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अखंड ज्योति आई हस्पताल- एक प्रेरणादायक कथा –Part 2

12  अप्रैल  2021 का ज्ञानप्रसाद 

आशा करते हैं कि हमारे समर्पित और सूझवान सहकर्मियों के ह्रदय में अखंड ज्योति आई हस्पताल के बारे में पृष्ठभूमि बन गयी होगी। हमारा सात मास का अथक प्रयास तभी सफल होगा जब हमारे  सहकर्मियों के ह्रदय में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा घड़ित  शिष्यों का समर्पण उभर कर प्रेरणा देगा और कहेगा “अरे क्या सोच रहा है ,कहीं सोच -सोच में ही यह अनमोल जीवन व्यतीत न हो जाये “ इस लेख को लिखने में हमने क्या -क्या प्रयास किये ,किस -किस से फ़ोन पर सम्पर्क किया, कैसे ऑनलाइन रिसर्च की इत्यादि का कल वर्णन करेंगें। 

तो आओ  चलें लेख के दूसरे और अंतिम भाग की ओर :

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तिवारी जी  का कहना है कि उन्हें  ग्रामीण परिवारों को इस बात के लिए राजी करने में बहुत परिश्रम करना पड़ा  कि लड़कियों की छोटी आयु में  शादी (early marriage ) की न  सोचें बल्कि उन्हें मस्तीचक भेजें जहां उनके लिए छह साल तक मुफ्त रहने और प्रशिक्षण की व्यवस्था है। एक दशक में 150 लड़कियों को प्रशिक्षण देकर ऑप्टीमीट्रिस्ट बनाया गया है और सात लड़कियों ने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में बिहार का प्रतिनिधित्व किया है।  यह कार्यक्रम इतना सफल रहा है कि बिहार भर के गांवों से करीब 500 लड़कियां यहां दाखिले के लिए वेटिंग लिस्ट में हैं। बिहार में सीवान, पीरो, गोपालगंज और डुमरांव में चार प्राथमिक दृष्टि जांच केंद्र और एक उत्तर प्रदेश के बलिया में चल रहा है।  भोजपुर के कस्बे पीरो का जांच केंद्र तो पूरी तरह महिलाएं चला रही हैं।  इसका नेतृत्व 22 वर्षीया दिलकुश शर्मा करती हैं, जिन्होंने अखंड ज्योति के विज्ञापन को पढ़कर उनसे  संपर्क किया था।  

तिवारी जी  कहते हैं: 

”हमारी सोच है कि अगले चार साल में महिलाएं ही अस्पताल के कम से कम 50 प्रतिशत कार्यों का नेतृत्व करें ” 

तिवारी जी अपने दादा प्रसिद्ध समाज सुधारक और आध्यात्मिक गुरु  श्री रमेश चंद्र शुक्ला जी  की शिक्षाओं का अनुसरण कर रहे हैं।  यह एक भली प्रकार स्थापित तथ्य है कि किसी भी चिकित्सा देखभाल कार्यक्रम की सफलता के लिए समर्पित कर्मियों का एक पूल  इस  कार्यक्रम की  एक  रीढ़ की हड्डी होता  है। यह भी सच है कि भर्ती करना, उन्हें प्रशिक्षित करना  और फिर retain  रखना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। ऐसे मानव संसाधनो का उच्च कारोबार समस्या को और भी महत्वपूर्ण बनाता है। चुनौतीपूर्ण भूगोल के तहत गरीब बुनियादी ढांचे  इसे और भी   अधिक जटिल बना देते  हैं । तो कहाँ से आयेंगें इस प्रतिभा वाले एक्सपर्ट।  यहाँ काम आयी out -of – the box तकनीक और एक नवीन  सोच। 

Out of the box : 

आउट-ऑफ-द-बॉक्स (Out of the box) सोचने से हमें अखंड  ज्योति नेत्र अस्पताल में भर्ती करने, प्रशिक्षित करने और स्थानीय प्रतिभा को सफलतापूर्वक बनाए रखने में मदद मिली है। Out -of -the box का  अर्थ  उन विचारों का पता लगाने के लिए प्रयोग में लाया जाता हैं  जो रचनात्मक और असामान्य हैं और जो नियमों या परंपरा द्वारा सीमित या नियंत्रित नहीं हैं। संभवतः हम रुपया -पैसा खर्च करते हैं , इतने अधिक वर्ष खर्च करने के उपरांत हम फिर नौकरी के लिए आवेदन करते हैं ,फिर भी कोई पता नहीं कि नौकरी मिलेगी य नहीं। गुरुदेव की  दूरदर्शिता ने यहाँ काम किया। 

आओ देखें यह स्कीम कैसे काम में आयी। 

Football to Eyeball :

“फुटबॉल टू आईबॉल” कार्यक्रम 2010 में शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम के तहत, स्थानीय गांवों की लड़कियों को पेशेवर ऑप्टोमेट्रिस्ट के रूप में ट्रेनिंग  प्राप्त करने के लिए फुटबॉल खेलने और प्रशिक्षित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जिससे उन्हें अंधापन को ठीक करने और एक बहुत ही पितृसत्तात्मक समाज में व्यापक सामाजिक प्रभाव बनाने के लिए सशक्त बनाया जाता है। पितृसत्तात्मक समाज का अर्थ है कि जैसे एक पिता परिवार का मुखिया होता है ,माता क्यों नहीं।  यह अनूठा कार्यक्रम युवा लड़कियों के लिए एक आइसब्रेकर के रूप में फुटबॉल का उपयोग करता है। 12-16 वर्ष की आयु के बीच की लड़कियों का पालन-पोषण अस्पताल द्वारा पेशेवर फुटबॉल खिलाड़ी या ऑप्टोमेट्रिस्ट या दोनों बनने के लिए किया जाता है।

मृत्युंजय जी  का फुटबॉल के प्रति जुनून था परन्तु किसी दुर्घटना के कारणवश अब वह फुटबॉल खेल नहीं सकते। उन्होंने जब देखा  कि  एक घर की छत पर कुछ लड़कियों को नीचे  ग्राउंड में लड़कों को फुटबॉल खेलते देखा तो उनके मन में आया कि  क्यों न लड़कियों को भी फुटबॉल खेलने में प्रेरित किया जाये।  यह आईडिया तो ठीक था लेकिन बिहार जैसे प्रदेश में जहाँ लड़कियों को घर से बाहर निकलने की इज़ाज़त नहीं थी ,उनको shorts पहन कर किसने खेलने देना था।  कार्य तो बहुत ही कठिन था।  परिवारों का विरोध अवश्य ही आड़े आना था और आया भी, लेकिन मृतुन्जय जी का तो एकमात्र उदेश्य था कि किसी प्रकार इन बच्चियों को घर के बाहर निकाला   जाये  और उन्हें भी खुली वायु में सांस लेने दिया जाये।  इस प्रकार  जागृति आने से कई समस्याओं का निवारण हो सकता था और हुआ भी। नारी शोषण और  बाल विवाह जैसे अभिशाप को समाप्त या  कम करने में  सहयोग मिलेगा   

तो हैं न मृतुन्जय जी के अन्तःकरण में परमपूज्य गुरुदेव की  शिक्षा।  

पूर्वी भारतीय राज्य बिहार के एक दूरदराज के गाँव मस्तीचक में   केवल  दस-बेड के अस्पताल से  आरम्भ होकर 4000 वार्षिक सर्जरी  करने वाला यह अस्पताल केवल 15  वर्षों में  100,000  सर्जरियां करने में समर्थ है और सबसे बड़ी बात है कि इस 100,000  में से  85000  निशुल्क हैं।  इस सारे समय में  इसे कभी भी नेत्र रोग विशेषज्ञों, विशेष रूप से ऑप्टोमेट्रिस्ट और नेत्र सहायक के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा।

युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य चेरिटेबल ट्रस्ट:

परमपूज्य गुरुदेव  के आदर्शों और शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर  2004  के शुरू में युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य चेरिटेबल ट्रस्ट का आरम्भ किया गया। यह ट्रस्ट  बिहार में गरीबों और दलितों के कल्याण के लिए काम करने के लिए  में बनाया गया था  क्योंकि राज्य  सरकार हमेशा से  मानव कल्याण के पहलू पर चुप्पी साधे थी । इस  ट्रस्ट का गठन श्री रमेश चंद्र शुक्ला (1917-) ने किया था जो  हमारे गुरुदेव कि शिष्य थे।  ट्रस्ट का एक उद्देश्य संचालित दृष्टिकोण है जो मूल्यों और विश्वासों के प्रति असम्बद्ध रवैया रखता है। उपासना, साधना और आराधना जैसे गुरुदेव के तीन स्तम्भ इस ट्रस्ट के pillar हैं।  स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला जागरण, पर्यावरण, सामाजिक बुराइयों को खत्म करना, उद्यमशीलता और आध्यात्मिकता को बढ़ावा देना इस ट्रस्ट के मुख्य  उद्देश्य  हैं। लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है ताकि उनकी गतिविधियों से लोगों को सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक बाधाओं को दूर करने में मदद मिले और सकारात्मक बदलाव आए। 

इसीलिए हमने इस लेख के आरम्भ में पाठकों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया था कि स्वयं भी गूगल सर्च करके इस में अधिक जानकारी प्राप्त करें। 

” सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।  

जय गुरुदेव 

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परमपूज्य गुरुदेव द्वारा दी गयी प्रथम गुरुदीक्षा

23 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद : परमपूज्य गुरुदेव द्वारा दी गयी प्रथम गुरुदीक्षा 

आज का लेख बहुत ही छोटा है। गायत्री तपोभूमि का ही दूसरा पार्ट कह सकते हैं क्योंकि लेख की लम्बाई के कारण इसे कल वाले लेख में शामिल न किया जा सका। इस लेख में आप  गुरुदेव द्वारा दी गयी प्रथम गुरुदीक्षा का वर्णन तो पढेंगें ही ,उसका कारण भी जानेंगें।  लेख  आरम्भ करने से पूर्व आइये हम सब संकल्प लें कि  हमारी सबसे नई  सहकर्मी  और बिटिया  संजना कुमारी  को प्रोत्साहित करने की कोई भी कसर  बाकी नहीं छोड़ेंगें। इस युवा पीढ़ी/ बच्चों को हम सदैव आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहेंगें।  लगभग 10  घंटे लगाकर हमने उस बच्ची द्वारा लिखी और बोली गयी कविता को अंतिम रूप दिया है ,हमें बहुत ही प्रसन्नता हुई है।  बच्ची और उसके परिवार के साथ हमारी लगभग एक घंटा बात हुई ,बहुत ही प्रतिभाशाली परिवार है। हो सकता है  कल वाले लेख में आप केवल  वीडियो ही देख सकें ,ऐसा केवल  इसलिए कि  आप इस वीडियो को अधिक से अधिक परिजनों में शेयर करके इस बच्ची का उत्साहवर्धन करें। आप हमारा उत्साहवर्धन तो करते ही हैं ,अब इसकी बारी है , बाकी बच्चों की तरह यह भी  हम सबकी बिटिया रानी है। इस कविता में  बहुत ही ह्रदय विदारक वाणी, लेखनी और भाव व्यक्त किये हैं।  तो चलें लेख की ओर ।

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साधना की सफलता का मूल तो साधक की अटूट निष्ठा एवं आत्मशोधन है, किंतु एक पक्ष जो बड़ी

महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वह है सुसंस्कारित साधनास्थली में साधना करने की सुविधा उपलब्ध होना।

जहाँ यह उपलब्ध हो जाती है, वहाँ थोड़े ही पुरुषार्थ से  दिव्यदर्शी साधक अपना लक्ष्य सिद्ध कर लेते हैं। पर पूज्य गुरुदेव ने अपनी जीवनयात्रा के साधना कालरूपी पूर्वार्द्ध की पूर्णाहुति के लिए एवं भावी गतिविधियों को क्रियारूप देने के लिए जिस स्थान का चयन किया, वह महर्षि दुर्वासा की तपःस्थली थी। यह स्थान यमुना किनारे मथुरा से वृंदावन जाने वाले मार्ग पर स्थित है। परमपूज्य  गुरुदेव के स्वयं के शब्दों में मथुरा में गायत्री तीर्थ बनने की योजना किसी व्यक्ति के संकल्प से नहीं, वरन माता की प्रेरणा से बनी है।  कितने ही सूक्ष्म एवं रहस्यमय कारणों से वह स्थान मथुरा चुना गया। आज यही स्थान विश्वभर में  गायत्री तपोभूमि  नाम  से प्रख्यात हुआ। आजकल (2019 से  ) तपोभूमि  में निर्माणधीन कार्य चल रहा है। 

भूमि का चयन करना और  उससे भी कठिन कार्य निर्माण का  होता है। धर्मधारणा भारत में आज  भी जिंदा है, पर उन दिनों जब चारों ओर मूढ़मान्यताएँ घर किए हुए थीं और  गायत्री के संबंध में भ्रांतियाँ संव्याप्त थीं , यह काम भगीरथ के गंगावतरण के समान दुष्कर  ही था। गुरुदेव ने  पाठकों की मनोभूमि बनाई एवं गायत्री तीर्थ बनाने की आवश्यकता बताते हुए प्रेरणा जगाई।  यों, यह कार्य  गुरुदेव ,इस युग के  विश्वामित्र,  अकेले  भी कर सकते  थे , पर परिजनों  के अंश-अंश सहयोग द्वारा उनका अपनत्व संस्था से जोड़ते हुए ही वह कार्य होना है, यही उनका लक्ष्य था। साथ ही सहयोग देने वाले हर व्यक्ति को उन्होंने  ‘गायत्री-उपासक कहा तथा प्रत्येक से हाथ से मंत्र लेखन व नियमित अनुष्ठान करने को कहा।  उनके स्वयं के चौबीस महापुरश्चरणों की समाप्ति का समय आ रहा था। गायत्री जयंती, 1953 में उसकी औपचारिक पूर्णाहुति होनी थी। अखण्ड ज्योति, नवंबर 1951 के अंक में गायत्री तपोभूमि का संभावित रूप क्या होगा; इसका एक चित्र छापा व उसके नीचे एक पंक्ति दी, – 

‘देखें, किन्हें पुण्य मिलता है; इस पवित्र तीर्थ को बनाने का।’ 

यहाँ हम यह कहना अनिवार्य समझते हैं कि जो सहकर्मी अपना  अमूल्य समय निकाल  कर ऑनलाइन ज्ञानरथ में अपना सहयोग दे रहे हैं उन्हें कितना पुण्य मिलेगा ,स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं।  हम कोई ज्ञानी तो नहीं हैं लेकिन अपने विवेक और बुद्धि के अनुसार बच्चों और अन्य सहयोगियों में प्रेरणा की अग्नि प्रजव्लित करने का परया करते रहते हैं।  हम समझते हैं कि प्रेरणा और प्रोत्साहन ज्वलंत अग्नि की चिंगारी  प्रकट कर सकते हैं। 

1952  की गायत्री जयंती,  तक परमपूज्य गुरुदेव ने  हस्तलिखित गायत्री मंत्र चौबीस लाख की संख्या में गायत्री तपोभूमि पहुँचाए जाने की अपनी इच्छा व्यक्त की। प्रत्येक व्यक्ति से 2400 मंत्र लिखकर भेजने को कहा। इस प्रकार एक हजार चुने हुए साधकों द्वारा इस लक्ष्यपूर्ति के लिए तिथि निर्धारित कर दी व उस दिन तक उन्हें हस्तलिखित गायत्री मंत्र प्राप्त हो गए। पर मंदिर निर्माण अभी भी होना था। दिसंबर, 1952 की अखण्ड ज्योति में उन्होंने  घोषणा कर दी कि 1953 की  गायत्री जयंती  को कई महान कार्यों की पूर्णाहुति होगी। 

उसमें प्रथम थी-सहस्रांशु गायत्री ब्रह्मयज्ञ की पूर्णाहुति, 125 करोड़ गायत्री महामंत्रों का जाप, 125 लाख आहुतियों का हवन, 125 हजार उपवास तीनों ही पूरे होने आ रहे थे, वे सभी गायत्री जयंती तक पूरे हो जाने की संभावना उन्होंने  व्यक्त की थी।  दूसरा था-सवा करोड़ हस्तलिखित मंत्रों के संकल्प की पूर्ति व उसकी भी पूर्णाहुति। 

तीसरा था-स्वयं के 24-24 लाख के 24 पुरश्चरणों की पूर्णाहति ।  चौथा था-गायत्री मंदिर में गायत्री माता की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा।  ऋषिकल्प सात्त्विकता का इस आयोजन में पूरा ध्यान रखे जाने का उन्होंने  आश्वासन दिया और स्वयं  15  वैशाख से 10  ज्येष्ठ तक चौबीस दिन मात्र गंगाजल पीकर, निराहार उपवास रखने की घोषणा की। 

यह प्राण-प्रतिष्ठा पर्व कितना महत्त्वपूर्ण था, इसको भली भाँति समझा जा सकता है जब हम देखते हैं कि इसके लिए पूर्व से पूज्य गुरुदेवं ने क्या-क्या तैयारियाँ की थीं। 1) भारतवर्ष के सभी 2400  प्रमुख तीर्थों का जल एवं सभी सिद्धपीठों (51 ) की रज एकत्रित कर, सभी तीर्थों व सिद्धपीठों को गायत्री तीर्थों में  प्रतिनिधित्व देने की घोषणा कर छह माह में यह कार्य पूरा भी कर लिया। बारह महाशक्तिपीठों का चरणोदक  भी स्थान-स्थान से मँगाया गया। 2 ) साढ़े  सात सौ वर्षों से जल रही एक महान  सिद्धपुरुष की धूनी की अग्नि की स्थापना करने की  बात भी कही गई। 

इस आयोजन में बहुत बड़ी भीड़ को नहीं, मात्र 125 गायत्री-उपासकों को बुलाया गया, जिन्होंने  संतोषजनक ढंग से समस्त विधि-विधानों को पूरा कर  गायत्री-उपासना संपन्न की थी। साथ ही ज्ञानवृद्ध, ,आयुवृद्ध, लोकसेवी,पुण्यात्मा सत्पुरुषों के पते भी माँगे गए, ताकि उनसे इस पुण्य आयोजन हेतु आशीर्वाद  लिया जा सके। कितना सुनियोजित व शालीनता, सुव्यवस्था से भरा-पूरा आयोजन होगा  जिसमें स्वयं को “सिद्ध पुरष  न बताकर” सबके आशीर्वाद माँगे, ताकि भूमि के संस्कारों  को जगाकर एक सिद्धपीठ विनिर्मित की जा सके। सब कुछ इसी प्रकार चला एवं चौबीस दिन का जल-उपवास पूज्य गुरुदेव ने निर्विघ्न पूरा किया। जो साधक ब्रह्मयज्ञ में आए थे, उन्हें मात्र दूध दिया जाता व लकड़ी की खड़ाऊँ पर चलने, यथासंभव सारी तप-तितिक्षाओं का निर्वाह करने को कहा गया। गायत्री जयंती के दिन वाराणसी से पधारे तीन संतों ने ब्रह्मयज्ञ की शुरुआत की। अरणि-मंथन द्वारा अग्नि प्रज्वलन का प्रयास किया गया, पर तीन-चार बार करने पर भी असफलता हाथ लगी।  पूज्य गुरुदेव अधूरे बने गायत्री मंदिर के फर्श पर बैठे सारी लीला देख रहे थे। उनने जटापाठ, घनपाठ, सामगान के लिए उपयुक्त निर्देश दिए तथा अरणि-मंथन हेतु आई काष्ठ को अपने हाथ से स्पर्श कर गायत्री मंत्र जप कर वापस किया। एक सहयोगी को बुलाकर कहा कि नारियल की पूँज लाओ। उसके आने पर उसमें भी मंत्रोच्चारण द्वारा प्राण फूंके तथा पुन: अरणि-मंथन किए जाने का निर्देश दिया। जैसे ही काष्ठों का घर्षण हुआ, मूंज को स्पर्श करा दिया, वैसे ही तुरंत अग्नि प्रज्वलित हो उठी; इसी यज्ञकुंड में धूनी की अग्नि स्थापित कर दी गई। यज्ञ पूर्ण हुआ एवं संध्या को सभी के साथ संतरे का रस लेकर पूज्य गुरुदेव ने अपना उपवास तोड़ा। 

एक गायत्री अनुष्ठानरूपी महायज्ञ, जो सन् 1926 में इस महापुरुष ने आरंभ किया था, की पूर्णाहुति इस पावन दिन हुई। 

अपने जीवन की पहली गुरुदीक्षा :

घोषणा की गई कि आगामी पाँच वर्षों में एक शतकुंडीय यज्ञ, एक नरमेध यज्ञ एवं एक सहस्रकुंडीय महायज्ञ अंत में संपन्न होगा, जिसमें विराट स्तर पर गायत्रीसाधक भाग लेंगे। पूर्णाहुति के दिन ही उनने शाम को एक और घोषणा की कि अभी तक उन्होंने  किसी को गुरु के नाते दीक्षा नहीं दी है। अभी तक सत्यधर्म की दीक्षा ही वे देते आए हैं। अब वे अगले दिन प्रातः अपने जीवन की पहली गुरुदीक्षा देंगे।” जो लेना चाहें, वे उस दिन उपवास रखें। स्वयं वे भी निराहार रहेंगे तथा अपने समक्ष साधकों को बिठाकर यज्ञाग्नि की साक्षी में दीक्षा देंगे। दीक्षा का यह प्रारंभिक दिन था व इसके बाद अनवरत क्रम चल पड़ा।  यही दिन दीक्षा के लिए क्यों चुना। यह एक साधक द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने  कहा कि 24 लाख के चौबीस महापुरश्चरणों की पूर्णाहुति व चौबीस दिन के जल-उपवास की समाप्ति पर उनमें अब पर्याप्त आत्मबल का संचय हो चुका है तथा अब वे अपनी परोक्षसत्ता के संकेत पर अन्यों को अपने मार्ग पर चलने की विधिवत् आध्यात्मिक प्रेरणा दे सकते हैं। ब्रह्मवर्चस् संपन्न गुरुदेव ने पूर्णाहति के अगले दिन वाले गुरुवार से दीक्षा देना आरंभ किया व उनके माध्यम से स्थूल-सूक्ष्मरूप में ज्ञानदीक्षा, प्राणदीक्षा, संकल्पदीक्षा लगभग पाँच करोड़ से अधिक व्यक्ति उनके महानिर्वाण तक ले चुके थे।

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं  कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव 

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तपोभूमि मथुरा में 750 वर्ष पुराणी अखंड अग्नि 

22 जून 2021  का ज्ञानप्रसाद – तपोभूमि मथुरा में 750 वर्ष पुराणी अखंड अग्नि 

तपोभूमि मथुरा प्रवास के दौरान हमारे ह्रदय में  एक प्रश्न ने बहुत ही जिज्ञासा उठाई।  वह प्रश्न  था 750 वर्ष पुरातन अखंड अग्नि के बारे में।  इसका प्रमाण तपोभूमि परिसर में नहीं मिला तो वहां कार्यकताओं को पूछा लेकिन संतुष्टि नहीं हुई। कौन था जो  इस 750 वर्ष पुरातन अग्नि को यहाँ लाया ,क्या साधन थे जिसके द्वारा इसको लाया गया क्योंकि यह अग्नि है, खतरे  की सम्भावना हो सकती थी । कई परिजनों से भी अपनी शंका discuss  की परन्तु कोई satisfactory उत्तर नहीं मिला। इसी दुविधा में हमने एक बार फिर “चेतना की शिखर यात्रा” के पन्नों में इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ना आरम्भ किया, इन्ही दिनों युगनिर्माण योजना का जून 2021  अंक भी आ गया।  दोनों  के अध्यन के उपरांत जो हमें प्राप्त हुआ वह आपके समक्ष है। 

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30 मई  1953  से गुरुदेव का 24  दिन का जल उपवास आरम्भ हुआ। गुरुदेव ने अधूरे बने  गायत्री माता  मंदिर के सामने एक लकड़ी का तख़्त बिछाया, उस पर दरी और चादर बिछाई,धूप से बचने के लिए तिरपाल तान दी।माता जी ने आचार्य श्री को तिलक किया,चरण छूए और तुलसी दल दिया।  इन चौबीस दिनों में कई महापुरष आए। गुरुदेव उनसे मिलते भी रहे और थोड़ी बहुत बातें भी करते रहे। 19  से 24  जून का समय गायत्री तपोभूमि के प्राणप्रतिष्ठा की तैयारियों का  था। इस समारोह में आने के लिए कई लोगों को निमंत्रण पत्र गए। लगभग सभी ने तत्परता दिखाई। ढाई तीन हज़ार साधकों के आने के सम्भावना बन रही थी। सोचा गया कि सभी के आने के बजाय कुछ परिजन अपने-अपने क्षेत्र में ही काम करें तो अच्छा होगा। गायत्री तपोभूमि की प्राण -प्रतिष्ठा की गूँज मथुरा के बाहर भी तो सुनाई देनी चाहिए। कुछ परिजन 2400 तीर्थों का जल- रज इकठा करने के उपरांत वापिस आने वाले थे। मंदिर के दक्षिण भाग में इनकी स्थापना की जानी थी। मंदिर  के उत्तर भाग में 2400 करोड़ गायत्री मंत्र लेखन का संग्रह स्थापित किया जाना था। विश्व का प्रथम गायत्री मंदिर स्थापित होने जा रहा था। जो परिजन तपोभूमि जा चुके हैं उन्होंने  अवश्य देखा होगा कि मन्त्र लेखन संग्रह और तीर्थ जल कैसे सुरक्षित रखा हुआ है।  

मुख्य कार्यक्रम 20  जून से आरम्भ होने थे। गुरुदेव स्वयं आयोजन में  शरीर  से बहुत सक्रीय नहीं हो पा रहे थे। जल -उपवास के कारण  काफी कमज़ोर हो गए थे। 8  किलोग्राम वज़न कम हो गया था ,बुखार भी था।  सभी को लग रहा था गुरुदेव कोई प्रवचन नहीं करेंगें लेकिन फिर  भी उनसे पूछना ठीक समझा। आचार्यश्री ने कहा वे अपना सन्देश लिख कर देंगें। शरीर कमज़ोर एवं बुखार  होने के बावजूद गुरुदेव  की आँखों में तेज झलकता था। 20  जून की सुबह पंडित लाल कृष्ण पंड्या की अध्यक्षता में पंचकुंडीय गायत्री महायज्ञ  आरम्भ हुआ। आज कल जहाँ यज्ञशाला  है  वहां पांच अस्थाई कुंड बनाए गए। तीन दिन चलने वाले गायत्री यज्ञ के इलावा  साधना- उपासना के विशेष कार्यक्रम भी शुरू हुए। इन कार्यक्रमों में सवा हज़ार चालीसा पाठ, महामृत्युंजय यज्ञ ,गायत्री सहस्त्रनाम और दुर्गा सप्तशती का पाठ चलता रहा। 

 अखंड की अग्नि स्थापना :

दो प्रकार की अग्नियां स्थापित की गयीं थीं। एक अरणी  मंथन ( इसका उल्लेख आगे है )  से प्रकट की गयी  और दूसरी हिमालय से लायी गई विशिष्ट अग्नि। शिव पार्वती की तपस्थली हिमालय में 750  वर्ष पूर्व प्रज्जवलित यह अग्नि एक सिद्ध आत्मा की धूनी से त्रियुगी (तीन युग ) नIरायण मंदिर से लाई गई थी। इस मंदिर का विवरण  इस लेख के अंत  में देते हैं। यज्ञशाला में इस के प्रकट होने का विधान भी अद्भुत था।  इसके बारे में किसी को पता नहीं कि वह कहाँ सुरक्षित थी और कब और किसने  लाई।  यज्ञ प्रारम्भ होने की संध्या को अनायास ही एक अज्ञात साधु महाराज  तपोभूमि में  पहुंचे। यद्यपि शाम को ढाई तीन सौ लोग वहां मौजूद थे लेकिन  किसी ने भी उन्हें आते हुए  नहीं देखा था। साधु महाराज  पर लोगों की नज़र तब पड़ी जब वह आचार्यश्री के निकट दिखाई दिए। पुरातन किन्तु साफ सुथरी चीवर ( योगियों की वेश ) धारण किये वह साधु महाराज अपनी उपस्थिति से ही सब को आकर्षित कर रहे थे। सामान्य से दिखने वाले  उन सन्यासी महाराज के व्यक्तित्व में अनूठी आभा थी, ऐसी आभा जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।  सभी का  मानना था कि यह साधु महाराज अचानक ही प्रकट हुए हैं। उनके पास एक कमंडल था। इस कमंडल में से हलकी सी आंच के साथ  आभा निकल रही थी। गुरुदेव ने उन साधु महाराज को देखा और देखते ही उठ कर खड़े हो गए। अभी तक जिनके लिए  बैठना भी सम्भव नहीं था, उनका तनकर खड़े होना वहां सभी को हैरान कर गया।  आचार्यश्री ने उन साधु महाराज को झुककर प्रणाम किया। साधु महाराज ने कहा -यज्ञशाला में इस सिद्धभूमि की अग्नि का भी स्थापित  किया जाना है। इसे कभी भी मंद नहीं पड़ना चाहिए, न ही तिरोहित ( ढका हुआ )  होना चाहिए। अग्नि अखंड रहे। कमंडल से निकाल कर साधु महाराज ने वन अग्नि को एक पात्र में  रखा।  यह दृश्य वहां पर मौजूद सब ने देखा। एकाध ने  पूछा भी महाराजश्री कहां से पधारें हैं। 

आचार्यश्री ने कहा :

जहाँ से ऋषिसत्तायें इस यज्ञ का संचालन कर रही हैं।  हिमालय के अगम्य प्रदेश  में सिद्धजन सैंकड़ों वर्षों से तप कर रहे हैं और  वहीँ से  एक प्रतिनिधि के रूप में इन विभूति का आगमन हुआ है। गुरुदेव ने दादा गुरु के साथ इन सूक्ष्म देहधारियों को हवन  करते देखा था। 30 से 80  वर्ष  की आयु वाले  यह  24 सन्यासी उस हिमालय क्षेत्र में यज्ञ अदि में संलग्न थे  और लोक में व्याप्त पतन के निवारण के लिए वहां  तप कर रहे हैं। उनकी स्वर और शैली से लगता था यह बहुत ही पुराने युग की बात है।दादा गुरु  ने गुरुदेव को बता दिया था  इसी तरह का एक साधनात्मक उपक्रम भविष्य में बनने वाले केंद्र में भी चलाना है। ( ब्रह्मवर्चस  शोध संस्थान  ?) 

गुरुदेव अपने आसन से धीरे- धीरे उठे ,पावं में खड़ाऊँ पहनी और पात्र में रखी उस दिव्य अग्नि को लेकर प्रमुख कुंड की तरफ आए ,माता जी भी उनके साथ थीं। उन्होंने 4  समिधायं चुनी ,उन्हें कुंड में स्थापित किया और मंत्रोचार के साथ अग्निदेव का आवाहन किया।  कपूर और घी के साथ अग्नि प्रज्वलित की गई और आहुतियाँ दी गयीं।  इस अग्नि में धुएं की एक भी रेखा नही थी।  निधूर्म अग्नि को यज्ञाचार्यों ने अग्निदेव के प्रसन्न होकर आहुतियाँ ग्रहण करने का प्रतीक बताया। शेष चार कुंडों में भी समिधायें रखीं थीं। इन कुंडों में गुरुदेव ने शमी और पलाश  की लकड़ियों को  रगड़ कर अग्नि प्रकट की।  शमी और पलाश एक विशेष प्रकार की लकड़ी होती है जिसके रगड़ने से चिंगारियां  प्रकट होती है। इस प्रक्रिया को  अरणी मंथन कहते हैं। गुरुदेव ने कहा था कि दियासिलाई की रगड़ से अग्नि नही प्रकट की जानी है। गुरुदेव ने लकड़ियां पकड़ीं और  ऋग्वेद के  पाठ करने लगे।  पाठ करते ही उन्होंने लकड़ियों को रगड़ा, लोग उत्सुकता से देख रहे थे। लाइटर की तरह छोटी सी लौ उठी ,लोगों की ऑंखें खुली की खुली रह  गईं। इस लौ से कुंड में पड़ी समिधाओं का स्पर्श किया ही होगा कि लपटें उठीं।  उसके बाद तुरंत घी की आहुतियां दी गयीं।  पूज्य गुरुदेव और वंदनीय माता जी प्रमुख कुंड पर बैठे रहे और शेष कार्य सम्पन्न हुआ। 

त्रियुगीनारायण मंदिर :

सोनप्रयाग से 12  और नई  दिल्ली से 455  किलोमीटर दूर  यह मंदिर रुद्रप्रयाग डिस्ट्रिक्ट उत्तराखंड में स्थित है। यह  पुरातन मंदिर  भगवान विष्णु को समर्पित है। हमारे शास्त्रों में इस मंदिर का वर्णन है  क़ि भगवान शिव का विवाह  माँ पार्वती के साथ इसी  पावन  स्थान पर हुआ था और भगवान विष्णु इसके साक्षी थे।  इस मंदिर के बारे में विशेष बात यह है कि इसके प्रांगण में अग्नि ज्वलंत है जो शिव पार्वती के दिव्य विवाह के समय से अखंड जल रही है। इसलिए इस मंदिर का नाम अखंड धूनी मंदिर भी है। इस मंदिर के प्रांगण में चार कुंड – सरस्वती कुंड, रूद्र कुंड, विष्णु कुंड व ब्रह्म कुंड स्तिथ हैं,  जिसमें मुख्य कुंड सरस्वती कुंड है जो  पास के  तीन जल कुंडों को भरता है। इस मंदिर से जुडी मान्यता है कि मंदिर के आँगन में स्तिथ अग्नि कुंड जहां शिव और पार्वती परिणय सूत्र में बंधे थे उस अग्नि कुंड की ज्वाला वर्षों से जलाई जा रही है। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु माँ पार्वती के भाई रूप में उपस्थित  हुए थे  तथा ब्रम्हा जी पुरोहित बने थे।  कहते हैं कि जो व्यक्ति इस कुंड में लकड़ी को प्रज्वलित करता है और इसकी राख को अपने पास रखता है तो उनके वैवाहिक जीवन में हमेशा सुख समृद्धि बनी रहती है। वहीँ प्रागण में स्तिथ कुंड के जल से जो एक बार स्नान करता है तो बाँझपन जैसी समस्या से उसे निदान मिल जाता है। कहते हैं कि इस मंदिर का निर्माण आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा किया गया था।

वर्ष 2018 में उत्तराखंड सरकार द्वारा त्रियुगी नारायण मंदिर  को डेस्टिनेशन वेडिंग (Destination wedding) के लिए प्रचार प्रसार किया गया।  इसके पीछे सरकार तर्क था कि जिस स्थान पर स्वयं भगवान शिव और पार्वती ने विवाह किया हो वहां दूर-दूर से लोग विवाह करने आएंगे। इससे ना सिर्फ उत्तराखंड में पर्यटन बढ़ेगा बल्कि इस क्षेत्र का विकास भी होगा। उत्तराखंड सरकार द्वारा त्रियुगीनारायण मंदिर की डेस्टिनेशन वेडिंग के रूप में घोषणा के बाद  FIR सीरियल की प्रसिद्ध टीवी एक्टर कविता कौशिक, प्रदेश के मंत्री धन सिंह रावत, गाजियाबाद की IPS  अपर्णा गौतम और नैनीताल के ADM ललित मोहन यहाँ अपने विवाह सम्पन्न कर चुके हैं।  

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं  कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव 

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परमपूज्य गुरुदेव का महाप्रयाण 21 जून 2021

18 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद :

परमपूज्य गुरुदेव का महाप्रयाण 21  जून  2021 –परमपूज्य गुरुदेव की पुण्यतिथि पर उनके प्रति सच्ची 

श्रद्धांजलि 

अगर हम अंग्रेजी कैलेंडर  के हिसाब से ही चलें तो परमपूज्य गुरुदेव का महाप्रयाण 2 जून 1990 को  गायत्री जयंती वाले दिन  हुआ था परन्तु तिथियों के मुताबिक इस वर्ष (2021) को  गायत्री जयंती ज्येष्ठ शुक्ल दशमी 21 जून को  पड़ती है। 20 जून,4 :21 दोपहर से 21  जून दोपहर 1 :31 तक।   गुरुदेव ने स्वयं यह महान  दिन अपने महाप्रयाण के लिए चुना। कई वर्ष पूर्व ही गुरुदेव ने अपने महाप्रयाण के संकेत देने और घोषणा करनी आरम्भ कर दी थी। परमपूज्य गुरुदेव कोई साधारण आत्मा तो थे नहीं – वह  स्वेच्छा से अपने स्थूल शरीर का त्याग करके सूक्ष्म में विलीन होने की सामर्थ्य रखते थे।  इस टॉपिक पर हमने कई लेख लिखे हैं ,कई वीडियो बनाई हैं ,हमारे सहकर्मी हमारे चैनल को browse कर सकते हैं।

क्या है महानता  21 जून 2021 की ?    

‘गंगा’ का महत्व भारतीय समाज में कितना है, इसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता। पुण्यसलिला, त्रिविध पापनाशिनी भागीरथी ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन इस धराधाम पर अवतरित हुई, इसलिए इस पर्व को ‘गंगा दशहरा’ कहा जाता है।ऐसी मान्यता है कि दस महापातक (महापाप ) भी गंगा का तत्वदर्शन जीवन में उतारने से छूट जाते हैं, । गंगा के समान ही पवित्रतम हिंदूधर्म का आधार स्तम्भ गायत्री महाशक्ति के अवतरण का दिन भी यही पावन तिथि है, इसलिए इसे ‘गायत्री जयंती’ के रूप में मनाया जाता है। गायत्री को वेदमाता, ज्ञान-गंगोत्री एवं आत्मबल-अधिष्ठात्री कहते हैं। यह गुरुमंत्र भी है एवं भारतीय धर्म के ज्ञान विज्ञान का आदिस्रोत भी। गायत्री को एक प्रकार से ज्ञानगंगा कहा जाता है एवं इस प्रकार गायत्री महाशक्ति एवं गंगा दोनों का अवतरण एक ही दिन क्यों हुआ, यह भलीप्रकार स्पष्ट हो जाता है। 

एक तरफ  भागीरथ ने तप करके गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारा था, तो दूसरी तरफ महर्षि  विश्वामित्र ने प्रचण्ड तप साधना करके गायत्री को देवताओं तक सीमित न रहने देकर सर्वसाधारण के हित के लिए इस  जगत तक पहुँचाया। दोनों ही पर्व एक तिथि पर आने के कारण भारतीय संस्कृति की विलक्षणता भी सिद्ध होती है एवं इस पर्व को मनाने का माहात्म्य भी हमें ज्ञात होता है।

गायत्री जयंती -गंगा दशहरा का दिन गुरुदेव द्वारा महाप्रयाण का चयन :

एक और विलक्षण तथ्य  गायत्री परिजनों को भलीभाँति विदित है कि इस विराट गायत्री परिवार के अभिभावक-संरक्षक- संस्थापक वेदमूर्ति तपोनिष्ठआचार्य पं. श्रीराम शर्मा जी ने अपने स्थूल शरीर के बंधनों से मुक्त होकर इसी पावन दिन माँ गायत्री की गोद में स्थान पाया था। हमारे अधिष्ठाता-गायत्री महाविद्या के तत्वज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने वाले परमपूज्य गुरुदेव ने अपने पूर्वकथन द्वारा इसी पावन दिन का चयन कर स्वयं को सूक्ष्म में विलीन किया  था। हमारे परमपूज्य गुरुदेव जिन्हे इस युग के भागीरथ  एवं विश्वामित्र की संज्ञा  प्राप्त है, जिन्होंने अस्सी वर्ष की आयु में चार सौ वर्ष के बराबर जीवन जीकर एक अतिमानवी पुरुषार्थ कर दिखाया, उनके लिए और कौन-सी श्रेष्ठ तिथि हो सकती थी।  स्वयं को अपनी आराधक माँ गायत्री की महासत्ता में विलीन करने के लिए  प्रात: आठ बजकर पाँच मिनट पर 2  जून, 1990  (गायत्री जयंती) के पावन दिन, आज से 31  वर्ष पूर्व आचार्यश्री ने अपनी अस्सी वर्ष की सुनियोजित यात्रा सम्पन्न कर महाप्रयाण किया था।

इस वर्ष यह पर्व 21  जून को आ रहा है।

इस पावन पर्व की वेला में गायत्री महाशक्ति को समर्पित एक सच्चे साधक के स्वरूप के विषय में जानने का प्रयास करें, तो हमें इनके द्वारा बताए गए, मार्गदर्शन को समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी। उनका व्यक्तित्व एक साधक की प्राणऊर्जा का अक्षयकोष था। उन्होंने  साधना के नये आयामों को  खोला एवं इसे गुह्यवाद-रहस्यवाद के लटके-झटकों से बाहर निकालकर सच्ची जीवन साधना के रूप में प्रस्तुत किया। अपने ऊपर प्रयोग करके , स्वयं वैसा जीवन जीकर परमपूज्य गुरुदेव ने  साधना से सिद्धि को परिष्कृत जीवन रूपी प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष के रूप में प्रतिपादित किया, घोषित किया  और प्रमाणित भी किया ।  

हम ढेरों साधकों की जीवनी देखते हैं : हम उनसे क्या शिक्षण लें ? क्या सभी हिमालय चले जाएँ, कुण्डलिनी जगाने के सम्मोहन (hypnosis ) भरे जाल में उलझकर जीवनसंपदा गंवा बैठें  या मरघट में बैठकर तांत्रिक साधना करें?  बिल्कुल  नहीं। हमारे गुरुदेव ने  लोकमानस के बीच रहकर उनके जैसा जीवन जीकर बताया कि अध्यात्म सौ फीसदी व्यावहारिक है, सत्य है एवं इसे उन्होंने अपनी जीवन रूपी प्रयोगशाला में स्वयं अपनाकर देखा व खरा पाया है।साधना व जीवन को दूध व पानी की तरह घुलाकर जैसे जीवनसाधना की जा सकती है, इसे हम गायत्री जयंती के पावनपर्व के प्रसंग में गुरुसत्ता की जीवनी को देख-पढ़, आत्मसात कर अपने लिए भी एक मार्गदर्शन के रूप में पा सकते हैं। 

अभी तक यही धारणा रही है- चाहे वे बुद्ध हों, पतंजलि हों , गोरक्षनाथ हों, आद्यशंकर हों अथवा महावीर हों  -सभी यही करते रहे हैं कि “जीवन और साधना दो विरोधी ध्रुवों पर स्थित शब्द हैं।” जो जीवन से मोह करता हो, वह साधना से लाभ नहीं प्राप्त कर सकता एवं जो साधना करना चाहता हो, उसे जीवन का त्याग करना होगा। संन्यास के रूप में एक श्रेष्ठ परंपरा इसीलिए पलायन का प्रतीक बन गयी और  वैराग्य भिक्षा वृत्ति का चोगा  पहनकर रह गया। परमपूज्य गुरुदेव ने संधिकाल की  वेला में, आस्था संकट की चरम विभीषिका की घड़ियों में , जीवन और साधना को एकाकार करके  प्रस्तुत किया और साधना को जीवन जीने की कला के रूप में प्रतिपादित ही नहीं, प्रमाणित करके दिखा दिया।  परमपूज्य गुरुदेव के जीवन में न केवल बुद्ध की करुणा दिखाई देती है महावीर का त्याग भी  दिखाई देता है।  सब विलक्षण संयोग  होने पर भी, पूर्वजन्म के सुसंस्कारों की प्रारब्ध जन्य प्रबल प्रेरणा होते हुए भी, उन्होंने जीवन से मुख नहीं मोड़ा-  एक गृहस्थ का जीवन जिया, ब्राह्मणत्व को जीवन में उतारकर दिखाया।  सही अर्थों में “स्वे स्वे आचरण शिक्षयेत्” की वैदिक परम्परा को पुनः जीवित कर  गुरुदेव हम सबके समक्ष एक ज्वलंत उदाहरण बनकर प्रस्तुत हुए। स्वेस्वे आचरण शिक्षयेत् का अर्थ है – जैसा आचरण एक श्रेष्ठ पुरुष का होता है, अन्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करते हैं। हमारे अभिभावक, विराट गायत्री परिवार के पिता न केवल भाव- संवेदना से ओतप्रोत थे, आज की कुटिलताओं से भरी दुनिया में लोकाचार-शिष्टाचार कैसे निभाया जा सकता है, इसके भी श्रेष्ठतम उदाहरण हैं। न जाने कितने चमत्कारों का विश्वकोष पूज्यवर के जीवन से जुड़ा है, पर लौकिक जीवन में वे एक सामान्य, व्यवहार-कुशल, एक सीधे सरल लोकसेवी के रूप में ही प्रतिष्ठित रहे। जीवनभर उन्हें कोई उस रूप में नहीं जान पाया, जिस रूप में महाकाल की अंशधर वह सत्ता हमारे बीच आयी थी।

सूक्ष्मीकरण साधना उनकी चौबीस वर्ष के चौबीस लक्ष के महापुरश्चरणों के प्रायः  32 वर्ष बाद संपन्न हुई थी। यदि महापुरश्चरण गुरु के आदेशों के अनुरूप जीवन को साधक के रूप में विकसित करने हेतु थे, तो सूक्ष्मीकरण का पुरुषार्थ विश्वमानव को केन्द्र बनाकर किया गया प्रचंड साधनात्मक पराक्रम था।  विश्व की कुण्डलिनी  जागरण की दिशा में एक अभूतपूर्व प्रयोग था। उन्होंने लिखा भी कि उनकी उस साधना का उद्देश्य  जन-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अगणित भागीरथों  का सृजन था। इसी क्रम में 1988 की  आश्विन नवरात्रि में  उन्होंने युगसंधि महापुरश्चरण की घोषणा की  जिसे बारह वर्ष तक चलना था,  नवयुग के आगमन तक। आज गायत्री जयंती की वेला में , 2021  की गायत्री जयंती की  वेला में -उस महासाधक का पुरुषार्थ याद हो आता है  जिसने  नरपशु-सा जीवन जीने वाले हम सभी को नरमानव के रूप में रूपांतरित कर देवमानव बनने का पथ दिखा दिया। 2021 का वर्ष शांतिकुंज का गोल्डन जुबली वर्ष -स्वर्ण जयंती वर्ष तो है ही ,पूज्य गुरुदेव के मथुरा प्रस्थान का भी स्वर्ण जयंती वर्ष है।  जून 1971 में ही गुरुदेव  तपोभूमि मथुरा छोड़ कर शांतिकुंज हरिद्वार आ गए थे। 

 गायत्री जयंती की वेला में साधना के परिप्रेक्ष्य में अपनी गुरुसत्ता के जीवनक्रम का अध्ययन करने वाले हम  सभी जिज्ञासुओं को उस गायत्री साधक के रूप में सच्चे  ब्राह्मणत्व को जगाने वाला स्वरूप समझ में आना चाहिए। ब्राह्मणत्व रूपी उर्वर  भूमि में ही गायत्री साधना का बीज  पुष्पित-पल्लवित हो वटवृक्ष बन पाता है। गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है- इस मूलमंत्र से जिसने अपनी शैशव अवस्था आरंभ की थी, उसने जीवनभर ब्राह्मण बनने की  जीवन- साधना को अपनाया। 

ब्राह्मण’ शब्द आज एक जाति का परिचायक हो गया है:

 ब्राह्मणवाद, मनुवाद न जाने क्या-क्या  कहकर उलाहने दिये जाते हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने ब्राह्मणत्व को सच्चा आध्यात्मिक  नाम देते हुए कहा कि हर कोई गायत्री महामंत्र के माध्यम से जीवन-साधना द्वारा ब्राह्मणत्व अर्जित कर सकता है। उन्होंने ब्राह्मणत्व को मनुष्यता का सर्वोच्च सोपान कहा। आज जब समाज ही नहीं समग्र राजनीति जातिवाद से प्रभावित नजर आती है, तो समाधान  एक ही  नज़र आता है- 

“परमपूज्य गुरुदेव के ब्राह्मणत्व प्रधान तत्वदर्शन का घर-घर में  विस्तार-प्रचार -प्रसार।” 

न कोई जाति का बंधन हो, न धर्म-संप्रदाय का।हम  सभी विश्वमानवता की धुरी में बंधकर यदि सच्चे ब्राह्मण बनने का प्रयास करें और  समाज से कम-से-कम लेकर अधिकतम देने की प्रक्रिया सीख सकें, आदर्श जीवन जी सकें, तो सतयुग की वापसी दूर नहीं है। गायत्री साधक के रूप में सामान्य जन को अमृत, पारस, कल्पवृक्ष रूपी लाभ सुनिश्चित रूप से आज भी मिल सकते हैं, पर उसके लिए पहले ब्राह्मण बनना होगा। गुरुवर के शब्दों में ब्राह्मण की पूँजी है- विद्या और तप। अपरिग्रही ही वास्तव में सच्चा ब्राह्मण बनकर गायत्री की समस्त सिद्धियों का स्वामी बन सकता है।   अपरिग्रह का अर्थ है कोई भी वस्तु संचित ना करना,इक्क्ठा न करना। 

अगर अगले दिनों  सतयुग य  ब्राह्मण युग  आएगा तो  वह इसी साधना से, जिसे बड़ी सरल बनाकर युगऋषि हमें सूत्र रूप में दे गए एवं अपना जीवन वैसा जीकर चले गए। ब्राह्मण बीज को संरक्षित कर ब्राह्मणत्व को जगा देना सारी धरित्री को गायत्रीमय कर देना ही परमपूज्य गुरुदेव की पुण्यतिथि पर उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है। जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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16 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद -सलाखों के अंदर गायत्री साधना 2

16 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद – सलाखों के अंदर गायत्री साधना 2
इतना प्रेरणादायक एवं भावनात्मक लेख पढ़ने के बाद आप सभी तो उत्सुक होंगें कि जल्दी से “सलाखों के अंदर गायत्री साधना पार्ट 2” पढ़ा जाये लेकिन ऑनलाइन ज्ञानरथ की सामूहिक भावनाएं आदरणीय शशि जी को पहुँचाना हमारा कर्तव्य एवं धर्म बनता है। सभी सोशल मीडिया साइट्स पर आने वाले कमेंट एक -एक करके शेयर करना तो असंभव है लेकिन हम केवल चार शब्द ही प्रयोग कर सकते हैं – “अद्भुत ,आश्चर्यजनक किन्तु सत्य”। इन चार शब्दों में सारी भावनाएं छिपी हुई हैं। हम लेख पढ़ने के लिए आप सबका धन्यवाद तो करते ही हैं लेकिन बहुतों ने तो उनके ब्लॉग को भी विजिट किया ,न केवल विजिट किया इस लेख के सम्बंधित पोस्ट भी पढ़ीं और कवितायेँ भी सराहीं। इसके लिए भी धन्यवाद्। अवश्य ही इतना महान कार्य गुरुसत्ता के आशीर्वाद से आदरणीय शशि जी और संजय जी से ही करवाना निश्चित हुआ होगा।
इस लेख में भी हमारा केवल इतना ही योगदान है कि हम आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं ,शशि जी की लेखनी है ,उन्होंने ने ही चित्र दिए हैं । आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के हम बहुत ही आभारी हैं जिन्होंने शशि जी के साथ हमारा सम्पर्क स्थापित करवाया ।

शशि जी का संक्षिप्त परिचय :
परमपूज्य गरूदेव की कृपा से हम सभी के अपने ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में कुछ उच्स्तरीय आत्माएं विद्यमान हैं , इन्हीं में से एक बहन जयपुर (राजस्थान) से शशि शर्मा ( ऑफिसियल नाम शशि संजय ) हैं, जिनका अनुभव टेलीविजन पर कार्यक्रम प्रस्तुति रहा है।तत्पश्चात राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा संचालित स्कूल में 40 वर्षों तक प्रिंसिपल के तौर पर रही और अब सेवानिवृत्त हो चुकी हैं। शशि जी गायत्री परिवार मिशन से 1992 से जुडी हैं और 1994 से जेल में बंदी भाइयों के बीच गुरुदेव का संदेश पहुंचाने का कार्य कर रही हैं। यह शशि जी का परिश्रम और समर्पण ही है कि 24 नवम्बर 2002 को राजस्थान सेंट्रल जेल में गायत्री मंदिर की स्थापना की गयी , तबसे गायत्री उपासना अनवरत चल रही है।


ध्यान मूलं गरोर्मूति, पूजा मूलं गुरोर्पदम् ।
मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं,मोक्ष मूलं गुरोर्कृपा ।।मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं

Continued from पार्ट 1
अब बारी थी मूर्ति लाने की, हम मूर्ति बाजार में गए और 3:30 फीट की मूर्ति पसंद कर ली, कुछ एडवांस दे दिया तैयार करने के लिए। अब पैसे कहां से आएं बस यही चिंता सता रही थी। एक दिन एक भाई अचानक से घर आए और आकर अपना स्वप्न बताने लगे बोले भाई साहब आज तो सपने में गुरु जी ने आकर बहुत डांटा और कहा बेटा अगर तेरा एक्सीडेंट में सिर फट जाए तो कितना रुपया लग जाएगा, मैंने गुरु जी से कहा-गुरु जी कम से कम 50000 तो लग ही जाएगा, वे कहने लगे कहां से लाएगा इतना रुपया ? मैंने गिड़गिड़ाते हुए कहा-गुरुजी ब्याज पर लेकर आऊंगा लेकिन इलाज तो कराऊंगा ना। गुरुदेव ने डांटते हुए कहा कि इलाज के लिए पैसे ला सकता है ब्याज पर ? तो जेल में मंदिर के लिए मूर्ति के लिए पैसे नहीं ला सकता। इतना बड़ा काम चल रहा है वहां पर और तू है कि घर में बैठकर कुछ नहीं कर रहा। वे भाई बताने लगे कि मैंने रो-रोकर गुरुदेव को प्रार्थना की कि गुरुदेव मूर्ति के पैसे मैं ब्याज पर लाकर मूर्ति रखवा दूंगा आप मेरी रक्षा करें। इस तरह मंदिर में मूर्ति रख दी गई। अब बारी थी प्राण प्रतिष्ठा की। अब प्राण प्रतिष्ठा कौन कराएं, हम दोनों ने यह संकल्प लिया था कि गायत्री माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कोई भी व्यक्ति शांतिकुंज से आकर कराएगा तभी अन्न ग्रहण करेंगे, 6 माह बीत गए लेकिन कोई व्यवस्था नहीं थी।अचानक गुरुदेव माता जी को शायद हम पर तरस आ गया और शांतिकुंज से डॉ प्रणव पंड्या जी के माता-पिता श्री सत्यनारायण जी पंड्या एवं श्रीमती सरस्वती पंड्या जी (जिन्हें हम सभी पापा और बाई के नाम से पुकारते थे) गायत्री माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करने 24 नवंबर 2002 को जयपुर आ गए। दोनों ने प्राण प्रतिष्ठा कराई बंदी भाइयों को आशीर्वाद दिया,जेल में उत्सव जैसा माहौल था। आदरणीय पापा जी बहुत भावुक हो गए और कहने लगे मेरे प्यारे बच्चों मुझे नहीं मालूम था कि तुम लोग इतना बड़ा काम कर रहे हो और गुरुदेव माता जी की शरण में हो, तुम सब जुड़े रहना,तुम्हें कृपा बराबर मिलेगी। आदरणीय बाई को जब माइक पकड़ाया तो वे बहुत भावुक होकर बोली मेरे बच्चों मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं अपने छोटे छोटे बालकों के बीच आ गई हूं मेरा खूब आशीर्वाद। इसके बाद जेल में बंदी भाइयों ने बैंड बाजे के साथ पापा और बाई का स्वागत किया और हर बंदी ने दोनों को कतार बद्ध होकर माला पहनाकर प्रणाम किया। तमाम बंदियों के प्रणाम करने में काफी समय लगा लेकिन आज पापा और बाई बहुत खुश थे, थकान का पूछने पर कहने लगे बेटा हम बिल्कुल ठीक हैं बच्चों से मिलने में थकान कैसी?
जब बंदी भाइयों ने उन्हें दोबारा आने के लिए कहा तो पापा कहने लगे बेटा मैं विश्वास तो नहीं दिला सकता अगर गुरुदेव की मर्जी हुई तो मैं अवश्य आऊंगा अन्यथा आप लोग जब भी बरी हों या पैरोल पर जाएं तो शांतिकुंज हमसे मिलने अवश्य आना और पापा बाई ने अपने इस वादे को अंत तक निभाया, जब भी कोई बंदी शांतिकुंज जाता तो सबसे पहले उनसे मिलकर आता।इस तरह प्राण प्रतिष्ठा के बाद सचमुच गायत्री माता की अनुभूतियों के वरदान सभी को मिलने लगे बहुत बार ऐसा होता कि सभी को एक साथ ध्यान में गुरुदेव और माता जी की प्रत्यक्ष खड़े होने की और कभी सिर पर हाथ रखने की अनुभूतियां होती।
5 साल तक बराबर यज्ञ जप ध्यान साधना का क्रम चलता रहा। मंदिर में गायत्री माता की मूर्ति के दोनों तरफ गुरुदेव और माता जी की तस्वीरें रखी रहती थी,अचानक से बंदी भाइयों ने जिद पकड़ ली कि इनकी जगह मूर्तियां बनवा दीजिए। अब समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। लेकिन बंदी भाई भी किसी साधक से कम नहीं थे उनका कहा पूरा हुआ और अप्रैल 2006 में गुरुदेव और माता जी की मूर्तियां भी वहां स्थापित हो गई। इस तरह वहां पर गुरुदेव ने जो स्वप्न दिया था, इस तरह से पूरा करा लिया। सपना तब याद आया, जब गुरुदेव और माता जी की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा करने दतिया शक्तिपीठ के संत आए और उन्होंने कहा कि तुम्हारे गुरु ने तुम लोगों को चुना है इस काम के लिए। कभी यह मत सोचना कि यह काम तुम अपनी मर्जी से कर रहे हो यह तो आचार्य जी चला रहे हैं और तुम सब चल रहे हो।
मंदिर प्रांगण में एक हवन कुंड भी बंदी भाइयों ने तैयार कर लिया ताकि लोहे का हवन कुंड बार-बार ना लाना पड़े और तो और.. उन्होंने रुपयों के बैंक की जगह “जप बैंक” खोल लिया। हर एक बंदी भाई को रोज की माला उस जब बैंक के खाते में लिखनी होती थी। कम से कम 108 माला रोज सबको मिलकर करनी होती थी किसी पर कोई दबाव नहीं था, लेकिन कम से कम तीन और अधिक से अधिक जितनी चाहे उतनी माला रोज करनी थी, जेल के बाहर या भीतर प्रशासनिक स्टाफ या अन्य कोई भी परेशान होता तो उस “जपबैंक” में से उधार लेकर सभी बंदी भाई उसकी समस्या का समाधान करने के लिए गुरुदेव को प्रार्थना करते और सचमुच गुरुदेव उनकी प्रार्थना को सुनते और जिसके लिए प्रार्थना की गई है उस व्यक्ति को अवश्य लाभ होता, चाहे वह स्वास्थ्य संबंधी हो, बच्ची की शादी से संबंधित हो, किसी का प्रमोशन हो, ऐसी बहुत सारी समस्याएं लेकर लोग बताने लगे, और समाधान मिलने पर बंदी भाइयों का उत्साह बढ़ने लगा उन्हें लगने लगा कि गुरुदेव हमारी प्रार्थना सुनते हैं तो क्यों ना हम दूसरों के लिए प्रार्थना करें। इसी क्रम में मंत्र लेखन का कार्य भी शुरू हो गया हर माह 1000 कॉपियां भरी जाने लगीं। तब से आज तक बराबर गुरुदेव का अनन्य प्यार उत्साह बंदी भाइयों को मिल रहा है। उनके साथ साथ हमारी सजा भी जो शायद पिछले जन्मों में अपराध किए जाने के कारण रही होगी गुरुदेव ने धीरे-धीरे सम्मान सहित जेल प्रांगण में भेज कर पूरी कर दी।अभी वर्तमान में बन्दी भाई स्वयं ही सारी व्यवस्था को संभाले हुए हैं।
इति जय गुरुदेव
कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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15 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद -सलाखों के अंदर गायत्री साधना 1

15 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद -सलाखों के अंदर गायत्री साधना 1
मित्रो, पिछले कुछ दिनों से राजस्थान सेंट्रल जेल जयपुर के अंदर गायत्री साधना के बारे में हम बताते आ रहे हैं , उसी संदर्भ में आज प्रस्तुत है दो कड़ी के लेख का प्रथम पार्ट। इन दोनों लेखों की लेखक हमारी आदरणीय शशि संजय शर्मा जी के हम ह्रदय से आभारी हैं जिन्होंने अमूल्य समयदान देकर ऑनलाइन ज्ञानरथ पर एक अभूतपूर्व उपकार किया है।इन लेखों में हमारा केवल इतना ही योगदान है कि हम आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं ,उन्ही की लेखनी है ,उन्होंने ने ही चित्र दिए हैं । उन्होंने ने तो कई चित्र भेजे थे लेकिन यूट्यूब की लिमटेशन के कारण सारे अपलोड नहीं हो सकते। आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के हम बहुत ही आभारी हैं जिन्होंने शशि जी के साथ हमारा सम्पर्क स्थापित किया।

तो आज का लेख आदरणीय शशि जी के संक्षिप्त परिचय से आरम्भ करते हैं।

शशि जी का संक्षिप्त परिचय :
परमपूज्य गरूदेव की कृपा से हम सभी के अपने ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में कुछ उच्स्तरीय आत्माएं विद्यमान हैं , इन्हीं में से एक बहन जयपुर (राजस्थान) से शशि शर्मा ( ऑफिसियल नाम शशि संजय ) हैं, जिनका अनुभव टेलीविजन पर कार्यक्रम प्रस्तुति रहा है।तत्पश्चात राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा संचालित स्कूल में 40 वर्षों तक प्रिंसिपल के तौर पर रही और अब सेवानिवृत्त हो चुकी हैं। शशि जी गायत्री परिवार मिशन से 1992 से जुडी हैं और 1994 से जेल में बंदी भाइयों के बीच गुरुदेव का संदेश पहुंचाने का कार्य कर रही हैं। यह शशि जी का परिश्रम और समर्पण ही है कि 24 नवम्बर 2002 को राजस्थान सेंट्रल जेल में गायत्री मंदिर की स्थापना की गयी , तबसे गायत्री उपासना अनवरत चल रही है।


ध्यान मूलं गरोर्मूति, पूजा मूलं गुरोर्पदम् ।
मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं,मोक्ष मूलं गुरोर्कृपा ।।मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं

गुरु ने जो कह दिया बस वही मंत्र बन गया, वही जीवन में चरितार्थ हो गया।
बात बहुत पुरानी है, लगभग 1996 की गायत्री जयंती की, जब मेरे पतिदेव श्री संजय शर्मा शांतिकुंज गए हुए थे अचानक एक दिन रात्रि में गुरुदेव स्वप्न में प्रकट हो गए और दो व्यक्तियों की आपस में जमीन को लेकर लड़ाई दिखाते हुए और खुद उन दोनों का बीच बचाव करते हुए दिखाई दिए, इतना ही नहीं उन्होंने उस जमीन के दाएं हाथ का टुकड़ा एक व्यक्ति को और बाएं हाथ का टुकड़ा दूसरे व्यक्ति को दे दिया मेरे पति सोचने लगे कि बीच वाले टुकड़े का गुरुदेव क्या करेंगे इन्होंने यह जमीन का टुकड़ा क्यों बचा लिया? गुरुदेव ने जैसे इनके मन को पढ़ लिया हो और इनकी तरफ देखते हुए कहा कि इस जमीन पर तू मंदिर बनाएगा इतना सुनते ही मेरे पतिदेव फूट-फूट कर रोने लगे तथा कहने लगे गुरुदेव मैं जीवन में कुछ नहीं कर पाया आप मंदिर बनाने का कह रहे हैं मैं मंदिर कैसे बना सकता हूं मैं मंदिर नहीं बना सकता इतना कहकर इन्होंने गुरुदेव के चरण पकड़ लिए। गुरुदेव ने इनकी ओर गुस्से से देखा और कहने लगे तू मंदिर बनाएगा, तू ही मंदिर बनाएगा,मंदिर यहीं बनेगा,इतना कहकर अंतर्ध्यान हो गए। जब इन की आंख खुली तो ये रो रहे थे इनका तकिया पूरी तरह भीग चुका था कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें यह सपना था या सचमुच गुरुदेव आए थे। सुबह यज्ञ के बाद ये शैल जीजी से मिलने गए और उन्हें पूरा स्वप्न बताया जीजी ने कहा भैया इंतजार करो गुरुदेव ने कहा है तो अवश्य पूरा होगा। उसके बाद जयपुर वापस आ गए और बहुत सारे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से हम दोनों ने स्वप्न के बारे में जिक्र किया लेकिन कोई भी कार्यकर्ता जवाब नहीं दे पाया। हम भी वक्त के साथ इस घटना को भूल गए। 1994 से हम लोग सेंट्रल जेल, अनाथ आश्रम, नारी निकेतन,बालिका सदन, इन तमाम स्थानों पर यज्ञ कराने तथा इस बहाने गुरुदेव के विचार इन जगहों पर पहुंचाने का कार्य कर रहे थे बहुत ही अनवरत रूप से यह कार्यक्रम चल रहे थे। सेंट्रल जेल में नवरात्रि पर्व पर हमेशा अखंड दीपक जलाकर 9 दिन तक जप यज्ञ एवं ध्यान साधना का कार्यक्रम होता था, लगातार कई वर्षों तक यह अनवरत रूप से चलता रहा। एक बार एक नए जेल अधीक्षक आए और उन्होंने जो कार्यक्रम हम जेल के बड़े हॉल में करते थे वहां से हटाकर हमें 9 नंबर बाड़े में भेज दिया और कहने लगे, अरे मैडम हॉल की छत काली हो जाएगी इसलिए आप अब से 9 नंबर वार्ड में जो शिव मंदिर(पीपल के पेड़ के नीचे छोटा सा शिव परिवार)बना हुआ है उसी प्रांगण में अपना कार्यक्रम करेंगी, उनके ऐसा करने से हमें बहुत दुख हुआ क्योंकि उस समय बारह सौ बंदी हुआ करते थे और सभी यज्ञ में भाग लिया करते थे अब जब हम 9 नंबर वार्ड में आ गए तो हमें लगने लगा कि यह सारे बंदी भाई यज्ञ में भाग नहीं ले पाएंगे, लेकिन हमारी सोच गलत थी सभी लोग यज्ञ में आने लगे और सभी बहुत खुश थे कारण…. हॉल में प्रशासन का हस्तक्षेप ज्यादा रहा करता था वार्ड में किसी तरह का कोई हस्तक्षेप नहीं था। इसी तरह लगभग 6 साल बीत गए हम बराबर वहां जाते रहे और कार्यक्रम यथावत चलते रहे, सन 2001 के नवरात्रों में हमेशा की तरह पीपल के पेड़ से बांधकर गुरुदेव माता जी की तस्वीरें लगा दी गई और अखंड दीपक जला दिया गया हम यज्ञ करा कर घर वापस लौट आए जब अगले दिन पहुंचे तो मालूम पड़ा कि तस्वीरें गिर गई थीं और दीपक बुझा पड़ा था, जाते ही बंदी भाइयों ने वह सब दिखाया और कहने लगे कि हम लोग जेल अधीक्षक महोदय से गायत्री माता की मूर्ति और छोटा सा मंदिर बनाने की बात करें, उनकी यह बात सुनकर हमें विश्वास नहीं हुआ कि प्रशासन हमारी इस बात को सुनेगा भी। हमने उन्हें समझाया कि नवमी वाले दिन अधीक्षक महोदय को यज्ञ के लिए जब आमंत्रित करेंगे तभी इस विषय पर आप लोग बात करना। पूर्णाहुति के दिन अधीक्षक महोदय को आमंत्रित किया गया और वह सहर्ष ही तैयार हो गए उन्होंने आकर यज्ञ किया तथा अपने विचार प्रकट करने लगे तभी हमने उनसे निवेदन किया कि कुछ बंदी भाई आपसे कुछ कहना चाहते हैं, उन्होंने कहा हां हां क्यों नहीं अवश्य कहें, उनमें से एक बंदी भाई ने पूरा माजरा समझाया कि किस तरह से गिलहरी और बंदर मिलकर दीपक को गिरा देते हैं और तस्वीरों की डोरी को काट देते हैं, अच्छा हो यदि आप 1 फीट की मूर्ति और माताजी के लिए छोटा सा मंदिर बनवा दें जहां अखंड दीपक और तस्वीरें सुरक्षित रह सकें, इतना सुनते ही अधीक्षक महोदय ने हम दोनों की तरफ देखा और कहने लगे कि क्या आपको भी ऐसा लगता है, हमारी हां कहने पर उन्होंने तुरंत भूमि पूजन के लिए हां कर दी और कहने लगे अरे बहन जी अभी खड्डा खुदवाओ और भूमि पूजन कर दो मैं अभी यहीं हूं। इतना सुनते ही बंदी भाई खुश हो गए और भूमि खोदने के लिए औजार आदि ले आए, तुरंत ही छोटा सा खड्डा खोद कर अधीक्षक महोदय से भूमि पूजन करा दिया उसके बाद जेल के समस्त वार्डों में (जहां 14 वार्ड हुआ करते थे) सभी बंदी भाइयों को प्रसाद वितरण कर हम घर वापस आ गए। उस रात पूरी रात हम दोनों सो नहीं सके केवल एक ही विचार कि मंदिर आखिर बनेगा कैसे, भले ही छोटा सा ही क्यों ना हो, हमने सुन रखा था कि जैन समाज की मंदिर बनाने की फाइल पिछले लगभग 30 सालों से विचाराधीन है अभी तक उस पर कोई भी निर्णय नहीं हुआ है, तब अचानक अधीक्षक महोदय का उत्साह पूर्वक नींव पूजन कराना आश्चर्यचकित कर देने वाला था, हम अगले दिन वापस लिखित में मंदिर बनवाने के लिए प्रार्थना पत्र लेकर अधीक्षक महोदय के पास गए और उन्हें वह प्रार्थना पत्र दे दिया जैसे ही उन्होंने पत्र को पढ़ा तो अपनी सीट से उठकर खड़े हो गए और कहने लगे बहन जी यह मेरी जुबान है कोई मजाक नहीं, आप जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा, इतना कहकर उन्होंने प्रार्थना पत्र को फाड़ दिया, हमारा अविश्वास शायद फिर भी बरकरार था। खैर…हमने मंदिर बनाने के लिए सामग्री डलवादी और वहां जो बंदी थे उन्हीं में इंजीनियर आर्किटेक्ट बेलदार मजदूर सभी तरह के बंदियों ने मिलकर मंदिर का निर्माण कर लिया जब छत बनाने की बारी आई तो हमें लगा कि शायद यह लोग छत नहीं बना पाएंगे और हमने बाहर से एक मिस्त्री बुलाकर छत का गुंबज बनवाने का प्रयास किया किंतु न जाने क्यों? वह एक्सपर्ट मिस्त्री गुंबज नहीं बना पाया और पैसे लेकर चलता बना, सभी बंदी भाई हम पर हंसने लगे और कहने लगे कि गुरुजी नहीं चाहते कि कोई बाहर का आदमी आकर इस मंदिर को हाथ लगाए, गुंबज हम ही लोग बनाएंगे, उनकी बात सुनकर हमने भी हां कर दी,जब गुंबज बन कर तैयार हुआ तो हम देख कर दंग थे कि उसकी डिजाइन मस्जिद के जैसी थी किंतु कुछ कर नहीं सकते थे क्योंकि उसको बनाने में हिंदू मुस्लिम सिक्ख ईसाई सभी का हाथ था और सभी की भावनाएं उस मंदिर से जुड़ी थीं।
To be continued
इति जय गुरुदेव
कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा लेख 11-दादा गुरु ने कहा ,”विश्वास की कमी रही न ?”

14  जून 2021  का ज्ञानप्रसाद –दादा गुरु ने कहा ,”विश्वास की कमी रही न ?”

आज का लेख परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा का 11वं  और अंतिम लेख है।  कल से हम एक नई श्रृंखला  “ सलाखों के अंदर गायत्री साधना” शीर्षक से आरम्भ कर रहे हैं।  दो कड़ी की यह श्रृंखला बहुत ही अद्भुत और प्रेरणादायक है। गुरुदेव की आत्मकथा के 11 अंक लिखते -लिखते ,हर अंक में यही संदेह रहा कि कैसे पूरी होगी यह श्रृंखला तो उसका उत्तर आज वाले  लेख के शीर्षक में मिल ही गया  -”विश्वास की कमी रही न” परमपूज्य गुरुदेव ने सब कुछ इतनी सहजता से सम्पन्न करा दिया , इतना ही नहीं आपके सबके माध्यम से श्रेय भी हमें ही दे दिया।  धन्य हैं  गुरुदेव आप – कार्य खुद करते हैं  और श्रेय हमें देते हैं – नमन ,नतमस्तक। 

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इसी प्रभात वेला में प्रकाशपुंज मार्गदर्शक के पहले जैसी स्थिति में फिर दर्शन हुए, । देखते ही तन्द्रा आरम्भ हुई और क्रमशः अधिक गहरी होती गई । मूक भाषा में पूछा गया-

इन 24 वर्षों में कोई चित्र-विचित्र अनुभव हुआ हो तो बता ?” 

मेरा एक ही उत्तर था-

“निष्ठा बढ़ती ही गयी है और इच्छा उठती रही है कि अगला आदेश हो और उसकी पूर्ति इससे भी अधिक तत्परता तथा तन्मयता को संजोकर की जाए । आकांक्षा तो एक ही है कि अध्यात्म आडम्बर है या विज्ञान ? इसकी अनुभूति स्वयं कर सकें, ताकि किसी से बलपूर्वक कह सकना सम्भव हो सके ।”

अपनी बात समाप्त हो गयी । मार्गदर्शक ने कहा 

विश्वास में एक पुट और लगाना बाकी है, ताकि वह समुचित रूप से परिपक्व हो सके । इसके लिए 24  लाख आहुतियों का गायत्री यज्ञ करना अभीष्ट है ।” मैंने इतना ही कहा कि-“शरीरगत क्रियाएँ करना मेरे लिए शक्य है, पर इतने बड़े आयोजन के लिए जो राशि जुटाई जाएगी और प्रबन्ध में असाधारण उतार-चढ़ाव आयेंगे उन्हें कर सकना कैसे बन पड़ेगा? निजी अनुभव और धन इस स्तर का है नहीं, तब आपका नया आदेश कैसे निभेगा ?” 

मन्द मुसकान के बीच उस प्रकाशपुंज ने फिर कहा:  

“विश्वास की कमी रही न ? हमारे कथन और गायत्री के प्रतिफल से क्या नहीं हो सकता? इसमें सन्देह करने की बात कैसे उठ पड़ी? यही कच्चाई है, जिसे निकालना है । शत-प्रतिशत श्रद्धा के बल पर ही परिपक्वता आती है।”

मैं झुक गया और कहा: “रूपरेखा बता जाइये । मैं ऐसे कामों के लिए अनाड़ी हूँ।” उन्होंने संक्षेप में किन्तु समग्र रूप में बता दिया कि एक हजार कुण्डों में 24 लाख आहुतियों का गायत्री यज्ञ कैसे हो? इन दिनों जो प्रमुख गायत्री उपासक हैं, उन्हें एक लाख की संख्या में कैसे निमन्त्रित किया जाए ? मार्ग में आने वाली कठिनाइयाँ अनायास ही हल होती चलेंगी। दूसरे दिन से वह कार्य आरम्भ हो गया । चार दिन पहले आयोजन आरम्भ होना था । एक लाख आगन्तुक और इससे दो-तीन गुने दर्शकों के लिए बैठने, निवास करने, भोजन, शयन, लकड़ी, सफाई, रोशनी, पानी आदि के अनेकानेक कार्य एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए थे । जैसे मन में आया, वैसा ढर्रा चलता रहा । आगन्तुकों के पते कलम अपने आप लिखती गई । आयोजन के लिए छह-सात मील का एरिया आवश्यक था । वह कहीं  खाली  मिल गया, कहीं माँगने पर किसानों ने दे दिया । जिनके पास डेरे, तम्बू, राशन, लकड़ी, कुओं में लगाने के पम्प-जेनेरेटर आदि थे, उन सभी ने देना स्वीकार कर लिया । ऐसे कामों में एडवांस माँगने का रिवाज है, पर न जाने कैसे लोगों का विश्वास जमा रहा कि हमारा पैसा मिल जाएगा । न किसी ने देने के लिए कहा और न ही दिया गया । पूरी तैयारी होने में एक महीने से भी कम समय लगा । सहायता के लिए स्वयं-सेवकों का अनुरोध छापा गया तो देखते ही देखते वे भी 500  की संख्या में आ गए । सभी ने मिलजुलकर काम हाथों में ले लिया । नियत समय पर निमन्त्रित गायत्री उपासकों की एक लाख की भीड़ आ गई । उनके साथ ही दर्शकों के हुजूम थे । अनुमान दस लाख आगन्तुकों का किया जाता है । स्टेशनों पर अन्धाधुन्ध भीड़ देखी गयी और बस स्टैण्डों पर भी वही हाल । भले अफसरों ने स्पेशल ट्रेनें और बसें छोड़ना आरम्भ किया । मथुरा शहर से चार मील दूर यज्ञ स्थल था । अपने-अपने बिस्तर सिर पर लादे सभी आते चले जाते थे । एक लाख के ठहरने का प्रबन्ध किया गया था, पर उसी में चार लाख समा गए । भोजन के लंगर चौबीस घण्टे चलते रहे । किसी को भूखे रहने की, छाया न मिलने की शिकायत न करनी पड़ी। कुओं में पम्प वालों ने अपने पम्प लगा दिए । बिजली कम पड़ी तो दूर-दूर कस्बों तक से गैस बत्तियाँ आ गई। टट्टी-पेशाब और स्नान की समस्या सबसे अधिक पेचीदा होती है । वह भी इतनी सुव्यवस्था से सम्पन्न हो गयी कि देखने वाले चकित रह गए। जंगल में पैसा पास न रखने एवं अमानत रूप में दफ्तर में रखने का ऐलान किया गया । फलतः अमानतें जमा होती चली गयीं । सब कुछ व्यवस्था से था । किसी का  पैसा भी  न खोया । देखने वाले इस आयोजन की तुलना इलाहाबाद के कुम्भ मेले से करते थे, पर पुलिस या सरकार का एक भी  आदमी न था । लोगों ने अपनी ओर से डिस्पेन्सरियाँ, प्याऊ व स्वल्पाहार केन्द्र खोल रखे थे। मीलों का एरिया खचाखच भरा हुआ था । यज्ञ नियत समय पर विधिवत होता रहा । यज्ञशाला की परिक्रमा देने तीस पचास मील दूर से अनेकों बसें आई थीं । पूर्णाहुति के दिन हम और हमारी धर्मपत्नी हाथ जोड़कर खड़े रहे । सभी से प्रसाद लेकर (भोजन करके) जाने की प्रार्थना की । न जाने कहाँ से राशन आता गया । न जाने कौन उसका मूल्य चुकाता गया । न जाने किसने इतने बड़े राशन के पर्वत को खा-पीकर समाप्त कर दिया । सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह कि न किसी का एक पैसा खोया, न किसी को चोट लगी और न किसी को ढूंढना-खोजना पड़ा । पैसा कहीं से आता व कहीं से जाता रहा।  स्वयंसेवकों को टिकट दिला दिए गए । लोग कहते थे,

रेत के बोरे आटा बन जाते, पानी का घी बन जाता है, यह किम्बदन्ती यहाँ सही होती देखी गयी । कुम्भ मेलों जैसी संरक्षकों, बजट, टैक्स आदि की यहाँ कोई व्यवस्था न थी । फिर भी सारी व्यवस्था यहाँ सुचारु रूप से ऐसे चल रही थी, मानो किसी यन्त्र पर सारा ढर्रा घूम रहा हो ।

मथुरा के इर्द-गिर्द सौ-सौ मील तक यह चर्चा फैल गयी कि “महाभारत के बाद इतना बड़ा आयोजन इसी बार हो रहा है । जो उसे देख न सकेंगे, जीवन में दुबारा ऐसा अवसर न मिल सकेगा ।”  इस जनश्रुति के कारण आदि से अन्त तक प्रायः दस लाख व्यक्ति उसे देखने आए ।

आयोजन समाप्त होने के बाद भी तीन दिन तक परिक्रमा चलती रही । कुण्डों की भस्म लोग प्रसादस्वरूप झाड़झाड़ कर ले गए। वस्तुतः आयोजन हर दृष्टि से अलौकिक-दर्शनीय था । हजार कुण्ड की भव्य यज्ञशाला । एक लाख प्रतिनिधियों के बैठने लायक पण्डाल, 24  घण्टे चलने वाली भोजन-व्यवस्था, रोशनी, पानी, बिछावट-जिधर भी दृष्टि डाली जाए, आश्चर्य लगता था । सात मील का पूरा क्षेत्र ठसाठस भरा था । पूर्णाहुति के बाद भी तीन दिन तक आगन्तुक भोजन करते रहे । अक्षय भण्डार कभी चुका नहीं । जो आरम्भ में आए थे, उन्होंने जाते ही अपने क्षेत्रों में चर्चा की और बसों-बैलगाड़ियों की भीड़ बढ़ती चली गयी । भीड़ और भव्यता देखकर हर आगन्तुक अवाक रह जाता था । ऐसा दृश्य वस्तुतः इन लाखों में से किसी ने भी इससे पूर्व देखा न था ।

यह गायत्री महा-पुरश्चरण के जप-तप, साधन एवं पूर्णाहुति यज्ञ की चर्चा हुई । “सबसे बड़ी उपलब्धि” इस आयोजन की यह थी कि आमन्त्रित किन्तु अपरिचित गायत्री उपासकों में से प्रायः एक लाख हमारे मित्र, सहयोगी एवं घनिष्ट बन गए । कन्धे से कन्धा और कदम से कदम मिलाकर चलने लगे । गायत्री परिवार का इतना व्यापक गठन देखते-देखते बन गया और नवयुग के सूत्रपात का क्रिया-कलाप इस प्रकार चल पड़ा मानो उसकी सुनिश्चित रूपरेखा किसी ने पहले से ही बनाकर रख दी हो।

इति  जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा लेख 10-परमपूज्य गुरुदेव का भगवान के साथ जुआ 

12 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद – परमपूज्य गुरुदेव का भगवान के साथ जुआ 

ऐसा लग रहा था कि  आज का लेख आत्मकथा की कड़ी का अंतिम लेख होगा ,लेकिन जब पढ़ना आरम्भ किया तो इतनी महत्वपूर्ण बाते मिलीं ,इतने कनेक्शन मिले कि  कुछ भी छोड़ने को मन न किया।  आशा करते हैं कि इससे आगे वाला लेख इस कड़ी का अंतिम लेख होगा।  आत्मकथा के सभी लेखों को पढ़ते -पढ़ते कई बार तो ऐसा लगता रहा कि एक -एक शब्द नहीं तो एक -एक पैराग्राफ पर एक-एक  लेख लिखा जा सकता है।  जैसा हमने इन लेखों के इंट्रोडक्टरी लेख में लिखा था -हमारी वसीयत और विरासत – पुस्तक से पूर्व पूज्यवर ने अखंड ज्योति  में  चार लेख लिखे थे और कहा  था कि इस पुस्तक को पढ़ने  पहले यह चारों लेख पढ़  लिए जाएँ तो ठीक रहेगा।

तो रविवार की  प्रातः को हम आपके  विश्राम की कामना करेंगें और अगला लेख सोमवार की प्रातः प्रस्तुत करने की  आशा के साथ  प्रस्तुत है आज का ज्ञानप्रसाद।         


पौन शताब्दी (75 वर्ष ) से काया और चेतना के ईंट-गारे से बनी इस प्रयोगशाला में हम दत्त-चित्त होकर एक ही प्रयल करते रहे हैं कि अध्यात्म-तत्त्वज्ञान की यथार्थता और प्रतिक्रिया वस्तुतः है क्या ? विकसित बुद्धिवाद की दृष्टि में वह भावुकों का अन्धविश्वास और धूर्तों का जादुई व्यवसाय है । इसे उनका स्वर्निमित जाल-जंजाल  बता दिया जाता तो हमें इतनी पीड़ा न होती जितनी कि उन्हें ऋषि प्रणीत, शास्त्र सम्मत  द्वारा परीक्षित, अनुमोदित कहे जाने पर होती है।  साथ ही परीक्षा की कसौटी पर अप्रामाणिक भी ठहराया जाता है, तो असमंजस का ठिकाना नहीं रहता । 

एक ओर चरम सत्य, दूसरी ओर पाखण्ड कहकर उसे विलक्षण स्थिति में लटका दिया जाता है, तो मन की व्याकुलता यह कहती है कि इस सन्दर्भ में किसी निर्णायक निष्कर्ष पर पहुँचा जाना चाहिए।

आज नास्तिकवादी ही उसका मजाक नहीं उड़ाते, आस्तिकवादी भी यही कहते हैं कि बताये हुए क्रिया कृत्यों को लम्बे समय तक करते रहने पर भी उनके हाथ ऐसा कुछ नहीं लगा, जिस पर वे सन्तोष एवं प्रसन्नता व्यक्त कर सकें । ऐसी दशा में सिद्धान्तों एवं प्रयोगों में कहीं-न-कहीं त्रुटि तो अवश्य ही है । इस त्रुटि का निराकरण करने एवं अध्यात्म की यथार्थता प्रकाश में लाने के लिए कुछ कारगर प्रयत्न होने ही चाहिए । 

       “इसे कौन करे?”

 सोचा कि जब अपने को इतना लगाव है तो यह कार्य खुद अपने ही कंधों पर ले लेना चाहिए । अध्यात्म यदि विज्ञान है तो उसका सिद्धान्त यथार्थता से जुड़ा होना चाहिए और परिणाम ऐसा होना चाहिए जैसा कि वैज्ञानिक उपकरणों का तत्काल सामने आता है । प्रतिपादन और परिणाम की संगति न बैठने पर लोग आडम्बर का लांछन लगाएँ, तो उन्हें किस प्रकार रोका जाए । यदि वह सत्य है तो उसका जो बढ़ा-चढ़ा माहात्म्य बताया जाता है, उससे अन्य अनेकों को लाभ ले सकने की स्थिति तक क्यों न पहुँचाया जाए?

अब तक का प्रायः पौन शताब्दी का हमारा जीवनक्रम इसी प्रकार व्यतीत हुआ है । इसे एक जिज्ञासु साधक का प्रयोग-परीक्षण कहा जाए तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी।

परमपूज्य गुरुदेव के स्वयं के प्रयोग ( Experiments ) – एक जुआ खेला है 

घटनाक्रम पन्द्रह वर्ष की आयु से आरम्भ होता है, जिसे अब 60  वर्ष से अधिक हो चले । इससे पूर्व की अपरिपक्व बुद्धि कुछ कठोर दृढ़ता अपनाने की स्थिति में भी नहीं थी और न ही मन में उतनी तीव्र उत्कण्ठा थी । आरम्भिक दिनों में उठती जिज्ञासा ने अनेकों पुस्तकों को पढ़ने एवं इस क्षेत्र के अनेकों प्रतिष्ठित सिध्याने की लिप्सा नहीं, वरन् तथ्यों को अनुभव में उतारने के लिए कठिन से कठिन प्रक्रिया अपनाने की साहसिकता थी । पूछताछ से, अध्ययन से समाधान न हुआ तो वह उत्कण्ठा अन्तरिक्ष में भ्रमण करने लगी और एक पारंगत ( निपुण ) समाधानी  को सहायता के लिए ढूँढ़ लाई । माँ के  ब्राह्मण कुल में जन्म लेने और पौरोहित्य कर्मकाण्ड की परम्परा से सघन सम्बन्ध होने के कारण दस वर्ष की आयु में ही महामना मालवीय जी के हाथों पिताजी ने उपनयन करा दिया था और गायत्री मन्त्र की उपासना का सरल कर्मकाण्ड सिखा दिया था । इस गुह्य विद्या के अन्यान्य पक्ष तो हमें बाद के जीवन में विदित हुए , निर्धारित क्रम अपनी जगह ज्यों-त्यों करके चल रहा था और लक्ष्य तक पहुँचने का जिज्ञासा-भाव क्रमशः अधिक प्रचण्ड हो रहा था । इसी उद्वेग (परेशानी ) में कितनी ही रातें बिना सोए निकल जाती । पूजा की कोठरी अलग एकान्त में थी । उस दिन ब्रह्ममुहूर्त में अपनी कोठरी दिव्यगन्ध और दिव्यप्रकाश से भर गई । माला छूट गई और मन:स्थिति तन्द्राग्रस्त ( नींद ) जैसी हो गयी । लगा कि सामने पूर्व कल्पनाओं से मिलते-जुलते एक ऋषि खड़े हैं-प्रकाशपुंज के रूप में । इस दिव्यदर्शन ने घबराहट उत्पन्न नहीं की, वरन् तन्द्रा सघन होती चली गई और प्रकट होने वाली सत्ता ने कुछ संक्षिप्त शब्द कहे-

“तेरी पात्रता और इच्छा की  हमें जानकारी है, सो सहायता के लिए अनायास ही दौड़ आना पड़ा । अपनी पात्रता को अधिक विकसित करने के लिए महाप्रज्ञा की एक समग्र तप-साधना कर डाल ।” 

उनका तात्पर्य था, “गायत्री महामन्त्र का एक वर्ष में एक महापुरश्चरण (एक वर्ष में 24 लाख गायत्री मंत्र -एक दिन में 6000 -7000 गायत्री मन्त्र )  करते हुए चौबीस वर्षों में चौबीस महापुरश्चरण सम्पन्न करना । विधि-विधान उन्होंने संक्षेप में बता दिया । यह अवधि जौ की रोटी और छाछ पर बिताने की आज्ञा दी, ताकि इन्द्रिय-संयम से लेकर अर्थ-संयम, समय-संयम और विचार-संयम तक की समस्त मनोनिग्रह प्रक्रियाएँ सम्पन्न हो सकें और तत्त्वज्ञान धारण कर सकने की पात्रता परिपक्व हो सके । उनका संकेत था-इतना कर सका तो आगे का मार्ग बताने हम स्वयं अबकी भाँति फिर आयेंगे । इतना कहकर वे अन्तर्धान हो गये।  जिज्ञासु का मस्तिष्क भगवान ने दिया है और उसमें तर्कबुद्धि की न्यूनता नहीं रखी है । आश्चर्य है कि इस स्तर की विचारणा के साथ-साथ उतनी ही प्रचण्ड श्रद्धा और संकल्प-शक्ति का भण्डार कहाँ से और कैसे भर गया ? “दोनों दिशाएँ एक-दूसरे के विपरीत हैं,” पर अपनी मानसिक बनावट में इन दोनों का ही परस्पर विरोधी समन्वय मिल गया । दूसरे दिन से वही चौबीस वर्ष की संकल्प-साधना समग्र निष्ठा के साथ आरम्भ कर दी। कुटुम्बियों-सम्बन्धियों ने इसी प्रयोजन में 7  घण्टे नित्य बिताने की 24  वर्ष लम्बी प्रतिज्ञा की बात सुनी तो सभी खिन्न हुए । अपने-अपने ढंग से समझाते रहे । जौ पर निर्वाह इतने लम्बे समय तक शरीर को क्षति पहुँचाएगा। विद्या पढ़ना रुक गया तो भविष्य में क्या बनेगा? आदिआदि । बहुत कुछ ऐसा सुनने को मिलता रहा, जिसका अर्थ होता था कि इतना लम्बा और कठोर साधन न किया जाए । पर अपनी जिज्ञासा इतनी प्रचण्ड थी कि अध्यात्म की तात्त्विकता को समझने के लिए एक क्या ऐसे कई शरीर न्योछावर कर देने का मनोबल उमगता रहा और समझाने वालों को अपना निश्चय और अभिप्राय स्पष्ट शब्दों में कहता रहा । घर में गुजारे के लायक बहुत कुछ था, सो उसकी चिन्ता करने की बात सामने नहीं आई।

एक-एक करके वर्ष बीतते गए । पूछने वालों को एक ही उत्तर दिया-

“एक जुआ खेला है । इसको अन्त तक ही सँभाला जाएगा ।” 

चौबीस वर्ष एक-एक करके इसी प्रकार पूरे हो गए । सात घण्टे की नित्य प्रक्रिया से मन ऊबा नहीं । जौ की रोटी और छाछ का आहार स्वास्थ्य की दृष्टि से अपूर्ण और हानिकारक कहा जाता रहा, पर वैसा कुछ घटित नहीं हुआ । लम्बे समय तक लम्बी प्रक्रिया के साथ सम्पन्न करने का क्रम यथावत चलता गया । उसमें ऊब नहीं आई । रुचि यथावत बनी रही । इस अवधि में मनोबल घटा नहीं, बढ़ा ही । चौबीस वर्ष पूरे होने के दिन निकट आने लगे तो मन में आया कि एक और ऐसा ही क्रम बता दिया जाएगा तो उसे भी इतनी ही प्रसन्नतापूर्वक किया जाएगा । परिणाम की कुछ और जन्मों तक प्रतीक्षा की जा सकती है।

यह पंक्तियाँ आत्म-कथा के रूप में लिखी नहीं जा रही हैं और न उनके साथ अप्रासंगिक विषयों का समावेश किया जा रहा है । अध्यात्म भी विज्ञान है क्या ? इस प्रयोग-परीक्षण के सन्दर्भ में जो कुछ भी बन पड़ा है, उसी की चर्चा की जा रही है, ताकि अन्यान्य जिज्ञासुओं को भी कुछ प्रकाश और समाधान मिल सके ।

इन 24  वर्षों में कुछ भी शास्त्राध्ययन नहीं किया और न  समीप आने वाले विद्वान-विज्ञजनों से कोई चर्चा की। कारण कि इसमें निर्धारित दिशा और श्रद्धा में व्यतिरेक हो सकता था, जबकि अध्यात्म का मूलभूत आधार प्रचण्ड इच्छा और गहन श्रद्धा पर टिका हुआ था । दिशा-विभ्रम से अन्तराल डगमगाने न लगे, इसलिए प्रयोग का एकनिष्ठ भाव से चलना ही उपयुक्त था और वही किया भी गया । मन दिन में ही नहीं, रात की स्वप्नावस्था में भी उसी राह पर चलता रहा। नियत अवधि भारी नहीं पड़ी, वरन् क्रमशः अधिक सरस होती गई । समय पूरा हो गया । 

क्रमशः जारी : To be continued जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा लेख 9-ऋद्धियाँ एवं सिद्धियाँ क्या हैं ?

11 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद –ऋद्धियाँ एवं सिद्धियाँ क्या हैं ?

आज का लेख थोड़ा सा लम्बा है ,इसलिए हम भूमिका देने के बजाय सीधा लेख पर केंद्रित रहेंगें। 

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विगत साठ वर्षों की हमारी जीवनचर्या अलौकिक घटना-प्रसंगों एवं दैवीसत्ता के मार्गदर्शन में संचालित ऐसी कथा-गाथा है, जिसके कई पहलु ऐसे हैं जो अभी भी जनसाधारण के समक्ष उजागर नहीं किए जाने चाहिए । किन्तु पहली बार हमने अपने मार्गदर्शक के निर्देश पर अपनी जीवनयात्रा के उन गुह्य पक्षों ( गुप्त ) का प्रकटीकरण करने का निश्चय किया है, जिससे सर्व-साधारण को सही दिशा मिले । ऐसे कुछ प्रसंगों को पाठक पिछले पन्नों पर पढ़ चुके हैं।

ऋद्धि-सिद्धियों के सम्बन्ध में सर्व-साधारण को अधिक जिज्ञासा रहती है । हमारे विषय में एक सिद्ध-पुरुष की मान्यता जन-मानस में बनती रही है । बहुत खण्डन करने एवं अध्यात्म दर्शन का सत्व सामने रखने पर भी यह मान्यता संव्याप्त है ही कि हम एक चमत्कारी सिद्धपुरुष हैं ।” अब हमें इस वसन्त पर निर्देश मिला कि अपनी जीवन-गाथा को एक खुली पुस्तक के रूप में सबके समक्ष रख दिया जाए, ताकि वे चमत्कारों एवं उन्हें जन्म देने वाली साधना-शक्ति की सामर्थ्य से परिचित हो सकें?

ऋद्धियाँ एवं सिद्धियाँ क्या हैं ?

 इस सम्बन्ध में हमारा दृष्टिकोण बड़ा स्पष्ट रहा है । वह शास्त्रसम्मत भी है एवं तर्क की कसौटी पर खरा उतरने वाला भी । हमारे प्रतिपादन के अनुसार योगाभ्यास एवं तपश्चर्या के दो विभागों में अध्यात्म साधनाओं को विभाजित किया जा सकता है । इनमें तपश्चर्या प्रत्यक्ष है और योगाभ्यास परोक्ष । तप शरीर प्रधान है और योग मन से सम्बन्धित । इनके प्रतिफल दो हैं । एक सिद्धि, दूसरा ऋद्धि । शरीर से वे काम कर दिखाना जो आमतौर से उसकी क्षमता से बाहर समझे जाते हैं, सिद्धि के अन्तर्गत आते हैं । पुरातनकाल में वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होती थी । नदी नाले चार महीने तेजी से बहते रहते थे । पुल नहीं थे । नावों पर ही निर्भर रहना पड़ता था । उनके भी वेगवती हो जाने और भँवर पड़ने लगने पर नावों का आवागमन भी बन्द हो जाता था । आवश्यक काम आ जाने पर तपस्वी लोग जल पर चलकर पार हो जाते थे, वे वायु में भी उड़ सकते थे । शरीर को अंगद के पैर के समान इतना भारी बना लेना कि रावण सभा के सभी सभासद मिलकर भी उसे उठा न सके, इसी प्रकार की सिद्धि है । सुरसा का मुँह फाड़कर हनुमान को निगलने का प्रयत्न करना, हनुमान का उससे दूना रूप दिखाते जाना और अन्त में मच्छर जितने लघु बनकर उस जंजाल से छुट भागना, यह सिद्धि वर्ग है । उससे शरीर को असामान्य क्षमताओं से सम्पन्न बनाया जाता है ।

ऋद्धि आन्तरिक हैं, आत्मिक हैं । साधारण मनुष्य मन को जिस सीमा तक ग्रहण  कर सकते हैं, उसकी तुलना में अत्यधिक मनोबल का, इच्छाशक्ति का भाव-प्रभाव का होना यह ऋद्धि है । ऋद्धि के अनुदान किसी के व्यक्तित्व, चरित्र एवं स्तर को ऊँचा उठा सकते हैं । जिसके पास जिसका बाहुल्य है, उसी के लिए यह सम्भव है कि अपनी विशेषता स्थिर रखते हुए भी दूसरों को अपने अनुदानों से लाभान्वित कर सके । पदार्थों का स्वरूप बदल देना, उसकी मात्रा को बढ़ा देना यह सिद्धपुरुषों का काम है । साधना से यह सब असम्भव भी नहीं है ।

ऋद्धि-सिद्धियाँ कितने प्रकार की होती हैं ? उन्हें किस प्रकार प्राप्त किया जाता है और फिर उनका प्रयोग उपयोग किस प्रकार किया जाता है ? इसका विवरण योगग्रन्थों, तन्त्रों तथा विद्वानों  से हमने जाना एवं अनुभव भी किया है, किन्तु इनका प्रयोग कभी प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया । वस्तुतः इसकी आवश्यकता हमें कभी नहीं पड़ी । अपनी समस्त इच्छाएँ उसी दिन समाप्त हो गई, जिस दिन महान मार्गदर्शक का साक्षात्कार हुआ । आदेश जब भी मिलते हैं, तब उन्हें पूरा करने के लिए जिस प्रकार के सहयोगियों की, साधनों की, सूझ-बूझ की आवश्यकता पड़ती है वह हाथों-हाथ हमें उपलब्ध होती चली गयी । ऋद्धि-सिद्धियों की आवश्यकता इसी निमित्त पड़ सकती थी । वे सिर पर लदतीं तो व्यर्थ का अहंकार चिपकता और वह व्यक्तित्त्व को पतनोन्मुख बनाता । इसलिए अच्छा ही हुआ कि ऋद्धि-सिद्धियों की उपलब्धि के लिए उनके विधान एवं प्रयोग जानने के बावजूद प्रयोग की आवश्यकता ही नहीं पड़ी जो अतिशय दुष्कर काम थे वे होते चले और उसे भगवान का आदेश या अनुग्रह कहकर अपनी ओर से मेहनत करने की, बखान करने की, अहन्ता लादने की आवश्यकता नहीं पड़ी । यह अच्छा ही हुआ । भविष्य के लिए अपनी कोई निजी योजना नहीं  जिसके लिए सिद्धियों का संग्रह किया जाए । दिव्य आदेश आते हैं तो उनकी पूर्ति के लिए जो जितना अभीष्ट है, वह उतनी मात्रा में उसी समय मिल ही जाता है, फिर व्यर्थ ही सिद्धि-साधना के झंझट में क्यों पड़ें?

सिद्धपुरुषों को स्वर्ग और मुक्ति का दैवी-अनुदान मिलता है । स्वर्ग कोई स्थान या लोक-विशेष है, यह हमने कभी नहीं माना । स्वर्ग उत्कृष्ट दृष्टिकोण को कहते हैं । इसी आनन्द को स्वर्ग कहते हैं । वह हमें निरन्तर उपलब्ध है। दुश्चिन्तन दुष्कर्म से स्पर्श ही नहीं होता, फिर नरक कहाँ से आये? मुक्ति, भव-बन्धनों से होती है । वासना, तृष्णा और अहन्ता को भवसागर कहा गया है । लोभ को हथकड़ी, मोह को बेड़ी और गर्व को गले का फन्दा  कहते हैं । जीव इन्हीं से बँधा रहता है । 

ऋद्धि की व्याख्या :

ऋद्धि आन्तरिक होती है और स्वानुभूति तक ही उसकी सीमा है । आत्म-सन्तोष, लोकसम्मान और दैवीअनुग्रह यह तीन दिव्य अनुभव कहे जाते हैं । सो अपने को हर घड़ी होते रहते हैं । 

1 आत्मसंतोष -अभावों से असन्तोष होता है। कुकर्म भी आत्म-प्रताड़ना उत्पन्न करते हैं  जो बहुत ही असहनीय है। हमें यह बिल्कुल  नहीं सहना पड़ा है । अब तो शरीर की वृद्धावस्था  के साथ-साथ कामनाओं का समाधान विवेक ही कर देता है । इसलिए न अभाव लगता है,न असन्तोष ।

2 लोकसम्मान -इसके लिए हमें अलग से कुछ नहीं करना  पड़ा । सच्चे मन से हमने हर किसी का सम्मान और सहयोग किया है । स्नेह और सद्भाव लुटाया है । जो भी सम्पर्क में आया उसे आत्मीयता के बन्धनों में बाँधा है । उसकी प्रतिक्रिया दर्पण के प्रतिच्छाया की तरह होनी चाहिए।  रबड़ की गेंद जितने जोरों से जिस एंगल  से मारी जाती है, उतने ही जोर से, उसी एंगल  में वह लौट आती है । हमारा स्नेह और सम्मान दूसरों के मन से टकराकर ज्यों का त्यों  वापस लौटता रहा है । हमने किसी को शत्रु नहीं माना । किसी के मन में अपने लिए दुर्भाव नहीं सोचा, तो अन्य कोई किसी भी मनःस्थिति में क्यों न हो, हमें उसकी अनुभूति सद्भावनाओं से भरी-पूरी ही लगती है । जीवन बीतने को आया । कोई हमारे विरोधियों, शत्रुओं, अहित करने वालों के नाम पूछे तो हम एक भी नहीं बता सकेंगे । जिन्होंने नासमझी में हानि पहुँचाई भी है, उन्हें भूला-भटका, बालबुद्धि माना है । हर किसी का सम्मान हमने किया है और लौटकर लोक-सम्मान ही हमें मिला । किसी ने न भी दिया हो तो भी हम उसे समीक्षा और हित-कामना ही मानते रहे हैं। 

3 दैवी-अनुग्रह – यह उच्चस्तरीय क्रियाकलापों और उनकी सफलताओं से भी लगता है । इसके अतिरिक्त आकाश के तारे, पौधों पर लगे हुए फूल, बादलों से बरसते हुए जल-बिन्दु, हवा से हिलते पत्ते, नदियों की लहरें, चिड़ियों का कलरव हमें अपने ऊपर दुलार लुटाते, फूल बरसाते दृष्टिगोचर होते हैं । प्रकृति की हलचलों में, प्राणियों की चहलपहल में, वनस्पतियों में जो सौन्दर्य भरा-पूरा दीखता है, वह हमारे  संसार को फूलों से भर देता है।

हमें भीतर और बाहर से उल्लास और उत्साह ही दीखता है । जीवन को उलट-पुलटकर देखने पर उसमें चन्दन जैसी सुगन्ध ही आती दीखती है । भूतकाल की ओर गरदन-मोड़कर देखते हैं तो शानदार दीखती है। वर्तमान का निरीक्षण करते हैं तो उसमें भी उमंगें छलकती दीखती हैं । भविष्य पर दूर-दृष्टि डालते हैं, तो प्रतीत होता है कि भगवान के दरबार में अपराधी बनकर नहीं जाना पड़ेगा । परीक्षा में अच्छे नम्बर लाने वाले विद्यार्थी और प्रतिस्पर्दा जीतने वाले खिलाड़ी की तरह उपहार ही मिलेगा।

हमारी आत्मा ने हमें कभी बुरा नहीं कहा, तो दूसरे भी क्यों कह सकेंगे । जो कहेंगे तो अपनी व्याख्या अपने मुँह कर रहे होंगे । हमें अपनी प्रशंसा करने और प्रतिष्ठा देने को ही मन करता है । I want to reward myself. ऐसी दशा में इस लोक और परलोक में हमें अच्छाई से ही सम्मानित किया जाएगा। इससे बढ़कर मनुष्य जीवन की सार्थकता और हो भी क्या सकती है?

आत्म-साधना करने वाले ऋद्धि-सिद्धियों के अनुपात से अपनी सफलता-असफलता आँकते रहे हैं । हमें इसके लिए अतिरिक्त प्रयल नहीं करना पड़ा। ईश्वर-दर्शन हमने विराट ब्रह्म के रूप में किया है। विश्व-मानव के रूप में हमने उसे एक क्षण के लिए भी छोड़ा नहीं और न ही उसने ही ऐसी निष्ठुरता दिखाई कि हमें साथ लिए बिना अकेला ही फिरता । कभी वार्तालाप हुआ है तो उसमें एक झगड़े की ही स्थिति उत्पन्न होती रही है । राम और भरत राज्यतिलक को गेंद बनाकर झगड़ते रहे थे कि इसे मैं नहीं लूंगा, तुम्हें दूँगा । हमारा भी भगवान के साथ ऐसा ही विग्रह चला है कि तुझे क्या चाहिए जो मैं हूँ । गुम्बज की आवाज की तरह हमारा उत्तर यही रहा है कि तुझे क्या चाहिए, अपना मनोरथ बता ताकि उसे पूरा करके धन्य बनूँ । भगवान बॉडीगार्ड (अंगरक्षक) की तरह पीछे-पीछे चला है और संरक्षण करता रहा है। आगे-आगे पायलट की तरह चला है, रास्ता साफ करता हुआ और बताता हुआ । हमारी भी अकिंचन काया-गिलहरी की तरह उसके लिए सम्पूर्ण भाव से समर्पित रही है । 

क्रमशः जारी : To be continued जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा लेख 8-आत्मवत् सर्वभूतेषु – अपने समान सबको देखना

10 जून  2021 का ज्ञान प्रसाद : “आत्मवत् सर्वभूतेषु – अपने समान सबको  देखना” 

लेख नंबर 8 आपके समक्ष प्रस्तुत करते हुए इतनी प्रसन्नता हो रही है कि जिसे शब्दों में बयान करना सम्भव नहीं हैं।  यह इसलिए  कि अगर आप जीवन की जटिल समस्यायों का समाधान  ढूंढ रहे हैं  तो पहले इस जगत के सभी जीव जंतुओं ,प्राणियों का दुःख अपना समझें ,उन्हें भी अपने समान समझें ,यहाँ तक कि वातावरण की  उसी प्रकार रक्षा करें जैसे हम अपनी चिंता करते हैं। इसी एक उदाहरण के साथ चलते  हैं  आज के लेख की ओर क्योंकि हमने परमपूज्य  गुरुदेव को सुनना है न कि  मुझे। 

हमें चैन नहीं,  करुणा चाहिए , हमें समृद्धि नहीं  शक्ति चाहिए: 

जब तक व्यथा-वेदना का अस्तित्व इस जगत में बना रहे, जब तक प्राणियों को क्लेश और कष्ट की आग में जलना पड़े, तब तक हमें भी चैन से बैठने की इच्छा न हो, जब भी प्रार्थना का समय आया, तब भगवान से निवेदन यही किया । हमें चैन नहीं, वह करुणा चाहिए जो पीड़ितों की व्यथा को अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सके, हमें समृद्धि नहीं वह शक्ति चाहिए, जो आँखों से आँसू पोंछ सकने की अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके । बस इतना ही अनुदान-वरदान भगवान से माँगा और लगा कि द्रोपदी को वस्त्र  देकर उसकी लज्जा बचाने वाले भगवान हमें करुणा की अनन्त संवेदनाओं से ओत-प्रोत करते चले जाते हैं। अपने को क्या कष्ट और अभाव है, इसे सोचने की फुरसत ही कब मिली ? अपने को क्या सुख-साधन चाहिए इसका ध्यान ही कब आया है ? केवल पीड़ित मानवता की व्यथा- वेदना ही रोम-रोम में समाई रही और यही सोचते रहे कि अपने विश्वव्यापी कलेवर परिवार को सुखी बनाने के लिए क्या किया जा सकता है । जो पाया उसका एक-एक कण हमने उसी प्रयोजन के लिए खर्च किया, जिससे शोक- सन्ताप की व्यापकता हटाने और संतोष की साँस ले सकने की स्थिति उत्पन्न करने में थोड़ा योगदान मिल सके।

हमारी कितनी रातें सिसकते बीती हैं-कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख-बिलख कर, फूट-फूट कर रोये हैं, इसे कोई कहाँ जानता है ? लोग हमें संत, सिद्ध, ज्ञानी मानते हैं, कोई लेखक, विद्वान, वक्ता, नेता समझते हैं, पर किसने हमारा अन्तःकरण खोलकर पढ़ा-समझा है । कोई उसे देख सका होता तो उसे मानवीय व्यथा-वेदना की अनुभूतियों से, करुण-कराह से हाहाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हड्डियों के ढांचे में बैठी बिलखती ही दिखाई पड़ती । 

कहाँ कथित आत्मज्ञान की निश्चिन्तता, निर्द्वन्द्वता और कहाँ हमारी करुण कराहों से भरी अन्तरात्मा । दोनों में कोई तालमेल नहीं । सो जब कभी सोचा यही सोचा कि अभी वह ज्ञान जो निश्चिन्तता, एकाग्रता और समाधि सुख दिला सके हमसे बहुत दूर है । शायद वह कभी मिले भी नहीं, क्योंकि इस दर्द में ही जब भगवान की झाँकी होती है, पीड़ितों के आँसू पोंछने में ही जब कुछ चैन अनुभव होता है तो उस निष्क्रिय मोक्ष और समाधि का प्रयास करने के लिए कभी मन चलेगा ऐसा लगता नहीं, जिसकी इच्छा ही नहीं वह मिला भी किसे है? पुण्य-परोपकार की दृष्टि से कभी कुछ करते बन पड़ा हो सो याद नहीं आता । दूसरों की व्यथा-वेदनाएँ भी अपनी बन गईं और वे इतनी अधिक चुभन, कसक पैदा करती रही कि उन पर मरहम लगाने के अतिरिक्त और कुछ सूझा नहीं । पुण्य करता कौन ? परमार्थ के लिए फुरसत किसे थी? ईश्वर को प्रसन्न करके स्वर्ग-मुक्ति का आनन्द लेना आया किसे ? विश्व-मानव की तड़पन अपनी तड़पन बन रही थी। सो पहले उसी से जूझना था, अन्य बातें तो ऐसी थीं जिनके लिए अवकाश और अवसर की प्रतीक्षा की जा सकती थी । 

“हमारे जीवन के क्रिया-कलाप के पीछे उसके प्रयोजन को कभी कोई ढूँढना चाहे तो उसे इतना ही जान लेना पर्याप्त है कि संत और सज्जनों की सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों का जितने क्षण स्मरण-दर्शन होता रहा उतने समय चैन की साँस ली और जब जन-मानस की व्यथावेदनाओं को सामने खड़ा पाया तो अपनी निज की पीड़ा से अधिक कष्ट अनुभव हुआ । लोक-मंगल, परमार्थ, सुधार, सेवा आदि के प्रयास कुछ यदि हमसे बन पड़े तो उस संदर्भ में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि यह हमारी विवशता भर थी । दर्द और जलन ने क्षण भर चैन से न बैठने दिया तो हम करते भी क्या ? जो दर्द से इठा जा रहा है वह हाथ-पैर न पटके तो क्या करे ? हमारे अब तक के समस्त प्रयत्नों को लोग कुछ भी नाम दें, किसी रंग में रंगें, असलियत यह है कि विश्व-वेदना की आन्तरिक अनुभूति ने करुणा और संवेदना का रूप धारण कर लिया और हम विश्व-वेदना को आत्म-वेदना मानकर उससे छुटकारा पाने के लिए बेचैन-घायल की तरह प्रयत्न-प्रयास करते रहे । भावनाएँ इतनी उग्र रहीं कि अपना आपा तो भूल ही गये । त्याग, संयम, सादगी, अपरिग्रह आदि की दृष्टि से कोई हमारे कार्यों पर नजर डाले तो उसे इतना भर समझ लेना चाहिए कि जिस ढाँचे में अपना अन्त:करण ढल गया, उसमें यह नितान्त स्वाभाविक था । अपनी समृद्धि, प्रगति, सुविधा, वाहवाही हमें नापसन्द हो ऐसा कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता । उन्हें हमने जान-बूझकर त्यागा सो बात नहीं है । वस्तुतः विश्व-मानव की व्यथा अपनी वेदना बनकर इस बुरी तरह अन्त:करण पर छाई रही कि अपने बारे में कुछ सोचने-करने की फुरसत ही न मिली, वह प्रसंग सर्वथा विस्मृत ही बना रहा । इस विस्मृति को कोई तपस्या, संयम कहे तो उसकी मर्जी, पर 

“जब स्वजनों को अपनी जीवन-पुस्तिका  के कुछ सभी उपयोगी पृष्ठ खोलकर पढ़ा रहे हैं तो वस्तुस्थिति बता ही देनी उचित है।”

हमारी उपासना और साधना साथ-साथ मिलकर चली हैं । परमात्मा को हमने इसलिए पुकारा कि वह “प्रकाश बनकर आत्मा में प्रवेश करे” और तुच्छता को महानता में बदल दे । उसकी शरण में इसलिए पहुंचे कि उस महत्ता में अपनी क्षुद्रता विलीन हो जाए । वरदान केवल यह माँगा कि हमें वह सहृदयता  और विशालता मिले, जिसके अनुसार अपने में सब को और सब में अपने को अनुभव किया जा सकना सम्भव हो सके ।अपनी साधनात्मक अनुभूतियों और उस मंजिल पर चलते हुए समक्ष आये उतार-चढ़ावों की चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि यदि किसी को आत्मिक प्रगति की दिशा में चलने का प्रयत्न करना हो और वर्तमान परिस्थितियों में रहने वालों के लिए यह सब कैसे सम्भव हो सकता है? 

“इसका प्रत्यक्ष उदाहरण ढूँढना हो, तो उसे हमारी जीवनयात्रा बहुत मार्ग-दर्शन कर सकती है । वस्तुतः हमने एक प्रयोगात्मक( EXPERIMANTAL) जीवन जिया है ।”

 आध्यात्मिक आदशों का व्यावहारिक जीवन में तालमेल बिठाते हुए आन्तरिक प्रगति के पथ पर कैसे चला जा सकता है और उसमें बिना भटके कैसे सफलता पाई जा सकती है? हम इसी तथ्य की खोज करते रहे हैं और उसी के प्रयोग में अपनी चिन्तन-प्रक्रिया और शारीरिक गतिविधि केन्द्रित करते रहे हैं । हमारे मार्गदर्शक का इस दिशा में पूरा-पूरा सहयोग रहा है, सो अनावश्यक जाल-जंजालों में उलझे बिना सीधे रास्ते पर सही दिशा में चलते रहने की सरलता उपलब्ध होती रही है । 

“उसी की चर्चा इन पंक्तियों में इस उद्देश्य से कर रहे हैं कि जिन्हें इस मार्ग पर चलने की और सुनिश्चित सफलता प्राप्त करने का प्रत्यक्ष उदाहरण ढूँढ़ने की आवश्यकता है, उन्हें अनुकरण के लिए एक प्रामाणिक आधार मिल सके ।”

आत्मिक प्रगति के पथ पर एक सुनिश्चित एवं क्रमबद्ध योजना के अनुसार चलते हुए हमने एक सीमा तक अपनी मंजिल पूरी कर ली है और उतना आधार प्राप्त कर लिया है जिसके बल पर यह अनुभव किया जा सके कि परिश्रम निरर्थक नहीं गया, प्रयोग असफल नहीं रहा । क्या विभूतियाँ या उपलब्धियाँ प्राप्त हुई? इसकी चर्चा हमारे मुंह शोभा नहीं देती । 

“इसको जानने, सुनने और खोजने का अवसर हमारे चले जाने के बाद ही आना चाहिए ।”

उसके इतने अधिक प्रमाण बिखरे पड़े मिलेंगे कि किसी अविश्वासी को भी यह विश्वास करने के लिए विवश किया जा सकेगा कि न तो आत्म-विद्या का विज्ञान गलत है और न उस मार्ग पर सही ढंग से चलने वाले के लिए आशाजनक सफलता प्राप्त करने में कोई कठिनाई है । इस मार्ग पर चलने वाला आत्मशान्ति, आन्तरिक-शक्ति और दिव्य-अनुभूति की परिधि में घूमने वाली अगणित उपलब्धियों से कैसे लाभान्वित हो सकता है ? इसका प्रत्यक्ष प्रमाण ढूंढने  के लिए भावी शोधकर्ताओं (RESEARCHERS ) को हमारी जीवन-प्रक्रिया बहुत ही सहायक सिद्ध होगी। समयानुसार ऐसे शोधकर्ता उन विशेषताओं और विभूतियों के अगणित प्रमाण, प्रत्यक्ष प्रमाण स्वयं ढूंढ़ निकालेंगे, जो आत्मवादी-प्रभुपरायण जीवन में हमारी ही तरह हर किसी को उपलब्ध हो सकना सम्भव है। 

क्रमशः जारी : To be continued जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा लेख 7-आत्मवत् सर्वभूतेषु – अपने समान सबको देखना ( contd)

9 जून  2021 का ज्ञान प्रसाद : “आत्मवत् सर्वभूतेषु – अपने समान सबको  देखना” (contd )

लेख नंबर 7 आपके समक्ष प्रस्तुत करते हुए इतनी प्रसन्नता हो रही है कि जिसे शब्दों में बयान करना सम्भव नहीं हैं।  लेख नंबर 6 ,7  और 8 (आने वाला )बहुत ही  ध्यान से  पढ़ने की  आवश्यकता है।  यह इसलिए  कि अगर आप जीवन की जटिल समस्यायों का समाधान  ढूंढ रहे हैं  तो पहले इस जगत के सभी जीव जंतुओं ,प्राणियों का दुःख अपना समझें ,उन्हें भी अपने समान समझें ,यहाँ तक कि वातावरण की   उसी प्रकार रक्षा करें जैसे हम अपनी चिंता करते हैं। इसी एक उदाहरण के साथ चलते  हैं  आज के लेख की ओर क्योंकि हमने परमपूज्य  गुरुदेव को सुनना है न की मुझे। 

विश्व-मानव की  पीड़ा  अपनी पीड़ा :

ये प्रश्न निरन्तर मन में उठते रहे । बुद्धिमानी, चतुरता, समझ- कुछ भी तो यहाँ कम नहीं है । लोग एक से एक बढ़कर कला-कौशल उपस्थित करते हैं और एक से एक बढ़कर चातुर्य-चमत्कार का परिचय देते हैं, पर इतना क्यों समझ नहीं पाते कि दुष्टता और निकृष्टता का पल्ला पकड़ कर वे जो पाने की आशा करते हैं, वह मृग-तृष्णा ही बनकर रह जाएगा, केवल पतन और सन्ताप ही हाथ लगेगा । मानवीय बुद्धिमत्ता में यदि एक कड़ी और जुड़ गई होती, समझदारी ने इतनाऔर निर्देश किया होता कि ईमान को साबित और सौजन्य को विकसित किए रहना मानवीय गौरव के अनुरूप और प्रगति के लिए आवश्यक है, तो इस संसार की स्थिति कुछ दूसरी ही होती है । फिर सब सुख शान्ति का जीवन जी रहे होते । किसी को किसी पर अविश्वास, सन्देह न करना पड़ता और किसी के द्वारा ठगा, सताया न जाता । तब यहाँ दुःख-दारिद्र्य का अतापता भी न मिलता, सर्वत्र सुख-शान्ति की सुरभि फैली अनुभव होती।

समझदार मनुष्य इतना नासमझ क्यों, जो पाप का फल दुःख और पुण्य का फल सुख होता है, इतनी मोटी बात को भी मानने के लिए तैयार नहीं होता ।

इतिहास और अनुभव का प्रत्येक अंकन अपने गर्भ में यह छिपाये बैठा है कि अनीति अपनाकर स्वार्थ, संकीर्णता से आबद्ध रहकर हर किसी को पतन और संताप ही हाथ लगा है । उदात्त और निर्मल हुए बिना किसी ने भी शान्ति नहीं पाई है । सम्मान और उत्कर्ष की सिद्धि किसी को भी आदर्शवादी रीति-नीति अपनाये बिना नहीं मिली है । कुटिलता सात पर्दे भेद कर अपनी पोल आप खोलती रहती है, यह हम पग-पग पर देखते हैं, फिर भी न जाने क्यों यही सोचते रहते हैं कि हम संसार की आँखों में धूल झोंककर अपनी धूर्तता को छिपाये रहेंगे । कोई हमारी दुरभिसन्धियों की गन्ध न पा सकेगा और लुक-छिपकर आँख-मिचौनी का खेल सदा खेला जाता रहेगा । यह सोचने वाले लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि 

हजारों आँख से देखने, हजारों कानों से सुनने और हजारों पकड़ से पकड़ने वाला विश्वात्मा किसी की भी धूर्तता पर पर्दा नहीं पड़ा रहने देता । वस्तुस्थिति प्रकट होकर रहती है और दुष्टता छत पर चढ़कर अपनी कलई आप खोलती और अपनी दुरभिसन्धि आप बखानती है । 

यह सनातन सत्य और पुरातन तथ्य लोग समझ सके होते और अशुभ का अवलम्बन करने पर जो दुर्गति होती है, उसे अनुभव कर सके होते तो क्यों सन्मार्ग का राजपथ छोड़कर कांटे भरे  कुमार्ग पर भटकते? और क्यों रोते-बिलखते इस सुर दुर्लभ मानव-जीवन को सड़ी हुई लाश की तरह ढोते, घसीटते ?

दर्बुद्धि का कैसा जाल-जंजाल बिखरा पड़ा है और उसमें कितने निरीह प्राणी-करुण चीत्कार करते हुए फँसे जकड़े पड़े हैं, यह दयनीय दुर्दशा अपने लिए मर्मान्तक पीड़ा का कारण बन गई । आत्मवत् सर्वभूतेषु की साधना ने विश्व-मानव की इस पीड़ा को अपनी पीड़ा बना दिया, लगने लगा मानो अपने ही हाथ-पाँवों को कोई ऐंठ-मरोड़ और जला रहा हो ।

 “सबमें अपना आत्मा पिरोया हुआ है और सब अपनी आत्मा में पिरोये हुए हैं”

 गीता का यह ज्ञान जहाँ तक पढ़ने-सुनने से सम्बन्धित रहे वहाँ तक कुछ हर्ज नहीं, पर जब वह अनुभूति की भूमिका में उतरे और अन्त:करण में प्रवेश प्राप्त करे, तो स्थिति दूसरी ही हो जाती है । अपने अंग-अवयवों का कष्ट अपने को जैसा व्यथित-बेचैन करता है, अपने स्त्री, पुत्रों की पीड़ा जैसे अपना चित्त विचलित करती है, ठीक वैसे ही आत्मविस्तार की दिशा में बढ़ चलने पर लगता है कि विश्वव्यापी दु:ख अपना ही दु:ख है और व्यथित-पीड़ितों की वेदना अपने को ही नोंचती-कचोटती है ।

 जीवन के अंतिम  अध्याय  तक करुणा यथावत बनी  रही :

पीड़ित मानवता की, विश्वात्मा की, व्यक्ति और समाज की व्यथा-वेदना अपने भीतर उठने और बेचैन करने लगी । आँख, डाढ ( दांत ) और पेट के दर्द से बेचैन मनुष्य व्याकुल फिरता है कि किस प्रकार-किस उपाय से इस कष्ट से छुटकारा पाया जाए ? क्या किया जाए ? कहाँ जाया जाए? की हलचल मन में उठती है और जो सम्भव है उसे करने के लिए क्षण भर का विलम्ब न करने की आतुरता व्यग्र होती है । अपना मन भी ठीक ऐसा ही बना रहा । 

दुर्घटना में हाथ-पैर टूटे बच्चे को अस्पताल ले दौड़ने की आतुरता में माँ अपने बुखार-जुकाम को भूल जाती है और बच्चे को संकट में से बचाने के लिए बेचैन हो उठती है । लगभग अपनी मनोदशा ऐसी ही तब से लेकर अद्यावधि चली आई है। अपने सुख-साधन जुटाने की फुरसत किसे है ? विलासिता की सामग्री जहर-सी लगती है, विनोद और आराम के साधन जुटाने की बात कभी सामने आई तो आत्म-ग्लानि ने उस क्षुद्रता को धिक्कारा, जो मरणासन्न रोगियों के प्राण बचा सकने में समर्थ पानी के एक गिलास को अपने पैर धोने की विडम्बना में बिखेरने के लिए ललचाती है । भूख से तड़प कर प्राण त्यागने की स्थिति में पड़े हुए बालकों के मुख में जाने वाला ग्रास छीनकर माता कैसे अपना भरा पेट और भरे ? दर्द से कराहते बालक से मुंह मोड़कर पिता कैसे ताश-शतरंज का साज सजाये? ऐसा कोई निष्ठुर ही कर सकता है । आत्मवत् सर्वभूतेषु की संवेदना जैसे ही प्रखर हुई, निष्ठुरता उसी में गल-जलकर नष्ट हो गई । जी में केवल करुणा ही शेष रह गई, वही अब तक जीवन के इस अन्तिम अध्याय तक यथावत बनी हुई है । उसमें कमी रत्ती भर भी नहीं हुई वरन् दिन-दिन बढ़ोत्तरी ही होती गई।

सुना है कि आत्म-ज्ञानी सुखी रहते हैं और चैन की नींद सोते हैं । अपने लिए ऐसा आत्म-ज्ञान अभी तक दुर्लभ ही बना हुआ है । ऐसा आत्म-ज्ञान कभी मिल भी सकेगा या नहीं इसमें पूरा-पूरा सन्देह है । 

क्रमशः जारी : To be continued जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा लेख 6-आत्मवत् सर्वभूतेषु – अपने समान सबको देखना(contd)

7 जून  2021 का ज्ञानप्रसाद : “आत्मवत् सर्वभूतेषु – अपने समान सबको  देखना”

हमें तो ऐसा अनुभव हो रहा है कि  हम एक प्राध्यापक हैं जिसके विद्यार्थी सूक्ष्म रूप में सारे विश्व में विस्तृत हैं लेकिन फिर विचार आता है कि हमारी क्या औकात कि किसी को कुछ भी सिखा  सकें ,हम तो सभी से ,आप सभी से कुछ न कुछ शिक्षा प्राप्त कर ही रहे हैं।  हम  बहुत भाग्यशाली हैं  कि  छोटे -छोटे बच्चों से भी हमें ज्ञान प्राप्त हो रहा है। 

आज के लेख के शीर्षक में आप  “आत्मवत् सर्वभूतेषु” दो शब्द देख रहे हैं और हमने  सरल करके अर्थ भी  लिखा है ,इसी पर सारा लेख   केंद्रित है।  हम देखेंगें कि  इस संसार की स्थिति देखकर  परमपूज्य गुरुदेव की क्या दशा हुई।  अब हम सबको समझ आ जायेगा कि गुरुदेव ने हमारे लिए ,केवल हमारे लिए ,हमारा जीवन सुखमय बनाने के लिए इतने कष्ट सहे। यह पंक्तियाँ जी इस समय आप पढ़ रहे हैं उन्होंने अपने अन्तःकण में उठती वेदना के कारण लिखी हैं जिनपर हम सबको ठीक एक परीक्षार्थी की तरह मनन करने की आवश्यकता है। 

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“अपने समान सबको  देखना” कहने सुनने को यह शब्द मामूली लगते हैं लेकिन इन शब्दों की परिधि वहां पहुँचती है जहाँ परमसत्ता के साथ घुल जाने की स्थिति आ पहुँचती है । इस साधना के लिए दूसरे के अन्तरंग के साथ अपना अन्तरंग जोड़ना पड़ता है और उसकी संवेदनाओं को अपनी संवेदना समझना पड़ता है। वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता का यही मूर्तरूप है कि हम हर किसी को अपना मानें । अपने को दूसरों में और दूसरों को अपने में पिरोया हुआ, घुला हुआ अनुभव करें। इस अनुभूति की प्रतिक्रिया यह होती है कि दूसरों के सुख में अपना सुख और दूसरों के दुःख में अपना दुःख अनुभव होने लगता है। ऐसा मनुष्य अपने तक सीमित नहीं रह सकता, स्वार्थों की परिधि में आबद्ध( बंधे रहना ) रहना उसके लिए कठिन हो जाता है । दूसरों का दु:ख मिटाने और सुख बढ़ाने के प्रयास उसे बिल्कुल ऐसे लगते हैं, मानो यह सब अपने नितान्त व्यक्तिगत प्रयोजन के लिए किया जा रहा हो ।

“संसार में अगणित व्यक्ति पुण्यात्मा और सुखी हैं, सन्मार्ग पर चलते और मानव-जीवन को धन्य बनाते हुए अपना-पराया कल्याण करते हैं । यह देख-सोचकर जी को बड़ी सान्त्वना होती है और लगता है, सचमुच यह दुनिया ईश्वर ने पवित्र उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनाई है। यहाँ पुण्य और ज्ञान मौजूद है, जिसका सहारा लेकर कोई भी आनन्द-उल्लास की, शान्ति और सन्तोष की दिव्य उपलब्धियाँ समुचित मात्रा में प्राप्त कर सकता है। पुण्यात्मा, परोपकारी और आत्मावलम्बी व्यक्तियों का अभाव यहाँ नहीं है। वे संख्या में कम भले ही हों, पर अपना प्रकाश तो फैलाते ही हैं और उनका अस्तित्व यह तो सिद्ध करता ही है कि मनुष्य में देवत्व मौजूद है और उसे जो चाहे थोड़े-से प्रयत्न से सजीव एवं सक्रिय कर सकता है, धरती वीर विहीन नहीं है  । यहाँ नर-नारायण का अस्तित्त्व विद्यमान है । परमात्मा कितना महान, उदार और दिव्य हो सकता है, इसका परिचय, उसकी प्रतिकृति उन आत्माओं में देखी जा सकती है, जिन्होंने श्रेय पथ का अवलम्बन किया और काँटों को तलवों से रौंदते हुए लक्ष्य की ओर शान्ति, श्रद्धा एवं हिम्मत के साथ बढ़ते चले गये । मनुष्यता को गौरवान्वित करने वाले इन महामानवों का अस्तित्त्व ही इस जगती को इस योग्य बनाये हुए है कि भगवान बार-बार नरतनु धारण करके अवतार के लिए ललचाए । आदर्शों की दुनिया में विचरण करने वाले और उत्कृष्टता की गतिविधियों को अवलम्बन बनाने वाले महामानव बहिरंग में अभावग्रस्त दीखते हुए भी अन्तरंग में कितने समृद्ध और सुखी रहते हैं, यह देखकर अपना चित्त भी पुलकित होने लगा । उनकी शान्ति अपने अन्त:करण को छूने लगी । महाभारत की वह कथा अक्सर याद आती रही जिसमें पुण्यात्मा युधिष्ठिर के कुछ समय तक नरक जाने पर वहाँ रहने वाले प्राणी आनन्द में विभोर हो गये थे । लगता रहा जिन पुण्यात्माओं की स्मृति मात्र से अपने को सन्तोष और प्रकाश मिलता है, वे स्वयं न जाने कितनी दिव्य अनुभूतियों का अनुभव करते होंगे।  इस कुरूप दुनिया में जो कुछ सौन्दर्य है, वह इन पुण्यात्माओं का ही अनुदान है । असीम अस्थिरता से निरन्तर प्रेत-पिशाचों जैसा हाहाकारी नृत्य करने वाले अणु-परमाणुओं से भरी-बनी इस दुनिया में जो स्थिरता और शक्ति है वह इन पुण्यात्माओं द्वारा ही उत्पन्न की गई है । सर्वत्र भरे बिखरे जड़ पंचतत्वों में जो सरसता और शोभा दीखती है, उसके पीछे इन सत्पथगामियों का प्रयल और पुरुषार्थ ही झाँक रहा है । प्रलोभनों और आकर्षणों के जंजाल के बन्धन काटकर जिन्होंने सृष्टि को सुरभित और शोभामय बनाने की ठानी, उनकी श्रद्धा ही धरती को धन्य बनाती रही है । जिनके पुण्य-प्रयास लोक-मंगल के लिए निरन्तर गतिशील रहे, इच्छा होती रही उन नर- नारायणों के दर्शन और स्मरण करके पुण्य फल पाया जाए । इच्छा होती रही उनकी चरण-रज मस्तक पर रखकर अपने को धन्य बनाया जाए । जिन्होंने आत्मा को परमात्मा बना लिया, उन पुरुष-पुरुषोत्तमों में प्रत्यक्ष परमेश्वर की झाँकी करके लगता रहा अभी भी ईश्वर साकार रूप में इस पृथ्वी पर निवास करते, विचरते दीख पड़ते हैं । अपने चारों ओर इतना पुण्य-परमार्थ दिखाई पड़ते रहना बहुत कुछ सन्तोष देता रहा और यहाँ अनन्त काल तक रहने के लिए मन करता रहा । इन पुण्यात्माओं का सान्निध्य प्राप्त करने में स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि आदि का सबसे अधिक आनन्द पाया जा सकता है । इस सच्चाई के अनुभवों ने हस्तामलकवत ( पूरी तरह से समझ आने वाला ) स्वयं सिद्ध करके सामने रख दिया और कठिनाइयों से भरे जीवनक्रम के बीच इसी विश्व-सौन्दर्य का स्मरण कर उल्लसित रहा जा सका ।

आत्मवत् सर्वभूतेषु की यह सुखोपलब्धि एकांगी ( one sided ) न रही, उसका दूसरा पक्ष भी सामने अड़ा रहा । 

दूसरा पक्ष :

संसार में दुःख कम नहीं । कष्ट और क्लेश, शोक और सन्ताप, अभाव और दरिद्रता से अगणित व्यक्ति नारकीय यातनाएँ भोग रहे हैं । समस्याएँ, चिन्ताएँ और उलझनें लोगों को खाये जा रही हैं । अन्याय और शोषण के कुचक्र में असंख्यों को बेतरह पिसना पड़ रहा है । दुबुद्ध (पढ़े -लिखे ,प्रभुद्ध ) ने सर्वत्र नारकीय वातावरण बना रखा है । अपराधों और पापों के दावानल में झुलसते, बिलखते, चिल्लाते, चीत्कार करते लोगों की यातनाएँ ऐसी हैं जिससे देखने, सुनने वालों को रोमांच हो आते हैं, फिर जिन्हें वह सब सहना पड़ता है उनका तो कहना ही क्या ? सुख-सुविधाओं की साधन- सामग्री इस संसार में कम नहीं है, फिर भी दु:ख और दैन्य के अतिरिक्त और कहीं कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता। एक-दूसरे को स्नेह-सद्भाव का सहारा देकर व्यथा वेदनाओं से छुटकारा दिला सकते थे, प्रगति और समृद्धि की सम्भावना प्रस्तुत कर सकते थे,

 “पर किया क्या जाए ?”

जब मनोभूमि विकृत( बिगड़ गयी ) हो गई, सब कुछ उलटा सोचा और अनुचित किया जाने लगा तो विष-वृक्ष बोकर अमृत-फल पाने की आशा कैसे सफल होती?”  सर्वत्र फैले दुःख-दारिद्रय, शोक-

संताप से किस प्रकार समस्त मानव प्राणियों को कितना कष्ट हो रहा है, पतन और पाप के गर्त में लोग किस शान और तेजी से गिरते-मरते चले जा रहे हैं, यह दयनीय दृश्य देखे, सुने तो अन्तरात्मा रोने लगी । 

“मनुष्य अपने ईश्वरीय अंश अस्तित्व को क्यों भूल गया ? उसने अपना स्वरूप और स्तर इतना क्यों गिरा दिया ?

क्रमशः जारी : To be continued जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा- लेख 5-अखंड दीपक यानि हमारे प्राण

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5 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद : “अखंड दीपक यानि हमारे प्राण” “मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत्”
परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा  की शृंखला में आज हम आपके समक्ष लेख नंबर 5  प्रस्तुत कर रहे हैं। कठिन श्रम और अध्यन  पश्चात्  ही यह लेख आपके समक्ष लाये जा रहे हैं और आप इस अमृतपान का आनंद उठा रहे हैं ,ऐसा हमें आपके कमेंटस  से पता चल रहा है। आप सब एक परीक्षार्थी की तरह इन अद्भुत लेखों को पढ़  रहे हैं  और न केवल पढ़ रहे हैं अपनेआप को self-examine भी कर रहे हैं। यह हम इसलिए कह रहे हैं की कमैंट्स करते समय अक्सर लेखों पर ही चर्चा हो रही है और सभी परस्पर विचार-विमर्श के साथ अपनी जिग्यासाओं का निवारण भी किये जा रहे हैं।  यह सभी टॉपिक और आने वाले लेख हैं ही ऐसे कि  आप खाना -पीना सोना भूल सकते हैं लेकिन लेख को बीच में नहीं छोड़ सकते। इसीलिए हमने इनकी लंबाई इतनी रखी  है कि आप आराम से ,पूरे मन से इनको पढ़ सकें। अखंड दीप और अखंड ज्योति पत्रिका का बहुत ही खूसूरत व्याख्यान आज आपको मिलने वाला है। हम जानते हैं कि  आपकी उत्सुकता बड़े ही जा रहा है तो आओ चलते हैं एक और अद्भुत अमृतपान की ओर  आज के  ज्ञानप्रसाद की ओर।  

मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत्  का अर्थ है दूसरे  की पत्नी को अपनी माता के समान समझना और पराये धन को मिटटी के समान समझना।  इस प्रकार के आदर्शों में विरोध  प्रायः युवावस्था में ही होता है ।

काम और लोभ की प्रबलता के भी वही दिन हैं, सो 15 वर्ष की आयु से लेकर 24 वर्षों में 40 तक पहुँचते-पहुँचते वह उफान ढल गया । कामनाएँ, वासनाएँ, तृष्णाएँ, महत्त्वाकांक्षाएँ प्रायः इसी आयु में आकाश-पाताल के कुलावे मिलाती हैं । यह अवधि स्वाध्याय, मनन, चिन्तन से लेकर आत्मसंयम और जप-ध्यान की साधना में लग गई । इसी आयु में बहुत करके मनोविकार प्रबल रहते हैं, सो आमतौर से परमार्थ प्रयोजनों के लिए ढलती आयु के व्यक्तियों को ही प्रयुक्त किया जाता है। -उठती उम्र के लोग अर्थ-व्यवस्था से लेकर सैन्य संचालन तक अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर उठाते हैं और उन्हें उठाने चाहिए । महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए इन क्षेत्रों में बहुत अवसर रहता है । सेवाकार्यों में योगदान भी नवयुवक बहुत दे सकते हैं पर लोक-मंगल के लिए नेतृत्व करने की वह अवधि नहीं है । शंकराचार्य, दयानन्द, विवेकानन्द, रामदास, मौरा, निवेदिता जैसे थोड़े ही अपवाद  ऐसे हैं जिन्होंने उठती उम्र में ही लोक-मंगल के नेतृत्व का भार कन्धों पर सफलतापूर्वक वहन किया हो । आमतौर से कच्ची उम्र गड़बड़ी ही फैलाती है । यश, पद की इच्छा, धन का प्रलोभन, वासनात्मक आकर्षण के बने रहते जो सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, वे उलटी विकृति पैदा करते हैं । अच्छी संस्थाओं का भी सर्वनाश इसी स्तर के लोगों द्वारा होता रहता है । यों बुराई-भलाई किसी आयु विशेष से बँधी नहीं रहती, पर प्रकृति की परम्परा कुछ ऐसी ही चली आती है, जिसके कारण युवावस्था महत्त्वाकांक्षाओं की अवधि मानी गई है । ढलती उम्र के साथ-साथ स्वभावतः आदमी कुछ ढीला पड़ जाता है, तब उसकी भौतिक लालसाएँ भी ढीली पड़ जाती हैं, मरने की बात याद आने से लोक-परलोक, धर्म-कर्म भी रुचता है, इसलिए तत्त्ववेत्ताओं ने वानप्रस्थ और संन्यास के लिए उपयुक्त समय आयु के उत्तरार्द्ध को ही माना है ।

न जाने क्या रहस्य था कि हमें हमारे मार्गदर्शक ने उठतआयु में तपश्चर्या के कठोर प्रयोजन में संलग्न कर दिया और देखते-देखते उसी प्रयास में 40  साल की उम्र पूरी हो गई । हो सकता है वर्चस्व और नेतृत्व के अहंकार का, महत्त्वाकांक्षाओं और प्रलोभनों में बह जाने का खतरा समझा गया हो । हो सकता है आन्तरिक परिपक्वता, आत्मिक बलिष्ठता पाये बिना कुछ बड़ा काम न बन पड़ने की आशंका की गई हो । हो सकता है महान कार्यों के लिए अत्यन्त आवश्यक संकल्प, बल, धैर्य, साहस और सन्तुलन परखा गया हो । जो भी हो अपनी उठती आयु उस साधना क्रम में बीत गई जिसकी चर्चा कई बार कर चुके। 

 असामान्य अखंड दीपक :

उस अवधि में सब कुछ सामान्य चला, असामान्य एक ही था-हमारा गौ-घृत से अहर्निश जलने वाला अखण्ड दीपक । पूजा की कोठरी में वह निरन्तर जलता रहता । इसका वैज्ञानिक या आध्यात्मिक रहस्य क्या था ? कुछ ठीक से नहीं कह सकते । गुरु सो गुरु, आदेश सो आदेश, अनुशासन सो अनुशासन, समर्पण सो समर्पण । एक बार जब ठोक-बजा लिया और समझ लिया कि इसकी नाव में बैठने पर डूबने का खतरा नहीं है तो फिर आँख मूंदकर बैठ ही गये । फौजी सैनिक को अनुशासन प्राणों से भी अधिक प्यारा होता है । अपनी अन्धश्रद्धा कहिए या अनुशासन प्रियता, अत: जीवन की जो दिशा निर्धारित कर दी गई, कार्य-पद्धति जो बता दी गई उसे सर्वस्व मानकर पूरी निष्ठा और तत्परता के साथ करते चले गये । अखण्ड दीपक की साधना-कक्ष में स्थापना भी इसी प्रक्रिया के अन्तर्गत आती है । मार्गदर्शक पर विश्वास किया, उसे अपने आपको सौंप दिया तो उखाड-पछाड़, क्रिया में तर्क-सन्देह क्यों ? वह अपने से बन नहीं पड़ा । जो साधना हमें बताई गई उसमें अखण्ड दीपक का महत्त्व है, इतना बता देने पर उसकी स्थापना कर ली गई और पुरश्चरणों की पूरी अवधि तक उसे ठीक तरह जलाये रखा गया । पीछे तो यह प्राणप्रिय ही बन गया । 24  वर्ष बीत जाने पर उसे बुझाया जा सकता था, पर यह कल्पना भी ऐसी लगती है कि हमारा प्राण ही बुझ जाएगा, सो उसे आजीवन चालू रखा जाएगा हम अज्ञातवास गये थे, अब फिर जा रहे हैं तो उसे धर्मपत्नी सँजोये रखेगी । यदि एकाकी रहे होते, पत्नी न होती तो और कुछ साधना बन सकती थी । अखण्ड दीपक सँजोए रखना कठिन था । कर्मचारी या दूसरे अश्रद्धालु एवं आन्तरिक दृष्टि से दुर्बल लोग ऐसी दिव्य अग्नि को सँजोये नहीं रह सकते । अखण्ड-दीपक स्थापित करने वालों में से अनेकों के जलते-बुझते रहते हैं, वे नाम मात्र के ही अखण्ड हैं। अपनी ज्योति अखण्ड बनी रही, इसका कारण बाह्य सतर्कता नहीं, अन्तर्निष्ठा ही समझी जानी चाहिए, जिसे अक्षुण्ण रखने में हमारी धर्मपत्नी ने असाधारण योगदान दिया ।

हो सकता है अखण्ड दीपक अखण्ड यज्ञ का स्वरूप हो धूपबत्तियों का जलना, हवन-सामग्री की, जप मन्त्रोच्चारण की और दीपक-घी होमे जाने की आवश्यकता पूरी करता हो और इस तरह अखण्ड हवन की कोई स्व-संचालित प्रक्रिया बन जाती हो । हो सकता है जल भरे कलश और ज्वलन्त अग्नि की स्थापना में कोई अग्नि-जल का संयोग रेल-इंजन जैसी भाप शक्ति का सूक्ष्म प्रयोजन पूरा करता हो । हो सकता है अन्तज्योति जगाने में इस बाह्य-ज्योति से कुछ सहायता मिलती हो, जो भी हो अपने को ‘अखण्ड-ज्योति’  में भावनात्मक प्रकाश, अनुपम आनन्द, उल्लास से भरा-पूरा मिलता रहा । बाहर चौकी पर रखा हुआ यह दीपक कुछ दिन तो बाहर ही बाहर जलता दीखा, पीछे अनुभूति बदली और लगा कि हमारे अन्त:करण में यही प्रकाश-ज्योति ज्यों की त्यों जलती है और 

जिस प्रकार पूजा की कोठरी प्रकाश से आलोकित होती है, वैसे ही अपना समस्त अन्तरंग इस ज्योति से ज्योतिर्मय हो रहा है । शरीर, मन और आत्मा में स्थूल, सूक्ष्म और कारण कलेवर में हम जिस ज्योतिर्मयता का ध्यान करते रहे हैं, सम्भवतः वह इस अखण्ड दीपक की ही प्रतिक्रिया रही होगी ।

उपासना की सारी अवधि में भावना-क्षेत्र वैसे ही प्रकाश से जगमगाता रहा है जैसा कि उपासना-कक्ष में अखण्ड दीपक आलोक बिखेरता है। अपना सब कुछ प्रकाशमय है । अन्धकार के आवरण हट गये । अन्धतमित्रा की मोहग्रस्तता जल गई, प्रकाशपूर्ण भावनाएँ, विचारणाएँ और गतिविधियाँ शरीर और मन पर आच्छादित हैं । सर्वत्र प्रकाश का समुद्र लहलहा रहा है और हम तालाब की मछली की तरह उस ज्योति- सरोवर में क्रीड़ा-कल्लोल करते विचरण करते हैं । इन अनुभूतियों, आत्मबल, दिव्यदर्शन औरअन्त:उल्लास  को विकासमान बनाने में इतनी सहायता पहुँचाई कि जिसका कुछ उल्लेख नहीं किया जा सकता । हो सकता है यह कल्पना ही हो, पर सोचते जरूर हैं कि 

यदि यह ‘अखण्डज्योति’ जलाई न गई होती तो पूजा की कोठरी के धुंधलेपन की तरह शायद अन्तरंग भी धुंधला बना रहता । 

अब तो वह दीपक दीपावली के दीप पर्व की तरह अपनी नस-नाड़ियों में जगमगाता दिखता है । अपनी भाव भरी अनुभूतियों के प्रवाह में ही 

“जब 32  वर्ष पूर्व पत्रिका आरम्भ की तो संसार का सर्वोत्तम नाम जो हमें प्रिय लगता था, पसन्द आता था ‘अखण्ड-ज्योति’ रख दिया ।” 

हो सकता है उसी भावावेश में प्रतिष्ठापित पत्रिका का छोटा सा विग्रह संसार में मंगलमय प्रगति की प्रकाश किरणें बिखेरने में समर्थ और सफल हो सका हो । साधना के तीसरे चरण में प्रवेश करते हुए आत्मवत् सर्वभूतेषु” की किरणें फूट पड़ी । मातृवत् परदारेषु और परद्रव्येषु लोष्ठवत् की साधना अपने काय-कलेवर तक ही सीमित थी । दो आँखों में पाप आया तो तीसरी विवेक की आँख खोलकर उसे डरा-भगा दिया । शरीर पर कड़े प्रतिबन्ध लगा दिए और वैसी परिस्थितियाँ बनने की जिनसे आशंका रहती है उनकी जड़ काट दी, तो दुष्ट व्यवहार असम्भव हो गया । मातृवत् परदारेषु की साधना बिना अड़चन के सध गई । मन ने सिर्फ आरम्भिक दिनों में ही हैरान किया । शरीर ने सदा हमारा साथ दिया । मन ने जब हार स्वीकार कर ली तो वह हताश होकर हरकतों से बाज आ गया । बाद में  तो वह अपना पूरा मित्र और सहयोगी ही बन गया । स्वेच्छा से गरीबी वरण कर लेने, आवश्यकताएँ घटाकर अन्तिम बिन्दु तक ले आने और संग्रह की भावना छोड़ने से ‘परद्रव्य'( पराया  धन ) का आकर्षण चला गया । पेट भरने के लिए, तन ढंकने के लिए जब स्व उपार्जन ही पर्याप्त था तो ‘परद्रव्य’ के अपहरण की बात क्यों सोची जाए ? जो बचा, जो मिला-सो देते बाँटते ही रहे । बाँटने और देने का चस्का जिसे लग जाता है, जो उस अनुभूति का आनन्द लेने लगता है, उसे संग्रह करते बन नहीं पाता । फिर किस प्रयोजन के लिए परद्रव्य का पाप कमाया जाए ? गरीबी का, सादगी का, अपरिग्रही ब्राह्मण जीवन, अपने भीतर एक असाधारण आनन्द, संतोष और उल्लास भरे बैठा है, इसकी अनुभूति यदि लोगों को हो सकी होती तो शायद ही किसी का मन परद्रव्य( पराया धन ) की पाप-पोटली सिर पर लादने को करता । अपरिग्रह अनुदान की प्रतिक्रिया अन्त:करण पर कितनी अनोखी होती है, उसे कोई कहाँ जानता है? पर अपने को तो यह दिव्य विभूतियों का भण्डार अनायास ही हाथ लग गया ।

 मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत् की दो मंज़िलों के बाद आती है तीसरी मंज़िल आत्मवत् सर्वभूतेषु’  । अपने समान सबको देखनाकहने सुनने में ये शब्द मामूली से लगते हैं और सामान्यतया नागरिक कर्तव्यों का पालन, शिष्टाचार, सद्व्यवहार की सीमा तक पहुँचकर बात पूरी हो गई दीखती है, पर वस्तुतः इस तत्त्वज्ञान की सीमा अति विस्तृत है । उसकी परिधि वहाँ पहुँचती है, जहाँ परमात्म-सत्ता के साथ घुल जाने की स्थिति आ पहुँचती है। 

क्रमशः जारी : To be continued जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा लेख 4- हमने उपासना कैसे की ?

4 जून  2021 का ज्ञानप्रसाद : हमने उपासना कैसे की ?

परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा  की शृंखला में आज हम आपके समक्ष लेख नंबर ४ प्रस्तुत कर रहे हैं। कठिन श्रम और अध्यन  पश्चात्  ही यह लेख आपके समक्ष लाये जा रहे हैं और आप इस अमृतपान का आनंद उठा रहे हैं ,ऐसा हमें आपके कमेंटस  से पता चल रहा है। सभी परिजन  अपना अपना कार्य बखूबी निभा रहे हैं ,हमारे वरिष्ठ सहकर्मी आदरणीय सविंदर जी अपने फ़ोन में आयी प्रॉब्लम के कारण इतना सक्रीय नहीं हैं लेकिन फिर भी जहाँ कहीं भी हो ,योगदान दे ही रहे हैं। समस्त कार्य पूरी निष्ठां और श्रद्धा से  सम्पन्न  होने के बाबजूद सविंदर जी की अनुपस्थिति हमें बहुत ही खल रही है।  आशा करते शीघ्र ही वह हमारे साथ होंगें।  

प्रस्तुत है परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा का लेख नंबर 4 :    

कर्मकाण्ड और पूजा-पाठ की श्रेणी :

कर्मकाण्ड और पूजा-पाठ की श्रेणी में साधक तभी आता है, जब उसका जीवन-क्रम उत्कृष्टता

की दिशा में क्रमबद्ध रीति से अग्रसर हो रहा हो तथा उसका दृष्टिकोण भी सुधर रहा हो और क्रिया-कलाप में उस रीति-नीति का समावेश हो जो आत्मवादी के साथ आवश्यक रूप से जुड़े रहते हैं । धूर्त, स्वार्थी, कंजूस और शरीर तथा बेटे के लिए जीने वाले लोग यदि अपनी विचारणा और गतिविधियाँ परिष्कृत न करें तो उन्हें तीर्थ, व्रत, उपवास, कथा, कीर्तन, स्नान, ध्यान आदि का कुछ लाभ मिल सकेगा, इसमें हमारी सहमति नहीं है । यह उपयोगी तो हैं, पर इनकी उपयोगिता इतनी ही है जितनी कि लेख लिखने के लिए कलम की । कलम के बिना लेख कैसे लिखा जा सकता है? पूजा-उपासना के बिना आत्मिक प्रगति कैसे हो सकती है? 

“यह जानने के साथ साथ हमें यह भी जानना चाहिए कि बिना स्वाध्याय, अध्ययन, चिन्तन, मनन की बौद्धिक विकास प्रक्रिया सम्पन्न किए बिना केवल कलम कागज के आधार पर लेख नहीं लिखे जा सकते? न कविताएँ बनाई जा सकती हैं ?”

आन्तरिक उत्कृष्टता बौद्धिक विकास की तरह है और पूजा अच्छी कलम की तरह । दोनों का समन्वय होने से ही बात बनती है । एक को हटा दिया जाए तो बात अधूरी रह जाती है । हमने यह ध्यान रखा कि साधना की गाड़ी एक पहिये पर न चल सकेगी, इसलिए दोनों पहियों की व्यवस्था ठीक तरह जुटाई जाए । 

हमने उपासना कैसे की ? 

इसमें कोई रहस्य नहीं है । गायत्री महाविज्ञान में जैसा लिखा है, उसी क्रम से हमारा इसी गायत्री मन्त्र का सामान्य उपासना क्रम चलता रहा है । हाँ, जितनी देर तक भजन करने बैठे हैं, उतनी देर तक यह भावना अवश्य करते रहते हैं कि ब्रह्म की परम तेजोमयी सत्ता, माता गायत्री का दिव्य प्रकाश हमारे रोम-रोम में ओत-प्रोत हो रहा है और प्रचण्ड अग्नि में पड़कर लाल हुए लोहे की तरह हमारा भौंड़ा अस्तित्व उसी स्तर का उत्कृष्ट बन गया है, जिस स्तर का कि हमारा इष्ट देव है । शरीर के कण-परमाणुओं में गायत्री माता का ब्रह्मवर्चस समा जाने से काया का हर अवयव ज्योतिर्मय हो उठा और उस अग्नि से इन्द्रियों की लिप्सा जलकर भस्म हो गई, आलस्य आदि दुर्गुण नष्ट हो गये । रोग विकारों को उस अग्नि ने अपने में जला दिया । शरीर तो अपना है, पर उसके भीतर प्रचण्ड ब्रह्मवर्चस लहलहा रहा है । वाणी में केवल सरस्वती ही शेष है । असत्य, छल और स्वाद के असुर उस दिव्य मन्दिर को छोड़कर पलायन कर गये । नेत्रों में गुण-ग्राहकता और भगवान का सौन्दर्य हर जड़-चेतन में देखने की क्षमता भर शेष है । छिद्रान्वेषण( दोष  ढूंढना )  कामुकता जैसे दोष आँखों में नहीं रहे । कान केवल जो मंगलमय है उसे ही सुनते हैं । बाकी कोलाहल मात्र है, जो श्रवणेन्द्रिय के पर्दे से टकराकर वापस लौट जाता है। 

गायत्री माता का परम तेजस्वी प्रकाश सूक्ष्म शरीर में,मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार में प्रवेश करते और प्रकाशवान होते देखा और अनुभव किया कि वह ब्रह्मवर्चस अपने मन को उस भूमिका में घसीटे लिए जा रहा है जिसमें पाशविक( पशु जैसी )  इच्छा-आकांक्षाएं विरत हो जाती हैं और दिव्यता परिप्लावित कर सकने वाली आकांक्षाएँ सजग हो पड़ती हैं । बुद्धि निर्णय करती है कि क्षणिक आवेशों के लिए, तुच्छ प्रलोभनों के लिए मानव जीवन जैसी उपलब्धि विनष्ट नहीं की जा सकती । इसका एक-एक पल आदर्शों की प्रतिष्ठापना के लिए खर्च किया जाना चाहिए । चित्त में उच्च निष्ठाएँ जमतीं और सत्यं, शिवं, सुन्दरम् की ओर बढ़ चलने की उमंगें उत्पन्न करती हैं । सविता देवता का तेजस अपनी अन्तः भूमिका में प्रवेश करके अहं. को परिष्कृत करता है और मरणधर्मा (mortal) जीवधारियों की स्थिति से कई मील  ऊपर उड़ा ले जाकर ईश्वर के सर्व-समर्थ, परम-पवित्र और सच्चिदानन्द स्वरूप में अवस्थित कर देता है।

गायत्री पुरश्चरणों के समय केवल जप ही नहीं किया जाता रहा

गायत्री पुरश्चरणों के समय केवल जप ही नहीं किया जाता रहा, साथ ही भाव-तरंगों से मन भी हिलोरें लेता रहा । कारण शरीर, यानी भाव-भूमि के अन्तस्तल में “आत्मबोध, आत्मदर्शन, आत्मानुभूति और आत्म-विस्तार की अनुभूति को अन्तर्योति के रूप में अनुभव किया जाता रहा” । लगा अपनी आत्मा परम तेजस्वी सविता देवता के प्रकाश में पतंगों के दीपक पर समर्पित होने की तरह विलीन हो गयी । अपना अस्तित्व समाप्त, उसकी स्थान पूर्ति परम तेजस द्वारा । मैं समाप्त, तू का आधिपत्य । आत्मा और परमात्मा के अद्वैत मिलन की अनुभूति में ऐसे ‘ब्रह्मानन्द की सरसता क्षण-क्षण अनुभूत होती रही, जिस पर संसार भर का समवेत विषयानन्द निछावर किया जा सकता है । जप के साथ स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीर में दिव्य प्रकाश की प्रतिष्ठापना आरम्भ में प्रयत्नपूर्वक ध्यान धारणा के रूप में की गई थी, पीछे वह स्वाभाविक प्रकृति बनी और अंततः प्रत्यक्ष अनुभूति बन गई । जितनी देर उपासना में बैठा गया, अपनी सत्ता के भीतर और बाहर परम तेजस्वी-सविता की दिव्य ज्योति का सागर ही लहलहाता रहा और यही प्रतीत होता रहा कि हमारा अस्तित्त्व इस दिव्य ज्योति से ओत-प्रोत हो रहा है । प्रकाश के अतिरिक्त अन्तरंग और बहिरंग में और कुछ है ही नहीं, प्राण की हर स्फुरणा ( किरण ) में ज्योति- स्फुल्लिंगों ( चिंगारी )  के अतिरिक्त और कुछ बचा ही नहीं । इस अनुभूति में कम से कम पूजा के समय की अनुभूति को दिव्य-दर्शन और दिव्य-अनुभव से ओत-प्रोत बनाये ही रखा । साधना का प्रायः सारा ही समय इस अनुभूति के साथ बीता।

पूजा के 6 घण्टे, शेष 18 घण्टों को भरपूर प्रेरणा देते रहे । काम करने का जो समय रहा उसमें यह लगता रहा कि इष्ट देवता का तेजस ही अपना मार्ग-दर्शक है, उसके संकेतों पर ही प्रत्येक क्रियाकलाप  बन और चल रहा है। लालसा और लिप्सा से, तृष्णा और वासना से प्रेरित अपना कोई कार्य हो रहा हो ऐसा कभी लगा ही नहीं । छोटे बालक की माँ जिस प्रकार उँगली पकड़ कर चलती है, उसी प्रकार उस दिव्य-सत्ता ने मस्तिष्क को पकड़ कर ऊँचा सोचने और शरीर को पकड़ कर ऊँचा करने के लिए विवश कर दिया । उपासना के अतिरिक्त जाग्रत अवस्था के जितने घण्टे रहे उनमें शारीरिक नित्य-कर्मों से लेकर आजीविका उपार्जन, स्वाध्याय, चिंतन, परिवार व्यवस्था आदि की समस्त क्रियाएँ इस अनुभूति के साथ चलती रहीं, मानो परमेश्वर ही इन सबका नियोजन और संचालन कर रहा हो । रात को सोने के 6 घण्टे ऐसी गहरी नींद में बीतते रहे, मानो समाधि लग गई हो और माता के आँचल में अपने को सौंपकर परम शान्ति और सन्तुष्टि की भूमिका में आत्म-सत्ता से तादात्म्यता (एक जुटता ) प्राप्त कर ली हो । सोकर जब उठे तो लगा नया जीवन, नया उल्लास, नया प्रकाश अग्रिम मार्गदर्शन के लिए पहले से ही पथ-प्रदर्शन के लिए सामने खड़ा है ।

24 वर्ष के 24 महापुरश्चरण काल में कोई सामाजिक, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ कंधे पर नहीं थीं । सो अधिक तत्परता और तन्मयता के साथ यह जप-ध्यान का साधना क्रम ठीक तरह चलता रहा । मातृवत् परदारेषु और परद्रव्येषु लोष्ठवत् की अटूट निष्ठा ने काया को पाप कर्मों से बचाये रखा । अन्न की सात्त्विकता ने मन को मानसिक अध:पतन के गर्त में गिरने से भली प्रकार रोक रखने में सफलता पाई । जौ की रोटी और गाय की छाछ का आहार रुचा भी और पचा भी । जैसा अन्न, वैसा मन की सच्चाई हमने अपने जीवनकाल में पग-पग पर अनुभव की । यदि शरीर और मन का संयम कठोरतापूर्वक न किया गया होता तो न जाने जो थोड़ी-सी प्रगति हो सकी, वह हो सकी होती या नहीं।

क्रमशः जारी To be continued जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा लेख 3- आध्यात्मिक जीवन कठिन है क्या ?

2 जून 2021  का ज्ञानप्रसाद : आध्यात्मिक जीवन कठिन है क्या ?

पिछले कुछ दिनों से परमपूज्य गुरुदेव की  ऑटोबायोग्राफी का वर्णन करते- करते ह्रदय इतना आनंदित हो गया है कि कुछ और लिखने को मन ही नहीं कर रहा।  हमारे समर्पित सहकर्मी जानते हैं कि हर लेख के बाद हम अपडेट देते हैं लेकिन अब एक के बाद लेख लिखे जा रहे हैं।  इसी कड़ी में आज तीसरा लेख प्रस्तुत करते हुए हम अति आनंदित हैं -आनंदित इस लिए कि  हमारे जीवन का बहुत ही उच्च उदेश्य पूर्ण होता दिख रहा है।  हम आपके ह्रदय में सुखमय जीवन की सच्चाई को उतारने में सफल होते दिख रहे हैं। आपके कमैंट्स इस तथ्य के साक्षी हैं। हर कोई बढ़ चढ़ कर एक दूसरे के साथ सम्पर्क बनाने और अपनत्व व्यक्त करने की रेस लगा रहा जो ऑनलाइन ज्ञानरथ की सफलता का एक बहुत ही महत्वपूर्ण सूत्र है। इस सफलता का श्रेय आपको केवल आपको ही जाता है। आज अपडेट का मन तो था ,कुछ महत्वपूर्ण अपडेट हैं भी लेकिन फिर देखा,ऑटोबायोग्राफी में हम सब बहुत श्रद्धा और समर्पण दिखा रहे हैं।  हाँ चलते -चलते संक्षेप में एक अपडेट ज़रूर शेयर कर देते हैं :  आदरणीय अनिल मिश्रा भाई साहिब के प्रयास से हम आदरणीय शशि बहिन  जी से सम्पर्क स्थापित कर सके। उनके परिश्रम से “सलाखों के अंदर गायत्री साधना” शीर्षक से एक लेख /वीडियो शीघ्र ही आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगें। 

तो आइये चलें आज के लेख की ओर :

लोग कहते रहते हैं कि आध्यात्मिक जीवन कठिन है, पर अपनी अनुभूति इससे सर्वथा विपरीत है । वासना और तृष्णाओं से घिरा और भरा जीवन ही वस्तुतः कठिन एवं जटिल है। इस स्तर का क्रिया-कलाप अपनाने वाला व्यक्ति जितना श्रम करता है, जितना चिन्तित रहता है, जितनी व्यथा-वेदना सहता है, जितना उलझा रहता है, उसे देखते हुए आध्यात्मिक जीवन की असुविधा को तुलनात्मक दृष्टि से नगण्य ही कहा जा सकता है । इतना श्रम, इतना चिंतन, इतनी भागदौड़-फिर भी क्षण भर चैन नहीं, कामनाओं की पूर्ति के लिए अथक प्रयास, पर पूर्ति से पहले ही अभिलाषाओं का और सौ गुना हो जाना इतना बड़ा जंजाल है कि बड़ी से बड़ी सफलताएँ पाने के बाद भी व्यक्ति अतृप्त और असन्तुष्ट ही बना रहता है । छोटी सफलता पाने के लिए कितना थकाने वाला श्रम करना पड़ा था, यह जानते हुए भी उससे बड़ी सफलता पाने के लिए चौगुने, दस गुने उत्तरदायित्व और ओढ़ लेता है । गति जितनी तीव्र होती जाती है, उतनी ही समस्याएँ उठती और उलझती हैं । उन्हें सुलझाने में देह, मन और आत्मा का कचूमर निकलता है । सामान्य शारीरिक और मानसिक श्रम सुरसा (राक्षसी) जैसी अभिलाषाओं को पूर्ण करने में समर्थ नहीं होता, अस्तु अनीति और अनाचार का मार्ग अपनाना पड़ता है । 

जघन्य पापकर्म करते रहने पर अभिलाषाएँ कहीं पूर्ण होती हैं ?

निरन्तर की उद्विग्नता( परेशानी) और भविष्य की अन्धतमित्रा दोनों को मिलाकर जितनी क्षति है उसे देखते हुए उपलब्धियों को अति तुच्छ ही कहा जा सकता है । आमतौर से लोग रोते-कलपते, रोष- शोक  से सिसकते बिलखते किसी प्रकार जिन्दगी की लाश ढोते हैं ।  वस्तुतः इन्हीं को तपस्वी कहा जाना चाहिए । इतना कष्ट, त्याग, उद्वेग यदि आत्मिक प्रगति के पथ पर चलते हुए सहा जाता तो मनुष्य योगी, सिद्धपुरुष, महामानव, देवता ही नहीं, भगवान भी बन सकता था । 

बेचारों ने पाया कुछ नहीं, खोजा बहुत । वस्तुतः यही सच्चे त्यागी, तपस्वी, परोपकारी, आत्मदानी, बलिदानी हैं, जिन्होंने अथक परिश्रम से लेकर पाप की गठरी ढोने तक दुस्साहस कर डाला और जो कमाया था उसे साले, बहनोई, बेटे, भतीजों के लिए छोड़कर स्वयं खाली हाथ चल दिये, दूसरे के सुख के लिए स्वयं कष्ट सहने वाले वस्तुतः यही महात्मा, ज्ञानी, परमार्थी  हमें   दीखते हैं। अपने इर्द-गिर्द घिरे असंख्यों मानव देहधारियों के अन्तरंग और बहिरंग जीवन को जब हम देखते हैं तो लगता है

 “इन सबसे अधिक सुखी और सुविधाजनक जीवन हमी ने जी लिया।” हानि अधिक से अधिक इतनी हुई कि हमें कम सुविधा और कम सम्पन्नता का जीवन जीना पड़ा। सामान कम रहा और गरीब जैसे दीखे । सम्पदा न होने के कारण दुनिया वालों ने हमें छोटा समझा और अवहेलना की । बस इससे अधिक घाटा किसी आत्मवादी को हो भी नहीं सकता, पर इस अभाव से अपना कुछ भी हर्ज नहीं हुआ, न कुछ काम रुका । दूसरे षट्रस ( छह प्रकार के रस या स्वाद ) व्यंजन खाते रहे, हमने जौ, चना खाकर काम चलाया । दूसरे जीभ के अत्याचार से पीड़ित होकर रुग्णता (बीमारी का कष्ट सहते रहे, हमारा सस्ता आहार ठीक तरह पचता रहा और नीरोगता बनाये रहा । घाटे में हम क्या रहे । जीभ का क्षणिक जायका खोकर हमने कड़ी भूख में पापड़ ,भूख में चने भी बादाम लगते हैं – होने की युक्ति सार्थक होती देखी, जहाँ तक जायके का प्रश्न है, उस दृष्टि से तुलना करने पर विलासियों की तुलना में हमारी जौ की रोटी अधिक मजेदार थी । धन के प्रयास में लगे लोग बढ़िया कपड़े, बढ़िया घर, बढ़िया साज-सज्जा अपनाकर अपना अहंकार पूरा करने और लोगों पर रौब गाँठने की विडम्बना में लगे रहे । हम स्वल्प साधनों में उनका-सा ठाट तो जमा नहीं सके, पर सादगी ने जो आत्म-सन्तोष और आनन्द प्रदान किया, उससे कम प्रसन्नता नहीं हुई और छिछोरे, बचकाने लोग मखौल उड़ाते रहे हों पर वजनदार लोगों ने सादगी के पर्दे के पीछे झाँकती हुई महानता को सराहा और उसके आगे सिर झुकाया ।”

 नफे में कौन रहा, विडम्बना बनाने वाले या हम ? 

“अपनी कसौटी पर अपने आप को कसने के बाद यही कहा जा सकता है कि कम परिश्रम, कम जोखिम और कम जिम्मेदारी लेकर हम शरीर, मन की दृष्टि से अधिक सुखी रहे और सम्मान भी कम नहीं पाया । पागलों की पागल प्रशंसा करे, इसमें हमें कोई ऐतराज नहीं, पर अपने आप से हमें कोई शिकायत नहीं, आत्मा से लेकर परमात्मा तक और सज्जनों से लेकर दूरदर्शियों तक अपनी क्रिया-पद्धति प्रशंसनीय मानी गई । जोखिम भी कम और नफा भी ज्यादा । खर्चीली, तृष्णा ग्रस्त, बनावटी, भारभूत जिन्दगी पाप और पतन के पहियों वाली गाड़ी पर ही ढोई जा सकती है । अपना सब कुछ हलका रहा, “बिस्तर बगल में दबाया और चल दिए।” न थकान, न चिन्ता । हमारा व्यक्तिगत अनुभव यही है कि “आदर्शवादी जीवन सरल है।” उसमें प्रकाश, सन्तोष, उल्लास सब कुछ है । दुष्ट लोग आक्रमण करके कुछ हानि पहुँचा दें, तो यह जोखिम-पापी और घृणित जीवन में भी कम कहाँ है? सन्त और सेवा-भावियों को जितना त्रास सहना पड़ता है, प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिशोध के कारण भौतिक जीवन में और भी अधिक खतरा रहता है । कत्ल, खून, डकैती, आक्रमण, ठगी की जो रोमांचकारी घटनाएँ आये दिन सुनने को मिलती हैं, उनमें भौतिक जीवन जीने वाले ही अधिक मरते-खपते देखे जाते. हैं । इतने व्यक्ति यदि स्वेच्छापूर्वक अपने प्राण और धन गवाने को तत्पर हो जाते तो उन्हें देवता माना जाता और इतिहास धन्य हो जाता । ईसा, सुकरात, गाँधी जैसे संत या उस वर्ग के लोग थोड़ी-सी संख्या में ही मरे हैं । उनसे हजार गुने अधिक तो पतनोन्मुख ( पतन की ओर जानेवाला ) क्षेत्र में ही हत्याएँ होती रहती हैं । दान से गरीब हुए भामाशाह (महाराणा प्रताप के मित्र, सहयोगी और विश्वासपात्र सलाहकार ) तो उँगलियों पर गिने जाने वाले ही मिलेंगे, पर ठगी, विश्वासघात, व्यसन, व्यभिचार, आक्रमण, मुकद्दमा, बीमारी, बेवकूफी के शिकार होने वाले आये दिन अमीर से फकीर बनते लाखों व्यक्ति रोज ही देखे-सुने जाते हैं । आत्मिक क्षेत्र में घाटा, आक्रमण, दु:ख कम है लेकिन  भौतिक में अधिक । इस तथ्य को यदि ठीक तरह से समझा गया होता तो लोग आदर्शवादी जीवन से घबराने और भौतिक लिप्सा (चाह ) में औंधे मुंह गिरने की बेवकूफी न करते Iहमारा व्यक्तिगत अनुभव यही है कि तृष्णा-वासना के प्रलोभन में व्यक्ति पाता कम, खोता अधिक है। हमें जो खोना पड़ा वह नगण्य है, जो पाया वह इतना अधिक है कि जी बार-बार यही सोचता है कि हर व्यक्ति को आध्यात्मिक जीवन जीने की, उत्कृष्ट और आदर्शवादी परम्परा अपनाने के लिए कहा जाए I

पर बात मुश्किल है । हमें अपने अनुभवों की साक्षी देकर उज्ज्वल जीवन जीने की गुहार मचाते मुद्दत हो गई, पर कितनों ने उसे सुना और सुनने वालों में से कितनों ने उसे अपनाया ?” 

हमारे  लिए यह जीवन अत्यंत  कठिन पड़ता, यदि जीवन का स्वरूप, प्रयोजन और उपयोग ठीक तरह समझने और जो श्रेयस्कर है, उसी पर चलने की हिम्मत एवं बहादुरी न होती । जो शरीर को ही अपना स्वरूप मान बैठा और तृष्णा-वासना के लिए आतुर रहा, उसे आत्मिक प्रगति से वंचित रहना पड़ा है । 

“पूजा-उपासना के छुट-पुट कर्मकाण्डों के बल पर किसी की नाव किनारे नहीं लगी है ।”

 हमें 24  वर्ष तक निरन्तर गायत्री पुरश्चरणों में निरत रहकर उपासना का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय पूरा करना पड़ा, पर उस कर्मकाण्ड की सफलता का लाभ तभी सम्भव हो सका, जब आत्मिक प्रगति की भावनात्मक प्रक्रिया को, जीवन-साधना को उसके साथ जोड़े रखा । यदि दूसरे की तरह हम देवता को वश में करने या ठगने के लिए उससे मनोकामनाएं पूरी कराने के लिए जन्त्र-मन्त्र का कर्मकाण्ड रचते रहते, जीवनक्रम के निर्वाह की आवश्यकता न समझते तो निस्सन्देह अपने हाथ भी कुछ नहीं पड़ता । हम अगणित भजनानन्दी और तन्त्र-मन्त्र के कर्मकाण्डियों को जानते हैं जो अपनी धुन में मुद्दतों से लगे हैं । पूजा-पाठ उनका हमसे ज्यादा लम्बा और चौड़ा है, पर बहुत बारीकी से जब उन्हें परखा तो खोखले मात्र पाया । झूठी आत्म-प्रवंचना उनमें जरूर पाई, जिसके आधार पर वे यह सोचते थे कि इस जन्म में न सही, मरने के बाद उन्हें स्वर्गसुख जरूर मिलेगा, पर हमारी परख और भविष्यवाणी यह है कि इनमें से एक को भी स्वर्ग आदि नहीं मिलने वाला है, न उन्हें कोई सिद्धि-चमत्कार हाथ लगने वाला है ।

क्रमशः जारी To be continued जय गुरुदेव  

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा-लेख 2- परमेश्वर का परम पवित्र निवासगृह

1 जून 2021 का ज्ञानप्रसाद :  परमेश्वर का परम पवित्र निवासगृह 

आप सब ने परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा का प्रथम भाग बहुत ही ध्यान और श्रद्धा से अध्यन किया ,न केवल  अध्यन किया अपने आत्मपरिष्कार का प्रयास किया।  विचारों का हो तो सारा खेल है ,यही है विचार क्रांति – यही है मनुष्य में देवत्व का अवतरण ,यही है युगनिर्माण -नया  युग -नया  सवेरा। 

तो प्रस्तुत है आज का लेख : लेख 2 

शरीर के स्वार्थ और अपने स्वार्थ :

शरीर को बहाना भर माना, वस्तुओं को निर्वाह की भट्टी जलाने के लिए ईंधन भर समझा । महत्त्वाकांक्षाएं बड़ा आदमी बनने और झूठी वाहवाही लूटने की कभी भी नहीं उठीं । मन यही सोचता रहा हम आत्मा हैं, तो क्यों न आत्मोत्कर्ष के लिए, आत्म-कल्याण के लिए, आत्म-शान्ति के लिए और आत्म-विस्तार के लिए जियें ? शरीर और अपने को जब दो भागों में बाँट दिया, शरीर के स्वार्थ और अपने स्वार्थ अलग बाँट दिये तो वह अज्ञान की एक भारी दीवार गिर पड़ी और अँधेरे में उजाला हो गया । जो लोग अपने को शरीर मान बैठते हैं, इन्द्रिय तृप्ति तक अपना

आनन्द सीमित कर लेते हैं, वासना और तृष्णा की पूर्ति ही जिनका जीवन उद्देश्य बन जाता है, उनके लिए पैसा, अमीरी, बड़प्पन, प्रशंसा, पदवी पाना ही सब कुछ हो सकता है । वे आत्म-कल्याण की बात भुला सकते हैं और लोभ-मोह की सुनहरी हथकड़ी-बेड़ी भावपूर्वक पहने रह सकते हैं । उनके लिए श्रेय पथ पर चलने की सुविधा न मिलने का बहाना सही हो सकता है । अन्तःकरण की आकांक्षाएँ ही सुविधाएं जुटाती हैं । जब भौतिक सुख-सम्पत्ति ही लक्ष्य बन गया तो चेतना का सारा प्रयास उन्हें ही जुटाने लगेगा । 

उपासना  एक खिलवाड़ :

उपासना तो फिर एक हल्की-सी खिलवाड़ रह जाएगी । कर ली तो ठीक, न कर ली तो ठीक । लोग प्रायः उपासना को कौतूहल की दृष्टि से देखा करते हैं कि इसका भी थोड़ा तमाशा देख लें, कुछ मिलता है या नहीं । थोड़ी देर, अनमनी तबियत से, कुछ चमत्कार मिलने की दृष्टि से उलटी-पुलटी पूजा-पत्री चलाई तो उस पर विश्वास नहीं जमा, सो वह छूट गई । छूटनी भी थी। सच तो यह है कि श्रद्धा और विश्वास के अभाव में, जीवन उद्देश्य को प्राप्त करने की तीव्र लगन के अभाव में कोई भी आत्मिक प्रगति न कर सका । यह सब तथ्य हमें अनायास ही विदित थे, सो शरीर-यात्रा और परिवार व्यवस्था जमाये भर रहने के लिए जितना अनिवार्य रूप से आवश्यक था, उतना ही ध्यान उस ओर दिया । उन प्रयत्नों को “मशीन का किराया” भर चुकाने की दृष्टि से किया । अन्त:करण-लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तत्पर रहा सो भौतिक प्रलोभनों और आकर्षणों में भटकने की कभी जरूरत ही अनुभव नहीं हुई।

परमेश्वर का परम पवित्र निवासगृह :

जब अपना स्वरूप आत्मा की स्थिति में अनुभव होने लगा और अन्त:करण परमेश्वर का परम पवित्र निवासगृह दीखने लगा तो चित्त अन्तर्मुखी हो गया । सोचने का तरीका इतना भर सीमित रह गया कि परमात्मा के राजकुमार आत्मा को क्या करना, किस दिशा में चलना चाहिए। 

प्रश्न सरल थे और उत्तर भी सरल:

केवल उत्कृष्ट जीवन जीना चाहिए और केवल आदर्शवादी कार्य-पद्धति अपनानी चाहिए । जो इस मार्ग पर नहीं चले, उन्हें बहुत डर लगता है कि यह रीति-नीति अपनाई तो बहुत संकट आयेगा, न जाने कौन-सी गरीबी, तंगी, भर्त्सना (निंदा) और कठिनाई सहनी पड़ेगी । अपने को भी उपहास और भर्त्सना सहनी पड़ी । घर-परिवार के लोग ही सबसे अधिक आड़े आये । उन्हें लगा कि हमारी सहायता से जो भौतिक लाभ उन्हें मिलते या मिलने वाले हैं उनमें कमी आ जाएगी, सो वे अपनी हानि जिसमें समझते, उसे हमारी मूर्खता बताते थे, पर यह बात देर तक नहीं चली । अपनी आस्था ऊँची और सुदृढ़ हो तो झूठा विरोध देर तक नहीं टिकता । कुमार्ग पर चलने के कारण जो विरोध-तिरस्कार उत्पन्न होता है, वही स्थिर रहता है । नेकी अपने आप में एक विभूति है, जो स्वयं को तारती है और दूसरे को भी । विरोधी और निन्दक कुछ ही दिनों में अपनी भूल समझ जाते हैं और रोड़ा अटकाने के बजाय सहयोग देने लगते हैं । आस्था जितनी ऊँची और जितनी मजबूत होगी, प्रतिकूलता उतनी ही जल्दी अनुकूलता में बदल जाती है । परिवार का विरोध देर तक नहीं सहना पड़ा, उनकी शंका-कुशंका वस्तुस्थिति समझ लेने पर दूर हो गई । आत्मिक जीवन में वस्तुत: घाटे की कोई बात नहीं है । बाहरी दृष्टि से गरीब जैसा दिखने पर भी ऐसा व्यक्ति आत्मिक शान्ति और सन्तोष के कारण बहुत प्रसन्न रहता है । यह प्रसन्नता और संतुष्टि हर किसी को प्रभावित करती है और विरोधियों को सहयोगी बनाने में बड़ी सहायक सिद्ध होती है। अपनी कठिनाई ऐसे ही हल हुई। बड़प्पन की, लोभ-मोह-वाहवाही की एवं तृष्णा की हथकड़ी, बेड़ी कटी तो लगा कि अब बन्धनों से मुक्ति मिल गई । इन्हीं तीन जंजीरों में जकड़ा हुआ प्राणी इस भवसागर (  संसार रूपी समुद्र) में औंधे मुँह घसीटा जाता रहता है और अतृप्ति, उद्विग्नता (परेशानी ) की व्यथा-वेदना से कराहता रहता है । इन तीनों की तुच्छता समझ ली जाए और लिप्सा (इच्छा)  को श्रद्धा में बदल लिया जाए तो समझना चाहिए कि माया के बन्धन टूट गये और जीवित रहते ही मुक्ति पाने का प्रयोजन पूरा हो गया ।  

              “नजरें, तेरी बदली कि नजारा बदल गया” 

वाली उक्ति के अनुसार अपनी भावनाएँ आत्म-ज्ञान होते ही समाप्त हो गई और जीवन-लक्ष्य पूरा करने की आवश्यकता उँगली पकड़ कर मार्ग-दर्शन करने लगी । फिर न अभाव रहा, न असन्तोष I

यह शब्द परमपूज्य  गुरुदेव के लिखे हैं और हमें तो तब हैरानी हुई जब हमने इन पंक्तियों की रिसर्च की। 1951 की सुप्रसिद्ध बॉलीवुड फिल्म छोटी बहु में लता मंगेशकर ने यह गीत गया था और इस गीत में  कितनी भावना छिपी है।  यह सारा नज़र का ही तो खेल है। 

शरीर को जीवित भर रखने के लिए, सीमित साधनों से सन्तुष्ट रहने की शिक्षा देकर लोभ, लिप्सा की जड़ काट दी । मन उधर से भटकना बंद कर दे तो कितनी अपार शक्ति मिलती है और जी कितना प्रफुल्लित रहता है, यह तथ्य कोई भी अनुभव करके देख सकता है, पर लोग तो लोग ही ठहरे, तेल से आग बुझाना चाहते हैं । तृष्णा को दौलत से और वासना को भोग से तृप्त करना चाहते हैं । इन्हें कौन समझाये कि ऐसे प्रयास केवल दावानल ( वन की आग)  ही भड़का सकते हैं । इस पथ पर चलने वाला मृगतृष्णा में ही भटक सकता है । मरघट के प्रेत-पिशाच की तरह उद्विग्न ही रह सकता है, कुकर्म ही कर सकता है । इसे कौन समझाए , किसे समझाये ? समझने और समझाने वाले दोनों बिडम्बना मात्र करते हैं। सत्संग और प्रवचन बहुत सुने पर ऐसे ज्ञानी न मिले जो अध्यात्म के अन्तरंग में उतर कर अनुकरण की प्रेरणा देते । प्रवचन देने वाले के जीवन क्रम को उघाड़ा, तो वहाँ सुनने वालों से भी अधिक गन्दगी पायी । सो जी खट्टा हो गया । बड़े-बड़े सत्संग, सम्मेलन होते तो, अपना जी किसी को देखने-सुनने के लिए न करता । 

प्रकाश मिला तो अपने ही भीतर । आत्मा ने ही हिम्मत की और चारों ओर जकड़े पड़े जाल-जंजाल को काटने की बहादुरी दिखाई तो ही काम चला । दूसरों के सहारे बैठे रहते तो ज्ञानी बनने वाले शायद अपनी ही तरह हमें भी अज्ञानी बना देते । लगता है यदि किसी को प्रकाश मिलना होगा तो भीतर से ही मिलेगा । कम से कम अपने सम्बन्ध में तो यही तथ्य सिद्ध हुआ है । 

आत्मिक प्रगति में बाह्य अवरोधों के जो पहाड़ खड़े थे उन्हें लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा रखे बिना,

श्रेय-पथ पर लाने का दुस्साहस संग्रह किए बिना निरस्त नहीं किया जा सकता था, सो अपनी हिम्मत ही काम आई । जब अड़ गये तो सहायकों की भी कमी नहीं रही । गुरुदेव ( दादा गुरु )       से लेकर भगवान तक सभी अपनी मंजिल को सरल बनाने में सहायता देने के लिए निरन्तर आते रहे और प्रगति-पथ पर धीरे-धीरे किन्तु सुदृढ़ कदम आगे ही बढ़ते चले गये । अब तक की मंजिल इसी क्रम से पूरी हुई है।

क्रमशः जारी  (To be continued )

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् ,जय गुरुदेव  

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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा लेख 1

31 मई  2021 का ज्ञानप्रसाद –

29 मई वाले इंट्रोडक्टरी लेख में हमने आपके साथ वादा किया था कि  हम गुरुदेव की ऑटोबायोग्राफी (आत्म कथा ) पर लेखों  की शृंखला पर कुछ लेख प्रस्तुत करेंगें। सभी लेख “प्रज्ञावतार का कथामृत” शीर्षक पुस्तक  पर आधारित  होंगें।  तो प्रस्तुत है इस श्रृंखला का प्रथम लेख। लेख आरम्भ करने से पूर्व हम अपने पाठकों से दो बातें कहना चाहेंगें- 1 ) हमने प्रयास किया है कि  जहाँ तक हो सके  गुरुदेव की अपनी  लेखनी में ही प्रस्तुति की जाये ,केवल कठिन शब्दों को गूगल सर्च करके अनुवाद किया है ,सरल किया  है।   इस तरह का वातावरण चित्रित करने का प्रयास किया है  आप अनुभव करें कि आप केवल लेख ही नहीं पढ़ रहे हैं, परमपूज्य गुरुदेव  प्रतक्ष्य आपको शांतिकुंज प्रांगण में  सम्बोधन कर रहे हैं।  2 ) यूट्यूब की लिमिटेशन है कि इसमें बोल्ड ,अंडरलाइन ,कलर इत्यादि की सुविधा नहीं है और यह सम्बोधन ऐसा है कि कितने ही point  highlight करने वाले हैं। जो पाठक हमारी वेबसाइट से परिचित हैं उन्हें इस तरह की सुविधा वहां मिल सकती है। आप अपनी सुविधा अनुसार कहीं भी पढ़ें, कमेंट करके मार्गदर्शन अवश्य दें। 

तो चलते हैं लेख की ओर :

परमपूज्य गुरुदेव ने आत्मकथा क्यों नहीं लिखी :    

हमारे बहुत-से परिजन हमारी साधना और उसकी उपलब्धियों के बारे में कुछ अधिक जानना चाहते हैं और  यह स्वाभाविक भी है । हमारे स्थूल जीवन के जितने अंश  प्रकाश में आये हैं वे लोगों की दृष्टि में अद्भुत हैं । उनमें सिद्धियों, चमत्कारों और अलौकिकताओं की झलक देखी  जा सकती है । कौतूहल के पीछे उसके रहस्य जानने की  उत्सुकता छिपी रहनी स्वाभाविक है, सो अगर परिजन हमारी आत्म-कथा जानना चाहते हैं और उसके लिए इन दिनों विशेष रूप से दबाव देते हैं तो उसे अकारण नहीं कहा जा सकता ।

यों हम कभी छिपाव के पक्ष में नहीं रहे, दुराव, छल, कपट हमारी आदत में नहीं, पर इन दिनों हमारी एक विवशता है कि जब तक रंग-मंच पर प्रत्यक्ष रूप से अभिनय चल रहा है, तब तक वास्तविकता बता देने पर दर्शकों का आनन्द दूसरी दिशा में मुड़ जाएगा और जिस कर्तव्यनिष्ठा को सर्व-साधारण में जगाना चाहते हैं, वह प्रयोजन पूरा न हो सकेगा । लोग रहस्यवाद के जंजाल में उलझ जाएँगे, इससे हमारा व्यक्तित्त्व भी विवादास्पद बन जाएगा और जो करने-कराने हमें भेजा गया है, उसमें भी हमें अड़चन पड़ेगी । निस्सन्देह हमारा जीवनक्रम अलौकिकताओं (super- 

natural)  से भरा पड़ा है । रहस्यवाद के पर्दे इतने अधिक हैं कि उन्हें समय से पूर्व खोला जाना अहितकर ही होगा । अतः पीछे वालों के लिए उसे छोड़ देते हैं कि वस्तुस्थिति की सच्चाई को प्रामाणिकता की कसौटी पर कसें और जितनी हर दृष्टि से परखी जाने पर सही निकले उससे यह अनुमान लगायें कि अध्यात्म विद्या कितनी समर्थ और सारगर्भित ( प्रभावकारी )  है । उस पारस से छूकर एक नगण्य-सा व्यक्ति अपने लोहे जैसे तुच्छ कलेवर को स्वर्ण जैसा बहुमूल्य बनाने में कैसे समर्थ, सफल हो सका ? इस दृष्टि से हमारे जीवनक्रम में प्रस्तुत हुए अनेक रहस्यमय तथ्यों की समय आने पर शोध की जा सकती है और उस समय उस कार्य में हमारे अति निकटवर्ती सहयोगी कुछ सहायता भी कर सकते हैं, पर अभी वह समय से पहले की बात है । इसलिए उस पर वैसे ही पर्दा पड़ा रहना चाहिए, जैसे कि अब तक पड़ा रहा है ।

हमारा साधनाक्रम कैसे चला ?

आत्मकथा लिखने के आग्रह को केवल इस अंश तक पूरा कर सकते हैं कि हमारा साधनाक्रम कैसे चला ? वस्तुतः हमारी सारी उपलब्धियाँ प्रभु-समर्पित साधनात्मक जीवन-प्रक्रिया पर ही अवलम्बित हैं । उसे जान लेने से इस विषय में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति को वह रास्ता मिल सकता है जिस पर चलकर आत्मिक प्रगति और उससे जुड़ी हुई विभूतियाँ प्राप्त करने का आनन्द लिया जा सकता है । पाठकों को अभी इतनी ही जानकारी हमारी कलम से मिल सकेगी, सो उतने से ही इन दिनों सन्तोष करना पड़ेगा। 60  वर्ष के जीवन में से 15  वर्ष का आरम्भिक बालजीवन कुछ विशेष महत्त्व का नहीं है । शेष 45  वर्ष हमने आध्यात्मिकता के प्रसंगों को अपने जीवनक्रम में सम्मिलित करते हुए बिताये हैं । पूजा-उपासना का, उस प्रयोग में एक बहुत छोटा अंश रहा है । 24  वर्ष तक 6 घण्टे रोज की “गायत्री उपासना” को उतना महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए जितना कि मानसिक परिष्कार और भावनात्मक उत्कृष्टता के अभिवर्द्धन (विकसित रूप में लाना ) के प्रयत्नों को । यह माना जाना चाहिए कि यदि विचारणा और कार्य-पद्धति को परिष्कृत न किया गया होता तो उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते जिस तरह कि अनेक पूजापत्री तक सीमित मन्त्र-तन्त्रों का ताना-बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली हाथ रहना पड़ता है । हमारी जीवन-साधना को यदि सफल माना जाए और उसमें दीखने वाली अलौकिकता को खोजा जाए तो उसका प्रधान कारण हमारी “ अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाए ।” पूजा-उपासना को गौण (जिसका महत्व कम हो ) समझा जाए । आत्म-कथा के एक अंश को लिखने का दुस्साहस करते हुए हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्म-शोधन में लगा है । उपासना जो बन पड़ी है, उसे भी हमने भावपरिष्कार के प्रयत्नों के साथ पूरी तरह जोड़ रखा है । 

अब आत्मोद्घाटन के साधनात्मक प्रकरण पर प्रकाश डालने वाली कुछ चर्चाएँ पाठकों की जानकारी के लिए प्रस्तुत करते हैं

साधनात्मक जीवन की तीन सीढ़ियाँ हैं । तीनों पर चढ़ते हुए एक लम्बी मंजिल पार कर ली गई। मातृवत् परदारेषु  परद्रव्येषु लोष्ठवत् की मंजिल सरल थी वह अपने आप से सम्बन्धित थी । इन शब्दों के अर्थों को समझने के लिए  चाणक्य  के सुप्रसिद्ध श्लोक का अर्थ बताना अत्यंत आवश्यक है : 

अन्य व्यक्तियों की स्त्रियों को माता के समान समझे, दूसरें के धन पर नज़र न रखे, उसे पराया समझे और सभी लोगों को अपनी तरह ही समझे”

लड़ना अपने से था, सँभालना अपने घर को था, सो पूर्व जन्मों के संस्कार और समर्थ गुरु की सहायता से इतना सब आसानी से बन गया । मन न उतना दुराग्रही था, न दुष्ट, जो कुमार्ग पर घसीटने की हिम्मत करता । यदा-कदा उसने इधर-उधर भटकने की कल्पना भर की, पर जब प्रतिरोध का डण्डा जोर से सिर पर पड़ा तो सहम गया और चुपचाप सही राह पर चलता रहा । मन से लड़ते-झगड़ते, पाप और पतन से भी बचा लिया गया । अब जबकि सभी खतरे टल गए, तब सन्तोष की साँस ले सकते हैं । दास कबीर ने झीनी-झीनी बीनी चदरिया, जतन से ओढ़ी थी और बिना दाग-धब्बे ज्यों की त्यों वापस कर दी थी । परमात्मा को अनेक धन्यवाद कि जिसने उसी राह पर हमें भी चला दिया और उन्हीं पद-चिह्नों को ढूँढ़ते-तलाशते उन्हीं आधारों को मजबूती के साथ पकड़े हुए उस स्थान तक पहुँच गये, जहाँ लुढ़कने और गिरने-मरने का खतरा नहीं I इस दोहे में कबीर   इस शरीर को, आत्मा की चादर कहते हुए, गाते हैं कि ये चादर बड़ी महीन बुनी हुई है  और जुलाहे ने बुना था निर्मल इसे, संसार से लिए गुण-दोषों के बिना। 

अध्यात्म की कर्म-काण्डात्मक प्रक्रिया बहुत कठिन नहीं होती । संकल्प-बल मजबूत हो, श्रद्धा और निष्ठा की मात्रा कम न पड़े तो मानसिक उद्विग्नता नहीं होती और शान्तिपूर्वक मन लगने लगता है और उपासना के विधिविधान भी गड़बड़ाये बिना अपने ढरें पर चलते रहते हैं। मामूली दुकानदार सारी जिन्दगी एक ही दुकान पर, एक ही डर से पूरी दिलचस्पी के साथ काट लेता है । न मन ऊबता है, न अरुचि होती है । पान, सिगरेट के दुकानदार 12-14  घण्टे अपने धन्धे को उत्साह और शान्ति के साथ आजीवन करते रहते हैं, तो हमें 6-7  घण्टे प्रतिदिन की गायत्री साधना 24  वर्ष तक चलाने का संकल्प तोड़ने की क्या आवश्यकता पड़ती । मन उनका उचटता है जो उपासना को पान-बीड़ी के, खेती बाड़ी के, मिठाई-हलवाई के धन्धे से भी कम आवश्यक या कम लाभदायक समझते हैं, बेकार के अरुचिकर कामों में मन नहीं लगता। उपासना में ऊबने और अरुचि की अड़चन उन्हें आती है जिनकी आन्तरिक आकांक्षा भौतिक सुख सुविधाओं को सर्वस्व मानने की है । जो पूजा-पत्री से मनोकामनाएं पूर्ण करने की बात सोचते रहते हैं, उन्हें ही प्रारब्ध और पुरुषार्थ की न्यूनता के कारण अभीष्ट वरदान न मिलने पर खीज होती है । आरम्भ में भी आकांक्षा के प्रतिकूल काम में उदासी रहती है । यह स्थिति दूसरों की होती है, सो वे मन न लगने की शिकायत करते रहते हैं। 

तो मित्रो आज के  लेख को  यहीं पर विराम देते हैं।  हमने आपकी आशाओं पर उतरने का सम्पूर्ण प्रयास किया है, कितना उत्तीर्ण हुए  हम नहीं जानते लेकिन  विश्वास करते हैं कि  आप खुद ही मूल्यांकन करके हमें अपने कमैंट्स के द्वारा बता देंगें।  इस लेख को और आने वाले लेखों को इस प्रकार पढ़ा जाये जैसे  एक परीक्षार्थी परीक्षा के लिए तैयारी  करता है तभी आप आनंदविभोर हो सकेंगें। 

क्रमशः जारी ( To be continued )

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कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् ,जय गुरुदेव

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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा पर लेखों की शृंखला पर Introductory लेख

29 मई 2021 का ज्ञानप्रसाद – परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा पर लेखों की शृंखला पर Introductory लेख
हमारी बहुत ही इच्छा थी कि परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा (ऑटोबायोग्राफी ) पढ़ी जाये,आपके समक्ष प्रस्तुत की जाये, लेख लिखे जाएँ लेकिन जहाँ तक हमारी स्मरणशक्ति और विवेक कार्य करते हैं ” हमारी वसीयत और विरासत ” शीर्षक से पुस्तक में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। गुरुदेव के सबसे प्रिय शिष्य पंडित लीलापत शर्मा जी द्वारा लिखी पुस्तक ” पूज्य गुरुदेव के मार्मिक संस्मरण ” में यह विवरण आता है कि पंडित जी ने कई बार गुरुदेव को अपनी आत्मकथा लिखने का आग्रह किया लेकिन गुरुदेव हर बार टालते ही रहे। गुरुदेव यही कह कर टालते रहे -मैं तो एक साधारण पुरष हूँ मेरी क्या आत्मकथा लिखनी ? एक बार पंडित जी ने बहुत ज़िद की तो गुरुदेव कहने लगे “मैंने क्या आत्मकथा लिखनी है ,अब तो आप ही लिखोगे। ” पंडित जी लिखते हैं कि उस युगदृष्टा ने मुझसे यह कार्य करवाना था और करवा ही लिया।

हम अपने पाठकों को ,ऑनलाइन ज्ञानरथ के सहकर्मियों को सप्रेम कहना चाहेंगें कि आज से हम परमपूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व पर, गुरुदेव के जीवन पर लेखों की एक श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। इस श्रृंखला का प्रत्येक लेख आपको मार्गदर्शन तो देगा ही, आपके दिन -प्रतिदिन के जटिल प्रश्नों के उत्तर देने में भी सहायक होगा। ऐसे प्रश्न जिन्हे हमारे परिजन कई बार हमसे पूछ चुके हैं ,हमने अपनी अल्प -बुद्धि के अनुसार उन प्रश्नों का निवारण भी किया होगा। लेकिन अब आपको यह अमृतपान -ज्ञानपान परमपूज्य गुरुदेव के अपने ही शब्दों में ,अपनी ही लेखनी से पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त होगा। उदाहरण के लिए एक प्रश्न कल ही हम से पूछा गया ” साधना में मेरा मन लगता नहीं है ,भटकन बहुत ही होती है ,गायत्री माता की तीन माला करता हूँ ,क्या इस संख्या को बढ़ा कर 6 कर दूँ ” , करुणा की ,स्नेह की ,अपनत्व की बातें जो हम आपके साथ प्रतिदिन कर रहे हैं ,ऋद्धि और सिद्धि में क्या अंतर् है ,इत्यादि। इस तरह के प्रश्नों के सटीक उत्तर आने वाले लेखों में आपको मिलने वाले हैं। हम अपना पूर्ण प्रयास करेंगें कि इन लेखों को सरल से सरल शब्दावली प्रयोग करते हुए ,गुरुदेव की भावना को ध्यान में रखते हुए आपके समक्ष प्रस्तुत करें।Scan version में मात्र 18 पन्नों की पुस्तिका “प्रज्ञावतार का कथामृत” एक पुस्तक न होकर अमृतपान है। आने वाले लेख इस पुस्तिका पर आधारित होंगें।

तो आइये जाने इस पुस्तक के बारे में :
परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने परिजनों के आग्रह के बावजूद 1970-71 तक कभी भी अपने जीवन के अन्तरंग पक्षों को सबके समक्ष उजागर नहीं होने दिया । उनका जीवन इतना सरल, इतना पारदर्शी था कि सभी उन्हें अपना अभिन्न और आत्मीय स्वजन मानते थे । वे कौन हैं ? क्या हैं ? कितना बड़ा संकल्प अपने साथ लेकर आए हैं ? यह वही समझ पाया जिसने उनके साहित्य का मनन किया, उनकी प्राणचेतना ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका का मनोयोगपूर्वक स्वाध्याय किया । पूज्य गुरुदेव ने अपने जैसा ही अपनी सहधर्मिणी माता भगवती देवी को भी ढाल लिया एवं दोनों की हर श्वास लोकहित में ही समर्पित होती रही । दोनों ने मिलकर जिस वटवृक्ष के बीजांकुर की स्थापना एक मिशन के रूप में की, अब वह विशाल रूप लेकर समाज में सबके समक्ष सबकी दृष्टि में आ गया है ।
गायत्री व यज्ञ की धुरी पर तपोमय एवं ब्राह्मणत्व भरा जीवन जीकर सारे समाज के ढाँचे को कैसे जर्जर स्थिति से नये भवन के रूप में खड़ा किया जा सकता है इसका नमूना हमारे परिजन-पाठकगण आने वाले लेखों में भली-भाँति पा सकेंगे । स्थान-स्थान पर घटनाक्रमों के माध्यम से उनकी करुणा भरे अन्त:करण की झलक-झाँकी देखी जा सकती है तो कहीं-कहीं पर दुष्प्रवृत्तियों, मूढमान्यताओं से मोर्चा लेने वाले योद्धा का दर्शन भी किया जा सकता है ।
इस पुस्तक में परमपूज्य गुरुदेव के पूरे जीवनवृत्त को विभिन्न खण्डों में बाँटा है । इनमें से कई घटनाक्रम कई स्थानों पर भिन्न-भिन्न शब्दावली में वर्णित मिल सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि यह अनावश्यक ‘रिपीटिशन’ है । इससे बचा नहीं जा सकता था । इसके बिना उस स्थान पर समझाये जा रहे प्रसंग को भली-भांति आत्मसात किया नहीं जा सकता । उदाहरणार्थ-सहस्रकुण्डी यज्ञ मथुरा (1958 ) का विवरण, दादागुरु से भेंट-साक्षात्कार, युग-परिवर्तन सम्बन्धी घोषणाएँ, उनकी हिमालय यात्राएँ, सूक्ष्मीकरण से जुड़े गुह्य (गुप्त ) प्रसंग स्थान-स्थान पर भिन्न-भिन्न शब्दावलियों में आए हैं । उन्हें उस प्रसंग विशेष के साथ पढ़कर समझने का प्रयास किया जाय । ‘क्रोनोलॉजीकल’ क्रम अर्थात् समयावधि के अनुसार जीवनी उसी की लिखी जा सकती है, जिसके जीवन के साथ बहुमुखी विलक्षणताएँ न जुड़ी हों ।

” किन्तु यदि किसी ने पाँच-पाँच जीवन एक साथ जिए हों, अस्सी वर्ष में स्वयं आठ सौ वर्षों का कार्य एकाकी करके रख दिया हो, नितान्त असम्भव पुरुषार्थ अपनी सहधर्मिणी शक्तिस्वरूपा माता वन्दनीया भगवती देवी शर्मा से सम्पन्न करवा लिया हो एवं दोनों एक प्राण होकर एक मिशन के रूप में लाखों सूजन शिल्पियों के समुदाय को अपनी मानस संततियों के रूप में जन्म देकर अभूतपूर्व कार्य सम्पन्न कर दिया हो एवं वह कार्य अभी भी दोनों सत्ताओं के महाप्रयाण के बाद निरन्तर बढ़ता ही जा रहा हो, शिष्य समुदाय एक विराट जनसमुदाय का रूप लेता चला जा रहा हो, तब उनका जीवनक्रम कैसे समयावधि में बाँधकर लिखा जा सकता है ।”

इसी कारण पाठकगण स्थान-स्थान पर इस समय काल-सीमा के बंधन को तोड़कर इस जीवनक्रम को एक कथामृत के रूप में पढ़ें तो वस्तुत: वह लाभ ले पायेंगे जो भगवत्कथामृत का पान करने से मिलता है।
परमपूज्य गुरुदेव ने 1970 -71 में विदाई की वेला में जब वे गायत्री तपोभूमि, मथुरा छोड़कर हिमालय प्रस्थान कर रहे थे, अपनी अन्त:वेदना अपने सम्पादकीय ‘अपनों से अपनी बात’ में व्यक्त की है । “हमारी जीवन-साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू” नाम से पहली बार आत्मकथा प्रधान लेखनी उन्होंने जनवरी, 1971 की अखण्ड-ज्योति पत्रिका में चलाई । इसी नाम से ‘अपनों से अपनी’ बात लिखी गयी तथा फरवरी, 1971 की अखण्ड-ज्योति पत्रिका में उन्होंने “हमारे दृश्यजीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ” नाम से इसका उत्तरार्द्ध लिखा । यह दोनों लेखों को, जिन्हें संकलित कर इस पुस्तिका में दिया गया है , पढ़कर कोई भी उस संत, आत्मज्ञानी, सिद्धपुरुष के अन्त:करण को, उनकी व्यथा को अनुभूत कर सकता है । समग्र जीवन-वृत्तान्त तो उन्होंने दार्शनिक शैली में जून, 1984 की ‘अखण्ड-ज्योति’ के विशेषांक के रूप में तथा बाद में अप्रैल, 1985 की अखण्ड-ज्योति के जीवनगाथा विशेषांक के रूप में सूक्ष्मीकरण की अवधि में लिखा । यही सब संकलितसम्पादित होकर उनकी आत्म-कथा ‘हमारी वसीयत और विरासत’ के रूप में सामने आया, किन्तु इससे भी पूर्व “चमत्कारों भरा जीवनक्रम एवं उसका मर्म” नाम से एक लेख-माला वे दोनों विशेषांकों के बीच की अवधि में फरवरी व मार्च, 1985 में लिख चुके थे । परिजनों का दबाव था कि बाल्यकाल से अब तक के जीवनवृत्त को विस्तार से दिया जाए, तब अप्रैल, 1985 का अंक लिखा गया । परमपूज्य गुरुदेव के जीवनवृत्त को समग्र रूप से समझने से पूर्व उपर्युक्त चार लेख पढ़ लेना अत्यधिक अनिवार्य है ताकि उनके सांगोपांग स्वरूप को समझा जा सके । विधिवत जीवनवृत्त आरम्भ करने से पूर्व इसलिए हम उनके जीवन से जुड़े, उनकी लेखनी से लिखे गए ये लेख अविकल उसी रूप में दे रहे हैं, ताकि उस विराट व्यक्तित्व के अन्तराल में छिपी उस आत्मसत्ता का दिग्दर्शन ( किसी का परिचय देने की क्रिया) किया जा सके, उनकी संवेदनाओं, उनके मूलभूत चिन्तन के घनीभूत रूप मिशन को समझा जा सके ।

हम समझ सकते हैं कि हमारे सहकर्मी उपर्लिखित पंक्तियों में कुछ उलझन अनुभव कर रहे होंगें परन्तु ऐसी बात नहीं है ,सब कुछ बहुत ही straightforward है ,हमने कई बार इन्हे पढ़ कर ,अखंड ज्योति पत्रिका के वोह वाले अंक जिनका यहाँ वर्णन है चेक किये हैं। हमारा प्रयास सदैव रहता है कि सरलता तो की जाये लेकिन तथ्य सम्पूर्णतया सुरक्षित रहें। इसी तर्क को ध्यान में रखते हुए पिछले कई दिनों से हमारी रिसर्च इस दिशा में चल रही थी।
तो लेखों के परिपेक्ष में इन्ही introductory शब्दों के साथ अपनी वाणी को विराम देते हैं और कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। हमारे सभी सहकर्मी अत्यंत श्रद्धा और परिश्रम के साथ अपने ऑनलाइन ज्ञानरथ में योगदान दे रहे हैं तो हम चाहेगें कि एक दिन का अवकाश किया जाये। तो भारतीय समयसारणी के अनुसार रविवार की सुबह कोई लेख नहीं होगा, इस श्रृंखला का प्रथम लेख हम सोमवार की सुबह प्रस्तुत करेंगें। कल वाले लेख पर 555 कमेंट संख्या ( लेख पोस्ट होने समय ) सभी का आभार।
धन्यवाद् ,जय गुरुदेव

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परमपूज्य गुरुदेव पर घातक हमला-April 1986

27 मई 2021 का ज्ञानप्रसाद – परमपूज्य गुरुदेव पर घातक हमला
मित्रो आज का लेख गुरुदेव के ऊपर एक घातक हमले को वर्णित करता है। आप में से बहुतों ने इस हमले के बारे में पढ़ा होगा लेकिन यह विवरण परमपूज्य गुरुदेव के शिष्य आदरणीय जगदीश चंद्र पंत द्वारा लिखित पुस्तक
“Pandit Sriram Sharma Acharya as I Knew Him ” पर आधारित है।

अप्रैल 1986 में एक ऐसी घटना घटी जिसके संकेत परमपूज्य गुरुदेव पहले से ही शांतिकुंज के परिजनों को दे चुके थे। यह वोह घटना थी जिसमें गुरुदेव पर एक हत्यारे ने हमला किया था। गुरुदेव ने अपने निकट के सभी परिजनों को यह भाव व्यक्त किया कि वे शांति कुंज में प्रवेश करने वाले सभी लोगों के प्रति पर्याप्त सावधानी नहीं बरत रहे हैं। वह यहां तक ​​कह चुके था कि किसी दिन, दिन के उजाले में उन पर हमला किया जाएगा और जब तक यह सब खत्म नहीं हो जाता, तब तक किसी को इसकी भनक नहीं लगेगी। यह सब ऐसे ही हुआ। हमलावर सुबह करीब 11 बजे उनके कमरे में दाखिल हुआ और उनके पैर छूने के बाद, शरीर के महत्वपूर्ण हिस्सों जैसे हृदय, गुर्दे आदि पर अपने हमलों को लक्षित करने के लिए एक लंबे नुकीले खंजर से उन पर हमला करने लगा। गुरुदेव ने चतुराई से अपने बाएं हाथ से, ज़ोर से वार किया ताकि लेखन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले दाहिने हाथ को चोट न पहुंचे। दरअसल उन्होंने अपने बाएं हाथ से खंजर के ब्लेड को पकड़ लिया और हमलावर की पकड़ से छीन लिया , हमलावर को बड़ा आश्चर्य हुआ। ऐसा प्रतीत होता है कि हमलावर के लक्षित हमलों में प्रशिक्षिण के बावजूद गुरुदेव के युद्धाभ्यास भारी पड़ गए । 76 वर्ष के एक व्यक्ति के बाएं हाथ की शक्ति ने एक प्रशिक्षित युवा हत्यारे के दाहिने हाथ की पाशविक शक्ति को प्रबल कर दिया था। इसमें कोई संदेह नहीं है कि महाकाल भी हत्यारे की योजनाओं को विफल करने के लिए वहां रहे होंगे, क्योंकि गुरुदेव अक्सर टिप्पणी करते थे कि उन्हें पांच साल के लिए विस्तार ( एक्सटेंशन ) दिया गया था, जैसे सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों को अपने आप को अपरिहार्य साबित करने पर विस्तार दिया जाता है। हत्यारा दहशत में था और गुरुदेव ने उस पर चिल्लाकर कहा:

” जितनी जल्दी हो सके, दूर हो जाओ अन्यथा वह परिजनों द्वारा मार डाला जाएगा।”

हालाँकि, हमलावर के भाग जाने के बाद, हत्यारे को भगाने के उद्देश्य से गुरुदेव के चिल्लाने की आवाज सुनकर परिजन उनके कमरे में घुसने लगे और उन्हें खून से लथपथ पाकर चौंक गए।यहाँ पर एक बात देखने वाली है : हत्यारा परमपूज्य गुरुदेव को जान से मारने आया था लेकिन उन्होंने उसे भी बचाने का प्रयास किया और चिल्लाकर उसे भागने को कहा ” धन्य हैं हमारे पूज्यवर “
अब आगे :
कुछ परिजन जो डॉक्टर थे और अन्य जो हरिद्वार में प्रैक्टिस कर रहे थे उन्हें बुलाया गया । गुरुदेव का बायां हाथ और हथेली कई जगहों पर बुरी तरह से कटे हुए थे। उसका हृदय क्षेत्र , पेट और गुर्दे हमलावर से छूट गए थे। यह एक मेडिको लीगल केस था और औपचारिक पुलिस रिपोर्ट दर्ज की गई। जब प्राथमिक उपचार दिया जा रहा था डॉक्टरों ने अपनी रिपोर्ट लिखना शुरू कर दिया। गुरुदेव ने जहां कहीं भी आवश्यक होता , डॉक्टरों के ऑपरेशन से पहले कोई इंजेक्शन या रक्त आधान ( blood transfusion ) और साथ ही किसी भी anesthesia इंजेक्शन लेने से इंकार कर दिया। गुरुदेव हंसते रहे और उस वीभत्स ( घ्रणित ) घटना पर प्रकाश डालते रहे ताकि उनकी सुरक्षा में लापरवाही बरतने वाले परिजनों की दोषी चेतना को दूर किया जा सके। यहाँ भी गुरुदेव उनको बचाते रहे जिन्होंने शायद लापरवाही की थी।

जगदीश जी को इस घटना की खबर लखनऊ में श्री लीलापत शर्मा जी और गुरुदेव के पुत्र श्री मृत्युंजय शर्मा जी से मिली जो उसी शाम दिलकुशा कॉलोनी में उनके आवास पर आए थे। परिवार में सभी निशब्द हो चौंक से गए और जगदीश जी जानना चाहते थे कि वास्तव में वह क्या कर सकते हैं । लीलापत जी और मृत्युंजय जी ने
कहा कि वे इस मामले में उचित और गहन पुलिस जांच के साथ-साथ शांति कुंज के आसपास उचित सुरक्षा व्यवस्था चाहते हैं। जगदीश जी अपनी पुस्तक में लिखते हैं:

” मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैंने क्या किया, लेकिन मैंने गृह सचिव और पुलिस अधिकारियों को अवश्य ही फोन किया होगा। मैंने अगले दिन शाम की ट्रेन से तुरंत शांति कुंज जाने का फैसला किया। घटना के बाद तीसरे दिन हरिद्वार पहुंच गया।”

गुरुदेव अपने सामान्य हंसमुख स्वभाव के थे लेकिन माताजी को जब बुलाया और अपना सामान्य प्रणाम किया तो वह रो रही थीं । जगदीश जी भी रोने लगे, यह कहते हुए कि “गुरुदेव जैसे संत को अंडरवर्ल्ड के उन लोगों से
ऐसे हमले झेलने पड़ रहे हैं जिन्हें युग निर्माण मिशन से खतरा महसूस हुआ।” शांति कुंज में हर कोई अपनेआप को इस लापरवाही के लिए दोषी महसूस कर रहा था। शांति कुंज के आमतौर पर जोश भरे माहौल में एक भयानक सन्नाटा सा छा गया था । गुरुदेव ने चतुराई से अपना दाहिना हाथ बचा लिया था और अपनी चोट के बावजूद उन्होंने हर दिन सुबह छह घंटे लिखने की अपनी दिनचर्या जारी रखी और शांति कुंज आने वाले सभी लोगों से मुलाकात की, उनके संदेह और मानसिक अंधकार को दूर किया। ऐसी थी उनकी महानता!!

गुरुदेव ने इस घटना को सभी संबंधितों को एक संकेत देने के लिए चुना : संकेत यह था कि वह अब केवल उन्ही लोगों से मिलेंगे जिनसे वह मिलना चाहते हैं और अन्य जो केवल एहसान चाहते हैं, वे मंदिर जैसी दो संरचनाओं, “छत्रियों” के दर्शन कर सकते हैं। शांति कुंज के मुख्य द्वार पर स्थित इन दो मंदिरों को छतरियां कह कर संबोधित किया जाता था। एक गुरुदेव का “प्रखर प्रज्ञा” के रूप में, दूसरा वंदनिया माता जी का “सजल श्रद्धा” के रूप में प्रतिनिधित्व करता है। गुरुदेव ने कहा, “जहां तक ​​संभव हो किसी भी समस्या के समाधान की सुविधा प्रदान की जाएगी।” इस तरह उन्होंने अपना कीमती समय बचाने की कोशिश की, जो कि एहसान के साधकों द्वारा लिया गया था। यह ऐसे साधक थे जो शांति कुंज में केवल कुछ एहसान यां चमत्कार की भावना से आते थे । सच्चे लोगों को गुरुदेव के पास तुरंत पहुँच मिली और इस प्रकार गुरुदेव ने ऐसे सच्चे व्यक्तियों की मदद करने का फैसला किया जिन पर मिशन के लिए कुछ उपयोगी काम करने के लिए भी निर्भर किया जा सकता था। उनका कहना था कि महाकाल ने उन्हें पांच साल का सेवा विस्तार ( extension in service ) दिया था, जो वह चाहते हैं मिशन के काम के लिए पूरी तरह से उपयोग करें। चूँकि कुछ लोग गुरुदेव की एक झलक देखना चाहते थे,इसलिए यह व्यवस्था की गई थी कि “अखंड दीप ” के दर्शन के लिए सुबह की कतार उन्हें रास्ते में एक निश्चित खिड़की पर अपनी मेज पर लिखते हुए देख सकती थी। जगदीश जी को अधिकतम 2 -3 घंटे का समय दिया गया जब वह हर दो माह बाद लखनऊ से मसूरी जाते रास्ते में शांति कुंज का दौरा करते थे ।
इति
जय गुरुदेव
सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा और नई उमंग लेकर आए। जय गुरुदेव परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित


जगदीश चंद्र पंत: एक संक्षिप्त परिचय
जगदीश चंद्र पंत जी का जन्म 4 दिसंबर,1937 को अल्मोड़ा में एक पहाड़ी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। अल्मोड़ा एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र है और अब एक जिला मुख्यालय है, कभी कुमाऊं क्षेत्र की राजधानी हुआ करता था । अल्मोड़ा का सम्बन्ध स्वामी विवेकानंद जी से भी है। जगदीश जी ने अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा मसूरी में की और बीएससी और एमएससी डिग्री के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय जिसे “ईस्ट का ऑक्सफोर्ड ” का सम्मान प्राप्त है , की तरफ प्रस्थान किया। जून 1961 में यूपी कैडर में आईएएस में शामिल हुए और उत्तर प्रदेश राज्य सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर राज्य सरकार के प्रमुख सचिव के रूप में कार्य किया। बाद में भारत सरकार में अतिरिक्त सचिव के रूप में , फिर विशेष सचिव और सचिव के रूप में कार्य किया। कृषि और सहकारिता विभाग (डीएसी), स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में सचिव के रूप में भी कार्यरत रहे जहां से वे 31 दिसंबर, 1996 को सेवानिवृत्त हुए। भारत सरकार के कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में जगदीश जी का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। सेवानिवृति के पश्चात् “ऋचा ” नामक Research and Extension Association for Conservation Horticulture and Agro-forestry,( REACHA ) एक गैर सरकारी स्वयंसेवी संगठन के संस्थापक आदरणीय पंत जी आजकल दिल्ली में रहते हैं। ऋचा का अर्थ वेदों के लेखन ,भजन आदि होता है। कुछ समय पूर्व हमने जगदीश जी से और उनके पुत्र निखिल जी से जीमेल से और वाहट्सएप्प पर सम्पर्क किया तो पता चला कि सर्जरी के बाद वह स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं। हमने उनसे निवेदन किया कि आपकी पुस्तक अंग्रेजी में है और हमारे ऑनलाइन ज्ञानरथ कि रीडरशिप हिंदी भाषी है तो उन्होंने पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिया। लेकिन हमने सर्जरी और स्वास्थ्य को देखते हुए स्वयं अपने विवेक से अनुवाद करके यह एक लेख लिखने का प्रयास किया है ,हम कितना सफल हो पाएं है यह तो हमारे समर्पित पाठक ही बता सकते हैं। हम आशा करते हैं कि हमारे आने वाले लेखों में आदरणीय पंत जी सहयोग करेंगें, हम और नवीन कंटेंट आपके समक्ष प्रस्तुत कर सकेंगें

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26 मई 2021 का ज्ञानप्रसाद – अपने सहकर्मियों से दो आशाएं

26 मई 2021 का ज्ञानप्रसाद – अपने सहकर्मियों से दो आशाएं
हमारे सभी बच्चों और वरिष्ठ सहकर्मियों को ह्रदय से नमन,साधुवाद और अपना कार्य पूरी निष्ठां से सम्पन्न करने के लिए शाबाशी। आज के ज्ञानप्रसाद में हम आपको स्मरण कराने का प्रयास करेंगें परमपूज्य गुरुदेव का महाप्रयाण दिवस 2 जून,1990 का दिन। वर्ष 1990 की गायत्री जयंती 2 जून को थी लेकिन इस वर्ष गायत्री जयंती 21 जून को आ रही है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार से कुछ अपेक्षाएं हैं ,आशाएं हैं। पिछले वर्ष हमने गायत्री यज्ञ की तीन वीडियो अपलोड कीं – आप पूछेंगें तीन वीडियो अपलोड करने का क्या औचित्य था। इस भागदौड़ की दुनिया में हर कोई अपनी समर्था और समय को ध्यान में रख कर कार्य करता है। सबसे बड़ी वीडियो 73 मिंट की थी और सबसे छोटी 17 मिंट की थी। सबसे छोटी वाली वीडियो को 115000 लोगों ने देखा और सबसे बड़ी वाली को 22000 लोगों ने देखा। तो आप देख सकते हैं कि समय का कितना अधिक महत्व है। हमें याद है कि हमारे सहकर्मियों ने सुझाव दिया था कि अगर ज्ञानरथ में कुछ दिन कार्य बंद भी करना पड़े तो आप वीडियो पर ध्यान केंद्रित करें। उड़ीसा से हमारे बहुत ही वरिष्ठ सहकर्मी आदरणीय जसोदा सिंघानिया जी और नैरोबी अफ्रीका से आदरणीय विद्या परिहार जी का मार्गदर्शन बहुत ही काम आया था। कार्य था भी बहुत कठिन। यज्ञ के दौरान एक-एक मन्त्र के उच्चारण को समझना, उसको हिंदी में समझाना और साथ -साथ में लिखित रूप में display होना एक अद्भुत कार्य था। अखिल विश्व गायत्री परिवार शांतिकुंज द्वारा प्रकाशित pdf पुस्तकों में से मन्त्रों के फोटो प्रिंट लेकर ,मन्त्रों के उच्चारण के साथ -साथ attach करना कोई सरल कार्य नहीं था लेकिन परमपूज्य गुरुदेव ने यह करवाना था इसलिए हो गया। अब देख कर हैरानगी होती है कि यह सब कैसे सम्भव हुआ। ऐसी ही तो होती है गुरु -शक्ति, असम्भव को सम्भव करने वाली। तो आप सभी से एक निवेदन यह है कि इन तीनो वीडियो को देख कर, अपना कर्तव्य समझ कर प्रचार-प्रसार करें ताकि 21 जून तक अधिक से अधिक लोग इन वीडियो का लाभ उठा सकें। हम इतने दिन पूर्व इस प्रयास को इसलिए कर रहे हैं कि आने वाले प्रश्नों के उत्तरों का रिप्लाई कर सकें और उस दिन कोई भी श्रद्धावान इस पावन कार्य से वंचित न रह सके। हमें पूर्ण विश्वास है कि इस तरह की complete वीडियो आपको कहीं नहीं मिलेगी। वीडियो तो और भी हैं लेकिन साथ में पुस्तक भी रखनी पड़ती है। तीनो वीडियो के लिंक तो नहीं दिए जा सकते आज 17 मिंट वाली का देते हैं।

तो दूसरा निवेदन आपसे यह है कि हमने एक और वीडियो अपलोड की थी जिसका शीर्षक था ” इस पांच मिंट की वीडियो में गुरुदेव के 100 के लगभग चित्र ” इस वीडियो को भी लगभग 10000 लोगों ने देखा था। इस बार हमारा प्रयास है कि इसमें और चित्र add करें। इसकी प्रेरणा हमारे सहकर्मी सुजाता जी ने दी है। उन्होंने आदरणीय सविंदर पल जी को सम्पर्क करके हमें 20 के लगभग चित्र भेजे हैं ,उनमें से अधिकतर हमारे पास पहले ही हैं ,लेकिन माता जी की एक पुस्तिका भेजी है जिसमें रंगीन फोटो तो हैं लेकिन लिखा उड़िया भाषा में है। हमने हिंदी अनुवाद तो कर लिया है लेकिन अभी विचार- अधीन है। सुजाता बहिन जी को हमने निवेदन किया था लेकिन उड़ीसा निवासी होने के कारण हिंदी में समस्या हो। कोई बात नहीं गुरुदेव इसका भी विकल्प निकल देंगें।
तो आप सभी से निवेदन है किआपके पास गुरुदेव की कोई भी फोटो हों ,हमें भेज दें ताकि हम गायत्री जयंती वाले दिन अपने गुरुदेव को यह वीडियो समर्पित कर सकें।

गायत्री जयंती का महत्व
शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि गायत्री जयंती ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष में ग्यारहवें दिन बहुत ही श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। इस दिन भक्तगण विशेष श्रद्धा के साथ पूजा अर्चना करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि गुरु विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र को इस दिन सबसे पहले सर्वसाधारण अर्थात् आम जनता के लिए बोला था और उसके बाद भक्तगण इसका अनुसरण करते है।
गुरु विश्वामित्र के बोले जाने के पश्चात इस पवित्र एकादशी को गायत्री जयंती के रूप में हर साल मनाया जाने लगा। एक अन्य मान्यता के अनुसार ऐसा भी कहा जाता है कि इसे श्रावण पूर्णिमा के समय भी मनाना बहुत ही शुभ माना जाता है। यही नहीं अपितु ऐसा कहा जाता है कि सभी प्रकार के चारों वेद, पुराण, श्रुतियाँ भी सभी गायत्री से ही उत्पन्न हुए हैं, और इसी कारण इन्हें वेदमाता की संज्ञा दी गयी है।
गायत्री जयंती की तिथि को लेकर भिन्न-भिन्न मत सामने आते हैं। कुछ स्थानों पर गंगा दशहरा और गायत्री जयंती की तिथि एक समान बताई जाती है तो कुछ इसे गंगा दशहरे से अगले दिन यानि ज्येष्ठ मास की एकादशी को मनाते हैं। वहीं श्रावण पूर्णिमा को भी गायत्री जयंती के उत्सव को मनाया जाता है। श्रावण पूर्णिमा के दिन गायत्री जयंती को अधिकतर स्थानों पर स्वीकार किया जाता है। लेकिन अधिक मास में गंगा दशहरा अधिक शुक्ल दशमी को ही मनाया जाता है जबकि गायत्री जयंती अधिक मास में नहीं मनाई जाती।
जय गुरुदेव
सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा और नई उमंग लेकर आए। जय गुरुदेव परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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कलाप ग्राम जहाँ काया न पहुँच पाए -परमपूज्य गुरुदेव की हिमालय यात्रा

कलाप उत्तराखंड के ऊपरी गढ़वाल क्षेत्र का एक गाँव है। 7,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित, यह गांव देवदार (चीढ़ ) के जंगलों के बीच बसा है। यह ऊंचाई लगभग हिमाचल प्रदेश स्थित शिमला जितनी है परन्तु शिमला जैसा विकास इस गांव में सोचना भी शायद कठिन हो, सुपिन नदी यहाँ की मुख्य नदी है जो टोंस नदी से होकर यमुना नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है। कलाप ग्राम उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से 210 किमी और नई दिल्ली से 450 किमी दूर है। निकटतम रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डा देहरादून है। कलाप के लिए कोई भी डायरेक्ट बस सर्विस नहीं है। निकटतम शहर नेटवर तक पहुंचने में देहरादून से कार से 6 घंटे या बस से 10 घंटे लगते हैं। नेटवर से कलाप पहुँचने का केवल पैदल ही मार्ग है जिसमें लगभग 4 -5 घंटे लगते हैं और सीधी पहाड़ी चढाई है।
कलाप गांव और उसके आसपास के गांव महाभारत की पौराणिक कथाओं में डूबे हुए हैं। कलाप का मुख्य मंदिर कौरवों के साथ लड़ने वाले योद्धा कर्ण को समर्पित है। कर्ण की मूर्ति को इस क्षेत्र के विभिन्न गांवों के बीच लेकर जाया जाता है । जब मूर्ति को एक गांव से में ले जाया जाता है, तो इसे “कर्ण महाराज उत्सव” के रूप में मनाया जाता है। कलाप में पिछला उत्सव 2014 में था, और यह एक दशक से अधिक समय के बाद ही फिर से होगा
जनवरी में इस गाँव में हमेशा ही पांडव नृत्य होता है । इस नृत्य रूप में महाभारत की विभिन्न कहानियों का अभिनय किया जाता है।आपको जीने, खाने और पहनने के लिए जो कुछ भी चाहिए वह कलाप में बनाया जाता है। यह जीवन का एक अनूठा तरीका है, जो दूरस्थ स्थान की कठोरता से लगाया जाता है।

24 मई 2021 का ज्ञानप्रसाद- भारत का सबसे दूरस्थ( सबसे दूर ) गांव- कलाप
आज के लेख में हमने एक नवीन प्रयास किया है। इस लेख के साथ ही एक वीडियो लिंक दे रहे हैं जिसमें आप कलाप क्षेत्र की खूबसूरत फोटो देखेंगें। देखते हैं यह प्रयास कैसा रहता है।


हमारे पाठक हमारी निष्ठा से भली भांति परिचित हैं कि हम कोई भी कार्य अधूरा नहीं छोड़ते हैं। इस लेख को पूरा करने में हमें कितनी ही न्यूज़ रिपोर्ट्स पढ़नी पड़ी, वीडियो देखनी पड़ीं ,नक़्शे देखने पड़ें। इतने प्रयास के उपरांत भी हो सकता है कोई त्रुटि रह गयी हो ,हम क्षमा प्रार्थी हैं। ऐसे लेखों का चित्रण करना और अपने पाठकों के ह्रदय तक पहुंचना कोई आसान कार्य नहीं है। शायद वीडियो के द्वारा बताना अधिक लाभकारी हो ,अगर हमारे पाठकों का निर्देश /सुझाव रहा तो गुरुदेव के इस जीवन पर कुछ वीडियोस बनाने का प्रयास करेंगें।

परमपूज्य गुरुदेव की हिमालय यात्रा :

गुरुदेव को तपोवन में नए गुरुभाई का सानिध्य प्राप्त हुआ। इन्ही प्रतिनिधि से मालूम हुआ था कि गुरुदेव इस बार कैलाश मानसरोवर ( तिब्बत ) के मार्ग में मिलेंगें गुरुदेव बहुत ही प्रसन्न हुए कि इस बार इन गुरुभाई से हिमालय के बारे में बहुत सी जानकारी मिलेगी। इन नए प्रतिनिधि ने भी कुछ अधिक बात नहीं की। गुरुदेव ने कहा अपने व्यक्तिगत के बारे में चाहे कुछ न बताएं परन्तु दादा गुरु की अनुभूति का तो कुछ बताएं। आप तो बहुत ही भाग्यशाली हैं कि आपको उनका सानिध्य प्रायःमिलता रहा है। मुझे तो दो -तीन दिन से अधिक कभी भी उनका सानिध्य प्राप्त नहीं हुआ। प्रतिनिधि ने गुरुदेव की बात का खंडन करते कहा- हिमालय के सिद्ध क्षेत्र में साधना की अनुकूलता रहती है और यहाँ की दिव्यता सांसारिक मोह ,बंधन से दूर रहती है। उनका कहने का आशय था कि उनके लिए भी दादा गुरु का सानिध्य सुलभ नहीं रहा। हमारे गुरुदेव ने प्रतिनिधि ( सन्देशवाहक ) को कहा – आप गुरुदेव का सन्देश लेकर आए हैं और बहुत ही भाग्यशाली हैं। इस पर प्रतिनिधि कहने लगे :

” अगर यह बात है तो आप मुझसे और मेरे जैसे और हज़ारों शिष्यों की तुलना में अधिक भाग्यशाली हैं । आपको तो दादा गुरु ने लाखों, करोड़ों लोगों का संदेशवाहक चुना है “

चलते चलते सुमेरु पर्वत की सीमा पार हो गयी। सुमेरु पर्वत गंगोत्री ग्लेशियर क्षेत्र उत्तराखंड में स्थित है। चौखंबा शिखर सामने दिखाई दे रहा था। चौखंबा का अर्थ चार पर्वत शिखर ,सच में ही है। आप भी गूगल में सर्च करके देख सकते हैं । हिमालय क्षेत्र में पर्वतों के शिखर ,सरोवर ,झरने इत्यादि की भरमार है। चौखंबा शिखर के पास से गुज़रते हुए कुछ झोंपड़िया दिखाई दीं। संदेशवाहक ने झोंपड़ियां देख कर कहा – सैंकड़ों वर्ष पूर्व यहाँ एक बहुत बड़ा गांव था। इस गांव का नाम “कलाप” है। इस गांव की सीमा एक तरफ हिमाचल प्रदेश से ,दूसरी तरफ उत्तराखंड से और तीसरी तरफ तिब्बत से मिलती है। यह गांव प्रसिद्ध हिन्दू ग्रन्थ महाभारत की जन्मस्थली है , इसी गांव में कौरव और पांडव समय व्यतीत कर चुके हैं। ध्रतराष्ट्र ने यहाँ आकर उग्र तप किया। यहाँ के निवासियों से इस तरह की कथाएं अक्सर सुनने को मिलती हैं। द्वापर युग केअंत में जब आसुरी संकट बढ़ने लगा तो सत्ता की होड़ में निति ,अनीति ,पुण्य, पाप ,धर्म ,अधर्म का भेदभाव भुलाया जाने लगा। स्वार्थ और आपाधापी ने मनुष्य को नरपिशाच बना दिया तो कलाप ग्राम में मुनियों का एक सत्र आयोजित हुआ। उस सत्र में नारद ,व्यास ,गौतम ,जमदग्नि आदि ने गहन विचार किया। ईश्वरीय चेतना को हस्तक्षेप करने और सृष्टि का संरक्षण ,पोषण करने वाली दिव्य चेतना को स्थूल रूप में व्यक्त होने के लिए बाधित किया गया।

आज कल तो इस गांव में केवल 500 लोग ही रहते हैं। विकास न होने के कारण और यहाँ पर कोई approach road न होने के कारण आज इस गांव को Forgotten Himalayan remote scenic village की संज्ञा दे दी है । हमारा दुर्भाग्य है कि इतने प्रसिद्ध ऐतिहासिक गांव को इस प्रकार की संज्ञा दे दी गयी है। अविकसितता का उदाहरण तो तब देखने में आया जब हम ऑनलाइन इस प्रदेश की रिसर्च कर रहे थे तो पाया कि सुपिन नदी के ऊपर लकड़ी का पुल टूट गया था और और निवासी इतने वेगपूर्ण नदी से अपनी जान को जोखिम में डाल कर पास की बस्तियों में आ जा रहे थे। 38 वर्षीय बंगलुरु निवासी फोटो जर्नलिस्ट आनंद संकर की 2013 में आरम्भ हुई कलाप ट्रस्ट नामक समाजिक आर्गेनाईजेशन ने इस गांव के विकास बारे में कुछ कार्य किया है। आप इस संस्था के बारे में इस वीडियो में देख से सकते हैं।

कलाप ग्राम जहाँ काया न पहुँच पाए :

प्रतिनिधि के साथ जब गुरुदेव ने इस गांव में प्रवेश किया तो तीव्र प्रकाश की अनुभूति हुई। चाहे यह दिन का समय था और सूर्य का प्रकाश पूरी तरह से आभायुक्त लेकिन उसके इलावा कुछ और ही अलौकिक आभास हुआ। ऐसे लग रहा था किसी स्वर्णनगरी में प्रवेश किया हो। गुलाब के फूलों की भीनी -भीनी सुगंध व्याप्त थी। लगता था जैसे किसी उद्यान में आ गए हों। उपवननुमा इस बस्ती में कहीं-कहीं हवन कुंड भी बने हुए थे। कुछ सन्यासियों को एक जगह बैठे देख कर गुरुदेव और संदेशवाहक रुके। उनमें से सबसे बुज़ुर्ग सन्यासी ने हाथ उठा कर गुरुदेव को आशीर्वाद दिया। उनका नाम सत्यानंद बताते हैं। वह कहने लगे- मैं पिछले 60 वर्ष से इधर ही रह रहा हूँ। महायोगी त्र्यम्बकं बाबा ने मुझे दीक्षI दी और साधना मार्ग की शेष यात्रा इधर ही पूरी करने के लिए कहा। तब से कलाप गांव छोड़ कर कहीं जाना ही नहीं हुआ। अपनी बात बीच में छोड़ कर सत्यानंद जी ने गुरुदेव से पूछा – आपने भागवत में कलाप गांव का उल्लेख तो पढ़ा ही होगा। गुरुदेव ने सिर हिला कर हाँ कहा। सत्यानंद जी फिर कहने लगे – इस प्रदेश में नारद जी आदि ऋषियों के आने का और सृष्टि के बारे में विचार करने का उल्लेख आता है। पृथ्वी पर जब भी कोई संकट आता है यां बड़े परिवर्तन आते हैं तो सिद्ध संत मिल कर बैठते हैं और सूक्ष्म जगत में संतुलन लाने पर विचार करते हैं। इस विचार शैली को को आज कल की भाषा में अगर “ऋषियों की पार्लियामेंट” कहें तो गलत नहीं होगा। सत्यानंद जी ने कहा -यह कोई अकेला स्थान नहीं है। ज्ञानगंज ,सिद्धाश्रम जैसे और भी कई केंद्र हैं। जिस प्रकार का आभास गुरुदेव को कलाप गांव में हुआ एक सिद्ध आत्मा को ही हो सकता है। और इस तरह के बाकि के सिद्ध क्षेत्रों में भी केवल सिद्धि प्राप्त किये साधक ही प्रवेश कर सकते हैं। YouTube पर इस संदर्भ में वीडियोस तो उपलब्ध हैं लेकिन उनकी प्रमाणिकता के बारे में कोई भी निर्णय हम अपने पाठकों पर ही छोड़ने की आज्ञा लेते हैं। यह हम इस लिए कह रहे हैं यह आभास व्यक्तिगत होते हैं। किसी एक को कुछ आभास हो सकता है किसी दूसरे को नहीं।

गायत्री माँ द्वारा सत्यानंद जी का मृत्यु योग टला :

सत्यानंद जी को बचपन से ही धुन सवार थी कि जीवन को परमसत्य की खोज में ही व्यतीत करना है। 13 वर्ष की आयु में यज्ञोपवीत हुआ ,तभी से नियमित रूप से गायत्री जप और पूजा पाठ में लग गए। यज्ञोपवीत संस्कार के डेढ़ वर्ष उपरांत उन्हें मलेरिआ बुखार आया , उन दिनों मलेरिआ का इलाज न होने कारण दशा इतनी बिगड़ गयी कि डॉक्टर ने बचने की आशा ही छोड़ दी। कह दिया कि रोगी जो चाहे खाने को दे दो ,जो उसकी इच्छा है उसे पूरा होने दो। परहेज़ और इलाज से कोई लाभ नहीं। घर के सभी लोग रोने लगे ,पीटने लगे। सत्यानंद अर्धचेतन अवस्था में थे। वे अपने जीवन से निराश हो गए थे। सिरहाने बैठी माँ भगवतगीता का पाठ सुनाने लगी। उस अवस्था में सत्यानंद जी ने अनुभव किया कि एक कन्या सिरहाने बैठी है और कह रही है आप चिंता न करें आपका मृत्यु योग टल गया है। कन्या सत्यानंद जी के सिर पर हाथ फेरती जा रही थी और थोड़ी देर बाद ही बुखार उतरना आरम्भ हो गया। घर वालों के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। डॉक्टर ने देखा तो उसकी भी आश्चर्य की सीमा न रही। सत्यानंद जी को बाद में बोध हुआ कि उनके सिर पर हाथ फेरने वाली कन्या कोई और नहीं बल्कि स्वयं वेदमाता गायत्री थीं। उसके उपरांत सत्यानंद जी ने पढ़ाई छोड़ दी और वैराग्य जागने के कारण हिमालय की ओर निकल गए। उनके गुरु त्र्यम्बकं बाबा ने कलाप ग्राम में ही दर्शन दिए और इधर ही साधना करने का निर्देश दिया।
हम अपने पाठकों को बताना चाहेंगें कि यह बातें जो आज 2020 में कर रहे हैं लगभग 120 वर्ष पुरानी हैं क्योंकि सत्यानंद जी 60 वर्ष से कलाप ग्राम में थे ओर गुरुदेव को यह वर्णन 1958 में कर रहे थे। हमने इन तथ्यों की और सत्यानंद जी के बारे में ऑनलाइन रिसर्च की लेकिन कुछ भी प्राप्त न हुआ। इसी नाम के और कई entries appear हुईं लेकिन उनका इस लेख के साथ कोई भी सम्बन्ध न दिखा।
जय गुरुदेव
सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा और नई उमंग लेकर आए। जय गुरुदेव परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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Auroville -सूर्योदय का नगर –

21 मई 2021 का ज्ञानप्रसाद
आज के ज्ञानप्रसाद में हम आपको एक ऐसे अद्भुत नगर के बारे में बताने का प्रयास करेंगे जिसको experimental सिटी ,City of Dawn ,Peace area /सिटी के नाम दिए गए हैं। इस नगर के सूत्रधार माँ मीरा अलफस्सा के बारे में भी संक्षिप्त सा वर्णन देने का प्रयास करेंगें।
Auroville ( ऑरोविले नगर )
इस नगर के नामकरण के बारे दो धारणाएं प्रचलित हैं। एक धारणा के अनुसार auro का अर्थ है dawn यानि सूर्योदय और ville का अर्थ फ्रेंच में होता है नगर। दूसरी धारणा के अनुसार auro को aurobindo के साथ भी जोड़ा जा सकता है। City of Dawn यानि सूर्योदय का शहर चेन्नई से 150 किलोमीटर दूर है। पुडुचेरी से 12 किमी दक्षिण की ओर है। यहां ईस्ट कोस्ट रोड (ECR) होकर आसानी से पहुंचा जा सकता है, जो चेन्नई और पुडुचेरी को जोड़ता है। ECR पर संकेतित साइनपोस्ट के सहारे पश्चिम की ओर आठ किलोमीटर जाने पर विजिटर सेंटर तथा मातृमंदिर तक पहुंचा जा सकता है। पूर्व की ओर घूमने पर कुछ सौ मीटर की दूरी पर सीधे Repos beach आता है।
Auroville एक ऐसा शहर है जहां पूरी दुनिया के पुरुष और महिलाएं शांति से रहते हैं। हर तरह की राष्ट्रीयता से ऊपर, न कोई झगड़ा न झंझट और न ही कोई क्षुद्र राजनीति Auroville मानवीय संवेदना का चरम है। श्रीमां नाम से प्रसिद्ध मीरा अलफस्सा ( श्रीमां का वर्णन नीचे देखें ) ने 28 फरवरी 1968 में श्री अरविंदो सोसायटी प्रोजेक्ट के तहत इस नगर की स्थापना की थी। इस शहर की स्थापना करने वाली श्रीमां का मानना था कि ये यूनिवर्सल टाउनशिप भारत में बदलाव की हवा लाएगा। ऐसे शहर को बसाने का सिर्फ एक ही मकसद था कि ये शहर जात पात और भेदभाव से दूर रहे और यहां कोई भी इंसान जाकर रह सकता हो। Auroville में आपको मानवीयता का चरम बिंदु देखने को मिलेगा। यहां पूरी दुनिया के 60 अलग अलग देशों के, हर जाति, वर्ग, समूह, पंथ, धर्म के लोग यहां रहते हैं। 2020 की एक वीडियो के अनुसार यहाँ लगभग 3000 लोग रहते हैं और सभी को एक जैसा वेतन 12000 रूपये प्रतिमाह ही मिलते हैं चाहे वह डॉक्टर है यह फिर माली। यहाँ के निवासियों को ऑरोविले के साथ एक अकाउंट सेट अप करना होता है और उसके उपरांत सारा इंतेज़ाम वही करते हैं।
नगर के बीचो बीच “मातृ-मंदिर” स्थित है। आपने भारत के लगभग सभी मंदिरों में किसी न किसी देवी-देवता की तस्वीर या मूर्ति देखी होगी लेकिन ऑरोविले के इस मंदिर में कोई मूर्ति या तस्वीर आपको देखने को नहीं मिलेगी। दरअसल यहां धर्म से जुड़े भगवान की पूजा नहीं होती। यहां लोग आते हैं और सिर्फ योग करते हैं। इस शहर में धर्म राजनीति और पैसे की कोई जरूरत नहीं। अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा किस प्रकार संभव है तो हम आपको बता दें कि यहां लोग धार्मिकता के बजाय आध्यात्मिकता को अधिक तरजीह देते हैं। यहां के मकानों के मालिक उनमें रहने वाले नहीं बल्कि 900 लोगों की एक असेंबली है। वर्तमान में ऑरोविले आने वाले सभी लोगों को नि:शुल्क आवास मुहैया करा पाने की स्थिति में नहीं है लेकिन नि:शुल्क आवास मुहैया कराने के प्रयास जारी हैं। कागज के नोटों और सिक्कों की बजाय निवासियों को अपने केन्द्रीय खाते से संबंध स्थापित करने के लिए एक खाता संख्या दिया जाता है। लोग एक दूसरे की भाषा नहीं समझ पाते इसके बावजूद वे अपना सारा काम बिना रुकावट के करते हैं। यहां सांसारिक सुखों को बिना वजह की तरजीह नहीं दी जाती। यूनेस्को ने भी ऐसे शहर की प्रशंसा की है और पिछले 40 वर्षों की अवधि में यूनेस्को ने ऑरोविले को चार बार समर्थन दिया। आपको ये बात शायद नहीं पता होगी कि ये शहर भारतीय सरकार के द्वारा समर्थित है। भारत के राष्टपति डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम और प्रतिभा पाटिल भी ऑरोविले का दौरा कर चुके हैं। Repos beach शहर के पास ही स्थित है जो अपनी खूबसूरती के कारण यात्रियों और पर्यटकों को आकर्षित करता है।
श्रीमां के ह्रदय में इस एक्सपेरिमेंटल टाउनशिप का आईडिया 1930 में आया। 1968 में उद्घाटन के समय एक बरगद के पेड़ के नीचे लगभग 124 देशों के 5000 लोग एकत्रित हुए। इसमें भारत के सभी प्रांतों के नागरिक भी थे। यह नागरिक अपने साथ अपने देश की माटी लेकर आए थे। इस नगर में निवास कर रहे लोगों की दिनचर्या क्या है ,बच्चे कौन से स्कूल में जाते हैं ,यहाँ का वातावरण कैसा है ,सोलर किचन में भोजन कैसे बनता है ,अद्भुत साउंड गार्डन की रचना किसने की और इसकी रचना के पीछे क्या प्रेरणा थी आदि सभी प्रश्नों के उत्तरों के लिए https://auroville.org/ विजिट करना चाहिए। गूगल सर्च में आपको बीबीसी समेत ऑरोविले पर कितनी ही full-length फिल्में मिल सकती हैं।
मातृ मंदिर ( Temple of The Mother )
मातृमंदिर श्री अरविन्द आश्रम की माँ द्वारा स्थापित ऑरोविले के केंद्र में, integral योग के अभ्यासियों के लिए आध्यात्मिक महत्व का एक भवन है। इसे शहर की आत्मा कहा जाता है और यह “शांति” नामक एक बड़े खुले स्थान में स्थित है। मातृमंदिर किसी विशेष धर्म या वर्ग से संबंधित नहीं है। मातृमंदिर को बनने में 37 साल लगे; 21 फरवरी 1971 को सूर्योदय के समय श्रीमाँ के 93वें जन्मदिन पर आधारशिला रखने से लेकर मई 2008 में इसके पूरा होने तक । यह बारह पंखुड़ियों से घिरे एक विशाल गोले के रूप में है। जियोडेसिक इंजीनियरिंग तकनीक से निर्मित इस मंदिर का dome सुनहरी डिस्क से ढका हुआ है और सूरज की रोशनी को परिबिम्ब करता है जो संरचना को इसकी विशिष्ट चमक देता है। केंद्रीय गुंबद के अंदर एक ध्यान कक्ष है जिसे आंतरिक कक्ष के रूप में जाना जाता है – इसमें विश्व का सबसे बड़ा optically-परफेक्ट ग्लास ग्लोब है। केंद्रीय शांति क्षेत्र में मातृमंदिर और उसके आसपास के उद्यान, नियुक्ति के द्वारा जनता के लिए खुले हैं। विज़िटर सेंटर से आप को एक पास दिया जाता है जिससे आप शांति क्षेत्र तक जा सकते हैं , मातृ मंदिर के लिए अलग पास है। चार मुख्य स्तंभ जो मातृमंदिर को support करते हैं और आंतरिक कक्ष को ले जाते हैं कम्पास की चार मुख्य दिशाओं में स्थापित किए गए हैं। ये चार स्तंभ श्री अरबिंदो द्वारा वर्णित श्रीमाँ के चार पहलुओं के प्रतीक हैं, और इन चार पहलुओं के नाम पर हैं। महेश्वरी ( दक्षिण स्तम्भ ),महाकाल ( उत्तर स्तम्भ ),महालक्ष्मी ( पूर्वी स्तम्भ ) और महासरस्वती ( पश्चिमी स्तम्भ )।
श्रीमां का बाल्य जीवन:
फ्रांसीसी मूल की विदुषी में अपने बाल्यकाल से ही असाधारण लक्षण परिलक्षित होते थे। गंभीर स्वभाव, सरल हृदय, निश्छल व्यवहार,कुशाग्र बुद्धि से परिपूर्ण,प्रतिभा सम्पन्न तथा दृढ़ निश्चय युक्त श्रीमां के कुलवंश का सम्बन्ध मिस्र के राजघराने से था। उनके पिता एक तुर्की यहूदी थे तथा मां मिस्र के यहूदी धर्म परिवार से सम्बंधित थीं। अपनी चार वर्ष की छोटी उम्र से ही श्रीमां कुर्सी पर बैठकर ध्यान किया करती थीं। उन्हें बचपन से ही प्रकृति तथा पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम था। अनेक अवसरों पर वे ध्यानमग्न हो जाया करती थी एवम् वृक्षों, पशु-पक्षियों की चेतना से जुड़ जाती थीं। वे प्राय: पशु-पक्षी तथा फूल-पौधों से अपने सुख दुःख की बातें करती थीं तथा स्वयं की रक्षा के लिए प्रार्थना भी किया करती थीं।श्रीमां स्वभाव से गंभीर-गहन चिंतन में डूबी रहतीं थीं, उनकी ऐसी अवस्था को देखकर उनकी मां, चिंता में डूबकर सोचा करती कि लगता है जैसे सारी दुनिया का भार इसके कन्धे पर है। उसी क्षण श्रीमां गम्भीर स्वर में कह उठती,”हां ऐसा ही है,मुझ पर सारे संसार का उत्तरदायित्व हैं ” श्रीमां को जो उचित नहीं लगता उस हेतु उन्हें कोई भी बाध्य न कर सकता था। ऐसे समय पर वे कहा करतीं,”संसार की कोई भी शक्ति मुझ से अपना आदेश नहीं मान्य करवा सकती है। मैं भगवान की हूँ,केवल उन्हीं का आदेश मानती हूं ” सामान्य पाठ्यक्रम शिक्षण के साथ ही श्रीमां, संगीतकला,नृत्य,चित्रकला,साहित्य तथा टेनिस खेल में अनुभवी थी। इन सभी ललित कलाओं का उन्होंने पारम्परिक रूप से प्रशिक्षण ग्रहण किया था। बढ़ती उम्र के साथ उनकी यह धारणा प्रबल हुई कि वे किसी अन्य लोक से आई हैं। उन्हें यह स्पष्ट प्रतीति हुआ करती थी कि एक ज्योति उनके शिरोमंडल में प्रवेश कर उन्हें असीम शांति प्रदान करती है।श्रीमां को गहरी नींद में अनेक ऋषि-मुनिगणों से अनेक अलौकिक शिक्षाएं प्राप्त होती थी। एक अद्भुत घटना को श्रीमां ने अपनी डायरी में लिखा था
” मैं जब तेरह वर्ष की बालिका थी लगभग एक वर्ष तक हर रात को बिस्तर पर लेटते ही मुझे लगता कि मैं अपनी देह से बाहर निकल गई हूं और ऊपर उठ रही हूँ। सूक्ष्म शरीर रात में भौतिक शरीर से बाहर निकल जाता, तब मैं स्वयं को एक शानदार सुनहरे चोगे में लिपटे हुए देखती जो मुझसे कहीं अधिक लम्बा था। ज्यों ही मैं ऊपर उठती वह चोगा मेरे चारों ओर से घेरे में चंदोवे की तरह तन जाता और शहर के ऊपर फैल जाता। तब मैं चारों दिशाओं से दु:खी स्त्री, पुरूष, बच्चों, वृद्धों व बीमार,दरिद्र लोगों को आते हुए देखती और वे सब उस चंदोवे के नीचे एकत्र हो जाते,अपने दुःख संताप सुनाते। अपनी कठिनाइयों का वर्णन करते और मुझसे सहायता की याचना करते। इसके प्रत्युत्तर में वह नमनीय और जीवंत चोगा हर किसी के निकट झुक जाता और ज्योंही उसे वे छूते मानों संतुष्ट,निरोग और आश्वस्त हो जाते तथा स्वस्थ,प्रसन्न और सबल होकर वापस लौट जाते “
सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा और नई उमंग लेकर आए। जय गुरुदेव परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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परमपूज्य गुरुदेव श्री अरविन्द आश्रम में श्रीमाँ के साथ पार्ट-2

19 मई 2021 का ज्ञानप्रसाद- परमपूज्य गुरुदेव श्री अरविन्द आश्रम में श्रीमाँ के साथ पार्ट-2
आज का लेख भी बहुत ही संक्षिप्त है। हमारे 16 मई वाले लेख की तरह यह लेख भी लगभग मूलरूप में ही हमारे सहकर्मी आदरणीय विवेक खजांची जी द्वारा फेसबुक पर शेयर हुए लेख में से तैयार किया है। विवेक भाई साहिब का हम ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं कि उन्होंने श्री अरविन्द के ऊपर इतना विस्तृत ज्ञान दो भागों में हम सबके के लिए प्रस्तुत किया। कुछ दिन पूर्व जब हमने इन लेखों को देखा तो उनसे बात करके हमें पता चला कि यह लेख उनके लगभग 6 -7 मास के अथक परिश्रम और वर्षों पुराने गूढ़ ज्ञान का परिणाम है। हम विवेक जी के इस अद्भुत योगदान को नतमस्तक हैं। इस लेख में हमने बहुत ही सामान्य सी एडिटिंग की है जो इस लेख को सरल बनाने (easy to understand ) उदेश्य से की है। अपने सहकर्मियों से आशा करते हैं कि वह संकल्प लें कि इस लेख को किसी कहानी की तरह नहीं बल्कि एक धार्मिक कंटेंट की धारणा से पढ़ेंगें। जिस प्रकार सुप्रसिद्ध टीवी सीरियल महाभारत में संजय युद्धक्षेत्र का विवरण ध्रतराष्ट्र को बताते जाते थे ठीक उसी प्रकार श्रीमां और परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म दृष्टि के कुछ विवरण इस लेख में देखने को मिलेंगें।

पांडिचेरी ( वर्तमान पुदुच्चेरी) स्थित अरविन्द आश्रम में परम्पूज्य गुरुदेव की यात्रा, आकस्मिक आगंतुक की तरह न थी। श्रीमां ने उन्हें श्रीअरविन्द की शिक्षाओं के आलोक में सम्बोधन कर कहा , ” वे ( श्रीअरविन्द ) एक नए मनुष्य के जन्म की दिशा में प्रयत्न कर रहे हैं। जिन शक्तियों ने उन्हें इस कार्य के लिए नियुक्त किया है, उन्हीं ने आपको भी यहां इस आश्रम में बुलाया है। ” श्रीमां ने आगे कहा,“ श्रीअरविन्द मानते हैं कि यह आश्रम , एक प्रयोगशाला है यहां भविष्य के लिए परीक्षण होने चाहिए, वे चल रहे हैं और आप से उनकी कुछ अपेक्षाएं हैं”

पूज्य गुरुदेव की अस्सी वर्षों की जीवन यात्रा में हम यह देख पाते हैं कि उनकी हर यात्रा का एक विशेष उद्देश्य था। इस प्रसंग को उन्होंने एक समय अपने उद्बोधन में प्रस्तुत कर कहा भी था, ” हमारी यात्राओं का उद्देश्य,लोकोत्तर दिव्य आयाम उद्घाटित करना है ” फ्रैंच विदुषी ( विद्वान महिला) श्रीमां ने पूज्य गुरुदेव को अपनी योगजनित साधनोंपलब्ध दृष्टि से सनातन सत्य-चेतन पुरुष, ब्रह्मशक्तिसंपन्न आध्यात्मिक भावराज्य में विचरण करने वाले महायात्री के रूप में पहचानकर योगी, यज्ञ पुरुष कह कर सर्वोच्च सम्मान का प्रदर्शन किया था। यहूदी धर्म के आदर्शों में भारतीय अध्यात्म के मिलन-संयोजन स्वरूप, श्रीमां का यौगिक व्यक्तित्व गठित हुआ था, जो उनके अतिंन्द्रिय भावराज्य का ही एक प्रतिबिंब था।

यह एक ख्यात प्रसंग है कि वे प्रतिदिन प्रार्थना करतीं थीं,-“हे जेहोवा (परमेश्वर) अपने धर्म के मार्ग में मेरा पथ
प्रदर्शन कर, मेरे आगे अपने सीधे मार्ग को दिखा” श्रीमां ने अपनी इस सार्वभौमिक प्रार्थना के साथ सनातन धर्म के प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र में अद्भुत साम्य पाया था। फ्रांस निवास काल में वे अनुभव किया करती थीं कि भारत में वे बहुत से योगियों, साधकों और विभिन्न धाराओं के आचार्यों से मिलेंगी। जिस क्षण श्रीमां ने पूज्य गुरुदेव को प्रथम बार देखा उन्हें यज्ञपुरुष-महासिद्ध की प्रतीति हई। श्रीमाँ ने अनुभव किया कि पूज्य गुरुदेव के सरल, संतुलित, धीर व्यक्तित्व,प्रशान्त एवम् समुज्ज्वल चरित्र तथा पुण्यमय दिव्य स्वरूप के प्रभा मण्डल से आश्रम में नव चेतना का संचार हुआ है। वे पूज्य गुरुदेव के आश्रमवास से अत्यन्त प्रफुल्लित हुईं। आश्रमवासी साधकों के मध्य बैठे,पूज्य गुरुदेव से उन्होंने कहा, ” आप नए हैं, लेकिन हम लोगों के लिए नहीं, किसी मंत्रणा के लिए आपका यहां आना आवश्यक नहीं था, वह पराभौतिक (सूक्ष्म) स्तर पर भी संपन्न होती रहती, इस मिलन का उद्देश्य कुछ ज्यादा गहन है। इसीलिए आपको यहां आश्रम में रोके रखा ” इसके बाद उन्होंने , पूज्य गुरुदेव से बिल्कुल चिर-परिचित अंदाज़ में अतिमानस अवतरण के अन्तर्गत नवयुग के आगमन तथा उसके स्वरूप के विषय में वार्ता की। श्रीमां ने पूज्य गुरुदेव से अपनी अनुभूति बताते हुए कहा, ” संसार क्या है ? इसके सम्बन्ध में मुख्य रूप से तीन धारणाएं हैं:

१ एक अदिशंकर और बुद्ध से मेल खाती है कि संसार एक भ्रांति है,अविद्या है और इस कारण यहां दुःख ही दुःख है। यहां करने योग्य एक ही काम है कि इसमें से निकल जाओ, छुटकारा पा लो और ब्रह्म में लीन हो जाओ।
२ दूसरी धारणा वेदान्त की है कि ईश्वर सर्वव्यापी है। मूल तत्व के रूप में वह हर जगह विद्यमान है, लेकिन उसका व्यक्त रूप विकृत (परिवर्तित) है, तमस (lethargy) से आच्छादित है ,उससे छुटकारा पाने के लिए आत्म चेतना में स्थिर होकर रहो,जगत के बारे में चिन्ता मत करो।
३ तीसरी दृष्टि आधुनिक या नवीन है। यह श्रीअरविन्द ने उन्मीलित की है। उनके अनुसार संसार जैसा अभी है ,वह अपूर्ण है उसे जो होना है, उसका धुंधला और विकृत रूप है। लेकिन उसे वहीं बनना है उसकी रचना भगवान के सभी रूपों और पहलुओं में विकसित होने के लिए है। यह एक बहुत ही वैज्ञानिक व्याख्या है।-Universe is always changing ।

श्रीमां ने पूज्य गुरुदेव के द्वारा नवयुग के नूतन युगनिर्माण के अन्तर्गत, भविष्य में किए जाने वाले आनुष्ठानिक साधना-सत्रों व स्थापनाओं के विषय में अपनी दिव्य दृष्टि से जान लिया था। हम अपने सहकर्मियों को याद दिलाते जाएँ कि यह बातें 1937 में जब पूज्यवर केवल 26 वर्ष के थे तब हो रही थीं। मनुष्य में देवत्व ,धरती पर स्वर्ग के अवतरण और युगनिर्माण योजना की नींव उस समय से ही दिखती थी क्योंकिं यह परमपिता परमात्मा की दिव्य योजना है।

नीलरत्नम की कथा :
श्रीमां, अरविन्द आश्रम के प्रत्येक साधक के आध्यात्मिक जीवन पर पूर्ण दृष्टि रखा करती थीं। श्री नीलरत्नम एक उच्च कोटि के साधक थे। संभवत: सन 1971 के बाद किसी समय वे उत्तर भारत के तीर्थ स्थल, हरिद्वार पहुंचे। वे हरिद्वार स्थित शान्तिकुंज आश्रम के सामने से गुजर रहे थे कि उनके कानों में श्रीमां का स्वर गूंजा,” यहीं है विश्वामित्र की तप:स्थली। जिस यज्ञपुरुष को तुम ध्यान में देखते हो वह महासिद्ध यहीं है और अभी भी विद्यमान है। इस स्वर गुंजन के फलस्वरूप श्री नीलरत्नम चलते-चलते अचानक रुक गए और शान्तिकुंज आश्रम के भीतर प्रविष्ट हुए। शान्तिकुंज आश्रम में उस समय पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी अपने अनेक शिष्यों, प्रशंसकों व अनुरागियों के मध्य घिरे हुए थे। श्री नीलरत्नम ने पूज्य गुरुदेव के प्रथम दर्शन करते ही ठीक पहचान लिया। वे पूज्य गुरुदेव के श्री चरणों में दंडवत लेट गए। पूज्य गुरुदेव को प्रणाम निवेदित करते हुए उन्हें अपने गहन ध्यान अवस्था में दीख पड़ा कि एक विराट यज्ञ हो रहा है, यज्ञ स्थल पर बने यज्ञ कुंडों में उठती हुई ज्वालाओं से एक आकृति के दर्शन होते हैं, ज्वालाओं की शीर्ष जिव्हा उस आकृति की केश राशि में परिवर्तित हो जाती है और मध्य भाग तप्त वर्ण के मुख मण्डल में रूपांतरित हो जाता है। इस दृश्य को श्री नीलरत्नम प्राय: अपनी ध्यान अवस्था में पांडिचेरी आश्रम में देखा करते थे। श्री नीलरत्नम ने पूज्य गुरुदेव को भक्तिभाव से आत्मनिवेदन कर विनयपूर्वक कहा, “आप ही वह दिव्य पुरुष हैं, जिनके दर्शन मैं ध्यान में करता रहा हूं ? इस आश्रम के सामने से गुजरते समय श्रीमांने आपके बारे में संकेत किया उन्होंने ही मुझे यहां भेजा है” पूज्य गुरुदेव ने उन्हें सम्बोधित करते हुए कहा, ” प्रत्यक्ष में लौटो नीलरत्नम ! अपनी अनुभूति को इस तरह सार्वजनिक मत करो”

यह घटना जिस समय घटित हो रही थी तथा जिस क्षण श्रीनीलरत्नम ने पूज्य गुरुदेव के समक्ष समर्पण किया था, ठीक उसी क्षण ,पांडिचेरी के श्रीअरविन्द आश्रम में विराजित, श्रीमां को अपने दिव्य चक्षुओं द्वारा श्री नीलरत्नम को अपने गुरु के चरण स्पर्श व समर्पण विषयक वह घटना दिख गई। श्रीमां ने उसी क्षण आश्रम में अपने निकट खड़ी विमला जालान नामक एक शिष्या को बताया,” नीलरत्नम अपने यज्ञप्रभु के पास पहुंच गया है, वह बहुत आगे जाएगा ” इस लौकिक जगत में समय – समय पर अनेक अलौकिक घटनाएं घटित हुआ करती है जो जीव के नवजागरण का मार्ग प्रशस्त कर दिया करती है। क्षण महत्वपूर्ण है,एकात्मता महत्वपूर्ण है। एन्द्रिक जगत में उस पारलौकिक अनुभव का वह क्षण, ईश्वरादिष्ट मसीहा के प्रत्यक्ष प्रकटन का होता है। स्थिर होकर, एकाग्रचित्त होकर उस परमतत्व को बिल्कुल स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है जो मनुष्यों के सर्वविध कल्याण हेतु भौतिक स्तर पर सौंदर्य रूप में प्रकट होते हैं। स्वाभाविक रूप से पूज्य गुरुदेव में एक ऐसा आकर्षण था जो सामान्यत: इस जड़ जगत में दिखाई नहीं पड़ता। उनकी उपस्थिति में एक ऐसा चुंबकत्व था जो हर किसी को आकृष्ट कर लेता था। उन्हें सभी अपना समझ,अपने अनुभव बताया करते थे। ईसा,बुद्ध,मुहम्मद,चैतन्य,महावीर आदि,अनेक अवतार पुरुषों में जो-जो शक्ति विद्यमान थीं पूज्य गुरुदेव उन सभी का समन्वयात्मक आधार थे। यद्धपि वे बहुत सामान्य दीख़ पड़ते थे किन्तु उनके प्रज्ञालोक का आभास हो ही जाया करता था। उनके सानिध्य में जो भी रहा करता उसे ये स्पष्ट धारणा हुआ करती थी कि यहीं एकमात्र उद्धारक हैं,जो मेरे जीवन में दिव्यता का मार्ग प्रशस्त करेंगे।
पांडिचेरी की श्री मां की दृष्टि में वे महासिद्ध थे जो, अरणी-काठ (लकड़ी ) से ज्वलित यज्ञपुरुष के रूप में यज्ञमय जीवन जीने की प्रेरणा देकर सदा सर्वदा के लिए अपने असंख्यों अनुगमियों के हृदय प्रदेश में विराजित हो जाते थे। हर धर्म के, हर सम्प्रदाय के लिए वे अमूल्य थे। वे इस धरा पर दैव निधि (सम्पति) थे।

यज्ञपुरुष को पहचानने वाली , श्रीमां ने अपने पंचानवे वर्ष की उम्र में (1973 ) समाधि लाभ किया। यह समाधि लाभ उनके जीवन की परिसमाप्ति नहीं था अपितु अनन्त में समाहित हो उस विराट यज्ञ के शुभारम्भ का ब्रह्मनाद था जिसमें श्रीमां ने पूज्य गुरुदेव के देवभाव की युग निर्माण योजना महायज्ञ में मनुष्य में देवत्व का उदय-धरती पर स्वर्ग अवतरण हेतु सुगन्धि आहुतियां प्रदान की थीं। जिस क्षण श्रीमां ने पांडिचेरी आश्रम में अपनी भौतिक देह को सूक्ष्म में विसर्जित किया था उसी क्षण पूज्य गुरुदेव को श्रीमां की महासमाधि में लीन होने का आभास हुआ था।
तो ऐसी होती है दिव्य आत्माएं ,जय गुरुदेव।
सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा और नई उमंग लेकर आए। जय गुरुदेव परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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परमपूज्य गुरुदेव अरविन्द आश्रम पांडिचेरी में -पार्ट 1

आज 17 मई 2021 का ज्ञानप्रसाद – परमपूज्य गुरुदेव अरविन्द आश्रम पांडिचेरी में -पार्ट 1

आज का लेख बहुत ही संक्षिप्त है। यह लेख हमने लगभग मूलरूप में ही हमारे सहकर्मी आदरणीय विवेक खजांची जी द्वारा फेसबुक पर शेयर हुए लेख में से तैयार किया है। विवेक भाई साहिब का हम ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं कि उन्होंने श्री अरविन्द के ऊपर इतना विस्तृत ज्ञान दो भागों में हम सबके के लिए प्रस्तुत किया। कुछ दिन पूर्व जब हमने इन लेखों को देखा तो उनसे बात करके हमें पता चला कि यह लेख उनके लगभग 6 -7 मास के अथक परिश्रम और वर्षों पुराने गूढ़ ज्ञान का परिणाम है। हम विवेक जी के इस अद्भुत योगदान को नतमस्तक हैं। आशा करते हैं कि हमारे सहकर्मी विवेक जी के इस प्रयास से अवश्य प्रेरणा लेंगें और ऑनलाइन ज्ञानरथ में अपने लेख लिख कर योगदान देंगें।

तो चलते हैं लेख कि ओर।

परमपूज्य गुरुदेव , ईष्ट प्रेरणा तथा श्रीअरविन्द के सूक्ष्म अध्यात्मिक संप्रेषण के आकर्षण से पांडिचेरी पहुंचे थे। इस यात्रा में सूक्ष्म भावपक्ष का ही अधिक प्राबाल्य था न कि भौतिक यात्रा का। वर्ष 1937 में किसी समय पूज्य गुरुदेव ने दक्षिण भारत के पांडिचेरी की यात्रा सम्पन्न की थी। उस समय गुरुदेव की आयु 26 वर्ष रही होगी।
पांडिचेरी, कभी अगस्त्य ऋषि की तप साधन स्थली रहा है। पौराणिक आख्यानों में पांडिचेरी , ‘ मेदापुरी’ अर्थात् ज्ञान का नगर, नाम से अभिहित है। तमिल भाषा में पुंडुचेरि का अर्थ है , नया नगर। आधुनिक पांडिचेरी की स्थापना फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी के डायरेक्टर François Martin, ने की और 138 वर्ष फ़्रांसिसी राज्य के उपरांत 1 नवम्बर 1954 को भारत सरकार द्वारा केंद्रीय शासित प्रदेश घोषित किया गया। सामान से भरे लकड़ी के विशाल जहाजों के आगमन पर दिशा प्रकाश निर्देशन के लिए बंगाल की खाड़ी के तट पर 1836 में Light House निर्मित किया गया था। Puducherry Railway Co. की व्यवस्थापना में वर्ष 1879 में यहां रेलमार्ग का निर्माण किया गया थ। इसी रेलमार्ग से पूज्य गुरुदेव का पांडिचेरी नगर में आगमन हुआ था। जिस समय पूज्य गुरुदेव , पांडिचेरी पहुंचे उस समय तक वह नगर फ्रैंच साम्राज्य के अधिकार क्षेत्र में था। उसका भारत तथा ब्रिटिश शासन से कोई सम्बन्ध न था। उस काल में खाद्य पदार्थ, फ्रांस से समुद्री मार्ग द्वारा डिब्बा बंद कनस्तरों व लकड़ी के चौकोर बॉक्स में आया करते थे। वे कम मूल्य के हुआ करते थे। स्थानीय रहवासी जिनकी संख्या सीमित थी वे वहीं आहार ग्रहण किया करते थे और मछली का भोज्य पदार्थों में उपयोग किया करते थे। वहां के खेतों में केवल प्याज का उत्पादन हुआ करता था।
1910 में श्रीअरविन्द का पांडिचेरी में आगमन हुआ और 1926 में अरविन्द आश्रम अपने स्थापना काल से क्रमशः प्रति वर्ष विस्तारित होता रहा। आश्रम के स्वयं के कृषि समुदाय, धान्य खेत , गौशाला , हरित तृण के मैंदान तथा फल – सब्जियों के सुन्दर और व्यवस्थित बागीचे थे। आश्रम में कार्यों को सुव्यवस्थित रखने के लिए यांत्रिक मशीनों का भी उपयोग किया जाता था। आत्मिक प्रगति के लिए आश्रम में सात्विक निरामिष आहार की ओर ध्यान दिया जाता था एवम् गाय के दूध को प्रमुख रूप से स्थान दिया जाता था। आश्रम का वातावरण गहन आध्यात्मिक नीरवता से सम्पन्न – योग, ध्यान , साधना व स्वाध्याय से पूरित था। भारत तथा भारत के बाहर अन्य देशों से यौगिक जीवन के अनुरागी ही आश्रम में आया करते थे तथा उनकी संख्या भी बहुत कम थी।

श्रीअरविन्द के निकट आगत पूज्य गुरुदेव ने आश्रम में प्रवेश किया। आश्रम स्थित Reception में रजनी भाई नामक एक चालीस वर्षीय भद्र व्यक्ति ने पूज्य गुरुदेव का आतिथ्य – सम्मान किया था। उन्होंने पूज्य गुरुदेव के निवास, जलपान तथा भोजन की व्यवस्था की थी। आश्रम में प्रथम दिन पूज्य गुरुदेव की “श्रीमां” के रूप में ख्यात मां मीरा अल्फांसा से भेंट हुई। श्रीमां ने उन्हें प्रसन्नतापूर्वक ‘ योगी ‘ सम्बोधन के पवित्र शब्द से सम्बोधित किया था। उन्होंने पूज्य गुरुदेव से अनेक आध्यात्मिक विषयों पर वार्तालाप किया था। एक दिन ठहरने के पश्चात दूसरे दिन प्रातः पूज्य गुरुदेव की भेंट श्रीअरविन्द से हुई। शुभ्रवर्ण के श्रीअरविन्द, व्यवस्थित और लम्बे घने श्वेत केश व दाढ़ी से युक्त थे। उनका मुखमण्डल , ऋषि सदृश ज्ञान और ईश्वरीय प्रेम से संयोगित था। वे मध्यम कद के योगी थे जिनकी दृष्टि , प्रतिक्षण मानवता को आनंदित रखने हेतु योग के साथ समन्वय करा देने के लिए आतुर रहा करती थीं। अधिकांशतः वे एकान्त वास किया करते। श्रीअरविन्द ने पूज्य गुरुदेव का ससम्मान स्वागत किया, किन्तु नि: सन्देह पूज्य गुरुदेव ने ही पहले उनका अभिवादन किया होगा। यहां अवश्य ही अनुमान होता है कि पूज्य गुरुदेव ने , खादी वस्त्र का कुर्ता और एक धोती पहना होगा जिसका कुछ भाग उनकी कमर में बंधा रहता था। प्रथम दर्शन – स्पर्शन में ही पूज्य गुरुदेव ने महायोगी के मुख से कुछ, आश्रम जीवनधारा अनुसार , योग – ध्यान आदि के विषय में सुनने की इच्छा व्यक्त की होगी।

श्रीअरविन्द ने पूज्य गुरुदेव का ध्यान पूर्वक निरीक्षण किया। अंतःकरण का तीव्र रूप में अध्ययन करने में अभ्यस्त श्रीअरविन्द ने पूज्य गुरुदेव की अनेक जन्मों की उच्च आध्यात्मिक परिणति स्वरूप जीवनों को अपने गहन ध्यान के कछ ही क्षणों में देख लिया। उन्हें यथार्थ अनुभव हुआ कि जिस समष्टि की साधना करने का उपदेश वर्षों पूर्व उन्हें जिन महापुरुष से प्राप्त हुआ था अब वे ही महापुरुष वर्तमान में नूतन देह धारण कर सामने प्रस्तुत हुए हैं , एवम् जिस ‘ अतिमानस (सुपरमैन) के अवतरण ‘ के जन्म की वे वर्षों से धैर्यपूर्वक गूढ़ साधनाओं द्वारा प्रतीक्षा कर रहे थे वह समय एवम् उस विषय के सम्पूर्ण इन्द्रिय व शारीरिक – मानसिक अवयवों के गठन, पूज्य गुरुदेव में, ब्रह्मज्ञ – ब्रह्मनिष्ठ शक्ति के रूप में विद्यमान हैं। साथ ही उन्होंने पूज्य गुरुदेव के व्यवहार में शालीनता और सादगी को लक्ष्य किया, अतः उन्होंने पूज्य गुरुदेव से अपने यौगिक अनुभवों की बातें कहना आरम्भ की :

वे महापुरुष , श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव थे एवम् वर्तमान में वे ही नूतन देह धारण कर , श्रीअरविन्द के समक्ष पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के रूप में प्रकट हुए थे।

श्रीअरविन्द , आश्रम जीवन में (तप साधन से ) ऐसा वातावरण उत्पन्न करने में संलग्न थे कि वहां आए लोगों में अनायास ही दिव्य भाव का प्रस्फुटन हो जाए। इस विषयक वार्तालाप को उन्होंने आरम्भ करते हुए, पूज्य गुरुदेव से कहा ,
” एक ऐसी आध्यात्मिक प्रयोगशाला का निर्माण हो जिसमें ऐसे व्यक्ति (नर – नारीगण ) तैयार किए जाएं जो कि बाह्य स्वरूप से अत्यन्त साधारण दिखाई दें किंतु आन्तरिक स्तर पर वे ईश्वर के दिव्य अनुदान – वरदानों को संभालने में समर्थ और ऊर्जावान हों। वैयक्तिक तथा संघगत रूप से आध्यात्मिक विद्या शिक्षण के लिए ऐसे प्रयत्न हों कि चारों ओर दिव्य चेतना का आविर्भाव होता हुआ दिखाई पड़े। कुछ क्षण बाद उन्होंने पूज्य गुरुदेव से तत्कालीन समय में दक्षिण प्रदेश में मठ-मंदिर-प्रासादों में व्याप्त जाति , उंच – नीच , धनी और दरिद्र आदि रूढ़िवादी विचारों की सीमा को बीते प्राचीन काल की व्यवस्थाएं – पुरानी भाषाएं कहकर संभाषण किया। पश्चात उन्होंने कुछ विचार करते हुए कहा,
” आज के युग में गुफा -कंदराओं में बैठकर साधना नहीं की जा सकती। आने वाले वर्षों में जीवन और जटिल होगा , तब और कठिन समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। परिवार के प्रति थोड़ी उदासीनता साधना में अपरिहार्य हो सकती है किन्तु मोह और आसक्ति में न डूब जाया जाए और उसकी उपेक्षा भी न की जाए। मनुष्य जब आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करता है तो पारिवारिक सम्बन्ध झड़ने लगते हैं। नए सम्बन्ध विकसित होने लगते हैं । पुराने सम्बन्धों में बंधे रहने का अर्थ है सामान्य प्रकृति से बंधे रहना।”
श्री अरविन्द के साथ पूज्य गुरुदेव का यह संभाषण लगभग चालीस मिनिट चला था। जान पड़ता है कि यह वार्तालाप अंगरेजी – हिन्दी मिश्रित भाषा में हुआ था। पूज्य गुरुदेव ने श्रीअरविन्द के साथ हुए अपने वार्तालाप को अपनी स्मृतियों के आधार पर 1968 में लिखा था। पूज्य गुरुदेव ने एक स्थल पर लिखा है :

” प्रकृति का निरीक्षण करने से यहीं जान पड़ता है कि उसका उद्देश्य मानव-चेतना को अधिकाधिक विकसित करना ही है, वर्तमान समय में यह चेतना अपूर्ण है और उस पर ज्ञान की अपेक्षा अज्ञान का प्रभाव ही अधिक है। अहंकार के कारण द्वंद-भाव या विरोध की उसमें उत्पत्ति हो जाती है पर यह स्थिति अन्तिम नहीं है इसके पश्चात् एक ऐसी स्थिति अवश्य होनी चाहिए जिसमें यह द्वंद और विरोध न हो और एक अनुकूल समन्वय पाया जाए। यह उद्देश्य कोई अपूर्व या अनहोनी बात नहीं है मनुष्य जाति के इतिहास में अनेक आध्यात्मिक वीरों ने प्रयत्न करके इस स्थिति को प्राप्त किया है। मानव चेतना के भीतर कुछ ऐसे संकेत मिलते हैं जिनसे प्रगट होता है कि मनुष्य एक दिन ‘ अतिमानवता ‘ की स्थिति (सुपरमैन) को अवश्य प्राप्त कर लेता है इस ‘ अतिमानवता ‘ को हम देवत्व की स्थिति भी कह सकते हैं “

हम अपने पाठकों को बताना चाहेंगें कि श्रीमाता (जन्म नाम मिर्रा अलफासा) (1878-1973) श्री अरविन्द की शिष्या और सहचरी थी। श्रीमाँ फ्रासंसी मूल की भारतीय आध्यात्मिक गुरु थी। हिँदु धर्म लेने से पहले तक उनका नाम था मीरा अलफासा। श्री अरविँद उन्हें माता कहकर पुकारा करते थे इसलिये उनके दुसरे अनुयायी भी उन्हे श्रीमाँ कहने लगे। मार्च 29 1914 में श्रीमाँ पण्डीचेरी स्थित आश्रम पर श्री अरविँद से मिली थीँ और उन्हे भारतीय गुरुकूल का माहौल अच्छा लगा था। प्रथम विश्वयुद्ध के समय उन्हे पण्डिचेरी छोड़कर जापान जाना पड़ा था। वहाँ उनसे विश्वकवि रविन्द्रनाथ टैगोर मिले और उन्हे हिन्दुधर्म की सहजता का एहसास हुआ। 24 नवम्बर 1926 को मीरा आलफासा पण्डिचेरी लौट कर श्रीअरविँद की शिष्या बनी । श्रीमाँ के जीवन के आखरी 30 वर्ष का अनुभव The Agenda नामक पुस्तक में लिखा गया है। श्री अरविन्द उन्हे दिव्य जननी का अवतार कहा करते थे। उन्हे ऐसे करने का जब कारण पूछा गया तो उन्होनें इस पर The mother नाम से एक प्रबन्ध लिखा था। 12 दिसंबर 2007 को लंदन स्थित श्री अरविन्द के निवास को English Heritage Blue Plaque से सम्मानित किया गया। इसी निवास पर रह कर श्री अरविन्द ने विश्व राजनीति का अध्यन किया और ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा भारत में अन्याय का चिंतन मनन किया।
क्रमश : to be continued

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आज के लेख में मातृमंदिर को थोड़ा vertically stretched दिखाया गया है जिससे इसकी आकृति अंडाकार दिखाई दे रही है , ऐसा हमें केवल फोटो की dimensions की विवशता के कारण करना पड़ा। मंदिर की श्रद्धा को हम सदैव नतमस्तक रहेंगें और कोई भी समझौता नहीं करेंगें। -ऑनलाइन ज्ञानरथ

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गुरुदेव के किसी शिष्य के लिए कोई चिन्ता और भय नहीं है।

13 ,2021 मई का ज्ञानप्रसाद -गुरुदेव के किसी शिष्य के लिए कोई चिन्ता और भय नहीं है।

ऑनलाइन ज्ञानरथ के अति समर्पित सहकर्मी एवं गायत्री परिवार साधक आदरणीय जागृति पटेल जी ने आज व्हाट्सप्प पे एक पोस्ट शेयर की जिसने हमें उसी पोस्ट पर आधारित कुछ और रिसर्च करने की प्रेरणा दी और आज का लेख उसी प्रेरणा का ही परिणाम है। कुछ दिन पूर्व विवेक खजांची जी ने फेसबुक पर एक विस्तृत लेख पोस्ट किया था। वह लेख भी इसी सन्दर्भ में था। दोनों लेख श्री अरविन्द (Sri Aurobindo ) पर आधारित थे। महान आत्मायों के बारे में जानकारी प्राप्त करना हमारे जीवन का एक बहुत ही महत्व पूर्ण पक्ष है और इसी पक्ष को सार्थकता देते हुए हमने पिछले वर्ष श्री अरविन्द जी के बारे में कुछ अध्ययन किया , समय -समय पर और भी करते रहते हैं ,नोट्स बना कर लिखते भी रहे हैं। कभी इस विषय पर भी एक -दो विस्तृत लेख ऑनलाइन ज्ञानरथ के समक्ष प्रस्तुत करने का इच्छा है ,देखें गुरुदेव का क्या आदेश होता है !

श्री अरविन्द के बारे में जितना भी अल्प ज्ञान हम एकत्रित कर सके उसकी भूमिका बनाते हुए जागृति जी द्वारा भेजे लेख के साथ कनेक्ट करने का प्रयास करेंगें।

दक्षिण भारत स्थित केंद्र शासित प्रदेश पांडिचेरी (पुडुचेर्री ) का जब जब भी नाम लिया जायेगा श्री अरविन्द का नाम पहले आएगा। भारत को स्वतंत्रता तो 1947 में मिल गयी थी लेकिन पांडिचेरी 1954 तक एक फ्रेंच कॉलोनी बना रहा ,इतना ही नहीं आज भी यहाँ फ़्रांसिसी सभ्यता देखने को मिलती है। विश्व प्रसिद्ध श्री अरविंद आश्रम यहीं पे स्थित है। अक्सर हम श्री अरविन्द को एक महात्मा के रूप में ही जानते हैं। अरविन्द घोष एक योगी एवं दार्शनिक थे। वे 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता में जन्मे थे। इनके पिता एक डाक्टर थे। इन्होंने युवा अवस्था में स्वतन्त्रता संग्राम में क्रान्तिकारी के रूप में भाग लिया, किन्तु बाद में यह एक योगी बन गये और इन्होंने पांडिचेरी में एक आश्रम स्थापित किया। वेद, उपनिषद ग्रन्थों आदि पर टीका लिखी। योग साधना पर मौलिक ग्रन्थ लिखे। उनका पूरे विश्व में दर्शन शास्त्र पर बहुत प्रभाव रहा है और उनकी साधना पद्धति के अनुयायी सब देशों में पाये जाते हैं। यह कवि भी थे और गुरु भी। मात्र 7 वर्ष की उम्र में ही परिवार के साथ वह इंग्लैण्ड चले गए और केवल 18 वर्ष की आयु में ही ICS की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। इसके साथ ही उन्होंने अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, ग्रीक एवं इटैलियन भाषाओँ में भी निपुणता प्राप्त की थी। ICS डिग्री स्वंत्रता के बाद IAS के नाम से प्रचलित हुई और आज तक इसी नाम से चल रही है। इसी भूमिका के साथ आज का लेख प्रस्तुत है जो जुलाई 2003 की अखंड ज्योति में से लिया गया है।

गुरु पूर्णिमा पर बरसती यादों की झड़ी में गुरुदेव की शिष्य वत्सलता के अनेकों रूप हैं। उस दिन भी वह नित्य की भाँति प्रसन्नचित्त लग रहे थे। पूर्णतया खिले हुए अरुण कमल की भाँति उनका मुख मण्डल तप की आभा से दमक रहा था। उनके तेजस्वी नेत्र समूचे वातावरण में आध्यात्मिक प्रकाश बिखेर रहे थे। उनकी ज्योतिर्मय उपस्थिति थी ही कुछ ऐसी जिससे न केवल शान्तिकुञ्ज का प्रत्येक अणु-परमाणु बल्कि उनसे जुड़े हुए प्रत्येक शिष्य व साधक की अन्तर्चेतना ज्योतिष्मान होती थी। उनके द्वारा कहा गया प्रत्येक शब्द शिष्यों के लिए अमृत-बिन्दु था। वे कृपामय अपने प्रत्येक हाव-भाव में, परम कृपालु थे। उनके सान्निध्य में शिष्यों एवं भक्तों को कल्पतरु के सान्निध्य का अहसास होता था। सभी को विश्वास था कि उनके आराध्य सभी कुछ पूरा करने में समर्थ हैं। इस विश्वास का खाद-पानी पाकर कई चाहतें भी मन में बरबस अंकुरित हो जाती थी। उस दिन उनके सान्निध्य में एक शिष्य के मन में बरबस यह भाव जागा कि परम समर्थ गुरुदेव

“ क्या कृपा करके उसे जीवन की पूर्णता का वरदान नहीं दे सकते?”

वही पूर्णता जिसे शास्त्रों ने कैवल्य, निर्वाण, ब्रह्मज्ञान आदि अनेकों नाम दिये हैं। परम पूज्य गुरुदेव अपने पलंग पर बैठे हुए थे और वह उनके चरणों के पास जमीन पर बिछे एक टाट के टुकड़े पर बैठा हुआ था। इस विचार को कहा कैसे जाय, बड़ी हिचकिचाहट थी उसके मन में। सकुचाहट, संकोच और हिचक के बीच उसकी अभीप्सा छटपटा रही थी। सब कुछ समझने वाले अन्तर्यामी गुरुदेव उसके मन की भाव दशा को समझते हुए मुस्करा रहे थे। आखिर में उन्होंने ही हँसते हुए कहा- ” जो बोलना चाहता है, उसे बेझिझक बोल डाल।”

अपने प्रभु का सम्बल पाकर उसने थोड़ा अटकते हुए कह डाला- “गुरुदेव! क्या मुझे आप ब्रह्मज्ञान करा सकते हैं?” इस कथन पर गुरुदेव पहले तो जोर से हँसे फिर चुप हो गए। उनकी हँसी से ऐसा लग रहा था- जैसे किसी छोटे बच्चे ने अपने पिता से कोई खिलौना माँग लिया हो या फिर उसने किसी मिठाई की माँग की हो। पर उनकी चुप्पी रहस्यमय थी। इसका भेद पता नहीं चल रहा था कि आखिर वह हँसते हुए चुप क्यों हो गए? इसी दशा में पल-क्षण गुजरे। फिर वह कमरे में छायी नीरवता को भंग करते हुए बोले- ” तू ब्रह्मज्ञान चाहता है, मैं अभी इसी क्षण तुझे ब्रह्मज्ञान करा सकता हूँ। ऐसा करने में मुझे कोई परेशानी नहीं है। मैं इसमें पूरी तरह से समर्थ हूँ।” इतना कहकर वह फिर से ठहर गए। और उनकी आँखों में करुणा छलक आयी। वह करुणा जो माँ की आँखों में अपने कमजोर-दुर्बल शिशु को देखकर उभरती है। इस छलकती करुणा के साथ वह बोले- “यदि इसी समय तुझे ब्रह्मज्ञान करा दूं, तो जानता है तेरा क्या होगा? बेटा! तू विक्षिप्त और पागल होकर नंगा घूमेगा। छोटे-छोटे लड़के तुझे पत्थर मारेंगे।” सुनने वाले को यह बात बड़ी अटपटी सी लगी। इसका भेद उसे समझ में न आया। घनीभूत मूर्ति गुरुदेव उसे समझाते हुए बोले- “बेटा! तू इसे इस तरह से समझ। यदि 220 वोल्ट वाले पतले तार में 11,000 वोल्ट की बिजली गुजार दी जाय, तो जानता है क्या होगा? “अपने ही इस सवाल का जवाब देते हुए वह बोले- “न केवल वह पतला तार उड़ जाएगा, बल्कि दीवारें तक फट जायगी। ब्रह्म चेतना 11,000 वोल्ट की प्रचण्ड विद्युत् धारा की तरह है। और सामान्य मनुष्य चेतना 220 वोल्ट की भाँति दुर्बल है। इसलिए ब्रह्मज्ञान पाने के लिए पहले तप करके अपने शरीर और मन को बहुत मजबूत बनाना पड़ता है। इन्हें ऐसा फौलादी बनाना होता है, ताकि ये ब्रह्म चेतना की अनुभूति का प्रबल वेग सहन कर सकें। इसके बिना भारी गड़बड़ हो जायगी। जबरदस्ती ब्रह्मज्ञान कराने के चक्कर में शरीर और मन बिखर जाएँगे।” भक्त की चाहत को ठुकराते हुए भी भगवान के मन में केवल निष्कलुष करुणा का निर्मल स्रोत ही बह रहा था। सदा वरदायी प्रभु वरदान न देकर अपनी कृपा ही बरसा रहे थे।

इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए उन्होंने एक सत्य घटना का विवरण सुनाया। यह घटना महर्षि अरविन्द और उनके शिष्य दिलीप कुमार राय के बारे में थी। विश्व विख्यात संगीतकार दिलीप राय उन दिनों श्री अरविन्द से दीक्षा पाने के लिए जोर जबरदस्ती करते थे। वह ऐसी दीक्षा चाहते थे, जिसमें श्री अरविन्द दीक्षा के साथ ही उन पर शक्तिपात करें। उनके इस अनुरोध को महर्षि हर बार टाल देते थे। ऐसा कई बार हो गया। निराश दिलीप ने सोचा कि इनसे कुछ काम बनने वाला नहीं है। चलो किसी दूसरे गुरु की शरण में जाएँ। और उन्होंने एक महात्मा की खोज कर ली। ये सन्त पाण्डिचेरी से काफी दूर एक सुनसान स्थान में रहते थे।

दीक्षा की प्रार्थना लेकर जब दिलीप राय उन सन्त के पास पहुँचे। तो वह इस पर बहुत हँसे और कहने लगे- “तो तुम हमें श्री अरविन्द से बड़ा योगी समझते हो। अरे वह तुम पर शक्तिपात नहीं कर रहे, यह भी उनकी कृपा है।” दिलीप को आश्चर्य हुआ- ये सन्त इन सब बातों को किस तरह से जानते हैं। पर वे महापुरुष कहे जा रहे थे, “तुम्हारे पेट में भयानक फोड़ा है। अचानक शक्तिपात से यह फट सकता है, और तुम्हारी मौत हो सकती है। इसलिए तुम्हारे गुरु पहले इस फोड़े को ठीक कर रहे हैं। इसके ठीक हो जाने पर वह तुम्हें शक्तिपात दीक्षा देंगे।” अपने इस कथन को पूरा करते हुए उन योगी ने दिलीप से कहा “मालूम है, तुम्हारी ये बातें मुझे कैसे पता चली? अरे अभी तुम्हारे आने से थोड़ी देर पहले सूक्ष्म शरीर से महर्षि अरविन्द स्वयं आए थे। उन्होंने ही मुझे तुम्हारे बारे में सारी बातें बतायी।”

उन सन्त की बातें सुनकर दिलीप तो अवाक रह गये। अपने शिष्य वत्सल गुरु की करुणा को अनुभव कर उनका हृदय भर आया। पर ये बातें तो महर्षि उनसे भी कह सकते थे, फिर कहा क्यों नहीं? यह सवाल जब उन्होंने वापस पहुँच कर श्री अरविन्द से पूछा, तो वह हँसते हुए बोले, “यह तू अपने आप से पूछ, क्या तू मेरी बातों पर आसानी से भरोसा कर लेता।” दिलीप को लगा, हाँ यह बात भी सही है। निश्चित ही मुझे भरोसा नहीं होता। पर अब भरोसा हो गया। इस भरोसे का परिणाम भी उन्हें मिला निश्चित समय पर श्री अरविन्द ने उनकी इच्छा पूरी की।

यह सत्य कथा सुनाकर गुरुदेव बोले- बेटा! गुरु को अपने हर शिष्य के बारे में सब कुछ मालूम होता है। वह प्रत्येक शिष्य के जन्मों-जन्मों का साक्षी और साथी है। किसके लिए उसे क्या करना है, कब करना है वह बेहतर जानता है। सच्चे शिष्य को अपनी किसी बात के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है। उसका काम है सम्पूर्ण रूप से गुरु को समर्पण और उन पर भरोसा। इतना कहकर वह हँसने लगे, “तू यही कर। मैं तेरे लिए उपयुक्त समय पर सब कर दूंगा। जितना तू अपने लिए सोचता है, उससे कहीं ज्यादा कर दूंगा। मुझे अपने हर बच्चे का ध्यान है।” अपनी बात को बीच में रोककर अपनी देह की ओर इशारा करते हुए बोले- “बेटा! मेरा यह शरीर रहे या न रहे, पर मैं अपने प्रत्येक शिष्य को पूर्णता तक पहुँचाऊँगा। समय के अनुरूप सबके लिए सब करूंगा। किसी को भी चिन्तित-परेशान होने की जरूरत नहीं है।”

सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा और नई उमंग लेकर आए। जय गुरुदेव परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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आइये सब सहकारिता से कार्य करें

10 मई 2021 का ज्ञानप्रसाद
आज का लेख बहुत ही भावनात्मक और प्रेरणा से भरपूर है। यह इसलिए है कि हमारे परमपूज्य गुरुदेव की दिव्य उँगलियों से उनके मार्गदर्शक के निर्देश पर लिखे हुए लेखों में से चुन कर यह लेख आपके समक्ष प्रस्तुत है। अखंड ज्योति जनवरी 1962 में प्रकाशित हुआ लेख आज हमारे,आप सबके ऑनलाइन ज्ञानरथ के संदर्भ में पूरी तरह उतरता है।

लेख आरम्भ करने से पहले हम अपने पाठकों को 1962 के दिनों में ले जाने का प्रयास करेंगें। इस अंक के मुख पृष्ठ पर देखने से पता चलता है कि एक कॉपी का मूल्य केवल 4 आना था और वार्षिक मूल्य 3 रूपए था। आज 2021 में एक अंक का मूल्य 19 रूपए है और वार्षिक चंदा केवल 220 रूपए है। यह तुलना हम इसलिए कर रहे हैं कि जिन लाखों करोड़ों की मशीनों पर यह पत्रिका प्रिंट होती है और बाकि के प्रोसेस को अगर हम नज़रअंदाज़ भी कर दें तो इनका मूल्य लगभग फ्री ही है। आज के युग की इससे भी बड़ी बात यह है कि गुरुदेव का लगभग सारा साहित्य ऑनलाइन फ्री पढ़ने के लिए उपलब्ध है। हम अपने पाठकों को अनुरोध करेंगें कि इस दिव्य पत्रिका का नियमित अध्यन किया जाये और अपने परिजनों में शेयर भी किया जाये। इस पत्रिका का अमृत पान करने से अवश्य ही जीवन दान मिलता है। तो आओ चलें आज के लेख की ओर।

अग्नि से अग्नि उठेगी :
गुरुदेव अखंड ज्योति पत्रिका के बारे में लिखते हैं कि इसमें जो लेख लिखे जाते हैं उनमें जीवन का निर्माण करने का तत्व होता है। इन लेखों को ह्रदय की स्याही में अपनी कलम डुबोकर,अपने प्राणो की भाषा से अक्षर चुन -चुन कर पूरे मनोयोग की कलम से लिखा हुआ है। इन लेखों में जीवन और प्रकाश की मात्रा मौजूद है। यह प्रकाश अवश्य ही आपके जीवन में आग लगाने में सफल होगा। आप जानते ही हैं कि जब कभी आग लगती है उसको रोकना अत्यंत कठिन होती है। आग का काम है फैलना ,इसने तो फैलना ही है।

हम ऑनलाइन ज्ञानरथ पाठकों का ह्रदय जानते हैं। यह अत्यंत स्वाभाविक है कि जब आपको कोई नई बात का पता चलता है तो आप छोटे बच्चे की तरह भाग -भाग कर बताने में उत्सुक होते हैं। आपकी उत्सुकता का लेवल और भी अधिक होता है जब आप किसी कार्य में सफल होते हैं जैसे कि परीक्षा में फर्स्ट आना। ऐसी ही प्रसन्नता और उत्सुकता गुरुदेव के साहित्य को पढ़ने में होनी चाहिए जो हम सम्पूर्ण समर्पण से आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं।
गुरुदेव अखंड ज्योति पत्रिका को एक ” पावर हाउस ” का नाम देते हैं। जिस प्रकार पावर हाउस में से बिजली generate होती है और घर- घर को प्रकाशमय बनाती है ठीक उसी तरह युग निर्माण योजना का हर कोई सदस्य एक बल्ब की तरह प्रकाश फैलाने का कार्य करेगा/कर रहा है । अखंड ज्योति का पाठक केवल एक धार्मिक पत्रिका का पाठक मात्र न रह कर एक लौकिक शिक्षक के रूप में अपने आप को प्रस्तुत करेगा। जब अँधेरा छट जाता है तो प्रकाश से सारा विश्व जगमग हो जाता है। हमारे पाठक इस बात से सहमत होंगें कि

“अज्ञान ही मानव जाति का सबसे बड़ा शत्रु है।”

संसार से सारे कुकर्म इसी अंधकार में पनपते हैं उल्लू ,चमगादड़ ,सर्प ,बिच्छू ,कनखजूरे अँधेरे में ही तो बैठे रहते हैं ,क्यों ? क्योंकि यह प्रकाश सहन नहीं कर पाते। प्रकाश में इन प्राणियों की आँखें चुंदीआं जाती हैं। आपने कई बार देखा होगा – प्रकाश दिखते ही cockroach कैसे भाग उठते हैं। इसी सन्दर्भ को हम आज के युग के उन लोगों के साथ compare कर सकते हैं जिनको ज्ञान की बात समझ आना तो दूर सुनने को भी तैयार नहीं हैं। क्योंकि उनके ऊपर अज्ञान की भारी परत उन्हें कुछ अच्छा करने ही नहीं देती।

गुरुदेव कहते हैं – धन का दान करने वाले तो बहुत हैं परन्तु ” समय का दान ” तो कोई-कोई ही कर सकता है। धन से सड़क बन सकती है ,भवन बन सकता है लेकिन चरित्र बनाने के लिए एक समर्पित शिक्षक का बहुमूल्य समय ही काम आता है। हम यह कतई नहीं कह रहे कि धनवान लोगों की आवश्यकता नहीं है यां धनवान लोगों में कोई बुराई है। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि धनवान के पास समय का अभाव है और वह पहले अपना लाभ देखता है – He is a business man। एक शिक्षक अगर सही मायने में शिक्षक है तो वोह पहले समाज का ,सेवा का ,पुरषार्थ का सोचता है ,इसीलिए उसे Nation Builder कहा गया है। एक शिक्षक अपना पूरा समय अपने आप को परिष्कृत करने और ज्ञान अर्जित करने में लगाता है और फिर उस ज्ञान को बाँटने में तत्पर रहता है। इसके लिए समय की आवश्यकता होती है और फिर समय दान की। युगनिर्माण के इस महान कार्य में समयदान के लिए हर कोई तत्पर रहेगा,कोई भी कंजूसी नहीं दिखाएगा ऐसा हमारा अटल विश्वास है।

शिक्षक द्वारा ज्ञान प्राप्ति के उपरांत उसमें फिर वही उत्सुकता जाग उठती है जो एक बच्चे में सभी को बताने में होती है। हमें भी जब कोई ज्ञान की प्राप्ति होती है तो हम जब तक आपके समक्ष प्रस्तुत नहीं कर लेते हमें नींद तक नहीं आती। हम न दिन देखते हैं न रात्रि। एक बार ,दो बार और कितनी ही बार पढ़ कर परिष्कृत करने के उपरांत ही आपके समक्ष प्रस्तुत करने का साहस करते हैं।

जब शिक्षक की बात हो रही है तो हम सत्यम भूषण जी का कमेंट आपके साथ शेयर करना चाहेंगें। भूषण जी लिखते हैं कि यूँ लग रहा है कि हम किसी एक ऐसे विद्यालय के विद्यार्थी हैं जिनके शिक्षक आदरणीय डॉक्टर साहिब हैं और प्रधान शिक्षक परमपूज्य गुरुदेव हैं। भूषण जी आपके कमेंट का सम्मान करते हुए हम यही कहना चाहेंगें कि परमपूज्य गुरुदेव के साथ हमारा क्या मुकाबला, वह तो स्वयं ही सूर्य हैं और अगर हमें उनसे थोड़ी सी भी प्रेरणा मिलती हो और हम कुछ कर सकने में समर्थ होते हैं तो इसमें आप सबका बहुत बड़ा योगदान है। शिक्षक अकेले कुछ भी नहीं कर सकता अगर शिष्य समर्पित न हो। शिक्षक -शिष्य का समन्वय अटूट है , इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं इस तथ्य को साबित करने के लिए।

34 वर्षीय सूर्य कुशवाहा जी का कमेंट भी बहुत ही प्रेरणादायक है। सारा कमेंट तो शेयर नहीं करेंगें लेकिन इतना अवश्य कहेंगें कि कुशवाहा जी ने ऑनलाइन ज्ञानरथ के कार्य के लिए, इसके सहकर्मियों के लिए बहुत ही सराहनीय शब्द प्रयोग किए हैं। कुशवाहा जी ने झाँसी गायत्री शक्तिपीठ में 15 माह और मुंसियारी चेतना केंद्र में समयदान करके अपनी श्रद्धा और समर्पण को प्रकट किया है । ऑनलाइन ज्ञानरथ के लिए भी सम्पूर्ण समर्पण के साथ सहयोग करने की इच्छा व्यक्त की है। उनके उत्तर में हम कहना चाहते हैं आपका ऑनलाइन ज्ञानरथ में स्वागत है और हमारा सौभाग्य है कि आप जैसे युवा हमारे ज्ञानरथ को गति देने में तत्पर हैं। आज जितने भी सहकर्मी अपनी सहकारिता का प्रमाण दे रहे हैं उन्होंने ने भी अपना -अपना कार्यभार अपनी समर्था के अनुसार अपने कन्धों पर ले लिया था और आज तक अनवरत हमारे साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहे हैं।

इस ऑनलाइन ज्ञानरथ का मुख्य उदेश्य ज्ञान -प्रचार और ज्ञान -प्रसार है। अगर ज्ञान का प्रचार-प्रसार न हो तो हम बेशक सैंकड़ों पुस्तकें खरीद लें सब अर्थहीन होगा और ज्ञान का अनादर होगा। इसीलिए हम बार-बार इस बात को दोहराते आए हैं कि हमारे लेखों की readership और वीडियो की viewership बढ़नी चाहिए। युवा शक्ति इसमें बहुत योगदान दे सकती है। कुशवाहा जी के साथ और युवा साथियों को हम सुझाव दे सकते हैं कि लेखों और वीडियो की popularity पर दृष्टि बनाये रखें और अपने क्षेत्र में अधिक से अधिक शेयर करें। युवा शक्ति भारत कि सबसे बड़ी शक्ति क्योंकि इस देश में युवाओं की संख्या और शक्ति विश्व में सबसे अधिक है।

जब हम readership और viewership के नंबरों की बात कर रहे हैं तो इसका कतई अर्थ नहीं है कि हम इसमें कोई आर्थिक लाभ लेना चाहते हैं यां इसमें हमारा कोई स्वार्थ है । हम तो केवल निस्वार्थ सेवारत होना चाहते हैं। हमें तो न यश चाहिए न उत्कर्ष चाहिए, जीवन भर संघर्ष चाहिए ,अजय विजय की चिंता क्या जब जाग्रत हमारी हस्ती है, नित नूतन हमारी हस्ती है जब गुरुदेव हमारे अंग संग हैं ,रोम रोम में हैं।

यह दोनों कमेंट हमने आज के लेख के सन्दर्भ में होने के कारण शेयर किए हैं। इच्छा तो सदैव यही रहती है कि सब कमैंट्स का रिप्लाई किया जाये लेकिन हो नहीं सकता। उसके दो कारण है -एक समय का अभाव ,दूसरा हमारे सहकर्मी हमसे अच्छे उत्तर दे रहे हैं और सभी की भावनाओं को पढ़ रहे हैं। लेकिन फिर भी कहीं-कहीं ,कभी -कभी हम रिप्लाई कर भी देते हैं इससे हमें भी संतुष्टि होती है।

हम अपने पाठकों को यह बताना चाहेंगें कि पूज्यवर ने यह बातें आज के लगभग 6 दशक पूर्व लिखी थीं और आज उनके द्वारा लगाया गायत्री परिवार का पौधा एक विशाल वृक्ष बन कर विश्व भर में संरक्षण प्रदान कर रहा है। लगभग 15 करोड़ सदस्यों का यह परिवार ,जिसका प्रत्येक सदस्य अपने गुरुदेव का ही प्रतिबिम्ब है , मनुष्य में देवत्व का उदय करने को कृतसंकल्प है। यह पीले वस्त्रों वाले साधकों की विशाल सेना गुरुदेव के स्वप्न को साकार करने में कृतसंकल्प है। हम अगर गुरुदेव के समर्पित और सच्चे सैनिक हैं तो गुरुदेव स्वयं ही हमारा चयन करके अपने चरणों में स्थान देंगें।

आज के ज्ञान प्रसाद में बस इतना ही। आशा करते हैं आप भी इस विश्व को प्रकाशमय बनाने में अपना योग दान देंगें और ज्ञानरथ को गति देंगें।
जय गुरुदेव

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मसूरी इंटरनेशनल स्कूल पर आधारित है आज ( 4 मई 2021 ) का ज्ञानप्रसाद

मित्रो अपने पहले वाले लेख में हमने आपको बताया कि कैसे गुरुदेव की शक्ति से प्रेरित होकर और नारी सशक्तिकरण की दिशा में हसमुख राय रावल नामक प्रवासी भारतीय ने मसूरी इंटरनेशनल स्कूल की उत्पति की ,जो पूरे का पूरा कन्या आवासीय ( residential ) स्कूल है।रावल जी तो शांतिकुंज में अनुष्ठान करने आए थे और बीच में उनके पास एक दिन फ्री था तो उन्होंने मसूरी का केम्पटी फाल देखने का मन बनाया। मसूरी में उन्होंने एक खाली भूमि का बिकाऊ टुकड़ा देखा तो उस पर होटल बनाने के विचार से खरीद लिया। लेकिन गुरुदेव ने उनको बोला

” यह भूमि होटल के लिए नहीं है ,इस पर 1000 वर्ष पूर्व ऋषियों ने घोर तपश्चर्या करके इसको दिव्यता प्रदान की है और तू इस पर एक कन्या विद्यालय बना दे ”

गुरुदेव की बात को अमृत वाणी मान कर रावल जी ने 1984 में इस विद्यालय की स्थापना की। इस विद्यालय के बारे में सम्पूर्ण विस्तार से लिखना तो संभव नहीं है लेकिन हम कुछ महत्वपूर्ण बातें अपने सहकर्मियों के साथ शेयर करने का प्रयास करेंगें। मसूरी डाउनटाउन से केवल साढ़े पांच किलोमीटर दूर स्थित है मसूरी इंटरनेशनल स्कूल ( MIS ) यह एक ऐसा विद्यालय है जहाँ परम्परागत ( traditional ) और आधुनिक ( modern ) शिक्षा का अविश्वसनीय समन्वय मिलता है। एक तरफ गायत्री मन्त्र और गायत्री साधना और दूसरी तरफ आज के युग की समस्त आधुनिक गतिविधियां हमारी बालिकाओं का सम्पूर्ण विकास करने में समर्थ हैं। यह स्कूल Council for the Indian School Certificate Examinations (CISCE code UT026), New Delhi and University of Cambridge International Examinations (CIE) , IBDP. के साथ affiliated है I कहने का अर्थ यह है की यह स्कूल CBSE के साथ नहीं है I विद्यालय का logo देखते स्वयं ही दिव्यता का आभास हो जाता है ” धियो योनः प्रचोदयात” का होना अपने आप ही गायत्री उपासना के लिए प्रेरित करता जाता है। विद्यालय में पहाड़ी पर स्थित मंदिर दिव्यता प्रदान करता हुआ कुछ यूँ बातें करता हुआ प्रतीत होता है :

“आज रविवार की सुबह है,विद्यालय बिल्क़ुल शांत और भावपूर्ण है। विद्यालय के मंदिर में भजन बजाए जा रहे हैं, सूर्यौदय हो रहा है, पर्वतों के उच्च शिखर एक राजसी बड़े भाई की तरह सुरक्षात्मक दृष्टिकोण के साथ हम पर मुस्कुरा रहे हैं। नीचे विद्यालय परिसर की ताज़ी रंगीन दीवारों से रिफ्लेक्ट होती चमक दमक, गेंदें के फूलों की फसल लहलहा कर स्वर्गीय वातावरण का आभास दे रही है एक पेड़ के शीर्ष पर अकेला पक्षी , बच्चियों के आने का इंतजार कर रहा है ”

पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर में सभी प्रतिमाओं पर नवरात्री को नए वस्त्र पहनाये जाते हैं। माँ गायत्री के साथ ही परमपूज्य गुरुदेव की प्रतिमा इस मंदिर को शोभायमान करती है। वर्तमान प्रिंसिपल मीता शर्मा जहाँ स्कूल की और सारी गतिविधियों में बालिकाओं का मार्गदर्शन करती हैं वहीँ स्कूल की आध्यात्मिक क्रियाओं में भी पूर्ण तौर पे सहयोग देती हैं। हमारे साथ संक्षिप्त बातचीत के दौरान उन्होंने MIS के बारे में किसी भी प्रकार सहयोग देने की उत्सुकता दिखाई। स्कूल की वेबसाइट और सोशल मीडिया साइट्स पर उनकी सक्रियता देखी जा सकती जहाँ वह बच्चों और स्टाफ के साथ गायत्री हवन करती दिखाई देती हैं। स्कूल प्रांगण के सामने पहाड़ी पर स्थित मंदिर में देवियों के वस्त्र बदलते हुए और बालिकाओं का कन्या पूजन करते भी हम इनको देख सकते हैं। शांतनु प्रकाश जो इस स्कूल के ट्रस्टी हैं इन्हे भी हम परमपूज्य गुरुदेव और माँ गायत्री के चित्रों के समक्ष नतमस्तक होते देख सकते हैं। स्कूल के प्रांगण में स्थित “प्रज्ञा शिखर” एक बहुत ही आकर्षित मीनार की तरह आपका स्वागत करता है, इसके ऊपर ग्लोब बहुत ही मनोहर दृश्य देता है।

हसमुख राय रावल जी की जितनी भी वीडियो हमने देखीं सब में परमपूज्य गुरुदेव के समक्ष नतमस्तक होते उन्होंने एक बात कही :

” गुरुदेव ने हमें धरती से उठाकर आकाश पर बिठा दिया “।

हमारे गुरुदेव हैं ही ऐसे। चाहे हम मृतुन्जय तिवारी ,मस्तीचक हस्पताल के ट्रस्टी से बात करें , ,मस्तीचक स्थित गायत्री शक्तिपीठ के अधिष्ठाता आदरणीय शुक्ला बाबा से बात करें, लीलापत शर्मा जी का साहित्य पढ़ें यां फिर गायत्री परिवार के किसी भी परिजन से बात करें सभी गुरुदेव के प्रति भरपूर समर्पण व्यक्त करेंगें क्योंकि सभी को गुरुदेव ने एक अद्भुत संरक्ष्ण प्रदान किया है। रावल जी अगर एक सफल बिज़नेस मैन हैं तो उनकी पत्नी भी कोई कम नहीं हैं। गुजरात प्रदेश के नगर भुज में जन्मी कल्पना रावल भारत से ही LL.B और LL .M की डिग्री प्राप्त करने उपरांत 27 वर्ष की आयु में अपने पति हसमुख राय रावल जी को join करने 1973 में केन्या ( अफ्रीका ) में शिफ्ट हो गयीं। कल्पना जी केन्या की सुप्रीम कोर्ट में डिप्टी चीफ जस्टिस और वाईस प्रेजिडेंट के पद से रिटायर हो चुकी हैं।

हम अपने सहकर्मियों के लिए गुरुदेव/गायत्री परिवार से सम्बंधित बिल्क़ुल ही यूनिक जानकारियां प्रस्तुत करने का प्रयास करते रहते हैं ,ऐसी जानकरियां जो लीक से हटकर हों ,जिन्हें कभी किसी ने दर्शाया न हो। मन मैं सदैव एक आग सी धधकती रहती है कि गुरुदेव के साहित्य में से जो कुछ भी नया हो उसे रीसर्च करके आपके समक्ष लाया जाये और ऐसे विषय लाये जाएँ जो कभी पहले किसी ने न छुए हों। इसीलिए किसी भी विषय पर कार्य शुरू करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि यह वीडियो यां लेख कहीं पहले किसी ने प्रस्तुत तो नहीं किया है क्योंकि अगर हमने वही कर दिया जो पहले ही उपलब्ध है तो यह फोटोकॉपी ही हुआ। रिसर्च फोटोकॉपी नहीं ,ओरिजिनल होती है। इसके लिए हमें कई लोगों से संपर्क करना पड़ता है , कई किताबें पढ़नी पड़ती हैं ,कई वीडियो देखनी पड़ती हैं और कई कई दिन ,कई कई रातें चिंतन -मनन करना पड़ता है ,सुनिश्चित करना पड़ता है कि जो हम प्रस्तुत कर रहे हैं उसकी validity पर कोई ऊँगली न उठा दे। अगर हमारा कोई शुभचिंतक कार्य प्रकाशित करने के पश्चात् हमारे कार्य में कोई सकारात्मक सुझाव देता है तो बहुत हर्ष की प्राप्ति होती है I इतना परिश्रम करके हमें भी पूर्ण संतुष्टि होती है जब आप हमारे कार्य को सराहते हुए परमानंद का अनुभव करते हैं और कमेंट करते हैं। यह सब परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन के कारण ही सम्पन्न हो रहा है नहीं तो हम कहाँ इतना कुछ करने में समर्थ थे। गुरुदेव हमसे यह सब करवाते गए ,आप जैसे सामर्थ्यवान सहकर्मी हमसे जुडते गए ,ज्ञानरथ आगे ही आगे गति शील होता गया।

अखंड ज्योति नेत्र हस्पताल का लेख लिखते समय भी हमने कहा था कि यह जानकारी इतनी विस्तृत है कि इसको दो -तीन लेखों में compile करना संभव नहीं है, तो जिस किसी को भी दिलचस्पी हो इंटरनेट से सर्च कर ले। मसूरी इंटरनेशनल स्कूल के बारे में भी हम यही कहेंगें कि जानकारी विस्तृत तो है ही लेकिन दिलचस्प भी बहुत है और सब कुछ प्रस्तुत करना संभव नहीं है। YouTube की अपनी लिमिटेशन है कि एक फोटो से अधिक नहीं लगा सकते ,व्हाट्सप्प पर कितनी ही लगा लो ,इसका एक ही विकल्प है कि हम समय समय पर आपको इस स्कूल की फोटो दिखाते जायेंगें ताकि आप इस स्कूल की दिव्यता को अपने ह्रदय में बसाये रखें।

तो इन्ही शब्दों के साथ आज का लेख को विराम देते हुए सूर्य भगवान की प्रथम किरण से नया सवेरा ,नई ऊर्जा और नई उमंग की कामना करते हैं । परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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नेत्र हस्पताल के बाद इंटरनेशनल स्कूल की उत्पति गुरुदेव की अनुकम्पा

2 मई 2021 का ज्ञानप्रसाद
आज के ज्ञान प्रसाद में हम आपको मसूरी इंटरनेशनल स्कूल के बारे में बता रहे हैं। इस स्कूल की उत्पति की कथा भी बिल्कुल वैसी ही है जैसी आपने अभी अभी अखंड ज्योति नेत्र हस्पताल की पढ़ी। गुरुदेव की प्रेरणा और आशीर्वाद से उत्पन हुआ यह स्कूल देहरादून से 39 किलोमीटर दूर हिमालय की गोद में बिल्कुल ही दिव्य वातावरण में स्थित है। इंटरनेशनल स्तर का यह स्कूल “केवल बालिकाओं” का ही स्कूल है।

परमपूज्य गुरुदेव ने नारी सशक्तिकरण और बालिकाओं की शिक्षा के लिए जहां अपनी जन्मभूमि आंवलखेड़ा में कम लागत वाले संस्थानों – माता भगवती देवी कन्या कॉलेज , श्री दान कुंवरि इंटर कॉलेज , स्वाबलम्भ्न केंद्रों को जन्म दिया वहीं उच्च लागत वाले मसूरी इंटरनेशनल स्कूल को जन्म दिया। इस स्कूल की एक वर्ष की फीस भारतीयों के लिए पांच लाख रुपए वार्षिक है जबकि विदेशी विद्यार्थियों के लिए आठ लाख रूपए वार्षिक है। इसके इलावा और क्या कुछ चार्ज किया जाता है आप स्कूल की वेबसाइट से देख सकते हैं https://www.misindia.net/

देहरादून क्षेत्र में सम्पूर्णतया आवासीय ( Fully residential ) स्कूल के लिए इतनी फ़ीस होना कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि इसी क्षेत्र में और स्कूल भी हैं जो इससे भी अधिक फीस वसूल कर रहे हैं। इन स्कूलों/कॉलेजों में अमिताभ बच्चन और राजीव गाँधी जैसे उच्च स्तरीय व्यक्तित्व शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं। मसूरी इंटरनेशनल स्कूल के पूर्व छात्राओं ने सम्पूर्ण विश्व में अपना नाम और ख्याति अर्जित की है और यहाँ लगभग 27 देशों के नागरिक शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं।

इस स्कूल के बारे में और कुछ जानने से पूर्व आप उत्सुक हो रहे होंगें कि जब परमपूज्य गुरुदेव का समस्त जीवन ग्रामीण और निर्धन बच्चे बच्चियों के लिए समर्पित था तो इतने उच्च स्तरीय ,इतने महंगें स्कूल के जन्म के पीछे क्या रहस्य रहा होगा। तो सुनिए कैसे हुआ था जन्म।

बात 1983 की है जब केन्या ( अफ्रीका ) से प्रवासी भारतीय डॉक्टर हसमुख राय रावल शांतिकुंज में नवरात्री अनुष्ठान के लिए आए। अनुष्ठान समाप्ति के उपरांत रावल गुरुदेव के चरणस्पर्श के लिए गए। रावल जी के पास एक दिन था,परसों की फ्लाइट थी तो गुरुदेव ने कहा आप मसूरी घूम आइये ,वहां केम्पटी फॉल है और विश्व प्रसिद्ध स्कूल भी हैं। तो रावल जी ने सोचा हमारा व्यवसाय भी शिक्षा है तो वहां जाने का प्रोग्राम बना लिया। केम्पटी फॉल 5 -6 किलोमीटर दूर है ,उसे देखने के बाद वापस आ रहे थे तो एक बोर्ड देखा -land for sale । रावल जी व्यापारी हैं और उन्होंने सोचा देखते हैं भारत में ज़मीन का क्या भाव है।
रावल जी कहते हैं ” हमें तो कुछ भी पता नहीं ज़मीन का क्या भाव है ,कोई तोल मोल भी नहीं किया ,बस साइन किया और वापिस आ गए। वापिस आकर गुरुदेव से बात की तो गुरुदेव कहने लगे,
” बेटा यह ज़मीन तेरे लायक नहीं है ,तू इतनी ज़मीन खरीद कर क्या करेगा ,तेरा लंदन में भी घर है ,अफ्रीका में भी घर है क्या करेगा इतने घरों का। “

रावल जी कहते हैं ” हमने तो कोई भी आगे चर्चा नहीं की , न कुछ पूछा कि गुरुदेव आप ऐसा क्यों कह रहे हैं। गुरुदेव ने कह दिया तो कह दिया – no arguments । हमने तो यही सोचा कि कोई चमत्कार होने वाला है।”

गुरुदेव थोड़ी देर रुक कर गुरुदेव बोले, ” यह ज़मीन जो तुम खरीद कर आए हो ,यहाँ हिमालय में 1000 वर्ष पूर्व ऋषि सत्ताओं ने घोर तप किये थे और यह दिव्य भूमि है। यहाँ तेरा नाच डांस ,एंटरटेनमेंट वाला व्यापार न चल पायेगा।”
रावल जी ने पूछा ” तो गुरुदेव आप स्वयं ही बता दीजिये मैं क्या करूं इस ज़मीन का ? “
तो गुरुदेव ने कहा, ” तू यहाँ पर कन्या विद्यालय खोल। “
रावल जी कहते हैं , ” तो ठीक है गुरुदेव ,आपने कह दिया तो ऐसा ही होगा।”

इसके बाद रावल जी वापिस चले गए और विद्यालय का पूरा मास्टर प्लान बना कर लाए। अमेरिका के प्रसिद्ध आर्किटेक्ट पॉल रोनो से मास्टर प्लान बनवाया जिसका पहाड़ों को काट कर बिल्डिंग बनाने का बहुत ही अनुभव था।
रावल जी और पॉल रोनो प्लान लेकर परमपूज्य गुरुदेव के पास पहुंचे। गुरुदेव प्लान को देख रहे थे और छोटी सी पेंसिल से प्लान के ऊपर निशान लगा कर काटे जा रहे थे। कह रहे थे इसको काट दो ,यह आवश्यक नहीं है इत्यादि। इस पोरशन को यहाँ ले आओ ,इसे उधर ले जाओ। पॉल रोनो यह सब देखे जा रहा था और हैरान भी था कि मेरे काम को ,विश्व विख्यात आर्किटेक्ट के काम को जिसे आज तक कोई चैलेंज नहीं कर सका पूज्यवर चैलेंज कर रहे हैं। उससे रहा न गया रावल जी से पूछने लगा
” यह ओल्ड मैन कौन है , इसकी qualification क्या है ?”
रावल जी ने कहा ,” यह ओल्ड मैन जो भी हो ,इन्होने जो कह दिया तो करना ही पड़ेगा ,इसमें कोई भी चर्चा नहीं हो सकती “
तो इस तरह उत्पति हुई मसूरी इंटरनेशनल स्कूल की जिसको आज लगभग चार दशक होने को हैं।

रावल जी कहते हैं , ” यह तो एक चमत्कार ही हुआ और सब परमपूज्य गुरुदेव ने ही किया। लेकिन एक बात हम आपको कहते हैं कि गुरुदेव ने कभी भी यह नहीं महसूस होने दिया कि यह वह स्वयं कर रहे हैं। अपनी शक्ति और तपश्चर्या का बोध उन्होंने कभी न होने दिया। हमारा मन कई बार डोल जाता कि गुरुदेव ने इतना बड़ा काम दे दिया ,कैसे होगा। तो तब हम गुरुदेव से प्रार्थना करते, गुरुदेव हमें सम्भाल लेना और हमारा काम एक दम,इंस्टेंट कॉफ़ी की तरह सुलझ जाता। कई बार घमंड भी आ जाता था कि मैं इतना बड़ा बिज़नेसमैन इतने लोगों को आर्डर देता हूँ तो गुरुदेव एक दम रोक देते और गुस्से में आकर बोलते
,
” तू क्या समझता है ,यह सारा कार्य तू खुद कर रहा है क्या ? ,मैंने 24 घंटे वहां खड़े होकर तेरे स्कूल की रखवाली की है ,तेरा एक भी बैग चोरी हुआ है क्या ? ,यहाँ 1500 मज़दूर दिन -रात काम करते थे ,स्कूल की boundry बनाने में ही 2 वर्ष लग जाते , 30-30 फुट ऊँचे तो तेरे स्कूल के छत थे ,इतना काम तू अकेले में कर सकता था क्या ? मैं 24 घंटे तेरे साथ खड़ा रहा और किसी को भी कोई नुकसान नहीं होने दिया और तू कहता है
सब मैंने खुद किया है। यह सब तेरे को याद नहीं हैं ,मैं याद दिलाता हूँ “

तो मित्रो यह एक कहानी है ,रावल जी की कहानी उन्ही की ज़ुबानी :

” रात आठ बजे का समय होगा, मैं अकेला अपने नौकर के साथ बैठा था , मेरा भारत में और कोई तो था नहीं , एक नौकर मेरी देखभाल करता था ,खाना वगैरह बना देता था। मेरी आंख लग गयी और मैं क्या देखा हूँ कि गुरुदेव मेरे सामने आये ,मैंने कहा गुरुदेव इतनी रात में आप क्यों आये, मैं गुरुदेव को समझ नहीं सका कि भगवान मेरे घर आए हैं। मैंने सोचा यह मेरे दोस्त हैं। मैंने कहा गुरुदेव आप मेरे को बताते मैं गाड़ी भेज देता। गुरुदेव ने कहा चुपचाप सुन , बैठ इधर। मैंने कहा ,गुरुदेव मेरे को तो चाय बनाना भी नहीं आता ,मैं तो एक बिगड़ा हुआ इंसान हूँ। “
गुरुदेव कहने लगे ” मैं चाय पीने थोड़े आया हूँ ?”
रावल जी ने कहा ” तो क्या करना है ,क्या आज्ञा है ?”
गुरुदेव ने कहा ” उठ ,चल राउंड लगा कर आते हैं “
रावल जी ने बोला,” गुरुदेव रात को कैसे जायेंगें ,शेर ,चीते ,जंगली जानवर होंगें , आप आराम से सो जाएँ ,सुबह जायेंगें। “
गुरुदेव ने कहा ” मेरे पास समय नहीं है ,चल अभी चल। “
मैं चल पड़ा ,नींद में था ,गुरुदेव पता नहीं क्या कुछ बता रहे थे , इधर यह बनाओ , इसको ऐसे कर लो, हॉस्पिटल ऊपर लेकर आ , इत्यादि ,इत्यादि
रावल जी ने कहा ,” आप जैसा कहेंगें वैसा ही करेंगें आप ने ही तो प्लान बनाया है। जंगल में पहाड़ के बीचो-बीच कोई रास्ता तो था नहीं ,मुझे साथ लेकर चलते रहे और पूरा राउंड लगाया। राउंड लगा कर आकर बैठ गए। मैंने कहा गुरुदेव रात बहुत हो गयी है ,आप इधर ही सो जाओ , मेरा नौकर है , ड्राइवर भी नहीं है , मैं नीचे सो जाऊंगा आप चारपाई पर सो जाओ। “
गुरुदेव कहते ,” कोई बात नहीं ” और इतने में मेरी आँख खुल गयी।

स्वप्न था ,मुझे कुछ भी याद नहीं। अगले दिन सुबह जब मैं ऑफिस गया तो मेरा इंजीनियर बोला -रावल साहिब इतनी रात को राउंड लेने की कोई आवश्यकता नहीं , यहाँ कोई चोरी नहीं हो सकती , उधर पहाड़ से टाइगर भी आ सकता था ।
रावल जी कहते हैं ,” तभी भी मुझे अनुभव नहीं हुआ कि क्या हो रहा है। साक्षात् भगवान ही हैं हमारे गुरुदेव ,इतने साधारण इतने सादा , इतना सब कुछ कर देते हैं लेकिन कभी भी नहीं कहते कि मैंने कुछ किया है। मैं कितने हो कमर्शियल लोगों के पास ,बाबा लोगों के पास गया हूँ वह सभी यही कहते हैं हमने किया है। “

तो मित्रो यह है गुरुदेव की शक्ति और अपने बच्चों के प्रति स्नेह। अभी अभी आपने देखा/ पढ़ा ” माता जी ने शुक्ला बाबा को बोला -जा आंख बना ” तो अखंड ज्योति नेत्र हस्पताल जैसा विशाल तंत्र बन कर खड़ा हो गया। अब परमपूज्य गुरुदेव ने कहा ” कन्या पाठशाला बना ,तो विश्व स्तर का स्कूल बन कर खड़ा हो गया “

इस लेख के साथ में दिए गए चित्रों से ही आप इस स्कूल की विशालता और दिव्यता का अनुमान लगा सकते हैं। इस दिव्य वातावरण में पढ़ कर किस प्रकार की संस्कारित बच्चियां पैदा हो रही हैं उनका अनुमान हम आपको आने वाली वीडियो में लगाने का प्रयास करेंगें। अगले लेख में इसी स्कूल के कुछ संस्कारी बच्चियों और वातावरण के बारे में बताने का प्रयास करेंगें।
सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा और नई उमंग लेकर आए। जय गुरुदेव परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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कोरोना काल में हमारा आत्मिक शांति का प्रयास

29 अप्रैल 2021 का ज्ञानप्रसाद

आज का लेख हम अपने विवेक और अध्यन से लिख रहे हैं। बहुत से सहकर्मियों के लिए इस लेख में कुछ भी नया न हो क्योंकि यह चिंतन मनन का विषय है। इस कोरोना दानव ने जहाँ हर जगह त्राहि -त्राहि मचा रखी है, कहीं कोई मार्ग दिखाई ही नहीं दे रहा, ऐसा लगता है मानव पूरी तरह से लाचार हो गया है तो ऑनलाइन ज्ञानरथ उस परमसत्ता से ,गुरुसत्ता से निवेदन करके कुछ ,केवल कुछ ही , मानसिक शांति का प्रयास कर रहा है। हर किसी के जीवन में इस तरह की विकट परिस्थितियां आयी होंगीं लेकिन उस परमसत्ता का साथ न छोड़ने में ही लाभ है ,न कि घबराहट में। हम सूर्य भगवान की प्रथम किरण के साथ आपको ज्ञानप्रसाद की भेंट प्रदान करते समय यही आशा करते हैं कि आपका दिन सुखमय हो और अँधेरा गायब हो जाये।


इस लेख में गुरुदेव और पंडित लीलापत जी, गुरुदेव और श्रेध्य डॉक्टर साहिब जी ,गुरुदेव और शुक्ला बाबा , शुक्ला बाबा और मृतुन्जय तिवारी जी के उदाहरण तो दिए हैं लेकिन यह किसी भी गुरु -शिष्य ,भक्त -भगवान की बात हो सकती है -समर्पण ,समर्पण और समर्पण। यह बातें हम सब पर भी लागू होती हैं। केंद्रीय मंत्री श्री रवि शंकर प्रसाद जी ने एक वीडियो में गायत्री परिवार के सदस्यों की संख्या 15 करोड़ बताई है । 2020 की यह वीडियो हमारे चैनल पर लगी हुई है। सुन कर हर्ष और गर्व तो बहुत होता है लेकिन कितनों पर आज का लेख apply होता हैं ,कितने लीलापत जी हैं ,कितने शुक्ला बाबा हैं ? ज़रा सोचिये

इन्ही opening remarks के साथ आइये साथ -साथ चलें आज की ज्ञानतीर्थ यात्रा पर।


गुरु और माली का उत्तरदाईत्व :
एक शिष्य के जीवन को सजाने में ,संवारने में गुरु की वही भूमिका है, जो किसी पौधे के सम्पूर्ण विकास में एक माली की होती है। किस पौधे को कब और कितना खाद और पानी चाहिए, इसे एक माली बखूबी जानता है। एक माली एक नन्हे से पौधे को लगाता है, उसे सींचता है उसे कीड़ों से, पशुओं से, रोगों से बचाता है। तभी तो एक दिन एक नन्हा-सा पौधा ही वृक्ष बनकर आकाश को छूने लगता है।

माली के कारण ही तो एक दिन सारा गुलशन महक उठता है। वैसे ही गुरु भी शिष्य में एक नई चेतना को जन्म देता है। वह उसकी चेतना को अपने ज्ञानामृत से सींचता है। वह उसे भवरोगों से बचाता है, दुर्गुणों से बचाता है। तभी तो एक दिन वह शिष्य अपनी चेतना के शिखर को छू पाता है और ब्रह्म साक्षात्कार कर पाता है। एक दिन शिष्य का जीवन भी गुलशन की तरह महक उठता है। उस परिष्कृत व्यक्तित्व को उपलब्ध शिष्य को देखकर एक गुरु को कैसी आनंदानुभूति होती होगी, उसे शब्दों में बता पाना कैसे संभव है; क्योंकि

“वहाँ तो शब्द भी निःशब्द हो जाते हैं।”

समर्पण :
उस शिखर तक पहुँचने के लिए एक शिष्य को स्वयं को पूर्णतः अपने गुरु के हवाले करना होता है, माली के हवाले करना होता है और अपनी इच्छाओं का, कामनाओं का सर्वथा त्याग करना होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो जैसे एक रोगी स्वयं को पूर्णतः एक चिकित्सक के हवाले कर देता है वैसे ही एक शिष्य को भी स्वयं को गुरु के हवाले कर देना होता है; क्योंकि तभी गुरु एक कुशल चिकित्सक की तरह शिष्य की चेतना में अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार कर पाता है। उसके चित्त की वृत्तियों के कारणरूप उसके कर्म-संस्कारों के समूल नाश का, विनाश का मार्ग प्रशस्त कर पाता है।

” पूज्य गुरुदेव ने कितने ही जन्मों तक अपने-आप को दादा गुरु के हवाले किया “

यदि चिकित्सक रोगी की आवश्यक शल्यक्रिया ( सर्जरी ) या चिकित्सा करने के बजाय उसकी इच्छापूर्ति करने में लग जाए, उसे उसकी इच्छानुसार खाने-पीने की छूट दे दे तो फिर न तो रोगी की सही चिकित्सा हो पाएगी और न ही रोगी रोगमुक्त हो सकेगा। रोगी को रोगमुक्त होने के लिए तो चिकित्सक के अनुसार ही चलना होगा ,चिकित्सक के परामर्श को मानना होगा।

” शिष्य को भी अपनी इच्छा से नहीं, गुरु की इच्छा से चलना होता है। गुरु की इच्छा को ही, ईश्वर की इच्छा को ही अपनी इच्छा बनाना होता है तभी तो वह चेतना के शिखर को छू पाता है,”

इसी लिए जब पंडित लीलापत शर्मा जी गुरुदेव के संरक्षण में आए तो वह सब कुछ वही करते आए जैसे गुरुदेव करवाते गए। कई बार गुस्से भी हुए लेकिन माता जी ,गुरुदेव ने अपने आज्ञाकारी बेटे को मना ही लिया। बिल्क़ुल ऐसा ही विवरण श्रद्धेय डॉक्टर साहिब आदरणीय प्रणव पंड्या जी के बारे में भी मिलता है। उनको तो गुरुदेव बार -बार यही कहते सुने गए हैं :

” तू यहाँ मेरे काम के लिए आया हैं यां अपने ?”

अगर शिष्य अपनी इच्छा को ढोते फिरने के चक्कर में पड़ा रहे तो वह छोटा ही बना रह जाता है, फिर वह बीज से वृक्ष नहीं बन पाता। वह फिर अपने जीवन के शीर्ष को नहीं छू पाता और किसी तरह घिसी-पिटी जिंदगी जीकर एक दिन संसार से विदा हो जाता है। पंडित जी के शीर्ष व्यक्तित्व के कारण ही हम उनके बारे में इतनी चर्चा कर रहे हैं। हम इस महान आत्मा के ऊपर कितने ही लेख लिख चुके हैं। जब से उनके द्वारा लिखित पुस्तकें हमारे हाथ में आयी हैं उनके बारे में जानने की जिज्ञासा दिन -प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है अब शुक्ला बाबा जी का पता चला तो उसमें ही डूब गए। अगले दिनों में एक और व्यक्तित्व को आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगें -रिसर्च जारी है।

क्या हम भगवान के सच्चे भक्त हैं ?
कहने को तो हम भी स्वयं को अपने गुरु का सच्चा शिष्य मानते हैं; हम भी अपने आप को भगवान का भक्त मानते हैं। हम अपने आप को ईश्वर का, गुरु का, उपासक मानते हैं और अक्सर हम ईश्वरदर्शन के लिए मंदिरों में जाते भी हैं, आश्रमों में जाते भी हैं। अपने आराध्य से, अपने गुरु से मिलते भी हैं, पर वहाँ जाकर भी क्या हम अपने आराध्य का, अपने भगवान का, अपने गुरु का दर्शन कर पाते हैं? क्या हम सचमुच अपने गुरु के दरबार में, ईश्वर के दरबार में उपासक बनकर जा पाते हैं ?

” शायद नहीं। क्योंकि हम भगवान के पास उपासक नहीं याचक (भिखारी) बन कर जाते हैं “

गुरु के समीप बैठकर भी, ईश्वर के समीप बैठकर भी हम उपासना से दूर ही रहते हैं। उनके पास होकर भी हम उनसे दूर ही होते हैं। क्योंकि हम वहाँ भी अपनी छोटी -छोटी, तुच्छ सी इच्छाओं की टोकरी को अपने सिर पर ढोये फिरते हैं। वहाँ हम रोते हैं, गिड़गिड़ाते हैं, लड़ते हैं , ढेर सारी याचनाएँ करते हैं। इसीलिए गुरु की आवश्यकता पड़ती है। ईश्वर के समीप जाने का, गुरु के समीप जाने का, बैठने का वास्तविक उद्देश्य तो हमें हमारे गुरु ही बता पाते हैं। उपासना का असली मर्म तो हमारे गुरु ही बता पाते हैं। हमारे आराध्य, हमारे गुरु ही हैं, जो हमें बताते हैं कि

” उपासना याचना नहीं और याचना उपासना नहीं।”

हम ईश्वर के पास जाएँ, अपने गुरु के पास जाएँ, पर याचक बनकर नहीं, उपासक बनकर; दर्शक बनकर नहीं, द्रष्टा बनकर। द्रष्टा का अर्थ है कि हम केवल देख नहीं रहे हैं, अंदर तक देख रहे हैं ,गहराई में जा रहे हैं। तभी तो उनके पास जाने की, उनके पास बैठने की सार्थकता हो सकेगी।

मृतुन्जय तिवारी जी का समर्पण हमने आपको दिखाया। बच्चे ,पत्नी ,माता पिता ,व्यापार कोलकाता महानगर में और स्वयं मस्तीचक जैसे उस छोटे से ग्राम में जहाँ केवल 12 घंटे बिजली आती है। उन्होंने ने भी अपने आप को गुरु के प्रति समर्पित कर दिया है।

उस विराट ईश्वर की प्रतिमा के समक्ष खड़े होकर, उस ब्रह्मज्ञानी गुरु के समक्ष खड़े होकर भी ,उनके पास होकर भी, उनके समीप होकर भी, उनके समीप बैठकर भी उनसे स्वयं को बंधन में बाँधने वाली याचनाएँ क्यों करना? वहाँ तो उनकी विराटता की अनुभूति करनी चाहिए। उनकी विराटता को स्वयं के अंतःकरण के आकाश में उतरते हुए देखना चाहिए।

वहाँ देखना चाहिए कि जैसे हमारे आराध्य, हमारे भगवान, हमारे गुरु के हृदयाकाश में कोटि-कोटि सूर्य, चंद्र व तारे जगमगा रहे हैं, वैसे ही क्या हमारे स्वयं के हृदयाकाश में भी अब ज्ञान, भक्ति, वैराग्य आदि के रूप में सूर्य, चंद्र व तारे जगमगाने लगे हैं? क्या हमारे अंतःकरण से अज्ञान का अँधेरा मिटने लगा है? जैसे आकाश में हजारों सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश होता है , वो दिव्य अनुभूति हमें उपासना में करनी है। भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को जब विराट रूप दिखाया तो उसकी आँखें चुंदीआं गयी थीं। इतना प्रकाश ,इतना तेज़ उससे सहन नहीं हो रहा था

क्या हम भगवान में अपना रूप देखते हैं ?
जैसे दर्पण में हम अपने रूप को भली भाँति देख पाते हैं, वैसे ही ईश्वर की, गुरु की प्रतिमाओं में, हम अपने वास्तविक स्वरूप को देख पाते हैं। अपने सोऽहम्, शिवोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम् रूप को देख पाते हैं, निहार पाते हैं ? उपासना में ईश्वर के पास बैठकर या गुरु के पास बैठकर हमें स्वयं भी वैसा ही होना है, जैसे कि स्वयं हमारे आराध्य हैं, भगवान हैं, गुरु हैं।

उस विराट ब्रह्मसमुद्र के समीप खड़े होकर, समीप होकर भी उससे बूंद, दो बूंद जल पाने की याचना क्या करना? उस विराट ब्रह्मसमुद्र में उतरकर, डूबकर, उसमें घुल-मिलकर हम स्वयं भी बिंदु से सिंधु, सरिता से सागर क्यों नहीं हो जाएँ? हम उस ब्रह्मसमुद्र के समीप होकर भी स्वयं के अंतस् में भी प्रेम, पवित्रता, करुणा, संवेदना आदि दिव्य गुणों की रसधार क्यों नहीं प्रवाहित कर लें? अपनी आत्मा में ही परमात्मा के सत्-चित्-आनंदस्वरूप की अनुभूति क्यों नहीं कर लें।

वास्तव में ईश्वर दर्शन की, गुरु दर्शन की, ईश्वर के पास, गुरु के पास बैठने की यही तो वास्तविक फलश्रुति है।
समुद्र के पास बैठकर उसकी गहराई, उसकी विराटता की अनुभूति, गंगा के पास बैठकर उसकी शीतलता की अनुभूति, ईश्वर के पास एवं गुरु के पास बैठकर उसकी ब्रह्मानुभूति करना ही तो उपासना है। यही तो सच्ची उपासना है ,सच्ची भक्ति है ,सच्चा समर्पण है ,सच्चा योग है ,ईशदर्शन है और हम स्वयं भी तो ईश्वर अंश ही है। हम स्वय भी तो सुख की राशि हैं तो फिर गुरु से, ईश्वर से याचना क्या करना। अपना जो कुछ है, सो उनका अर्थात परमात्मा का है और उनका जो कुछ है, सो अपना ही तो है। इसीलिए तो हम कहते हैं :

” तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा “

हमें तो बस, ईश्वर के समीप बैठकर, गुरु के समीप बैठकर उनकी ईश्वरीय विराटता का बार-बार स्मरण करना है। उनके दिव्य गुणों का बार-बार स्मरण करना है। तभी तो हमें स्वयं की विराटता का, अपने सत्-चित्-आनंद रूप का स्मरण हो सकेगा, जिसका हमने विस्मरण कर दिया है तो उस विस्मरण का बार-बार स्मरण ही उपासना है।

ऐसी उपासना से हम स्वयं भी ईश्वरमय हो सकते हैं। हम वो बन सकते हैं, हम वो हो सकते हैं जो हमारे आराध्य, हमारे गुरु हमें बनाना चाहते हैं। ऐसे में ,उपासना में, ईश्वर या गुरु के समीप होकर स्वयं को भी उनके ही रंग में क्यों न रँग लें? ईश्वर की विराटता का, ईश्वर की दिव्यता का बार-बार स्मरण कर हम स्वयं भी क्यों न विराट बन जाएँ, दिव्य बन जाएँ, मानव से माधव बन जाएँ? जैसा कि संत कबीर ने प्रस्तुत दोहे में कहा है

” लाली मेरे लाल की, जित देखू तित लाल। लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल “

अर्थात मुझे हर जगह ईश्वरीय ज्योति दिखती है। अंदर, बाहर, हर जगह, लगातार ऐसी दैवी ज्योति देखते देखते मैं भी ईश्वरीय हो गया हूँ। ईश्वर की दिव्यता देख देखकर मैं भी दिव्य हो गया हूँ। उनकी लाली देखकर मैं भी लाल हो गया हूँ। दरअसल इस दोहे में कबीरदास जी कहते हैं कि मेरे प्रभु का रंग कुछ ऐसा था कि चारों ओर ज्ञानस्वरूप लाली छाई हुई थी। मैंने सोचा मैं भी जाकर देखता हूँ और उनके समक्ष जाते ही वही रंग मेरा भी हो गया।

अस्तु हम भी क्यों न उपासना में बैठकर, आराध्य के पास बैठकर, गुरु के पास बैठकर याचना करने के बजाय स्वयं को ही अपने प्रभु के रंग में रंग लें? और यदि हो सके तो उपासना में बैठकर अपने प्रभु से, गुरु से नित्य यही प्रार्थना भी करें कि हे प्रभु! आप मुझे भी अपने ही रंग में रँग लीजिये क्योंकि हे प्रभु ! मैं स्वयं को किसी और रंग में रंगना ही नहीं चाहता।

इन्ही शब्दों के साथ ,इस आशा से कि कोरोना की विकट स्थिति हमें विचलित नहीं होने देगी, हम आज के ज्ञान प्रसाद को विराम देंगें, क्योंकि हमने अपने आप को उस परमपिता के हवाले कर दिया है -जय गुरुदेव

सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा और नई उमंग लेकर आए।
जय गुरुदेव परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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माता भगवती देवी राजकीय महिला महाविद्यालय

26 अप्रैल 2021 का ज्ञानप्रसाद

माता भगवती देवी राजकीय महिला महाविद्यालय

नवम्बर 2019 में जब से हम आंवलखेड़ा की पावन भूमि से होकर आये थे ह्रदय में एक ही अभिलाषा थी कि वंदनीय माता जी के नाम पर स्थापित “माता भगवती देवी राजकीय महिला महाविद्यालय ” पर एक लेख लिखा जाए। लेकिन जब जो बात होने होती है तब ही क्रियान्वित होती है। 2019 में इधर कनाडा वापिस आते ही कई प्रकार से इस कॉलेज के साथ संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन कोई अधिक सफलता न मिल सकी। अप्रैल 2020 के भेजे हुए व्हाट्सप्प मैसेज की आजतक प्रतीक्षा कर रहे हैं लेकिन कोई उत्तर नहीं आया। इसी बीच हमने अपनी रिसर्च जारी रखी, जो कुछ ऑनलाइन मिलता रहा उसको compile करते रहे। कई बार मन में आया कि डॉक्टर ममता शर्मा जी, जो श्री दान कुंवरि कॉलेज की प्रिंसिपल हैं, से सम्पर्क किया जाए लें फिर out of mind हो गया। आज से कई दिन पहले एक बार फिर माता भगवती देवी कॉलेज से पुनः संपर्क किया लेकिन कोई भो उत्तर नहीं आया। थक हार कर यही लग रहा है कि अब और प्रतीक्षा करना हमारे हित में नहीं है। सभी बिकाश शर्मा और मृतुन्जय तिवारी भाई जी कि तरह prompt तो नहीं होते।

खैर, माता भगवती देवी राजकीय कॉलेज के सम्बन्ध में जो कुछ भी ऑनलाइन उपलब्ध है, ऑनलाइन ज्ञानरथ के पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने की चेष्टा कर रहे हैं। आशा करते हैं हमारे पाठक इस जानकारी से भी लाभांवित होंगें।

आंवलखेड़ा ग्राम :
परमपूज्य गुरुदेव की जन्मभूमि आंवलखेड़ा , आगरा के निकट छोटा सा ग्राम, प्रत्येक गायत्री साधक के लिए किसी तीर्थस्थली से कम नहीं है। जिस हवेली में परमपूज्य गुरुदेव को केवल 15 वर्ष की आयु में अपने हिमालय गुरु सर्वेश्वरानन्द जी से साक्षात् दर्शन कर निर्देश प्राप्त हुए थे इसी ग्राम में स्थित है। इसी ग्राम में स्थित है श्री माता दान कुंवरि देवी इंटर कॉलेज, गुरुवर के माता जी की स्मृति में यह कॉलेज। अभी इसी वर्ष (2021) जनवरी में इस कॉलेज के प्रांगण में स्थित गायत्री मंदिर में माता दान कुंवरि जी और गायत्री माँ की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा की गयी थी। इस प्राणप्रतिष्ठा कार्यक्रम की वीडियो हमने कुछ समय पूर्व ही अपने चैनल पर अपलोड की थीं। इसी कॉलेज के सामने गायत्री शक्तिपीठ के भव्य भवन की छटा देखते ही बनती है। हमारे पाठक इन सभी दिव्य स्थानों के दर्शन करने के लिए हमारे चैनल पर समय -समय पर अपलोड की गयी वीडियो देख सकते हैं और पुराने लेख भी पढ़ सकते हैं।


माता भगवती देवी राजकीय महिला महाविद्यालय की स्थापना

अपूर्णताओं से भरे इस संसार में पूर्णता की एक प्रकार होती है जिसे मानसिक दक्षता की संज्ञा दी जाती है। इस दक्षता का सीधा सम्बन्ध शिक्षा से है, शिक्षा से असाधारण उत्कृष्टता, सभ्यता तथा उन्नति के शिखर प्राप्त किये जा सकते हैं।

अच्छी तरह से सुशिक्षित और प्रवीण मन ही दुनियां में सबसे अधिक उपयोगी सम्पत्ति है। ऐसे ही मानवीय विचारों के अक्षय पुंज, विद्यानुरागी, मर्मज्ञ मनीषी, समय के पारखी अपनी योग्यता और विद्वता से भारतीय गुरु परम्परा में सम्मानीय स्थान प्राप्त करने वाले आचार्य पं० श्रीराम शर्मा जी की पवित्र पुण्य भूमि है आंवलखेड़ा, जहाँ पर गुरुदेव आचार्य श्री जी ने जन्म लिया। हम अपने आपको बहुत ही भाग्यशाली मानते हैं जब 2019 में हमें इस भूमि की पावन रज को अपने मस्तक पर धारण करने का परम् सौभाग्य प्राप्त हुआ। हम इस पावन भूमि को बार-बार नमन वंदन करते हैं और अपने अंतःकरण से भावना व्यक्त करते हैं कि अवश्य ही यह कोई हमारे य हमारे पूर्वजों द्वारा किये गए पुण्य कार्यों का ही अनुदान है जो हमें यह सौभाग्य प्राप्त हुआ।

परमपूज्य गुरुदेव के विचारों को समाजोपयोगी कार्यों के शैक्षिक संकल्प और नारी सशक्तिकरण के उदेश्य को क्रियांविंत करते हुए गायत्री शक्तिपीठ आंवलखेड़ा ने अगस्त 1996 में राजकीय महिला महाविद्यालय के लिए दान स्वरूप 6.24 एकड़ भूमि प्रदान कर “इक्कीसवीं सदी नारी सदी” होगी वाले वाक्यांश को सार्थक कर दिया।

समय सदा करवट बदलता है, हर काली रात के बाद प्रातः काल की प्रभा मुस्कराती है और यही मुस्कराहट ग्रामीण अंचल की अनेकानेक बालिकाओं के मुखमण्डल पर शिक्षा सुरभि के रूप में आच्छादित हो रही है।

महाविद्यालय को शासन द्वारा सत्र 1996-97 से हिन्दी, अंग्रेजी, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र, इतिहास, संस्कृत व गृह विज्ञान विषयों में स्नातक स्तर पर अध्ययन-अध्यापन की स्वीकृति प्रदान की गयी। दान स्वरूप प्रदत्त भूमि पर जून 2000 में व्याख्यान कक्ष, कम्प्यूटर कक्ष, गृह विज्ञान प्रयोगशाला, एन०एस०एस० कक्ष के साथ महाविद्यालय भवन निर्मित कर दिया गया। इस नव निर्मित महाविद्यालय भवन का लोकार्पण 15 अक्टूबर 2000 को करते समय महाविद्यालय का नाम “माता भगवती देवी राजकीय महिला महाविद्यालय,” आँवलखेड़ा (आगरा ) घोषित करके वन्दनीया माता जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की है।

भारत सरकार के रास्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान के अर्न्तगत इस महाविद्यालय मे स्नातकोत्तर कक्षाओं के लिए 2018 से अलग ब्लाक है। इसी वर्ष से डॉ. बी. आर. आम्बेडकर वि. वि. आगरा की सिफारशों पर अर्थशास्त्र तथा अंग्रेजी की स्नातकोत्तर कक्षाओं का संचालन भी हो रहा है। यह महाविद्यालय परमपूज्य गुरुदेव और वंदनीय माता जी के आदर्शों पर पूरा उतरते हुए निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर है।

ऑनलाइन रिसर्च के दौरान हमने जब इस महाविद्यालय के fee structure पर दृष्टि डाली तो देखा कि इतनी थोड़ी सी फीस से बच्चों की पढ़ाई संम्पन हो रही है। एक और चीज़ जिसने हमारा मन अपनी और खींचा वह थी विद्यार्थिओं के यूनिफार्म। बच्चों को यूनिफार्म तो पहननी ही है लेकिन विद्यार्थियों की पहचान के लिए कुर्ते की बाज़ू पर क्रीम रंग की स्ट्रिप है। फर्स्ट ईयर के विद्यार्थियों के लिए 1 स्ट्रिप, सेकंड ईयर के विद्यार्थियों के लिए 2 स्ट्रिप और थर्ड ईयर के लिए 3 स्ट्रिप अनिवार्य हैं।

आज के लिए इतनी ही जानकारी के साथ, आप सबसे, अपने समर्पित सहकर्मियों से विदा लेते हुए अपनी वाणी को विराम देते हैं।

सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा और नई उमंग लेकर आए। जय गुरुदेव परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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एक ही दिन में मिले तीन जीवनदान :रमेशचन्द्र शुक्ल मस्तीचक, (बिहार)

17 अप्रैल 2021 का ज्ञानप्रसाद
पिछले कुछ दिनों से ऑनलाइन ज्ञानरथ के पाठकों और सहकर्मियों द्वारा दिए गए कमैंट्स से विदित हो रहा है कि आपको महामहिम ,आदरणीय शुक्ला बाबा जी के बारे में जानने की अत्यंत जिज्ञासा है। हम भी उतने ही उत्साहित हैं लेकिन प्रतिदिन बाबा जी के बारे में इतनी जानकारी मिल रही है कि हमारे विवेक और अथक परिश्रम के बावजूद सब कुछ compile करना अति कठिन हो रहा है। आप सब हमारी कार्यप्रणाली से भलीभांति परिचित हैं ,जब तक हमें पूरी तरह से संतुष्टि नहीं हो जाती हम कुछ भी आपके समक्ष प्रस्तुत नहीं कर सकते। हमारे समर्पित और वरिष्ठ सहकर्मियों का इसमें बहुत बड़ा योगदान है ,ऐसी ,ऐसी जानकारी दे रहे हैं कि उनको मिस करना ऑनलाइन ज्ञानरथ के साथ अन्याय होगा। ऐसे सहकर्मियों को ह्रदय से नमन।

आपने प्राणस्वरूप सहकर्मियों से एक प्रतिबद्धता की आशा करते हैं :

इस इतनी विस्तृत,विशाल ,अविस्मरणीय एवं अद्भुत जानकारी को इक्क्ठा करना और compile करने में व्यस्तता और भी अधिक होने की संभावना है। अगर हम अपडेट न पोस्ट कर पाएं ,आपके कमैंट्स के उत्तर न दे पाएं तो क्षमा प्रार्थी हैं। हम प्रतिदिन सभी सोशल मीडिया साइट्स पर विजिट तो करेंगें ही ,सभी के कमैंट्स और अपडेट पढेगें भी लेकिन हो सकता है आपके साथ one – to- one सम्पर्क न हो सके। हमारे समर्पित सहकर्मी यह कार्यभार संभालने का प्रयास अवश्य करेंगें -ऐसा हम विश्वास करते हैं। कुछ एक तो संभाल भी लिया है विशेषकर हमारी बिटिया रानी। आशा करते हैं और भी सहकर्मी इस पुनीत कार्य में अपना योगदान डालने के लिए तत्पर रहेंगें।
धीरे -धीरे क्रमबद्ध होकर आपके समक्ष आदरणीय बाबा जी के बारे में लेख ,वीडियो एवं अपडेट प्रस्तुत करते जायेंगें। आज का लेख हमें हमारे तीसरे बेटे बिकाश शर्मा ने भेजा है जो उन्होंने 1 जनवरी 2019 को अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया था। “एक ही दिन में मिले तीन जीवनदान” शीर्षक से प्रकाशित यह आत्मकथा अद्भुत ,आश्चर्यजनक किन्तु सत्य नामक पुस्तक के भाग 1 में से ली गयी है

एक ही दिन में मिले तीन जीवनदान :

बचपन से ही साधना में मेरी गहरी रुचि थी। ध्यान मुझे स्वतः सिद्ध था। तरह- तरह के अनुभव होते थे, जिन्हें किसी से कहने में भी मुझे डर लगता था। पर धीरे- धीरे उनका अर्थ समझ में आने लगा। एक दिन न जाने कहाँ से एक महात्मा मस्तीचक आए और धूनी जलाकर बैठ गए। उनका नाम था- बाबा हरिहर दास। उनसे प्रभावित होकर मैंने दीक्षा लेने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा- मैं तुम्हारा गुरु नहीं हो सकता हूँ। तुम्हारे गुरु इस धरती पर अवतरित हो चुके हैं। मेरा उद्धार भी तुम्हारे गुरु के द्वारा ही होना है। एक दिन वे मथुरा से यहाँ आएँगे और इसी मिट्टी की कुटिया में आकर मेरा उद्धार करेंगे।
बाबा हरिहर दास ने जिस दिन मुझे यह बात बताई, उस दिन के पहले से ही मेरे सपने में एक महापुरुष का आना शुरू हो चुका था। वे खादी के धोती कुर्ते में नंगे पाँव आया करते थे। उनके चेहरे से अलौकिक आभा टपकती रहती थी। जब भी वे मेरे सपने में आते, मैं यंत्रचालित- सा उनके चरणों में अपना माथा टेक देता। फिर वे मेरा सिर सहलाकर मुझे आशीर्वाद देते और बिना कुछ कहे वापस चले जाते।
वर्षों तक यही क्रम चलता रहा। लेकिन एक रात ऐसी भी आयी, जब उन्होंने अपना मौन तोड़ दिया। अंतरंगता से आप्लावित शब्दों में उन्होंने मुझसे कहा-

“अभी कितने दिन यहाँ रहना है। मैं वहाँ तुम्हारी राह देख रहा हूँ।”

तभी से एक अनजानी- सी बेचैनी मेरे भीतर घर कर गई। अब तक मुझे इसका आभास हो चुका था कि यही मेरे पूर्व जन्म के गुरु हैं। लेकिन प्रश्र यह था कि इस अवतारी चेतना को मैं कहाँ खोजूं? कुछ ही दिनों बाद दैवयोग से मैं मथुरा पहुँचा। वहीं पर मुझे मिले बार- बार मेरे सपने में आने वाले मेरे परम पूज्य गुरुदेव- युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य
पहली ही मुलाकात में उनसे मुझे ऐसा प्यार मिला कि मैं उन्हीं का होकर रह गया। उनके पास रहते- रहते करीब चार वर्ष बीत गए थे। आचार्य श्री के मार्गदर्शन में साधना और उपासना के बल पर मैं अपने जीवन में होने वाली अनेक घटनाओं के बारे में जानने लग गया था।

मृत्यु के समय का ज्ञान:

इसी क्रम में एक दिन मुझे अपनी मृत्यु के समय का ज्ञान हो गया। तब मैंने पूज्य गुरुदेव से कहा- इस शरीर से आपकी सेवा अगले तीन- चार महीने तक ही हो सकेगी। गुरुदेव ने पूछा- ऐसा क्यों? मैंने मुस्कुराते हुए कहा- मेरी मृत्यु होने वाली है। मरने के बाद भूत बनकर शायद आपकी सेवा कर सकूँ, पर इस शरीर से तो सेवा नहीं हो पाएगी। जवाब में पूज्य गुरुदेव भी मुस्कराने लगे। उन्होंने कहा- तुम्हें इसी शरीर से मेरा काम करना है।
कुछ दिन और बीत गए। मृत्यु को कुछ और करीब आया जानकर मैंने पूज्य गुरुदेव के सामने फिर से यही बात दुहराई। गुरुदेव झल्ला उठे।

उन्होंने डपटते हुए पूछा- “अच्छा बता, तेरी मृत्यु कैसे होगी?”

मैंने कहा- “आज से ठीक दो महीने बाद मुझे एक साँप काट लेगा और उसी से मेरी मृत्यु हो जाएगी।”
मेरी बात सुनकर उनकी झल्लाहट कुछ और बढ़ गई।
उन्होंने कहा- “तू अपना काम करता चल। मरने की बकवास छोड़ दे।”
मुझे लगा कि गुरुदेव का इशारा शरीर की नश्वरता की ओर है। मैं भी करीब आती हुई मौत को भूलकर अपने काम में मगन हो गया।
महीने- डेढ़ महीने बाद तो मैं इस बात को पूरी तरह से भूल गया था कि मौत मेरी तरफ तेजी से बढ़ती आ रही है। आखिरकार वह दिन भी आ ही गया जिसे नियति ने मेरी मृत्यु के लिए निर्धारित कर रखा था। सुबह के समय मैं, शरण जी तथा दो- तीन अन्य परिजनों के साथ नीम के पेड़ के नीचे बैठा था। गुरुदेव सामने के कमरे में थे। हम सब उनके बाहर निकलने का ही इन्तजार कर रहे थे। समय बीतता जा रहा था, पर वे बाहर निकलने का नाम नहीं ले रहे थे। विलम्ब होता देख मैं उधर जाने की सोच ही रहा था कि अचानक पेड़ से एक भयंकर विषधर सर्प मेरे सिर पर गिरा। उसी क्षण मुझे अपनी ध्यानावस्था में देखा हुआ दृश्य याद आ गया कि आज मुझे मृत्यु से कोई बचा नहीं सकता है। पर आश्चर्य! उस काले साँप का फन मेरी आँखों के आगे नाच रहा था। उस काले साँप ने दो- तीन बार अपने फन से मेरे सिर पर और छाती पर प्रहार किया, पर काट नहीं सका। ऐसा लगा कि किसी ने उसके फन को नाथ कर रख दिया है।
अपने जीवन में समय को पूरी तरह से साध लेने वाले मेरे गुरुदेव समय के बीत जाने पर भी आज कमरे से बाहर क्यों नहीं निकले, यह बात अब मेरी समझ में आ चुकी थी। डसने की कोशिश में असफल हुआ वह साँप धीरे-धीरे मेरे शरीर पर सरकता हुआ नीचे आ गया। अब तक वहाँ कुछ और लोग भी जमा हो गए थे। सबने मिलकर उस साँप को मार दिया। तब तक वहाँ इस बात को लेकर कोहराम मच गया कि शुक्ला जी को साँप ने काट खाया है। गुरुदेव अपने कमरे से निकले।
इन सारी बातों से अनजान बनते हुए उन्होंने पूछा – “क्या हुआ शुक्ला?”
मैंने मरे हुए साँप को दिखाते हुए कहा- “यह सर्प मेरा काल बनकर आया था। लगता है मैं बच गया।”
गुरुदेव ने गंभीर स्वर में कहा- “इस सर्प को मारना नहीं चाहिए था। किसने मारा?”
किसी ने मुँह नहीं खोला। सभी सिर झकाए खड़े रहे। वातावरण को सहज बनाने के लिए गुरुदेव बोले- “खैर, जाने दो। स्नान कर लो।”
पूज्यवर की शक्ति सामर्थ्य से अभिभूत होकर मैं स्नान करने के लिए चल पड़ा।
उस दिन भी रोज की भाँति ही दोपहर के बाद वाले कार्यक्रम में परम वन्दनीया माताजी के गायन में मुझे तबले पर संगत करनी थी। मंच पर सारी व्यवस्था हो चुकी थी। तबला, हारमोनियम रखे जा चुके थे। माताजी के लिए माइक सेट करना था। जैसे ही मैंने माइक को पकड़कर उठाना चाहा, मेरा हाथ माइक से चिपक गया। माइक में 240 बोल्ट का करंट दौड़ रहा था। अपनी पूरी ताकत लगाकर मैंने हाथ झटकना चाहा, पर झटक नहीं सका। फिर मैं चीखकर बोला- लाइन काटो। मुझे लगा कि अब मेरी मृत्यु निश्चित है। सुबह साँप से तो मैं बच गया था, पर बिजली के इस करंट से बचना असंभव है। लेकिन मेरे और मेरी मौत के बीच तो पूज्य गुरुदेव की तपश्चर्या की ताकत दीवार बनकर खड़ी थी। उन्होंने भेदक दृष्टि से बिजली के तार की ओर देखा और तार का कनेक्शन कट गया। माइक ने मेरा हाथ छोड़ दिया और मैं झटके से नीचे गिर पड़ा। सब लोग दौड़कर मेरे पास आ गए। पूज्य गुरुदेव भी स्थिर चाल से चले आ रहे थे। लोगों ने उन्हें रास्ता दिया।
उन्होंने पास आकर पूछा- “कैसे हो बेटे?”
बोलना चाहकर भी मैं कुछ बोल नहीं सका। ऐसा लग रहा था, जैसे पूरे शरीर को लकवा मार गया हो।
डॉक्टर बुलाये गए। उन्होंने कहा- बिजली का झटका बहुत जोर का लगा है। इसका असर मस्तिष्क पर भी पड़ सकता है। ठीक होने में कम से कम तीन महीने तो लग ही जाएँगे।
डॉक्टर के चले जाने के बाद पूज्य गुरुदेव ने कहा – “इसके सारे शरीर में सरसों के तेल से मालिश करो।”
संगीत का कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। मैं अकेले में बिस्तर पर लेटा हुआ गुरुसत्ता की सर्वसमर्थता पर मुग्ध हो रहा था। कुछ ही घण्टों के दौरान दो बार काल मुझे निगलने के लिए आया और दोनों बार उन्होंने मुझे मौत के मुँह से बाहर निकाल लिया। मैं उनके प्रति कृतज्ञता के भाव में डूबता जा रहा था कि न जाने कब आँखों में गहरी नींद समाती चली गई। आधी रात के बाद अचानक मेरी नींद टूटी। ऐसा लगा कि कोई मेरी छाती पर बैठकर मुझे जान से मारने की कोशिश कर रहा है और मैं अब कुछ ही क्षणों का मेहमान हूँ। एक ही दिन में तीसरी बार मैं अपनी मृत्यु को करीब से देख रहा था। दोपहर बाद के बिजली के झटके ने मेरी सारी ताकत पहले ही निचोड़ ली थी। इसीलिए चाहकर भी मैं कोई प्रतिकार नहीं कर सका। जब मुझे लगा कि अगली कोई भी साँस मेरी अन्तिम साँस साबित हो सकती है, तो मेरे मुँह से सिर्फ दो ही शब्द निकले- “हे गुरुदेव! “
उनका नाम लेना भर था कि मेरी छाती पर सवार मेरा काल शून्य में विलीन हो गया। इस प्रकार परम पूज्य गुरुदेव ने विधि के विधान को चुनौती देकर एक ही दिन में तीन- तीन बार मुझे नया जीवन दिया।
सुबह होते ही पत्नी ने पूज्य गुरुदेव के कल के आदेश का पालन करने की तत्परता दिखाई। सरसों के तेल की मालिश शुरू हुई। बीस मिनट की मालिश में ही एक चौथाई आराम मिल गया। मालिश का यह क्रम करीब एक हफ्ते तक चलता रहा। डॉक्टर साहब ने तो जोर देकर कहा था कि मुझे ठीक होने में कम से कम तीन महीने लग जायेंगे, लेकिन आठवें दिन ही मैं अपने आपको पहले से भी अधिक ताकतवर महसूस करने लगा था। उनकी दवा धरी की धरी ही रह गई थी।
प्रस्तुतिः रमेशचन्द्र शुक्ल मस्तीचक, (बिहार)

सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा और नई उमंग लेकर आए। जय गुरुदेव परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पितShow less

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अखंड ज्योति आई हस्पताल -एक प्रेरणादायक कथा Part 1

11  अप्रैल 2021का ज्ञानप्रसाद  पार्ट 1 

मृतुन्जय तिवारी जी  की कहानी आप सब के समक्ष रखते हुए अति हर्ष हो रहा है क्योंकि यह इतनी प्रेरणादायक और उत्साहवर्धक है कि जब हमने पहली बार इसको देखा तो आश्चर्यचकित हो गए कि ऐसा भी हो सकता है। हम अपने पाठकों और सहकर्मियों को बताना चाहते हैं जिस शीर्षक पर हम आज चर्चा करने का प्रयास कर रहे हैं इतना विस्तृत है कि विकिपीडिया ,YouTube ,orbis  और पता नहीं कौन- कौन सी जगहों  पर इसके रेफरन्स हैं कि इस लेख को  compile करने में इतना परिश्रम करने के बावजूद अभी भी बहुत कुछ छूटता लगता है। हमारे विवेक के अनुसार इसका केवल एक ही विकल्प संभव है कि आप स्वयं भी गूगल सर्च करके इसके बारे में  जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करें और परमपूज्य गुरुदेव के इस शिष्य ( मृतुन्जय जी के दादा जी ), अखंड ज्योति नेत्र अस्पताल के अभिनव प्रयोग को  समझें, अधिक से अधिक  शेयर करें और गुरुदेव के कार्य में योगदान करें।    

अखंड ज्योति नेत्र  हस्पताल मस्तीचक  बिहार 

मृतुन्जय तिवारी  जी के दादा  श्री रमेश चंद्र शुक्ला  हमारे परमपूज्य गुरुदेव के विचारों से बहुत  ही प्रभावित थे।  उनका जन्म 1917 का बताया गया है लेकिन  उनका निधन कब  हुआ ,कुछ भी उपलब्ध  नहीं है। इस समय  मृतुन्जय जी की आयु लगभग 50 वर्ष  के करीब  होनी चाहिए। यह हम 26  दिसंबर 2018  में इंडिया टुडे में प्रकाशित  न्यूज़ आइटम के आधार पर कह रहे हैं जब उनकी आयु 47  वर्ष बताई गयी है। 

बिहार निवासी राष्ट्रिय फुटबॉल विजेता मृत्युंजय तिवारी अपने फैमिली  बिज़नेस के लिए  कोलकाता महानगर  में आकर  बस गए, और वहां अपने  परिवारक बिज़नेस  लदाई और ढुलाई ( carrying and forwarding ) में कार्यरत रहे । लेकिन विधाता ने कुछ और ही लिखा था। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा कि  महानगर का जीवन छोड़ कर  वापिस अपनी जन्मभूमि में आना होगा और वोह भी एक ऐसे कार्य के  के लिए , एक ऐसे पुरषार्थ के लिए जिसने मृतुन्जय जी को घर-घर में प्रसिद्ध कर दिया।  बिहार की ग्रामीण जनता ने कितना आशीर्वाद और दुआएं दी होंगी इस पुण्य कार्य के लिए जिसमें आज वह  कार्यरत हैं। शायद विधाता द्वारा अपनी जन्मभूमि का ऋण चुकाने का कोई पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम था।        

मृतुन्जय जी के जीवन की दिशा ही बदल गयी जब  बिहार के एक नेत्रहीन किसान को  इलाज कराने  के लिए अपनी जन्म भूमि  बिहार के जिला अस्पताल में गए। छह महीने में वह तीसरी बार आए थे । अस्पताल ने इलाज के लिए अपनी  असमर्थता जता दी क्योंकि वहां कोई नेत्ररोग विशेषज्ञ ही  नहीं था।  उस किसान की व्यथा सुनकर मृत्युंजय अंदर से हिल गए। एक बार तो ऐसा भी हुआ कि उन्होंने एक पिता को अपनी छोटी सी  बेटी को मात्र 1500  रुपए के लिए बेचते हुए देखा।  इतनी निर्धनता थी इस प्रदेश में।

इस प्रकार की  घटनाओं ने, और हमारे गुरुदेव की  शिक्षा और आदर्शों ने उन्हें इतना झकझोरा कि उन्होंने बिहार के एक छोटे से ग्राम  मस्तीचक में अखंड ज्योति आई  हॉस्पिटल शुरू करने की ठान ली। ठानना कुछ और बात है और उस को किर्यान्वित रूप देना दूसरी बात। इतने बड़े कार्य के लिए पैसा कहाँ से आएगा ,कौन सहायता करेगा, डॉक्टर कहाँ से आयेंगें इत्यादि इत्यादि।  यहाँ पर  यह  तथ्य  पूरी तरह से  लागु होता  है कि 

“जो भगवान की योजना होती है उसमें कोई भी अड़चन नहीं आती क्योंकि उसे भगवान खुद ही तो चला रहे होते हैं।” 

ठीक उसी तरह जैसे हमारे ऑनलाइन ज्ञानरथ के सारथि स्वयं गुरुदेव हैं और स्वयं ही आदर्शवादी ,संस्कारित,सामर्थ्यवान,परिश्रमी सहकर्मी जुड़ते चले जा रहे हैं। न केवल जुड़ते ही जा रहे हैं बल्कि  स्वयं ही इसमें अपने  पुरषार्थ का योगदान भी डाल रहे हैं।  

 मृत्युंजय जी   कहते हैं,

 ”मैं अपने बूते पर  बिहार की सारी समस्याएं तो हल नहीं कर सकता, इसलिए मुझे   केवल एक  ही चीज पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत थी  जिसमें मैं कुछ कर सकता था और वह है 

“इलाज योग्य अंधापन ” Curable Blindness 

तिवारी जी ने  जनवरी 2006  में मात्र 10 बेड का अस्पताल एक मंदिर प्रांगण में आरम्भ  किया  जो आज विश्व की उन ऊंचाइयों  को छू रहा  है  जो एकदम अविश्वसनीय है ,लेकिन है शत प्रतिशत सत्य।  यह सब कैसे हो गया ? इसका उत्तर तो हमने पहले वाली पंक्तियों में लिख ही दिया है कि यह भगवान की योजना है लेकिन  पौत्र ने अपने दादा के संस्कार कैसे प्राप्त कर लिए ,यह भी गुरुदेव की परमसत्ता पर मोहर लगाना ही हुआ न। 

हमारे पाठक ,सूझवान ,समर्पित सहकर्मी स्वयं ही इस बात का विश्लेषण करके निर्णय कर सकते हैं कि परमपूज्य गुरुदेव के कार्यक्रम कैसे तीसरी पीड़ी में स्थानांतरित हो गए और मृतुन्जय जी ने बने बनाये स्थिर बिज़नेस को त्याग कर बिहार के ग्राम वासियों  में अपना  समस्त जीवन समर्पित कर दिया।  उनके समर्पण ने उन्हें किस ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। 

युगतीर्थ शांतिकुंज में डॉक्टर गायत्री शर्मा जो डॉक्टर ओ पी  शर्मा जी  की सहधर्मिणी है “आओ गढ़ें  संस्कारवान पीढ़ी” नामक एक बहुत ही अद्भुत कार्यक्रम का संचालन करती है। दोनों पतिपत्नी शांतिकुंज में गुरुदेव के समय से जीवनदानी हैं। हमने भी उनके कई उद्बोधन सुने और देखे ,बहुत ही प्रभावित हुए।   डॉक्टर गायत्री शर्मा गर्भवती महिलाओं को मार्गदर्शन  देते हैं। यह परमपूज्य गुरुदेव की  दूरदर्शिता  और मार्गदर्शन ही तो है ऐसे अभिनव कार्यक्रम चल रहे हैं।  

हमारा अल्पज्ञान तो हमें इसी निष्कर्ष पर लाकर खड़ा करता है : जैसे  अभिमन्यु ने  माता  के गर्भ में चक्रव्यूह की  शिक्षा प्राप्त कर ली थी तो  ठीक उसी प्रकार अपने दादा के संस्कार मृतुन्जय जी ने प्राप्त   कर लिए हों।  

 बिहार से इलाज योग्य अंधेपन (curable blindness ) को खत्म करना अब उनका एकमात्र मिशन बन गया है।  दिसंबर 2018 के अनुसार  24 Eye Surgeons  की मदद से चलने वाला 350 बिस्तरों वाला यह अस्पताल न केवल पूर्वी भारत में आंखों के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक है, बल्कि इसने लड़कियों के लिए रोजगार के मौके बनाने में भी अहम योगदान दिया है।  “फुटबॉल टु आइबॉल”  जैसे अभिनव कार्यक्रम से रोजगार पाने में भी सहायता मिल रही है। 

तिवारी जी  ने 2009 में  “फुटबॉल टु आइबॉल” कार्यक्रम शुरू किया जिसके तहत लड़कियों को फुटबॉल और ऑप्टोमीट्री ( optometry ) (आंखों की जांच), दोनों का प्रशिक्षण दिया जाता है।  आगे चल कर इस कार्यक्रम पर विस्तार से चर्चा करेंगें। 

क्रमशः जारी 

” सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।  

जय गुरुदेव 

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लिखे गए एक अनमोल पत्र का स्क्रीनशॉट – पत्र पाथेय पन्ना 7

9 अप्रैल 2021 का ज्ञान प्रसाद

हमारे, आप सबके ज्ञानरथ के समर्पित सहकर्मियों को नमन ,वंदन के साथ ,आज का ज्ञान प्रसाद परमपूज्य गुरुदेव की अनुकम्पा और मार्गदर्शन में केवल 2 पत्रों पर ही आधारित है। यह दोनों अनमोल पत्र परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अपने अनुचर पंडित लीलापत शर्मा जी को 9 और 18 अगस्त 1961 को लिखे गए थे।

हमारे एक बहुत ही समर्पित सहकर्मी ने कुछ दिन पूर्व कमेंट करके सुझाव दिया था कि गुरुदेव के पत्र प्रस्तुत किये जाएँ। उन्होंने अखंड ज्योति पत्रिका में प्रकाशित कुछ पत्र पढ़े होंगें और अपनी अश्रुपूर्ण भावना भी व्यक्त की थी। हमारा समस्त समय ,विवेक और बुद्धि इसी ज्ञानरथ के प्रसार में समर्पित रहता है। बहुत ही हर्ष होता है जब कोई सहकर्मी हमें सुझाव देता है, हम तो उसी समय उस सुझाव को पूर्ण करने में लग जाते हैं , फिर दिन क्या तो रात्रि क्या , कई बार रात्रि में उठ उठ कर points नोट करते रहते हैं और अपनी प्रसन्नता अपने साथ अकेले में ही शेयर करते रहते हैं। यह हर्ष चरम सीमा पर तब पहुँचता है जब हम उनके सुझाव को पूर्ण करने में समर्थ होते हैं। यह पल केवल अनुभव ही किये जा सकते हैं ,शब्दों में चित्रित करना कठिन तो है ,असम्भव नहीं। अभी कल ही परमपूज्य गुरुदेव की 2 मिनट की अपलोड हुई वीडियो के संदर्भ में भी अभिषेक जी का सुझाव मिला है-” इस तरह की वीडियो अपलोड करते रहें बहुत हौसला मिलता है।” हम तो यही कहना चाहेंगें कि हम तो अत्यंत तुच्छ प्राणी हैं ,जैसा परमपूज्य गुरुदेव मार्गदर्शन देंगें ,एक रीछ ,वानर की तरह योगदान देते रहेंगें।

कुछ पाठकों ने तो एक बार नहीं बल्कि कईं बार सुझाव दिया है कि ज्ञानरथ के अंतर्गत लिखे लेखों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जाये। जो उत्तर हमने उनको दिया है उसी को दोहराते हुए हम कहेंगें कि हमारे पास तो कोई साधन नहीं है ,जानकारी नहीं है ,गुरुदेव ने चाहा तो कोई महामानव स्वयं ही इसमें अपना योगदान देने के लिए आगे आ जायेगा। यह हमारे गुरुदेव की, हमारे भगवान की योजना है स्वयं चलती ही जाएगी।

पंडित लीलापत शर्मा जी के बारे में जानने के लिए हमारे पाठकों से अनुरोध है कि हमारे कुछ समय पूर्व वाले लेख पढ़ लें ,बहुत ही विस्तारपूर्वक जानकारी देने का प्रयास किया था। हाँ इतना अवश्य कहना चाहेंगें कि “पत्र पाथेय” शीर्षक से प्रकाशित 183 पन्नों की यह पुस्तक परमपूज्य गुरुदेव का अपने अनुचर के नाम एक अनमोल संग्रह है। 1998 में तपोभूमि मथुरा से प्रकाशित यह पुस्तक 79 पत्रों का संग्रह है। पंडित लीलापत जी के समर्पण की हम जितना सराहना करें कम ही होगी ,कैसे उन्होंने यह अनमोल पत्र संभाल कर रखे होंगें -हम तो नतमस्तक हैं ,कृतज्ञ हैं।

यह पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है। सारे के सारे पत्र मूल रूप में गुरुदेव की लेखनी में तथा पीडीऍफ़ में उपलब्ध हैं। हमने भी दोनों ही फॉर्म में आपके समक्ष प्रस्तुत किये हैं। आप इन पत्रों में प्रयोग की गयी शब्दावली को देखिये, एक -एक शब्द को ध्यान से अध्ययन कीजिये तो आप स्वयं ही परमपूज्य गुरुदेव के सरल व्यक्तित्व को समर्पित हो जायेंगें।

आपकी अंतरात्मा स्वयं ही कह उठेगी ” यह पत्र लिखने वाला कोई साधारण मानव नहीं है “

आप इन्हें पढ़ कर अवश्य ही प्रेरित और समर्पित तो होंगें ही ,परमपूज्य गुरुदेव के प्रति आपकी श्रद्धा अवश्य बढ़ेगी – ऐसा हमारा अटूट विश्वास है। एक बात और हम कहना चाहेंगें कि इस पुस्तक के प्रथम छः पन्ने जी पंडित जी ने preface के रूप में लिखे हैं कभी भी मिस न किये जाएँ , कई घरों में ,परिवारों में सुखशांति ,हर्ष का वातावरण लाने में सहायक हो सकते हैं।

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इन्ही शब्दों के साथ अपनी लेखनी को विराम देते हैं जय गुरुदेव परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्रीचरणों में समर्पित है स्वर्णिम सूर्य के साथ दिव्य दर्शन -सुप्रभात

दिनांक-9 -8 -1961

हमारे आत्मस्वरूप,
आपका पत्र मिला | माताजी और हमने उसे कई बार पढ़ा । पढ़कर आँखों में आँसू छलक आये । हम तुच्छ हैं पर हमारे प्रति आपकी जो श्रद्धा है वह महान है । आपकी यह महानता यदि स्थिर रही तो आप उसी के बल पर पूर्णता प्राप्त कर लेंगे । श्रद्धा अपने आप में एक स्वतन्त्र तत्व है और इतना शक्तिशाली है कि उसके द्वारा मिट्टी का ढेला सचमुच के गणेश का काम कर सकता ह