीनाराम को लेकर मन्दिर में गए और वहीं दीक्षा दी। दीक्षा ग्रहण करने के बाद कीनाराम प्रचंड रूप से जप साधना में लग गए। गुरु प्रेरणा से वे फिर स्वतंत्र घूमने लगे। समय आने पर हिमालय आ गए।

जय गुरुदेव 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं  कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो।

Leave a comment

हिमालय क्षेत्र के निवासी -प्रेम के अवतार

24 अगस्त 2021 का ज्ञानप्रसाद : हिमालय क्षेत्र के निवासी -प्रेम के अवतार https://drive.google.com/file/d/1S0wWaC_U_hfI-Elp0SEp-jpAzKlIwdIY/view?usp=sharing

रिसर्च तो हम कर  रहे थे पांडुकेश्वर ग्राम की और पहुँच गए “कलाप”  ग्राम में।  हाँ ,यह दोनों ही ग्राम अपनेआप में अत्यंत दिव्यता छिपाये हुए हैं।  ऐसे ही कई ग्राम, क्षेत्र परमपूज्य गुरुदेव की हिमालय यात्रा का अध्यन करते हमें जानने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, हमारे पास शब्द ही नहीं हैं कि कैसे उस गुरु का धन्यवाद् करें जिन्होंने उस प्रदेश का ज्ञान दिलवा दिया जो कभी discovery चैनल पर देखे थे लेकिन फॉरवर्ड करके छोड़ दिए थे कि क्या देखना इन जगहों को , क्या विशेष है इनमें। Maptia:Home to World of Stories   के opening comments ने ही दिल को ऐसे छुआ कि पांडुकेश्वर की  रिसर्च एक तरफ रह गयी और हम लग पड़े उनकी वेबसाइट की surfing करने।  इस भागदौड़ के संसार से दूर गढ़वाल उत्तराखंड स्थित कलाप नामक एक पुरातन ग्राम जहाँ के निवासियों को  प्रमति जी  ने “प्रेम के अवतार” की संज्ञा दी है, हमारे ह्रदय के और भी करीब लाकर रख दिया।  वह लिखती  हैं -इस ग्राम के लोग बिल्कुल उसी तरह के हैं जैसे भगवान ने उन्हें पैदा किया, बिल्कुल  ही  सादा ,दुनियादारी से दूर। प्रमति जी  “कलाप ट्रस्ट” के सूत्रधार आनंद संकर के निमंत्रण पर इस  दिव्य ग्राम में आयीं थीं । हुआ यह  कि 1990 के दशक के अंत में बैंगलोर की एक महिला अपने तीन बच्चों के साथ पहाड़ों के इस हिस्से में आई। उन्होंने यहाँ अपना  घर बनाया, एक ऐसा घर जो पूरी तरह से ऑफ-ग्रिड था और सौर ऊर्जा से चलता था। उन्होंने यहां कई साल बिताए जब बादलों की गरज और बाढ़ ने उनका बाकी की दुनिया से  संपर्क तोड़ दिया।  बाढ़  से एकमात्र लकड़ी का  पुल  जो शेष दुनिया का संपर्क साधन था वह भी टूट गया। कई साल बाद, आनंद शंकर की उन बच्चों में से एक के साथ एक अनौपचारिक मुलाकात हुई। उन्होंने आनंद को दुनिया के इस हिस्से से परिचित कराया। तब से लेकर आज तक आनंद ने  कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आनंद को उस जगह से प्यार हो गया और वे बार- बार यहाँ  आते रहे।  लेकिन उन्होंने  जल्द ही यहाँ की बड़ी समस्याओं ; स्वच्छता, शिक्षा और चिकित्सा-सहायता को देखना शुरू कर दिया। 

हमें भी  इस दिव्य भूमि के साथ एक अंतरात्मा का  स्नेह हो गया है।  हमें याद भी नहीं आता कि हमने इसी विषय पर कितने ही लेख लिखे हैं। हो सकता है  इसका कारण परमपूज्य  गुरुदेव के चरणस्पर्श से इस गांव की भूमि का हमारे साथ कोई सम्बन्ध हो। यह ग्राम  उत्तराखंड के ऊपरी गढ़वाल क्षेत्र का एक गाँव है। 7,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित, यह गांव देवदार (चीढ़ ) के जंगलों के बीच बसा है। यह ऊंचाई लगभग हिमाचल प्रदेश स्थित शिमला जितनी है परन्तु शिमला जैसा विकास इस गांव में सोचना भी शायद कठिन हो, सुपिन नदी यहाँ की मुख्य नदी है जो टोंस नदी से होकर यमुना नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है। कलाप ग्राम उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से 210 किमी और नई दिल्ली से 450 किमी दूर है। निकटतम रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डा देहरादून है। कलाप के लिए कोई भी डायरेक्ट बस सर्विस नहीं है। निकटतम शहर नेटवर तक पहुंचने में देहरादून से कार से 6 घंटे या बस से 10 घंटे लगते हैं। नेटवर से कलाप पहुँचने का केवल पैदल ही मार्ग है जिसमें लगभग 4 -5 घंटे लगते हैं और सीधी पहाड़ी चढाई है।

हम अपने सहकर्मियों से निवेदन करते हैं कि इस ग्राम का  सौंदर्य और सादगी का आभास करने के लिए साथ दी गयी केवल एक मिंट की वीडियो अवश्य देख लें।  इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि इस most remote ग्राम में जहाँ सुविधाओं की कमी के बावजूद यह लोग कितने प्रसन्न  हैं और गायत्री स्तवन तो है ही। कलाप ग्राम का वर्णन अभी आगे फिर आएगा। 

तो आइये चलें एक बार फिर गुरुदेव के पीछे -पीछे हिमालय यात्रा पर :

_____________________________

कल वाले लेख में हमने देखा था कि गुरुदेव सुमेरु पर्वत से नीचे उतरे।  वहीँ पर उन्हें दादा गुरु द्वारा भेजा योगी लेने आया था। गुरुदेव ने उस योगी को वीरभद्र नाम दिया था। नाम इसलिए देना पड़ा कि वह अपना कोई परिचय नहीं दे रहा था। पूछने पर यही कहता था कि दादा गुरु  ने  अपने साथ लिवा लाने के लिए यहीं भेजा है । इस बार वे नंदनवन में नहीं हैं। पिछली बार दादा गुरु  के जिस प्रतिनिधि ने मार्गदर्शन दिया था उसका नाम वीरभद्र ही था। पिछली यात्रा में जिस वीरभद्र का सान्निध्य मिला था वह मौन ही रहा था। उसे वीरभद्र के रूप में ही पहचाना था। अभी आए गुरुभाई को भी आचार्यश्री ने इसी नाम से पुकारा। उसी से पता चला कि दादा  गुरु  कैलाश  मानसरोवर के मार्ग में मिलेंगे। 

कहाँ कलाप क्षेत्र और कहाँ कैलाश मानसरोवर – यह दूरी और यहाँ का वातावरण बिलकुल ही अविश्वसनीय और आश्चर्यजनक है लेकिन है बिलकुल ही सत्य। हम दिव्य आत्मा गुरुदेव की बात कर रहे हैं न कि किसी साधारण मानव की। 

उससे बातचीत करते हुए आचार्यश्री को लग रहा था कि रास्ते में गुरुभाई से हिमालय के बारे में कई नई जानकारियाँ मिल सकती हैं। आचार्यश्री ने जब पहली बार वीरभद्र कहकर पुकारा तो उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा। आचार्यश्री ने कहा, ‘मैं गुरुदेव को भगवान शंकर के रूप में देख रहा हूँ। आप उनके गण या संदेशवाहक हैं। भगवान शंकर के गण तो वीरभद्र ही कहे जाते हैं न।’ सुनकर योगी चुप रह गए। योगी तपोवन से ही साथ हो लिया था। उसके आने से पहले ही संकेत आने लगे थे कि आगे का मार्ग दुर्गम है। मई, जून के महीने थे। मौसम थोड़ा सुहाना और गर्म-सर्द सा  था। मैदान जैसी गर्मी तो नहीं थी लेकिन हिमालय में रहने वाली शीतकाल जैसी सर्दी भी नहीं थी। उस समय चारों ओर हरियाली छाई हुई थी। आचार्यश्री के मन में इच्छा जागने लगी कि कुछ दिन यहां रहा जाए। योगी ने उस इच्छा को निरस्त कर दिया।  आचार्यश्री ने उस योगी से अपने बारे में कुछ बताते चलने का अनुरोध किया। आशय यह था कि बातें करते करते  रास्ता आसानी से कट जाएगा। वीरभद्र ने स्पष्ट मना कर दिया कि हमारे जीवन में  कुछ भी ऐसा नहीं हुआ जो बताने लायक हो। आचार्यश्री ने कहा, “अपने निज के बारे में भले ही न बतायें, दादा गुरु  के सान्निध्य में हुए लाभ और अनुभूतियों के बारे मे ही बताते चलें। मुझे उनका प्रत्यक्ष सान्निध्य केवल  दो-तीन दिन के लिए ही मिला है। आप तो बहुत  भाग्यशाली  हैं जो  आपको उनका सान्निध्य प्रायः मिलता रहता है।” योगी ने आचार्यश्री की बात का खंडन किया। उन्होंने कहा -यह सच है  हिमालय के सिद्ध क्षेत्र में रहने से साधना में थोड़ी बहुत  अनुकूलता रहती है और  संसार क्षेत्र जैसे व्यवधान इधर नहीं आते,  यहां के सिद्ध वातावरण का लाभ भी मिलता है लेकिन प्रत्यक्ष सान्निध्य यानि  मोह से तो बचना ही पड़ता है। योगी के कहने का  आशय था कि दादा गुरु  का सानिध्य उन्हें भी यहां बहुत सुलभ नहीं रहा है। आचार्यश्री ने कहा कि दादा गुरु के संदेशवाहक बनकर आप तो  बहत ही  सौभाग्यशाली सिद्ध हुए हैं। योगी ने कहा कि इस तरह तो  तुम मेरे  और मुझ जैसे हजारों शिष्यों की तुलना में लाख गुना ज्यादा सौभाग्यशाली हो। तुम्हें तो दादा गुरु  ने लाखों, करोड़ों लोगों के लिए अपना संदेशवाहक चुना है। आचार्यश्री के पास वीरभद्र के इस उत्तर का कोई प्रत्युत्तर नहीं था।

सुमेरू पर्वत की सीमा पार हो चुकी थी। वरुण वन शुरू हो गया था। वहां की मिट्टी नम थी, कहीं कहीं इतनी गीली कि कीचड़ सी लगने लगती थी लेकिन इस वन में वनस्पतियां बहुत थीं। देखकर आचार्यश्री को नंदनवन याद हो आया। चौखंबा शिखर दूर से ही दिखाई दिया। कहते हैं कि पांडवों ने यहीं से स्वर्गारोहण ( स्वर्गवास ) किया था। इसी तरह का एक शिखर तिब्बत के पास भी है। योगी ने बताया कि हिमालय में इस तरह के शिखर सरोवर और पर्वतों की भरमार है।

योगी के साथ चलते हुए शाम ढलने लगी। तपोवन की सीमा जहाँ समाप्त होती थी वहीं गौरी सरोवर था। मान्यता है कि माता  पार्वती यहां सरोवर रूप में विराजती हैं। पर्वत को शिव का रूप मानते हैं। गंगा ग्लेशियर के सहारे-सहारे आगे बढ़े। कुछ मील चलने पर एक झील दिखाई दी। उस झील किनारे दो संन्यासी ध्यान लगाए बैठे थे। वस्त्र के नाम पर उन्होंने विचित्र तरह का कौपीन पहना हुआ थे। वह पत्तों और वृक्ष की छालों से बना था। कारीगरी इतनी बारीक थी कि तपस्वियों को उसके लिए समय निकालने की बात नहीं सोची जा सकती थी। इस तरह के वस्त्र किन्हीं श्रद्धालुओं या आसपास कोई बस्ती हो तो वहां के लोगों ने ही दिए होंगे। चौखंभा शिखर के पास से गुजरते हुए दूर कुछ झोपड़ियां दिखाई दीं। समतल मैदान वहां नहीं था। झोपड़ियां बनाने के लिए समतल मैदान का उपयोग किया गया था। सैकड़ों साल पहले  यहां एक बड़ा गांव था । तब यहां सिद्ध साधक रहते थे। अब उनके वंशज रहते थे।’ साथ चल रहे योगी ने बताया कि इस गांव में होते हुए चलना चाहिए। उस गांव का नाम था ‘कलाप’। यह नाम क्यों पड़ा? आचार्यश्री के मन में प्रश्न तो उठा लेकिन उसमें ज्यादा उलझे नहीं। योगी ने कह दिया था कि यह  गांव हजारों वर्ष पुराना है।इस गांव का नाम कलाप है।  कलाप गांव और उसके आसपास के गांव महाभारत की पौराणिक कथाओं में डूबे हुए हैं। कलाप का मुख्य मंदिर कौरवों के साथ लड़ने वाले योद्धा कर्ण को समर्पित है। कर्ण की मूर्ति को इस क्षेत्र के विभिन्न गांवों के बीच लेकर जाया जाता है । जब मूर्ति को एक गांव से में ले जाया जाता है, तो इसे “कर्ण महाराज उत्सव” के रूप में मनाया जाता है। कलाप में पिछला उत्सव 2014 में था, और यह एक दशक से अधिक समय के बाद ही फिर से होगा जनवरी में इस गाँव में हमेशा ही पांडव नृत्य होता है । इस नृत्य रूप में महाभारत की विभिन्न कहानियों का अभिनय किया जाता है।आपको जीने, खाने और पहनने के लिए जो कुछ भी चाहिए वह कलाप में बनाया जाता है। यह जीवन का एक अनूठा तरीका है, जो दूरस्थ ( भारत का सबसे दूर  स्थान ) स्थान की कठोरता से लगाया जाता है। यहाँ भारत की सीमा समाप्त हो जाती है। 

महाभारत के समय भी यहां सिद्ध पुरुषों का वास था। धृतराष्ट्र ने इसी क्षेत्र में आकर उग्र तप किया था और परमधाम गए थे। भागवत में यहाँ सिद्धों, ऋषियों और तापस महात्माओं के सत्र लगाने  का उल्लेख आता है। योगी के साथ आचार्यश्री ने कलाप ग्राम में प्रवेश किया। वे सीमा पर ही थे कि तीव्र प्रकाश की अनुभूति हुई। दिन का समय था। सूर्य का प्रकाश होना स्वाभाविक ही था लेकिन दिखाई दे रहा प्रकाश आभायुक्त था जैसे किसी स्वर्ण नगरी में पहुंच गए हों। गांव में प्रवेश करते ही वल्कल पहने योगी, कौपीन धारण किए बटुक और घुटे हुए सिर के संन्यासी दिखाई दिए थे। ये सभी लोग स्वस्थ थे। प्रत्येक की आयु में बाल, युवा और वृद्ध जैसा अंतर था लेकिन शरीर सभी के सक्रिय और सक्षम थे।

कलाप का अद्भुत लोक

गांव में गुलाब की भीनी-भीनी सुगंध व्याप्त थी। लगता था जैसे किसी उद्यान में आ गए हों। जहां तहां सुगंधित फूलों के पौधे लगे थे। झाड़ियां भी थीं और क्यारियां भी। उपवननुमा इस बस्ती में कहीं कहीं हवन कुंड बने थे। कुछ संन्यासियों को एक जगह बैठा देखकर योगी और आचार्यश्री रुके। सबसे बुजुर्ग दिखाई दे रहे उन संन्यासियों में से एक ने हाथ उठाकर आचार्यश्री को आशीर्वाद दिया। उस संन्यासी का नाम सत्यानंद था।  इस तरह का वर्णन सुनकर हमें तो यह क्षेत्र  सिद्धक्षेत्र का ही आभास दे रहा है  तो मित्रो हम आज का लेख यहीं पर समाप्त करने की अनुमति लेते हैं और सन्यासी सत्यानंद की रोचक दिव्य कथा अगले लेख में प्रस्तुत करेंगें। 

जय गुरुदेव 

Leave a comment

सुमेरु पर्वत क्षेत्र में गुरुदेव की निखिल और महावीर स्वामी के साथ भेंट 

23 अगस्त  2021 का ज्ञानप्रसाद – सुमेरु पर्वत क्षेत्र में गुरुदेव का निखिल और महावीर स्वामी के साथ भेंट 

परमपुज्य गुरुदेव की हिमालय यात्राओं पर जितना  भी लिखा जाये कम ही है ,इससे भी बड़ी बात यह है कि उसी चैप्टर को बार -बार पढ़ने  से  revision तो होता ही है , हर बार नई बातों का पता चलता है।  जो सहकर्मी  हमारे साथ पिछले वर्ष भी थे जानते होंगें कि  इसी तरह का एक लेख तब भी लिखा था। लेकिन आज इसमें और अधिक जानकारी डाल कर ठीक उसी प्रकार edit किया है जिस प्रकार  किसी पुस्तक का नया  एडिशन तैयार किया जाता है। अक्सर  हम लोग  केवल  टाइटल को देखते हैं और छोड़ देते हैं कि यह पुस्तक तो पहले ही पढ़ी हुई है।  लेकिन ऐसा नहीं होता है – लेखक हर बार, हर एडिशन में नई जानकारी देता है चाहे कितनी भी छोटी न हों।इस लेख में हम गुरुदेव के साथ गोमुख ,गंगोत्री ,सुमेरु पर्वत क्षेत्र में चलेंगें। 21000 फुट ऊंचाई पर स्थित यह वही सुमेरु पर्वत है जो पुराणों में वर्णित अमृत मंथन के समय प्रयोग किया गया था। 21000 फुट ऊंचाई को जब हम मीलों में  बदलते हैं तो लगभग चार मील बनते हैं , यह ऊंचाई लगभग उतनी ही  है जिस ऊंचाई  पर विमान  उड़ते हैं।  तो इतनी ऊंचाई पर गुरुदेव कैसे पहुंचे – एक कल्पना ही लगती है , हाँ यह कल्पना ही है ,लेकिन केवल  हमारे  लिए, गुरुदेव जैसी  सिद्ध आत्मा के लिए नहीं। आज के लेख में आप इस क्षेत्र का आईडिया लेने के लिए  एक वीडियो भी देख सकते हैं।    https://youtu.be/oT8vp8OMtrg

_____________

निखिल की कहानी :

गुरुदेव को योगी अकेला छोड़ कर चला गया। गुरुदेव कितनी ही देर प्रकृति का सौंदर्य निहारते रहे। फिर उठ कर चलकदमी करने लगे। अभी तक तो योगी का साथ था ,अकेलेपन का ज़्यादा अनुमान न था। गुरुदेव उठे और चल पड़े। पहाड़ी के नीचे ढलान पर एक झोंपड़ी दिखाई दी। अभी कुछ पता नहीं चल रहा था कि किस तरफ जाना है। इसलिए झोंपड़ी ने अपनी ओर आकर्षित कर दिया। जब तक आगे जाने का कोई संकेत न मिले यहीं ठीक है। गुरुदेव को दादागुरु जैसे -जैसे निर्देश देते थे गुरुदेव बिना किसी प्रश्न के पालन करते रहे। समर्पण ही कुछ ऐसा था कि किन्तु -परन्तु की कोई सम्भावना ही नहीं। वस्त्र,दरी और लोटा झोंपड़ी के अंदर रख कर आस पास के वातावरण का निहारन करने निकल पड़े। भांति -भांति के फूल ,बर्फ से ढकी चोटियाँ ,और यहाँ वहां झरनों का मनोहर दृश्य किसी सौभाग्यशाली को ही प्रदान होता है। गुरुदेव फिर झोंपड़ी में आ गए ,पूजा आराधना के बाद सोने का प्रयास करने लगे। मार्गदर्शक का सानिध्य होने के बावजूद एक प्रश्न कचोट रहा था कि आगे क्या होगा। रात्रि गहराती जा रही थी परन्तु नींद थी कि आने का नाम तक नहीं था। करवटें बदलने से उचित समझा कि बाहर आकर प्रकृति से संवाद किया जाये। झोंपड़ी के सामने एक झरने के पास शिला के ऊपर बैठ गए। झरने के दूसरी तरफ देखा तो एक युवा सन्यासी बैठे साधना कर रहे थे। दृष्टि जाते ही साधक ने ऑंखें खोली और गुरुदेव को निहारा। वह उठ कर गुरुदेव के पास आया और प्रणाम किया। उसके प्रणाम करते ही पुरानी स्मृति ह्रदय में उतर आयी। गुरुदेव को साधक का कुछ ऐसे स्मरण हो आया जैसे चलचित्र हो। ऐसे लगा जैसे कि इस युवा सन्यासी ने किसी समय गुरुदेव के सानिध्य में साधना आरम्भ की हो और सन्यासी बन कर कहीं दूर चला गया हो। स्मृति पर थोड़ा ज़ोर डाला तो स्मरण हो आया कि दीक्षा का स्थान वाराणसी था। सन्यासी गुरुदेव की तरफ देख रहा था। गुरुदेव ने कहा, ” अरे निखिल तू यहाँ क्या कर रहा है ?” निखिल कहने लगा -गुरुदेव आपके बिना तो पत्ता तक नहीं हिल सकता तो आप ऐसा क्यों पूछ रहे हो ? गुरुदेव ने फिर पूछा – जिन सिद्धियों के लिए तुम साधना कर रहे थे वह मिली कि नहीं। निखिल को फिर हैरानगी हुई लेकिन दूसरे ही पल सब स्पष्ट हो गया। गुरुदेव ने कहा – अपने शरीर को स्फटिक ( quartz ) की भांति पारदर्शी बना कर तो दिखाओ। इसके कुछ पल बाद ही निखिल का शरीर शीशे की भांति पारदर्शी हो गया और आर पार दिखने लगा। अगले ही पल निखिल वायुभूत होने लगा ( हवा में उड़ने लगा ) और देखते ही देखते गुरुदेव की आँखों से ओझल हो गया। थोड़ी देर बाद निखिल की आवाज़ आयी कि मैं इस समय धरती से चार मील ऊपर चल रहा हूँ ,नीचे गंगोत्री बह रही है और मैं गोमुख की तरफ जा रहा हूँ । तभी थोड़ी देर पश्चात् निखिल नीचे आता दिखाई दिया ,आवाज़ आयी मैं अंजुली मैं गंगोत्री का जल लेकर आ रहा हूँ। तब गुरुदेव देखते हैं निखिल नीचे शिला पर आ गया ,उसने अंजुली में लिया जल गुरुदेव के श्री चरणों मैं अर्पित कर दिया और नतमस्तक खड़ा हो गया। गुरुदेव ने निखिल की पीठ थपथपाई और कहा इसको अपनी सफलता मत मानना ,ऐसे चमत्कार ऐन्द्रजालिक हैं। ऐंद्रजालिक या इन्द्रजालिक अक्षर देवताओं के राजा इंद्र से संबंधित है। राजा इंद्र को छली या मायावी माना गया है ,आज के युग मैं जिसे जादू कहा जाता है वही ऐन्द्रजाल है। गुरुदेव ने कहा अगर तुम अपने आप को परमात्मा के कार्यों में लगा सको तो अपने आप को अधिक भाग्यशाली अनुभव करोगे। निखिल ने गुरुदेव से पूछा मुझे क्या करना चाहिए ? गुरुदेव ने कहा :

” जितनी जल्दी हो सके यह प्रदेश छोड़ कर समाज में जाओ। वहां तुम जैसे प्रतिभावान मनुष्यों की ,निर्मल ,निश्छल ( innocent, जिसको छल कपट न आता हो ), ऊर्जावान आत्मायों की अत्यंत आवश्यकता है। तुम्हारे भीतर इस प्रकार की क्षमता है ,तुम इस क्षमता को मानवीय चेतना के  उत्थान और उन्नति के लिए लगाओ। वहीँ तुम्हारी एकांत साधना पूरी होगी “

जब हमारे पाठक इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं तो उन्हें दादा गुरु द्वारा हमारे पूज्यवर को ” बोओ और काटो ” वाला निर्देश अवश्य स्मरण हो आया होगा। जब दादा गुरु ने हमारे गुरुदेव को कहा था – भगवान के खेत में बोओ और काटो तो संकेत यही था कि यह संसार ही भगवान का खेत है। जैसे मक्की का एक बीज धरती माता का संरक्षण प्राप्त कर ,सूर्य पिता की ऊर्जा से सौ गुना अधिक परिणाम देता है ठीक उसी प्रकार भगवान के कार्य में दिया हुआ अपना योगदान कितने ही गुना होकर प्रकट होता है। इस तथ्य का जीवंत परिणाम हमारे सूझवान पाठकों के समक्ष 15 करोड़ गायत्री परिवार के साधकों के रूप में दर्शित है। उस महान आत्मा को , इतने सादगी भरे साधु को, जिनकी हम सब संतान हैं हमारा सदैव आभार एवं चरण स्पर्श रहेगा।

पांडुकेश्वर /पाण्डुक्य की कहानी :

निखिल के जाने के बाद गुरुदेव समेरु पर्वत से तपोवन जाने के लिए नीचे उतर रहे थे। रास्ते में एक अत्यंत छोटा सा गांव आया ,नाम था शायद पांडुकेश्वर। स्थानीय लोग इसे पाण्डुक्य कहते थे। महाभारत के प्रसिद्ध पात्र पाण्डु के साथ जुड़ा था यह गांव। इस बस्ती में सात परिवार थे। हिमपात के कारण पक्के मकान बनाने का रिवाज़ नहीं था। कच्चे मकान और झौंपडियां ही दिखाई दीं। इस बस्ती की तीसरी ढलान पर एक झोंपड़ी में से एक वृद्ध निकल कर आए। उन्होंने मामूली से वस्त्र पहने थे। गुरुदेव ने उनको हाथ जोड़े और उन वृद्ध ने गुरुदेव के अभिवादन का उत्तर दिया और स्वागत में गुरुदेव को कहा -आइये पधारिये ,स्वागत है महाभाग। स्वागत के उपरांत खुद ही अपना परिचय दे दिया। वह सन्यासी वृद्ध कहने लगे :

मैं चालीस वर्ष से यहाँ रह रहा हूँ। मेरे साथ एक साधक और भी हैं ,जगन्नाथ स्वामी। उनके इलावा पांच और परिवार हैं। उन्होंने अपना नाम महावीर स्वामी बताया। उनके कहने पर गुरुदेव महावीर जी की झोंपड़ी में अंदर आ गए। उन्होंने कुछ फल वगैरह अर्पण किये। आवभगत करते -करते बात भी कर रहे थे। उन्होंने कहा :

जब मनुष्य के भीतर कुंडलिनी जागृत होती है ,तब उसका वास्तविक जीवन आरम्भ होता है ,उससे पहले वाले जीवन को तो पाशविक ही कहना चाहिए। शास्त्रों मैं चौरासी लाख योनियों का वर्णन आता है लेकिन कोई आवश्यक नहीं कि मनुष्य शरीर इन सब को धारण करे। मनुष्य का शरीर रहते हुए भी मानव पशुओं वाली योनि में जी रहा होता है। उदाहरण के लिए मनुष्य का जीवन होते हुए भी मानव को व्यर्थ की चिंताएं घेरे रहती हैं। हर सुबह उठना ,खाना -पीना और दिन-प्रतिदिन की दिनचर्या निपटाते हुए रात्रि को सो जाना और फिर एक और दिन। इसी तरह कई वर्ष बीत जाते हैं ,इस तरह के जीवन को गधे की योनि कहते हैं। कुत्ते ,बिल्ली ,चूहे जैसे लक्षण दिखने वाले मनुष्य इसी योनियों के कहे जा सकते हैं। कुण्डिलिनी जागृत होने के बाद सात जन्मों का प्रचलन है परन्तु अगर गुरु का अनुग्रह हो तो कोई आवश्यक नहीं कि सारे जन्म काटने हैं ,इससे पहले ही निर्वाण पाया जा सकता है। लेकिन सामान्य स्थिति में सात जन्म बदलने ही पड़ते हैं।

महावीर स्वामी ने कहा यह उनका छटा जीवन है ,अभी एक जन्म शेष है। सातों जन्मों की विवेचना करते हुए योगी ने बताया कि अगला जन्म करुणा और सहृदयता के गुण अधिक लेकर आता है। लेकिन अगर पूर्व जन्म का प्रभाव अधिक हो तो मानव पीछे की ओर खिंचा जाता है। सभी जीवनों की व्याख्या में पांचवें जीवन का महत्व सबसे अधिक बताया गया है। इस जन्म में मानव के मुख पर एक विशेष आभामंडल होता है ,मनुष्य योगी होते हुए भी गृहस्थ होता है और गृहस्थ होते हुए भी योगी होता है। उस व्यक्ति के जीवन के लोभ ,वासना का आवेग कदापि नहीं होता। इतना कह कर महावीर योगी चुप हो गए।

गुरुदेव देखते रहे कि महावीर स्वामी अपने इस छटे जीवन के बारे में या फिर कुंडलिनी जागरण के बाद के बारे में बताएंगें ,परन्तु उन्होंने गुरुदेव को कहा :

” आप तो मुझसे भी आगे की भूमिका में पहुँच चुके हैं , आप गृहस्थ हैं और जिस महाकार्य का दाइत्व लेकर संकल्पित हैं आपको तो एक दिन भी इधर उधर नहीं होना चाहिए पर आप निस्पृह ( इच्छारहित ) भाव से हिमालय का विचरण कर रहे हैं। यह निस्पृह भाव छटे जीवन से कम में नहीं आता “

महावीर स्वामी की कहानी भी हमारे गुरुदेव जैसी ही है। छोटी सी आयु में ही कृष्णानद नामक गुरु मिल गए थे , उन्होंने बचपन का स्मरण कराया। कहने लगे -तुम हाई स्कूल में पढ़ते होंगे तबसे हमारा -तुम्हारा सम्बन्ध है। तुम पिछले जन्म में मेरे पुत्र थे ,इस जन्म में मैंने गृहस्थ बसाया ही नहीं इसलिए तुम्हे ही पुत्र मान लिया। इसके बाद मेरे गुरु ने यहीं रहने का निर्देश दिया। आज चालीस वर्ष हो गए हैं इसी प्रदेश में रहते हुए। गुरु जी के दर्शन कभी भी नहीं हुए परन्तु सूक्ष्म संरक्षण प्रतिक्षण मिलता रहा है।

हमारे गुरुदेव कहने लगे ,” हमें भी दो -तीन दिन से अधिक कभी ही प्रतक्ष्य सानिध्य मिला हो लेकिन हमारी साँसों में ,हमारे जीवन को सूक्ष्म मार्गदर्शन आज तक मिल रहा है।” यह कह कर गुरुदेव पहाड़ के नीचे की तरफ चल पड़े। जय गुरुदेव 

Leave a comment

हिमालय की अलौकिक शक्तियों को प्रमाणित करती है मिस्टर फैरेल की यह सत्यकथा – पार्ट 2  

21 अगस्त 2021 का ज्ञानप्रसाद -हिमालय की अलौकिक शक्तियों को प्रमाणित करती है मिस्टर फैरेल की यह सत्यकथा – पार्ट 2  

आज प्रस्तुत है मिस्टर फैरेल की सत्यकथा का पार्ट 2 आज के लेख में आपके लिए कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये गए है जिसके लिए हमें विज्ञानं का सहारा लेना पड़ा है।  हमने अपने अल्पज्ञान से वैज्ञानिक पार्ट को अधिक से अधिक सरल रखने का प्रयास  किया है।  यह इस सप्ताह का अंतिम लेख होगा और अब हमारी मुलाकात सोमवार की सबह को होगी।  _______________________________

मिस्टर फैरेल कैंप में लौट आए, लोग उन्हें ढूंढ रहे थे। जब मिस्टर फैरेल ने राजा को घटना सुनाई तो  उन्होंने अपना टेंट वहां से हटा कर  करीब 200 गज़ दूर लगा  दिया।  उस दिन की शाम को एक युवक वास्तव में उस जगह की तलाश में आया भी  था। हर तरह से खुद को संतुष्ट करने के बाद, वह युवक  वहां बैठ गया। इस बीच, मिस्टर  फैरेल भी वहां पहुंच गए। जैसे जैसे समय व्यतीत होता मिस्टर  फैरेल की  जिज्ञासा और अधिक तीव्र होती जा रही थी। कुछ ही देर में साधु महाराज  भी वहाँ पहुँच गए। मिस्टर फैरेल और युवक ने उनके पैर छुए और उनके निर्देश की प्रतीक्षा में खड़े हो गए वह स्थान घने पेड़ों के बीच में था। अग्नि प्रज्ज्वलित करने के बाद साधु महाराज ने कुछ पूजा की, कुछ मंत्रों का पाठ किया और उन्हें  ध्यान की मुद्रा में बैठने के लिए  कहा। साधु महाराज के  माथे से प्रकाश की एक किरण निकली और एक  घने पेड़ के तने पर प्रकाश का एक गोलाकार पुंज  दिखाई दिया।उसके उपरांत उन दोनों ने जो कुछ भी इस गोलाकार प्रकाश पुंज में देखा वह एक सिनेमा जैसा था” उन्होंने पात्रों को देखा जो सचमुच  में चल रहे थे  और बातचीत कर रहे थे।  उन्होंने उस युवक के पिछले जन्म की घटनाओं को अपनी नग्न आंखों से देखा। बीच-बीच में युवक उत्तेजित हो जाता था और कहता- “हां-हां मैंने ऐसा किया था”। अंत में उस युवक ने  साधु महाराज  के पैर छुए और कहा  “भगवान! अब मेरा सांसारिक लगाव टूट गया है और  मैं अपने पिछले जीवन की  अधूरी  साधना को पूरा करने  के लिए तैयार हूं। कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिये  ताकि मैं इस अधूरे कार्य को  पूरा कर सकूं ।”साधु महाराज ने कहा – “मेरे बेटे! आज तुम यहाँ विश्राम करोऔर कल प्रातः ही  अपने घर लौट जाओ। उचित समय पर मैं तुम्हें बुलाऊँगा।” 

उसके बाद मिस्टर फैरेल को पता ही नहीं चला कि उस युवक को दोबारा कब बुलाया गया? लेकिन मिस्टर फैरेल भारतीय धर्म और अध्यात्म के कट्टर भक्त बन गए।  मिस्टर  फैरेल ने स्वयं इस घटना का वर्णन  “सप्तहिक हिंदुस्तान” के 17 मई  1959 वाले  अंक में किया है। 

हमारे वरिष्ठ सहकर्मी हिंदी की इस साप्ताहिक पत्रिका से  भलीभांति  परिचित होंगें। बड़े पन्नों वाली इस मैगज़ीन  की याद ताज़ा करने के लिए हमने गूगल सर्च करके आपके समक्ष संलग्न चित्र में शामिल  की है। यह 1962  की कॉपी है और मूल्य केवल 40 पैसे। हमारे स्वर्गीय  मम्मी इस मैगज़ीन के बहुत ही फैन थे। उन दिनों TV तो होता नहीं था , यह मैगज़ीन ही उनकी सबसे बड़ी  साथी थी ।        

स्वामी योगानंद की पुस्तक ” Autobiography of a Yogi ” में एक ऐसी ही घटना का वर्णन एक प्रसिद्ध भारतीय योगी श्री श्यामा चरण लाहिरी के जीवन में हुआ है, जिन्हें लाहिरी महाशय के नाम से जाना जाता है। लाहिरी  महाशय योगानंद जी  के दादा गुरु थे। उन्हें भी हिमालय के एक सिद्ध बाबा जी ने बुलाया था जिन्होंने उन्हें क्रिया योग” का विज्ञान सिखाया। हमारे दादा गुरु सर्वेश्वरानन्द जी ने भी गुरुदेव को  हिमालय में बुलाकर उन्हें कितना ही ज्ञान प्रदान किया था।  सिद्ध योगीियों द्वारा  इन उच्स्तरीय आत्माओं को बुलाने का  उदेश्य था कि  कहीं  यह  पुरातन ज्ञान विलुप्त ही  न हो जाए। भारतीय शास्त्र शिव, भैरव, हनुमान, अश्वत्थामा और कई सिद्धों जैसी अमर आत्माओं के वर्णन से भरे हुए हैं। 

कल्कि पुराण में एक कथा है, जो इस प्रकार है: जब भगवान कल्कि ने देखा कि सारा संसार कामवासना, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, आलस्य आदि विकृतियों में डूबा हुआ है और आत्माओं का प्रकाश बुझ गया है  तो उन्होंने जनता का मार्गदर्शन करने का फैसला किया। अज्ञान का अंधेरा इतना  घना था कि  सारा संसार भौतिकवाद और इन्द्रियों के सुखों में   बुरी तरह फँसा हुआ था । भगवान कल्कि ने महसूस किया कि उनके पास जनता के इस जागरण के लिए आवश्यक शक्ति की कमी है। तब उनके आध्यात्मिक गुरु परशुराम ने उन्हें हिमालय में बुलाया और उन्हें उस स्थान पर तपस्या करने के लिए कहा, जहां उन्होंने स्वयं (परशुराम) की थी । इस तपस्या ने कल्कि के भीतर उस विशाल शक्ति को जगाया, जो युग परिवर्तन के लिए आवश्यक थी। भगवान परशुराम का जन्म वैदिक युग में हुआ था, जो कलियुग से बहुत पहले आया था। कलियुग में उनकी उपस्थिति भी उनकी अमरता का संकेत है और इस बात का प्रमाण है कि उनके जैसी अमर आत्माएं अभी भी हिमालय में मौजूद हैं। वैदिक युग वाले  सिद्ध ऋषि कलियुग वाली आत्माओं  को बुला सकते हैं , जो कि दो अलग -अलग युगों  की बाते हैं तो एक  जन्म का अधूरा  कार्य दुसरे जन्म में पूरा करना कोई हैरान करने वाली बात नहीं है।     

इन्ही तथ्यों का एक और उदाहरण :

डॉ. हरि दत्ता भट्टा, शैलेश ने  साप्ताहिक मैगज़ीन धर्मयुग के 23  अगस्त 1964 वाले अंक में अपने पर्वतारोहण अनुभव का एक दिलचस्प विवरण दिया था । धर्मयुग भी उन दिनों की बड़े पन्नों वाली बहुचर्चित मैगज़ीन थी  गढ़वाल स्थित जनवाली  पहाड़ी की यह घटना अमर आत्माओं को और भी परिपक्व करती है।   यह पहाड़ी समुद्र तल से 22000 फीट से ऊपर है जहाँ डॉक्टर दत्ता अपने पर्वतारोहण दल के साथ जा रहे थे। उन्हें विश्वास था कि  किसी अलौकिक शक्ति ने उन्हें और उनके साथियों को  भूस्खलन ( landslide)  के नीचे दबने से बचा लिया। 

“ये सभी घटनाएं इस बात को साबित करती हैं कि उच्स्तरीय  अलौकिक शक्ति रखने वाली अमर आत्माएं अभी भी हिमालय में मौजूद हैं और वे अनंत काल तक वहीं रहेंगी। आधुनिक वैज्ञानिक भी “जीवन के अमृत” की खोज में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं। जीवन के अमृत का अर्थ है जीवन को अनंत काल तक जीवित रखना – मृत्यु को रोक कर रखना। रूस, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, अमेरिका आदि के प्राणी विज्ञानी लंबे समय से उम्र बढ़ाने  और मृत्यु की प्रक्रिया की जांच कर रहे हैं। अब तक प्राप्त परिणामों के आधार पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला है कि मृत्यु कोई आवश्यक  घटना नहीं है। कोई ज़रूरी नहीं कि मृत्यु होनी ही है – बुढ़ापा एक तरह की बीमारी है। यदि इसका इलाज खोजै जा सके  तो “ मनुष्य  एक हजार साल तक जीवित रह सकता है।” आयुर्वेद में वर्णित कायाकल्प  के तरीके भी इस तथ्य को साबित करते हैं। वास्तव में मृत्यु biological  systems के पतन का परिणाम है। जब धीरे-धीरे शरीर के अंगों की कार्यक्षमता कम  होती जाती है तो यही है  बुढ़ापे  का कारण है और इसी कार्यक्षमता की कमी के कारण  मृत्यु हो जाती है।यदि life style और biological systems   को स्वस्थ रखा जाए और नए cells  बनने  की प्रक्रिया को बरकरार रखा जाए, तो मनुष्य को अनंत काल तक जीवित रखा जा सकता है।” आयुर्वेद का अध्ययन करने के बाद, आसानी से यह  निष्कर्ष निकाल सकते  हैं  कि प्राचीन ऋषियों और विद्वानों ने कई जड़ी-बूटियों, फलों और chemicals  की पहचान की थी, जो शरीर के कायाकल्प में मदद करते हैं। काया और  कल्प  दो शब्दों से योग से कायाकल्प बनता है जिसका अर्थ है शरीर का बदल जाना -नया शरीर प्राप्त  करना एक प्रचलित मुहावरा है। “हम  भोजन नहीं करते, भोजन है जो हमें  खाता है। हमारा भौतिक शरीर रक्त से पोषित होता है। यही रक्त  पूरे शरीर को ऑक्सीजन प्रदान करता है। ऑक्सीजन और अन्य  द्रव शरीर में चेतना बनाए रखते हैं। यह सब  कार्य भावनाओं के माध्यम से पूरा होता है । यह विचार और भावनाएं ही हैं जो अलग-अलग hormones को  जन्म देती हैं। ये हार्मोन शरीर की प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। इसलिए, ऐसा प्रतीत होता है कि शरीर को स्वस्थ रखने की जिम्मेदारी हमारी भावनाओं और विचारों पर है जो जीवन का वास्तविक सार है।” Hormonal science  का विवरण  किसी और लेख में करेंगें।   

मिस्टर  क्लार्क ने अपनी पुस्तक ‘स्पेस ओडिसी’ में लिखा है कि 200 से 400 वर्ष तक चलने वाली अंतरिक्ष यात्रा करने के लिए अंतरिक्ष यात्री को शून्य से कम तापमान पर सुप्त अवस्था में रखना आवश्यक होगा। इस वैज्ञानिक खोज से देखा जाए तो हिमालय के उन क्षेत्रों  में जहाँ सारा वर्ष बर्फ जमी रहती है, अमर प्राणियों के अस्तित्व को एक कल्पना” नहीं, सच्चाई , माना जा सकता है। वास्तव में, हिमालय क्षेत्र अनादि काल से सच्चे योगियों और महात्माओं का विशेष स्वर्गीय  स्थल रहा है। इस पवित्र क्षेत्र में रहने वाले महान योगी  कहीं और नहीं मिल सकते । कहा जाता है कि तिब्बत में ज्ञानगंज  योगाश्रम है जो योगियों का प्रशिक्षण संस्थान है। ऐसा माना  जाता है कि  सैकड़ों योगी यहाँ पर रहते हैं  और आंतरिक लोकों के रहस्यों पर शोध कर रहे हैं । भौतिक क्षेत्र में अलग  यह सिद्धाश्रम सामान्य व्यक्तियों के लिए सुलभ या दृश्यमान नहीं है । केवल मानसिक रूप से जागृत और प्रतिभाशाली साधकों को ही इस सिद्धाश्रम में प्रवेश का सौभाग्य प्राप्त है। 

बहुत बहुत धन्यवाद्।       

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं  कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली

किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। जय गुरुदेव

Leave a comment

हिमालय की अलौकिक शक्तियों को प्रमाणित करती है मिस्टर फैरेल की यह सत्यकथा – पार्ट 1 

20 अगस्त 2021 का ज्ञानप्रसाद –  हिमालय की अलौकिक शक्तियों को प्रमाणित करती है मिस्टर फैरेल की यह सत्यकथा – पार्ट 1 

11 और 12 अगस्त के लेखों में हमने आपको ज्ञानगंज ,सिद्धाश्रम ,शांगरिला इत्यादि हिमालय के अलौकिक क्षेत्रों का वर्णन किया था। Aajtak,ZeeNews य फिर किसी और TV चैनल की तरह  यह विषय इतना पॉपुलर हो गया है कि क्या सही है और क्या fake  है बताना कठिन हो गया है। आप यह शब्द गूगल सर्च बार में डाल कर तो देखिये, ऐसे -ऐसे दावे किये जा रहे हैं कि पैरों तले ज़मीन ही खिसक जाये। लेकिन हम अपनी रिसर्च के आधार पर, तथ्यों  के आधार पर  केवल वही कंटेंट लेकर आयेंगें जिन पर  ऊँगली उठाना  इतना आसान न हो, लेकिन अनजाने में त्रुटि तो हमसे भी हो सकती है जिसके लिए हम सदैव ही क्षमा प्रार्थी रहेंगें।   हम कई महीनों से इस टॉपिक पर रिसर्च कर रहे थे और इसी निष्कर्ष पर उतरे हैं  कि अलौकिक शक्ति रखने वाली अमर आत्माएं अभी भी हिमालय में मौजूद हैं और वे अनंत काल तक वहीं रहेंगी। आधुनिक वैज्ञानिक भी “जीवन के अमृत” की खोज में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं। रूस, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, अमेरिका आदि देशों  के  विज्ञानी लंबे समय से आयु बढ़ाने  और मृत्यु की प्रक्रिया की जांच कर रहे हैं। इन वैज्ञानिक प्रयोगों का वर्णन तो पार्ट 2 में किया जायेगा लेकिन आज का पार्ट 1  पृष्ठभूमि अवश्य ही बना रहा है।  मार्च -अप्रैल  2004  के अखंड ज्योति (English edition )पर  आधारित मिस्टर  फैरेल की कथा रोचक के साथ -साथ अलौकिक भी कम नहीं है।  हम  प्रयास करेंगें किआपको  मिस्टर फैरेल की यात्रा का आँखों देखा हाल एक live movie की तरह  दिखाएँ। 

तो आओ चलें इस आर्मी कमांडर के साथ साथ। 


यह 1942 की घटना है जब कुमाऊं(उत्तराखंड ) के राजा ने पश्चिमी कमान के एल.पी. फैरेल नामक एक सैन्य अधिकारी को पहाड़ियों की पिकनिक यात्रा के लिए आमंत्रित किया था। श्री फैरेल को आमंत्रित करने का एक विशेष कारण था; ब्रिटिश होने के बावजूद उनकी भारतीय धर्म, भारतीय फिलोसोफी और संस्कृति में बहुत रुचि थी। उन्हें कुछ भारतीय योगियों के चमत्कारी कारनामों के प्रदर्शन को देखने के कुछ अवसर मिले। वह शुद्ध शाकाहारी बन गए  थे। उन्होंने हमेशा ही  हिमालय की ओर जाने के हर किसी अवसर का स्वागत किया ताकि कोई भी संत य योगी मिले  जो उन्हें आध्यात्मिक साधना में दीक्षित कर सके?। मिस्टर फैरेल, राजा, रानी और उनका दल प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर नैनीताल के पास एक स्थान पर पहुँच गया। इस स्थान ने  उन्हें इतना मंत्रमुग्ध कर दिया कि उन्होंने रात भर वहीं डेरा डालने का फैसला किया और वहीँ पर दर्जनों तंबू गाड़ दिए। यह  सुनसान जगह नौकरों की चहल-पहल से भर गई। आधी रात तक गपशप, मौज-मस्ती, खाना-पीना चलता रहा। दिन भर की थकान के कारण सभी  तुरंत गहरी नींद में सो गए। अभी मुश्किल से  नींद का पहला चरण ही खत्म हुआ था कि  “मिस्टर फैरेल को लगा कि उनकी खाट के पास कोई है।” वह उठे  और उन्होंने स्पष्ट रूप से सुना- “जहां आपके तंबू लगाए गए हैं हमें उस जगह की जरूरत है ।आप इस जगह को खाली कर दें । अगर आप इस बात को  समझने में असमर्थ हैं  तो आपको सामने वाली उत्तर-पश्चिमी पहाड़ी पर आना चाहिए। मैं आपको सब कुछ समझा दूंगा।”  मिस्टर फैरेल ने कहा, “लेकिन आप हैं कौन?” इतना कह कर वह बेड  से उठे, टार्च जलाई और इधर उधर देखने लगे, लेकिन वहां कोई नहीं था। वह तंबू से बाहर आये, लेकिन बाहर  भी न तो किसी को देखा और न ही किसी के कदमों की आहट सुनाई दी। उन्हें  एक पल के लिए  डर तो लगा लेकिन बाद में  वह सामान्य हो गया।  सोने के लिए वह  फिर  अपने बिस्तर पर वापस  चले गए । उन्होंने देखा  घड़ी में साढ़े तीन बजे थे। लाख कोशिशों के बाद भी वह सो नहीं सके।  किसी तरह आंखें बंद कर रहे थे लेकिन  उन्हें फिर  से किसी की मौजूदगी का अहसास हुआ। इस बार  बिस्तर पर लेटे हुए उन्होंने आँखें खोलीं और देखा कि उनके  सामने एक व्यक्ति की परछाई खड़ी  है। इस बार फिर  उस व्यक्ति  ने   वही शब्द कहे। व्यक्ति  की पहचान के लिए जैसे ही मिस्टर फैरेल ने टॉर्च जलाई तो वह परछाई  गायब हो गई, उनका  शरीर कांपने लगा और पसीना आने लगा। हम उस  सेना अधिकारी की बात कर रहे हैं  जो युद्ध में भीषण रक्तपात को भी  देखकर नहीं घबराया, ऐसी कौन सी वस्तु  थी जिसने उन्हें इतना भयभीत कर दिया था। क्षण भर के लिए एक अलौकिक (Supernatural) प्राणी की कल्पना  से ही वह इतने  व्याकुल हो गए थे । अब नींद कहाँ आनी  थी।  सुबह तक इसी तरह  आँखें बंद करके अपने बिस्तर पर लेटे रहे  लेकिन कुछ भी सुनाई न दिया। लेकिन मन में उस वर्णित पहाड़ी को देखने के लिए एक  जिज्ञासा ज़रूर उभरी और उनके  भीतर एक अजीब सा आकर्षण  पैदा हो रहा था। उन्होंने कपड़े पहने, जूते पहने, चुपचाप तंबू से बाहर आए  और  उस पहाड़ी की ओर चल दिए । 

इस घटना का वर्णन करते हुए मिस्टर  फैरेल ने स्वयं लिखा है: 

“जिस स्थान तक पहुँचने के लिए मुझे निर्देशित किया गया था, वहाँ का रास्ता बहुत कठिन, तंग  और खतरनाक था। मैं अपनेआप से ऊपर चढ़ने में सक्षम नहीं था लेकिन मुझे लगातार लग रहा था कि कोई  मुझे रास्ता दिखा रहा है  और मुझे ऊपर चढ़ने की ऊर्जा प्रदान कर रहा था। साढ़े तीन घंटे की कड़ी मेहनत के बाद मैं उस पहाड़ी के ऊपर चढ़ सका। भारी सांस और पसीने के कारण आगे बढ़ना मुश्किल लग रहा था। इसलिए मैं एक चौकोर पत्थर पर बैठ गया, कुछ आराम करने के लिए उस पत्थर  पर लेट गया और मुझे नींद आ गयी । मुश्किल से दो मिनट बीते होंगें कि उसी आवाज ने मुझे जगाया और कहा – मिस्टर फैरेल, अब आप अपने जूते उतारो और धीरे-धीरे पत्थर पर चढ़ो और मेरे पास आओ। कानों में इन शब्दों के साथ, मैंने चारों ओर देखा और देखा कि एक  बहुत ही  कमजोर संत  मेरे सामने खड़े थे। कमज़ोर तो थे लेकिन मस्तक पर इतना तेज़ था कि  क्या कहें। परिचय  की तो बात ही क्या करें  मैंने उन्हें न तो कभी पहले देखा था और न ही कभी मिला था। बड़ी हैरानगी हुई कि  इन्हे मेरा नाम कैसे मालूम हुआ। वह तो यहाँ थे पर  उनकी  परछाई रात को मेरे टेंट  में कैसे पहुँच गयी ? हम दोनों के बीच  संचार का कोई भी  माध्यम – टेलीफोन रेडियो फ़ोन, रेडियो लिंक  इत्यादि नहीं था  फिर उनकी  आवाज़ मुझ तक कैसे पहुँची? ऐसे अनेक प्रश्न मेरे मन में उठे। इन unending  प्रश्नों  पर विराम लगाते हुए साधु बाबा  ने कहा- जो कुछ भी आपने सुना और देखा है वह सामान्य मानव मन से नहीं समझा जा सकता है। इसके लिए मनुष्य को सांसारिक सुखों और इन्द्रियों (5 senses) के आकर्षण का परित्याग करते हुए दीर्घ साधना और योगाभ्यास करना होता है। आपको यहाँ एक विशिष्ट उद्देश्य  के लिए बुलाया गया है।” 

आजकल के विज्ञान ने तो 5  इन्दिर्यों के बजाये 7 प्रमाणित करके रख दी हैं। कभी इन इन्द्रियों की  चर्चा भी करेंगें, अवश्य ही इनका ज्ञान भी हमारा जीवन सुखमय बनाने में सहायक होगा। 

तो चलते हैं आगे :

फैरेल यह पता नहीं लगा सके कि वह  संत व्यक्ति थे या देवता। उनके मन में उठने वाले विचार इन दिव्य विभूति  द्वारा एक खुली किताब की तरह लगातार पढ़े जा रहे थे। फैरेल चट्टान पर चढ़ आये  और कुछ ही देर में उस स्थान पर पहुँच गए  जहाँ साधु बैठे थे। वह स्थान इतना छोटा था कि वहाँ केवल एक ही व्यक्ति बैठ सकता था। 

फैरेल लिखते हैं :

“सामने रखे अग्निकुंड में धूनी का आभास हो रहा था।  साधु  महाराज ने अपने अत्यंत  कमजोर हाथ से मेरी  पीठ पर थपथपाया और मैं दंग रह गया कि उस बूढ़े शरीर में यह बिजली जैसी शक्ति कैसे हो सकती है। मेरा शरीर जो थकावट के कारण दर्द से लगभग टूट चुका  था अब एक फूल  की तरह हल्का लग रहा था उनके प्रति सम्मान के एक विनम्र भाव में मैंने घुटने टेक दिए और उनके पैर छुए। मैंने कई साधु देखे थे, लेकिन मैंने हमेशा महसूस किया है कि जिन साधुओं और संतों ने भारतीय फिलोसोफी  को प्रभावित किया और उसकी  गरिमा को बढ़ाया, वे उस तरह के नहीं  थे जो सड़कों पर घूमते रहते हैं , भिक्षा  मांगते रहते हैं , बल्कि वास्तव में वह हैं जो  एकांत-साधना  में रमे  समर्पित व्यक्ति हैं। उनके भौतिक शरीर का वजन भले ही  केवल 40 -50  किलोग्राम हो लेकिन  उनकी ऊर्जा की तीव्रता और शक्ति हजार बमों से भी अधिक  है  और वे ज्ञान के भंडार हैं । साधु  महाराज ने मुझसे कहा,  ” जहां आपने टेंट लगाए हैं, मैंने एक युवा को उस स्थान तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया है। वह पिछले जन्म में मेरा  शिष्य था, तब उसकी  साधना अधूरी रह गयी थी ,  मैं अब  फिर से उसका  मार्गदर्शन करना चाहता हूं ताकि  वे विश्व कल्याण के लिए  साधना और तपस्या कर सके । लेकिन उसके  पिछले जन्म की यादें सुप्त ( inactive ) हो गयी  हैं। इस जन्म के प्रभाव और परिस्थितियों ने  उसे इतना अधिक  आकर्षित कर दिया है कि  वह फिर से साधना करने में असमर्थ है। मैंने अपनी  सूक्ष्म प्रेरणा से उसे बुलाया है। यदि वह आता है और निर्देशित स्थान का पता लगाने में असमर्थ  है, तो वह भ्रमित हो जाएगा, confuse हो जायेगा  उस स्थिति में  जो कुछ मैं चाहता हूँ वह संभव नहीं होगा इसलिए आप  कृपया उस स्थान को तुरंत खाली कर दें।

फैरेल ने कहा – “भगवान! कृपया मुझे भी  मेरे पिछले जन्म के बारे में भी कुछ बातें बताएं”  साधु महाराज  ने उत्तर दिया- ” बेटे ,ये सिद्धियां (उपलब्धियां) प्रदर्शन के लिए नहीं होती हैं। वे कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए ही  होती  हैं और बेहतर है कि उनका उपयोग केवल उनके उदेश्यों के लिए ही किया जाए। लेकिन जब मैं उसे उसके  पिछले जन्म की घटनाएँ दिखाता हूँ तो अगर आप चाहें तो बेशक उस समय उपस्थित हो सकते हैं।  अब तुम जाओ। कैंप में लोग आपको ढूंढ रहे हैं। मैं भी जल्दी में हूं।”

To be continued :

बहुत बहुत धन्यवाद्।       

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं  कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। जय गुरुदेव

Leave a comment

हमारी भावनाएं ,हमारी बातें  अपने सहकर्मियों के साथ 

19 अगस्त  2021 – हमारी भावनाएं ,हमारी बातें  अपने सहकर्मियों के साथ 

हमारे किसी सहकर्मी ने कमेंट करके लिखा था कि नियमित लेखों और वीडियो के बीच आप जो अपडेट देते हैं वह “अपनों से अपनी बात” की तरह होता है और हमें पढ़कर शांति का आभास तो होता ही है ,साथ में एक पारिवारिक वातावरण का आभास ही होता है।     हम उनके कमेंट से शत प्रतिशत सहमत हैं  क्योंकि हम हैं ही एक छोटा सा परिवार जिसका नाम है ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार। जब हम  यह पंक्तियाँ लिख रहे हैं तो हमें बिलकुल यही आभास हो रहा है कि हम सब इक्क्ठे बैठे हुए हैं और विचारों का आदान प्रदान कर रहे हैं। हमने कई सहकर्मियों से वॉइस कॉल/ वीडियो काल  की हैं और उनकी आकृतियां  भी पता हैं लेकिन जिनके बारे में हमें कुछ भी नहीं पता ,हम काल्पनिक सम्बन्ध बना कर अपने ही अन्तःकरण से कुछ आकृतियां  बनाये बैठे हैं – आखिर यह सम्बन्ध स्थूल शरीरों  का न होकर ,सूक्ष्म तरंगों से जुड़ा हुआ है।    

इन updates में भावना बिल्कुल वही होती है -कौनसी वही ? वही जो  परमपूज्य गुरुदेव अखंड ज्योति में इस शीर्षक से लिखते थे, लेकिन हमने कभी भी यह शीर्षक प्रयोग में नहीं लाया। वह इसलिए कि  गुरुदेव द्वारा प्रयोग किया गया  शीर्षक उन्ही के लिए होना चाहिए।  इस तथ्य का बोध हमें उस समय हुआ जब हमारे एक सहकर्मी ने फ़ोन  करके हमें अपनी व्यथा कुछ इस प्रकार व्यक्त की – भाई साहिब आपने  अपने लिए “ तुच्छ”  शब्द का प्रयोग करके हमारे गुरुदेव का अनादर किया है ,मैंने अपने गुरु के इस अपमान में सारी  रात आंसुओं में  व्यतीत की है। हमने उन्हें सांत्वना देते हुए क्षमा प्रकट तो कर दी और इस बात को यकीनी भी बनाया कि  उनकी तरह और किसी  की भावना को ठेस न पहुंचे, हम  इससे अत्यंत व्यथित होंगें। लेकिन फिर सोचा कि एक तरफ हम परमपूज्य गुरुदेव की तरह सादा जीवन व्यतीत करने का प्रयास कर रहे हैं , उनकी तरह भौतिक पदार्थों से परे  जाने का प्रयास कर रहे हैं ,उनकी ही तरह स्नेह ,प्यार ,अपनत्व ,निष्ठां के मानवीय मूल्यों का पालन कर रहे हैं , परिजनों के दुःख -चिंता में अपनेआप को शामिल करे हुए हैं, परिजनों के दुखभरे किस्से सुनते हुए अपनी आँखों में आंसू आ जाते हैं – तो फिर हम उनके द्वारा प्रयोग किया हुआ शब्द “ तुच्छ “ का प्रयोग करके उन्हें और भी सम्मान दे रहे हैं। खैर हर किसी  की अपनी  सोच है और हर  सोच का आदर करना हमारा परम् कर्तव्य है। 

कल वाली वीडियो को भी आपने  बहुत सम्मान दिया इसके लिए हम ह्रदय से आपके   आभारी है।  नंबर भले ही कुछ कम हैं लेकिन यह कोई computerized  production line तो है नहीं जहाँ हम time -study करें और परिणाम उस स्टडी के हिसाब से ही आएं।  हमें बहुत ही गर्व और प्रसन्नता होती है कि गुरुदेव के विचारों को सरलता से घर- घर पहुंचा रहे हैं और विचार क्रांति का ध्वज हर  घर की शोभा बड़ा रहा है। लेकिन महेंद्र भाई साहिब की बातों का चिंतन- मनन -विश्लेषण ठीक उसी प्रकार करना चाहिए जैसे एक परीक्षार्थी  अधिक से अधिक अंक प्राप्त करने के लिए कठिन  से कठिन  परिश्रम करता है।  आप खुद अपने examiner  हैं।  ज़रा आत्म निरीक्षण करके तो देखिये , क्या आपने अपनेआप को कभी भी डांटा है ,फटकारा है , ताड़ा  है ? यां  फिर हर परिस्थिति का ज़िम्मेदार किसी दूसरे  को ही माना है, दूसरे के सिर पर ही ठीकरा फोड़ा  है – क्योंकि हम तो सर्वगुण  सम्पन्न हैं !! -ज़रा सोचिये। 

आज सुबह ही  प्रेरणा बिटिया के कमेंट का रिप्लाई करते हमने फिर मृगतृष्णा का पाठ  पढ़ा दिया था। एक तरफ तो हम रट रहे हैं कि “जो प्राप्त  है वही पर्याप्त है ” और दूसरी तरफ हम भौतिकता  के दलदल में डूबे जा रहे हैं। कई बार हमें  फ़ोन करके दुखान्त किस्से वर्णन किये जाते हैं -घर की परिस्थिति बहुत ही बिगड़ चुकी है, शांतिकुंज में जीवनदान देना चाहते हैं -कृपया मार्गदर्शन करें।  इन्हे शायद दान का अर्थ ही नहीं मालुम – दान का अर्थ है देना। शांतिकुंज देने के लिए जाना हैं – लेने के लिए नहीं। इसीलिए गुरुदेव ने अपनी वीडियो में कहा है – आप शांतिकुंज आइये, आपका स्वागत है ,यहाँ सैर करने न  आइये , यहाँ समय निकाल कर आइये , यहाँ के  वातावरण में समय बिताइए।  गुरुदेव ऐसा क्यों  कह रहे हैं ? इसलिए कि वातावरण का हमारे  व्यक्तित्व  पर बहुत ही प्रभाव पड़ता है।  क्योंकि जैसा खाये अन्न  वैसा होये मन्न। माताजी के चौके का सात्विक प्रसाद , श्रद्धा से परोसे  गए  प्रसाद  में जो आध्यात्मिक तत्व हैं वह हमें कहाँ मिलेंगें।  इसीलिए हमने “शांतिकुंज एक आध्यात्मिक सैनिटोरियम” वीडियो आपके लिए बनाई थी। वातावरण  की जीती  जागती प्रतिमूर्ति के साथ हमें कल 45 मिंट बात करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।  हम बात कर रहे हैं शशि मिश्रा बेटी की।  बात तो अरुण वर्मा जी की बेटी की एडमिशन के  बारे में  थी , साथ ही आदर, सम्मान और अखंड ज्योति नेत्र हस्पताल के प्रति श्रद्धा और समर्पण को दर्शाती शशि हमारे अन्तःकरण को सुख प्रदान करा रही थी।  हमारी यह वाली  बेटी और बाकि जितनों को भी हमें जानने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, शुक्ल बाबा का संरक्षण ,मृतुन्जय भाई साहिब का लालन पालन – इन बेटियों के संवारने में कितना ही  सहायक हुआ है। यह सभी बेटियां बिहार जैसे पिछड़े  प्रदेश में कठिन परिस्थितियों से युद्ध करती हुई अपनी  प्रतिभा से “21 वीं सदी नारी शक्ति की सदी” गुरुदेव के उद्घोष का ध्वज लिए आगे ही आगे बढ़ रही हैं।   इन बेटियों  के समर्पण के आगे हमारे शीश अवश्य झुकने चाहिए। सही मानों में अगर  आदरणीय शुक्ला बाबा को कोई श्रद्धांजलि हो सकती है तो अखंड ज्योति नेत्र हस्पताल मस्तीचक और इसकी शाखाओं का प्रचार प्रसार होना चाहिए।  आप इस दिव्य हस्पताल के बारे में  नीचे दिए गए लिंक से और जानकारी प्राप्त कर सकते हैं  https://youtu.be/EAWBRZMWALg , https://youtu.be/ML7cfjz5_zk

बहुत बहुत धन्यवाद्।       

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं  कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। जय गुरुदेव

Leave a comment

आज के  अपडेट में  सहकर्मियों के प्रति हमारी भावनाएं  

17 अगस्त  2021- आज के  अपडेट में  सहकर्मियों के प्रति हमारी भावनाएं  

लगभग एक 100  views प्रति  घंटे की रफ़्तार से कल वाली अद्भुत वीडियो अपनी दिव्य यात्रा पर चल रही है। 200 से ऊपर  कमेंट करके आप सबने अपनी श्रद्धा और समर्पण का एक उदाहरण दिया है।  बहुत बहुत धन्यवाद।  हमारे परमपूज्य गुरुदेव की अंतरात्मा से निकली दिव्य वाणी जब तक आपकी भावना के तारों को झकझोड़ नहीं देती, तब तक हम सब ,ऑनलाइन ज्ञानरथ के सहकर्मी और प्रतिदिन जुड़ रहे नए सहकर्मी चैन से नहीं बैठेंगें -ऐसा हमारा संकल्प है।  यह संकल्प ऊपर दिए गए नम्बरों से पूरी तरह से दर्शित हो रहा है। इस अपडेट के लिखने समय तक  2100  के लगभग लोगों ने इस वीडियो को देखा ,कोई ज़रूरी नहीं कि सभी कमेंट करें ,कोई ज़रूरी नहीं कि सभी viewers ने सारी  वीडियो देखी, कोई ज़रूरी नहीं कि हर कोई बड़े -बड़े कमेंट करे य कर सके लेकिन हर कोई viewer हमारे लिए आदरणीय है। आदरणीय क्यों है ? इसलिए कि वह अपना समयदान कर रहा है ,समयदान कर रहा है हमारे लिए , समयदान कर रहा है एक दिव्य और विशाल मिशन के लिए ,समयदान कर रहा है अपने गुरु के लिए , समयदान कर रहा है गुरुदेव के विचारों को घर -घर तक  पहुँचाने के लिए। तो हम उसके ऋणी हुए न, इतने परिजनों के ऋण- बोझ से  कहीं हम  दब न जाएँ , हम निर्धन हैं – कर्ज़दार,ऋणी नहीं होना चाहते  हैं।  हमारा  प्रयास रहता है क़ि किसी प्रकार अपने  ऋण का निवारण कर  सकें । इस प्लेटफॉर्म से,हम सबके ऑनलाइन ज्ञानरथ के प्लेटफॉर्म से कुछ अच्छा कार्य करके हमारा ऋण कुछ कम अवश्य ही होता है।ऑनलाइन ज्ञानरथ के परिजनों से बातचीत करके ,उनके परिवार के बारे में जानकर, उनकी सहायता करके,उनके दुखों का निवारण करके  कुछ कमअवश्य ही  हो जाता  है।  

कल आने वाली वीडियो में आप स्वयं देख लेना कि गुरुदेव की अपने बच्चों से क्या उपेक्षाएँ हैं।  यह वीडियो भी बहुत ही छोटी सी ,केवल पांच मिंट की है।  गुरुदेव कह रहे हैं कि अपने परिजनों के पास यह किताब  ले जाना  और कहना हम आपका कुशलक्षेम लेने आये हैं ,आपका परिवार कैसा है ,कोई चिंता तो नहीं है ,हम आपके लिए क्या कर सकते हैं  आदि आदि। गुरुदेव ने कई वीडियोस में कहा है यज्ञ के बहाने से हम अपने परिजनों से मिल सकने में सफल होते हैं ,उनके साथ अपनत्व के ,स्नेह के, प्यार के तार जोड़ सकने में सफल होते हैं।  यही फार्मूला मृतुन्जय तिवारी जी ने बिहार की उन बच्चियों के लिए अपनाया जिनके लिए  घर से निकलना  ही अस्मभव था।  From football to eyeball वाले कांसेप्ट ने उन बच्चियों का जो  कायाकल्प किया इसे  आप हमारी अखंड ज्योति नेत्र हस्पताल वाली वीडियोस में देख सकते हैं।  बिल्कुल उसी लीक पर हम ऑनलाइन ज्ञानरथ के माध्यम से अपने परिजनों तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं। क्योंकि आज जिस युग में हम रह रहे हैं वहां स्नेह ,प्यार ,अपनत्व ,सहानुभूति ( हमारे स्तम्भ ) कहीं दूर -दूर तक भी दिखाई नहीं देते। और अगर कोई इन मानवीय मूल्यों को दर्शित भी करता है तो उसे शंका से देखा जाता है।  यही सोचा जाता है कि -अवश्य ही इसका अपना कोई स्वार्थ होगा। क्या हम इतने अमानुष हो चुके हैं ?  क्या हम इतने डरपोक हो चुके हैं?  हमें तो यही लगता है कि ऐसे लोगों की अंतरात्मा ही मर चुकी है। लेकिन हम शायद  भूल चुके हैं  कि इन मानवीय मूल्यों का पालन करना ही मानवता की रक्षा करना है। इन्ही मूल्यों की रक्षा करते हुए हम अपनी बिटिया रानी ,प्रेरणा बिटिया से  शनिवार को लगभग 77  मिंट तक बात करते रहे।  जो संतुष्टि हमें मिली उसका शब्दों में वर्णन करना तो असंभव ही है लेकिन फ़ोन बंद करने के तुरंत बाद ही बिटिया ने मैसेज किया – “आपसे बात करके जो ख़ुशी मिली है हम शब्दों में बयान नहीं कर सकते। मैंने गुरुदेव से कभी बात नहीं की लेकिन आपसे बात करके ऐसा प्रतीत हुआ गुरुदेव से ही बात कर रहे हैं”  धन्यवाद बेटी।  कहाँ गुरुदेव और कहाँ हम ,कोई भी comparison तो  नहीं हैं। नवंबर 2019 में हम शांतिकुंज के संक्षिप्त प्रवास पर थे।  गेट नंबर 5 के पास स्थित  लोपा मुद्रा भवन में हम  ठहरे हुए  थे।  हमारे साथ वाले कमरे में नॉर्वे की राजधानी ओस्लो से आये एक साधक ठहरे हुए थे। वह अक्सर देखते रहते थे कि हम जब भी फ्री होते वह हमारे पास आ जाते। उन्होंने तो गुरुदेव को देखा नहीं था लेकिन  हमसे गुरुदेव के बारे में जानकार उन्हें बहुत ही संतुष्टि होती थी।  अक्सर हमसे गुरुदेव के साहित्य और उनके बारे में चर्चा करने की जिज्ञासा रहती। और बात यहाँ तक पहुँच चुकी  कि उन्होंने हमें इतना आदर सम्मान देना आरम्भ कर दिया कि सदैव हमारे  चरणस्पर्श करते।  हम नहीं जानते की परमपूज्य गुरुदेव की शक्ति है यं युगतीर्थ  शांतिकुंज  का दिव्य वातावरण। हमने भी विश्व भर में से जहाँ से भी कोई भी गुरुदेव के समय का मनुष्य मिला, जिसने गुरुदेव के साथ कार्य किया हो, संपर्क बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी- चाहे वह नैरोबी में विद्या परिहार जी हों ,मस्तीचक में मृतुन्जय तिवारी भाई  साहिब हों , किशोर जी दार ए सलाम अफ्रीका में हों ,शशि संजय शर्मा जयपुर में हों ,सरोज वर्मा हों आदि आदि। 

जब अपनत्व और सम्पर्क साधना की बात चल ही रही है तो आप सबने हमारी सहकर्मी प्रीती भारद्वाज  बहिन का कमेंट तो देखा ही होगा। उन्होंने अपनी  मम्मी के  महाप्रयाण के दुःखित  दिनों में सहकर्मियों द्वारा दिए गए सहयोग  की सराहना की है। हमारे रिप्लाई का भी उन्होंने बहुत आभार  व्यक्त किया है।  हम यही कहेंगें कि              

“शिष्टाचार,स्नेह,समर्पण,आदर,श्रद्धा ,निष्ठा,विश्वास ,आस्था,सहानुभति , सहभागिता,सद्भावना एवं अनुशासन हैं ऑनलाइन ज्ञानरथ  के  स्तम्भ। ऑनलाइन ज्ञानरथ के स्तम्भ जिन पर यह भवन खड़ा है इसकी रक्षा करना हमारा परम् कर्तव्य है।”

इन मानवीय मूल्यों के देखते हुए  हम कह सकते हैं कि  हम इंसान हैं कोई देवता नहीं – हमसे गलती तो  हो ही सकती है, लेकिन  गलती न करने  का प्रयास करना हमारा सबका कर्तव्य है।  फिर भी अगर हो जाती है तो उसको correct  करने का प्रयास भी हमने ही करना है। 

पिछले कुछ समय से ज्ञानगंज , सिद्धाश्रम ,शांगरिला  पर हमारी रिसर्च चल रही है। Britisher आर्मी ऑफिसर , LP Farrel द्वारा  1942 की घटना अखंड ज्योति में भी वर्णित है और उसके द्वारा ही लिखित पुस्तक तो है ही। Farrel द्वारा  हिमालय योगियों की शक्तियों का वर्णन हमारे गुरुदेव की शक्तियों के साथ connect अवश्य करता है। जल्द ही यह रोमांचकारी ,दिव्य ,अविश्वसनीय किंतु सत्य कथा आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगें। साथ में ही गुरुदेव के वाराणसी के सहयोगी निखिल और महावीर स्वामी की हिमालय में पाण्डुकेशवर ग्राम  में भेंट  भी आपके समक्ष लाने का प्रयास करेंगें। बद्रीनाथ क्षेत्र में पांडुकेश्वर पांडवों के साथ सम्बंधित है। 

इन सभी लेखों से पहले हमारी इच्छा है कि आप हमारे  साथ 4-5  छोटी -छोटी वीडियो देख लें ताकि परमपूज्य गुरुदेव  के प्रति आपकी श्रद्धा ,निष्ठां,समर्पण और प्रगाढ़ हो सके।  इन वीडियोस में आप ऐसे -ऐसे संस्मरण देखेंगें जिन्हे देखकर  आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगें जैसे हमारी प्रेरणा बिटिया रानी ने व्यक्त किया है। हर  बार की तरह हम आज फिर कहते हैं कि  महेंद्र जी की पूरी की पूरी वीडियो का लिंक हम आपको दे सकते हैं और कह सकते हैं कि आप देख लीजिये लेकिन हमें  विश्वास नहीं है।  गुरुदेव भी तो यही कह रहे हैं “ बेटा ,मुझे विश्वास नहीं है कि तुम मेरे बारे में लोगों को बताओगे कि मेरे गुरु के पास इतनी शक्तियां हैं” और फिर साथ -साथ में देखने का अपना ही आनंद  है।  आपके कमेंट बता देते हैं कि आपने न केवल देखि है औरों को भी भेजी है।  हमें ऐसा लगता है कि हम साथ -साथ ही देख रहे हैं।  बहुत बहुत धन्यवाद्।       

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं  कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। जय गुरुदेव