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अखंड ज्योति आई हस्पताल- एक प्रेरणादायक कथा –Part 2

12  अप्रैल  2021 का ज्ञानप्रसाद 

आशा करते हैं कि हमारे समर्पित और सूझवान सहकर्मियों के ह्रदय में अखंड ज्योति आई हस्पताल के बारे में पृष्ठभूमि बन गयी होगी। हमारा सात मास का अथक प्रयास तभी सफल होगा जब हमारे  सहकर्मियों के ह्रदय में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा घड़ित  शिष्यों का समर्पण उभर कर प्रेरणा देगा और कहेगा “अरे क्या सोच रहा है ,कहीं सोच -सोच में ही यह अनमोल जीवन व्यतीत न हो जाये “ इस लेख को लिखने में हमने क्या -क्या प्रयास किये ,किस -किस से फ़ोन पर सम्पर्क किया, कैसे ऑनलाइन रिसर्च की इत्यादि का कल वर्णन करेंगें। 

तो आओ  चलें लेख के दूसरे और अंतिम भाग की ओर :

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तिवारी जी  का कहना है कि उन्हें  ग्रामीण परिवारों को इस बात के लिए राजी करने में बहुत परिश्रम करना पड़ा  कि लड़कियों की छोटी आयु में  शादी (early marriage ) की न  सोचें बल्कि उन्हें मस्तीचक भेजें जहां उनके लिए छह साल तक मुफ्त रहने और प्रशिक्षण की व्यवस्था है। एक दशक में 150 लड़कियों को प्रशिक्षण देकर ऑप्टीमीट्रिस्ट बनाया गया है और सात लड़कियों ने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में बिहार का प्रतिनिधित्व किया है।  यह कार्यक्रम इतना सफल रहा है कि बिहार भर के गांवों से करीब 500 लड़कियां यहां दाखिले के लिए वेटिंग लिस्ट में हैं। बिहार में सीवान, पीरो, गोपालगंज और डुमरांव में चार प्राथमिक दृष्टि जांच केंद्र और एक उत्तर प्रदेश के बलिया में चल रहा है।  भोजपुर के कस्बे पीरो का जांच केंद्र तो पूरी तरह महिलाएं चला रही हैं।  इसका नेतृत्व 22 वर्षीया दिलकुश शर्मा करती हैं, जिन्होंने अखंड ज्योति के विज्ञापन को पढ़कर उनसे  संपर्क किया था।  

तिवारी जी  कहते हैं: 

”हमारी सोच है कि अगले चार साल में महिलाएं ही अस्पताल के कम से कम 50 प्रतिशत कार्यों का नेतृत्व करें ” 

तिवारी जी अपने दादा प्रसिद्ध समाज सुधारक और आध्यात्मिक गुरु  श्री रमेश चंद्र शुक्ला जी  की शिक्षाओं का अनुसरण कर रहे हैं।  यह एक भली प्रकार स्थापित तथ्य है कि किसी भी चिकित्सा देखभाल कार्यक्रम की सफलता के लिए समर्पित कर्मियों का एक पूल  इस  कार्यक्रम की  एक  रीढ़ की हड्डी होता  है। यह भी सच है कि भर्ती करना, उन्हें प्रशिक्षित करना  और फिर retain  रखना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। ऐसे मानव संसाधनो का उच्च कारोबार समस्या को और भी महत्वपूर्ण बनाता है। चुनौतीपूर्ण भूगोल के तहत गरीब बुनियादी ढांचे  इसे और भी   अधिक जटिल बना देते  हैं । तो कहाँ से आयेंगें इस प्रतिभा वाले एक्सपर्ट।  यहाँ काम आयी out -of – the box तकनीक और एक नवीन  सोच। 

Out of the box : 

आउट-ऑफ-द-बॉक्स (Out of the box) सोचने से हमें अखंड  ज्योति नेत्र अस्पताल में भर्ती करने, प्रशिक्षित करने और स्थानीय प्रतिभा को सफलतापूर्वक बनाए रखने में मदद मिली है। Out -of -the box का  अर्थ  उन विचारों का पता लगाने के लिए प्रयोग में लाया जाता हैं  जो रचनात्मक और असामान्य हैं और जो नियमों या परंपरा द्वारा सीमित या नियंत्रित नहीं हैं। संभवतः हम रुपया -पैसा खर्च करते हैं , इतने अधिक वर्ष खर्च करने के उपरांत हम फिर नौकरी के लिए आवेदन करते हैं ,फिर भी कोई पता नहीं कि नौकरी मिलेगी य नहीं। गुरुदेव की  दूरदर्शिता ने यहाँ काम किया। 

आओ देखें यह स्कीम कैसे काम में आयी। 

Football to Eyeball :

“फुटबॉल टू आईबॉल” कार्यक्रम 2010 में शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम के तहत, स्थानीय गांवों की लड़कियों को पेशेवर ऑप्टोमेट्रिस्ट के रूप में ट्रेनिंग  प्राप्त करने के लिए फुटबॉल खेलने और प्रशिक्षित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जिससे उन्हें अंधापन को ठीक करने और एक बहुत ही पितृसत्तात्मक समाज में व्यापक सामाजिक प्रभाव बनाने के लिए सशक्त बनाया जाता है। पितृसत्तात्मक समाज का अर्थ है कि जैसे एक पिता परिवार का मुखिया होता है ,माता क्यों नहीं।  यह अनूठा कार्यक्रम युवा लड़कियों के लिए एक आइसब्रेकर के रूप में फुटबॉल का उपयोग करता है। 12-16 वर्ष की आयु के बीच की लड़कियों का पालन-पोषण अस्पताल द्वारा पेशेवर फुटबॉल खिलाड़ी या ऑप्टोमेट्रिस्ट या दोनों बनने के लिए किया जाता है।

मृत्युंजय जी  का फुटबॉल के प्रति जुनून था परन्तु किसी दुर्घटना के कारणवश अब वह फुटबॉल खेल नहीं सकते। उन्होंने जब देखा  कि  एक घर की छत पर कुछ लड़कियों को नीचे  ग्राउंड में लड़कों को फुटबॉल खेलते देखा तो उनके मन में आया कि  क्यों न लड़कियों को भी फुटबॉल खेलने में प्रेरित किया जाये।  यह आईडिया तो ठीक था लेकिन बिहार जैसे प्रदेश में जहाँ लड़कियों को घर से बाहर निकलने की इज़ाज़त नहीं थी ,उनको shorts पहन कर किसने खेलने देना था।  कार्य तो बहुत ही कठिन था।  परिवारों का विरोध अवश्य ही आड़े आना था और आया भी, लेकिन मृतुन्जय जी का तो एकमात्र उदेश्य था कि किसी प्रकार इन बच्चियों को घर के बाहर निकाला   जाये  और उन्हें भी खुली वायु में सांस लेने दिया जाये।  इस प्रकार  जागृति आने से कई समस्याओं का निवारण हो सकता था और हुआ भी। नारी शोषण और  बाल विवाह जैसे अभिशाप को समाप्त या  कम करने में  सहयोग मिलेगा   

तो हैं न मृतुन्जय जी के अन्तःकरण में परमपूज्य गुरुदेव की  शिक्षा।  

पूर्वी भारतीय राज्य बिहार के एक दूरदराज के गाँव मस्तीचक में   केवल  दस-बेड के अस्पताल से  आरम्भ होकर 4000 वार्षिक सर्जरी  करने वाला यह अस्पताल केवल 15  वर्षों में  100,000  सर्जरियां करने में समर्थ है और सबसे बड़ी बात है कि इस 100,000  में से  85000  निशुल्क हैं।  इस सारे समय में  इसे कभी भी नेत्र रोग विशेषज्ञों, विशेष रूप से ऑप्टोमेट्रिस्ट और नेत्र सहायक के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा।

युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य चेरिटेबल ट्रस्ट:

परमपूज्य गुरुदेव  के आदर्शों और शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर  2004  के शुरू में युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य चेरिटेबल ट्रस्ट का आरम्भ किया गया। यह ट्रस्ट  बिहार में गरीबों और दलितों के कल्याण के लिए काम करने के लिए  में बनाया गया था  क्योंकि राज्य  सरकार हमेशा से  मानव कल्याण के पहलू पर चुप्पी साधे थी । इस  ट्रस्ट का गठन श्री रमेश चंद्र शुक्ला (1917-) ने किया था जो  हमारे गुरुदेव कि शिष्य थे।  ट्रस्ट का एक उद्देश्य संचालित दृष्टिकोण है जो मूल्यों और विश्वासों के प्रति असम्बद्ध रवैया रखता है। उपासना, साधना और आराधना जैसे गुरुदेव के तीन स्तम्भ इस ट्रस्ट के pillar हैं।  स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला जागरण, पर्यावरण, सामाजिक बुराइयों को खत्म करना, उद्यमशीलता और आध्यात्मिकता को बढ़ावा देना इस ट्रस्ट के मुख्य  उद्देश्य  हैं। लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है ताकि उनकी गतिविधियों से लोगों को सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक बाधाओं को दूर करने में मदद मिले और सकारात्मक बदलाव आए। 

इसीलिए हमने इस लेख के आरम्भ में पाठकों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया था कि स्वयं भी गूगल सर्च करके इस में अधिक जानकारी प्राप्त करें। 

” सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।  

जय गुरुदेव 

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22 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद यह वीडियो- To watch this video go to video section.

22 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद यह वीडियो : 10 मिंट की इस संक्षिप्त वीडियो में युगतीर्थ शांतिकुंज हरिद्वार के वर्तमान (2022)व्यवस्थापक आदरणीय महेंद्र शर्मा जी परमपूज्य गुरुदेव की 1984 की एक सप्ताह की हिमालय यात्रा का विवरण दे रहे हैं। हमारे दर्शक इस यात्रा का विवरण अखंड ज्योति 1985 के जनवरी अंक में भी पढ़ सकते हैं। बहुत ही आश्र्चर्यजनक एवं अविश्वसनीय लगता है परन्तु हैं सत्य कि तालाबंद कमरे के अंदर से ,जिसके बाहिर 24 घंटे पहरेदार रहता था, गुरुदेव कैसे निकल कर हिमालय की ऋषि सत्ताओं से मिल कर आ गए थे। यह सूक्ष्म की शक्ति है जो स्थूल से कई गुना अधिक होती है। महेंद्र भाई साहिब उन वरिष्ठ कार्यकर्ताओं में से एक हैं जिन्होंने परमपूज्य गुरुदेव के साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए युग निर्माण योजना में योगदान दिया। ऐसे महापुरषों को हमारा अत्यंत श्रद्धा से नमन है जिनके मार्गदर्शन में हमारा बहुत ही छोटा सा ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार गुरुकार्य में अपना योगदान देने में कार्यरत है।इस वीडियो से सम्बंधित और भी कई वीडियोस हमारे यूट्यूब चैनल पर अपलोड की हुई हैं आप उन्हें देख कर और शेयर करके गुरुदेव के अनुदान प्राप्त करें। आप को हमारी वेबसाइट https://life2health.org/ पर full-length लेख पढ़ने के लिए भी सादर आमंत्रण है। जय गुरुदेव

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24 आहुति संकल्प सूची : इस संकल्प सूची और गोल्ड मैडल की जानकारी के लिए ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार से जुड़ें।

21 जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत इस बार आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 5 समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परमपूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य सप्तऋषि निम्नलिखित हैं : (1)अरुण कुमार वर्मा-35,(2) प्रेरणा कुमारी-27,(3)संध्या कुमार जी-24,(4)रेनू श्रीवास्तव जी-26,(5) सरविन्द कुमार पाल जी-26 उक्त सभी सूझवान व समर्पित युगसैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है। इस युगसेना के Commander-in- Chief अरुण कुमार वर्मा जी को एक बार फिर 35 अंक प्राप्त कर स्वर्ण पदक जीतने पर हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। आज के ज्ञानप्रसाद में लेख न होने के कारण के गोल्ड मैडल सर्टिफिकेट प्रकाशित नहीं कर रहे हैं और आशा करते हैं सभी सहकर्मी वीडियो में अपना योगदान देंगें। जय गुरुदेव हमारी दृष्टि में सभी सहकर्मी विजेता ही हैं जो अपना अमूल्य योगदान दे रहे हैं,धन्यवाद् जय गुरुदेव

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अपने आत्मीयजनों से चर्चा 

21 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद – अपने आत्मीयजनों से चर्चा 

आज ज्ञानप्रसाद के लेख को स्थगित करके इच्छा हुई कि अपने आत्मीयजनों से सूक्ष्म तरंगों से जुड़ने का प्रयास किया जाये। कुछ एक आत्मीयजनों  को छोड़ कर जिनके साथ हमारे फ़ोन से सम्बन्ध हैं, अधिकतर को हमने देखा तक नहीं है।  जब कमेंट देखते हैं तो ह्रदय पटल पर एक काल्पनिक सी छवि बना लेते हैं।  कई बार तो यह काल्पनिक  छवि असल छवि से बिल्कुल  मेल नहीं खाती और हमारे पास  ठहाके लगा कर अपने साथ विनोद करने के इलावा कोई मार्ग नहीं दिखता। साधना बहिन जी ने ज़ूम मीटिंग करने का सुझाव दिया था लेकिन उसका कोई खास रिस्पांस न मिलने के कारण बंद कर दिया था।     

लगभग तीन सप्ताह  उपरांत हम अपने परिवार के सदस्यों के समक्ष “अपनों से अपनी बात” कहने आये हैं।  इससे पूर्व 28 दिसंबर को विचारों का कुछ आदान प्रदान संभव हो पाया था। आज की बात आरम्भ करने से पूर्व हम अपने सभी सहकर्मियों का ह्रदय से धन्यवाद् करना चाहेंगें जो अपना अमूल्य समय निकाल कर ,अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए ,कोरोना जैसी महामारी के साथ जूझते हुए, युवा साथी-बच्चे अपनी विद्यार्थी जीवन की  ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए अनवरत, regularly ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  के साथ  न केवल जुड़े हुए हैं बल्कि औरों को भी इस परिवार में लाने का कठिन पुरषार्थ कर रहे हैं। सभी सहकर्मियों  का अंतरात्मा की गहराईयों से धन्यवाद् ,आभार। 

हमारे सहयोगी बहुत ही कठिन परीक्षा से गुज़र रहे हैं :

“कठिन” हमने इस कारण लिखा है कि यह कार्य सच में बहुत ही कठिन है। कठिन इसलिए कि लोगों की धारणा में परिवर्तन लाना अत्यंत कठिन,लगभग असंभव सा कार्य है। क्योंकि जिनके पास हम जाते हैं, परमपूज्य गुरुदेव के बारे में बताने का प्रयास करते हैं,अपने मिशन की,अपने परिवार  की अच्छी बातें बताने का प्रयास करते हैं, वह हमारी बातों पर विश्वास क्यों करेंगें, क्योंकि इस भौतिकवादी संसार में प्रत्यक्षवाद का बहुत ही  बोलबाला है। हर कोई चमत्कार देखना चाहता है।  गायत्री उपासना से instant परिणाम प्राप्त करना चाहता है। आप खुद सोचिये क्या यह संभव हो सकता है -कदापि नहीं। परमपूज्य गुरुदेव ने खुद चमत्कारों के खिलाफ आवाज़ उठाई। गायत्री मन्त्र में  ब्रह्मास्त्र जितनी शक्ति अवश्य है, nuclear missile जितनी क्षमता अवश्य है, द्वितीय विश्व युद्ध में  हिरोशिमा-नागासाकी जापान पर फेंके गए nuclear weapon जितनी शक्ति अवश्य है लेकिन उसके लिए महर्षि विश्वामित्र जैसी साधना की भी आवश्यकता है। इस विषय पर भी हमने एक लेख save करके रखा हुआ है, समय आने पर आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगें। हमारे पास आये दिन इस तरह के परिजनों के फ़ोन  आते रहते हैं जो चमत्कारों की तलाश में हैं ,उन्हें केवल चमत्कार चाहिए, पात्रता विकसित करने की बात कहते हैं  तो भाग खड़े होते हैं। 

हमारी बात लोग तभी सुनेगें, हमसे convince तभी होंगें जब  हमारा उनके साथ आत्मा का सम्बन्ध स्थापित होगा। और आत्मा का सम्बन्ध स्थापित करने के लिए प्रेम की भावना का सहारा लेना पड़ता है जो आज के युग में प्रायः लुप्त ही होता जा रहा है। छोटा बच्चा अपनी माँ का पल्लू पकड़ कर पीछे- पीछे क्यों भागा-फिरता है, इसलिए कि माँ के साथ उसका आत्मिक सम्बन्ध है, उसे माँ के संरक्षण में जो मिलता है वह कहीं औरपाना अत्यंत दुर्लभ है,असंभव है । हम अपने गुरु को, गुरु की शिक्षा को, गुरु की अमृतवाणी को unique बना दें तो कोई कारण नहीं कि लोग हमारी बात न सुनें। आप सब हमारी बात सुन रहे हैं, प्रतिदिन सुन रहे हैं, परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन में लिखा एक- एक लेख आपकी अंतरात्मा की गहराईयों तक अवतरित हो रहा है तो कोई कारण नहीं कि आप द्वारा अन्य  लोग प्रेरित नहीं होंगें। ऐसा हमें अटल विश्वास है। शांतिकुंज गायत्री परिवार से आजकल तो ऑनलाइन वीडियोस प्रसारित हो रही हैं,यूट्यूब चैनल भी है।  कभी वोह दिन भी थे जब निर्माण हो रहे शांतिकुंज के प्रांगण में टेंटों में उद्बोधन हुआ करते थे। एक एक वक्ता  बैटरी चार्ज करने की बात करता था, जब हमने पहली बार यह उद्बोधन सुने तो सच में बैटरी चार्ज होने जैसा ही था।    

जो परिजन हमारे साथ जुड़े हुए हैं, वह केवल इसी कारण जुड़े हुए हैं कि उनमें प्रेम की भावना है, समर्पण की भावना है, दान की प्रवृति है, कुछ देने की प्रवृति है। चाहे वह समय है (समयदान), चाहे वह श्रम है (श्रमदान), विवेक है,योग्यता है (विवेकदान), रूपया- पैसा है(अंश दान),ज्ञान है( ज्ञानदान) ! जब हम अंश दान की बात कर रहे हैं तो आप सोचते होंगें कि  हमने तो ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में  कभी कोई पैसा नहीं दिया, सब कुछ  ऑनलाइन है, सब कुछ फ्री है।  लेकिन ऐसा नहीं है, आपने फ़ोन खरीदा हुआ है ,इंटरनेट के पैसे  देते हैं और इस investment का गुरुकार्य में प्रयोग कर रहे हैं, गुरु के विचारों के प्रचार-प्रसार में प्रयोग कर रहे हैं। अवश्य ही फ़ोन को अन्य  कार्यों में  भी प्रयोग करते है लेकिन maximum तो गुरुकार्य के लिए ही  प्रयोग करते हैं। इसी  गणित पर आधारित एक और तर्क दिया जा सकता है। TIME IS MONEY बहुत ही commonly और fashionably प्रयोग किया जाता है।  तो जब आप समयदान कर रहे हैं तो अंशदान भी तो हो रहा है।        

कल वाले लेख पर आधारित कमैंट्स में  अधिकतर परिजनों ने  प्रेम, विश्वास, श्रद्धा, निष्ठा,आत्म परिष्कार ,आत्मा,परमात्मा,पात्रता शब्दों का प्रयोग किया गया है जिससे विदित हो रहा है कि हमारे सहकर्मियों में गुरुकार्य में योगदान की भावना बहुत ही प्रबल होती दिख रही है। साधना बहिन ,निशा भरद्वाज जी और निशा दक्षित जी ने अपने ह्रदय पटल पर  उठ रही टीस को व्यक्त करते हुए गुरुदेव के सपनों को साकार करने में प्रयास भी करना चाहा है। साधना बहिन जी ने परमपूज्य गुरुदेव को  मार्गदर्शक और हमें पथ प्रदर्शक कहा है। गुरुदेव तो अवश्य ही मार्गदर्शक हैं लेकिन हम पथ प्रदर्शक हैं कि नहीं, इस पर तो प्रश्न चिन्न है ,हाँ सहायता के लिए हम सदैव ही तत्पर हैं। हम सभी का सामूहिक प्रयास ही इसमें कार्यरत होता आया है और आगे भी आता रहेगा। 

एक निवेदन :

5  फरवरी 2022 को वसंत पर्व है ,परमपूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिवस। एक बार फिर से याद दिला रहे हैं कि आपके पास जो भी कोई अनुभूति हो हमारे साथ शेयर करें ताकि हम 5 फरवरी का ज्ञानप्रसाद अनुभूतियों के रूप में ही गुरु चरणों में अर्पित कर सकें। हमें विश्वास है कि हमारे वरिष्ठ सहकर्मियों के पास अवश्य ही कुछ अनमोल खज़ाना होगा। आप ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार के बारे में भी लिख सकते हैं। जल्दी कीजिये दिन बहुत ही कम बचे हैं। 

ज्ञानप्रसाद लेखों की अगली श्रृंखला हम सोमवार 24 जनवरी से ही आरम्भ करेंगें। और कल शनिवार को एक वीडियो आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगें।  हो सकता है हमारे परिजनों ने यह वीडियो देखी  हो लेकिन ऑनलाइन ज्ञानरथ में शामिल करना अति आवश्यक है।  आपसे निवेदन है कि इस वीडियो की description अवश्य पढ़ें और अधिक से अधिक  कमेंट के श्रद्धा सुमन गुरुचरणों में अर्पित करें।    

इन्ही शब्दों के साथ हम अपनी लेखनी को विराम देते हैं और किसी भी त्रुटि के लिए करबद्ध क्षमा प्रार्थी हैं। 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

20  जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत इस  बार  आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के  9  समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परमपूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य सप्तऋषि  निम्नलिखित हैं :

(1) अरूण कुमार वर्मा जी – 34. (2) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 31, (3) डा.अरुन त्रिखा जी – 27, (4) रजत कुमार जी – 27, (5) पिंकी पाल बिटिया रानी – 27, (6) प्रेरणा कुमारी बिटिया रानी – 26, (7) संध्या बहन जी – 26, (8) नीरा त्रिखा बहन जी – 24. (9) सरविन्द कुमार पाल – 24, 24

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युगसैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है। इस युगसेना के Commander-in- Chief अरुण कुमार वर्मा  जी को एक  बार फिर 34   अंक  प्राप्त कर  स्वर्ण पदक जीतने  पर  हमारी  व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। जय गुरुदेव

हमारी दृष्टि में सभी सहकर्मी  विजेता ही हैं जो अपना अमूल्य योगदान  दे रहे हैं,धन्यवाद् जय गुरुदेव   

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आत्मा और परमात्मा से सच्चे प्रेम की तीन धाराएं 

20 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद -आत्मा और परमात्मा से सच्चे प्रेम की तीन धाराएं 

परमपूज्य गुरुदेव की मथुरा से विदाई के क्षणों पर आधारित 9 लेखों की श्रृंखला का अंतिम लेख अपने सहकर्मियों के श्रीचरणों में समर्पित करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। यह सभी लेख वर्ष 1969 की  अखंड ज्योति पत्रिका पर आधारित हैं। हम सबने इन लेखों से क्या-क्या अद्भुत ज्ञान प्राप्त किया, परमपूज्य गुरुदेव के निर्देशों का हमने  कितना पालन किया, आपके द्वारा अनवरत पोस्ट होते कमेंटस  स्वयं ही बता रहे हैं कि ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में अपने गुरु के  प्रति समर्पण का कितना उत्साह और जिज्ञासा है। सभी परिवारजन, वरिष्ठ-बच्चे-स्त्री-पुरष कंधे से कंधा  मिलाकर आगे ही आगे बढ़े जा रहे  हैं । उन सभी सहकर्मियों के हम सदैव आभारी रहेंगें जो अपने व्यक्तिगत कमेंट लिखने के उपरांत अन्य सहकर्मियों के कमेंटस पर भी बड़ी ही पैनी दृष्टि बनाये रखते हैं। जिस प्रकार अर्जुन को केवल मछली की आंख ही दिखाई देती थी, उसी प्रकार हमारे इन  सहकर्मियों को केवल अपना लक्ष्य ही दिखाई देता रहता है-संपर्क का लक्ष्य। जितना अधिक संपर्क होगा, उतने अधिक परिजन प्रेरित होंगें और उतना ही अधिक गुरुवर  के विचारों का प्रसार होगा। ऐसे ही  सहकर्मियों ने  अपने कठिन परिश्रम के आधार से स्वर्ण पदक प्राप्त किए और वह भी  एक बार नहीं ,दो बार नहीं बल्कि कई-कई बार। इन  सभी सहकर्मियों को हमारा नमन एवं बधाई।लेकिन संकल्प सूची में  शामिल हो रहे बाकि सहकर्मियों के परिश्रम को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। गाड़ी को चलाने के लिए तो केवल चार पहियों की आवश्यकता होती है लेकिन ऑनलाइन ज्ञानरथ को तो 13-13 पहिये गति दे रहे हैं। धन्य है ऐसे सहकर्मी।        

परमात्मा से प्रेम करने का अर्थ होता है अपनी आत्मा को प्यार करना है और इसी सिद्धांत को परमपूज्य गुरुवर  ने  वसुधैव कुटुंबकम का उदाहरण देते हुए हम सबको प्रेम और समर्पण की शिक्षा दी है। यही वह सूत्र है जिसने  हम सब परिवारजनों को बंधा हुआ है। आज के युग में परिवारों के टूटने का सबसे बड़ा कारण मानवीय मूल्यों का पालन न करना ही है। हम सब समय-समय पर शिष्टाचार ,अनुशासन ,समर्पण, सहकारिता ,सहभागिता ,आदर ,सम्मान ,निष्ठां,श्रद्धा ,विश्वास, सहकर्मिता और अपनत्व को स्मरण करते रहते हैं।  

ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में योगदान देने के  उत्साह और जिज्ञासा की बात हुई है तो हम आदरणीय  निशा भारद्वाज और निशा दक्षित जी का उदाहरण देना चाहेंगें।  आपने इस बहनों के जिज्ञासा भरे कमेंटस और हमारे रिप्लाई अवश्य ही देखे होंगें। इन्होने पूछा  था “ हम ऑनलाइन ज्ञानरथ के लिए  क्या कर सकते हैं ?” हमने तो यही रिप्लाई किया था कि परमपूज्य गुरुदेव स्वयं हर सहकर्मी की योग्यता देख परख कर ही चयन करते हैं।  जो कोई भी गुरुकार्य में इस समय सलग्न है उसके पास अवश्य ही  एक स्पैशल skill है जिसे गुरुदेव ने देखा ,परखा और एक ही बात कही “तू मेरा काम कर “ जो जो इस पुनीत कार्य में योगदान दे रहे  हैं  ,छोटा या बड़ा बहुत ही सौभाग्यशाली है beacause he is selected from a pool of outstanding talented individuals. यह सौभाग्य सभी को प्राप्त नहीं होता, इसके लिए पात्रता विकसित करनी पड़ती है। जिसके पास भी कुछ देने की प्रवृति है वह इस योगदान से वंचित नहीं रह सकता। 

इन्ही शब्दों से आरम्भ करते हैं आज के  बहुत ही संक्षिप्त ज्ञानप्रसाद की अमृतपान 

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आत्मा और परमात्मा से सच्चे प्रेम की प्रथम धारा सदाचरण, संयम, उत्कृष्टता, आदर्शवादिता, उदारता, सहृदयता, सज्जनता जैसी सत्प्रवृत्तियों को उगाने और बढ़ाने में जादू जैसा कार्य करती है और कितनी आध्यात्मिक विशेषताओं का उदय एवं अभिवर्धन सहज ही दृष्टिगोचर होता चला जाता है। यह सत्प्रवृत्तियाँ ही हैं, जो आवश्यकता से  ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में प्रयुक्त की जा सकती है। दुष्ट दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्तियों से घिरे-भरे मनुष्य में कोई दिव्य एवं अलोकिक विभूतियाँ न कभी रही हैं, न आगे हो सकती है।

हमारे प्रेम की दूसरी धारा अपने मार्ग-दर्शक गुरुदेव के चरणों में निरन्तर प्रवाहित रही। श्रद्धा और विश्वास का विकास करने के लिए आरम्भ में किसी सजीव देहधारी महामानव की सहायता इच्छित  होती है, जिससे देवत्व की समुचित मात्रा विद्यमान् हो। मनोभूमि को  परिपुष्ट करने वाली  श्रद्धा और  विश्वास के दोनों तत्त्वों को गुरु भाव ही विकसित करता है। एकलव्य को द्रोणाचार्य की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर अपनी श्रद्धा को  परिपक्व करते हुए शक्ति उपलब्ध करने का साधन बनाना पड़ा था। परमपूज्य गुरुदेव को   संयोगवश एक दिव्य सत्ता  का सहारा मिल गया तो उससे लाभ क्यों न उठया जाता ? उसी दिव्य सत्ता की  अहैतुकी कृपा से गुरुदेव का  रोम-रोम कृतज्ञता से भर गया और अपने को एक “अधिकारी शिष्य” सिद्ध करने की तीव्र उत्कण्ठा जग पड़ी। गुरुदेव ने अपना मन दिव्य सत्ता के  मन के साथ जोड़ दिया और अपना शरीर उनके आदेशों के अनुरूप गतिविधियां  अपनाने के लिए प्रस्तुत कर दिया। सांसारिक सम्पदायें नगण्य थी, जो थीं  उनकी राई-पत्ती उसी प्रयोजन में होम दी, जो उन्हें प्रिय था। सच्चे शिष्य अपनी पात्रता इसी  प्रकार के समर्पण से सिद्ध करते रहे हैं। गुरु तत्त्व को द्रवीभूत( liquefied ) और वशीभूत कर लेने की शक्ति किसी शिष्य को ऐसे ही समर्पण से मिलती है। अध्यात्म मार्ग के पथिकों की इस सनातन परम्परा को हमने अपनाया। फलतः वह सब कुछ मिलता रहा जो हमारी  पात्रता के अनुरूप था। हमने गुरुदेव की असीम और अलौकिक कृपा  पाई है लेकिन  इसे कोई संयोग न माना जाय। उस अनुग्रह को हमने “अपनापन देकर” खरीदा है। दूसरे धूर्तों  की तरह अपने भौतिक सुखों की रट लगाकर दण्डवत प्रणाम  करते रहते तो हमारी तुच्छता उन्हें कहाँ द्रवीभूत कर पाती, कदापि नहीं , और वैसा  वात्सल्य और आकाश जैसा अनुदान कदापि उपलब्ध न हो सका होता।

रामकृष्ण परमहंस ने जिस प्रकार विवेकानन्द और समर्थ गुरु रामदास ने जैसे  अपनी शक्ति शिवाजी को हस्तान्तरित की थी, वैसी ही कृपा किरण परमपूज्य गुरुदेव  को भी मिली। यह कृपा किसी वस्तु या सुविधा के रूप में नहीं बल्कि धैर्य, साहस, शौर्य, पुरुषार्थ, श्रद्धा, विश्वास, ब्रह्म वर्चस्व, तप-प्रवृत्ति उदार, सहृदयता के रूप में उपलब्ध हुई। इन  विभूतियों ने गुरुदेव के  व्यक्तित्व को निखारा।  निखरा हुआ  व्यक्ति तो  अनायास ही आवश्यक साधन, सुविधा एवं सहायता दबोच लेता है। वैसे ही अवसर हमें भी मिलते रहे। अपार जन-सहयोग और  सम्मान का अधिकारी कोई व्यक्ति तब तक नहीं हो सकता जब तक उसमें उपरोक्त सत्प्रवृत्तियाँ न हों। गुरु अनुग्रह से अन्तरंग में जिन सद्भावनाओं का उदय हुआ, वे ही हमारे द्वारा सम्पन्न हो सकने वाले कार्यों की अदृश्य आधार शिलाएँ हैं। प्रेम की दूसरी धारा गुरुचरणों पर बहाई और उसकी नकल  ने हमें धन्य बना दिया।

प्रेम की तीसरी धारा परिवार क्षेत्र में प्रवाहित होती रही। पत्नी को उसने अपने रंग में रंग दिया और वह अनन्य अनुचरी की तरह हमारी छाया बनी फिरती है। घर, परिवार में जो सौजन्य प्रसन्नता  का वातावरण है, उससे हमें परम संतोष है। इससे बढ़कर अपना गायत्री परिवार और युग-निर्माण परिवार है, जिसमें 50 लाख से ऊपर विशाल जनसमूह एक सूत्र श्रृंखला में बंधा हुआ  है। इस विशाल जनसमूह को जिस सूत्र ने  मजबूती से जकड़कर बाँध रखा गया है, वह है हमारी गहन आत्मीयता,अजस्र  ममता, प्रगाढ़ सद्भावना और कौटुम्बिक घनिष्ठता इस आधार पर इतने लोगों की शुभेच्छायें सम्पादित की हैं। उनके जीवनक्रम में ऐसे परिवर्तन किये हैं, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। परिवार के आधे से अधिक सदस्य अपना आन्तरिक कायाकल्प हुआ अनुभव करते हैं।

जीवन की अनमोल उपलब्धि:

उपासना एवं साधना के शुष्क एवं नव-निर्माण के कठिन कष्टकर कार्यों में इतना विशाल जनसमूह लगा हुआ है, उसके पीछे शिक्षा, उपदेश या लेख, प्रवचन ही काम नहीं कर रहें, असली प्रेम सम्बन्ध हैं  जिनके  दबाव से अनिच्छा और असुविधा के होते हुए भी  लोगों का उस दिशा में सुधबुध खोनी ही  पड़ती  है, जो हमें चाहत है। इस प्रयोग में लोगों के  जीवन सुधरे हैं,  समाज का हित हआ है और हमें सम्मान, सद्भाव  मिला है। परिवार को प्रेम देकर, उनके दुःख-दर्द में हिस्सा बंटाकर जितना दिया है, उससे असंख्य गुना पाया है। नये युग का नया निर्माण कर सकने जैसा साहस और विश्वास जिस आधार पर किया जा सका है वह  केवल लक्ष-लक्ष परिजनों की अनन्य आत्मीयता, श्रद्धा और सद्भावना ही है। इसे हम अपने जीवन की अनमोल उपलब्धि मानते हैं।

प्रेम-भावना के इन  त्रिकोणीय अध्याओं से हमें पग-पग पर सद्गुणों और सद्भावनाओं की वे विभूतियाँ मिलती चली गई हैं, जिनसे जीवन की हर उपलब्धि और सफलता को सम्भव कर दिखाया। हमारी उपासना पद्धति के मध्यांतर  में सन्निहित यह प्रेम साधना ही थी, अपने गुरु के साथ आत्मा का मिलन ही था जिसने  सामान्य को  असामान्य में और  तुच्छता को महानता में परिणित करने का चमत्कार दिखाया 

विदा होते समय जो ऐंठन अन्तरंग में होती है, वह मोह-ममता कायरता या विवशता जन्य नहीं बल्कि “चिरसंचित उच्च प्रेम साधना” की सहज परिणित है, जिसे हमने अपने परिवार के लिये कलेजे की गहराई में उगाया  और बढ़ाया है।हम सब जानते हैं कि  प्रेम का उपहार कसक ही है, तो फिर हमें ही उस कसक से  वंचित क्यों रहना पड़ता।

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

19  जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत इस  बार  आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के  7  समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परमपूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य सप्तऋषि  निम्नलिखित हैं :

(1) सरविन्द कुमार पाल – 48, (2) अरूण कुमार वर्मा जी – 30, (3) प्रेरणा कुमारी बिटिया रानी – 27, (4) संध्या बहन जी – 26, (5) संजना कुमारी बिटिया रानी – 26, (6) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 24, (7) पिंकी पाल बिटिया रानी – 24

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युगसैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है। सरविन्द  कुमार  जी को एक  बार फिर 48   अंक  प्राप्त कर  स्वर्ण पदक जीतने  पर  हमारी  व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। जय गुरुदेव

हमारी दृष्टि में सभी सहकर्मी  विजेता ही हैं जो अपना अमूल्य योगदान  दे रहे हैं,धन्यवाद् जय गुरुदेव

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आत्मा से प्रेम करना ही परमात्म-प्रेम का आधार 

19 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद -आत्मा से प्रेम करना ही परमात्म-प्रेम का आधार 

हम अक्सर कहते हैं जिन प्रेम कियो तिन प्रभु पाओ -तो आइये आज देखते हैं  सिख धर्म के सुप्रसिद्ध दशम ग्रन्थ की इन पंक्तियों को कैसे आत्मसात किया जाता है। अत्यंत गूढ़ ज्ञान से भरपूर Only those who love,realize God. हमारा आज का ज्ञानप्रसाद शायद बहुतों को प्रेम की सही परिभाषा समझने में सहायक हो सके ,हमारे परमपूज्य गुरुदेव ने भी इसी स्तर का प्रेम करके अपने मार्गदर्शक  के साथ सम्बन्ध बनाये और परनाम हम सबके समक्ष हैं। प्रेम की तीन धाराओं की चर्चा के साथ कल  इस श्रृंखला का अंत होगा।  आज केवल आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व पर चर्चा करेंगें।     

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हम अक्सर बात करते हैं “वसुधैव कुटुम्ब्कम की” जिसका अर्थ होता है -सारा विश्व मेरा परिवार है, सारी  धरती मेरा कुटुम्ब  है। यह वाक्य भारत के संसद  भवन के द्वार पर भी अंकित है, परन्तु यह सब   होते हुए भी कुटुम्ब यानि परिवार उन्ही  तक सीमित रह जाता है, जिन तक हमारा सम्पर्क क्षेत्र है। ऐसा  इसलिए है कि  “प्रेम” के लिए परिचय आवश्यक है। किसी अपरिचित से प्रीति कैसे हो? ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार, गायत्री परिवार, युग-निर्माण परिवार के सदस्य चूँकि हमारे परिचय क्षेत्र की परिधि में आते हैं इसलिए  हम अपनी सीमा के अनुसार  उन्हें अपने साथ प्रेम के बंधन  में बांधते हैं। इस  प्रेम साधना का क्षेत्र जैसे-जैसे बढ़ता है विराट् ब्रह्म की आराधना का व्यवहारिक अवसर भी अधिक व्यापकता के साथ उपलब्ध होने लगेगा। यह एक ऐसा अवसर है जिससे अनंत प्रेम की ,श्रद्धा की और समर्पण की धारा बहती ही चली जाती है।  अपने सहकर्मियों में हम दिन प्रतिदिन इस प्रेम की धारा की व्यापकता का अनुभव करने के साथ-साथ भौतिक परिणाम भी देख रहे हैं जो हम सबके  अन्तःकरण में उतरते जा रहे हैं। अन्तःकरण में से उद्भूत प्रेम-तत्त्व जिन तीन दिशाओं  में, धाराओं में प्रवाहित होता  है, वह विधि शोक संतापों को धो डालती है।इन तीन धाराओं पर हम अगले लेख में चर्चा करेंगें, पहले आज यह तो देख लें कि  जिस प्रेम-तत्व को  परमपूज्य गुरुदेव हमें समझाने की बात कर रहे हैं आखिर है क्या।

आत्मा से प्रेम करना ही परमात्म-प्रेम का आधार  

परमात्मा से प्रेम करने का अर्थ होता है अपनी आत्मा को प्यार करना है। क्या यह स्वार्थ नहीं हुआ ? बात  कर रहे हैं हम  वसुधैव कुटुम्ब की, यानि सारे विश्व को प्रेम करने की और कह रहे अपनेआप को प्रेम करने की, है न कितना confusing . नहीं, नहीं बिल्कुल confusing नहीं है। अपने को प्यार करना अर्थात् जीवन लक्ष्य को, आत्म-कल्याण को सर्वोपरि महत्व देना। इस स्तर की निष्ठा निरन्तर यही प्रेरणा देती  है कि शरीरिक  सुख और मन की ललक के लिए कोई ऐसा काम न किया जाय, जो आत्म-लक्ष्य की प्रगति में अवरोध उत्पन्न करे। वासना और तृष्णा की तुच्छता समझ में आ जाने से आत्मा को प्रेम करने वाला संयम सदाचरण का समुचित ध्यान रखे रहता है और उन कषाय- कल्मषों- कुसंस्कारों  के भार से बच जाता है, जो प्राणी को पतन के गर्त में निरन्तर घसीटती रहती है।

मन उन तथ्यों को सोचने और उन कामों को करने में लगता है, जो उत्कर्ष की भूमिका बना सकें। शरीर एवं मन को छोटा  और आत्मा को प्रमुख स्थान जब मिलने लगा तो उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की नीति ही कार्यान्वित होती है और “भौतिक प्रलोभनों” का आकर्षण अत्यन्त ही तुच्छ एवं छिछोरा प्रतीत होता है। आत्मा से प्रेम करना ही परमात्म-प्रेम का आधार है।  इस श्रेय पथ पर जब कदम बढ़ चलें  तब वे लक्ष्य पूर्ति की मंजिल पर पहुँचकर ही रुकते हैं। कल वाले लेख में भी हमने लिखा था “जिन प्रेम कियो तिन प्रभु पायो”

विश्व की समस्त शक्तियों और परम्पराओं का भण्डारगृह परमात्मा है, उसके साथ आत्मा को जोड़ देने का अर्थ  है परमात्मा के शक्ति प्रवाह को आत्मा में भरने लगने का आधार विनिर्मित कर देना। बिजली घर में विनिर्मित शक्ति के साथ जब हमारे घर की बत्तियों का संबन्ध एक पतले तार के माध्यम से जुड़ जाता है तो बटन दबाते ही सारी बत्तियाँ जगमगाने लगती हैं। एक खाली नीचे गड्ढे को ऊँचाई पर अवस्थित भरे-पूरे तालाब के साथ पतली नाली के द्वारा सम्बन्धित करते हैं तो तालाब का पानी गड्ढे में चलने लगता है और कुछ ही समय में गड्ढा उतनी ही ऊँचाई तक पानी से भर जाता है, जितना कि तालाब था। यही उदाहरण तब चरितार्थ होता है, जब “आत्मा का सम्बन्ध परमात्मा” के साथ जुड़ जाता है। यह एक अटल सत्य है कि  इस सम्बन्ध सूत्र को प्रेम तत्त्व द्वारा ही जोड़ा जा सकता है। 

प्रेमभाव की चरम सीमा

उपासनाओं की सफलता तभी सम्भव है, जब इष्टदेव के साथ प्रेमभाव की सीमा चरम परिणित (climax) होती हो।शारीरिक क्रिया की तरह मशीन जैसे कर्मकाण्ड कुछ थोड़े बहुत फल तो  दे ही सकते हैं लेकिन चरम  सीमा पर पहुंचने के लिए, climax तक पहुँचने के लिए परमात्मा से आत्मा का सम्बन्ध बहुत ही आवश्यक है। “परमात्मा प्रेममय” है और वह प्रेम से ही प्रभावित होता है। कर्मकाण्ड तो उस प्रेम को बढ़ाने, उगाने के साधन भर का काम करते हैं। गुरुदेव कहते हैं: हमने  उपासना के नियमोपनियम ( bylaws ) और विधि-विधानों पर समुचित ध्यान दिया है, साथ ही अन्तःचेतना को भी  भाव भरी बनाये रखा है और निरन्तर यही भावना बनाए रखी  कि “प्राणप्रिय इष्टदेव” के साथ भाव भरी एकाग्रता  अनवरत रूप में बनी रहे। इस प्रक्रिया से उत्पन प्रकाश ने  अपने रोम-रोम में प्रवेश करते हुए ऐसी  प्रेरणा दी है  जिससे मानव लक्ष्य की पूर्ति सम्भव कर सकने का मार्ग सरल होता चला गया है ।

लेकिन आज के युग में प्रेम की परिभाषा कुछ और ही व्यक्त करती है ,आइये इस पर भी कुछ चर्चा कर लें। यह विचार केवल और केवल हमारे व्यक्तिगत विचार हैं, हम कभी भी इन विचारों को किसी के ऊपर थोपने का प्रयास नहीं कर रहे  हैं। 

संसार में अलग-अलग स्वभाव के अलग-अलग व्यक्ति हैं। सभी में अलग-अलग कुछ विशेष गुण होते हैं,जिसे व्यक्तित्व (personality) कहते हैं। कुछ विशेष व्यक्तित्व विशेष व्यक्ति को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। यही आकर्षण है जो एक-दूसरे के विचारों में मेल खाता है, एक दूसरे को करीब लाता है।  इसीलिए आजकल कहा जाता है उन दोनों की chemistry बहुत मेल खाती है, physics चाहे हो न हो।  यहाँ केमिस्ट्री का अर्थ वोह केमिकल्स  हैं  जो personality बनाते हैं और फिजिक्स का अर्थ  Physical body से है जो height, weight इत्यादि  बनाते हैं।  केमिस्ट्री यानि केमिकल्स से ही एक-दूसरे के प्रति  त्याग का भाव अनुभव होता  है,एक-दूसरे के लिए समर्पित हो जाने की भावना उत्पन होती  है।मनुष्य एक-दूसरे की प्रसन्नता में प्रसन्नता अनुभव करता है। एक-दूसरे का साथ पाकर सुरक्षित तथा प्रसन्न अनुभव करता है। एक-दूसरे पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देना चाहता है। जब उसका एक-दूसरे से सिर्फ शारीरिक या मानसिक सम्बन्ध न होकर “आत्मा से आत्मा” का मिलन हो जाता है,शायद वही प्रेम है। ‘प्रेम’, हृदय की वह अनुभूति है जो जन्म के साथ ही ईश्वर से उपहार स्वरूप प्राप्त होती  है, या यूँ कहें कि,माँ के गर्भ में ही प्रेम का भाव पल्लवित एवं पुष्पित हुआ होता  है। प्रेम अस्तित्व है- अवलम्ब है- समर्पण है, निःस्वार्थ भाव से चाहत है,जिसे हम केवल  अनुभव ही कर सकते हैं। प्रेम अपनेआप में ही पूर्ण है, जिसे शब्दों में अभिव्यक्त करना थोड़ा कठिन ही है। फिर भी हम अल्पबुद्धि से  प्रेम की परिभाषा  लिखने का प्रयास करते  हैं। 

प्रेम शब्द में  प्र को प्रकारात्मक और एम को पालनकर्ता भी माना जाता है। प्रेम में लेन-देन नहीं होता। प्रेम सिर्फ देकर ही  संतुष्ट होता है। शरीर,मन और आत्मा प्रेम के सतह हैं। प्रेम किसे,किस सतह पर होता है,यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है।

Philosophers  आत्मा और परमात्मा के प्रेम का वर्णन करते हैं,तो महाकवियों के संवेदनशील मन ने हृदय की सुन्दरता को महसूस कर प्रेम का चित्रण अपने अंदाज में किया है। आम तौर पर हर रिश्ते में अलग-अलग भावनाएं जुड़ी होती हैं।  उन भावनाओं की अनुभूति भी प्रेम के प्रकार हैं। उम्र के साथ-साथ प्रेम का भाव भी बदलता रहता है। जब व्यक्ति अपने बालपन की दहलीज को लांघ किशोरावस्था के लिए कदम बढ़ाता है,तब उसे शारीरिक और मानसिक स्तर पर कई प्रकार के परिवर्तनों  का सामना करना पड़ता है और वह विपरीत लिंग के प्रति आकर्षित होता है। इसी आकर्षण को जब शरीर, मन और आत्मा आत्मसात कर लेता है तो उस  प्रक्रिया को ही हम प्रेम कह सकते हैं। तब आरम्भ होती हैं लेन-देन की ,समर्पण की प्रक्रिया।  प्रेम एक-दूसरे को देकर संतुष्ट होता है।

राधा-कृष्ण का प्रेम सच्चे प्रेम का उदाहरण है। पुरातन युग में प्रेम को खुली छूट नहीं मिली थी। लैला-मजनू,हीर-रांझा के प्रेम को समाज  की मान्यता नहीं मिली, और प्रेम के लिए उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी थी। लेकिन आजकल तो  प्रेमी बहुत ही आसानी से टूट और जुड़ रहे हैं। आज लोग “दिल की अपेक्षा दिमाग” से काम ले रहे हैं। समाज भी प्रेम को स्वीकार कर रहा है,यही वजह है कि आजकल प्रेम विवाह की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

आज पश्चिमी सभ्यता के अन्धानुकरण ने प्रेम का अंदाज ही बदल दिया है।आजकल का प्रेम जीवन जीवान्तर तक का न होकर कुछ वर्षों में ही टूट और जुड़ रहा है। प्रेमी-प्रेमिका बड़ी आसानी से एक-दूसरे के प्रेम बन्धन से मुक्त होकर अन्य प्रेमी-प्रेमिका ढूंढ ले रहे हैं, और बड़ी आसानी से अपने अपने पुराने प्रेमी-प्रेमिका को कह देते हैं कि,अब हम सिर्फ दोस्त हैं। कुछ लोग विवाहेत्तर ( extramarital) सम्बन्धों को भी प्रेम की संज्ञा देते हैं। उनके अनुसार प्रेम अंधा होता है वह उचित और अनुचित नहीं देखता, सिर्फ़ प्रेम करता है -अंधा- वह अपने तरह-तरह के कुतर्कों द्वारा अपने प्रेम को सही साबित करने का प्रयास करता है।

विवाहेत्तर सम्बन्धों का दुष्परिणाम कभी-कभी बहुत ही भयावह होता है। मर्यादित प्रेम यदि जीवन में सुधा की रसधारा  है तो अमर्यादित प्रेम विष का प्याला और आग का दरिया है। इसलिए,प्रेम में मर्यादा का होना आवश्यक है। 

क्रमशः जारी- To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

18   जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत इस  बार  आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के  7  समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य युगसैनिक निम्नलिखित हैं :

(1) डा अरुण त्रिखा-33,(2)प्रेरणा बिटिया-28,(3) अरुण वर्मा जी-26,(4)रजत वर्मा जी-25,(5) संध्या कुमार बहिन जी-36,(6)रेणु श्रीवास्तव बहिन जी-40,(7)सरविन्द कुमार जी-29 

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युग सैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है। रेणू  बहिन  जी को एक  बार फिर 40  अंक  प्राप्त कर  स्वर्ण पदक जीतने  पर  हमारी  व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। जय गुरुदेव

हमारी दृष्टि में सभी सहकर्मी  विजेता ही हैं जो अपना अमूल्य योगदान  दे रहे हैं,धन्यवाद् जय गुरुदेव

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हमने गायत्री माता को वैसे ही प्यार किया जैसे एक छोटा बच्चा अपनी माँ से करता है।

18 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद -हमने गायत्री माता को वैसे ही प्यार किया जैसे एक छोटा बच्चा अपनी माँ से करता है। 

आज का ज्ञानप्रसाद आरम्भ करने से पूर्व हम सभी देवतुल्य सहकर्मियों को एक पुनीत कार्य के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। सभी जानते हैं कि वसंत का पावन पर्व इस वर्ष 5 फरवरी को है।परमपूज्य गुरुदेव अपना आध्यात्मिक जन्म दिवस वसंत को ही मानते हैं। गायत्री परिवार की समस्त गतिविधियों  का शुभारम्भ वसंत को ही किया जाता रहा है। सविनय आमंत्रण है कि परमपूज्य गुरुदेव यां ऑनलाइन ज्ञानरथ से सम्बंधितअनुभूतिआँ भेज कर अपने गुरु के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करने का परम् सौभाग्य प्राप्त करें। आदरणीय सरविन्द कुमार और अरुण वर्मा जी इस दिशा में अग्रसर  हुए थे, आशा करते हैं अधिक से अधिक  सहकर्मी  सहकारिता और सहभागिता व्यक्त करेंगें। अभी 10-12 दिन का समय है, तो आज ही चिंतन करना आरम्भ करें तो उचित होगा। 

हर बार की भांति आज का लेख भी परमपूज्य गुरुदेव के अंतःकरण की परतों के भीतर झाँकने की दिशा में एक छोटा सा प्रयास है। हमारे देवतुल्य सहकर्मी इन लेखों को अटूट प्यार देकर हमारा उत्साहवर्धन कर रहे हैं ,हम ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं और इसी उत्साह से आरम्भ करते हैं आज का ज्ञानप्रसाद।  

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 हमने गायत्री माता को वैसे ही प्यार किया जैसे एक छोटा बच्चा अपनी माँ से करता है 

यदि हमारी गायत्री उपासना के ब्रह्म कलेवर को उखाड़ कर उसके अन्तरंग को देखा जाये, जाना जाय तो उसके गहन में प्रेम तत्त्व की साधना का विशाल विस्तार परिलक्षित होगा। मातृत्व की साकार प्रतिमूर्ति को हमने “गायत्री माता” के रूप में देखा और उसे वैसे ही प्यार किया जैसा एक छोटा बच्चा  अपनी सगी माता को कर सकता हैं लोग सिर फोड़ी करते रहते है कि गायत्री साकार नहीं निराकार है। साकार का अर्थ है जिसका आकार होता है और निरकार का अर्थ है जिसका कोई आकार नहीं।  हम इस बहस में नहीं पड़ते कि वह क्या है? वस्तुतः वह सब कुछ है। जो सब कुछ है वह क्या नहीं है? वस्तुतः वह सब कुछ है, उसे किसी आकृति में देखने से क्या गर्ज? निराकार नहीं है हम यह कब कहते  हैं, पर उसे साकार मानना भी अनुपयुक्त नहीं है। बिजली निराकार है पर वह बल्ब के भीतर साकार भी देखी जा सकती है? माता की साकार छवि को हमने अपनी प्रेम भावना के विकास में एक महत्त्वपूर्ण माध्यम माना और उसकी प्रतिक्रिया एवं प्रतिध्वनि के रूप में अविरल वात्सल्य का दैवी अनुदान निरन्तर पाया।

महामानव की प्रतिमा हमने साक्षात् मिल  गयी

परमात्मा का प्रेम अपने विकसित स्वरूप में एक कदम आगे बढ़ते हुए गुरु-भक्ति के रूप में फलित हो सका। भगवान् की साकार-निराकार प्रतिमा तो हमें कल्पना-स्तर में अपनी बनानी पड़ती है, पर सतोगुण आत्म-बल और दैवी तत्त्व से भरे-पूरे महामानव की प्रतिमा तो हमें बढ़ी हुई, हँसती-बोलती चलती-फिरती साक्षात् मिल गई। प्रेम साधना के लिये यह और भी सरल माध्यम दीखा। सो हमने अपने मार्ग-दर्शक पर उतनी ही निष्ठा आरोपित की जितनी परमेश्वर पर की जा सकती है। एक बार जाँच, परख लेना और सोच समझ लेना भी आवश्यक था, सो वैसा कर भी लिया। पूरी परख तो हो भी नहीं सकती, पूर्णता प्राप्त तो कोई शरीरधारी है भी नहीं, फिर सतर्क, चतुर और अविश्वासी भी तो आये दिन धोखा खाते रहते है।

यदि एक महान् प्रयोग में कहीं कुछ गड़बड़ी  मिली भी  तो अपना सहज विश्वास और निर्मल प्रेम अपने लिये तो उज्ज्वल परिणाम ही उत्पन्न करेगा। जिस पर प्रेम बोया गया, यदि वह गड़बड़ होगी तो उसकी गड़बड़ी उसी के साथ वापिस चली जाएगी, अपनी श्रद्धा अपने साथ सत्परिणाम लेकर ही  लौटेगी।  इसलिये यह मान लिया गया कि अपने को कोई खतरा  नहीं है। 

अध्यात्म मार्ग का अर्थ है समर्पण

घाटा- मुनाफा तो  सांसारिक परिपेक्ष्य में होता है। अध्यात्म मार्ग के  पथिक को  आरम्भ में ही शिरोधार्य करके पूर्ण समर्पण करना  पड़ता है। निश्चय ही यह मुनाफ़ा कमाने का व्यापार नहीं है ।। सांसारिक दृष्टि से हर अध्यात्मवादी को घाटे के बजट बनाने पड़ते हैं, तभी उसकी आत्मिक प्रगति के साधन सरंजाम जुड़ते है। जो सांसारिक लाभ के लिये आध्यात्म मार्ग में प्रवेश करता है, उसे निराश ही होना पड़ता है। दोनों परस्पर विरोधी दिशायें है, एक को खोकर दूसरी पाई जा सकती है। हमारे लिए कभी भी यह आशंका नहीं उठी कि हमारे मार्गदर्शक  द्वारा बताये गए निर्देशों से कोई भौतिक  हानि होगी। जहाँ विश्वास, वहाँ प्रेम और  जहां प्रेम वहाँ विश्वास। बाजीगर के हाथ में अपने तार बाँधकर कठपुतली  बहुत कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करने का आनन्द लेती रहती है। अपने बाज़ीगर के प्रति  आत्म-समर्पण करके हमने  क्या खोया ? केवल पाना ही था, सो पाया ही पाया और  पाते ही  चले आ रहे हैं  और आगे तो और भी अधिक पाना है।

अपने मार्ग-दर्शक के प्रति हमारी प्रेम साधना को  साँसारिक रिश्तों से तोला  जाय तो उसकी उपमा पतिव्रता स्त्री के अगण्य पति प्रेम से दी जा सकती है। उनकी प्रसन्नता अपनी प्रसन्नता है, उनकी इच्छा अपनी इच्छा। अपने व्यक्तित्व के लिये भी कुछ चाहने-माँगने की कल्पना तक नहीं उठी। केवल इतना ही सोचते रहे अपने पास जो कुछ भी है, अपने साथ जो भी सम्पदायें विभूतियाँ जुड़ी हुई हैं, वे सभी इस आराध्य के चरणों पर समर्पित हो जाएँ, उनके व्यक्तित्व में धुल जाएँ, उनके प्रयोजनों में खप जाएँ, ऐसे अवसर जब भी, जितने भी आये हमारे संतोष ओर उल्लास की मात्रा उतनी ही बढ़ी।  यह गुरु-भक्ति हमारे लिये कितने बड़े वरदान ओर उपहार लेकर वापिस लौटती रही है, इसकी चर्चा इस समय अप्रासंगिक ही रहेगी। दूसरे निम्न स्तर  लोगों की तरह हमनें  भी अगर  गुरु-शिष्य का ढोंग बनाकर अपनी कामना पूर्ति की माँग पर माँग रखी होती और प्रेम को  लाभदायक धन्धे के रूप में मछली पकड़ने का जाल बनाया होता तो निराश और शिकायतों भरा मस्तिष्क लेकर खाली ही लौटना पड़ता। दिव्य तत्त्व में आखिर इतनी अकल तो होती ही  है कि मनुष्य की स्वार्थपरायणता  और प्रेम भावना की वस्तुस्थिति का अन्तर समझ सके। 

दण्डवत, प्रणाम और आरती स्तवन से नहीं वहाँ तो केवल वस्तुस्थिति ही प्रभावी सिद्ध होती है।” हमारे गुरुदेव पर आरोपित हमारी प्रेम साधना प्रकारान्तर से चमत्कारी वरदान बनकर ही वापिस लौटी है और  लौटती रहेगी।

विश्व ब्रह्माण्ड भगवान का विराट रूप

हमारी प्रेम साधना की एक धारा-प्रवाह परिवार की ओर है। यों कहने सुनने में परिवार एक संकीर्णता ही लगता है। परिवार से, गायत्री परिवार या युग-निर्माण परिवार से ही मोह क्यों? सारे संसार से क्यों नहीं? इस सन्देह का समाधान जानने के लिये हमें व्यवहारिकता की भूमिका में उतरना होगा। समस्त विश्व ब्रह्माण्ड को भगवान् का विराट् रूप माना  जाता हैं। विश्व की, प्राणि-मात्र की, जड़-चेतन की सेवा ही भगवान् की सेवा है। इसे सिद्धान्त के रूप में ही सही माना जा सकता है, व्यवहार में उसकी कोई प्रतिक्रिया बनती नहीं। समस्त ब्रह्माण्ड में भगवान् व्याप्त है। पर उसके साथ संपर्क नहीं बन सकता। सम्पर्क हम केवल पृथ्वी भर तक रख सकते है। हमारी पहुँच इससे आगे नहीं है। समस्त जड़-चेतन में भगवान् हैं  पर समुद्र तल या भूगर्भ में हमारी पहुँच से बाहर पदार्थों के साथ हमारा व्यवहारिक सम्पर्क कैसे जुड़े? इसी प्रकार समस्त प्राणियों को भगवान का स्वरूप मानकर भी हम उन प्राणियों के समीप नहीं जा सकते, जो हमारी पहुँच से बहुत दूर जल थल या आकाश में विचरण करते रहते हैं । मछलियों की, मच्छर-मक्खियों की, कीट-पतंगों की सेवा करना भी सिद्धांत के तौर पर  ठीक है पर व्यवहार में मनुष्य ही उस क्षेत्र में आता है, क्योंकि उसकी स्थिति से अपनी स्थिति मिलती है। मनुष्यों में भी हम बहुत दूर के निवासी, अन्य भाषा बोलने वाले  लोगों के साथ सम्पर्क बनाने में असमर्थ हैं। समीपवर्ती, समान स्थिति के लोगों से सम्बन्ध बना  कर ही हम विश्व मानव की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को चरितार्थ कर सकते हैं।  प्राणि-मात्र की सेवा का आदर्श, मानव सेवा में ही चरितार्थ होता है। जिस प्रकार भगवत् प्रेम को इष्टदेव के एक सीमित विग्रह में सीमाबद्ध कर ध्यान करना पड़ता है, उसी प्रकार विराट ब्रह्म की सेवा साधना भी मानव समाज के उस वर्ग में करनी पड़ती है। जिस तक कि अपनी पहुँच हो।

हमारी पहुँच जितने व्यापक क्षेत्र में होती चली जा रही है, उसी अनुपात से हमारी “वसुधैव कुटुम्बकम्” की तृप्ति को चरितार्थ करने का विस्तार बढ़ता जाता है। इस सम्पर्क क्षेत्र को हम अपना परिवार कहते हैं और उन्हीं की सेवा, सहायता, ममता, आत्मीयता का ध्यान रखते हैं। जो हमें नहीं जानते, जिन्हें हम नहीं जानते, जिनकी पहुँच हम तक नहीं, जिन तक हम नहीं पहुँच सकते, उनके साथ प्रबल इच्छा होते हुये भी हम सम्पर्क नहीं साध सकते और उनकी प्रत्येक सेवा करने का मार्ग नहीं निकाल सकते, परोक्ष सेवा की बात अलग है वह तो अपनी सेवा करने से भी विश्व की सेवा हो जाती हे और भावना से सबके कल्याण का चिन्तन किया जा सकता है। सो हम भी करते हैं पर व्यवहारिक सेवा के लिए हर किसी का एक सीमित क्षेत्र ही है, सो ही हमारा भी है।

क्रमशः जारी- To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

17    जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत इस  बार  आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के   समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य युगसैनिक निम्नलिखित हैं :

(1) संध्या बहन जी – 44. (2) प्रेरणा कुमारी बिटिया रानी – 41, (3) सरविन्द कुमार पाल – 40, (4) अरूण कुमार वर्मा जी – 31, (5) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 30, (6) विदुषी बहन जी – 26, (7) डा.अरुन त्रिखा जी – 25, (8) पिंकी पाल बिटिया रानी – 24

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युग सैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है। संध्या बहिन  जी को एक  बार फिर 44  अंक  प्राप्त कर  स्वर्ण पदक जीतने  पर  हमारी  व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। जय गुरुदेव

हमारी दृष्टि में सभी सहकर्मी  विजेता ही हैं जो अपना अमूल्य योगदान  दे रहे हैं,धन्यवाद् जय गुरुदेव

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प्राणतत्व और प्रेमतत्व में क्या अंतर् है ?

17 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद – प्राणतत्व और प्रेमतत्व में क्या अंतर् है ?

विश्व भर में weekend की छुट्टी के बाद  सोमवार  को एक बार फिर अपने काम पर जाने को Monday Blues की परिभाषा दी गयी है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें हमारा काम पर जाने को मन नहीं करता,सुस्ती और कामचोरी करने को मन करता है। लेकिन हम पूर्ण विश्वास के साथ कह सकते हैं कि ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में एक भी विद्यार्थी ढूंढने पर नहीं मिलेगा जो Monday Blues से ग्रस्त है।  हम इतने बलपूर्वक इसलिए कह रहे हैं कि हमारे कुछ एक  परिवारजन रविवार को भी सम्पर्क किये रहते है।  हर रविवार किसी न किसी से फ़ोन /वीडियो, व्हाट्सप्प पर सम्पर्क हो ही जाता है। हमें तो ऐसा अनुभव होता है कि यह क्लास, यह सब्जेक्ट, यह विद्यार्थी ,यह अध्यापक(???) हैं ही इतने रोचक कि क्लास मिस करने की ,bunk मारने की बात सोचना ही व्यर्थ है। 

परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी का अमृतपान करना हमारा परम सौभाग्य है।  इस ज्ञान का अध्यन करके स्वयं अंतरात्मा में धारण करना ,औरों को अमृतपान कराना बहुत ही पुण्य का कार्य है क्योंकि ब्रह्मदान का पुण्य अन्नदान के पुण्य से कई हज़ार गुना अधिक है। 

तो चलते हैं आज के ज्ञानप्रसाद की ओर।      

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प्राणतत्व और प्रेमतत्व:

शरीर में जब प्राण रहता है तो आँखों में देखने की, कानों में सुनने की, जीभ में चखने की, हाथों में कुछ करने की, पैरों में चलने की शक्ति बनी रहती है। भीतर के कल-पुर्जे दिल-दिमाग आँत, दाँत सभी अपना काम करते रहते हैं। किन्तु जब प्राण  शरीर को छोड़कर  चला जाता है, तब समस्त इन्द्रियाँ और कलपुर्ज़ों  की शक्ति समाप्त हो जाती है और वे कुछ ही समय में सड़-गलकर बग़ावत  करने लगते हैं । जिस प्रकार शरीर के क्रिया-कलाप में “प्राण-तत्त्व” (जीवनी शक्ति)  की महत्ता है, उसी प्रकार आत्मिक क्षेत्र में “प्रेम-तत्त्व” का आधिपत्य है। अन्तरंग क्षेत्र में प्रेम भावना का जितना प्रकाश और विकास हुआ होगा, उसी अनुपात से अन्य सद्गुण जिन्हें विभूतियाँ कहा जाता है, उगने और बढ़ने लगती हैं।

अपनी आत्मिक प्रगति ( spiritual progress ) का रहस्य बताते जाना आवश्यक था, सो इस लेखमाला में उसके पर्त क्रमशः खोलते चले जायेंगे और इन दो-ढाई वर्षों में जो कुछ कहना आवश्यक था, उसका अधिकांश भाग कह लेंगे। बहुत से अनुभव और निष्कर्ष हमने अपनी साठ वर्ष की जीवन साधना में एकत्रित किये हैं, यह उचित ही था कि उन्हें साथ ले जाने की अपेक्षा परिजनों के सामने खोलकर रख दिया जाये। हमने अपना भरा हुआ मन खाली करना आरम्भ कर दिया है, ताकि संचय का यह अन्तरंग भार भी हल्का हो जाय। ब्रह्म जीवन के भार तो समय-समय पर हल्के करते रहे हैं। जो शेष हैं  वे अगले दिनों हल्के कर देंगे।

हमारा जीवन और गायत्री उपासना पद्धति:  

हमारी ब्रह्म उपासना पद्धति में गायत्री पुरश्चरणों की लम्बी श्रृंखला का प्राधान्य रहा है। कितने वर्षों तक, कितनी संख्या में, किस विधान में, किन नियम-संयमों के साथ उस उपासना क्रम को चलाया जाता रहा, समयानुसार इसकी भी चर्चा करेंगे। इस समय तो तथ्य की उस आधार शिला पर ही प्रकाश डाल रहे हैं, जिसके बिना कोई पूजा पद्धति सफल नहीं होती और वह है  “अन्तःकरण की मूल स्थिति।” अंतःकरण की मूल स्थिति वह पृष्ठभूमि है, जिसको सहज बनाकर ही कोई उपासना लंबी हो सकती है। उपासना का अर्थ है  “बीज बोना” और “अन्तःभूमि की परिष्कृत जमीन ठीक करना”। बीज बोने से फसल उगती है, यह बात सही है पर यह और भी सही है कि अच्छी जमीन जिसमें खाद, पानी, जुताई, गुड़ाई, निराई, रखवाली आदि की समुचित व्यवस्था की गई हो, किसी बीज को अंकुरित और फलित करने में समर्थ हो सकती है। इन दिनों लोग यह भूल करते हैं, वे “उपासना विधानों और कर्मकाण्डों” को ही सब कुछ समझ लेते है और अपनी मनोभूमि परिष्कृत करने की ओर ध्यान नहीं देते। पथरीली, सूखी, खारी, ऊसर धरती में अच्छे बीज भी नहीं उगते। फिर बिगड़ी हुई मनोभूमि में कोई उपासना क्यों कर फलवती होगी? यह सही नहीं कि केवल भजन मात्र से मनोभूमि शुद्ध हो जाती है। यदि यह मान्यता सही रही होती तो भारत के  56 लाख सन्त-महन्त आज प्राचीन- काल के सात ऋषियों की तुलना में 8 लाख गुना प्रकाश उत्पन्न कर सकने  में समर्थ हो गये होते। देखा यह जाता है कि बहुत भजन करने पर भी वे सामान्य किसान-मज़दूर  की तुलना में आत्मिक दृष्टि से पिछड़े हुए है। इन उदाहरणों को देखते हुए यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि उपासना का प्रतिफल तभी मिल सकता है जब मनोभूमि का विकास तदनुरूप हो। रामकृष्ण परमहंस को माँ काली की प्रतिमा अपने अस्तित्व का पग-पग पर परिचय देती थी पर उसी मन्दिर के अन्य पुजारी जो दिन रात सेवा-पूजा में लगे रहते थे, कुछ भी अनुभव नहीं कर  पाते थे । मीरा के गिरधर गोपाल उनके साथ नाचते थे पर वह प्रतिमा आज भी उसी तरह विद्यमान होने पर भी कोई अलौकिकता प्रकट नहीं करती। उसमें महत्व प्रतिमा या उपासना का नहीं, गरिमा “साधक की मनोभूमि” की है। सो लोग उसी की उपेक्षा कर बैठे, फिर शास्त्रोक्त परिणाम कैसे मिले।

उपासना विधान की त्रुटियों से कुछ भी नहीं बिगड़ता:  

हमारी गायत्री उपासना जिस सीमा तक सुलभ हो सकी, उसमें प्रधान कारण यह था कि अपने मार्ग दर्शक ने गायत्री पुरश्चरणों का विधान बताने ओर आरम्भ कराने से पूर्व मनोभूमि के परिष्कार की बात बहुत जोर देकर समझाई और कहा “उपासना विधान” में रही त्रुटियों से कुछ बहुत बिगड़ने वाला नहीं है पर यदि भावनात्मक स्तर को ऊँचा न उठाया गया तो सारा श्रम निष्फल चला जायेगा। गन्दी और संकीर्ण मनोभूमि वाले साधक बहुत हाथ-पैर पीटते रहने पर भी खाली हाथ रहते है और असफलता ही पाते है, किन्तु जो अन्तःकरण को परिष्कृत करते चलते है, उनकी साधना लहलहाती फसल की तरह उगती, बढ़ती और फलवती होती है, इसलिये हमें उस ओर पूरी सतर्कता और अभिरुचि के साथ प्रयत्नशील रहना होगा वैसा ही हमने किया भी। मनोभूमि के परिष्कार में जो सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है, वह है “अन्तःकरण में प्रेम-तत्त्व का अभिवर्धन।”  उपनिषदकार ने ईश्वर के भावनात्मक स्वरूप की व्याख्या करते हुए कहा है-

रसो वै स:’ अर्थात्– प्रेम ही  परमात्मा  है, जिन प्रेम कियो तिन  प्रभु पायो  

सः  का प्रयोग यहाँ स्वयम्भू सृजक के लिए  किया गया है और रस उनकी सुन्दर रचना से मिला  आनन्द है। जब प्राणी इस आनन्द को, इस रस को प्राप्त कर लेता है तो वह स्वयं आनन्दमय बन जाता है।

किसी व्यक्ति के कलेवर में परमात्मा ने कितने अंश में प्रवेश किया, उसकी परख करनी हो तो यह देखना होगी कि उसके अन्तःकरण में “प्रेम भावनाओं की उपस्थिति कितनी मात्रा में है।” थर्मामीटर से बुखार नापा जाता है और आत्मा का विकास प्रेम तत्त्व की मात्रा के अनुरूप समझा जाता है। जिसमें प्रेम भावना नहीं वह न तो आस्तिक है और न ईश्वर भक्त, न भजन जानता है, न पूजन। निष्ठुर, नीरस, सूखे, तीखे, स्वार्थी संकीर्ण,कड़वे, कर्कश, निन्दक, निर्दय प्रकृति के मनुष्यों को आत्मिक दृष्टि से नास्तिक  ही कहा जायेगा भले ही वे घण्टों पूजा-पाठ करते हों अथवा व्रत-उपासना स्नान -ध्यान तीर्थ-पूजन कथा-कीर्तन करने में घण्टों लगाते रहे हों।

अपने हाथ सही सिद्धान्त, सही मार्ग और सही प्रकाश आरम्भ से ही लग गया। मार्ग दर्शक ने पहले ही दिन सब कुछ बता दिया। उन्होंने कृपा करके सूक्ष्म शरीर में पधार कर अनुग्रह किया और 15 वर्ष की आयु में ही उस मार्ग पर लगा दिया, जिस पर चलने से ही आत्म-बल बढ़ता है और उस उपलब्धि के आधार पर ही जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिये आवश्यक प्रकाश मिलता है। बताया और सिखाया यह गया है कि प्रेम भावना के जितने बीजांकुर अन्तःकरण में विद्यमान है, उन्हें यत्न-पूर्वक संभालना, सींचना चाहिये। सांसारिक दृष्टि से घाटा दिखता हो तो भी इस भाव-सम्पदा को बढ़ाते चलना चाहिये। किसान बीज बोते समय खोता है पर अन्त में उसका यह विवेकपूर्ण त्याग और साहस उसे  घाटे में नहीं रहने देता। बीज की तुलना में बहुत गुना  उपलब्धि उसे बढ़िया फल  के रूप में समयानुसार मिल जाती है। अध्यात्म के इस मूलतत्त्व को हमने समझा और अपनाया।

प्रेम ही परमेश्वर  है: 

अपनी जीवन साधना की सफलता का जो आधार है, उनमें यह सर्वप्रथम और सर्वप्रधान है। प्रेम को हम परमेश्वर मानते हैं  और उसकी उपासना साधना में सतत मग्न रहने का प्रयत्न करते है। पूजा तो हमारी कुछ घण्टे की ही होती है पर लगन सोते-जागते यही लगी रहती है कि प्रेम का अमृत  चखाने  का कोई अवसर हाथ से जाने न पाये। यह वह उपक्रम है जो क्रमशः हमें प्रगति पथ पर  चलाने  से सफलता प्रदान करा  सका।

अभी थोड़ी देर पूर्व प्रकशित हुए  लेखों की श्रृंखला में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा  विदाई की घड़ियाँ और उनकी  विरह वेदना  की  अभिव्यक्ति की चर्चा  की गयी थी। यह चर्चा करने का  कारण और आधार ऐसे  परिजनों  लिये समझ सकना बहुत ही कठिन है, जिनकी मनोभूमि सूखी और रूखी पड़ी है। उनके लिये यह एक मोहग्रस्त मनुष्य  का प्रलाप-विलाप भी हो सकता है पर वस्तुतः वैसी बात है नहीं। जब हम भौतिक दृष्टि से शरीर को भी अपना नहीं मानते, अपना ब्रह्म और अन्तरंग सर्वस्व उस समग्र सत्ता को सौंप चुके तो लोभ और मोह किसका? जीवन का  जब मृत्यु के साथ ही  विवाह कर  दिया तो विदाई और बिना विदाई में अन्तर क्या? भौतिक और लौकिक पैमाने के ओछे मीटर  से नापा जाय तो हमारी इन दिनों की व्यथा-वेदना अज्ञानी मोह-ग्रस्तों जैसी लगेगी, पर उस सब भूमिका का अनुमान लगा सकना  किसी के लिये सम्भव हो तो वह यही अनुभव करेगा कि किसी अपने  से बिछुड़न  “प्रेम-तत्त्व के उपासक” के लिये कितना तड़पन भरा होता है। इस रहस्य को समझने के लिये हमें मीरा का अध्ययन करना पड़ेगा।

क्रमशः जारी- To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

15   जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत इस  बार  आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 13   समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य युगसैनिक निम्नलिखित हैं :

(1) सरविन्द कुमार पाल – 71, (2) संजना कुमारी बिटिया रानी – 35, (3) डा.अरुन त्रिखा जी – 32, (4) प्रेरणा कुमारी बिटिया रानी – 32, (5) रेणुका गंजीर बहन जी – 31, (6) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 30, (7) संध्या बहन जी – 30, (8) अरूण कुमार वर्मा जी – 28, (9) सुधा बर्नवाल बहन जी – 28, (10) रजत कुमार जी – 25, (11) पिंकी पाल बिटिया रानी – 24, (12) निशा भारद्वाज बहन जी – 24, (13) सुधा कुमारी बहन जी – 24

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युग सैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है।  सरविन्द भाई साहिब  जी को एक  बार फिर 71 अंक  प्राप्त कर   स्वर्ण पदक जीतने  पर  हमारी  व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। जय गुरुदेव

हमारी दृष्टि में सभी सहकर्मी  विजेता ही हैं जो अपना अमूल्य योगदान  दे रहे हैं,धन्यवाद् जय गुरुदेव

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एक उल्लास भरी आकर्षक कथा गाथा का सुखान्त अन्त

15 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद -एक उल्लास भरी  आकर्षक कथा गाथा का सुखान्त अन्त

आज का ज्ञानप्रसाद बहुत ही संक्षिप्त,केवल डेढ़ पन्नों का ही है क्योंकि गुरुदेव की मथुरा विदाई का अगला लेख कुछ अलग ही रोमांचकारी  दिव्य सन्देश से परिपूर्ण है और उसे इसके साथ जोड़ना उचित नहीं है। रविवार को अवकाश होने के कारण उस  दिव्य लेख के लिए  हमारे सहकर्मियों को सोमवार की प्रातः तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। 

अलग-अलग शब्दों का प्रयोग करके, अलग-अलग उदाहरण देकर परमपूज्य गुरुदेव ने हम बच्चों को अपने ह्रदय की व्यथा व्यक्त करने का प्रयत्न किया है, तभी तो पंडित लीलापत शर्मा जी ने कहा था “मैंने आज तक ऐसा लेखक नहीं देखा है।” जिस मर्ज़ी पुस्तक को उठा लो, जब कभी भी, किसी भी पुस्तक का कोई भी पन्ना निकाल लो, चाहे उसे पहले कितनी भी बार पढ़ा हो, ऐसा डूब जाने को मन करता है कि समाप्त किये बिना उठा ही नहीं   जा सकता। 

विदाई के वर्तमान लेखों को हम कितने ही दिनों से पढ़  रहे हैं लेकिन हर लेख अपने में एक अद्भुत सन्देश और मार्गदर्शन देने की क्षमता रखता है। आज के लेख में गुरुदेव बताते हैं कि लोग समझते हैं कि हमारा सारा  जीवन कष्टभरा और त्यागपूर्ण रहा है तो इस दुःखमय जीवन का अंत  भी दुःखमय ही हो रहा है, परन्तु ऐसा है नहीं। ऐसा इसलिए नहीं  है कि अभाव और  कष्टों भरी जिन्दगी काटने में एक शूरवीर योद्धा जैसी अनुभूति होती है। निरन्तर उत्कृष्टता की गतिविधियों से भरा पूरा जीवन बाहर से दयनीय ही क्यों  न लगे पर अंतर्मन  में अपार सन्तोष में  रहता है। हमारी अल्पबुद्धि इस स्थिति को एक माँ की स्थिति के साथ तुलना करने पर विवश कर रही है। अगर  हम अपनी माँ के  बारे में ही लिख दें तो अतिश्योक्ति न होगी।  बहुत सवेर से लेकर देर रात तक परिवार के एक -एक सदस्य का ख्याल रखना, एक -एक की दिनचर्या की चिंता करनी, खाने की पसंद की,कपड़ों की पसदं की  -लिस्ट इतनी लम्बी है कि शायद इसी पर लेख समाप्त हो जाये -लेकिन कभी भी जीवन को, दिनचर्या को दुःखमय नहीं समझा, उन्हें भी एक शूरवीर की भांति गर्व की अनुभूति होती रही थी -अवश्य ही हर माँ ऐसी ही होती है। तभी तो उसे भगवान् का दर्ज़ा दिया गया  है। गुरुदेव ने अपने बच्चों को,हम सबको एक माँ का संरक्षण और दुलार ही प्रदान किया है। आइये हम  सभी  सहकर्मी ऐसे गुरु के चरणों में नतमस्तक होकर आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतामृतपान करें।    

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एक उल्लास भरी  आकर्षक कथा गाथा का सुखान्त अन्त 

एक सुखान्त कहानी का दुखान्त अन्त हमें  अभीष्ट नहीं । हमारा समस्त जीवन क्रम आरम्भ से ही सुखान्त बना  है। आदर्शों की कल्पना, उनके प्रति अनन्य निष्ठा और तदनुकूल  कार्य पद्धति मे निर्धारण और निर्धारित  पथ पर कदम-कदम बढ़ते चलने का अविचल धैर्य एवं साहस, यही तो हमारी जीवन पद्धति है। 

“इस पथ पर चलते हुए दूसरों  की दृष्टि में  हमें बहुत  कष्ट सहने  और बहुत  त्याग करने पड़े हैं  और अब अन्त भी ऐसे ही रोते रुलाते हो रहा है। इसलिये देखने वालों  की समझ से यह गाथा दुःखान्त मानी जाने लगी है पर अपनी समझ में  अलग है।”

आदर्शों की कल्पनायें  मन में एक सिहरन और पुलकन उत्पन्न करती हैं। आदर्शों के प्रति अनन्य निष्ठा रखकर दूसरों के विरोध, उपहास की  चिन्ता न करते हुए, अभाव, कष्टों से भरी जिन्दगी काटने में एक शूरवीर योद्धा जैसी अनुभूति होती है। निरन्तर उत्कृष्टता की गतिविधियों से भरा पूरा जीवन बाहर से दयनीय ही क्यों  न लगे पर अन्तर में अपार सन्तोष में  रहता है।

अब तक इन्हीं  अनुभूतियों के साथ सुखपूर्वक हँसते खेलते दिन काटते आये हैं और मानते रहे हैं  कि हम संसार के गिने चुने लोगों की तरह सुखी हैं। अब अंत की विषम घड़ियाँ  यो एक बार कलेजे को कपडा निचोड़ने की तरह ऐंठती  है और अनायास ही रुलाई से कण्ठ भर देती हैं  फिर भी इसके पीछे कोई विवशता नहीं है। महान  उद्देश्य के लिये, लोक मंगल के लिए, नव निर्माण के लिए तिल- तिल करके अपने को गला देने में हमें असीम सन्तोष, अपार आनन्द और उच्चकोटि का गर्व अनुभव है। इस प्रकार यह एक उल्लास भरी  

“आकर्षक कथा गाथा का सुखान्त अन्त ही है। इसे दुःखान्त न माना जाय।”

पुरुष की तरह हमारी आकृति ही बनाई है, कोई चमड़ी उधेड़  कर देख सके तो भीतर माता का हृदय लगा मिलेगा, जो करुणा, ममता, स्नेह  और आत्मीयता से हिमालय की तरह निरन्तर गलते रहकर गंगा यमुना बहाता रहता है। इस दुर्बलता को मोह, ममता कहा तो जा सकता है पर निश्चय  ही यह विवशता नहीं है। सहेलियों  से बिछुड़ते हुए और पति के घर जाते हुए, जिस तरह किसी नव वधू की दुविधा भरी मनः स्थिति होती है, लगभग वैसी ही अपनी ही और रुधा कण्ठ एवं भावनाओं  के उफान से उफनता अन्तःकरण लगभग उसी स्तर का है। रात को बिना कहे चुपचाप पत्थर की तरह चल खड़े  होने का साहस अपने में नहीं, इस स्तर का वैराग्य अपने को मिला नहीं। इसे सौभाग्य, दुर्भाग्य जो भी कहा जाय कहना चाहिये।

अपनी सभी सहेलियों  से एक बार छाती से छाती जुड़ाकर मिल लेने और हँस खेल कर बड़े होने की स्मृतियों को ताज़ा  कर फफक-फफक कर रो लेने में  लोक उपहास भले ही होता है पर अपना चित्त हल्का हो जाएगा, सो ही हम से बन पड़ रहा है। मनुष्य आखिर  दुर्बलताओं से ही तो भरा है। अपने को हम एक नगण्य सा अति दुर्बल मानव प्राणी मात्र मानते रहे हैं। सो इन परिस्थितियों में हमारी दुर्बलतायें और भी अधिक स्पष्टतापूर्वक प्रकट हो रही हैं  तो अच्छा ही है। 

हमारा इतना जीवन परिवार की वृद्धि और विकास में  लग गया। छोटे-छोटे बच्चों  को उंगली पकड़कर चलना सिखाने से लेकर उनकी शिक्षा दीक्षा और सुव्यवस्थित जीवन श्रृंखला में पहुँचाने तक का जितना परिश्रम एक  गृहस्थ को करना पड़ता है, उसी परिश्रम और भावना के साथ बड़े यत्नपूर्वक हम इस परिवार के विकास में लगे रहे हैं। पाल पोस कर बड़े किये हुए  प्रिय परिजनों  को यों  छोड़कर चलना पड़ेगा, इसकी कभी कल्पना भी न की थी। यदि ऐसा पहले मालूम होता तो अपने बच्चो को समझाने बुझाने में  जो सख्ती बरतनी पड़ी  उसे पहले से ही कम करते और बदले में उन्हें अधिक स्नेह  और प्यार देते चले आये होते। अब तो विदाई  के क्षण समीप देखकर केवल रुलाई ही आती है कि अपने इस प्रिय परिवार को छोड़कर कैसे जायें ?

मन है कि अपने छोटे परिवार को अब जितना अधिक स्नेह, सद्भाव दे सकना सम्भव हो सके, दे लें । हंसने-खेलने,अपनी कहने, दूसरे की सुनने,सहानुभूति और सेवा के अधिकाधिक अवसर खोज निकालने मे शेष दो वर्षों को निकाल दें। इसी तरह यह थोड़ी सी अनमोल घड़ियाँ बीत सकें  तो अच्छा है। महान मानवता की सेवा करने के लिए तो दो वर्ष बाद का सारा बचा खुचा ही जीवन पड़ा है। यह दिन तो अपने छोटे परिवार के लिए व्यय करने का मन है।

प्यार, प्यार, प्यार यही हमारा मन्त्र  है। आत्मीयता, ममता, स्नेह और श्रद्धा यही हमारी उपासना है। सो बाकी दिनों  में  अब अपनों  में अपनी बाते ही नहीं कहेंगे-अपनी सारी ममता भी उन पर उड़ेलते रहेंगे। शायद इससे परिजनों  को भी कुछ  सुखद अनुभूति मिले, प्रतिफल और प्रतिदान की आशा किये बिना हमारा भावना प्रवाह तो अविरल  जारी ही रहेगा। परिजनों से परिपूर्ण स्नेह, यही  इन पिछले दिनों का हमारा उपहार है, जिसे कोई भुला सके तो भुला दे। हम तो जब तक मस्तिष्क मे स्मृति और ह्रदय  में भावना का स्पंदन विद्यमान है आजीवन उसे याद ही रखेंगे।

क्रमशः जारी- To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

14  जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत इस  बार  आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 10  समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य युगसैनिक निम्नलिखित हैं :

(1) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 30, (2) अरूण कुमार वर्मा जी – 50 , (3) संध्या बहन जी – 30 , (4) प्रेरणा कुमारी बिटिया रानी – 32 , (5) सरविन्द कुमार पाल – 51, (6 ) संजना कुमारी बिटिया रानी-46 , (7) रजत भाई साहिब -28   (8 ) डाअरुण त्रिखा-24  (9 )नीरा त्रिखा जी -25  (10 )सुमन लता बहिन जी -25  

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युग सैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है।  सरविन्द भाई साहिब  जी को इस बार स्वर्ण पदक प्राप्त  करने पर  हमारी  व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। जय गुरुदेव

हमारी दृष्टि में सभी सहकर्मी विजेता ही हैं जो अपना अमूल्य योगदान  दे रहे हैं,धन्यवाद् जय गुरुदेव 

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ढ़ाई  वर्ष बाद हमें  निर्धारित तपश्चर्या  के लिए जाना होगा

14 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद – ढ़ाई  वर्ष बाद हमें  निर्धारित तपश्चर्या  के लिए जाना होगा

पिछले कुछ दिनों से हम सब 1969 की अखंड ज्योति में  “विदाई की घड़ियां और हमारी व्यथा-वेदना” शीर्षक से प्रकाशित हुए लेखों का अध्यन कर रहे हैं, आपके कमैंट्स (जो communication का अद्भुत साधन हैं) इस तथ्य के साक्षी हैं कि इस विषय पर जितने भी लेख प्रकाशित हो जाएँ कम ही रहेगें। इसका कारण यह ही हो सकता है कि हम में से बहुतों को परमपूज्य गुरुदेव के  साक्षात् दर्शन नहीं हो सके और  लेखों की प्रस्तुति उनके लिए एक वरदान सिद्ध हो सकती है। गुरुदेव अपना ह्रदय खोल कर अपने बच्चों के आगे रख रहे हैं, अपनी वेदना तरह -तरह के उदाहरण देकर व्यक्त कर रहे हैं। तो आइये कल वाले लेख को आगे बढ़ाते हुए आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करें।  

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ढ़ाई  वर्ष बाद हमें  निर्धारित तपश्चर्या  के लिए जाना होगा

जिनके प्रति हमारी असीम श्रद्धा और अगाध भक्ति है, जिनके  संकेतों  पर पूरा जीवन  निकल गया, अब इस जराजीर्ण शरीर  को उनसे  अलग करने की, अपना रास्ता अलग बनाने की बात  सोची जाय? करना तो वही होगा जो नियति की आज्ञा है और इच्छा है, पर अपनी दुर्बलता का  क्या करें ? जिनके असीम स्नेह  जलाशय में स्वच्छन्द मछली की तरह क्रीड़ा कल्लोल करते हुए लम्बा जीवन बिता चुके, अब इस जलाशय से विलग होने की घड़ी भारी तड़पन उत्पन्न करती है। लगता है हम भी शायद ही इस स्थिति से कुछ ऊपर उठ पाये हैं।

अपना मन कितना ही इधर-उधर क्यों  न होता हो, यह निश्चित  है कि हमें  ढ़ाई  वर्ष बाद निर्धारित तपश्चर्या  के लिए जाना होगा और शेष जीवन इस प्रकार बिताना होगा, जिसमे जन संपर्क के लिए स्थान न रहे। यों  यह एक प्रकार से मृत्यु  जैसी स्थिति है। पर सन्तोष इतना ही है कि वस्तुतः ऐसी बात होगी नहीं। हमें अभी कितने ही दिन और जीना है।

जन संपर्क के स्थूल आवरण मे शक्तियाँ बहुत  व्यय होती रहती हैं, उन्हें बचा लेने पर हमारी सामर्थ्य अधिक बढ़ जायगी। सूक्ष्म शरीर तप साधना से परिपुष्ट होने पर और भी अधिक समर्थ बन  सकेगा। तब आज की अपेक्षा अपने लिये और दूसरों के लिये अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकेंगे । 

यदि ऐसा न होता तो हमारी मार्गदर्शक शक्ति हमें  वर्तमान उपयोगी कार्यक्रम और सरल  जीवन प्रवाह से विरत न करती।

वियोग की घड़ियों में भी संतोष केवल इस बात का है कि दूसरे लोग भले ही शरीर समेत हमसे मिल न सकें  पर जिन्हें अभीष्ट है उनके साथ भावनात्मक सम्बन्ध यथावत बना रहेगा वरन् सच पूछा जाय तो और भी अधिक बढ़ जाएगा, अति व्यस्तता और अल्प सामर्थ्य के कारण परिजनों के लिए जो अभी सम्भव नहीं हो पा रहा है, वह तब बहुत  सरल हो जाएगा।  शरीर की समीपता ही सान्निध्य का आधार नहीं होती। परदेश में रहने वाले भी अपने स्त्री पुत्रों के लिए बहुत कुछ सोचते/करते हैं। वियोग कई बार तो प्रेम को और भी अधिक प्रखर एवं प्रगाढ़ बनाता देखा गया है। ईश्वर भक्ति का आनन्द उसके अदृश्य  रहने से सम्भव होता है, यदि वह अपने साथ भाई भतीजे की तरह रहने लगे तो शायद उसकी भी उपेक्षा अवज्ञा होने लगे।

अब न स्वर्ग जाने की इच्छा है, न मुक्ति पाने की

जो भी हो, हमारा अपना आन्तरिक ढाँचा एक विचित्र स्तर का बन चुका है और उसे आग्रहपूर्वक वैसा ही बनाये रखेंगें । सहृदय, ममता, स्नेह, आत्मीयता की प्रवृत्ति हमारे रोम-रोम मे कूट-कूट कर भरी है। यह इतनी सरल व सुखद है कि किसी भी मूल्य पर इसे छोड़ने की बात तो दूर, घटाना भी सम्भव न हो सकेगा। तुष्णा और वासना से छुटकारा पाने के नाम हम मुक्ति मानते रहे है। सो उसे प्राप्त कर चुके। उच्च आदर्शों के अनुरूप जीवन पद्धति बनाये रहने, दूसरों  में  केवल अच्छाई देखने और सबमें  अपनी ही आत्मा देखकर असीम प्रेम करने की तीन धाराओं  का संयुक्त स्वरूप हम स्वर्ग मानते रहे हैं । सो उसका रसास्वादन चिरकाल से हो रहा है। अब न स्वर्ग जाने की इच्छा है, न मुक्ति पाने की।

ईश्वर दर्शन, आत्म साक्षात्कार, बुद्धि सिद्धि के लिए उनके अभाव में  जो आकर्षण रहता है, वह भी लगभग समाप्त हो चुका। अपनी कुछ कामना  ही नहीं। भावी तपश्चर्या के  प्रयोजन  उपरोक्त कारणों  में  से एक भी नहीं है। ऐसा वैराग्य जिसमे स्नेह  सौजन्य से-अनन्त आत्मीयता से वंचित होना पड़े, हमें तनिक भी अभीष्ट नहीं। हमारी ईश्वर भक्ति, पूजा उपासना से आरम्भ होती है और प्राणी मात्र को अपनी ही आत्मा के समान अनुभव करने और अपने ही शरीर के अंग  अवयवों की तरह अपनेपन की भावना रखते हुए अनन्य श्रद्धा चरितार्थ करने तक व्यापक होती चली जाती है। ऐसी दशा में कहीं  दूर चले जाने पर भी हमारे लिये यह संभव न हो सकेगा कि जिनके साथ इसी जीवन मे घनिष्ठता रही है, जिनका स्नेह, सद्भाव, सहयोग, अनुग्रह अपने ऊपर रहा है, उनकी ओर से तनिक भी मुख मोड़ा जाय, उनके प्रति उदासीनता और उपेक्षा अपनाई जाय। कोई कृतघ्न  ही ऐसा सोच सकता है।

यों  शरीर साधन और श्रम के द्वारा हमारी विभिन्न कार्यों में सहायता करने वाले  कम नहीं  हैं  पर  जो भाव भरी आत्मीयता के साथ, अपनी श्रद्धा, ममता और सद्भावना हमारे ऊपर उड़ेलते रहे हैं उनकी संख्या भी कम नहीं है। सच पूछा जाय जो यही वह शक्ति स्त्रोत रहा है, जिसे पीकर हम इतना कठिन जीवन जी सके हैं । रोटी ने नहीं, भाव भरी आत्मीयता के अनुदान जहाँ तहाँ से हमें  मिल सके हैं, उन्ही  ने हमारी नस-नालियों में जीवन भरा है और उसी के सहारे हम इस विशाल संघर्ष से भरे जीवन में जीवित रह सकने और कुछ कर सकने लायक कार्य कर सकने में समर्थ रहे  हैं । इन उपकारों को कोई पत्थर  ह्रदय, अति निष्ठुर और नर पशु ही भुला सकता है। हमें  ऐसी कृतज्ञता  का अभिशाप मिला नहीं है। कृतज्ञता से अपनी नस-नस भरी पड़ी है। जिसका एक रत्ती भी उपकार रहा है, वह हमें  एक मन लगा है और सोचा यही गया है कि उसके लिये अनेकों  गुनी सेवा, सहायता करके अपनी कृतज्ञता का परिचय दिया जाय। बन तो कुछ नहीं पड़ा पर अरमान अभी भी बड़े बड़े है। स्वप्न अभी यही है कि ढाई वर्ष बाद कहीं अन्यत्र चले जाने पर यदि कुछ उपलब्धियां  मिली और उन पर अपना अधिकार रहा तो उन्हें अपने ऋणदाताओ से ऋणमुक्त होने मे लगाएंगे ।

लोगों  की आँखों से हम दूर हो सकते हैं  पर हमारी आँखो से कोई दूर न होगा। 

जिनकी आँखो में  हमारे प्रति स्नेह  और हृदय में भावनायें  है, उन सब की तस्वीरें  हम अपने कलेजे में  छिपाकर ले जायेंगे  और उन देवप्रतिमाओं  पर निरन्तर आँसुओं  का अर्घ्य चढ़ाया करेंगे। कह नहीं सकते ऋणमुक्त  होने के लिए प्रत्युपकार का कुछ अवसर मिलेगा या  नहीं। पर यदि मिला तो अपनी इस देवप्रतिमाओं  को अलंकृत और सुसज्जित  करने मे कोई कसर नहीं छोड़ेंगें । लोग हमें  भूल सकते हैं  पर हम अपने  किसी भी स्नेही  को भूल  नहीं पाएंगे । पत्थर से बनी निष्ठुर देवप्रतिमाओं  के साथ आजीवन एकांगी प्रेम करने की कला भारतीय अध्यात्म सिखाता रहा है। सो हमने भली भांति सीख लिया है। पीठ फेरने पर लोग हमें  भूल जायेंगे, सो ठीक है, इससे अपना क्या बनता बिगड़ता है। जिसने कोई प्रत्यक्ष अनुदान नहीं दिया उन पत्थर  प्रतिमाओं के चरणों  मे आजीवन मस्तक झुकाते रहे हैं तो क्या उन देवियों और देवताओं की प्रतिमायें  हमारी आराध्य नहीं रह सकती, जिनकी ममता हमारे ऊपर समय-समय पर बरसी और प्राणों में सजीवता उत्पन्न  करती रही।

दिन कम बचे हैं, पूरे एक हजार भी तो नहीं बचे। रोज़  एक घट जाता है। इन दिनों  मे क्या करें , क्या न करें  सोचते रहते हैं। इस सोच विचार में एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि अपने छोटे से  परिवार को इस बीच भरपूर प्यार कर लें । कोई माता विवशता में  कहीं  अकेली जाती है तो चलते समय अपने बच्चों  को बार-बार दुलार करती है, बार बार चूमती है, लौट-लौट कर देखती और ममता से भरी गीली आँखे आंचल  से पोंछती हुई  आगे बढ़ती है। ऐसा ही कुछ उपक्रम अपना भी बन रहा है। सोचते हैं  जिन्हें अधूरा प्यार किया अब उन्हें  भरपूर प्यार कर लें । जिन्हें छाती से नहीं लगाया, जिन्हें गोदी में नहीं खिलाया, जिन्हें पुचकारा दुलारा नहीं, उस कमी को अब पूरी कर लें । किसी को कुछ अनुदान, आशीर्वाद देना अपने हाथ में न हो तो दुलार  देना तो अपने हाथ में है। प्रत्युपकार के लिए आतुर और कातर अपनी आत्मा इस तरह कुछ तो हल्कापन अनुभव करेगी ही  और शायद उससे स्नेह  पात्र स्वजनों को भी कुछ तो उत्साह उल्लास मिल ही सके।

क्रमशः जारी- To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

11 जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत एक बार फिर से आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 9 समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य युगसैनिक निम्नलिखित हैं :

(1) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 40, (2) अरूण कुमार वर्मा जी – 36, (3) संध्या बहन जी – 31, (4) प्रेरणा कुमारी बिटिया रानी – 28, (5) सरविन्द कुमार पाल – 27, (6) रेणुका गंजीर बहन जी – 26, (7) संजना कुमारी बिटिया रानी – 25, (8) साधना सिंह बहन जी – 25, (9) निशा भारद्वाज बहन जी – 24

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युग सैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है।  बहिन रेनू  श्रीवास्तव जी को बार -बार स्वर्ण पदक प्राप्त  करने पर  हमारी बार -बार व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। जय गुरुदेव

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आत्मीयता शरीर से नहीं, आत्मा से होती है। 

13 जनवरी 2021 का ज्ञानप्रसाद – आत्मीयता शरीर से नहीं, आत्मा से होती है। 

परमपूज्य गुरुदेव जब परिजनों के पत्रों के उत्तर देते थे  तो लिखते थे “ प्रिय आत्मीय जन।” कितनी आत्मीयता और अपनत्व है इस शब्द में।  आज के लेख में हम अध्यन करते हुए यह जानने का प्रयास करेंगें कि आत्मीयता का आत्मा के साथ कैसे सम्बन्ध है और सच्चे प्यार की क्या परिभाषा है। गुरुदेव बता रहे हैं कि प्यार में किसी को कोई घाटा नहीं रहा तो हमें क्यों रहे,किसी को कोई नुक्सान नहीं हुआ तो हमें क्यों हो। आज का लेख प्रेमी-प्रेमिका जोड़ों को अवश्य पढ़ना चाहिए- ज़रा पता चले प्रेम का असली अर्थ क्या होता है। “स्वार्थ नहीं -समर्पण,समर्पण और केवल समर्पण” 

जब हम यह शब्द लिख रहे हैं तो ऐसा लग रहा है कि गुरुदेव ने हमारे लिए ही लिखे होंगें।  एक- एक शब्द हम अपने ऊपर फिट करके देख रहे हैं।  इसका टेस्ट तो हमने कई बार किया है लेकिन अभी एक दिन पहले  ही अपने आत्मीयजनों ने,सहकर्मियों ने,सहपाठियों ने जिस प्रेम और अपनत्व के भाव व्यक्त किये हैं, हम तो निशब्द हैं। केवल एक दिन की अस्वस्थता ही थी। गुरुदेव ने हमारा कार्य सरल कर दिया, धन्यवाद् गुरुवर, आपके श्रीचरणों में शीश नवाते हैं -ऐसे  ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार की संरचना और संचालन के लिए।किस किस ने, क्या-क्या मैसेज किये,फ़ोन किये,क्या-क्या अपनत्व की भावना व्यक्त की-हम तो केवल यही कहने में समर्थ हैं -धरती पर स्वर्ग का अवतरण हो चुका  है, मनुष्य में देवत्व का उदय हो चुका है -ऐसी  देवतुल्य आत्माएं ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार की शान हैं नमन नमन एवं नमन। 

इन्ही शब्दों के साथ  आरम्भ करते हैं आज का पाठ  

“प्यार के धागों को इस तरह तोड़ना पड़ेगा, इसकी कभी कल्पना भी न की थी।”

विदाई के दिन जितने समीप आते जा रहे हैं, उतनी ही गति से हमारी भावनाओ में  उफान आता जा रहा है। लोगों को मौत का डर लगता है, सो हमें  न कभी था और न अब है। व्यक्तिगत स्वामित्व और अहंकार  के कारण उत्पन्न  होने वाला मोड़ भी कब का  विदा हो गया है । अवधुत (सन्यासी) की तरह मरघट में  रहना पड़े  तो भी अपने को कष्ट होने वाला नही है। सन् 60 का अज्ञातवास “सुनसान के सहचरों” के साथ हँसते-खेलते काट लिया था। जिन्दगी के शेष  दिनों को शरीर  किन्ही भी परिस्थितियों  में  पूरा कर लेता। विदाई के बाद उत्पन होने वाली अन्य सभी विषम परिस्थितियों को सहन करने योग्य विवेक, धैर्य, साहस  ओर अभ्यास अपने को है। बार-बार जो हूक  और इठन कलेजे मे उठती है उसका कारण यदि कोई दुर्बलता हो सकती है तो एक ही हो सकती है कि  जिनको प्यार किया, उनको समीप पाने की भी अभिलाषा सदा बनी रही। एक कुटुम्ब  बनाया, घरौंदा  खड़ा  किया, उसे बड़े प्यार से सजाया, बड़ी-बड़ी आशायें  बाँधी, बड़े अरमान संजोये। अब जबकि वे सपने कुछ-कुछ सजीव होने लगे थे, तभी नींद खुलने  का समय आ गया। ऐसा मीठा सपना अधूरा ही छोड़ना पड़ेगा  यह कभी सोचा भी न था। प्यार के धागों को इस तरह तोड़ना पड़ेगा , इसकी कभी कल्पना भी न की थी। जाने की बात बहुत दिन से कही  सुनी जा रही थी। उसकी जानकारी भी थी  पर यह पता न था कि प्रियजनों के बिछुड़ने  की व्यथा  कितना अधिक कचोटने  वाली-ऐंठने  मरोड़ने वाली होती है। अब विदाई के क्षण जितने समीप आते-जाते हैं, वह व्यथा  घटती नहीं बढ़ती  ही जाती है। यों  यह एक विडम्बना ही है कि जो  मोहमाया  का खण्डन करता रहा हो, ज्ञान-वैराग्य का उपदेश देता  रहा हो, वह अवसर आने पर अपने ऊपर बीतने पर इतनी व्यथा-वेदना अनुभव करे।

“प्रेम के व्यापार में घाटा किसी को भी नहीं रहता, फिर हमें  ही नुकसान क्यों उठाना पड़ता?”

अब हम अपने अन्तर की हर घुटन, व्यथा और अनुभूति को अपनों के आगे उगलेंगे ताकि हमारे अन्तर का भार हल्का हो जाय और परिजनों को भी वास्तविकता का पता चल जाय। आत्म-कथा तो जैसे कैसे लिखी जा सकेगी पर जो आंतरिक संघर्ष घुमड़ते हैं, उन्हें तो बाहर लाया ही जा सकता है। इसे सुनने से,  सुनने वालो को मानव तत्व के एक पहलू  को समझने का अवसर ही मिलेगा।

लोग अपनी आंख से हमें  कुछ भी देखते रहे हो, अपनी समझ से कुछ भी समझते रहें  हो। किसी ने विद्वान, किसी ने तपस्वी, किसी ने तत्व-दर्शी, किसी ने लोक-सेवी, किसी ने प्रतिभा-पुजं  आदि कुछ भी समझा हो। हम अपनी आँखों  और अपनी समझ में केवल एक अति सहृदय, अति भावुक और  आतिशय स्नेही  प्रकृति के एक नगण्य से मनुष्य मात्र रहे हैं । प्यार करना “सीखने और सिखाने” में सारी जिन्दगी चली गई। यदि कोई धन्धा  किया है तो एक कि “महँगी कीमत देकर प्यार खरीदना और सस्ते दाम पर उसे बेच देना। इस व्यापार में लाभ हुआ या घाटा, इसका हिसाब कौन लगाए।  खाली हाथ नंग धडंग  आठ पौण्ड वजन लेकर आये थे, अब कपड़ों में लिपटा एक सौ सोलह पौण्ड वजन लेकर जा रहे है- खोया क्या? पाया ही तो है। तब एक माँ और एक कुटुम्ब हमें  अपना समझता था, अब कितनों  ही  की अनुकम्पायें  अपने ऊपर बरसती हैं , कितनों के ही अनुग्रह से अपने शरीर, मन और  अन्तःकरण विकसित हए, खोया  क्या? पाया ही पाया है । प्रेम के व्यापार में घाटा किसी को भी नहीं रहता, फिर हमें  ही नुकसान क्यों उठाना पड़ता? नुकसान एक ही रहा कि यह सोचने मे न आया कि स्नेह  का तन्तु जितना मधुर है, वियोग की घड़ियों में वह उतना ही तीखा बन जाता है। यदि यह मालूम होता कि आत्मीयता जितनी घनिष्ठ होती है, उसका वियोग उतना ही  असह्य  होता है तो कुछ दिन पहले से ही मन को समेटना, स्नेह  तंतुओं को शिथिल करना और उदासीन बनने का अभ्यास करते, पर प्रकृति का  क्या किया जाय। मन तो ऐसा भौंड़ा  मिला है, आदतें  तो ऐसी विचित्र हैं, जो ज्ञान विज्ञान के सारे बन्धन तोड़कर आगे निकल जाता है।

“आत्मीयता शरीर से नहीं, आत्मा से होती है”

आत्मा एक है, हम सभी एक धागे  में  माला के दानों  का तरह जुड़े हुए हैं। शरीर से दूर रहने पर आत्मा की एकता बनी रहती है। स्नेह  में दूरी बाधक नहीं होती। आत्मीयता शरीर से नहीं, आत्मा से होती है।  तत्व दर्शन हमनें  पढ़े  तो बहुत  हैं, दूसरों को सुनाये भी हैं  पर उनका प्रयोग सफलतापूर्वक  कर सकना कितनी ऊँची स्थिति पर पहुँचे व्यक्ति के लिए सम्भव है यह कभी सोचा न था। लगता है अभी अपनी आत्मिक प्रगति नगण्य ही है। यदि ऐसा न होता तो अपने स्वजन स्नेह  और उनकी असंख्य उप-कृतियाँ मस्तिष्क में  सिनेमा के चित्रपट की तरह उभर-उभर कर क्यों आती? असीम प्यार पाया पर उसका प्रतिदान  क्या दिया? अनेकों  के अनेकों  अहसान, पदार्थों के न सही भावनाओं के सही, अपने ऊपर लदे पड़े हैं। उनको कुछ प्रतिदान दिये बिना ही चलना पड़ रहा है। स्नेहीजनों के स्नेह  और अनुग्रहियों  के अनुग्रहों  का कितना ऋणभार लेकर विदा होना पड़ रहा है, यह सोच कर कभी-कभी बहुत  कष्ट होता है। अच्छा होता जन्म से ही कहीं  एकान्त मे चले गये होते। लोमड़ी खरगोशों  की तरह किसी का अहसान, उपकार, स्नेह  और सहकार लिये बिना जिन्दगी के दिन पूरे कर लेते, पर यदि लोगों के बीच रहना ही पड़ा और उनका सौजन्य लेना ही पड़ा  तो संतोष तब रहता जब उस प्रेम का प्रतिदान  भी कुछ बन पड़ा होता। सोचते तो बहुत  रहे, स्वप्न बड़े-बड़े देखते रहे, अमुक के लिए यह करेंगे, अमुक को यह देंगे, पर जो  किया  जा सका और जो  दिया जा सका, वह इतना कम है कि आत्मग्लानि होती है और लज्जा से  सिर  नीचा हो जाता है। कदाचित कुछ दिन और ठहरने का अवसर बन जाता तो और कुछ आशा शेष न थी।  

“स्वजनों के चरणो की धूलि  सिर पर रखते।”   

एक इच्छा अवश्य  थी कि असीम स्नेह  बरसाने वाले स्वजनों के लिये प्रतिदान  में जो कुछ अपने भीतर बाहर और कुछ शेष बच  रहा है, उसे राई रत्ती  देकर जाते और सबके चरणो की धूलि  सिर  पर रखकर कहते:

“इस  नगण्य से प्राणी से अभी इतना ही बन पड़ा। 84 लाख योनियों में यदि विचरण करना पड़ा तो हर शरीर को लेकर आप लोगो की सेवा में उपलब्ध प्रेम और सहकार का कुछ न कुछ ऋण भार चुकाने के लिए अति श्रद्धा के साथ उपस्थित होते रहेंगे और जिस शरीर से जितनी सेवा, सहायता बन  पड़ेगी, जितनी कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त कर सकने की क्षमता रहेगी उसका पूरा-पूरा उपयोग आपके समक्ष करते रहेंगे।”

पर अब यह सब कहने से लाभ क्या? समय आ पहुंचा। यों  मरना अभी देर से  है पर जब परस्पर मिलने जुलने और हंसने  खेलने, सुनने और समझने की सुविधा न रही, एक दूसरे से दूर-समीप के आनंद  से वंचित रह कर जीवित भी रहें  तो यह आनन्द उल्लास  जिसे पाने का यह मन बन चुका है, कहाँ मिल सकेगा? जिस शक्ति के साथ हम बंधे और जुड़े हैं, उसकी  अवज्ञा नहीं की जा सकती। इन्कार, उपेक्षा और बहाना करने की बात भी नहीं सोचते। हम अज्ञान ग्रस्त मोह बन्धन में बंधे प्राणी अपना दूरवर्ती  हित नहीं समझते-वह शक्ति समझती है और जिसमें हमारा, हमारे परिवार और हमारे समाज धर्म, एवं विभु का कल्याण है. उसी को करने जा रहे हैं।

अगला लेख -गुरुदेव की दादा गुरु के प्रति असीम श्रद्धा

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

हर बार की तरह आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प सूची :

11 जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत एक बार फिर से आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 9 समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य युगसैनिक निम्नलिखित हैं :

(1) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 56, (2) सरविन्द कुमार पाल – 47, (3) अरूण कुमार वर्मा जी – 29, (4) संजना कुमारी बिटिया रानी – 29, (5) डा.अरुन त्रिखा जी – 26,25, (6) प्रेरणा कुमारी बिटिया रानी – 25, (7) नीरा त्रिखा बहन जी – 24, (8) संध्या बहन जी – 24, (9) रेणुका गंजीर  बहन जी – 24

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युग सैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है बहिन रेनू  श्रीवास्तव जी को  हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। जय गुरुदेव

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मृत्यु से पहले ही हमारे अंग ज़रूरतमंदों के लिए सुरक्षित कर लिए जाएँ । 

11 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद – मृत्यु से पहले ही हमारे अंग ज़रूरतमंदों के लिए सुरक्षित कर लिए जाएँ । 

आज का ज्ञानप्रसाद कल वाले मार्मिक वृतांत का ही अगला भाग है। हम देख रहे हैं कि कैसे-कैसे बड़ी ही कठिनता से परमपूज्य गुरुदेव अपनेआप को परिजनों से बिछड़ने के लिए तैयार कर रहे हैं। उनके अंतःकरण में अपने बच्चों के प्रति ,अपने परिवार के प्रति किस प्रकार का स्नेह है और कैसे एक सुखान्त कथानक का दुखान्त पटाक्षेप होने वाला है। जो परिजन रंगमंच से परिचित हैं अवश्य जानते होंगें अलग- अलग दृश्यों के बीच पर्दा गिरता है -पर्दा गिरने को ही पटाक्षेप कहता हैं। मथुरा से दृश्य समाप्त करके हरिद्वार में नवीन भूमिका निभाने हेतु परमपूज्य गुरुदेव कार्यरत हैं। 

तो आइये चलें सुने गुरुदेव के अंतःकरण की वाणी। 

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इन दिनों हमारी आन्तरिक स्थिति कुछ ऐसी है जिसका विश्लेषण कर सकना हमारे लिये कठिन है। हमारी व्यथा, वेदना के कष्ट से डरने की, परीक्षा मे कांपने की अथवा मोह ममता न छोड़ सकने वाली अज्ञानी जैसी लगती भर है वस्तुतः वैसी है नहीं। डर या कायरता की मंज़िल पार हो चुकी। सुख सुविधा की इच्छा के लिये अब मरने के दिनों गुंजाइश भी कहाँ रही? शौक मौज को आयु डल गई। अब तो और कोई न सही अपना जराजीर्ण शरीर भी पग-पग पर असुविधाएं उत्पन्न करेगा ऐसी दशा में सुविधाओं की कामना, असुविधाओं को अनिच्छा भी रोने-कलपने का कारण नहीं है। कारण एक ही है हमारी भावुकता और छलछलाते प्यार से भरी मनोभूमि। जिनका रत्तीभर भी मोह हमने पाया है उनका बदला पहाड़ जैसा प्रतिदिन देने के लिये मन मचलता रहता है। अपनों के साथ अपनेपन भरा भावनात्मक आदान प्रदान अन्तःकरण मे जो उल्लास उमगता रहता है उसका रस छोड़ते नहीं बनता। प्रियजनों के विछोह की कल्पना न जाने क्या कलेजे को मरोड़ डालती है। ब्रह्मज्ञान की दृष्टि मे यदि इसे मानवीय दुर्बलता कहा जाय तो हमें अपनी यह त्रुटि स्वीकार है। आखिर एक नगण्य से तुच्छ मानव ही तो हैं हम । कब हमने दावा किया है योगी यती होने का। हमारी दुर्बलता, ममता, बुद्धि यदि हमें आज बेतरह कचोटती है तो उसे हम छिपायेगें भी नहीं। एक दुर्बल मानव प्राणी को भाव भरी दर्बलता से उसके प्रियजनों को परिचित होना ही चाहिए।यह एक तथ्य है कि हमारा हर कदम अपने छोटे से भाव भरे परिवार से विलुप्त होने की दशा में बढ़ रहा है। जब साठ वर्ष एक एक करके देखते-देखते सामने बैठे पखेरुओं की तरह उड़ गये तो अब इन बेचारे दो वर्षों की क्या चलेगी। आज कल करते देखते देखते वह दिन भी आ ही रहा है जब हमें अपनी झोला और कम्बल पीठ पर लादे किसी अज्ञात दिशा में पदार्पण करते हुए देखा जाएगा और अन्तिम अभिवादन की एक कसक भर स्मृति लेकर हम सब अपने-अपने बन्धक क्षेत्रों की ओर लौट जायेंगे और एक सुखान्त कथानक का दुखान्त पटाक्षेप हो जाएगा। अब उस स्थिति को न तो टाला जा सकता है और न बदला। यह दर्द भरा दुखान्त पटाक्षेप हमारे लिये कितना असली होगा और छाती पर कितना बड़ा पत्थर बाँध कर हम अपना मानसिक सन्तुलन फिर स्थिर कर सकेगें इस सम्बन्ध में अभी कुछ कह सकना कठिन है। समय ही बतायेगा कि उस समय कैसी बीतेगी और उसका समाधान कैसे सम्भव होगा?

अभी तो इतनी ही आवश्यकता प्रतीत होती है कि एक बार अपने मन की दबी हुई व्यथाएँ अपने स्वजन परिजनों के सामने बैठकर खोलते। कहते है कि मन खोलकर कह लेने में चित्त हलका हो जाता है। परिजनों को अनावश्यक भी लगे पर हमारे लिये यह सुखद ही होगा। जो हमे थोड़ी राहत दे सके, ऐसा कुछ निरर्थक हो तो भी उदारता पूर्वक उसे सुन भी लिया जाना चाहिए। यह पक्तियाँ लिखते हुए सोचा यही गया है कि पाठक इसे बिना ऊँचा पढ़ते, सुनते रहेगे, जो काफी लम्बी हैं और कई अंकों तक चलेगी।

सबसे बड़ा भार हमारे ऊपर उन भाव भरी सद्भावनाओं का है जिन्हें ज्ञात और अज्ञात व्यक्तियों ने हमारे ऊपर समय-समय पर बरसाया है। सोच नहीं पाते कि इनका बदला कैसे चुकाया जाय। ऋण हमारे ऊपर बहुत है। जितना असीम प्यार, जितनी आत्माओं का, कितनी आत्मीयता और सौजन्यता से हमने पाया है उसकी स्मृति से जहाँ एक बार रोम-रोम पुलकित हो जाता है वहीं दूसरे ही क्षण यह सोचते हैं कि उनका बदला कैसे चुकाया जाय। प्रेम का प्रतिदान भी तो दिया जाता है, लेकर के ही तो नहीं चला जाना चाहिए। जिससे पाया है उसे देना भी तो चाहिए। अपना नन्हा-सा कलेवर, नन्हा-सा दिल, नन्हा-सा प्यार, किस किस का कितना प्रतिदान चुका सकना इससे सम्भव होगा यह विचार आते ही चित्त बहुत भारी और बहुत उदास हो जाता है।जिसने हमारी कुछ सेवा सहायता की है उनकी पाई-पाई चुका देंगे। न हमे स्वर्ग जाना है और न मुक्ति लेनी है। चौरासी लाख योनियों के चक्र मे एक बार भगवान से प्रार्थना करके इसलिये प्रवेश करेगे कि इस जन्म मे जिस-जिस ने हमारा जितना-जितना उपकार किया हो, जितनी सहायता की हो उसका एक-एक कण ब्याज सहित हमारे उस चौरासी चक्र में भुगतान करा दिया जाये। घास, फूल, पेड़, लकड़ी, बैल , गाय, गधा, भेड़ आदि बन कर हम किसी न किसी से अपने उपकारियों के अनुदान का बदला पूरे अधूरे रूप मे चुकाते रह सकते हैं। सद्भावना का भार ही क्या कम है जो किसी की सहायता का भार और ओड़ा जाय? यह सुविधा भगवान से लड़ झगड़कर प्राप्त कर लेंगे पर जिसने समय-समय पर ममता भरा प्यार हमें दिया है, हमारी तुच्छता को भुलाकर जो आदर, सम्मान, श्रद्धा, सद्भाव मोह एवं अपनत्व प्रदान किया है उनके लिये क्या कुछ किया जाय समझ में नहीं आता। इच्छा प्रबल है कि अपना हृदय कोई बादल जैसा बना दे और उसमे प्यार का इतना जल भर दे कि जहाँ से एक बूँद स्नेह की मिली हो वहाँ एक प्रहर की वर्षा कर सकने का सुअवसर मिल जाय मालूम नहीं ऐसा सम्भव होगा कि नहीं , यदि सम्भव हो सके तो हमारी अभिव्यक्ति उन सभी तक पहुंचे जिनकी सद्भावना किसी रूप मे हमे प्राप्त नई हो। वे उदार सज्जन अनुभव करें कि उनके प्यार को भुलाया नहीं गया वरन उसे पूरी तरह स्मरण रखा गया। बदला न चुकाया जा सका तो भी अपरिमित कृतज्ञता की भावना लेकर विदा हो रहे है। यह कृतज्ञता का ऋण भार तब तक सिर पर उठाये रहेंगे जब तक हमारी सत्ता कही बनी रहेगी। प्रत्युपकार प्रतिदान न बन सका हो तो प्रेमी परिजन समझें कि उनकी उदारता को कृतज्ञणता पूर्वक भुलाया नहीं गया। हमारा कृतज्ञ मस्तक उनके चरणों मे सदा विनम्र और विनयावत बना रहेगा जिन्होंने हमारे दोष दुर्गणों के प्रति घृणा न करके केवल हमारे सदगुण देखे और सद्भावनापूर्ण स्नेह और सम्मान प्रदान किया।

मन की दूसरी व्यथा जो खोलकर रखनी है यह है कि यह शरीर साठ वर्ष की लम्बी अवधि तक अगणित मनुष्यों और जीव जन्तुओं की सेवा सहायता से लाभ उठाता रहा है। जीवन धारण करने की क्रिया मे असंख्यों को ज्ञात-अज्ञात सहायता का लाभ मिला है। अन्त में ऐसे शारीर का क्या किया जाय? सोचते है यह मरते-मरते नष्ट होते-होते किसी के कुछ काम आ सके तो इसको कुछ सार्थक बन जाय। मौत सबको आती है-जरा जीर्ण शरीर के तो वह और भी अधिक निकट होती है। आज नहीं तो कल हमें भी मरना है। कही अज्ञात स्थिति में यह जल जाय तो बात दूसरी है अन्यथा मनुष्यों की पहुँच के भीतर स्थिति में प्राण निकले तो उस विकृत कलेवर का धूमधाम से संस्कार प्रदर्शन बिल्कुल न किया जाय हमने वसीयत कर दी है और इस घोषणा को ही वसीयत मान लिया जाय कि मरने से, पूरी मृत्यु से पहले ही जब तक जीवन विद्यमान रहे सारा रक्त निकाल लिया जाय और उसे किसी आवश्यकता वाले रोगी को दे दिया जाय। अब आँख, फेफड़े, गुर्दा, दिल आदि अंग दूसरों के काम आने लगे हैं, तब तक शायद चमड़ी, माँस, हड्डी आदि का भी कुछ उपयोग दूसरे रोगियों को यह अंग लगाने में होने लगे। जो भी अंग किसी के काम आ सकता हो तो उसे सरकारी संरक्षण में रखा जाए। 

क्रमशः जारी -To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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24 आहुति संकल्प सूची :

10 जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत एक बार फिर से आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 13 समर्पित साधकों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी युगसैनिक बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं और हम कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह देवतुल्य युगसैनिक निम्नलिखित हैं :

 (1) अरूण कुमार वर्मा जी – 42, (2) सरविन्द कुमार पाल – 38, (3) डा.अरुन त्रिखा जी – 35, (4) पिंकी पाल बिटिया रानी – 32, (5) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 31, (6) प्रेरणा कुमारी बिटिया रानी – 28, (7) रेणुका बहन जी – 28, (8) संजना कुमारी बिटिया रानी – 27, (9) निशा दीक्षित बहन जी – 25, (10) संध्या बहन जी – 24, (11) निशा भारद्वाज बहन जी – 24, (12) कुसुम बहन जी – 24,(13) रजत कुमार जी -27

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युग सैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है अरुण वर्मा भाई साहिब दूसरी बार 24 आहुति संकल्प सूची में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए हैं जो कि बहुत ही सराहनीय व प्रशंसनीय कार्य है। भाई साहिब को हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। जय गुरुदेव

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कठपुतली तो बेजान उपकरण है, खेल तो बाजीगर की उँगलियाँ करती हैं। 

10 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद – कठपुतली तो बेजान उपकरण है, खेल तो बाजीगर की उँगलियाँ करती हैं। 

आज के ज्ञानप्रसाद का शीर्षक बहुत ही Philosophical है। मदारी के तमाशे में दर्शक तो कठपुतली  के अभिनय को   देख कर प्रसन्न होते रहते  हैं लेकिन उसे नचाने वाला तो वह Expert  बाज़ीगर है जिसके हाथों की उँगलियाँ यह सब कुछ कर पाने में समर्थ हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने भी दादागुरु को एक बाज़ीगर और अपनेआप को बार-बार कठपुतली का संज्ञा दी है।        

आज से आरम्भ हो रही ज्ञानप्रसाद-शृंखला में हम परमपूज्य गुरुदेव की मथुरा से हरिद्वार की विदाई की पूर्ववेला  में उन्ही के द्वारा व्यक्त किये गए विचारों का अमृतपान करेंगें । गुरुदेव ने 20 जून 1971 को मथुरा से विदाई ली और युगतीर्थ शांतिकुंज में 10 दिन रहकर सुबह चार बजे कंधे  पर  एक थैला और  कंबल रखकर  हिमालय के लिए प्रस्थान कर गए थे।इन लेखों की शृंखला में हमारे परिजन परमपूज्य गुरुदेव की दूरदर्शिता और भावी योजनाओं का अनुभव करते हुए देखेंगें कि लगभग दो वर्ष पूर्व ही उन्होंने हम जैसे अनगनित बच्चों के समक्ष अपना करुणा से भरा ह्रदय खोल कर रख दिया था। आने वाले लेख परमपूज्य गुरुदेव की दिव्य लेखनी से 1969 की अखंड ज्योति में प्रकाशित हुए। इसी सन्दर्भ में 3 मई 2019 को अत्यंत दुर्लभ कंटेंट सहित हमने 25 मिंट की वीडियो भी बनाई थी। इस लेख के साथ हमारे  सहकर्मी अगर इस वीडियो को भी देख लें तो उस महान  व्यक्तित्व को समझने में और भी  सहायता मिलेगी। Please go to our YouTube channel to watch this video.

हमारा एकमात्र उदेश्य “परमपूज्य गुरुदेव को प्रत्येक हृदय में स्थापित करना”      

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आयु की दृष्टि मे लगभग 60 वर्ष पूरे करने जा रहे है। हमारे सांसारिक जीवन में एक बड़ा विराम यही लग जाना है। एक छोटे नाटक का यही पटाक्षेप है। दो वर्ष मे कुछ ही अधिक दिन शेष है कि हमे अपनी वे सभी हलचले बन्द कर देनी पड़ेगी जिनकी सर्वसाधारण को जानकारी बनी  रहती है। इसके उपरान्त क्या करना होगा, इसकी सही रूपरेखा तो हमें  भी मालूम नहीं है पर इतना सुनिश्चित  है कि यदि आगे भी जीना पड़ा तो उससे सर्वसाधारण का कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध न होगा। कहना चाहिए जो ऐसा प्रकाश पाकर भी अन्धकार में भटके। यदि हमारी कोई विशेषता और बहादुरी  है तो वह इतनी भर कि प्रलोभनों  और आकर्षणों  को चीरते हुए दैवी निर्देशों का पालन करने मे हमने अपना सारा साहस और मनोबल  झोंक  दिया। जो सुझाया गया वही सोचा और जो कहा गया वही करने लगे। इसी प्रक्रिया मे एक नगण्य सी जिन्दगी का एक छोटा-सा नाटक समाप्त हो चला, यही हमारी नन्ही-सी आत्म-कथा है। अब जीवन के अन्तिम चरण मे जो निर्देश मिला है उससे ऐसा विचित्र और कष्टकर  निर्णय हमें  स्वेच्छा से नहीं करना पड़ा है वरना इसके पीछे एक विवशता है। अब तक का सारा जीवन हमने एक ऐसी सत्ता के इशारे पर गुजारा है जो हर घड़ी  हमारे साथ है। हमारी हर विचारणा और गति विधि पर उसका नियन्त्रण है। बाजीगर की उंगलियों से बंधी हुए धागों के साथ जुड़ी हुई कठपुतली तरह-तरह के अभिनय करती हैं। देखने वाले इसे कठपुतली की करतूत मानते है पर असल में वह बेजान लकड़ी का एक तुच्छ-सा उपकरण मात्र है। खेल तो बाजीगर की उँगलियाँ करती हैं। हमें पता नहीं कभी कोई इच्छा निज के मन की  प्रेरणा से उठी है क्या? कोई क्रिया अपने मन से की  है क्या? जहाँ तक स्मृति साथ देती है एक ही अपना क्रम-एक ही ढर्रे पर लटकता चला आ रहा है कि हमारी मार्ग-दर्शक शक्ति जिसे हम गुरुदेव के नाम से स्मरण करते है,जब भी जो निर्देश देती रही है बिना अनुनय किये कठपुतली की तरह सोचने और करने की हलचलें  करते रहे हैं।

सौभाग्य ही कहना चाहिए कि आरम्भिक जीवन से ही हमें ऐसा मार्ग-दर्शन मिल गया। उसे अभागा ही इनकार कौन करे? कैसे करे? अपने बस  की यह बात ही नहीं। जब सारी जिन्दगी के हँसते मुस्कराते दिन एक इशारे पर गुजार दिए  तो अब इस जरा जीर्ण काया की  सुविधा-असुविधा का, परिजनों की मोह ममता का विचार कौन  करे? दो ढाई वर्ष हमें  अपना वर्तमान क्रिया कलाप समाप्त करना ही है और एक ऐसी तपक्षर्या में संलग्न होना ही है जिसमें जन संपर्क की न तो छूट है और न सुविधा।

गुरुदेव का करुणाभरा ह्रदय:

पिछले और अगले दिनों  की कभी तुलना करने लगते हैं  तो लगता है छाती फट जाएगी और एक हूक  पसलियों को चीर कर बाहर  निकल पड़ेगी। कोई अपनी चमड़ी उखाड़कर भीतर का अन्तरंग परखने लगे तो उसे माँस और हड्डियों  में एक तत्व उफनता दृष्टिगोचर होगा वह है असीम प्रेम। हमने जीवन में एक ही कमाई  की  है-प्रेम, एक ही सम्पदा कमाई है-प्रेम, एक ही रस हमने चखा है और वह है प्रेम का। यों  सभी में हमें अपनापन और आत्मभाव प्रतिबिंबित दिखाई पड़ता है पर उनके प्रति तो असीम ममता है जो एक लम्बी अवधि में भावनात्मक दृष्टि से हमारे अति समीप रहते रहे हैं । इनसे विलग होते हुए  हमे कम व्यथा नहीं है।

हर  किसी को विश्वास रखना चाहिए कि और कुछ हमारे पास हो चाहे न हो, असीम प्यार भरी ममता से हमारा अन्तःकरण भरा पूरा अवश्य है। जिसने हमें  तिल-भर प्यार किया है उसके लिये अपने मन में से ताड़ बराबर ममता उमड़ी  है। लम्बी अवधि से जिनके साथ हँसते-खेलते और प्यार करते चले आ रहे हैं  उनसे विलग होने की बात सोचकर हमारा मन भी गाय बछड़े के वियोग की तरह कातर हो उठता है। कई बार लगता है कोई छाती मे कुछ हूक  रहा है। यह वियोग कैसे सहा जाएगा। जिसकी कल्पना मात्र से दिल बैठ जाता है, उसी वियोग  को सहन करने में कितना बोझ पड़ेगा ? कहीं उस बोझ से यह शरीर  बैठ तो नहीं जायेगा ऐसी आशंका होती है।

ज्ञान और वैराग्य की पुस्तकें  हमने बहुत पढ़ी हैं । मोहमाया  की  निरर्थकता पर बहुत प्रवचन सुने हैं । संसार मिथ्या है, कोई किसी का नहीं- सब स्वार्थ के हैं  आदि आदि । यदा कदा उन शब्दो को दूसरों के सामने दुहराया भी है। पर अपनी दुर्बलता को प्रकट कर देना ही भला है कि हमारी मनोभूमि में अभी तक भी वह तत्व ज्ञान प्रवेश नहीं करता है। न कोई पराया दिखता है और न कहीं माया का आभास होता है जिससे विलग विरत हुआ जाय। जब अपनी ही आत्मा दूसरों  मे जगमगा रही है तो किससे मुंह  मोडा जाय? किससे नाता तोड़ा जाय? जो हमें  नहीं भुला पा रहे हैं, उन्हें हम कैसे भूल जायेगे? जो साथ घुले और जुड़े हैं उनसे नाता कैसे तोड़ लें, कुछ भी सूझ नहीं पड़ता। पढ़ा हुआ ब्रह्मज्ञान रत्ती भर भी सहायता नहीं करता। इन दिनों , बहुत  करके रात मे जब आँख खुल जाती है तब यही प्रसंग मस्तिष्क में  घूम जाता है। स्मृति पटल कर स्वजनों की हँसती बोलती मोह  ममता से भरी एक कतार बढ़ती उमड़ती  चली आती है। सभी एक से एक बड़कर प्रेमी, सभी एक से एक बढकर आत्मीय, सभी की एक से एक बढ़कर ममता। इस स्वर्ग में से घसीट कर हमें  कोई कहाँ लिये जो रहा है? क्यों  लिये जा रहा है। इन्हें छोड़कर हम कहाँ रहेंगे? कैसे रहेंगे? कुछ भी तो सूझ नहीं पड़ता। आँखें बरसती रहती है और सिरहाने रखे वस्त्र  गीले होते रहते हैं।

यह सोचने की गुंजाइश नहीं कि जिस कठोर कर्तव्य मे हमें  नियोजित किया जा रहा है वह अनुपयुक्त है। हमे कोई सता रहा है या विवश कर रहा है। हमे दूसरों  से जितना प्यार है, हमारे मार्ग दर्शक को हमारे प्रति उसकी  अपेक्षा कहीं अधिक प्यार है। स्वजनों  की व्यथा हमें  जैसे विचलित कर देती है, हमारी व्यथा उन्हें कुछ भी प्रभावित न करती हो सो बात नहीं। पर वे दूरदर्शी हैं, हम अज्ञानी। वह  हमारे शरीर, मन और आत्मा का श्रम एवं सदुपयोग अधिक अच्छी तरह समझते हैं।  इससे उनके निर्णय और निर्देश अनुपयुक्त नहीं हो सकते। उसके पीछे हमारी आत्मा का और विश्व मानव का अविछिन्न हित साधन जुड़ा हुआ  है, यह सुनिक्षित है। यदि ऐसा न होता तो वे न तो हमारे परिवार को रुलाते और न हमें  इधर उधर मुंह छिपाकर चुप-चुप सिसकते रहने की व्यथा वेदना  सहने का भार डालते।


गुरुदेव की विवशता है। आज की उबलती हुई दुनिया  को शीतलता प्रदान कर सकने वाली परिस्थितियों की आवश्यकता है। वे परिस्थितियाँ समुद्र मंथन  जैसे एक महान संघर्ष से उत्पन्न होगी। उस संघर्ष अभियान का सूत्र संचालन करने के लिये तेजस्वी आत्माओं  का आगे आना आवश्यक है। ऐसी आत्मायें  है तो आवश्य पर उनकी नसों  का ओज जम गया है। वे अकड़े और जकड़े बैठे हैं । ज़रूरत  उस गर्मी की है जो इस अकड़न और जकड़न की स्थिति को बदले और जो जम गया है उसे पिघलाकर  गतिशील बना दे। ऐसी गर्मी किसी प्रचण्ड तपस्या से ही उत्पत्र हो सकती है। पिछले स्वतन्त्रता संग्राम में  ऐसी गर्मी श्री रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण और योगी अरविन्द जैसे तपस्वी उत्पन  करते रहे हैं।  अब उससे भी बड़ा, मनुष्य के भावनात्मक नवनिर्माण का सच सामने है। इसके लिये प्रबुद्ध आत्माओं  का अवतरण और जागरण एक अनिवार्य आवश्यकता है। इसकी पूर्ति अनादि की उस सूक्ष्म ऊष्मा से भर देने पर ही सम्भव है जो समर्थ और सजग आत्माओं  को तुच्छता के बन्धनों से मुक्त करके महानता की भूमिका मे जागृत कर सके। ऐसी आत्मायें आज भी विद्यमान है परा उनकी अज्ञात मूर्छा  उठने ही नहीं देती। इनको जगाने के लिये जिस प्रखर ऊष्मा  और प्रबल कोलाहत की जरूरत है वही किसी बड़े प्रयत्न  से ही संभव है। लगता है ऐसा प्रयत्न  उन्हें यह सूझा है जिसके आधार पर हमें  कुछ ही दिन बाद एक अदभुत तपश्चर्या  में संलग्न होना है।

इतने महान् प्रयोजन की पूर्ति के लिये यदि अपने को पात्र समझ गया है तो यह बड़ी बात है। ऐसे सौभाग्य के लिये कुछ भी निछावर किया जा सकता है। भगवान् साहस दे तो जीवित दधीचि की तरह अपना माँस पशुओं  को खिलाकर  अस्थियो को उपहार देव प्रयोजन के लिये समर्पित कर देना एक अनुपम सौभाग्य ही माना जाएगा। छुट पुट त्याग, बलिदान तो इन साठ वर्षों में आये दिन करते रहने पड़े हैं पर अब अन्तिम पटाक्षेप के समय इतनी बड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होने का श्रेय मिलता है तो इससे कोई आत्मवेत्ता, सुखी, सन्तुष्ट प्रसन्न  और प्रमुदित ही हो सकता है। इसमें हमारे लिये रोने कलपने  की  आवश्यकता क्यों  पड़े?

क्रमशः जारी -To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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24 आहुति संकल्प सूची :

8  जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान  करने के उपरांत आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 13  समर्पित साधकों ने  24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के  लिए सभी युगसैनिक   बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं  और कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह  देवतुल्य युगसैनिक  निम्नलिखित हैं :

 (1) छोटी बिटिया  पिंकी पाल  – 63, (2) सरविन्द कुमार पाल – 57, (3) प्रेरणा बिटिया  – 38, (4) रेनू श्रीवास्तव जी – 35, 32, (5) अरूण कुमार वर्मा जी – 34, (6) संध्या कुमार  जी – 33, (7) डा.अरुन त्रिखा जी – 30, (8) संजना कुमारी बिटिया-30, (9) निशा भारद्वाज जी – 28, (10) रेणुका गंजीर  जी – 26, 25, (11) नीरा त्रिखा  जी – 25, (12) कुसुम त्रिपाठी  जी – 25, (13) रजत कुमार जी – 24

उक्त सभी सूझवान व समर्पित युग सैनिकों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में विजय हासिल की है  पिंकी पाल बिटिया रानी   24 आहुति संकल्प सूची में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुई हैं और  नैतिकता के आधार पर आदरणीय रेनू श्रीवास्तव बहन जी व रेणुका श्रीवास्तव  बहन जी ने दुगुने उत्साह व मनोयोग से दो-दो ग्रुप में 24 आहुति संकल्प सूची में अपना योगदान देकर कीर्तिमान स्थापित किया है जो कि बहुत ही सराहनीय व प्रशंसनीय कार्य है 

जय गुरुदेव

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युगनिर्माण योजना में परमपूज्य गुरुदेव का मार्गदर्शन

8 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद -युगनिर्माण योजना में परमपूज्य गुरुदेव का मार्गदर्शन

आज का ज्ञानप्रसाद आरम्भ  करने से पूर्व हम सभी सहकर्मियों के साथ शेयर कर रहे हैं कि आज आदरणीय मृतुन्जय तिवारी भाई साहिब का शुभ जन्मदिवस है। बिकाश शर्मा बेटे ने सुझाव दिया कि ऑनलाइन ज्ञानरथ की ओर से कुछ विशेष सन्देश होना चाहिए। तो हमने एकदम अपनी पुरानी प्रकाशित हुई वीडियोस में से कुछ एक क्लिप्स की एक संक्षिप्त( 3 मिंट) वीडियो बनाई जिसका लिंक प्रस्तुत है। हर बार यूट्यूब पर  लिंक चलने  में कोई न कोई समस्या अवश्य ही आती है क्योंकि यह एक shared लिंक होता है जो आपके इंटरनेट की  स्पीड पर आधरित है, व्हाट्सप्प य जीमेल पर कभी कोई समस्या नहीं आयी -कारण -वहां यह downloaded लिंक होता है। यूट्यूब सहकर्मियों से निवेदन करते हैं कि  इंटरनेट स्पीड का ख्याल रखें। https://drive.google.com/file/d/1FZzXyQEx1Pg82Wl8OOg2sifKzWHRjW66/view?usp=sharing ( This link may not be available if removed from google drive )

ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार मृतुन्जय भाई साहिब को जन्मदिवस सन्देश  भेजते हुए कामना करता है कि परमपूज्य गुरुदेव, वंदनीय माता जी और शुक्ला बाबा की कृपा उन पर सदैव बनी रहे। आप सभी जानते हैं की मृतुन्जय भाई साहिब शिष्य शिरोमणि शुक्ला बाबा के नाती हैं और अखंड ज्योति नेत्र हॉस्पिटल के ट्रस्टी और प्रोजेक्ट हेड हैं। अरुण वर्मा जी और संजना बेटी के परिवारों को इन दिव्य आत्माओं से  मिलने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका  है। आप हमारी वीडियोस देख कर उनके बारे में और जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 

अब बात आती है आज के ज्ञानप्रसाद  की।  शीर्षक तो है “युगनिर्माण योजना में परमपूज्य गुरुदेव का मार्गदर्शन” लेकिन यह शीर्षक इतना विस्तृत है कि इसे कुछ एक पन्नों में क्या, कई पुस्तकों में भी बांधना असंभव है। पिछले कितने ही दिनों से हम हीरक जयंती, सूक्ष्मीकरण साधना, परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन पर चर्चा कर रहे हैं, कोई अंत दिखाई ही नहीं  दे रहा। 1984 से 1986 तक की अखंड ज्योति के सभी अंकों को एक एक करके अध्यन करने के उपरांत जो कुछ भी अपनी अल्प बुद्धि  ने मार्गदर्शन पाया  आपके समक्ष प्रस्तुत किया। अब का मार्गदर्शन तो यही कह रहा है कि सोमवार से एक नई शृंखला का शुभारम्भ किया जाये-  परमपूज्य गुरुदेव की  मथुरा से मार्मिक  विदाई। 

तो आइये इन्ही शब्दों के साथ आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करें    

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भूतकाल के कार्यों के सम्बन्ध मे मिशन के सघन संपर्क मे आने वालों को अब तक की गतिविधियों का परिचय है। जो जान-बूझकर अविज्ञात रखी गई है उनका विवरण भी समय आने पर प्रकट और प्रतीत होता जायेगा। उदाहरण के लिए जहाँ समस्त विश्व मे एक स्वर से विनाश की सम्भावनाओं को सुनिक्षित बताया जा रहा है,उसके कारण प्रमाण, तर्क और तथ्य प्रस्तुत किए जा रहे है, वहीँ केवल एक ही आवाज उठी है कि विनाश होने नहीं दिया जायेगा। समस्त विभु की चिन्ता एक ओर और एक आदमी का निक्षय और उदघोष दूसरी ओर कि “कोई डरे नहीं, सभी निक्षिन्त रहें।” इस विभूवसुधा के ऊपर इतनी बड़ी ढाल तानी गई है कि उसे वेध सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। कठिनाइयाँ न आये, सो बात नहीं, पर वे समयानुसार निरस्त होती चलेगी। सृजन  की आवश्यकतायें बहुत बड़ी हैं, इतनी बड़ी कि उनका जुट सकना आज तो असम्भव जैसा दिखता  है, पर यह पक्तियों कह रही है कि हर साधन जुटता जायेगा। कौन जुटायेगा? कैसे जुटायेगा? इसका उल्लेख यहाँ आवश्यक नहीं, क्योंकि जब परोक्ष कर्तृत्व किसी महान सत्ता का है, तो व्यक्ति विशेष को श्रेय देना व्यर्थ है, उसका अहंकार बढ़ाने के समान है। इस प्रकार की बढ़ोत्तरी से संसार में कोई उठा नहीं, वरन् गिरा ही है। इसलिए कहा इतना भर जा रहा है कि विनाश की विभीषिकाएं निरस्त होगी और विकास उस तेजी से बढ़ेगा जिसकी घोषणा करना तो दूर, आज  उसकी रूपरेखा तक समझना कठिन है क्योंकि उस कथन को भी अत्युक्ति समझा जा सकता है।

पिछले दिनों जो हो चुका है उसका उल्लेख करना आवश्यक है। उस संदर्भ में इतना ही समझ लेना चाहिए कि प्रत्येक बसन्त पर्व एक नया तूफानी उभार साथ लाता है और वह आरम्भ में असाध्य या कष्टसाध्य दीखते हुए भी समय के साथ बढ़ता और फूलता जाता है। तालाब में घनघोर वर्षा का पानी जितना बढ़ता है उसी हिसाब से कमल का डंठल  भी रातों -रात बढ़ जाता है और फूल पानी में डूबने भी नहीं पाता, वरन ऊपर ही उठा हुआ दीखता है। 

अगले वर्ष से बसन्त पर्व के तुरन्त उपरान्त ही वे कार्यक्रम चल पड़ेगे, जिन्हें वर्गीकरण की दृष्टि से दो विभागों में भी बाँटा जा सकता है। समय के सेकेण्ड-मिली सेकेण्ड जैसे अगणित भाग हो सकते है परन्तु सुविधा को दृष्टि से उसे दो भागों में भी बाँटा जा सकता है- एक दिन, दूसरी रात। इसी प्रकार प्रस्तुत बसन्त के उपरान्त दो कार्यक्रम चलेंगे, पर उनकी शाखा-प्रशाखाएं इतनी होगी जिनकी संख्या की गिनती एक शब्द अगणित मे ही करनी होगी।

एक कार्य है देश के गाँव-गाँव मे युग परिवर्तन का सन्देश सुनाना,जन-जन के मन में अलख जगाना। दूसरा  कार्य है- देश के अपेक्षित अर्धमृत तीर्थों मे प्राण फूंकना,उनका पुनरुद्धार करना। कहने और सुनने मे यह दोनो योजनाएँ कुछ ही क्षणों में कही और सुनी जा सकती है लेकिन उनका विस्तार इतना बड़ा है कि जिसे मानवी कर्तृत्व से बाहर की बात समझा जाये, तो  अत्युक्ति न होगी।

भारत में सात लाख छोटे गाँव हैं, लेकिन मझले मिला लें तो बीस लाख हो जाते है। इन सभी गांवो मे युग चेतना की जानकारी पहुँचानी और उसके सिद्धान्त समझाने हैं । प्रज्ञायुग का अवतरण समीप है। उसमे दूरदर्शी विवेकशीलता का स्वरूप, उद्देश्य और व्यवहार जन-जन को समझाना है। साथ ही प्रस्तुत अवांछनीयता, अनैतिकता, मूढ़-मान्यता तथा कुरीतियों के कारण होने वाले भयंकर अन्यायों से भी अवगत कराया जाना है। हमें अगले दिनों जिस समता, एकता, सहकारिता की नीति को अपनाना है उसके महत्व को भी हृदयंगम कराना है। प्रज्ञायुग के चार आधार होंगे- समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी। इन सब के लिए मनों मे गुंजाइश पैदा करनी है और प्रचलन के नाम पर जो अविवेक और अनर्थ हर दिशा में छाया हुआ है उसका उन्मूलन भी करना है। यह कृत्य “हम बदलेंगे युग बदलेगा” की नीति के अनुरूप चलेगा और “नर और नारी एक समान” “जाति वंश सब एक समान” का आदर्श हृदयंगम करने पर ही सम्भव होगा। इन दिनों नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्र में अनेकों अनीतियाँ प्रचलित हैं। उनके विरुद्ध जनमत और आक्रोश भी जागृत करना है। विषमता का हर क्षेत्र में बाहुल्य है। उनके स्थान पर एकता और समता के सिद्धान्तों को मान्यता मिल सके, ऐसा वातावरण बनाना है।

इसके लिए जन-संपर्क साधने की आवश्यकता होगी। हर भाषा मे सस्ता प्रचार साहित्य पैदा करना है और दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन का प्रचलन इस स्तर पर करना है, जिसे शिक्षित पढ़ सके और जो आशिक्षित हैं पढ़े लिखों द्वारा सुन सके। यह प्रचार कार्य परस्पर वार्तालाप द्वारा, छोटी गोष्ठियों द्वारा और बड़े सम्मेलनों द्वारा चल पडेगा, तो एक भी व्यक्ति ऐसा न रहने पायेगा, जिसे युग परिवर्तन का आभास न मिले और आदर्शों को अपनाने का वातावरण न बने।

इसके लिए जहाँ जैसा सुयोग बनेगा, विचार विनिमय प्रवचन एवं वक्ताओं द्वारा छोटे बड़े समूहों को इस प्रकार समझाने का प्रयत्न चलेगा जो लोगों के अन्तराल की गहराई तक प्रवेश करता चला जाये। अभीष्ट प्रयोजन के लिए लेखनी और वाणी द्वारा तो प्रचण्ड प्रचार कार्य चलाया ही जाएगा, साथ ही बरसाती हरीतिमा की तरह दिन-रात चौगुने वेग से बढ़ने  वाली प्रज्ञा परिजनो की हरीतिमा को इतना शौर्य पराक्रम प्रस्तुत करने के लिए भी कटिबद्ध किया जायेगा कि वे अपने निज के क्रियाकलापों द्वारा असंख्यों के सामने अनुकरणीय आदर्श भी प्रस्तुत कर सकें । मनुष्य का स्वभाव अनुकरणशील है, उसने दुष्प्रवृत्तियां और दुर्भावनाएँ भी एक दूसरे से ही सीखी हैं। क्या यह सम्भव नहीं कि अग्रगामी व्रतशील परिजन जब सत्प्रयोजनों के लिए अपना आदर्श प्रस्तुत करें तो उनका अनुकरण दूसरे लोग करें। जब बुद्धि की छूत एक से दूसरे को लगी है तो कोई कारण नहीं कि शक्तिशाली सदाशयता का प्रभाव एक दूसरे पर न पड़े। जब कुछ ही दिनों  मे ईसाई धर्म और साम्यवादी सिद्धान्तों ने अधिकांश जन समुदाय को अपने अंचल में समेट लिया तो यह नितान्त असम्भव नहीं कि उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र और सौम्य व्यवहार का प्रभाव एक दूसरे पर न पड़े और आज की अवांछनीय परिस्थितियाँ बदली हुई मनःस्थिति के आधार पर उतर न सकें ।

यह है “जन संपर्क प्रक्रिया” जिसे प्राचीन काल के धर्मपरायण व्यक्ति अलख जगाना या आलोक (प्रकाश) वितरण कहते थे। कोई कारण नहीं कि एक समय जो सम्भव हो सका वह  उन्ही प्रयत्नों के आधार पर दूसरी बार सम्भव न हो सके। चिरकाल तक सतयुगी वातावरण इसी धरती पर रहा है तो कोई कारण नहीं कि उसकी वापसी न हो सके। सूर्यास्त होने के बाद जब दूसरे दिन फिर अरुणोदय के रूप में प्रकट हो सकता है तो सतयुग के अभिनव प्रज्ञा युग के रूप में पुनरावर्तन हो सकने मे शंका क्यों अभिव्यक्त की जाए ?

ब्रह्मपरायण वर्ग सदा से धर्म धारणा और भाव सम्वेदना का संरक्षक रहा है तो कोई कारण नहीं कि नवयुग के सृजन शिल्पी उस परम्परा को पुनर्जीवित करके और स्वार्थ को ठुकरा कर विश्वमानव को हित साधना के लिए लोभ, मोह और अहंकार का परित्याग करके राष्ट्र को जीवित और जागृत कर सकने वाले पुरोहितो के रूप मे नये सिरे से प्रकट न हो सके। घास मरती नहीं। गर्मी मे सूख जाती है किन्तु पहली वर्षा होते ही वह इतनी तेजी से उठती है कि धरातल पर मखमली फर्श बिछा देती है। मूल्यहीन नीचता से ऊँचे उठने वाली आत्माओं का बीज नाश नहीं हुआ है। युग चेतना की बरसात होते ही वे लोक प्रचलन का कायाकल्प कर सकेगीं। योजना ऐसी ही बनी है कि 80 करोड़ भारतवासी देवमानवों का लोकमानस बदल सकें और उनके पराक्रम से संसार भर का वातावरण बदल सकें । प्राचीनकाल में भारत के देव-मानवों ने संसार भर को अजस्र अनुदान दिये हैं। अब वह परम्परा पुनर्जीवित न हो सके ऐसा कोई कारण नहीं। पिछले दिनों छोटे से प्रयत्नों से 74 देशों मे युग परिवर्तन की हवा फैल सकी तो अगले दिनों उस दिशा में सशक्त प्रयास किये जाने पर समस्त संसार को उस लपेट में न लिया जा सके इसका कोई कारण नहीं।

पिछले दिनो जन जागरण के लिए, लोकमानस परिष्कार के लिए, जो सामान्य प्रयत्न हुए हैं उन्होंने आश्चर्यचकित करने वाले परिणाम उत्पन्न किये है तो कोई कारण नहीं कि अगले दिनों ऐसा न हो सके जिसे अभूतपूर्व कहा जा सके।

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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24 आहुति संकल्प सूची :

7  जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान  करने के उपरांत आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 7   समर्पित साधकों ने  24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के  लिए सभी सप्तऋषि  बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं  और कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह  देवतुल्य सप्तऋषि   निम्नलिखित हैं :

 (1) अरूण कुमार वर्मा जी – 41, (2) सरविन्द कुमार पाल – 40, (3) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 33, (4) डा.अरुन त्रिखा जी – 26,24, (5) संध्या बहन जी – 26, (6) प्रेरणा कुमारी बेटी – 26, (7) रेणुका बहन जी – 26

उक्त सभी आत्मीय सूझवान व समर्पित सहकर्मी देवतुल्य भाइयों व बहनो को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद, हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई। आज की संकल्प सूची में आदरणीय अरुण वर्मा जी को सबसे अधिक अंक प्राप्त करके स्वर्ण पदक विजेता होने की  हमारी सामूहिक और व्यक्तिगत स्पेशल बधाई। इस प्राप्ति के लिए सभी सहकर्मियों की सहकारिता और सहभागिता को नमन।

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हमारे सहकर्मी  आद. अरुण वर्मा जी की अनुभूति 

7 जनवरी  2022 का ज्ञानप्रसाद – हमारे सहकर्मी  आद. अरुण वर्मा जी की अनुभूति 

आज के ज्ञानप्रसाद में बिना किसी भूमिका के हम अरुण  वर्मा जी की अनुभूति प्रस्तुत कर रहे हैं ,हाँ इतना अवश्य कह सकते हैं कि इस लेख के पढ़ने  के बाद और परिजन भी आगे आयेंगें। शब्द सीमा के कारण  संकल्प सूची प्रकाशित न कर पाने के लिए क्षमा प्रार्थी हैं।  प्रेरणा बिटिया और संध्या बहिन जी को स्वर्ण पदक प्राप्त करने की हृदय से बधाई।    ______________

गायत्री परिवार में जुड़ने का अदभुत कहानी है।  11 फरवरी 2016 को एक छड़ सिमेन्ट का दुकान खोला,  पूजा  कराने के लिए गायत्री परिवार के पंडित जी को बुलाया, उन्हीं से पूजा कराई  और दुकान में देवस्थापना भी की। इस  घटना ने हमें गायत्री परिवार में सम्मिलित होने का सौभाग्य प्राप्त कराया, और उसी दिन से दुकान में गायत्री मंत्र के उच्चारण से पूजा करने लगा, गायत्री मंत्र तो आता नहीं था, फोन में इस मंत्र को लोड करवाकर सुनता था लेकिन छ: महीने में ही  दुकान को बंद करना पड़ा क्योंकि दुकान का किराया ज्यादा और बिक्री कुछ होती नहीं थी। लगभग 1 लाख रूपए का  नुकसान हुआ। 

एक महीने के बाद 220000 रूपए  में समान ढोने वाला  ऑटो खरीदा। 9 हजार सैलरी, 9 हजार के करीब इंसेन्टिव और 8-9 के बीच ऑटो  से आमदनी हो जाती थी ,जीवन ठीक से चल रहा था। सितम्बर 2017  में एक कार खरीदा जिसको ओला में चलवाना शुरू कर दिया लेकिन उससे  एक रूपया का भी बचत नहीं हुआ, फिर कार को दस हजार रूपए महीने पर दे दिया।  इसी बीच बड़ी वाली बेटी का बोर्ड का परीक्षा हुआ, परीक्षा पास करने के बाद इंजिनियरिंग की तैयारी के लिए जयपुर चली गई।  जिस आदमी को दस हजार  महीने पर कार  चलाने को दिया था वह छोड़ दिया, बहुत ज्यादा परेशानी होने लगी।  हमेशा तनाव में रहना शुरू हो गया।  मैं प्रतिदिन गायत्री मन्त्र  जपता था, सप्ताह में एक दिन छुट्टी रहती  तो  शक्तिपीठ जाकर हवन भी  करता था। पंडित जी से  बार बार बोलता था कि जब से गायत्री उपासना  शुरू किए हैं  गलत ही हो रहा है। वह  हमेशा यही बोलते- गुरुदेव परीक्षा ले रहे है। दोनों गाड़ीयों के होते  परेशानी बढ़ती गयी, उपासना में भी  व्यवधान आ रहा था। तब हमने गाड़ियां  बेचने का फैसला लिया। दोनों गाड़ियों के बेचने से जो पैसा मिला बेटियों की पढ़ाई चालू रखी। इतने उतार चढ़ाव  के बावजूद मुझे कोई अफ़सोस नहीं हुआ, मुझे लगा कि  बेटी की  पढ़ाई के लिए हुआ है। मेरी आमदनी भी आधी हो गयी, शायद कहीं न कहीं गुरुदेव की ही मर्ज़ी होगी। 

ज़मीन  बेचकर चाचा जी की  आज्ञा से दुकान खोली , छ: महीने में ही दुकान बंद हो गयी,उसी पैसे से  बेटी की  एडमिशन हुई, आटो आया जिसकी  कमाई से बेटी के  हॉस्टल और मेस  का खर्चा पूरा किया, पढ़ाई पुरा भी नहीं हुआ था कि दोनों गाड़ी बिक गयीं, छोटी बेटी की  पढ़ाई रुक गयी।  करोना के चलते मेरा इन्सेन्टिव भी बंद हो गया  और आमदनी सीधे 10000 रुपये पर आ गयी।  इसी बीच फिर बेटी की  एडमिशन  बी.आई. टी. में हो गयी।  पहले दूसरे कालेज में हुई थी  जहाँ  180000 रुपये दिया  था।  अब बेंगलुरु में एडमिशन हुआ तो दो दिन में ही पूरा  पैसा जमा करना था, अब कैसे होगा कुछ समझ में नहीं आ रहा था, लेकिन सब खेला गुरुदेव खेल रहे थे। किसी से उधार लेकर पैसे  का इंतजाम हो गया, कोई दिक्कत नही आयी।  एक महीने के बाद जो पैसा पहले वाले कालेज में  दिया  था वहाँ से रिटर्न आया तो उधर वापस कर दिया। इतना उतारा चढा़व होने के बाद भी दोनों बच्चियों की  पढ़ाई में कोई दिक्कत नहीं आयी।  बड़ी वाली इंजिनियरिंग कर रही है तो छोटी वाली बी.एस. सी. नर्सिंग कर रही है।  गुरुदेव अपने भक्त का परीक्षा लेते हैं। गुरुदेव की  परीक्षा से जो घबरा गया उसका कल्याण होना मुश्किल है।  अब तो ऐसा हो गया कि सही हो या गलत हमें कुछ फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि हमें पता है कि जो कुछ भी हो रहा है उन्हीं की मर्ज़ी से हो रहा है। 

संक्षिप्त में शांति कुंज की  घटना बताना चाहूंगा। 

जब शांतिकुंज जा रहे थे तो रास्ते में ही हमारे ससुर जी का दांत टूट गया,  पहूंचने पर सासु माँ का चश्मा टूट गया, गंगा स्नान के लिए गया तो मेरा पैर पत्थर से टकराकर जख्मी हो गया, लौटते समय  पत्नी के पैर की अंगुठी निकल कर कहीं  गिर गयी, घर पहुँच कर ड्यूटी से  घर लौट रहा था तो गाड़ी स्किड कर गयी और  साइलेंसर  से पैर जल गया। इस घटना के  दूसरे दिन मम्मी पापा में बहस  हुई तो पापा घर छोड़कर चले गये।  मेरा  जला हुआ पैर अभी  ठीक भी नहीं हुआ था कि बाइक स्किड  करने से  पैर फ्रैक्चर हो गया। 

एक के बाद एक की यह सारी घटनाएं क्या संकेत देती हैं ? 

हमारी पत्नी बोलती हैं  कि यह सब गुरुदेव की कृपा है, घबड़ाना नहीं है। हो सकता है इससे भी ज्यादा कुछ होने वाला हो जो इतने पर  ही पर टल गया।  

जिस प्रकार  शुक्ला  बाबा को एक ही दिन में मौत ने तीन बार अटैक किया और तीनों बार गुरुदेव ने बचा लिया, हो सकता है मेरे साथ भी कुछ वैसा ही घटित होने वाला हो। 

यह  तो जीवन  का एक पक्ष  है।  जीवन में  उतार चढ़ाव तो आते ही रहते हैं।  लेकिन गुरुदेव की कृपा से मेरे अंदर जो परिवर्तन आया वह बहुत ही अदभुत है। 

2016 में मैंने गायत्री मंत्र का जप शुरू किया था या यूँ कहीए कि गायत्री परिवार में शामिल होने का रास्ता मिला।  पंडित जी के  कहने पर  जनवरी 2017  में पहली बार शांतिकुंज घूमने  के विचार  से गया था।  गुरुदेव  के बारे में कुछ भी नहीं मालुम था, केवल  घूमकर ही वापिस आ गए। आने के बाद मार्च 2017  में  शक्तिपीठ पर तीन दिवसीय यज्ञ हुआ, हम भी पत्नी के साथ हवन करने गए। हवन के अन्त में पंडित जी  ने घोषणा की  कि हवनकुंड में यज्ञ भगवान को अपनी किसी   एक बुराई की आहुति दें।  मेरे अंतर्मन से जिज्ञासा उठी  कि शराब और मांसाहार छोड़ दूंगा। बिहार में 2016 में ही शराबबंदी हो गई थी इसलिए छोड़ना पड़ा, बंद होने के बाद भी मैं सप्ताह में एक दिन पी ही लेता था जिससे पकड़े जाने  का भी  डर था।  2018 में एक बार फिर  शांतिकुंज गया तो गुरुदीक्षा ली। वहां  भी एक बुराई छोड़ने को कहा गया।  मैंने बताया  कि शराब और मांसाहार तो  छोड़ दिया है तो उन्होंने कहा कि जो छोड़ दिए है उसकेइलावा  छोड़ना है। हमने तंबाकू खाना छोड़ दिया। 2019 में मथुरा, आंवलखेड़ा गया तो मेरे अंतर्मन ने एक बार फिर झकझोड़ा। मैंने संकल्प लिया कि बाकि का  नशा भी यहीं गुरुदेव के चरणों में समर्पित कर देता हूँ।  अगस्त 2019  के बाद से  मेरे अंदर से सारा नशा समाप्त हो गया और मैं एक  नशामुक्त प्राणी बन गया।  नशेड़ी का नशा छुड़वाना बहुत ही कठिन काम है, आज जितने भी हमारे साथी हैं वह सब कहते  हैं  यह सब कैसे हो गया।  हम सभी को यही कहते हैं कि यह सब हमारे गुरुदेव की कृपा है, उन्ही का मार्गदर्शन है। हमारे  साथी हमें मज़ाक में  बाबा कहकर सम्बोधन करते हैं लेकिन हमें कोई  फर्क नहीं पड़ता है।  यह सब गुरुदेव की कृपा से ही संभव हुआ। नशे के कारण  पत्नी से अक्सर  झगड़ा होता  रहता था, किसी भी समारोह में जाते  तो बिना पीये हुए नहीं जाते, पत्नी बहुत अपमान अनुभव करती  और झगड़ा भी हो जाता था।  लेकिन अब परम पूज्य गुरुदेव परम वंदनीय माता जी  एवं माँ गायत्री की कृपा से सब ठीक हो गया, गुरुदेव और उन पंडित जी को बहुत बहुत धन्यवाद करता हूँ जिनके माध्यम से यह सब कुछ सफल हो पाया। 

हमारे जीवन में ऑनलाइन  ज्ञानरथ परिवार का बहुत बड़ा योगदान। 

2019 नवम्बर दिसम्बर का महीना रहा होगा, जब हमें  औनलाइन ज्ञानरथ परिवार के साथ जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, कैसे जुड़े यह एक संयोग ही कहा जा सकता है।  मैं अक्सर शांतिकुंज से प्रसारित विडियो को देखता था,लाइक और कमेन्ट् भी करता था।  लेकिन कमेन्ट् के रिप्लाई में केवल  हाइलाइटेड कमेन्ट् ही  लिख कर आता था।  शुरू शुरू में तो बहुत खुश होता था कि मेरा भेजा हुआ कमेन्ट् हाइलाइटेड है, लेकिन बाद में निराश होने लगा क्योंकि  मेरे ह्रदय में  गुरुकार्य के लिए बहुत प्रेरणा थी  लेकिन कैसे करूँ, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। इसी बीच ऑनलाइन  ज्ञानरथ प्लेटफॉर्म पर आदरणीय अरुण भैया जी की  एक कहानी पढ़ने को मिली। कहानी बहुत अच्छी लगी, हमने दस लाइन का कमेंट किया और व्हाट्सप्प नंबर भी भेज दिया। कमेन्ट का विस्तृत रिप्लाई भी मिला और करीब 7 बजे शाम फोन पर बात भी हुई। पता चला कि अरूण भैया कनाडा में रहते हैं और वहाँ से फोन किए हैं, बात करके इतनी  खुशी हुई  कि शब्दों में ब्यान करना असंभव  है। ऐसा लगा  गुरुदेव ने मेरी बात सुन ली। फिर क्या था।  

अब ऑनलाइन ज्ञानरथ के  लेख व्हाट्सप्प  पर भी आने  शुरू हो गए हैं। व्हाट्सप्प  पर गुरुदेव के विचारों को शेयर भी करते हैं, बहुत से लोग पढते हैं , बहुत नहीं भी पढते   लेकिन मैं इसकी  परवाह नहीं करता था। गुरुदेव कहते थे कि मेरा विचार जन-जन तक पहूँचा दो, कौन अपनाएगा कौन नहीं अपनाएगा यह तय करना तुम्हारा काम नहीं है, लेकिन बाद में अरूण भैया बोले कि अगर कोई गुरुदेव के ज्ञानप्रसाद  को नहीं पढ़ता, बिना पढ़े डिलीट कर देता है तो यह गुरुदेव  का अपमान  है। इसलिए मैं  बीच-बीच में सुप्रभात के साथ लिखता हूं कि अगर आपको ज्ञानप्रसाद अच्छा  नहीं लगता   तो कृप्या हमें बता दें, हम   आपसे  शेयर नहीं करेंगें।  

2019 से आजतक मैं अनवरत ऑनलाइन ज्ञानरथ  परिवार में नियमितता पूर्वक उपस्थिति दर्ज करता आ रहा हूँ। इस प्लेटफॉर्म  के माध्यम से हमारे अन्दर बहुत बदलाव आया,हमारा परिष्कार  करने में आदरणीय अरूण भैया का भरपूर सहयोग मिला, बीच बीच में बात भी होती रहती है, इनके मार्गदर्शन से  बहुत कुछ सीखने को मिला। ऑनलाइन  ज्ञानरथ परिवार एक ऐसा परिवार है जिसमें  सभी भाई, बहनों, माताओं और बच्चों का  आदर पूर्वक सम्मान किया  जाता है।  हर किसी के  कमेन्ट का रिप्लाई दिया जाता है। पहले मैं  कमेन्ट्स का महत्व ही नहीं समझता था लेकिन धीरे-धीरे इसका महत्व समझ में आने लगा। आज ऑनलाइन  ज्ञानरथ परिवार के माध्यम से एक बहुत बड़ा परिवार मिला जो सुख-दुःख  में हमेशा साथ रहता है और प्रोत्साहित करते रहता है।  जितना भरोसा और विश्वास ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में  दिलाया जाता है, इतना तो अपने सगे सम्बन्धी  भी नहीं दिखाते। सभी सहकर्मी दुःख  की घड़ी में परमपूज्य गुरुदेव से  दुआएँ मांगते हैं और  कष्टों के निवारण हेतु  गायत्री मंत्र का जप भी करते हैं।  अभी मेरे साथ जो दुर्घटना हुई  इसमें भी सहकर्मियों ने  गायत्री मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र का जप  किया। ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार सभी की  प्रतिभा को निखारने और  प्रोत्साहित करने का निरंतर प्रयास  कर रहा है।सहकर्मियों के सहयोग से नए-नए प्रयास किये जाते है। आजकल चल रहे 24 आहुति संकल्प से सहकर्मियों के ह्रदय में संकल्प भावना उजागर हुई है और स्वर्ण पदक प्रथा से सभी सम्मानित अनुभव करते हैं।  

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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सब कुछ कहने के लिए विवश न करें। 

6 जनवरी 2021 का ज्ञानप्रसाद – सब कुछ कहने के लिए विवश न करें। 

आज का  ज्ञानप्रसाद आरम्भ करने से पूर्व हम सभी सहकर्मियों से  निवेदन कर रहे हैं कि हमारी बहुत ही समर्पित सहकर्मी आदरणीय विदुषी बंता जी के माता जी की दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाए। ज्ञानप्रसाद लिखने के कुछ समय पूर्व ही विदुषी बहिन जी ने इस  दुःखद समाचार का वर्णन शुभरात्रि सन्देश में रिप्लाई करते हुए किया  था।   भारत में बहुत रात हो चुकी थी इसलिए किसी सहकर्मी ने  कोई रिस्पांस/ रिप्लाई नहीं किया था।  ऑनलाइन ज्ञानरथ का प्रत्येक सदस्य परमपूज्य गुरुदेव एवं माँ गायत्री से प्रार्थना करता है  माता जी की आत्मा को शांति  प्रदान करते अपने दिव्य चरणों में स्थान दें और शोक संतप्त परिवार को यह irreparable loss सहन करने की शक्ति प्रदान करें। इस शोक की घड़ी  में आज की 24 आहुति संकल्प सूची और स्वर्ण पदक  वितरण समारोह कल तक के लिए स्थगित करने की आज्ञा लेते हैं। 

मार्च 1986 के अखंड ज्योति अंक पर आधारित आज का लेख अपनेआप में बहुत ही बड़े प्रश्न लिए हुए है। परमपूज्य गुरुदेव ने एक वर्ष के समयदान -जीवनदान की मांग की, कई तरह के प्रश्न एवं जिज्ञासाएं उठीं।  कितने ही  पत्र आए ,कितने ही प्रश्न पूछे गए , बहुतों के उत्तर  भी दिए गए।  लेकिन बहुतों ने शंकाभरे प्रश्न भी पूछे- सभी हमारे गुरुदेव की भांति तो हो नहीं सकते, जैसे दादा गुरु ने कहा वैसे ही एक समर्पित शिष्य की तरह मानते रहे।  और वह भी एक-दो वर्ष नहीं, आजीवन। इसी समर्पण और श्रद्धा के कारण हम आज उन्हें याद करते  हैं, सम्पूर्ण विश्व में उनका एक विशेष स्थान है,उनकी एक विशिष्ट ख्याति है-समस्त ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार नतमस्तक  है ऐसे गुरु को और उनके चरणों में शीश नवाता है।  

आज का ज्ञानप्रसाद उन परिजनों के लिए बहुत ही विशेष साबित हो सकता है जिन्होंने हमें जीवनदान के सम्बन्ध में बार-बार प्रश्न पूछे हैं। पारिवारिक समस्याओं से जूझ रहे परिजन मिशन के कार्यों में क्या योगदान दे सकते हैं, आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं। हमने ऐसे परिजनों से घण्टों बातचीत भी की,  शांतिकुंज में संपर्क भी करवाए ताकि किसी प्रकार की  शंका न रह जाए। हम निवेदन करेंगें कि इस लेख को बड़े ध्यान से पढ़कर समझने का प्रयास किया जाए कि Selection process कोई आसान नहीं है और जिस प्रकार हर किसी नौकरी में Probation period होता है यहाँ भी वही कार्यप्रणाली है। Very common rule of thumb is-अगर आप किसी भी प्रकार का दान- श्रमदान,समयदान,अंशदान, विवेकदान, ज्ञानदान, जीवनदान इत्यादि  देने में समर्थ हैं  तो युगतीर्थ शांतिकुंज  के बारे  में सोचने का लाभ है नहीं तो —– 

इन्ही शब्दों के साथ प्रस्तुत है आज का ज्ञानप्रसाद।                 

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युग परिवर्तन के महान् प्रयोजन में “एक वर्ष के समयदान” की याचना महाकाल ने की है। काम बड़ा और लम्बा भी। किन्तु एक वर्ष की ही माँग क्यों की गयी, जबकि इक्कीसवीं शताब्दी को आने में अभी 15 वर्ष और बाकी हैं और इस अवधि में महान घटनाएं होने वाली हैं। अशुभ से लड़ने और सृजन में जुटने के लिए असंख्यों एक से एक महत्व के काम सामने आने वाले हैं। पूरा जीवनदान कर भी दिया जाय तो भी आवश्यकता और उपयोगिता को देखते हुए वह कम है। फिर विचारणीय है कि बारम्बार एक वर्ष के समयदान की याचना ही क्यों दुहराई जा रही है?

फिर एक वर्ष की शर्त ही क्यों? किस लिए? पिछले वर्षों में भी कितने ही व्यक्तियों ने अपने जीवनदान मिशन के लिए दिए हैं और वे अपनी प्रतिभा का भली प्रकार निर्वाह कर रहे हैं। पूछने पर बताते ही हैं कि जिस प्रकार जीवनदान, कन्यादान आदि को वापस नहीं लिया जाता, उसी प्रकार जीवनदान को भी वापस लेकर प्रतिज्ञा तोड़ने की अपेक्षा और कुछ कर बैठना अच्छा। इसलिए जीवन यदि लोकमंगल के लिए समर्पित किया है तो इसी भूमि में प्राण त्यागेंगे। इसमें हेरा-फेरी करना न हमें शोभा देता है और न इसमें मिशन का एवं  गुरुदेव का गौरव है। हमारी तो प्रत्यक्ष बदनामी है ही, जो सुनेगा वह भी  धिक्कारेगा। इसलिए निश्चय तो निश्चय ही है। इस छोटी-सी आयु में ऐसा कलंक सिर पर लादकर क्यों चलें जिसकी कालिख-कालिमा फिर कभी छूटे ही नहीं।

“अब तक एक सौ से अधिक जीवनदानियों का समुदाय प्राण-पण से अपनी प्रतिज्ञा पर आरुढ़ है तो हमारे ही ऊपर क्यों ऐसी शर्त लगायी जा रही है कि एक ही वर्ष के लिए समय दिया जाय?” 

इसका मोटा उत्तर तो प्रश्नकर्ताओं को यही लिखाया जा रहा है कि 

1.यह दोनों पक्षों के लिये परीक्षा का समय है। आप लोग मिशन को देख लें, भली-भाँति परख लें, साथ ही हमें भी।  

2.साथ ही एक अवसर परखने का हमें भी दें कि आप इस तेज़ धार  तलवार पर चल सकेंगे या नहीं? 

3.अपना चिन्तन, चरित्र और व्यवहार उत्कृष्टता की कसौटी पर खरा सिद्ध कर सकेंगे या नहीं? 

4.बीच में कोई पक्ष अनुत्तीर्ण होता है तो उसके लिए यह छूट रहनी चाहिये कि वापस जाने या भेजने का उपाय अपना लिया जाय। 

5.जीवनदान बहुत बड़ी बात है। यदि वह दूसरों के सम्मुख आदर्श प्रस्तुत कर सकने की स्थिति में बना रह सकता हो तो ही उस अनुदान का गौरव है, अन्यथा मिथ्या वचन देने और उसे वापस लौटाने में किसी का भी गौरव नहीं है।

6.घटिया कदम ओछे लोग ही उठाते हैं। हममें से किसी पक्ष को भी अपनी गणना ओछे लोगों में नहीं करनी चाहिये। इसलिए परीक्षा-काल एक वर्ष की जाँच पड़ताल रखने में ही उत्तम है। बाद में फिर नये सिरे से विचार किया जा सकता है और नया कदम उठाया जा सकता है।

आमतौर से एक वर्ष की बात के सम्बन्ध में सन्देह उठाने वालों के लिए  यही उत्तर लिखाये जा रहे हैं। किन्तु इतने भर से किसी को भी सन्तोष नहीं होता। वे इसके अतिरिक्त और भी कई तरह की कल्पनाएं करते हैं और  दिए हुये उत्तरों को पर्याप्त नहीं मानते। उसके पीछे कोई रहस्य खोजते हैं। मनुष्य का स्वभाव भी है कि हर गम्भीर प्रश्न पर कई प्रकार से सोचे। इसे अनुचित भी नहीं कहा जा सकता।

कितने ही पत्रों में इस संदर्भ में  परमपूज्य गुरुदेव से  कितनी ही बातें पूछी गई हैं। उनमें से कुछ का उल्लेख भी यहाँ किया जा रहा है। कितनों ने ही पूछा है कि 

(1)  क्या आपकी आयु एक वर्ष ही शेष रह गई है  जिसमें उतने ही समय में अपने घोषित संकल्पों को पूरा करना चाहते हैं? 

(2) क्या एक वर्ष बाद हिमालय चले जाने और तपस्वियों की ऊँची बिरादरी में सम्मिलित होने का मन है? 

(3) क्या अगले वर्ष कोई भयावह दुर्घटनाएं तो घटित होने वाली नहीं है? 

(4) क्या एक वर्ष बाद आपको प्रज्ञा अभियान दूसरों के जिम्मे छोड़कर कोई असाधारण उत्तरदायित्व वहन करने की भूमिका तो नहीं निभानी है? 

(5) कहीं माताजी का स्वास्थ्य तो नहीं गड़बड़ा रहा है? 

(6) जिनके मन में इतने दिनों से उन्ट उत्कण्ठाएं उठाई जाती रही हैं, उन्हें ऐसा तो नहीं समझा गया है कि यह समय चुका देने पर फिर उन्हें कभी ऐसा अवसर नहीं मिलेगा? 

(7) युग परिवर्तन के सम्बन्ध में कोई ऐसा घटनाक्रम तो घटित नहीं होने जा रहा जिसकी सुरक्षा के लिए उन्हें अपने पास बुला रहे हों? 

(8) किन्हीं को कोई ऐसा सौभाग्य तो प्रदान करने वाले नहीं हैं, जिन्हें निकटवर्ती लोगों को ही दिया जा सकता हो? भविष्य में ऊँचे उत्तरदायित्वों के साथ जुड़ा हुआ महामानवों जैसा श्रेय तो नहीं मिलने जा रहा है जिसका रहस्य “कुछ विशेष लोगों के कान” में ही कहा जाना हो? 

(9) पात्रता जाँचकर अपनी विशिष्ट क्षमताओं का वितरण विभाजन तो नहीं कर रहे हैं?

ऐसे-ऐसे अनेकों प्रश्न हैं, जिनमें से कितनों का ही उल्लेख अप्रकाशित रहना ही उपयुक्त है। इस प्रकार के रहस्यमय प्रश्नों में से किसी का भी उत्तर “न” या “हाँ”  में नहीं दिया जा सकता। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें स्वीकार कर लिया जाता है। कुछ को अस्वीकार करने में भी हर्ज नहीं होता। पर कुछ बातें ऐसी होती हैं जिनके सम्बन्ध में मौन धारण करना, कुछ न कहना ही उचित है। कई बातें ऐसी होती हैं, जिनके सम्बन्ध में गोपनीयता को रखना ही लगभग सत्य के समतुल्य नीतिकारों ने बतलाया है।

जिन प्रश्नों  की झड़ी इन दिनों लगी हुई है उनसे किसी महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन की आशा नहीं करनी चाहिए। उन्हें इतना ही पर्याप्त समझना चाहिए, जितना कि एक दूसरे की जाँच पड़ताल का हवाला देते हुये कहा गया है।

गुरुदेव लिखते हैं :

हमने अपने भूतकाल की घटनाओं का भी पत्रिका के अंकों में सीमित ही उल्लेख किया है। पूछने पर भी नपा तुला ही वर्णन किया है, जो नहीं प्रकट किया गया वह इसलिए सुरक्षित है कि उसे हमारा शरीर न रहने से पहले न जाना जाय। उपरान्त जो लोग चाहें अपने अनुभव प्रकट कर सकते हैं। यदि इन घटनाओं की चर्चा होती है तो इन्हें प्रत्यक्ष कहने पर सिद्ध पुरुषों की श्रेणी में अपने को प्रख्यात करने की महत्वाकाँक्षा ऑकी जा सकती है।

शासन संचालकों को शपथ दिलाई जाती है, उनमें एक गोपनीयता की भी होती है। हमें भी ऐसा ही वचन अपने मार्गदर्शक को देना पड़ा है कि लोकसेवी ब्राह्मण के रूप में ही अपनी जानकारी सर्वसाधारण को दी जाय। जो अध्यात्म की गरिमा सिद्ध करने के लिए आवश्यक समझा जाय उतना ही प्रकट किया जाय। जो हमारी व्यक्तिगत साधना, तपश्चर्या, सिद्धि, जिम्मेदारी एवं भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं से सम्बन्धित है, उन्हें समय से पूर्व वर्णन न किया जाय।

युग परिवर्तन की अवधि में अनेकों घटनाएं घटित होंगी। अनेकों महत्वपूर्ण व्यक्तियों के वर्तमान रुख एवं कार्यक्रम में जमीन-आसमान जैसा अन्तर उत्पन्न होगा। ये बातें अभी से नहीं कही जा सकतीं। रहस्यमयी भविष्यवाणियां  करने के लिए अपनी सिद्धियाँ प्रकट करने के लिए हमें मनाही की गई है, उस प्रतिज्ञा का निश्चय ही पालन किया जाएगा। इसलिए कोई सज्जन वे प्रश्न इस वर्ष के संदर्भ में न पूछे, जो भविष्य के सम्बन्ध में न कहने के लिए हम वचनबद्ध हैं, उन्हें नहीं ही कहेंगे।

अगला लेख – हमारे सहकर्मी अरुण वर्मा जी की अनुभूति 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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युगतीर्थ शांतिकुंज से रत्नों की भांति प्रचारक निकलते हैं 

5 जनवरी 2021 का ज्ञानप्रसाद -युगतीर्थ शांतिकुंज से रत्नों की भांति प्रचारक निकलते हैं 

परमपूज्य गुरुदेव के करकमलों द्वारा लिखित दिव्य अखंड ज्योति के मार्च 1986 अंक पर आधारित लेख का द्वितीय भाग प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कल प्रकाशित हुए प्रथम भाग में हमने गुरुदेव के चरणों में बैठ कर अनुभव किया  था कि सूक्ष्मीकरण साधन की तप शक्ति कितनी प्रबल है और यह शक्ति क्या कुछ करने में समर्थ है। परमपूज्य गुरुदेव ने इतनी कठिन साधना करके भविष्य की डोर कैसे अपने हाथों में थाम ली ,यह केवल वही सहकर्मी देख सकते हैं ,अनुभव कर सकते हैं जिन्हे गुरुदेव की साधना शक्ति पर  पूर्ण विश्वास है। ऑनलाइन ज्ञानरथ का प्रत्येक सहकर्मी उन परिजनों के लिए पूर्ण निष्ठा से प्रयासरत है जिन्हे गुरुदेव को प्रतक्ष्य देखने का सौभाग्य न प्राप्त  हो सका और जो उनकी शक्ति से परिचित नहीं हैं। हमें सम्पूर्ण विश्वास है कि हम इस प्रयास में आगे ही आगे बढ़े जा रहे हैं।   

गुरुदेव बता  रहे हैं कि  विश्व को महाविनाश की चुनौती देने वाली प्रलय की घटाएँ अब किसी अदृश्य तूफान में उड़ गई। गुरुवर  यह आश्वासन अपनी तप शक्ति के आधार पर तो दे ही रहे हैं लेकिन उन्होंने बार-बार  यह भी कहा है कि हम अकेले कुछ भी करने में असमर्थ हैं। रीछ-वानर ,ग्वाल -बालों पर बहुत अधिक भरोसा है। इसीलिए  उन्होंने  भविष्य के लिए कुछ निर्धारण  भी   किये हैं जो  हम आज के लेख में केवल summarize ही करेंगें। विस्तृत चर्चा आने वाले लेखों  में करने का विचार है। आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने से   पूर्व हम एक  और बात आपके समक्ष रखना चाहेंगें कि गुरुदेव ने कहा है कि  हमारे  गुरु के निर्देश की तरह आप भी   सब कुछ बताने के लिए विवश न करें। कुछ बातें गुप्त ही रहनी चाहिए ,ठीक उसी तरह जिस तरह शासन संचालकों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई जाती है।  प्रतीक्षा कीजिये अगला  लेख इसी गोपनीयता पर आधारित है।

तो आइये चलें गुरुचरणों में अमृतपान के लिए :         

नवयुग का आगमन सुनिश्चित है। प्रज्ञा युग उसका नाम होगा। गंगा अवतरण का मन बना चुकी है। उसे स्वर्ग से धरती पर ला उतारने वाले तप की आवश्यकता थी जो हो रहा है, वह चलता ही रहेगा। कठिनाई हल करने के लिए शिवजी ने अपनी जटाएँ बिखेर दी हैं। अब आवश्यकता भागीरथ जैसे राजपुत्र की रह गई है जो अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो और अपने को भागीरथी का अवतरण कर्त्ता कहलाने का श्रेय भर लेने का साहस करे। अर्जुन को भी यही कहा गया है कि धरती पर दिखाई देने वाले जीवितों का प्राण हरण किया जा चुका है। यदि इच्छा हो तो विजयश्री का वरण कर, अन्यथा चुप बैठ। तेरे बिना महाभारत अनजीता न पड़ा रहेगा। यों भागीरथ न आते तो भी विधिचक्र ने गंगावतरण तो सुनिश्चित कर रखा ही था। इन दिनों देव मानवों की महती आवश्यकता अनुभव की जा रही है और उन्हें मनुहार-आग्रह-अनुरोध करके बुलाया भी जा रहा है। पर कोई यह न समझे कि हम नखरे दिखाएंगे, आनाकानी करेंगे, बहाने बनायेंगे तो गाड़ी रुकी पड़ी रहेगी,जो भविष्य में होने वाला परिवर्तन है हमारे हाथ लगाए बिना रुका रह जायेगा । 

“युग परिवर्तन सुनिश्चित है। मनुष्य से देवत्व का उदय होगा और उस समुदाय का बहुमत हो जाने पर धरती पर स्वर्ग का वातावरण बनेगा।”

जो शक्ति भयंकर भविष्य को टाल सकती है, वह उर्वर भूमि में हरे-भरे पौधे भी उगा सकती है। युद्ध सैनिकों के बीच  लड़े जाते हैं। सड़कें मजदूर बनाते हैं। पुल खड़े करने के लिए कारीगरों की जरूरत पड़ती है। साधन जुटाने में धन किसी का भी क्यों न लगा हो पर हर इंजीनियर, कारीगर, मजदूर यही कहता है कि यह पुल हमने बनाया था। उसकी यह गर्वोक्ति सही भी है। नवयुग के अवतरण के लिए ऐसे ही शिल्पी-कारीगर चाहिए, जीवन्त, प्राणवान, मनस्वी, योद्धा, देवमानव। उन्हीं को कभी साधु, ब्राह्मण कहा जाता था, पर जब वे रह नहीं गए तो दूसरा नामकरण करना पड़ रहा है।

अखण्ड ज्योति परिजनों में देवमानवों की एक बड़ी संख्या है। उन्हें ही सर्वप्रथम बुलाया गया है। गुरु गोविन्दसिंह ने अपने बच्चे बलि चढ़ा दिए तो दूसरों की मनुहार नहीं करनी पड़ी। वे सच्चाई देखकर प्रभावित हुए और बड़ी संख्या में सन्त सिपाही रूप में भर्ती होते चले गए। लक्ष्य पूरा करके ही रुके। आज देवमानवों को बुलाया गया है व कहा गया है कि लोभ, मोह और अहंकार के जाल-जंजाल से सदा के लिए न छूट सकें तो कम से कम एक साल का समय निकालें। इतने समय का छोटा वानप्रस्थ, छोटा संन्यास ग्रहण करें, उस पुनीत कार्य में लगें जिसमें पुरातन काल के देवमानव लगा करते थे। 86 हजार ऋषियों की टोली किसी समय इसी कार्य में प्रवृत्त थी। बुद्ध के लाखों भिक्षु और महावीर के असंख्यों श्रावक देश-देशांतरों में भ्रमण करते हुए जन-जन का सोया देवत्व जगाते थे और दुष्प्रवृतियों  की जड़ों को बलपूर्वक उखाड़ फेंकते थे। 

“सत्य के अनुयायी में हज़ार  हाथी के बराबर बल होता है, इस युक्ति को उन्होंने प्रत्यक्ष सार्थक करके दिखा दिया।

आज से ही हमारा भविष्य निर्धारण आरम्भ होता है। भविष्य किसका? समूचे धरातल का, समूचे मानव समुदाय का-समूचे प्राणि परिवार का। क्या यह सम्भव है? इसके उत्तर में हमें एक ही शब्द कहना है- “हाँ । क्योंकि भूत का अनुभव और वर्तमान की प्रगति हमें विश्वास दिलाती है कि भविष्य के बारे में जो सोचा गया है, वह बाल कल्पना नहीं है। उसके पीछे सच्चाई का गहरा पुट है। भविष्य के ये निर्धारण हैं

(1) एक लाख देवब्राह्मण उत्पन्न करना 

(2) युग साहित्य के माध्यम से जन-जन को समय के पक्ष में प्रशिक्षित करना 

(3) युग धर्म के प्रशिक्षण की 2400 पाठशालाएं खोलना 

(4) 24 हजार की संख्या में बाल संस्कार शालाऐं स्थापित करना 

(5) भारत भूमि के कोने-कोने में -तीर्थ स्थापित करना 

(6) शान्ति कुंज गायत्री तीर्थ के रूप में ऐसा आरण्यक विकसित करना, जहाँ से रत्नों  की खदान की तरह धर्म प्रचारक निरन्तर निकलते रहें। बुद्ध काल में नालन्दा, तक्षशिला विश्वविद्यालयों ने विश्व के कोने-कोने में धर्मचक्र प्रवर्तन के लिए अगणित तपस्वी और तपस्विनियाँ उत्पन्न किए थे। साथ ही यह भी कहा था कि तीन दिन से अधिक एक जगह ठहरना मत। दो से अधिक एक साथ,एक  समय चलना मत। उन दिनों वातावरण ऐसा था कि यह अनुशासन भी बन पड़ा था एवं बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन के लिए अनेकों जीवन दानी बन गये थे, जिन्होंने सारे विश्व को झकझोर कर रख दिया था। आज की हवा में ऊर्जा नहीं रही। फिर भी घोर अकाल  नहीं है। भूमि में उर्वरता अभी भी जीवित है। उतनी शानदार फसल तो उगा न सकेगी, पर स्थिति ऐसी नहीं आयेगी कि योजना को शेखचिल्ली के सपने कहकर मज़ाक  उड़ाया जा सके। युग परिवर्तन की दिशा में तपश्चर्या का बल जो चमत्कार दिखा चुका है उसे ध्यान में रखने पर यह पूरा विश्वास होता है कि भविष्य की सम्भावनाएं भी सार्थक होकर रहेंगी। 

अगला लेख – पद और गोपनीयता की शपथ 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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24 आहुति संकल्प सूची :

4 जनवरी 2022  के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान  करने के उपरांत आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 8  समर्पित साधकों ने  24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के  लिए आप सब बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं  और कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह  देवतुल्य सहकर्मी  निम्नलिखित हैं l (1) सरविन्द कुमार पाल – 46, (2) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 39, (3) प्रेरणा कुमारी बेटी – 38, (4) अरूण कुमार वर्मा जी – 32, (5) डा.अरुन त्रिखा जी – 29, (6) संध्या बहन जी – 27, (7) निशा भारद्वाज बहन जी – 26, (8) नीरा बहन जी – 25

उक्त सभी आत्मीय सूझवान व समर्पित सहकर्मी देवतुल्य भाइयों व बहनो को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद, हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई। आज की संकल्प सूची में आदरणीय सरविन्द कुमार पाल  जी को सबसे अधिक अंक प्राप्त करके स्वर्ण पदक विजेता होने की  हमारी सामूहिक और व्यक्तिगत स्पेशल बधाई। इस प्राप्ति के लिए सभी सहकर्मियों की सहकारिता और सहभागिता को नमन।

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नरक से स्वर्ग में प्रवेश पाना पूरी तरह मनुष्य के हाथों में है


4 जनवरी 2022  का ज्ञानप्रसाद – नरक से स्वर्ग में प्रवेश पाना पूरी तरह मनुष्य के हाथों में है

आज का ज्ञानप्रसाद परमपूज्य गुरुदेव के करकमलों द्वारा लिखित दिव्य अखंड ज्योति के मार्च 1986 अंक पर आधारित है।आज हम इसका प्रथम भाग प्रस्तुत कर रहे हैं, कल द्वितीय भाग प्रस्तुत करेंगें। परमपूज्य गुरुदेव के  लेखन में किसी प्रकार का  फेर बदल करना घोर अशिष्टता से कम नहीं होगा, हमने केवल सरलीकरण का ही प्रयास किया है ताकि हमारे सहकर्मियों को कठिन शब्दों के लिए  किसी शब्दकोश या गूगल सर्च का सहारा न लेना पड़े। अगर हमें किसी भी कारण कोई बात समझने में समस्या आती है और  उसे छोड़ कर आगे बढ़  जाते हैं तो परमपूज्य गुरुदेव के अभियान को समझने में हम लापरवाही बरत  रहे हैं। हम निवेदन करते हैं कि कृपया ऐसा कभी भी न किया जाए।वैसे तो हमारे सहकर्मियों की योग्यता  हमसे कहीं अधिक ही है, लेकिन फिर भी कहीं पर भी कोई शंका उत्पन हो तो हम अपनी समर्था अनुसार  उसका निवारण करने का पूर्ण  प्रयास करेंगें, ठीक उसी प्रकार जैसे प्रेरणा बिटिया ने कुछ प्रश्न पूछा  था।

तो आइये चलें गुरुचरणों में अमृतपान के लिए :     

पृथ्वी पर अनेकों बार संकट आये हैं और यह डूबते-डूबते उबरी है। एक बार हिरण्याक्ष उसे पाताल ले गया था। एक बार वृत्रासुर ने उसका अपहरण कर लिया था और इन्द्र समेत समस्त देव समुदाय को पलायन करना पड़ा था। भस्मासुर, महिषासुर ने भी विनाश की घड़ी समीप ला दी थी। ऐसे अनेकों प्रसंगों में “दैवी शक्तियों” ने ही उसका उद्धार किया था। देवों की करुण पुकार सुनकर प्रजापति ने कहा था- “तुम देव लोग उपेक्षा या अहंकार वश एकत्र नहीं हो पाते, इसलिए बलिष्ठ होने पर भी दैत्य समुदाय के सामने हार जाते हो। उनकी संयुक्त शक्ति दुर्गा के रूप में विनिर्मित हुई और उन्होंने  असुरों के संकट से देवों को बचाया

यह तो पौराणिक प्रसंग हुआ। वैज्ञानिकों के अनुसार पुरातन काल में एक काल्पनिक ग्रह था “फेथॉन” उसकी सभ्यता आज की आधुनिक सभ्यता  से भी बढ़ी-चढ़ी थी और इस  ग्रह के वासियों ने विज्ञान के  महाघातक  अस्त्र  एकत्रित कर लिए थे। शक्तियाँ प्राप्त कर लेना एक बात है और उनका सदुपयोग करना दूसरी। वे अहंकारी सत्ताधारी परमाणु आयुधों से लड़ पड़े और न केवल जीवसत्त का, पदार्थों का वरन् समूचे ग्रह का सर्वनाश कर दिया। फलस्वरूप उस ग्रह के छर्रे-छरे उड़ गए। उन्हीं टुकड़ों में से कुछ मंगल और बृहस्पति के बीच में एक उल्का (shooting star ,meteorite) माला के रूप में घूमते हैं। कुछ शनि के इर्द-गिर्द छल्ले के रूप में एवं कुछ प्लेटो, नेपच्यून तक उड़ गए। कहते हैं उसी कबाड़ से सृष्टा ने पृथ्वी की नूतन संरचना की। जो भी  हो, सृष्टा के इस ब्रह्मांड में पृथ्वी सबसे सुन्दर कलाकृति है। जब-जब भी इस पर विनाश के  संकट आते रहे, तब-तब उसकी रक्षा होती रही है। कोई न कोई उपाय निकलता रहा है। एक बार दधीचि की अस्थियों का वज्र बना था। एक बार संघ शक्ति दुर्गा ने विनाश की विपत्ति बचाई थी। 

“इस बार भी ऐसा ही होने जा रहा है।”

प्रस्तुत संकट के संदर्भ में दिव्यदर्शी आत्मवेत्ता कहते रहते हैं कि समुद्री उफान के रूप में पृथ्वी पर ऐसी विपत्ति बरसेगी जिससे कुछ बचेगा नहीं। मूर्धन्य मनीषियों का भी यही कहना है कि प्रदूषण, पर्यावरण, विकिरण (Radiation), अणुयुद्ध, जनसंख्या विस्फोट आदि के फलस्वरूप संसार तेजी से महाविनाश की ओर जा रहा है। तीसरे अन्तरिक्षीय युद्ध की संभावना तो हर पल सामने है ही।

महाविनाश से पूर्व ही बचाव की व्यवस्था :

सृष्टा ने महाविनाश से पूर्व ही बचाव की व्यवस्था बनाई है। यह तो सारी विश्व की जनसँख्या की बात हो रही है, सृष्टा तो किसी एक प्राणी का भी विनाश नहीं होने देता, उसके लिए भी बचाव की व्यवस्था बनाई हुई है। इस बचाव के ,Defence mechanism के उदाहरण हम प्रतिदिन देखते रहते हैं।  Reflex action के आटोमेटिक रिस्पांस के कारण आंधी आने पर  हमारी आँखें स्वयं ही बंद हो जाती हैं।चपाती पकाते समय अगर लापरवाही से हमारा हाथ गरम तवे को छू  जाता है तो Reflex  action एकदम हाथ को पीछे हटा लेता है। ऐसा है सृष्टि का न्याय, ऐसी  है सृष्टि द्वारा प्रदान की गयी  “बचाव प्रणाली” 

तप शक्ति संसार की सबसे बड़ी सृजन शक्ति:    

तप शक्ति संसार में सृजन को जन्म देने वाली सबसे बड़ी शक्ति  है। उसी तप  ने ब्रह्मा को सृष्टि बनाने की शक्ति दी थी। उसी के बल से संसार में सुव्यवस्था स्थिर है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने ब्रह्माण्ड के बारे में कहा है कि  यह एक बहुत ही व्यवस्थित सिस्टम है इसको समझने के लिए मनुष्य  का दिमाग बिल्कुल  एक बच्चे जैसा है। इसी तथ्य को हमने एक बार शुभरात्रि सन्देश में शेयर किया था। 

सारे ऋषिगण तपस्वी रहे हैं। उन्होंने तप विज्ञान से उत्तराखण्ड को देवलोक बनाने के लिए हिमालय के इस ध्रुव केन्द्र में प्रचंड तप किए और व्यास, वशिष्ठ, अत्रि, विश्वामित्र, भारद्वाज, जमदग्नि, कश्यप प्रभृति ऋषिगणों एवं ध्रुव पार्वती इत्यादि साधकों ने इसे देवभूमि बना दिया। उन्होंने संसार को समुन्नत सुसंस्कृत बनाने वाले अपने नेक प्रयास तप शक्ति से इस प्रकार सम्पन्न किए जिनके कारण यह धरती समूचे ब्रह्मांड में मुकुटमणि बन गयी।

इस बार भी तप शक्ति को महाविनाश के सम्मुख जुटाया गया है और वह प्रयास व्यर्थ नहीं गया है। पृथ्वी के एक कोने से दूसरे कोने तक जो विनाश की घटाएं उमड़ रही थीं, वे अब छंटने लगी हैं। स्थिति को अपनी दिव्य दृष्टि से देखने वाले कहते हैं कि अदृश्य वातावरण में रावण, कुंभकरण, जरासन्ध, हिरण्यकश्यपु जैसों की जो हुँकारें गरज रही थीं, वे अब शान्त हो चली हैं। जो विभीषिकाएं अभी शेष हैं, उनका भी समाधान होकर रहेगा। अब भयभीत  होने की आवश्यकता नहीं रही। रामराज्य का अरुणोदय  समीप है। अब यह किसी कुहरे के नीचे देर तक छिपा नहीं रहेगा।

नई सृष्टि बनाने के लिए ब्रह्मा ने, विश्वामित्र ने जो तप किया था, उसका प्रयोग इन दिनों चल रहा है। अपने युग के इस तपस्वी से जन-जन परिचित है और यही विदित है कि अब तक जो काम उसने अपने हाथ में लिए हैं, वे पूरा करके दिखाए हैं। आर्ष ग्रन्थों ( ऋषियों के ग्रन्थ) को सर्वसुलभ करना, विशाल प्रज्ञा परिवार का असाधारण संगठन, सहस्र कुंडीय  गायत्री यज्ञ, लोक मानस के परिष्कार का युग साहित्य, विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय के अभिनव प्रयास, परमार्थ प्रयोजनों के लिए जीवन दान देने वाले सहस्रों  देवमानवों का निर्माण आदि-आदि ऐसे काम हैं जो आज की परिस्थितियों में किसी सामान्य मानवी शक्ति के बलबूते की बात नहीं है। ऐसे महान कार्य तपशक्ति के बिना और किसी प्रकार नहीं हो सकते। 

“तप के प्रभाव से ऋषियों और देवताओं का अनुग्रह प्राप्त होता है और इन सबके संगठन से एक ऐसी शक्ति उत्पन्न होती है, जिसे अद्भुत अनुपम कहा जा सके।” 

सामान्य मनुष्य जब कभी अद्भुत काम करते हैं, युग परिवर्तन जैसे काम हाथ में लेते हैं तो समझना चाहिए कि इसके लिए इन्होंने तप की शक्ति एकत्रित कर ली है। वस्तुतः ये काम साधारण व्यक्ति नहीं करते, उनके पीछे कोई परोक्ष महती शक्ति काम कर रही होती है।

प्रज्ञा अभियान के मूल में तप शक्ति ही काम कर रही है, ऐसा तप जिसके बल पर शेषनाग धरती को अपने सिर पर उठाए हुए हैं, ऐसा तप जिसके कारण तपता हुआ सूर्य लोक-लोकान्तरों में आलोक और ऊर्जा का वितरण करता परिभ्रमण करता रहता है। इन दिनों इस तप शक्ति के सहारे ही मनुष्य में से “विष” निचोड़ा जा रहा है और उसकी आकृति वही बनी रहने पर भी प्रकृति में आमूल चूल परिवर्तन लाया जा रहा है। इसे एक दैवी  आश्वासन समझा जाना चाहिए कि कल तक जो महाविनाश के हजारों कारण और लक्षण दीख पड़ रहे थे, वे घट चले और हट भी चले।

नरक से स्वर्ग में प्रवेश पाना पूरी तरह मनुष्य के हाथों में है:

युग परिवर्तन के इस पूर्वार्ध में विश्व को महाविनाश की चुनौती देने वाली प्रलय की घटाएँ अब किसी अदृश्य तूफान में उड़ गई। इस आश्वासन के साथ एक दैवी अभिवचन यह भी प्रकट हुआ है कि अगले दिनों परिवर्तन प्रक्रिया के उत्तरार्ध में सतयुग के अभिनव सृजन में जिस स्तर के व्यक्तियों की, कौशल साधनों की जरूरत है वे एकत्रित होते चले जायेंगे। मनुष्य को समझाया और यह मानने के लिए विवश किया जायेगा कि वह औसत नागरिक की तरह निर्वाह करने में सन्तोष व्यक्त करे। पतन और पाप के गर्त में जान-बूझकर न गिरे। सीमित आवश्यकताओं की पूर्ति में ही सन्तोष करे। परिवार के जो लोग सेवा सहायता कर चुके हैं उन्हीं का ऋण चुकाए। नये कर्जदार एकत्रित न करे, जो देने से पहले ही वसूल करना आरम्भ कर दें। यदि इन विडम्बनाओं से आज के मानव समाज को बचाया जा सका तो समझना चाहिए कि “स्वर्ग का राजमार्ग” अपना लिया गया। दैत्यों को देवों में बदलना कठिन नहीं है। उसमें केवल उनकी मनःस्थिति बदलनी पड़ती है, उसके उपरान्त परिस्थितियाँ तो स्वतः ही बदल जाती हैं। 

“नरक से स्वर्ग में प्रवेश पाना पूरी तरह मनुष्य के हाथों में है, दैवी शक्तियों तो परोक्ष वातावरण बनाती व प्रेरणा का शंख फूंकती भर हैं।”

क्रमशः जारी -To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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24 आहुति संकल्प सूची :

3 जनवरी 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान  करने के उपरांत आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 11  समर्पित साधकों ने  24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के  लिए आप सब बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं  और कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह  देवतुल्य सहकर्मी  निम्नलिखित हैं l (1) रेणु  श्रीवास्तव बहन जी – 38, (2) सरविन्द कुमार पाल – 35, (3) अरूण कुमार वर्मा जी – 32, (4) नीरा बहन जी – 31, (5) डा.अरुन त्रिखा जी – 27, (6) संध्या बहन जी – 27,26, (7) प्रेरणा कुमारी बेटी – 26,(8) रजत कुमार जी – 26, (9) पिंकी पाल बेटी – 25, (10) रेणुका बहन जी – 24, (11) निशा दीक्षित बहन जी – 24

उक्त सभी आत्मीय सूझवान व समर्पित सहकर्मी देवतुल्य भाइयों व बहनो को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद, हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई। आज की संकल्प सूची में आदरणीय रेणु   बहिन जी को सबसे अधिक अंक प्राप्त करके स्वर्ण पदक विजेता होने की  हमारी सामूहिक और व्यक्तिगत स्पेशल बधाई। इस प्राप्ति के लिए सभी सहकर्मियों की सहकारिता और सहभागिता को नमन।

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आग ईंधन  से नहीं, पानी डालने से बुझेगी।

3 जनवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद -आग ईंधन  से नहीं, पानी डालने से बुझेगी।

हीरक जयंती शीर्षक पर  पांच ज्ञानप्रसाद और सूक्ष्मीकरण साधना पर तीन वीडियोस के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करके हमारे सहकर्मियों की अंतरात्मा इस कोरोना काल में अवश्य ही तृप्त हुई होगी। यूट्यूब की कुछ समस्या भी आती रही, कमैंट्स एवं और साधनों से संपर्क भी बनता रहा,अपने विवेक के अनुसार रिप्लाई भी करते रहे। रेणुका श्रीवास्तव बहिन जी ने जीमेल पर अपना फ़ोन नंबर और कमेंट दोनों भेजे, हमने आपके साथ शेयर  भी किये। उन्हें हमने व्हाट्सप्प ग्रुप में भी ऐड कर लिया है। ऐसा है हमारे सहकर्मियों का समर्पण। समर्पण की तो बात ही क्या कहें विदुषी बहिन जी अपनी 92 वर्षीय  माता जी की केयर करते ज्ञानरथ में भी सहयोग दे रही हैं। संजना बेटी को 3-4 दिन की छुट्टी मिली उसने भी अपना योगदान देकर परमपूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद प्राप्त किया। फ़ोन पर भी बात हुई, ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार के अपनत्व को मिस करती हुई दिखाई दी। मनीषा सिंह बेटी भी बड़े दिनों बाद सक्रिय दिखी,उसके शीर्ष पर भी गुरुदेव का हाथ आशीर्वाद देता दिखा।  प्रेरणा बिटिया से फ़ोन पर बात हुई, परमपूज्य गुरुदेव ने उसे एक  और ज़िम्मेदारी प्रदान की है, आपके साथ  शीघ्र ही  यह पुरषार्थ भी शेयर करेंगें। हमारा हृदय  हर समय अपने  सहयोगियों के मध्य ही रहता है। परमपूज्य गुरुदेव से आशीर्वाद के लिए  निवेदन करते हैं कि प्रत्येक घर में सुख शांति का वातावरण बना रहे। 

आइये आगे बढ़ें और परमपूज्य गुरुदेव की  युगनिर्माण योजना का हिस्सा बनने  का सौभाग्य प्राप्त करें beacuse we are among the very few persons  chosen by Parampujy Gurudev after  a rigorous selection process .

सूक्ष्मीकरण साधना का विषय इतना विशाल है कि इसको समझना और कुछ एक पन्नों में सिकोड़ना अत्यंत कठिन /असम्भव हैं। उसी रोडमैप पर चलते हुए आज से कुछ लेख ऐसे आरम्भ  करने का विचार है जिससे गुरुदेव की  हमारे प्रति आशाएं और उनके द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जायेगा । इन लेखों में हम देखेंगें कि गुरुदेव की दृष्टि कितनी विश्व्यापी है, उन्हें समस्त विश्व की चिंता है, ऐसे ही उनकी आँखों में आंसू नहीं आ जाते थे, ऐसे  ही उनकी वाणी में सिसकियाँ नहीं उभर आती थीं -हम सभी ने उनकी  तीन वीडियोस में देखा है।  वीडियो तो पिछले 10 वर्ष से उपलब्ध थी लेकिन कितनों ने इतनी श्रद्धा से परमपूज्य गुरुदेव को अपने ह्रदय में स्थान दिया, ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार इसका साक्षी है। वर्तमान में जो  कुछ भी हम भयावह स्थिति अपने आगे -पीछे, ऊपर नीचे ,वातावरण में, शॉपिंग मॉल्स में इत्यादि हम देख रहे हैं गुरुदेव ने 30- 40 वर्ष पूर्व ही देख लिया था और इसके निवारण के लिए ही इतनी  कठिन साधना  में अपनेआप को तपाया -नमन ,नमन एवं नमन। 

तो आइये देखें गुरुदेव 1986 में क्या कह रहे हैं –            

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इस वर्ष का महत्वपूर्ण कार्यक्रम एक लाख यज्ञ एवं सामूहिक मंत्रोच्चारण: 

युगसन्धि की गतिविधियां अब क्रमशः तीव्र  से तीव्रतम होती जा रही है। संसार बिखरा हुआ है इसलिए जो दुर्घटनाएं, षड्यंत्र  घटित हो रही हैं  उनका छितराया हुआ स्वरूप वैसा दृष्टिगोचर नहीं होता जैसा कि यह सब एकत्रित होने पर दीख पड़ता है। फिर भी विश्व में जो कुछ इन दिनों घटित हो रहा है,निकट भविष्य में जो घटित होने जा रहा है, वह भयावह है। उसे एकत्रित करके देखा जाय तो प्रतीत होगा कि सृजन से पहले  होने वाला ध्वंस क्रमशः आगे ही बढ़ रहा है पीछे नहीं हट रहा। 

इसके पीछे अदृश्य वातावरण, प्रकृति का प्रकोप और मनुष्य समुदाय का बिगाड़ा हुआ  अन्तःकरण है। कारण गहरे भी हैं और विषम भी। इसलिए हमें  स्थिति की गम्भीरता  समझनी चाहिए और विनाश के प्रतिरोध में जो करना चाहिए, वह करना चाहिए।

प्रस्तुत अभाव  का निराकरण कैसे हो? इसके उत्तर में एक ही उपाय हाथ रहता है कि दुर्भावनाओं का समाधान कर सकने में समर्थ “अध्यात्म उपचारों” (spiritual remedies)  का आश्रय लिया जाय। आग ईंधन  से नहीं, पानी डालने से बुझेगी।

भौतिक समस्याओं का भौतिक प्रयत्नों से समाधान होता है। लाठी का लाठी से, घुसे का घुसे से, धन का धन से, बल का बल से जवाब दिया जा सकता है। किन्तु आज की समस्या सूक्ष्म जगत तक जा पहुंची है। उसका निराकरण अन्तःकरण की गहराई में सन्निहित शक्ति के सहारे ही सम्भव है। वृत्रासुर की शक्ति से जब देवता भी न जीत सके तो ऋषि की अस्थियों से बना वज्र उस संकट को टालने में समर्थ हो सका। इन दिनों भी कुछ एक की महती साधना तपश्चर्या चल रही है। पर इस बार उतना ही पर्याप्त न होगा। इन दिनों तो सामूहिक संकल्प शक्ति से महिषासुर वध की कथा ही पुनरावृत्ति के रूप में दुहरानी पड़ेगी।

प्रज्ञा परिवार एक समूचा देव परिवार है। उसमें जन्मान्तरों के संचित संस्कारों वाली आत्माएं ही प्रयत्नपूर्वक एकत्रित की गई हैं। आवश्यकता सभी के समन्वित प्रयत्न की है। अब तक जप और पाठ का ही क्रम चला है अब इसमें यज्ञ प्रक्रिया भी सम्मिलित करनी होगी। सम्भव हो तो हर रविवार या पूर्णिमा को सामूहिक यज्ञ का क्रम चलायें। जन्मदिनों के अवसर पर एक कुण्डी यज्ञ होता रहे तो भी इतने बड़े समुदाय के जन्म दिनों की संख्या एक लाख होती है। इतने तो अपने वरिष्ठ प्रज्ञापुत्र ही हैं। उन सबका जन्मदिन मनाने से एक वर्ष में एक लाख यज्ञ हो जाते हैं। इसमें सामूहिक मंत्रोच्चार से उत्पन्न “प्राण ऊर्जा” का समावेश होगा। अतएव उसकी शक्ति और भी अधिक बढ़ जायेगी। कुण्डों की और आहुतियों की संख्या से ही यज्ञ शक्ति की गरिमा नहीं बढ़ती वरन् सुपात्र मन्त्रोच्चारणकर्ताओं की कितनी प्राण-शक्ति सम्मिलित हुई, यह भी देखा जायेगा। चूंकि हर जन्मदिन में बड़ी उपस्थिति होती है और सभी मन्त्रोच्चारण करते हैं अतएव इन यज्ञों में वेदी एक ही होने और आहुतियों की संख्या सीमित रहने पर भी मन्त्रोच्चारण अधिक होने से स्वभावतः उसकी शक्ति बढ़ जायेगी। वातावरण संशोधन हेतु इस संचित  शक्ति की ही आवश्यकता है।

आजकल हमारे स्वयं के प्रवचन और मन्त्रोच्चारण नहीं होते, पर टेप रिकार्डर के माध्यम से हम अपने मनोभावों को दूसरों तक पहुँचाने की प्रक्रिया अपनाते हैं। बैखरी वाणी की सीमा इतनी ही है। मध्यमा, परा, पश्यन्ति वाणियों को प्रयोग इन दिनों भी होता है पर वह होगा टेप रिकार्डर के माध्यम से। 24 गायत्री मन्त्रों का हमारी वाणी में एक लयबद्ध टेप रिकार्ड हुआ है। यह परा,पश्यंति वाणी का है। जिन यज्ञों में हमारी वाणी भी सम्मिलित करनी हो वे इस टेप उच्चारण के साथ अपना उच्चारण भी मिला दें। इस प्रकार उसकी शक्ति और भी कई गुनी बढ़ जायगी। इस वर्ष 1 लाख यज्ञ होने और उसमें 24 लाख से भी कई गुने अधिक हमारे उच्चारण सम्मिलित रहने का आयोजन है। जिन्हें आवश्यकता हो वे हमारे द्वारा उच्चारण किये टेपों को भी मँगा सकते हैं। वैसे बिना यज्ञ के भी हमारे उच्चारण में अपना उच्चारण मिलाकर दैनिक या साप्ताहिक अथवा जन्मदिन आदि के अवसर पर इस उपाय को सम्मिलित किया जा सकता है।

क्रमशः जारी -To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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24 आहुति संकल्प सूची :

1 जनवरी 2022 के नूतन वर्ष में “गुरुदेव का वसंत पर्व 1986 का ऐतिहासिक प्रवचन: तृतीय भाग” वीडियो की अमृतवाणी का पयपान करने के उपरांत आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 7 समर्पित सप्तऋषियों ने यूट्यूब  की तकनीकी समस्या के बावजूद भी 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। इस पुनीत कार्य के  लिए आप सब बहुत बहुत बधाई के पात्र हैं  और कामना करते हैं और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आप सबके परिवार पर सदैव बनी रहे। वह आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के सूझवान व समर्पित सहकर्मी देवतुल्य सप्तऋषि भाई बहन निम्नलिखित हैं l (1) संध्या बहन जी – 45, (2) डा.अरुन त्रिखा जी – 39,24, (3) प्रेरणा कुमारी बेटी – 37, (4) अरूण कुमार वर्मा जी – 31, (5) सरविन्द कुमार पाल – 30, (6) रेणुका बहन जी – 29, (7) मनीषा सिंह बहन जी – 24

उक्त सभी आत्मीय सूझवान व समर्पित सहकर्मी देवतुल्य भाइयों व बहनो को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद, हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई। आदरणीय संध्या बहिन जी को सबसे अधिक अंक प्राप्त करके स्वर्ण पदक विजेता होने की स्पेशल बधाई।

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गुरुदेव का वसंत पर्व 1986 का ऐतिहासिक प्रवचन: द्वितीय भाग 

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गुरुदेव का वसंत पर्व 1986 का ऐतिहासिक प्रवचन: प्रथम भाग

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अपने आत्मीयजनों से विचारों का आदान प्रदान

29 दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – अपने आत्मीयजनों से विचारों का आदान प्रदान 

आज के ज्ञानप्रसाद को आरम्भ करने से पहले हम अपनी व्हाट्सप्प सहकर्मी आदरणीय प्रेमशीला मिश्रा जी के  ह्रदय से आभारी हैं कि उन्होंने हमें स्मरण कराया कि “आज का शुभरात्रि सन्देश  नहीं आया -सब ठीक है भाई जी।” हमने यूट्यूब पर तो समयानुसार पोस्ट कर दिया था ,पता नहीं कैसे व्हाट्सप्प पर पोस्ट करने से चूक गए। इसीलिए  हम अक्सर कहते रहते हैं त्रुटि तो किसी से भी हो सकती है -आखिर हम इंसान  ही तो हैं। दरअसल हम ज्ञानरथ की अव्यवस्था को ही नियंत्रित करने में व्यस्त थे और कई दिशाओं में सोच रहे थे। इस अवयवस्था को ही देखते हम टाइम टेबल  में बदलाव लाने को विवश हुए। इतना कंटेंट इकक्ठा हो चुका  था कि अगर सावधानी न बरती, तो  कोई महत्वपूर्ण कंटेंट मिस हो सकता था। प्रेम बहिन जी ने  ऑनलाइन ज्ञानरथ की पारिवारिक और संपर्क साधना वाली  भावना को मुहर लगाने का कार्य किया है। धन्यवाद् बहिन जी।  

सबसे पहले हीरक जयंती एवं  सूक्ष्मीकरण साधना पर लेखों की श्रृंखला के सन्दर्भ में बात करते हैं। हमारे सहकर्मियों ने  जिस ध्यान और श्रद्धा से इतने  कठिन लेख का अमृतपान किया उसके लिए  हम नतमस्तक हैं। आज के समय में अगर Scientific Spirituality -वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की बात इतने ज़ोर से हो रही है तो उसे समझना बहुत ही आवश्यक है। अगर हमें  समझ आती है, तभी तो हम इसे किसी और  को समझाने  के काबिल होंगें। आज का युग प्रतक्ष्यवाद की युग है। सूक्ष्म की शक्ति को  साबित करने के लिए ,और अपने गुरुदेव की शक्ति  के बारे में हमने ही सबको  बताना है -क्योंकि परमपूज्य गुरुदेव ने यह महत्वपूर्ण कार्य हमें ही सौंपा है।  इस कार्य  को बड़ी ही श्रद्धा और समर्पण से करना ही गुरुदेव के प्रति हमारी भक्ति होगी -इससे कम कतई  नहीं। इन्ही विचारों से प्रेरित होकर ,गुरुदेव से मार्गदर्शन प्राप्त  कर हम अपने सहकर्मियों को  “सूक्ष्मीकरण” वाले लेख का स्वाध्याय करने के लिए  एक  दिन और देना चाहते हैं और निवेदन करते हैं कि एक Class  Tutorial की तरह कमैंट्स का आदान प्रदान करते हुए जो भी शंकाएं हो उनका समाधान करने का प्रयास करें। “सूक्ष्मीकरण” पर  अपने विचार आप इस लेख में दे सकते हैं, सभी को पता चल जायेगा कि  यह कमेंन्ट किस सन्दर्भ में है। 

जिस वीडियो की हमने आपसे बात की थी वह भी सूक्ष्मीकरण साधना वाले  दिनों (1986) की है।  यह वीडियो बहुत ही चर्चित है और बहुतों ने इसे देखा भी होगा। लेकिन ऑनलाइन ज्ञानरथ के प्लेटफॉर्म पर इस एक घंटे की अत्यंत मार्मिक वीडियो का प्रकाशित होना अपनेआप में बहुत ही महत्वपूर्ण होना चाहिए, हम सबने पूर्ण श्रद्धा के साथ यह  सुनिश्चित कराने का प्रयास करना है।  पिछले दिनों में  हमने इस वीडियो को कई बार देखा है, बार-बार रिवाइंड किया है, कई बार आँखों में आंसू भी आये- आंसू क्यों आये ? गुरुदेव स्वयं भी रुआँसी आवाज़ में बोल रहे थे। एक पिता की आँखों में आंसू देखना कितना कठिन होता है। बिल्कुल एक  संत जैसे महापुरष ने अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए क्या-क्या साधना और तप  किये। अब हमारी बारी है कुछ कर दिखाने -अपने गुरु के कार्य को लोगों के समक्ष साबित कर दिखाने की। यह सुनिश्चित कराने के लिए कि  हम सब इस वीडियो के एक-एक क्षण का अमृतपान  बिना फॉरवर्ड किए करें, हम इस एक घण्टे की वीडियो को तीन भागों में प्रकाशित करेंगें। प्रत्येक भाग लगभग 20 मिंट का होना चाहिए और आपको headphone लगाने पड़  सकते हैं क्योंकि जिन दिनों  यह वीडियो रिकॉर्ड की गयी थी उस समय गुरुदेव की आयु 75 वर्ष थी। जो  परिजन  गुरुदेव के प्रतक्ष्य दर्शन करने से वंचित रह गए, उनके लिए यह वीडियोस बहुत ही सुनहरी अवसर हो सकता है। दस वर्ष पूर्व प्रकाशित हुई इस वीडियो में केवल 392 लोगों ने कमेंट किये और तीन कमेंट आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।  यह कमेंट हमारी बात को बल देते हैं जो हम अक्सर कहते आये हैं – गुरुदेव के बच्चे कोई भिखारी  नहीं हैं :

कमैंट्स:

1.गुरुदेव माता जी मेरे भाई बहिनों को भी नौकरी देकर उनका घर बचाओ।अनुराधा  को ,रविशंकर को ,विष्णु  को आजीविका दे

2.गुरुदेव माताजी आप मेरे मायके और ससुराल पक्ष के हर व्यक्ति को अपने चरणों से जोड़ ले।सबको अपनी कृपा की छाव में लेे लेे।सबकी रक्षा करे।सबके जीवन से क्लेश कलह रोग शोक का नाश कर आयु arogyta सद्बुद्धि सद्भावना उज्ज्वल भविष्य दे।

3.गुरुदेव मेरे दाम्पत्य जीवन के क्लेश कलह को जला कर भस्म कर दो।माताजी आपकी संवेदन शीलता मेरे पति और मेरे बच्चों के में में मेरे लिए समाविष्ट हो जाए।आप दोनो जैसा सुखमय और कल्याण कारी दाम्पत्य जीवन मेरा हो जाए।मेरा जीवन संभालो गुरुदेव माताजी।मेरी बेटी प्रज्ञा के रूप में मेरी बांह पकड़ लो।मेरी नाव भवसागर में डूब रही है।पति के रूप में पतवार बनकर थाम लो।मेरे पति मेरे प्रति अत्यधिक करुणाशील और संवेदनशील हो उठे।वह कभी मेरे से मारपीट गाली गलौज ना करे।मेरा दिल से सम्मान करे।कभी मेरा अपमान ना करे।

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माँ शारदा ने एक शिष्य को कहा था – अरे तू भिखारी है क्या ? पहले कुछ समर्पण तो कर। 

हमें बहुत ही गर्व है कि ऑनलाइन ज्ञानरथ का प्रत्येक सहकर्मी समर्पण की प्रतिमूति है। 

आज के  ज्ञानप्रसाद का अंत तो  सरविन्द जी द्वारा संकल्प सूची के साथ ही होगा लेकिन हमारे एक और बहुत ही समर्पित सहकर्मी आदरणीय अरुण वर्मा जी के प्रति हम क्षमा प्रार्थी हैं। क्षमाप्रार्थी इसलिए कि कुछ दिन पूर्व उन्होंने गायत्री परिवार और ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार के प्रति अपनी अनुभूति लिख कर हमें भेजीं थीं, अभी तक उचित समय नहीं आ सका  कि हम प्रकाशित कर सकें। आज भी हमने इस अनुभूति का स्वध्याय किया, आने वाले दिनों में प्रकाशित करने की योजना है।  अवश्य ही  बहुतों की ऐसी अनुभतियाँ होंगीं जिससे सहकर्मियों को प्रेरणा मिलने की सम्भावना है । 

अगली प्रस्तुति -एक वीडियो 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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24 आहुति संकल्प सूची :

28 दिसंबर   मंगलवार को प्रस्तुत किये गए  ज्ञानप्रसाद का पयपान करने के उपरांत आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के 10 सूझवान व समर्पित  सहकर्मियों  ने परम पूज्य गुरुदेव के दस सूत्रीय कार्यक्रम को सफल बनाने में अपनी सहभागिता सुनिश्चित की है। इन्होने बहुत ही सक्रियता, सहकारिता, सहानुभूति व सद्भावना के साथ निस्वार्थ भाव से  समयदान व श्रमदान से  अपने विचारों की हवन सामग्री से कमेन्ट्स रूपी आहुति डाल कर अपने 24 आहुति संकल्प को पूरा किया। इन सभी सहकर्मियों ने  हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य करके पुरुषार्थ कमाने का सराहनीय कार्य किया है जिससे सबको बहुत  प्रेरणा मिल रही है। वह समर्पित सहकर्मी निम्नलिखित हैं l (1) सरविन्द कुमार पाल – 52, (2) डा.अरुन त्रिखा जी – 35, (3) अरूण कुमार वर्मा जी – 31, (4) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 30, (5) संध्या बहन जी – 29, (6) प्रेरणा कुमारी बेटी – 29, (7) रेणुका बहन जी – 27, (8) बबिता बहन जी – 27, (9) नीरा बहन जी – 25, (10) रजत कुमार जी – 25

सभी सहकर्मियों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से अनंत ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो और आप सभी पर आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ भगवती गायत्री माता  की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे,यही आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरु सत्ता से आप सबके लिए विनम्र प्रार्थना व पवित्र शुभ मंगल कामना है और जो  24 आहुति संकल्प को पूरा नहीं कर पाए उन सभी  से निवेदन है कि इसी तरह  प्रयासरत रहें।  सभी को गुरू सत्ता का स्नेह व प्यार के रूप में निरंतर आशीर्वाद व शुभकामनाएँ मिलती रहें l धन्यवाद ,जय गुरुदेव

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मानव शरीर एक सर्वांगपूर्ण  प्रयोगशाला 

28 दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – मानव शरीर एक सर्वांगपूर्ण  प्रयोगशाला 

25 दिसंबर वाले लेख में हमने संक्षिप्त वर्णन किया था कि सूक्ष्मीकरण से 5 शरीरों की शक्ति 3125 गुना हो जाती है। आज हम इसी तथ्य का वैज्ञानिक पक्ष और व्याख्या देखेंगें।अखंड ज्योति  जुलाई 1984 अंक पर आधारित आज के ज्ञानप्रसाद में हम समझने का प्रयास करेंगें कि गुरुदेव ने अपने शरीर को पका कर कैसे वाष्पीकृत किया। 

आदरणीय सरविन्द भाई जी ने अपनी अंतरात्मा की अभिलाषा को व्यक्त किया है कि आज 24 आहुतियों की संकल्प सूची प्रकाशित न करके आदरणीय विनीता जी की बहन की दिवंगत आत्मा की शांति हेतु आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से श्रद्धांजलि पेश की जाए। अपने सहकर्मियों के प्रति ऐसी भावना के लिए धन्यवाद् सरविन्द जी।  

भगवान को सृष्टि के आरम्भ में एक से अनेक बनना पड़ा था, तब कहीं जाकर इतनी बड़ी  सृष्टि की रचना  सम्भव हो पायी थी । विश्व में महान परिवर्तन करने वालों को भी अपने सहयोगियों की संख्या बढ़ाकर यही करना पड़ा है।

ऋषिकल्प व्यक्तियों को अपनी निज की क्षमता को ही कई खण्डों में विभाजित करके कई गुना करना पड़ता है। हम सभी जानते हैं कि चीरने, कूटने, तोड़ने, पीसने की प्रक्रिया द्वारा एक वस्तु के कई टुकड़े हो जाते हैं। आमतौर से इस कूट-पीस द्वारा प्रत्येक टुकड़ा कमजोर पड़ता जाता है। Union is Strength वाली बहुचर्चित कहानी हम से बहुतो ने अपने स्कूल-काल में अवश्य पड़ी होगी।  इस कहानी में भी यही शिक्षा दी गयी थी कि अलग- अलग की शक्ति काम होती है लेकिन ज्यों ही सब इक्क्ठे हुए तो शक्ति कई गुना हो गयी। लेकिन यहाँ  जो बात हम  कर रहे  हैं और इससे बिल्कुल  ही विपरीत है।यह एक अपवाद (Exception ) है कि  कई बार छोटे टुकड़े बड़े टुकड़ों से अधिक शक्तिशाली  भी होते हैं । इसको समझने के लिए अगर नौवीं -दसवीं कक्षा  की बेसिक साइंस की सहयता ले ली जाये तो बेहतर होगा।  

अणु ,परमाणु और विद्युत् अणु -Molecule,Atom and Electron:

Molecule(अणु ),atom(परमाणु )और  electron (विद्युत्अणु) पदार्थ के ही सूक्ष्म कण हैं और ज्यों ज्यों छोटे होते जाते हैं अधिक शक्तिशाली होते जाते हैं जैसे कि परमाणु बम्ब अणु बम्ब से अधिक शक्तिशाली  होता है 

सभी जानते हैं कि पदार्थ की सूक्ष्म इकाई अणु (Molecule )  है जो स्वतन्त्र अस्तित्व रखती है एवं उसमें पदार्थ के सभी गुण विद्यमान होते हैं। सभी अणुओं की सूक्ष्मता का स्पष्ट अनुमान अभी तक हो नहीं पाया है। अलग-अलग पदार्थों के अणु का आकर एक इंच के अरब-भाग ( 1/1000000000) का हो सकता है तो किसी का इंच के दस लाखवें भाग के बराबर। यह तो ठोस  ( Solid ) की बात हुई। द्रव्य रूप (liquid) में पोटेन्सी बढ़ने से इन सूक्ष्म अणुओं की संख्या व सामर्थ्य और बढ़ जाती है, इसका प्रतिपादन होम्योपैथी के विद्वानों ने किया है एवं प्रयोग परीक्षणों द्वारा उसे सिद्ध भी कर दिया है। द्रव्य से विरल एवं विराट रूप वाला स्वरूप गैस का है। हमारे चारों ओर स्थित अदृश्य हवा का जो जखीरा है, उसके एक घन इंच (Cubic Inch)  में लगभग पाँच हजार शंख (5 ,00,00,00,00,00,00,00,000,000 ) अणु विद्यमान हैं। शंख ( बजाने वाला नहीं) अरब ,खरब की तरह एक बहुत बड़ा गणना का यूनिट है। आप देख ही रहे हैं कि शंख में कितने zero हैं। 

अब आती है बात इन अणुओं के size से सूक्ष्मीकरण के सम्बन्ध की:

पदार्थ जितना सूक्ष्म होता चला जाता है, इन अणुओं की संख्या भी बढ़ती  जाती है एवं ऊष्मा-ऊर्जा (Heat Energy)  के कारण उसकी गति में अभिवृद्धि हो जाती है। गैस रूप में अणुओं की गति सबसे तेज़  होती  है, यही वह स्टेज है जो पदार्थ को अति सूक्ष्म बना देती हैं। इसीलिए सूक्ष्मीकरण तो वाष्पीकरण के साथ जोड़ा गया है। 

Solid ,liquid and gas are three forms of matter. All of them are made of small units called molecules . In solids molecules are near to each other and cannot move,in liquids molecules are away from each other and can move a little bit and in gases the molecules are far apart and can move faster. When gas, liquid and solid are heated molecules in them start moving. In gases this speed is highest and so they become- SUKSHAM. 

मानवी काया की सूक्ष्म संरचना को विकसित किया जा सकने पर वह उसे अत्यन्त सामर्थ्यवान बना देती है। मानव शरीर  के अंदर  तीन शरीर, पाँच कोश एवं षट्चक्र इसी स्तर के हैं। शरीर के मेरुदंड (spinal cord ) के भीतर, ब्रह्मनाड़ी में अनेक चक्रों की कल्पना की गयी है लेकिन मुख्य रूप से छह चक्र होते हैं | इन छह चक्रों के नाम- मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञाचक्र हैं तथा इनके स्थान क्रमशः योनि, लिंग, नाभि, ह्रदय, कंठ और भ्रूमध्य है | इन छह चक्रों के अलावा एक सातवां चक्र होता है जिसे सहस्रार चक्र कहते हैं यह चक्र मष्तिष्क में पीछे की तरफ़, सबसे ऊपर होता है और  सहस्त्रों पंखुड़ियों वाले कमल पर बैठा है |

इन्हें विकसित कर अन्तःसत्ता को विराट् बनाया जा सकता है। ये सभी एक ही शरीर के अंग अवयव होते हुए भी अपना-अलग विशिष्ट अस्तित्व प्रदर्शित करने लगते हैं।

शास्त्रों में मानव की चार अवस्थाओं का वर्णन मिलता है। यह चार अवस्थाएं 1. जागृतावस्था, 2.स्वप्रावस्था, 3.सुषुप्ति एवं 4. तुरीयावस्था हैं। योग साधना द्वारा  तुरीयावस्था प्राप्त करके सूक्ष्मीकृत हुआ जा सकता है। यह अवस्था सहज ही सबको उपलब्ध नहीं हो पाती, लेकिन जो इस स्थिति तक पहुँच पाते हैं, मानव कल्याण का एक महत्वपूर्ण पुरुषार्थ उन्ही से  सम्पन्न होता है।”

ऐसा वर्णन है कि जिन-व्यक्तियों ने पूर्व जन्मों  में संयम,साधना और योग-उपासना द्वारा अध्यात्म चेतना की सर्वोच्च स्थिति को प्राप्त कर लिया होता है वे  दिव्यात्माएं ऋषि आत्माएं कहलाती हैं एवं आत्मसत्ता को ऊंचा उठाने वाले धर्म के मर्म का परिचय जन-साधारण को देती हैं। समय-समय पर परिस्थिति विशेषानुसार उनका प्राकट्य होता रहता है एवं उनके द्वारा दिए गए  ज्ञान-सत्पथ के माध्यम से उस काल के सामान्य पुरुष,आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ते एवं जीवनमुक्त होते जाते हैं। सृष्टि की युग-व्यवस्था कुछ ऐसी है कि हर समय  दिव्यात्माएं सूक्ष्म जगत में अपने क्रिया-कलापों में संलग्न रहती हैं। इसी कारण धर्म का,श्रेष्ठता का,आदर्श एवं  निष्ठा का, सर्वथा लोप नहीं हो पाता।

शरीर एक सर्वांगपूर्ण  प्रयोगशाला है:

मानव शरीर में ऋषियों, देवताओं, अवतारों का निवास बताया गया है। विभिन्न स्थानों पर उनकी स्थापना है। दिव्य समुद्रों, दिव्य नदियों, दिव्य पर्वतों का निवास भी इस शरीर में है। शरीर रुपी मल-मूत्र की गठरी होते हुए भी इसकी सूक्ष्म सत्ता का निरिक्षण  करने पर लोक-लोकान्तरों की झलक झाँकी उनमें मिलती है। शरीर एक सर्वागपूर्ण प्रयोगशाला है। इसमें वे सभी यन्त्र उपकरण फिट हैं, जो मनुष्य द्वारा अब तक बनाये जा चुके या भविष्य में जिनके बनने की सम्भावना है। ब्रह्मांड की  एक गांठ में समग्र ब्रह्मांड सन्निहित है। इसका अर्थ यही हुआ कि विराट में जो विशेषताएं विद्यमान हैं, वे सभी छोटी आकृति बनाकर पिण्ड में भी निवास करती पायी जाती हैं। जो कुछ है प्रसुप्त  स्थिति में है। इसे जागृत किया जा सके तो पिण्ड में से ही ब्रह्माण्ड प्रकट हो सकता है। 

नीच  को महान बनाने के लिए एक ही उपचार है- वाष्पीकरण (evaporation )। वायु बन कर कोई भी वस्तु बहुत फैल जाती है और दूर-दूर तक अपने प्रभाव का परिचय देती है। जैसे एक मिर्च थोड़ी-सी जगह में ही रखी रहती है, पर यदि उसे आग में जलाया जाय तो वह वायुभूत होकर दूर-दूर तक फैलेगी और उस गंध से दूर-दूर तक के लोगों को खांसी उठेगी। यही सूक्ष्मीकरण हुआ। थोड़ा-सा तेल लेकर पानी की सतह पर डाल दिया जाय तो वह लहरों के साथ-साथ दूर-दूर तक फैल जायेगा। Perfume  का उदाहरण भी इसी श्रेणी में आता है। आयुर्वेद और होमियोपैथी में प्रयोग आने वाली भस्मों से हम सब परिचित हैं -इन्हे Nanomedicine का नाम दिया गया है। विज्ञान में Nano  का  अर्थ होता है बहुत ही छोटा ,Micro और Milli से कहीं दूर छोटा। आयुर्वेद में अधिक समय तक एक औषधि को लगातार घोंटते रहने पर उसमें विशेष सामर्थ्य के उत्पन्न होने का वर्णन है। होम्योपैथी में भी पोटेन्सी सिद्धान्त ( Strength Principle )  इसी आधार पर चलता है कि उस मूल द्रव्य को अधिकाधिक बारीक करके अधिक शक्तिशाली बनाया जाता है।

परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं:

हमारी सूक्ष्मीकरण साधना में क्या उपक्रम चल रहा है,क्या विधि व्यवस्था अपनाई जा रही है, यह पूछने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह “एक विशेष प्रयोग” है और उसमें मार्गदर्शक का सिलसिलेवार अनुशासन ही सब कुछ है। किसी दूसरे का इसके बारे में  पूछना व्यर्थ है क्योंकि यह कोई ऐसी विधि नहीं जिसका कोई भी अनुकरण कर के सीख ले।   हमें अपने अनुभवी मार्गदर्शक के परामर्श पर चलना होगा, उन्ही को निर्णय लेना है कि हमने क्या  करना है, क्यों करना है और किसलिए करना है। हमारे सभी  प्रश्नों के विस्तृत विवरण हमारे मार्गदर्शक के पास ही हैं।

सूक्ष्मीकरण साधना वाष्पीकरण (Evaporation) का एक स्वरुप – 

मोटे तौर से सूक्ष्मीकरण साधना का एक ही स्वरूप है-वाष्पीकरण। इसमें अपनी ही प्राण ऊर्जा को इतना प्रचण्ड किया जाता है कि उससे अपने ही अन्तराल में सन्निहित पाँच कोश इतने गरम हो सकें कि एक स्वतंत्र इकाई के रूप में उनकी सत्ता विनिर्मित हो सके। पानी खौलता है तो अलग-अलग बुलबुले  उठने लगते हैं। प्रत्येक बुलबुला अपनी एक स्वतंत्र इकाई बनाता है और जब तक आवश्यकता रहती है अपना अस्तित्व बनाये रखता है और फिर वातावरण की ठंडक से दूसरे बुलबुलों  के साथ विलीन हो जाता है। कितना बड़ा बुलबुला  किस कार्य के लिए, किस विधि से, कितना  शक्तिशाली बनाया या उठाया जाय यह निर्णय करना उसके मार्गदर्शक का काम होता है। हमारे जैसे अनगढ़ पाठकों के लिए इस सारी क्रिया का  सिद्धान्त जान लेना ही बहुत बड़ी बात  है। विवरण की गहराई में जाना ठीक  न होगा।

सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया वस्तुतः जीवित अवस्था में साधक के सूक्ष्म एवं कारण शरीर की परिष्कृति एवं प्रगति का एक ऐसा राजमार्ग है  जिसे समय समय पर उच्चस्तरीय आत्माओं ने अपनाया व अपनी मुक्ति हेतु नहीं, अन्यायों के हित साधन हेतु स्वयं को खपाया है।

यह प्रक्रिया ऋषि परम्परा की एक शाश्वत व्यवस्था है। मानव को मिली तीन शरीर रूपी ( स्थूल ,सूक्ष्म और कारण)  विभूतियाँ ईश्वर प्रदत्त सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों में से हैं जिनका ठीक से प्रयोग न करने पर मानव  दुर्गति की ओर जाने को बाधित हो जाता है। संस्कारों की संचित सम्पदा लेकर जन्मीं देवआत्माओं  को कोई अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ता और  वे स्वेच्छा से ही उस पथ पर चल पड़ती  हैं जिसके लिए उनका इस धरती पर अवतरण होता है । अदृश्य जगत की उच्चस्तरीय आत्माएं धरित्री पर  उनके लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा करने के लिए उन्हें वांछित आत्मबल देती हैं।  सामान्य बुद्धि के लिए इस  व्यवस्था को समझ पाना सहज नहीं होता क्योंकि जो कुछ होना होता है  वह सब कुछ नियन्ता की विधि-व्यवस्था का ही एक अंग है।

परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं :

हमारी सूक्ष्मीकरण- वाष्पीकरण युग साधना से जन समुदाय को क्या कुछ मिलने वाला है, वर्तमान परिस्थितियों में कैसे परिवर्तन आने वाला है, यह असमंजस सहज ही किसी के मन में उठ सकता है। आने वाले लेखों में हमारे सहकर्मी विस्तृत वर्णन देखेंगें।

अगली प्रस्तुति -एक वीडियो 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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फेसबुक पर बुरी खबरों को ‘पसंद’ (Like) करने का शिष्टाचार। 

हमारी शोक संतप्त  सहकर्मी  विनीता जी को हृदय से अपने दुःख का प्राकट्य  करते हैं और सभी 46 परिजनों का हृदय से धन्यवाद जिन्होंने अपने कमेंट पोस्ट किये। हमने उन्हें मैसेज किया था कि  दीदी  के बारे में कुछ 3-4 लाइन लिख कर भेज दें ताकि हमारे सहकर्मी जान सकें लेकिन काफी प्रतीक्षा के बाद हम समझ गए कि स्थिति ठीक नहीं है और हमें श्रद्धांजलि संदेश पोस्ट कर देना चाहिए।     

27 दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद- फेसबुक पर बुरी खबरों को ‘पसंद’ (Like) करने का शिष्टाचार। 

हमारे सहकर्मी सोच रहे होंगें कि अचानक  ज्ञानप्रसाद में फेसबुक  के सम्बन्ध में यह लेख कहाँ से टपक पड़ा और ऐसी कौन सी विवशता थी जिसने परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती लेख श्रृंखला को छोड़ कर यह लेख  लिखने का निर्णय लिया । हाँ, सच में विवशता थी और इसकी प्रेरणा परमपूज्य गुरुदेव ने अवश्य ही  दी है। लेख पढ़ने  से पहले ही निवेदन करते हैं कि इस कंटेंट को  अन्यथा न लिया जाये क्योंकि हर किसी की राय का सम्मान करना हमारा परम कर्तव्य है और हर कोई राय व्यक्तिगत होती है। लेकिन किसी भी अच्छे ज्ञान का  पयपान करना और ज्ञानदान करना एक बहुत बड़ा पुण्य कार्य है ,जो आप सब, हम सब कर रहे हैं। बहुत ही सौभाग्यशाली हैं हम।   

पिछले दो-तीन वर्ष से एक प्रश्न हमारी अंतरात्मा को पीड़ा दिए जा रहा था कि “जब किसी की मृत्यु का समाचार हम  सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं तो like बटन दबाना  ठीक है क्या  ?”

हमारी तरह और भी बहुत लोग होंगें जिन्हे यह यह स्थिति पीड़ा देती होगी, लेकिन  किसी को तो कदम उठाना पड़ेगा ही ,who will bell the cat ? अगर ऐसा न किया गया तो माँ के स्वर्गवास पर हैप्पी बर्थडे मैसेज आते ही रहेंगें और taaging की प्रथा के कारण लोग बिना देखे कुछ भी लिखते  जायेंगें। Tag करने की स्थिति तो ऐसी है कि आपके ही फेसबुक फ्रेंड आपसे पूछे बिना अपनी following बढ़ाने  आपको Tag  किये जा रहे हैं। उन्हें केवल  गिनती से मतलब है, उन्हें तो पता ही नहीं है कि क्या शेयर हो रहा है,मृत्यु य जन्मदिन।  

हम तीन वर्ष रिसर्च  करते रहे और आज जब कुछ कहने को  समर्थ हुए तो अपने सहकर्मियों के समक्ष प्रस्तुत हो गए। अगर हम ऑनलाइन ज्ञानरथ के 12 मानवीय मूल्यों  में “शिष्टाचार” की बात करते हैं तो सोशल मीडिया शिष्टाचार को कैसे भूल सकते हैं।  सोशल मीडिया  शिष्टाचार के तीन गुरु - Ravi Shukle ,    Diane Gottsman और  Jo Bryant के मार्गदर्शन विचार इस दिशा में हमें बहुत ही सार्थक लगे और हमने  एकदम अपने ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में लाने का निर्णय लिया। इन तीनो एक्सपर्ट्स के बारे में संक्षिप्त विवरण देना हमारा कर्तव्य है। 

Ravi Shukle, a social media and relationship marketing expert who helps brands like Samsung U.K., Amazon App Store and T-Mobile with their online etiquette; Diane Gottsman, founder of The Protocol School of Texas and author of Modern Manners for a Better Life; and Jo Bryant, a British etiquette expert who has edited more than fifteen books on modern manners— as well as some Facebook friends, to offer best practices on delivering and receiving bad news on Facebook.

आइये देखें वह क्या कह रहे हैं :

1.प्रश्न :एक करीबी मित्र  की अचानक मृत्यु हो गई, और मेरी पोस्ट को 22 “लाइक” मिले। मृत्यु  को “Like ” करने पर आपके क्या विचार हैं?

Shukle: किसी  tragedy  को पसंद करना अनजाने में पोस्ट करने वाले व्यक्ति को दिखा सकती है कि आप उनके द्वारा साझा की गई दुखद खबर का समर्थन करते हैं।  पोस्ट को  “Like” करना, करने वाले  को यह नहीं बताता कि आप वास्तव में कैसा महसूस करते हैं। अपने विचार साझा करने के लिए “कमैंट्स”  पर टिके रहें। ऐसा करने से उसे व्यक्तिगत संदेश मिल सकता है जबकि  “Like” भ्रमित कर सकता है।

Gottsman: लाइक बटन Tricky  है क्योंकि लोग आपकी पोस्ट के लिए अपना समर्थन दिखा रहे हैं । मैं कुछ दिल से कमेंट  करना पसंद करती  हूं और थम्स अप बटन नहीं दबाती ।

Bryant: यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किसी को कितनी अच्छी तरह जानते हैं, और कभी-कभी एक साधारण “Like”  उन्हें यह बताने के लिए पर्याप्त होगा कि आपने पोस्ट देखी है, और उनके बारे में सोच रहे हैं। बहुत से लोग Tragedy  का जवाब देने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं क्योंकि ऐसा करना, कुछ  कहने के लिए सही बात खोजने की कोशिश करने से ज्यादा आसान है। हालांकि, पीड़ित व्यक्ति के लिए, जो व्यक्तिगत रूप से उनका समर्थन करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करते हैं, वे हमेशा सर्वश्रेष्ठ होंगे। अच्छे दोस्त फ़ोन कॉल और IRL (In Real Life) विज़िट के योग्य होते हैं।

2.प्रश्न :“यदि आप किसी पोस्ट को  “Like ” नहीं करते हैं, या कोई अन्य प्रतिक्रिया नहीं जोड़ते हैं, तो क्या आपको असंवेदनशील माना जा सकता है?”

शुक्ला : विशेष रूप से फेसबुक पर सहानुभूति जोड़ने की अपेक्षा किसी व्यक्ति से नहीं की जानी चाहिए। यह एक भावना होनी चाहिए जिसे आप साझा करते हैं क्योंकि आप उस व्यक्ति की स्थिति से संबंधित हो सकते हैं। अगर आपको लगता है कि प्रतिक्रिया जोड़ने या Comment  करने की कोई आवश्यकता नहीं है, तो यह बिल्कुल ठीक है। यदि आप एक करीबी दोस्त या परिवार के सदस्य हैं, तो आप अधिक सार्थक आदान-प्रदान साझा करने के लिए हमेशा फोन, टेक्स्ट, ईमेल या निजी फेसबुक संदेश के माध्यम से सम्पर्क कर  सकते हैं।

Shukle  : अगर आपको लगता है कि फेसबुक “प्रतिक्रिया” – Like  या Comment  वास्तव में यह नहीं दर्शाता है कि आप कैसा महसूस करते हैं, तो यह one-to -one basis पर मिलने  का समय है। व्यक्ति के साथ अनुवर्ती कार्रवाई करते समय, आपको हमेशा एक व्यक्तिगत दृष्टिकोण जोड़ना चाहिए क्योंकि अब बातचीत आप दोनों के बीच है। समय निकाल  कर उसे सुने और   अधिक सार्थक बातचीत करें।

3.प्रश्न : “Tagging  सबसे अनुचित प्रतिक्रिया की  लगती है – Bryan Smith  के गोल्डन रिट्रीवर के  एक कार से टकराने के बारे में सुनकर खेद है।” इन परिदृश्यों में लोगों को टैग करने का शिष्टाचार क्या है?”

Shukle : Tagging  हाथ से निकल सकती है, खासकर फेसबुक पर क्योंकि हमने देखा है कि लोग अपने दोस्तों को बहुत Tag  करते हैं ताकि उनकी पोस्ट को अधिक लाइक या शेयर मिल सकें। फेसबुक पर किसी व्यक्ति को टैग करते समय आपको दो बातों का ध्यान रखना चाहिए:

i) क्या मेरा अपडेट उल्लेख किए जा रहे व्यक्ति के लिए मूल्यवान है या अतिरिक्त जानकारी प्रदान करता है?

ii) क्या यह अपडेट टैग किए जा रहे व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है?

यदि उपरोक्त का उत्तर “नहीं” है, तो बेहतर होगा कि आप केवल उपयोगकर्ता का नाम लिखें।

Gottsman : जिस व्यक्ति को आप टैग कर रहे हैं उसकी अनुमति के बिना टैगिंग हमेशा असभ्य होती है।

4.प्रश्न : यदि आप किसी पोस्ट को  “Like ” य कमेंट नहीं करते  हैं, तो क्या आपको असंवेदनशील माना जा सकता है?

Shukle : विशेष रूप से फेसबुक पर सहानुभूति जोड़ने की अपेक्षा किसी व्यक्ति से नहीं की जानी चाहिए। यह एक भावना होनी चाहिए जिसे आप साझा करते हैं क्योंकि आप उस व्यक्ति की स्थिति से संबंधित हो सकते हैं। अगर आपको लगता है कि प्रतिक्रिया जोड़ने या टिप्पणी करने की कोई आवश्यकता नहीं है, तो यह बिल्कुल ठीक है। यदि आप एक करीबी दोस्त या परिवार के सदस्य हैं, तो आप अधिक सार्थक आदान-प्रदान साझा करने के लिए हमेशा फोन, टेक्स्ट, ईमेल या निजी फेसबुक संदेश के माध्यम से पहुंच सकते हैं।

Gottsman : इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि व्यक्ति ने पोस्ट को देखा भी है, इसलिए  आपकी ओर से अतिसंवेदनशील होना  संवेदनशील होगा  कि किसी ने “पसंद” या प्रतिक्रिया नहीं दी । फेसबुक  पर हर कोई, हर  किसी  पोस्ट को देखता भी तो नहीं  है।

5.प्रश्न :एक सहकर्मी की मां की छह महीने पहले मृत्यु  हो गई थी। पिछले हफ्ते फेसबुक पर कई लोगों ने उसकी माँ को जन्मदिन की बधाई दी, यह नहीं देखा  कि उसकी मृत्यु हो  गई। क्या उस खबर को अपनी और/या अपनी माँ के फेसबुक पेजों पर साझा करना बेटी पर निर्भर है?

Shukle : जब परिवार के किसी सदस्य के खोने जैसे संवेदनशील मामलों की बात आती है, तो आपको हमेशा सम्मानजनक रहना चाहिए। इसलिए, आपको उन लोगों को दोष नहीं देना चाहिए जिन्होंने उसे जन्मदिन की शुभकामनाएं दी हैं क्योंकि वे वास्तव में उसके निधन के बारे में  जानते भी नहीं  होंगे। इसके बजाय, बेटी माँ के अकाउंट  पर एक अपडेट पोस्ट करके उन्हें बता सकती है कि उसकी  माँ का  निधन हो गया  है, लेकिनअपने जन्मदिन की शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद दे सकती है  क्योंकि वह अपने विशेष दिन पर कई अन्य लोगों की  शुभकामनाएँ साझा करने से प्रसन्न होतीं।

धन्यवाद् ,जय गुरुदेव 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। 

अगला लेख: सूक्ष्मीकरण 

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24 आहुति संकल्प सूची 

25 दिसंबर  शनिवार के लेख का विश्लेषण व पयपान के उपरांत आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के उन 12 सूझवान व समर्पित विज्ञ सहकर्मियों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व अनंत ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो जिन्होंने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य करके पुरुषार्थ कमाने का सराहनीय व प्रशंसनीय कार्य किया है, वह सहकर्मी निम्नलिखित हैं : (1) सरविन्द कुमार पाल – 51, (2) अरूण कुमार वर्मा जी – 32, (3) प्रेरणा कुमारी बेटी – 31, (4) निशा भारद्वाज बहन जी – 29, (5) संध्या बहन जी – 28, 26, (6) डा.अरुन त्रिखा जी – 27, 25, (7) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 27, (8) निशा दीक्षित बहन जी – 26, (9) रजत कुमार जी – 25, (10) नीरा बहन जी – 24, (11) रेणुका बहन जी – 24, (12) विदुषी बहन जी – 24

उक्त  सभी सहकर्मियों  पर आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ भगवती गायत्री माता दी की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे यही आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरु सत्ता से विनम्र प्रार्थना व पवित्र शुभ मंगल कामना है l 

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परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 5

25 दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 5

आज का ज्ञानप्रसाद परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती श्रृंखला का पांचवा पार्ट है। यह पार्ट हमें जानबूझ कर छोटा रखना पड़ रहा है क्योंकि जिस कंटेंट को आपके समक्ष प्रस्तुत करने की योजना थी वह इतना specialised है कि उसे समझने के लिए कुछ पृष्ठभूमि की आवश्यकता है। हम पूर्णरूप से विश्वास करते हैं कि हमारे सहकर्मियों का समझ-स्तर ऐसा है कि उन्हें कभी भी कोई कठिनाई नहीं हुई है लेकिन फिर भी रिसर्च,स्वाध्याय ,सरलीकरण के पश्चात् ही प्रकाशित किया जाये तो ठीक रहेगा। आने वाले लेखों के लिए बेसिक गणित ,विज्ञान, बायोलॉजी और आध्यात्मिक विज्ञान का ज्ञान हो जाये तो काफी सहायता मिल सकती है। तो देखते हैं हमारी बुद्धि समझने ,विश्लेषण करके आपको समझाने में कितनी सफल होती है। हर बार की तरह आज भी हम किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी हैं -आखिर इंसान ही तो हैं हम। 

तो आइये चलते हैं परमपूज्य गुरुदेव के चरणों में आज के ज्ञानप्रसाद काअमृतपान करने। 

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सूक्ष्मीकरण से सम्भावित परिणतियाँ:

परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं :मई 1984 से हमने अपने स्थूल शरीर से संभव हो सकने वाला स्थूल स्तर का क्रियाकलाप बन्द कर दिया। इसका अर्थ हुआ यह हुआ कि भेंट, मिलन वार्तालाप, विचार विनिमय, परामर्श का अब तक चलने वाला सिलसिला एक प्रकार से समाप्त ही हो जाना। कोई विशेष बात हो, तब ही व्यक्तिगत संपर्क होना संभव होगा।

जड़ और चेतन के नियम अलग -अलग होते हैं। जड़ नियम जड़ पदार्थों पर लागू होते हैं। चेतना की अपनी विशेष स्थिति है, वह जीवित रहते हुए भी मृतक और मृत होते हुए भी जीवितों जैसे आचरण करती पायी जाती है। सूक्ष्मीकरण का अंग्रेजी अनुवाद miniaturization य reduced in size होता है। विज्ञान की भाषा में किसी बड़ी वस्तु को छोटे-छोटे भागों में बाँटने को सूक्ष्मीकरण कहते हैं। रोज़मर्रा के जीवन से इसका एक उदाहरण दिया जा सकता है। Aspro aur Microrefined Aspro की गोली। Microrefined में छोटे पार्टिकल होने के कारण अधिक प्रभावशाली होती है। liquid और भी अधिक और इंजेक्शन उससे भी अधिक प्रभावशाली होते हैं।

सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया क्या थी ?

हमारी सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया का प्रयोजन पाँच कोशों पर आधारित शक्तियों को “अनेक गुनी” कर देना है। दो शरीर मिलें तो गणना में दो ही होते हैं। पर सूक्ष्म-जगत में स्थूल अंक गणित, रेखा गणित, बीज गणित काम नहीं आती। उस लोक का गणना चक्र अलग ही गुणन-क्रम से चलता है। स्कूली गणित में 2+2+2+2=8 होंगे। लेकिन सूक्ष्म जगत में यही multiply होकर 16 हो जायेंगे ; 2x2x2x2=16 सूक्ष्मीकृत शक्तियाँ कई बार तो इससे भी बड़े कदम उठाते देखी गई हैं। मनुष्य शरीर में पाँच कोश हैं। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय। मोटे तौर से सभी कोशों के जागृत होने पर एक मनुष्य “पाँच गुणा” सामर्थ्य सम्पन्न माना जाता है परन्तु “दिव्य गणित” के हिसाब से 5x5x5x5x5=3125 गुणा हो जाता है। भौतिक शरीर प्रत्यक्ष गणित के हिसाब से ही कुछ हद तक कार्य कर सकता है। चेतना के पाँच प्राण भी शरीर की परिधि में बंधे रहने के कारण पाँच विशेषज्ञों जितना ही कार्य कर सकते हैं परन्तु “सूक्ष्मीकृत” होने पर गणित की धारणाएं बदल जाती हैं और यह गणना (addition ) से गुणा (multiplication) हो जाता है। एक सूक्ष्म शरीर की प्रखर सत्ता 3125 गुनी हो जाती है।

हनुमान जी द्वारा रामायण काल में जो अनेकों अद्भुत काम संभव बन पड़े, वे उनके सूक्ष्म शरीर के ही कर्तव्य थे। जब तक वे स्थूल रहे, तब तक उन्हें सुग्रीव का नौकर रहना पड़ा और बातों द्वारा बालि द्वारा सुग्रीव की तरह उन्हें भी अपमानित होना पड़ा। पर सूक्ष्मता का अवलम्बन तो चेतना की सामर्थ्य को कुछ से कुछ बना देता है।

सूक्ष्मीकरण साधना का प्रयोजन :

यह कार्य “युग परिवर्तन प्रयोजन” में भगवान की सहायता करने के लिए मिला है। युग संधि का समय सन् 2000 तक चलेगा। इस अवधि में हमें न बूढ़ा होना है, न मरना। अपनी 3125 गुनी शक्ति के अनुसार काम करना है। कालक्षेत्र के नियमों का भी सीमा बंधन नहीं रहेगा। इसलिए जो काम अभी हाथ में हैं, वे अन्य शरीरों के माध्यम से चलते रहेंगे। लेखन हमारा बहुत बड़ा काम है, वह अनवरत रूप से सन् 2000 तक चलेगा। 

“हमारे सहकर्मी यह सोच रहे होंगें कि परमपूज्य गुरुदेव का महाप्रयाण 1990 में हो गया था तो 2000 की बात कैसे संभव हो सकती है -हम सूक्ष्म सत्ता की बात कर रहे हैं।”

यह दूसरी बात है कि कलम जो हमारे हाथ में जिन अंगुलियों द्वारा पकड़ी हुई है वे ही कागज काला करेंगी या कोई और। वाणी हमारी रुकेगी नहीं। यह प्रश्न अलग है जो जीभ इन दिनों बोलती चालती है, वही बोलेगी या किन्हीं अन्यों को माध्यम बनाकर काम करने लगेगी। अभी हमारा कार्य क्षेत्र मथुरा, हरिद्वार रहा है और हिन्दू धर्म के क्षेत्र में कार्य चलता रहा है। आगे वैसा देश, जाति, लिंग, धर्म, भाषा आदि का कोई बन्धन न रहेगा जहाँ जब जैसी उपयोगिता आवश्यकता प्रतीत होगी वहाँ इन इन्द्रियों की क्षमताओं से समयानुकूल कार्य लिया जाता रहेगा।

सन् 2000 तक किसी अनाड़ी को ही हमारे मरण की बात सोचनी चाहिए। विशेषज्ञों को स्मरण रख लेना चाहिए कि इस दृश्यमान शरीर से भेंट दर्शन, परामर्श, हो या न हो, हमारे अपने कार्य क्षेत्र में उत्तरदायित्वों की पूर्ति में अनेक गुनी तत्परता से काम होते रहेंगे। सहकारिता और अनुदान का क्रम भी चलता रहेगा। हमारे मार्गदर्शक(दादा गुरु) की आयु 600 वर्ष से ऊपर है। “उनका सूक्ष्म शरीर ही हमारी रूह में है।” हर घड़ी पीछे और सिर पर उनकी छाया विद्यमान है। कोई कारण नहीं कि ठीक इसी प्रकार हम अपनी उपलब्ध सामर्थ्य का सत्पात्रों के लिए सत्प्रयोजनों में लगाने हेतु वैसा ही उत्साह भरा उपयोग न करते रहें। 

पाठकों एवं आत्मीय परिजनों को हमारे विचार सतत सन 2000 तक ब्रह्मवर्चस नाम से पत्रिकाओं, पुस्तिकाओं और फोल्डरों के माध्यम से मिलते रहेंगे। हमारे पाठकों ने “ब्रह्मवर्चस” लेखक नाम से कई पुस्तकें अवश्य देखी होंगी, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है 

क्रमशः जारी -To be continued -अगला लेख :प्राण ऊर्जा का वाष्पीकरण-सूक्ष्मीकरण

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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24 आहुति संकल्प सूची :

हमारा ह्रदय प्रतिदिन दुःखित होता था कि ऋषितुल्य सरविन्द भाई साहिब जो रात दो बजे उच्च कोटि के विशेषणों से सजा कर 24 आहुति संकल्प सूची पोस्ट करते थे, शब्द सीमा के कारण हमें काट-छांट करनी पड़ती थी। लेख छोटा होने के कारण आज हम बिल्कुल उन्ही के शब्दों में प्रकाशित कर रहे हैं :

आज दिनांक 24/12/2021 के ज्ञानप्रसाद पयपान के उपरांत आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के 10 सूझवान व समर्पित वीरभद्र सहकर्मियों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक व क्रान्तिकारी 10 सूत्रीय कार्यक्रमों का स्मरण कराने का सराहनीय व प्रशंसनीय कार्य किया है इसके लिए आप सब बहुत बहुत बधाई के पात्र हैं और इससे हम सबको बहुत बड़ी प्रेरणा मिलेगी और हम सबका दृष्टिकोण व दिशा बदलेगी और आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होगा l वह सब वीरभद्र युग सैनिक निम्नलिखित हैं l (1) सरविन्द कुमार पाल – 41, (2) संध्या बहन जी – 33, (3) डा.अरुन त्रिखा जी – 25, 31, (4) अरूण कुमार वर्मा जी – 30, (5) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 29, (6) प्रेरणा कुमारी बेटी – 26, (7) रेणुका बहन जी – 26, (8) नीरा बहन जी – 25, (9) राजकुमारी बहन जी – 25, (10) रजत कुमार जी – 24

उक्त सभी सूझवान व समर्पित वीरभद्र युग सैनिकों को गुरु सत्ता के इस पुनीत व महत्वपूर्ण कार्य में निस्वार्थ भाव से पूर्णतया बहुत ही श्रद्धा व समर्पण के साथ समयदान देने हेतु आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई हो और आप व आप सबके परिवार पर आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ भगवती गायत्री माता दी की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे यही आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरु सत्ता से विनम्र प्रार्थना व पवित्र शुभ मंगल कामना है। जय गुरुदेव

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परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 4

24 दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 4

आज का ज्ञानप्रसाद परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती श्रृंखला का चतुर्थ पार्ट है। आज परमपूज्य गुरुदेव हमें अध्यात्म तत्वज्ञान का गणित बता रहे हैं और उन्हें हमसे कुछ शिकायतें भी हैं। हर माता पिता को अपने बच्चों से बहुत बड़ी-बड़ी आशाएं होती हैं, जब बच्चे उनके स्तर से थोड़ा कम रह जाते हैं तो माता पिता की शिकायत स्वाभाविक है। इसी शिकायत में उनका मार्गदर्शन छुपा रहता है। हर बार की तरह आज भी हम किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी हैं -आखिर इंसान ही तो हैं हम। 

तो आइये चलते हैं परमपूज्य गुरुदेव के चरणों में आज के ज्ञानप्रसाद काअमृतपान करने। 

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गुरुदेव ने अपने मार्गदर्शक के निर्देशन पर न अनावश्यक सोच-विचार किया, न अपनी इच्छा से योजनाएं बनाई केवल अनुशासन का निर्वाह भर किया है। यह प्रक्रिया अपनाकर उन्होंने जो खोया है उससे कई हज़ार गुना पाया है। 

“अध्यात्म तत्वज्ञान का यही गणित है।” This is the mathematics of spiritual philosophy.

इस फिलासफी को अपनाया जाना चाहिए और उसी आधार पर कदम उठाने का साहस जुटाना चाहिए। 

हीरक जयंती पर किसकी श्रद्धांजलि,अभिव्यक्ति, कितनी बड़ी एवं मूल्यवान रही इसका मूल्याँकन इस आधार पर किया जायेगा कि किसने अपने कदम निवेदन एवं निर्देशन को सुनने, समझने एवं क्रियान्वित करने के लिए उठाये। उनके लिए कितना साहस एकत्रित किया और कितना आदर्श उपस्थित किया, जिसका दूसरे अनुकरण कर सकें, जिससे अपनेआप को आत्मिक तृप्ति, तुष्टि एवं शान्ति का लाभ मिल सका, सफलताऐं विभूतियाँ बिना बुलाये ही चरण चूम सकीं ।

अगर सचमुच में किसी का हीरक जयन्ती मनाने को मन हो वह तो दो काम करे। वे दोनों ही उनके निजी रूप से करने के हैं। उनका प्रयोग “अपने ऊपर” करना है और “अपने संपर्क क्षेत्र” के ऊपर। वे दो काम हैं 1.आत्म-परिष्कार और 2.जन-जागरण। इन दोनों कार्यों के लिए जिन्होंने जितना अधिक परिश्रम से किया होगा, उन्हें हम आंखें उठाकर टकटकी लगाये देखते रहेंगे। 

प्रज्ञा परिजनों का स्तर जन साधारण की दृष्टि से कहीं ऊंचा है -आत्म परिष्कार :

प्रज्ञा परिजनों का स्तर जन साधारण की दृष्टि से कहीं ऊंचा है। आम लोग पेट-प्रजनन के अतिरिक्त जहाँ दूसरी बात सोचते ही नहीं, वहाँ प्रज्ञा पुत्रों ने लोभ, मोह और अहंकार के त्रिविध भव-बंधन अगर तोड़े नहीं तो ढीले अवश्य ही किये हैं। निजी आवश्यक कार्यों के साथ-साथ उन्होंने जन-जागृति के एवं युग परिवर्तन के कार्य को भी महत्व दिया है। यह साधारण बात नहीं, असाधारण बात है। अन्यान्य संस्था संगठनों की तुलना में प्रज्ञा परिवार का स्तर ऊंचा नहीं तो नीचा भी नहीं कहा जा सकता। 

हमारी शिकायत:

इतने पर भी हमें शिकायत रही कि साधु, ब्राह्मण परम्परा का निर्वाह करने वाले देव मानव स्तर के लोगों की संख्या विस्तार, आत्मबल, त्याग, बलिदान और पवित्रता, प्रखरता एक दृष्टि से उतनी ऊंची नहीं उठ पायी जितनी कि हम उनसे चाहते थे। जो युग परिवर्तन के हनुमान, अर्जुन जैसे अग्रदूत बनते, उनसे उतना पुरुषार्थ बन नहीं पड़ा। सभी परिजन यदि मिशन का सन्देश और अधिक जन-जन तक पहुँचाना चाहें तो वर्तमान प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक को 25 हजार व्यक्तियों के साथ घनिष्ठ संपर्क साधना होगा। यह ढिंढोरा पीटने की दृष्टि से तो शायद किसी कदर सफल भी हो जाय, पर जहाँ तक चिन्तन, चरित्र, व्यवहार, दृष्टिकोण और क्रिया-कलाप से काया-कल्प जैसा परिवर्तन लाने की आवश्यकता है, वहाँ यह संख्या नगण्य न सही अपर्याप्त अवश्य है। परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं :

“हमारा मन था कि जीवन का अंतिम अध्याय पूरा करते-करते हम एक करोड़ हनुमान, अंगद न सही पर रीछ,वानर तो मोर्चे पर खड़े कर ही सकेंगे पर वैसा बना नहीं। समय की विषमता दिन-दिन गम्भीर होती जाती है। सर्वनाश के बादल सभी दिशाओं से घुमड़ते आ रहे हैं। तूफानी विग्रहों की गणना नहीं। प्रदूषण, विकिरण जन संख्या उत्पादन जैसी समस्याएं सामने हैं। जन-जन के मन में पाशविक और पैशाचिक प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं। दुष्टों द्वारा आक्रमण करने का जितना दुस्साहस है उससे अनेक गुना छद्म श्वेत वस्तधारी ( camouflaged white collar people) और भले मानुष बनने वाले लोग करते हैं। प्रपंचों, संकीर्णताओं और अवांछनीयताओं की दृष्टि से सभ्य दिखते हुए भी आदमी आदिम युग के जंगलियों जैसा असभ्य बनता जा रहा है। महायुद्ध की आपदा उन सबसे ऊपर है। किसी भी दिन बारूद के पहाड़ में कहीं से कोई चिंगारी उड़ कर पहुँच सकती है और उसका अन्त, इस सुन्दर धरती के रूप में परमात्मा की जो कलाकृति उभरी है,उसे देखते-देखते भस्मसात हो सकती है। अब की बार का युद्ध इस धरती को सम्भवतः प्राणियों के रहने योग्य भी न रहने दे।

इस विनाश बेला में सुरक्षा शक्ति की,शान्ति सेना की जितनी बड़ी संख्या चाहिये, उसका हौसला जितना बढ़ा-चढ़ा होना चाहिये। वह प्रयत्न करने पर भी नहीं बन पड़ा। एक अच्छा संगठन खड़ा करने भर से हमें किसी भी प्रकार का सन्तोष नहीं होता। जितना बड़ा संकट है, उसके अनुरूप ही अनर्थ को रोक सकने वाली “चतुरंगिणी सेना” भी चाहिये। वह न बन पड़े तो छुटपुट प्रयत्नों का, निर्माणों का महत्व ही क्या रह जाता है।

हमारा मन था कि यदि हीरक जयन्ती मनानी है तो या तो प्रयत्न की असफलता पर धूल डालने और असफलता घोषित करने के रूप में मनाया जाय। या फिर ऐसा हो कि जो भी साथी सहयोगी हैं वे तूफान की तरह चल पड़ें, ज्वालामुखी की तरह उबल पड़ें और वह कर गुजरें जिसके लिये महाकाल ने जीवन्तों को पुकारा है। अन्यथा अपंगों,अनाथों की तरह जो लंगड़ा-लूला ढर्रा चल रहा है उसे किसी प्रकार घसीटते हुये अपने साथ धोखा करते रहें।

परमपूज्य गुरुदेव ने हीरक जयन्ती वर्ष को उत्सव के रूप में मनाने से स्पष्ट इन्कार कर दिया था। इसका कारण गुरुदेव लिखते हैं: राजनैतिक संस्थाओं के एक से बढ़कर दूसरा समारोह हर वर्ष होता है। उनमें प्रत्येक में भारी दौड़-धूप और प्रचुर पूँजी खर्च होती है। किन्तु एक सप्ताह बीतने नहीं पाता कि उस आयोजन की प्रशंसा-निन्दा तक समाप्त हो जाती है और लोग मेले ठेले के माहौल जैसा मनोरंजन करके उस बात को विस्मृति के गर्त में धकेल देते हैं,उसकी चर्चा तक समाप्त हो जाती है। इन्हीं तमाशों की तरह हम एक तमाशा और खड़ा करें। ऐसी इच्छा स्वप्न में भी नहीं है। पूरे बीस वर्ष ऐसा ही माहौल बनाते रहे पर उसके फलस्वरूप जो मिला है उसे निरर्थक तो नहीं कह सकते पर असन्तोषजनक अवश्य है।

क्रान्तियों में आँधी जैसा वेग चाहिये। अक्सर उखाड़ फेंकने वाले आन्दोलनों को ही क्रान्ति कहा जाता है। पर जिसका लक्ष्य सृजन हो, उत्पादन हो, विकास हो, काया-कल्प जैसा परिवर्तन हो, वह देवत्व की पक्षधर क्रान्ति तो और भी कठिन होती है। एक मशाल लेकर समूचे गाँव को एक घंटे में जलाया जा सकता है, फिर उस गाँव में लगे क्षेत्र में सिंचाई का प्रबन्ध करके हरीतिमा की मखमली चादर बिछाना कितना श्रम साध्य और समय साध्य होता है, इसे सभी जानते हैं। अग्निकाण्ड के लिये एक पागल का अभिमानी आचरण ही पर्याप्त है, पर लहलहाती फसल उगाने या भव्य भवन बनाने के लिये तो कुशल कारीगरों की सुविकसित योग्यता और अगाध श्रम-निष्ठा चाहिये।

प्रज्ञा परिवार सृजन का संकल्प लेकर चला है। उसके सदस्यों सैनिकों का स्तर ऊंचा चाहिये। इतना ऊंचा, इतना अनुशासित कि उसके कर्तृत्व को देखकर अनेकों की चेतना जाग पड़े और पीछे चलने वालों की कमी न रहे। बढ़िया साँचों में ही बढ़िया आभूषण या खिलौने ढलते हैं। यदि साँचे ही आड़े तिरछे हों तो उनके संपर्क क्षेत्र में आने वाले भी वैसे ही घटिया, वैसे ही फूहड़ होंगे। इसी प्रयास को सम्पन्न करने के लिये कहा गया है। इसी को उच्चस्तरीय आत्म परिष्कार कहा गया है। आत्म-निरीक्षण और आत्म-निर्माण की बात हम पिछले लेख में कर चुके हैं ,अगर आतम परिष्कार होगा तभी महाभारत जीतना सम्भव होगा । इसी “मल्लयुद्ध की विजय” शीर्षक से अप्रैल के अंक में चर्चा की है और कहा है कि जन-नेतृत्व करने वालों को आग की कसौटी पर भी खरा उतरना चाहिये। लोभ, मोह और अहंकार पर जितना अंकुश लगाया जा सके लगाना चाहिये। तभी वर्तमान प्रज्ञा परिजनों से यह आशा की जा सकेगी कि वे अपनी प्रतिभा से अपने क्षेत्र को आलोकित कर सकेंगे और सृजन का वातावरण बना सकेंगे।

जन-सम्पर्क की शक्ति :

दूसरा कार्य यह है कि नवयुग के सन्देश को और भी व्यापक बनाया जाय। इसके लिये जन-जन से संपर्क साधा जाय। घर-घर अलख जगाया जाय। मिशन की पृष्ठभूमि से अपने समूचे संपर्क क्षेत्र को अवगत कराया जाय, पढ़ाकर भी और सुनाकर भी। इन अवगत होने वालों में से जो भी उत्साहित होते दिखाई पड़ें, उन्हें कुछ छोटे-छोटे काम सौंपे जाय। भले ही वे जन्म मनाने जैसे अति सुगम और अति साधारण ही क्यों न हों क्योंकि इनके लिए भी तो कुछ श्रम करना ही पड़ता, कुछ सोचना और कुछ कहना पड़ता है तभी वह व्यवस्था जुटती है। ऐसे छोटे आयोजन सम्पन्न कर लेने पर मनुष्य की झिझक छूटती है, हिम्मत बढ़ती और वह क्षमता उदय होती है, जिसके माध्यम से नव सृजन प्रयोजन के लिये जिन बड़े-बड़े कार्यों की आवश्यकता है, उन्हें पूरा किया जा सकता है।

क्रमशः जारी -To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव 

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24 आहुति संकल्प सूची – परमपूज्य गुरुदेव के “सम्पर्क साधना सिद्धांत” पर आधारित है यह 24 आहुति संकल्प :

23 दिसंबर के ज्ञानप्रसाद पर कमेंट करके निम्नलिखित 10 महान दिव्य आत्माओं ने 24 आहुति-संकल्प पूर्ण किया है :(1 )संध्या कुमार जी -24, 26 (2) निशा भरद्वाज जी -24 ,(3 )अरुण कुमार वर्मा जी -27,(4 )सरविन्द कुमार जी -45,(5 )रेनू श्रीवास्तव जी -30,(6 )डॉ अरुण त्रिखा- 26,(7 ) प्रेरणा बिटिया -26, (8 )निशा दक्षित -25, (9) उमा सिंह जी -24,(10) रजत कुमार जी -24

संध्या कुमार बहिन जी ने दो यज्ञशालाओं पर संकल्प पूर्ण तो किया ही है अन्य सहकर्मियों को भी सहायता प्रदान की है। बहुत-बहुत धन्यवाद् एवं नमन बहिन जी। सभी सहकर्मियों को इस प्रयास के लिए आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत-बहुत साधुवाद, शुभकामनाएँ एवं हार्दिक बधाई हो। आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरुसत्ता से विनम्र प्रार्थना है कि इन पर जगत् जननी माँ गायत्री की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे। जय गुरुदेव

जो सहकर्मी 24 आहुति संकल्प पूर्ण न कर सके उन्हें भी हम नमन करते हैं। अधिक से अधिक सम्पर्क – Try Try again.

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गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 3 

23 दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 3 

आज का ज्ञानप्रसाद परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती श्रृंखला का तृतीय पार्ट है। पूर्व प्रकाशित दोनों लेखों और आने वाले लेखों की तरह आज का लेख भी एक अद्भुत ज्ञान का भंडार है। दुर्भाग्यवश जो सहकर्मी परमपूज्य गुरुदेव के दर्शन से वंचित रह गए हैं उनके लिए हम इन लेखों को इस भांति प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं उन्हें आभास हो कि गुरुदेव साक्षात् उनके समक्ष बैठे उनसे बाते कर रहे हैं। गूगल का सहारा लेते हुए हम प्रयास कर रहे हैं कि कोई भी कठिन शब्द देखकर हमारे सहकर्मियों को कठिनता न हो। अंग्रेजी के शब्द इस तथ्य के साक्षी हैं, फिर भी अगर कोई त्रुटि हो गयी हो तो हम क्षमा प्रार्थी हैं -आखिर इंसान ही तो हैं हम। 

तो आइये करते हैं आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान। 

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सूक्ष्मीकरण साधना में गुरुदेव के अंग-अवयव:

इतनी कठिन साधना के दिनों में भी परमपूज्य गुरुदेव ने प्रज्ञा परिजनों को नज़रअंदाज़ नहीं किया है। न उनकी ओर से मुंह मोड़ा है, न उदासीनता दिखाई है। प्रज्ञा परिजनों की ओर गुरुदेव का उतना ही ध्यान था जितना आकाश में उड़ती चिड़िया का अपने घोंसले के अण्डे, बच्चों के प्रति होता है क्योंकि वे उन्हें अपने अंग-अवयवों का समुदाय मानते थे । शरीर केवल ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेंद्रियों का समुदाय ही नहीं बल्कि मस्तिष्क, पेट आदि अदृश्य अवयवों का भी एक बड़ा समूह होता है। हमारा शरीर जीवकोषों ( cells ), ऊतकों( tissues) और तन्तुओं( filaments ) के समुदाय से विनिर्मित होता है। इन सब घटकों की गणना की जाय तो वह लाखों करोड़ों में जा पहुँचती है। उन सबके बीच घनिष्ठ सहयोग और अनुशासन होता है। यदि वह न रहे तो शरीर का सीरा बिखरने में ज़रा भी देर न लगे। काया अपने घटकों का पोषण करती है और घटक मिल जुलकर काया का। यदि वे सब ऐसा सहयोग न करें तो जीवन का अन्त हुआ ही समझा जा सकता है। अस्तु यह भी तथ्य है कि गुरुदेव जिस समर्थता के आधार पर बलि के तीन लोकों का राज्य मापने जैसे वामन के कदम उठा रहे हैं उसका सुदृढ़ बनाये रहना भी आवश्यक है। इस आवश्यकता को यथावत् जुटाये रहने से उनका ध्यान रत्ती भर भी विरत नहीं होता है।

यह ठीक है कि गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना के कारण हर किसी का मिलना-जुलना-भेंट परामर्श करना सम्भव नहीं रहा पर इससे किसी की कुछ हानि नहीं हुई, न आगे होनी है। निकटवर्ती-साथी संगी लाभदायक होते हों, दूर रहने वाले व्यर्थ सिद्ध होते हों, ऐसी भी कोई बात नहीं है। जुएं, खटमल, वस्त्र और बिस्तरों में चिपके रहते हैं। चूहे, दीमक, मच्छर, मक्खी, घर में ही घुसे रहते हैं। सर्प, बिच्छू, छिपकली भी घर आकर ही दर्शन देते रहते हैं पर उनसे किसी का कुछ बनता नहीं। सूर्य, चंद्र दूर हैं, पवन अदृश्य है, तो भी उनकी उपयोगिता कम नहीं। गुरुदेव के प्रत्यक्ष सान्निध्य संपर्क में कटौती हो जाने से किसी को भी न नज़रअंदाज़ी का अनुभव करना चाहिए न घाटे का।

माता अपने पेट में रहने वाले बच्चे को जब अपना रक्त माँस देकर पोषण करती रह सकती है तो अपने-अपने स्थानों पर रहते हुए परिजनों को भी ऐसा अनुभव नहीं होना चाहिए कि अकेलापन उपस्थित हो गया। सच तो यह है कि

“सूक्ष्म क्षमता ही अदृश्य होते हुए भी दृश्य पदार्थों की तुलना में कहीं अधिक समर्थ और सहयोगी हो सकती है।” 

गुरुदेव कहते हैं :इन दिनों अपना घनिष्ठ माने वालों में से प्रत्येक को यह अनुभूति होनी चाहिए कि वे हमारे बहिरंग से दूर दिखते हुए भी अन्तरंग के साथ अत्यधिक घनिष्ठता के साथ लिपट गये हैं। न केवल लिपट गये हैं वरन् कुछ कहते भी हैं। यह कथन झकझोरने और कचोटने जैसे स्तर का भी हो सकता है।

मार्गदर्शक सत्ता सूक्ष्म रूप से ही जुड़ी है:

हिमालय अवस्थित मार्गदर्शक सत्ता गुरुदेव के साथ सूक्ष्म शरीर से ही अपने अनुग्रह, आलोक, साहस और साधनों की कमी न पड़ने देने का पूरा-पूरा ध्यान रखती रही है। समीपता और नेत्र-सम्पर्क का अभाव दिखने पर भी उन्हें इस कारण किसी प्रकार का घाटा नहीं रहता। इसके विपरीत कितने ही कर्मचारियों और तथाकथित मित्र भक्तों से उन्हें समय-समय पर भारी आघात लगते रहे हैं। इस सब पर दृष्टिपात करने पर किसी को यह अनुभव नहीं करना चाहिए कि उनकी अनदेखी हुई या कथन-उपकथन से प्राप्त हो सकने वाले लाभों में कटौती हो गई। गुरुदेव ने इस स्थिति को समझाते हुए लिखा है कि जैसे घर में रहने वाला आलसी व्यक्ति जितना उपयोगी हो सकता है उसकी तुलना में दूर-देश जाकर कुछ उपार्जन करने वाला और परिवार पोषण के लिए भेजते रहने वाला अधिक उपयोगी एवं सम्मानास्पद सिद्ध होता है। 

गुरुदेव ने संपर्क के लिए जो माध्यम अपनाया है, वह समय की आवश्यकता के कारण ही हो सकता है, हो सकता है अगले दिनों उसकी भी आवश्यकता न रहे। गुरुदेव की वर्तमान साधना के सम्बन्ध में प्रत्येक विचारशील परिजन को दृष्टि से सोचना चाहिए कि दर्शन करने या कराने में अनुग्रह होने के अतिरिक्त वस्तुतः और कुछ है नहीं। 

“गुरुदेव को देखने के स्थान पर उनकी कही पर चलना कहीं अधिक महत्वपूर्ण एवं चमत्कारी है, इसे परिजन इन दिनों अनुभव करते रह सकते हैं।”

इस हीरक जयन्ती वर्ष में- गुरुदेव की तत्परता, तन्मयता, व्यवस्था एवं तपश्चर्या का स्तर बहुत अधिक बढ़ गया है इसलिए हर परिजन से उनकी घनिष्ठता और भी अधिक सघन हो गयी है। दर्शन नहीं हो रहे हैं इसका तात्पर्य यह नहीं हैं कि परिजन अपने को कटा हुआ समझें या अपने कर्त्तव्य उत्तरदायित्वों की इसलिए नज़रअंदाज़ी करें कि कोई कहने वाला तो है नहीं, उनके कान में अलग से कुछ कहा नहीं गया, उन्हें कुछ अतिरिक्त काम नहीं सौंपा गया। निवेदन एवं निर्देशन को अब अन्तर में टटोल कर खोजना चाहिए और उसे आत्मा की पुकार में घुला हुआ अनुभव करना चाहिए। 

आदान प्रदान का सिद्धांत गांठ बांध लेना चाहिए :

स्मरण रहे कि जैसे पौधों को जड़ों का रस ही नहीं ऊपर में हवा और धूप भी चाहिए। फल फूल प्राप्त करने के लिए पौधे में खाद-पानी की व्यवस्था भी तो करनी होगी। एक हाथ से ताली नहीं बजती, एक पहिये की गाड़ी नहीं चलती। आदान-प्रदान के सिद्धान्त को हमें कसकर गाँठ बाँध लेना चाहिए। गुरुदेव और उनका विश्व्यापी विशाल परिवार मिलकर एक इकाई बनते हैं। इस संयोग सुयोग से ही उनकी “समग्र क्षमता” बनती है, अन्यथा वे एकाकी रह जाते हैं। जिस प्रकार बैलगाड़ी के दो बैलों में से एक बैल के बैठ जाने पर पूरी गाड़ी का वजन एक बैल को ही खींचना पड़ता है वैसा ही उनके सम्बन्ध में घटित होता । हिमालय क्षेत्र की बरसने वाली अनुकम्पा उस कल्प-वृक्ष के लिए ऊपर से बरसने वाली पवन और धूप के समान है। पर जिस पात्रता के आधार पर वे यह अनुग्रह प्राप्त करते हैं वह उनकी नन्हीं-नन्हीं और सुदूर क्षेत्र तक जमीन के भीतर फैली हुई जड़ों से ही उत्पन्न होती है। यदि जड़ें जमीन में रहने और विज्ञापित ने होने के कारण अपने कार्य को महत्वहीन समझें तो अनर्थ हो जायेगा। पेड़ का तना सूख जायेगा और पत्ते झड़ जायेंगे। इस स्थिति में 

“एक हाथ से चप्पू थामकर नाव खींचने वाले मल्लाह पर जितना दबाव पड़ता है उतना ही हमारे गुरुदेव पर भी पड़ेगा ।”

काम तो एक हाथ का, एक पैर का आदमी भी किसी प्रकार करता है, पर उसका कार्य कितना कठिन और कितना धीमा होता है इसे सभी जानते हैं। हम सब गुरुदेव की उठाई ज़िम्मेदारी में ग्वाल-बालों की तरह, रीछवानरों की तरह साझीदार रहें तो ही शान और शोभा है। हाथ सिकोड़ लेने पर भी नाव तो किनारे लगेगी लेकिन उसे श्रेय से वंचित रहना पड़ेगा जो अर्जुन और हनुमान को सहज ही उपलब्ध हो गया था।

लाभ और हानि का गणित हमें नये आध्यात्मिक सिद्धान्तों के आधार पर सीखना होगा। भौतिक जगत में किसी भी प्रकार उपलब्धियां हस्तगत कर लेने का चातुर्य भी सफल होता है, पर अध्यात्म जगत में “बोने और काटने” के अतिरिक्त और कोई विद्या काम नहीं करती। इस क्षेत्र में गहरे तालाब ही बादलों की अनुकम्पा का लाभ लेते हैं। तालाब यदि अपनी मिट्टी बाहर फेंकने की उदारता न अपनायें तो उन्हें भी समतल भूमि की तरह प्रचण्ड वर्षा होने पर नाम मात्र नमी ही हाथ लगेगी। 

गुरुदेव का जीवन 75 पन्नों की पुस्तक :

गुरुदेव के 75 वर्ष को 75 पन्नों की पुस्तक समझा जा सकता है। इसे यदि ध्यानपूर्वक पढ़ा जाय तो उनकी विभूतियों को “बोयाकाटा” के आधार पर खरीदा गया ही समझा जा सकता है। हम सभी खरीदने का सिद्धांत अपनायें। खजाना खोदने, लाटरी भुनाने या याचना से दौलत बटोरने की बात न सोंचे। वह भ्रम मात्र है। सच्चा स्वार्थ परमार्थ ही है। इस तथ्य को गुरुदेव के जीवन संदर्भ के 75 पृष्ठो में से कुरेद कर भली-भाँति समझा जा सकता है। उन्हें इतनी महानता की उपलब्धि परमार्थ प्रयोजनों में अपनेआप को खपा देने के कारण ही मिली हुई हैं। उनके घर-कुटुम्ब के लोग और सहपाठीगण उसी स्थान पर रहे जहाँ उनके पूर्वज किसी प्रकार निर्वाह करते चले आ रहे थे। पर गुरुदेव जमीन से उछलकर आसमान तक छा गये और अंतर्ग्रही यानों की तरह रहस्य भरे अन्तरिक्ष में तीव्रगति से परिभ्रमण करने लगे। यही उनकी विरासत है, यही उनकी वसीयत है। जो कोई परिजन उनके आत्मीय होने का अनुभव करते हैं उन्हें अनुकरण की बात सोचनी चाहिए। वन्दन स्तवन से कुछ बनता नहीं है। विनिर्मित राजमार्ग पर चलने का साहस जुटाया जाना चाहिए। धीमी या तीव्रगति से चलने के लिए हमारे लिए एक राजमार्ग उपलब्ध है, एक ऐसा राजमार्ग जो परमपूज्य गुरुदेव ने कथनी से नहीं, करनी के सहारे सीधा -सरल और सुनिश्चित स्तर का जीवन जीकर विनिर्मित किया है। 

पिछले लेख में हमने लिखा था कि गुरुदेव ने रजत जयन्ती, स्वर्ण जयन्ती नहीं मनाई और शताब्दी मनाये जाने की कोई सम्भावना नहीं। इसीलिए परमपूज्य गुरुदेव ने हीरक जयन्ती को अपने जीवन का अंतिम उत्सव लिखा था। गुरुदेव ने यह इसलिए लिखा था कि उनके लिए उत्सवों से अधिक बड़े काम प्रतीक्षा कर रहे थे । गुरुदेव बताते हैं:

“ट्रान्सफर होने पर भी -रिलीव- होने में कुछ समय लग जाता है। इतना ही कार्यकाल उनके स्थूल शरीर का शेष है। इसके उपरान्त वे अपने “पाँच साथियों” समेत इस विश्व-ब्रह्माण्ड की अधिक उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाने में अपनी क्रियाशीलता नियोजित करेंगें।”

वे कब तक हमारे बीच हैं इस सम्बन्ध में कछ भी निश्चित रूप से कहना कठिन है। उनकी उपस्थिति में मात्र हीरक जयन्ती ही मन रही है। इस अदृश्य समारोह में किसने कितना उत्साह प्रकट किया, कितनी आत्मीयता और भाव श्रद्धा का परिचय दिया, इसका अवसर इसी बार है। नितान्त इन्हीं दिनों दिशा मिलने और चिन्तन करने में बहुत समय चला गया। इसी धुरी पर घूमते रहने से रहा बचा समय भी चला जायेगा। 

क्रमशः जारी -To be continued

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव 

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24 आहुति संकल्प सूची :

22 दिसंबर के ज्ञानप्रसाद पर कमेंट करके निम्नलिखित 3 महान दिव्य आत्माओं ने 24 आहुति-संकल्प पूर्ण किया है :(1 ) डॉ अरुण त्रिखा-25, (2) रेनू श्रीवास्तव जी-24 ,(3 )अरुण कुमार वर्मा जी -26
तीनों सहकर्मियों को इस प्रयास के लिए आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत-बहुत साधुवाद, शुभकामनाएँ एवं हार्दिक बधाई हो। आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरुसत्ता से विनम्र प्रार्थना है कि इन पर जगत् जननी माँ गायत्री की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे। जय गुरुदेव

जो सहकर्मी 24 आहुति टारगेट पूर्ण न कर सके उन्हें भी हम नमन करते हैं।

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परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 2

22  दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 2

आज का ज्ञानप्रसाद परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती श्रृंखला का द्वितीय पार्ट है। इस पार्ट में आप पढेंगें कि गुरुदेव ने वरिष्ठ प्रज्ञापुत्रों का विशेषण किन बच्चों के लिए प्रयोग किया, उनके लिए 75वां वर्ष परीक्षा का वर्ष क्यों था और आत्म- निरीक्षण और आत्म-निर्माण के प्रयास कौन-कौन से थे। ज्ञानप्रसाद के साथ ही आप  एक चित्र देख रहे हैं जिसमें एक तो आदरणीय डॉ चिन्मय पंडया जी की ईमेल है जो हमारी  प्रेरणा बिटिया की ऑडियो बुक्स तो सराहते हुए है और दो चित्र दर्शा रहे हैं कि बिटिया Deaf and Dumb के साथ अपना जन्म दिवस  मना रही है। चिन्मय भाई साहिब की सराहना का सम्मान करते हुए हम सबका कर्तव्य बनता है इन ऑडियो बुक्स को अधिक से अधिक व्यूज दिए जाएँ ताकि आने वाले प्रयासों को बल मिल सके। सभी सहकर्मियों से निवेदन करते हैं कि व्यूज को track  करते रहें।  इस भूमिका के साथ आज के  ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करते हैं। 

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कौन है गुरुदेव का वरिष्ठ प्रज्ञापुत्र ?

रोज़ कुआं खोदने और रोज पानी पीने वाले को भी आठ घंटा कमाने के लिए, सात घंटा सोने के लिए और पाँच घण्टा नित्य कामों  तथा अन्य  कामों के लिए छोड़ कर विशुद्ध रूप से चार घंटे बचते हैं। इसी में से संकल्पपूर्व दो से लेकर चार घंटे तक युग-धर्म के निर्वाह में लगाते रहा जाय तो स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही साथ-साथ सधते रह सकते हैं। जो इतना समयदान-अनुदान प्रस्तुत कर सकें उन्हें “जीवन्त प्रज्ञापीठ या वरिष्ठ प्रज्ञापुत्र” कहा जा सकेगा। ऐसे लोग केवल  अपने प्रयास से ही इतना काम कर  सकते हैं जितने कि भव्य इमारतों वाली प्रज्ञापीठों कर सकते हैं।

अर्थोपार्जन और परिवार निर्वाह के अतिरिक्त दो-चार घंटे का समय भगवान के लिए, देश, धर्म, समाज संस्कृति के लिए, गुरुदेव के लिए, युग-परिवर्तन के लिए लगाकर कोई व्यक्ति घाटे में नहीं रहेगा वरन् अपने त्याग की तुलना में अनेक गुना भण्डार भरेगा। अखण्ड-ज्योति के अप्रैल 1985 अंक में छपे गुरुदेव के “बोया काटा” लेख को पढ़कर सत्परिणाम के सम्बन्ध में सुनिश्चित विश्वास किया जा सकता है।

इन चार घंटों में क्या किया जाना चाहिए ?

जो चार घंटे परमपूज्य गुरुदेव ने गुरुकार्य के लिए चुने हैं उनके  सही प्रयोग का मार्गदर्शन  भी दिया हैं।  यह मार्गदर्शन 1985 का है ,आज बदले समय और टेक्नोलॉजी के आधार पर कुछ -कुछ फेर बदल किया जा सकता है।  हमने ब्रैकेट के अंदर ऑनलाइन गयारथ की गतिविधियां अंकित की हैं जिनको पूरा करने का प्रयास  हम सब  सामूहिक और व्यक्तिगत तौर पर कर रहे हैं। 

परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं -इन घंटों में क्या किया जाना चाहिए। यह अनेकों बार बताया जा चुका है। झोला पुस्तकालय, चल पुस्तकालय, कार्यकर्ताओं के जन्म दिन (अभी दो दिन पूर्व ही प्रेरणा बिटिया का जन्म दिवस  सभी ने मनाया), दीवारों पर आदर्श वाक्य ( शुभरात्रि संदेश), मुहल्लों में स्लाइड प्रोजेक्ट प्रदर्शन(हमारी विडियोज) टेप  रिकार्डर से गुरुदेव के नवीनतम प्रवचनों को सुनाया जाना ( ऑडियो बुक्स ) l

गुरुदेव की  जीवन गाथाएं, युग-गीतों के टेप  प्रातः काल सुनाने के लिए किसी ऊँचे स्थान पर लाउडस्पीकर फिट करना और टेप  से युग कीर्तन बिस्तर पर पड़े हुओं को भी सुनाना l  यह वे कार्यक्रम हैं जिन्हें वर्णमाला अभ्यास (विद्यालय की प्रथम कक्षा)   के समतुल्य समझा जा सकता है। भारी भरकम, बोझिल और विशालकाय कार्य इतना कर चुकने के पश्चात् ही किसी को सौंपे जा सकते हैं। समर्थता की प्रारम्भिक सीढ़ी पार कर लेने पर ही विशालकाय क्रिया-कलापों का बोझ उठाया जा  सकता है। 

उपरोक्त समूची योजना के लिए आवश्यक उपकरण खरीदने के लिए प्रायः पाँच हजार रुपए की राशि चाहिए। कुछ उपकरण पहले से  ही हों तो उतनी राशि से कम से भी काम चल सकता है। -झोला पुस्तकालय, चल पुस्तकालय, ज्ञानरथ, लाउडस्पीकर, स्लाइड प्रोजेक्टर, समग्र यज्ञशाला, वीडियो टेप  सुगम संगीत के वाद्ययन्त्र आदि ऐसी वस्तुएँ हैं जिनकी प्रचार कार्य में आये दिन आवश्यकता रहती है। वे न हों तो साधनहीन व्यक्ति का प्रचार कार्य आधा अधूरा बनकर रह जाता है।

इनके निमित्त राशि जुटाई ही जानी चाहिए। अपने पास से, मित्रों पर दबाव देकर, बर्तन बेचकर या कर्ज लेकर किसी न किसी प्रकार इतने साधनों की व्यवस्था करनी ही चाहिए। इसके लिए  मन को समझाने के लिए इस प्रकार  सोचा जाना चाहिए कि कोई आकस्मिक आपत्ति आ गई थी और उसमें इतना पैसा लग गया। इन सभी के लिए मेण्टेनेन्स का खर्च बीस पैसा प्रतिदिन के अंशदान की राशि से निकल सकता है। 

“ईंट चूने की शक्ति पीठों में लाखों रुपए की राशि जुट जाय और हाड़मांस की बोलती चलती जीवन्त शक्ति पीठ के लिए आवश्यक उपकरणों के निमित्त उतनी छोटी राशि भी न जुट सके, ऐसा हो ही नहीं सकता।”

स्थिर विनिर्मित प्रज्ञापीठों में निर्माण कर्ताओं ने स्वयं समय नहीं दिया। नौकरों से, बूढ़े बीमारों से, अनपढ़ अनगढ़ों से काम करवाया फलतः उसका कुछ निष्कर्ष न निकला। व्यक्ति की अपनी निज की प्रतिभा का अतिरिक्त मूल्य होता है। अनुपयुक्त व्यक्ति छोटे-मोटे काम भी नहीं कर पाता जबकि सुयोग्य व्यक्ति रास्ता चलते अनेकों काम बना कर रख देता है। अस्तु यह आवश्यक है कि नवसृजन का वातावरण बनाने के लिए कार्यक्रम चलाने के लिए “वरिष्ठ कार्यकर्ता स्वयं आगे बढ़ें” और देखें कि उन्हें कितने नये सहयोगी धड़ाधड़ मिलते चले जाते हैं और युगचेतना का प्रकाश उस समूचे क्षेत्र को किस प्रकार ज्योतिर्मय बनाता है। यही बात हमारे ऑनलाइन ज्ञानरथ पर भी apply होती है। 

अखंड ज्योति में वर्णन है कि-प्रज्ञा परिवार के जो भी सदस्य इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं ,यह युग निमन्त्रण सीधा उन्हीं के नाम भेजा गया है। गुरुदेव की हीरक जयन्ती इन्हीं दिनों दस हजार प्रज्ञापुत्रों को जीवन्त प्रज्ञा संस्थान के रूप में खड़े होते देखना चाहती है। गुरुदेव दस हजार मनकों का हार अपने गले में पहनना चाहते हैं। अपना नाम अगली पंक्ति में लिखा कर औरों को भी अनुकरण की प्रेरणा दी जानी चाहिए।

आत्म-निरीक्षण और आत्म-निर्माण:

गुरुदेव ने हर्षोत्सव पर अपनी प्रतिक्रिया जताते हुए लिखा था कि अपनी दिशा धारा ऐसी है जिसमें उत्साह उत्पादन करने वाले उन कार्यक्रमों की आवश्यकता है, जिससे लोकरंजन होता है और जन साधारण को तदनुरूप  जानकारी मिलती है। उथले स्तर पर यह भी कुछ  न कुछ  उपयोगी ही पड़ता है पर जिस लक्ष्य की ओर अपनी यात्रा चल रही है उसमें व्यक्तिगत साहस, पौरुष और पराक्रम की आवश्यकता रहेगी। यदि हीरक जयन्ती वस्तुतः मनानी हो तो हम सबको “आत्म-निरीक्षण और आत्म-निर्माण”  के प्रयत्न करने होंगे साथ ही लक्ष्य की दिशा में तीर की तरह सनसनाते हुए बढ़ना होगा। यह कार्य सुस्ती  अपनाने और मज़बूरी  की दशा में  चिन्ह पूजा करने से बन पड़ना  सम्भव नहीं है ।

गुरुदेव लिखते हैं कि हमारे  स्थूल शरीर की शताब्दी नहीं मनाई जा  सकती। यह हीरक जयन्ती हमारे  संदर्भ में अन्तिम उत्सव है। उन्होंने स्वयं को बड़ी समस्या सुलझाने के लिए नियोजित कर दिया है। 

वायु प्रदुषण, वातावरण और सर्वभक्षी महायुद्ध की विभीषिकाएं सामने हैं। व्यक्ति का चिन्तन और चरित्र नीचे ही गिरा जा  रहा है। इन सबके फलस्वरूप भविष्य के भयंकर और अन्धकारमय हो जाने में कोई सन्देह नहीं रह जाता। ऐसे प्रवाह को उलटना और उलटकर उलटे को सीधा करनाअसामान्य संकल्प है। 500( 1985 की विश्व जनसंख्या ) करोड़ मनुष्यों की नियति को आडंबर और दिखावे  से आलोक की ओर घसीट ले जाना सामान्य कार्य नहीं है। असामान्य प्रयास असामान्य व्यक्तियों से ही बन पड़ते हैं। व्यापक अन्धकार से निपटने की प्रतिज्ञा कोई सविता का अंशधर ही कर सकता है। ऐसी प्रतिज्ञा जिसे पूरी करने के लिए हमने अपना महान आधार का आस्तित्व बाजी पर लगा दिया गया है।

विनाश की सम्भावनाओं को हर धर्म के शास्त्रों और आप्त पुरुषों ने व्यक्त किया है। भविष्यदर्शी-सूक्ष्मचेता भी एक स्वर से यही कहते सुने जा रहे हैं। परिस्थितियों की प्रतिक्रिया का मूल्यांकन करने वाले महा-मनीषियों ने भी अगले दिनों विषम सम्भावनाओं की अभिव्यक्ति की है। यह सब निराधार नहीं है। इनके पीछे तथ्य है और वे तथ्य ऐसे हैं जिन्होंने  समस्त संसार को आशंकित और आतंकित कर रखा है। कोई भी इन्हें निरर्थक कल्पना नहीं मानता वरन् उन्हें प्रत्यक्ष देखता है।

इन सम्भावनाओं को इच्छा  करने  की बात  सहज हो सकती है पर उसे कर दिखाना ऐसा कठिन कार्य है जिसकी तुलना में गोवर्धन उठाने, समुद्र लाँघने जैसी उपासनाऐं भी छोटी पड़ती हैं। अशुभ का रोकना  एकाँगी बात हुई। दूसरा कार्य इसका पूरक “नव सृजन” रह जाता है। मात्र अशुभ का निराकरण हो और शुभ का संस्थापन न हो सके तो बात सर्वथा अधूरी रह जाती है। आसुरी उपद्रवों के निराकरण के साथ रामराज्य की स्थापना मिला देने से ही एक पूरी बात बनी थी। 

गुरुदेव लिखते हैं: अपने  लक्ष्य के भी यह दोनों ही पहलू हैं। सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि जो इस प्रक्रिया को पूरा करने का मात्र साहस ही नहीं दिखाता वरन् उसे पूरा कर दिखाने का संकल्पपूर्वक आश्वासन भी देता है, उसे कितनी दूर दृष्टि अपनानी होगी और प्रतिज्ञा पूर्ति के लिए कितनी कठोर तपस्या करनी होगी। इसकी झाँकी भागीरथ और दधीचि जैसों के प्रयासों का स्वरूप दृष्टि के सामने रखकर ही अनुमान लगा सकना सम्भव हो सकता है।

गुरुदेव का 75वाँ वर्ष उनकी अग्नि परीक्षा का वर्ष है :

हीरक जयंती 1985 के  वर्ष  में गुरुदेव कितनी अधिक तत्परता और निष्ठा के साथ अपनेआप को तपा रहे हैं, इसकी झाँकी उन्हें ही मिल सकती  है जो उनके अत्यधिक संपर्क में हैं। गुरुदेव का 75वाँ वर्ष उनकी अग्नि परीक्षा का वर्ष है, हर्षोत्सव में सम्मिलित होने या स्वागत सत्कार कराने का नहीं। 

क्रमशः जारी -To be continued  

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि  प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव 

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24 आहुति संकल्प सूची :

21 दिसंबर के ज्ञानप्रसाद पर कमेंट करके  निम्नलिखित 11  महान दिव्य आत्माओं  ने 24 आहुति-संकल्प पूर्ण किया है : (1 )प्रज्ञा सिंह जी -25 ,(2 )डॉ अरुण त्रिखा-29, (3 ) रेनू  श्रीवास्तव जी-26,(4 )संध्या कुमार जी -26 ,(5 )अरुण कुमार वर्मा जी -26 ,(6 )निशा भरद्वाज जी -24 ,(7 )नीरा त्रिखा जी -24 ,(8 )प्रेरणा बिटिया -29 ,(9 )सुमन लता जी -25 ,(10 )धीरप सिंह बेटा -26 ,(11 )सरविन्द कुमार जी -26 

सभी सहकर्मियों को इस प्रयास  के लिए आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत-बहुत साधुवाद, शुभकामनाएँ एवं  हार्दिक बधाई हो। आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरुसत्ता से विनम्र प्रार्थना है कि इन पर जगत् जननी  माँ गायत्री   की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे। जय गुरुदेव

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परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 1 

21  दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 1 

18 दिसंबर वाले लेख में हमने अपने सहकर्मियों के साथ परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती (Diamond Jubilee )का ज़िक्र किया था। उस दिन से लेकर इस लेख के प्रकाशित होने तक हमने अखंड ज्योति के कितने ही लेख पढ़ दिए ,कितनी ही वीडियोस देख दीं ताकि हम आपके समक्ष कुछ ऐसा  कंटेंट ला सकें जो आपको बता सके कि हमारा गुरु कैसा है और अगर आपको विश्वास  होता है  तो आप औरों को बताने का संकल्प लें। आज से आरम्भ हो रही इस श्रृंखला में आने वाले लेख आपको इस संकल्प में मार्गदर्शन तो प्रदान कर  ही सकते हैं, साथ में  परमपूज्य गुरुदेव की वेदना का भी आभास भी दिला सकते हैं कि उनको अपने विशाल परिवार से, अपने बच्चों से क्या- क्या आशाएं  थीं। इन लेखों को पढ़ते  हुए आपको ऐसा भी आभास होगा कि जो बात गुरुदेव हमसे कह रहे हैं, लगभग वही बात हम आपको ऑनलाइन ज्ञानरथ के संदर्भ में भी कहते रहते हैं – कहें भी क्यों न, जिस प्रकार हमारे गुरुदेव का हम पर विशेष अधिकार है ठीक वैसे  ही अधिकार की अपेक्षा  हम अपने सहकर्मियों पर कर सकते हैं। 

तो चलें आज की ज्ञान पाठशाला  में:

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सूक्ष्मीकरण के दौरान परमपूज्य गुरुदेव की  हीरक जयंती:       

परमपूज्य गुरुदेव ने सूक्ष्मीकरण अवधि के प्रथम वर्ष में अपनी हीरक जयंती  की घोषणा की थी। यह 1985 में मनाई गयी थी।  उसी की पूर्ववेला में गुरुदक्षिणा के रूप में उन्होंने 10000 हीरों की माला पहनने की बात कही थी।  उसके बाद अब 2021  में   36  वर्ष बीतने को आ रहे हैं, क्या हमने उनकी यह आकांशा पूरी की, क्या हम अभी भी अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे  हो जाने के बावजूद  बहाने बना रहे हैं और बचने का प्रयास कर रहे हैं ।

साधारणतया  25 वें वर्ष में रजत जयन्ती, पचासवें वर्ष में स्वर्ण जयन्ती, पचहत्तरवें  वर्ष में हीरक जयन्ती और सौ वर्ष में शताब्दी मनाये जाने की परम्परा है। लोकाचार में विवाह के साठ वर्ष पूरे होने पर हीरक जयंती मनाते हैं पर गुरुदेव का अपने गुरु से हुए गठबंधन को  साठ वर्ष पूरे होने के कारण इस वर्ष को ही हीरक जयन्ती वर्ष माना जा रहा था । गुरुदेव  ने लिखा  कि अन्यत्र यह आयोजन हर्षोत्सवों के रूप में मनाये जाते हैं, पर अपनी दिशा धारा ऐसी है जिसमें उत्साह उत्पादन करने वाले उन कार्यक्रमों की आवश्यकता है, जिनसे  लोकरंजन होता है। कौन कौन से हैं यह कार्यक्रम -आगे चल के बताते हैं 

अखंड ज्योति अक्टूबर  1985 के अनुसार  गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण एकान्त साधना को प्रायः डेढ़ वर्ष हो चला था । इस बीच उनकी ढलती आयु और प्रचण्ड तपश्चर्या को देखते हुए प्रत्यक्ष स्वास्थ्य बहुत अधिक नहीं लड़खड़ाया था । चेतना शरीर तो और भी अधिक बलिष्ठ, समर्थ एवं तेजस्वी हो गया था । उनकी संरक्षक शक्ति का प्रताप देखते हुए किसी  को भी कोई  चिन्ता की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी । वे अनवरत क्रम से अपने मार्ग पर चल रहे थे । निर्धारित लक्ष्य को पूरा करके ही रहेंगे, इतनी निश्चिन्तता हममें  रहनी ही चाहिए।

श्रावणी पर्व पर परमपूज्य गुरुदेव ने  एक अंगड़ाई ली । प्रज्ञामिशन की ओर ध्यान दिया  और भावनाशील परिजनों को भी उन्होंने  स्मरण किया । सभी के कुशल समाचार पूछे और मनःस्थिति एवं परिस्थिति का लेखा-जोखा लिया। साथ ही उनके उज्ज्वल भविष्य की संरचना का आश्वासन भी दिया । इसके अतिरिक्त परिजनों के प्रति निजी अभिव्यक्ति का  45 मिनट  का एक वीडियो  भी रिकॉर्ड करवाया । इस  वीडियो का 26 मिनट का एक भाग  यूट्यूब पर उपलब्ध है और हम इसे अलग से अपने चैनल पर अपलोड कर देंगें। 

इस वीडियो में परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि  1985 का वर्ष हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इस वर्ष में हमें विशेष शक्ति मिली हुई है, हमारा एक बैच (Batch) बना हुआ है और हम चाहते हैं कि जो लोग हमसे घनिष्टता से जुड़े हैं, जो लोग शांतिकुंज नहीं आ सके हैं उन्हें इधर भेज दीजिये। आगामी वसंत पंचमी को हमारे 75 वर्ष पूरे हो जाने हैं, तब तक आ जाएँ तो अच्छा है। हमें आपके साथ, अपने  सहयोगियों के साथ बहुत महत्वपूर्ण कार्य करने हैं। एक और बात गुरुदेव ने कही कि जीते जी हम अपने बारे में कुछ भी लिखना नहीं चाहते। हमारे जाने के बाद आप बताना कि  हमारा गुरु कैसा था ( है ) इसके उपरान्त वे अपनी प्रचण्ड साधना में फिर पहले की  भाँति लग गये। विश्व की विषम परिस्थिति का सन्तुलन बिठाने के लिए इससे कम ऊर्जा में काम चलने वाला भी नहीं है।

गुरुदेव ने हीरक जयंती के लिए  “अनिच्छा एवं अरुचि” क्यों व्यक्त की ?

अक्टूबर के अंक में ऐसा भी वर्णन है: यह गुरुदेव की हीरक जयन्ती का वर्ष है। इसमें प्रायः छ: महीने बीत चुके और लगभग इतने ही दिन शेष हैं। परमपूज्य गुरुदेव अपना प्रत्येक पर्व वसंत से ही गिनते थे, इस गणित से अक्टूबर माह तक लगभग छः माह  होते हैं।  यह शानदार वर्ष सभी परिजनों के लिए हर दृष्टि से सौभाग्य सूचक और उत्साहवर्धक है। सभी के मन में इस अवसर पर कुछ करने की उमंग है। साधारणतया हर्षोत्सवों पर धूमधाम भरे सज्जा सम्मेलन और यज्ञादि कर्मकाण्ड होते रहते हैं। इस संदर्भ में गुरुदेव ने आरम्भ में ही “अनिच्छा एवं अरुचि”   व्यक्त कर दी थी  और कहा कि इस महत्वपूर्ण बेला को इतने सस्ते में न निपटाया जाय। अगर किसी को कुछ  करना हो तो  वे कुछ ऐसा ठोस काम करें जिसका प्रभाव जन-मानव को  परिष्कृत करने के लक्ष्य की पूर्ति में महती भूमिका निभा सके और उसका प्रत्यक्ष दर्शन प्रेरणाप्रद स्वरूप में चिरकाल तक होता रहे।

शक्तिपीठों का निर्माण – “चेतना उभारने वाला लक्ष्य”

अधिक पूछने पर परमपूज्य गुरुदेव ने   कहा- हमारे जीवन के अनेकानेक कार्यों में सबसे महत्वपूर्ण कार्य एक था- 24 प्रज्ञा पीठों का निर्माण। देवालयों की दृष्टि से वे भली प्रकार विनिर्मित हो गये हैं।  अनेकों का हमने स्वयं जाकर उद्घाटन भी किया। इमारतों की दृष्टि से मध्यवर्गी परिजनों का इतना साहस कोई  कम सराहनीय नहीं है। जिस प्रयोजन को  लिए आशाओं के साथ इन शक्तिपीठों का  निर्माण हुआ, उसके पीछे एक दूरगामी “चेतना उभारने वाला लक्ष्य” भी था। आशा कर ली गई थी कि प्रत्येक प्रज्ञापीठ स्थानीय क्षेत्र में नव जीवन का संचार ही नहीं करेगा, वरन् समीपवर्ती गांवों को भी अपनी सेवा परिधि में लेकर एक “मण्डल का केन्द्र” बनायेगा। शक्तिपीठों के  रचनात्मक प्रयत्नों से ट्यूबवैल जैसी उगी हुई हरितमा  दूर-दूर तक दिखाई देगी। वे विद्युत उत्पादक, जनरेटर बनकर अपने दायरे में आलोक वितरण करेंगे। प्राचीन काल में देवमन्दिर जनमानस में धर्मधारणा को गहराई तक प्रवेश कराते थे और लोकोपयोगी सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में जान की बाज़ी लगाकर संलग्न रहते थे। उनके द्वारा उत्पन्न किया गया  लोक-सेवकों का  संगठन अनर्थ-अनौचित्यों के पैर नहीं जमने देता था । 

आशा  की गई थी प्रज्ञापीठें ऐसी ही हलचलों की केन्द्र बनकर रहेंगीं परन्तु  लगता है वस्तुस्थिति को और भावी जिम्मेदारी को समझे बिना ही उतावलेपन  में चन्दे के बल पर देवालय बन गये और कार्य समाप्त हुआ मान लिया गया। यही कारण है कि विनिर्मित प्रज्ञा पीठों में भाव-भरा जीवन संचार “नहीं” हो रहा है। परमपूज्य गुरुदेव ने इन विनिर्मित प्रज्ञापीठों( Manufactured Prgyapeeth ) को उत्पादित बालकों की संज्ञा देते हुए  और अपनी वेदना व्यक्त करते हुए कहा:

“ऐसा लग रहा है कि इन बालकों को  पक्षाघात (PARALYSIS) जैसा होता दिख रहा है। वे चलते-फिरते हँसते-खेलते, बोलते-चलते नहीं दिखते।” 

ऐसी परिस्थिति को देखते हुए गुरुदेव ने अपनी  व्यथा व्यक्त की और कहा यह सब देख कर हमें  चोट लगती है। गुरुदेव ने निर्जीवता के माहौल के बदले जाने और सजीवता उत्पन्न होने की आशा व्यक्त की । वीडियो में परमपूज्य गुरुदेव यहाँ तक कह रहे हैं कि शक्तिपीठ हमारी छाती के ऊपर बना दिए हैं, ज्ञानरथ चलता नहीं है,पुजारी बना दिए हैं ,आते हैं आरती करके चले जाते हैं। हमें ख़ुशी है हमारे बच्चों ने  बहुत बड़े कार्य किये हैं   लेकिन बहुत कुछ और  करने को अभी बाकी है।  यह आपकी हीरक जयंती है जिसमें हम आपको तराश कर हीरा बनाना चाहते हैं, आप चाहें तो इसको हमारा अंतिम सन्देश समझ सकते हैं लेकिन हम कहना चाहते हैं कि आप हमारे जैसे बने तभी हमें प्रसन्नता होगी।

हीरक जयन्ती वर्ष में समारोह के लिए गुरुदेव ने इसलिए  मना  कर दिया था  कि यदि प्रदर्शन और हुल्लड़ कोई ठोस काम होने की भूमिका नहीं बना सकते तो उनके निमित्त किया गया श्रम और खर्चा गया धन निरर्थक है। इन निराशाजनक परिस्थितियों में भी एक आशा की नई किरण उनके मन में कौंध रही थी । उसी का आभास उन्होंने 1985 के   श्रावणी पर्व पर दिया था। वे चाहते थे कि  बन चुके प्रज्ञापीठों को हिलाते-जुलाते रखा  जाय ताकि उनकी मूच्छना हटे और प्राण चेतना के लक्षण प्रकट हों। साथ ही उनकी एक और इच्छा भी थी  कि 24 लाख के विशालकाय गायत्री  परिवार में से कम से कम दस हजार व्यक्ति ऐसे निकलें, जिन्हें “ईंट चूने से नहीं हाड़मांस से बने भावनाशील और क्रियाशील पीठ कहा जा सके जो सक्रिय भी हों और गतिशील भी।”

गाँधी जी के सत्याग्रही, महात्मा बुद्ध  के परिव्राजक (भ्रमण करते हुए भिक्षु ), विनोबा जी के  सर्वोदयी, भगवान राम  के रीछ-वानर और भगवान कृष्ण  के ग्वाल-बाल कोई बहुत बड़ी प्रतिभा और परिस्थिति के नहीं थे, पर जब उन्होंने एक केन्द्र के तत्वावधान में रहकर परमार्थ प्रयोजन में अपनेआप  को समर्पित कर दिया  तो उन्हें  इतना बड़ा श्रेय मिला जितना देवताओं को मिलता है।

1985 के अनुसार प्रज्ञापरिवार के पंजीकृत सदस्य प्रायः 24 लाख हैं। इनमें से मात्र दस हजार निकल कर अगली पंक्ति में आयें जिन्हें सच्चे अर्थों में युग शिल्पी, प्रज्ञापुत्र एवं व्रतधारी कहा जा सके। उन्हें घर छोड़कर कहीं अन्यत्र चले जाने के लिए नहीं कहा जा रहा है बल्कि  आह्वान किया जा रहा है कि प्रतिदिन  न्यूनतम दो-चार घण्टे का समय एवं बीस पैसे प्रतिदिन  युगान्तरीय चेतना को गतिशील बनाने में संकल्पपूर्वक लगाते रहें। मात्र इतना करने से  ही वे उस पंक्ति में गिने जा सकने योग्य बन जायेंगे जैसों की  गुरुदेव ने इस बार आशा  की है। समय किसी के पास भी चौबीस घण्टे से कम नहीं। इसका सही विभाजन करके सही काम में लाते हुए सामान्य व्यक्ति महान कार्य कर गुजरते हैं जबकि व्यस्तता की गुहार लगाते हुए कितने ही अनगढ़ और आलसी अपना समय गंवाते हैं और उन समस्याओं को भी नहीं सुलझा पाते जिनकी आड़ में वे मानवी गरिमा को सार्थक करने वाले कार्यों से कतराते और आँख चुराते रहते हैं।

क्रमशः जारी -To be continued  

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि  प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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24 आहुति संकल्प सूची – 

प्रेरणा बिटिया द्वारा प्रकाशित दो आडियो बुक्स पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए  दो  महान दिव्य आत्माओं  ने 24 आहुति-संकल्प पूर्ण किया है। दोनों दिव्य आत्माओं “ (1) प्रेरणा कुमारी बेटी-24, (2) संध्या बहन जी-24” को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत-बहुत साधुवाद, शुभकामनाएँ एवं  हार्दिक बधाई हो। आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरुसत्ता से विनम्र प्रार्थना है कि इन दोनों पर जगत् जननी  माँ गायत्री   की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे। जय गुरुदेव

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उत्तराखंड में स्थित है “धरती का स्वर्ग” 

18 दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद -उत्तराखंड में स्थित है “धरती का स्वर्ग” 

आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने से पहले हम अपने सभी सहकर्मियों का धन्यवाद् करना चाहेगें जिन्होंने कल वाली वीडियो को सम्पूर्ण समर्पण से ग्रहण किया और इंटरनेट /यूट्यूब के कारण जो भी समस्या आती रही उसका यथासंभव निदान करते रहे। सभी ने सम्पूर्ण सहकारिता, सहभागिता का प्रमाण देते हुए कमैंट्स, लाइक्स और views का योगदान दिया है। आशा करते हैं ऐसा ही रिस्पांस 20 दिसंबर 2021 सोमवार को रिलीज़ हो रही हमारी सबकी बिटिया प्रेरणा द्वारा रचित दो ऑडियो बुक्स को भी मिलेगा। हाँ एक बार फिर स्मरण दिला रहे हैं इसी दिन हमारी बिटिया का शुभ जन्म दिवस भी है, हम सब बिटिया को व्यक्तिगत एवं सामूहिक शुभकामना देकर अपना आशीर्वाद प्रदान करेंगें।

हमारी व्हाट्सप्प सहकर्मी कोकिला बारोट जी का कमेंट हमने शेयर किया था जिसमें उन्होंने परमपूज्य गुरुदेव की हिमालय यात्रा पर आधारित लेखों में रुचि दिखाई थी। हमारे यूट्यूब के सहकर्मियों ने भी इस सुझाव का समर्थन किया था और हमारे पूर्वरचित हिमालय-यात्रा लेखों को repost करने की इच्छा दिखाई है। अपने आदरणीय सहकर्मियों के सुझाव सर्वोपरि हैं इसलिए आज का ज्ञानप्रसाद हिमालय पर ही आधारित है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से हम परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती के सम्बन्ध में 1985 की अखंड ज्योति का स्वाध्याय कर रहे थे। जो ज्ञानप्राप्ति इन अंकों से हुई है उन्हें हम आपके साथ शेयर किये बिना नहीं रह सकते। तो मंगलवार 21 दिसंबर से हीरक जयंती लेखों की श्रृंखला आरम्भ करने जा रहे हैं। अभी तक तो इस श्रृंखला में 3 से 5 लेखों की ही योजना है लेकिन जैसा परमपूज्य गुरुदेव का निर्देश होगा आपके समक्ष प्रस्तुत करते जायेंगें। सहकर्मियों के सुझावों पर ही अगले लेखों की योजना बनाई जाएगी।

प्रस्तुत है आज का ज्ञानप्रसाद:


हम सभी जानते हैं कि परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शक, हमारे दादा गुरु परमपूज्य सर्वेश्वरानन्द जी 1926 की वसंत को प्रातः आंवलखेड़ा आगरा स्थित गुरुदेव की पूजा की कोठरी में प्रकट हुए और कई निर्देश देकर अंतर्ध्यान हो गए। यह एक सौभाग्य य संयोग ही हो सकता है कि जीवन को आरम्भ से अन्त तक एक समर्थ सिद्ध पुरुष के संरक्षण में गतिशील रहने का अवसर मिल गया। उस महान् मार्ग दर्शक ने जो भी आदेश दिये, वे ऐसे थे जिसमें गुरुदेव के जीवन की सफलता के साथ-साथ लोक-मंगल का महान् प्रयोजन भी जुड़ा रहा। केवल 15 वर्ष की आयु से दादा गुरु की अनुकम्पा बरसनी शुरू हुई और गुरुदेव ने प्रयत्न किया कि महान गुरु के गौरव के अनुरूप शिष्य बना जाय। सो एक प्रकार से उस सत्ता के सामने आत्म-समर्पण ही हो गया। कठपुतली की तरह अपनी समस्त शारीरिक और भावनात्मक क्षमताएं उन्हीं के चरणों पर समर्पित हो गई। जो जो आदेश, जब जब भी , होता रहा उसे पूरी श्रद्धा के साथ शिरोधार्य और कार्यान्वित किया जाता रहा। जीवन के अंत तक अपने मार्गदर्शक के आदेशों को मानते रहे ,वैसे तो अंत कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि गुरुदेव जैसी दिव्य सत्ताओं का कभी भी अंत नहीं होता और हम जैसे अनगनित बच्चे प्रतिक्षण परमपूज्य गुरुदेव की उपस्थिति को अनुभव कर रहे हैं। 

अपने जीवन के क्रिया-कलापों को परमपूज्य गुरुदेव ने एक कठपुतली की उछल-कूद जैसा बताया हैं। ठीक उसी तरह जैसे एक कठपुतली अपने मदारी की डोर की हरकतों से उछलती है,कूदती है। 

यह दिव्य साक्षात्कार मिलन तब हुआ जब गुरुदेव अपनी आयु के 15 वर्ष समाप्त करके 16 वें वर्ष में प्रवेश कर रहे थे। इस दिव्य मिलन को ही विलय भी कहा जा सकता है। विलय को आज की आधुनिक भाषा में समझने का प्रयास करें तो Fusion सबसे उचित प्रतीत होता है। जैसे म्यूजिक में Fusion होता है यां दूध में पानी का विलय होता है ,ठीक इसी प्रकार का विलय था गुरुदेव और दादा गुरु का। 

केवल दो पदार्थों-जौ की रोटी और छाछ पर 24 वर्ष तक निर्वाह करने का निर्देश एवं अखण्ड दीपक के समीप 24 गायत्री महापुरश्चरण करने की आज्ञा हुई। महापुरश्चरण का अर्थ होता है एक वर्ष में 24 लाख मन्त्र,यानि 60 माला प्रतिदिन । गुरुदेव ने 24 वर्ष तक अनवरत यह टाइम टेबल निभाया। 24 लाख के 24 महापुरश्चरण पूरा होते ही दस वर्ष धार्मिक चेतना उत्पन्न करने के लिये प्रचार और संगठन, लेखन, भाषण एवं रचनात्मक कार्यों की श्रृंखला चली। उन वर्षों में एक ऐसा संघ तन्त्र जिसे हम आज अखिल विश्व गायत्री परिवार के नाम से जानते हैं, बनकर खड़ा हो गया, जिसे नवनिर्माण,युगनिर्माण के लिए उपयुक्त आधारशिला कहा जा सके। 

गुरुदेव ने जितनी शक्ति 24 वर्ष की पुरश्चरण साधना से अर्जित की थी , वह दस वर्ष में खर्च हो गयी।

दादा गुरु ने इससे भी बड़े कार्य करवाने थे तो उस अधिक ऊंची जिम्मेदारी को पूरा करने के लिये नई शक्ति की आवश्यकता पड़ी। सो इसके लिये फिर आदेश हुआ कि इस शरीर को एक वर्ष तक हिमालय के उन दिव्य स्थानों में रहकर विशिष्ट साधना करनी चाहिये। ऐसे स्थानों पर साधना करनी चाहिए जहां अभी भी “आत्म-चेतना का शक्ति प्रवाह” प्रवाहित होता है। अन्य आदेशों की तरह यह आदेश भी शिरोधार्य ही ही रहा। 

1958 में परमपूज्य गुरुदेव ने एक वर्ष के लिये हिमालय में तपश्चर्या के लिये प्रयाण किया ।

गंगोत्री में भागीरथ के तपस्थान पर और उत्तरकाशी में परशुराम के तपस्थान पर यह एक वर्ष की साधना सम्पन्न हई। गुरुदेव को लेखन का व्यसन (addiction ) तो था ही, यह सब अनुभूतियाँ गुरुदेव अपनी डायरी में लिखते रहे ताकि उनके अनुभवों से और लोग भी लाभ उठा सकें। जहां-जहां रहना हआ, वहां-वहां भी अपनी स्वाभाविक प्रवत्ति के अनुसार मन में भाव भरी हिलोरें उठती रहीं। इन अनुभूतियों को गुरुदेव ने अखण्ड-ज्योति में छपने के लिए भेज दिया गया और वह छप भी गईं। अनेक ऐसी थीं जिन्हें प्रकट करना अपने जीवनकाल में उपयुक्त नहीं समझा गया सो नहीं भी छपाई गई। उन दिनों के अखंड ज्योति के अंक हम देखें तो साधक की डायरी के पृष्ठ ‘सुनसान के सहचर’ आदि शीर्षक से प्रकाशित हुए। ये जो लेख अखण्ड-ज्योति पत्रिका में छपे वे लोगों को बहुत ही अच्छे लगे। बात पुरानी हो गई पर लोगों की दिलचस्पी बढ़ती ही गयी लोग इन लेखों को पढ़ने के लिये उत्सुक थे। सो फिर निर्णय लिया गया कि इन लेखों को पुस्तकाकार में प्रकाशित कर देना चाहिए। इस तरह “सुनसान के सहचर” नामक पुस्तक का जन्म हुआ। घटनाक्रम अवश्य पुराने हो गए हैं पर उन दिनों की जो विचार अनुभूतियां उठती रहीं, वे स्थाई हैं, अनंत हैं। उनकी उपयोगिता और महत्व में समय के पीछे पड़ जाने के कारण कुछ भी अन्तर नहीं आया है। आशा की जानी चाहिये वे भावनाशील अन्तःकरणों को वे अनुभूतियां अभी भी गुरुदेव की ही तरह स्पंदित कर सकेंगी और पुस्तक की उपयोगिता एवं सार्थकता सिद्ध हो सकेगी।

जब हम पुस्तक की उपयोगिता देख रहे थे हमने देखा कि स्कैन कॉपी के प्रथम पन्ने पर दर्शाया गया है कि इस पुस्तक को Faculty of arts के graduate स्तर के सिलेबस की पढ़ाई में मान्यता प्राप्त है। टेक्स्ट कॉपी में ऐसा कोई वर्णन नहीं मिला ,साथ ही हम यह जानने में असफल रहे कि यह मान्यता किस यूनिवर्सिटी द्वारा दी गयी है, शायद देव संस्कृति यूनिवर्सिटी ही हो। एक और बात जो देखने वाली है- वह यह कि जिस पुस्तक को आधार बना कर हम यह लेख लिख रहे हैं 2003 का एडिशन हैं और उस एडिशन का मूल्य केवल 15 रूपए है। 119 पन्नों की पुस्तक ,केवल पुस्तक ही नहीं बल्कि ज्ञान-अमृत कहें तो गलत नहीं होगा इतना कम मूल्य। हम अपने लेखों में कई बार कह चुके हैं कि परमपूज्य गुरुदेव का साहित्य लागत से भी कम मूल्य पर उपलब्ध है, इसका कारण तो एक ही हो सकता है कि कोई यह बहाना न लगा सके कि यह साहित्य हमारी जेब से बाहिर है। और हम तो यह कहेंगें कि ऐसे अनमोल साहित्य को किसी भी कीमत पर लेकर पढ़ना चाहिए। 

धरती का स्वर्ग कहाँ पर है ? 

बद्रीनारायण से लेकर गंगोत्री के बीच का लगभग 400 मील परिधि का वह स्थान है, जहां प्रायः सभी देवताओं और ऋषियों का तप-केन्द्र रहा है। इसे ही “धरती का स्वर्ग” कहा जा सकता है। स्वर्ग कथाओं से जो घटनाक्रम एवं व्यक्ति चरित्र जुड़े हैं, उनकी यदि इतिहास, भूगोल से संगति मिलाई जाय तो वे धरती पर ही सिद्ध होते हैं। इस बात से बहुत वज़न मालूम पड़ता है जिसमें इन्द्र के शासन एवं आर्य सभ्यता की संस्कृति का उद्गम स्थान हिमालय का उपरोक्त स्थान बनाया गया है। अब वहां बर्फ बहुत पड़ने लगी है। ऋतु परिस्थितियों की श्रृंखला में अब वह “हिमालय का हृदय” असली उत्तराखण्ड इस योग्य नहीं रहा कि वहां आज के दुर्बल शरीरों वाला व्यक्ति निवास स्थान बना सके। इसलिये आधुनिक उत्तराखण्ड नीचे चला गया और हरिद्वार से लेकर बद्रीनारायण-गंगोत्री-गोमुख तक ही उसकी परिधि सीमित हो गई है।

हिमालय के हृदय नामक क्षेत्र में जहां प्राचीन स्वर्ग की भी विशेषता विद्यमान है, वहां तपस्याओं से प्रभावित शक्तिशाली आध्यात्मिक क्षेत्र भी विद्यमान है। गुरुदेव के मार्ग दर्शक (दादा गुरु ) वहां रहकर प्राचीनतम ऋषियों की इस तप संस्कारित भूमि से अनुपम शक्ति प्राप्ति करते हैं। कुछ समय के लिये गुरुदेव को भी उस स्थान पर रहने का सौभाग्य मिला और वे दिव्य स्थान उन्हें भी देखने में आये। उनका जितना दर्शन हो सका उसका वर्णन उन वर्षों की अखण्ड-ज्योति में प्रस्तुत किया गया था। उन लेखों के पढ़ने से संसार में एक ऐसे स्थान का पता चलता है, जिसे “आत्म-शक्ति का ध्रुव” कहा जा सकता है। धरती के उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुवों में विशेष शक्तियां हैं। आध्यात्म शक्ति का एक ध्रुव परमपूज्य गुरुदेव के अनुभव में भी आया जिसमें अत्यधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियां भरी पड़ी हैं। सूक्ष्म शक्तियों और शरीरधारी सिद्धपुरुषों की शक्तियों की दृष्टि से यह प्रदेश बहुत ही उपलब्धियों का स्रोत है। परमपूज्य गुरुदेव ने इस पुस्तक में एवं अन्य पुस्तकों में भी इस दिव्य केंद्र की महत्ता पर बहुत ही ज़ोर दिया है। इसका कारण यही है कि लोगों का ध्यान इस दिव्य केंद्र की ओर बना रहे और इसकी शक्ति को हमेशा अपने अंतःकरण में स्थापित करते रहें। परमपूज्य गुरुदेव को अपने बच्चों का इतना ख्याल रहता है कि उन्होंने युगतीर्थ शांतिकुंज हरिद्वार में देवात्मा हिमालय का मंदिर ही स्थापित कर दिया ताकि अगर मेरे बच्चे इस मंदिर के अंदर बैठ कर साधना करें ,ध्यान लगाएं तो अपनेआप को दिव्य सत्ताओं के संरक्षण में अनुभव करें। आपको जब भी युगतीर्थ शांतिकुंज में जाने का सौभाग्य प्राप्त होता है तो समाधि स्थल ,अखंड दीप ,गायत्री मंदिर ,सप्तऋषि क्षेत्र के दर्शन तो करें हीं लेकिन देवात्मा हिमालय मंदिर जाना न भूलें। हम तो यह कहेंगें कि आप इस मंदिर में सीढ़ियों पर बैठ कर दिव्यता का अनुभव अवश्य ही करें। हम समय समय पर शुभरात्रि संदेश में इस मंदिर वीडियो शेयर कर रहे हैं।

धन्यवाद् जय गुरुदेव 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

अगला ज्ञानप्रसाद: प्रेरणा बिटिया की ऑडियो बुक्स 

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17 दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद -आदरणीय शुक्ला  बाबा की वीडियो

17 दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद -आदरणीय शुक्ला  बाबा की वीडियो

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“मन और उसका निग्रह” लेखों का सारांश  

16  दिसंबर 2021  का ज्ञानप्रसाद- “मन और उसका निग्रह” लेखों का सारांश  

 “मन और उसका  निग्रह” शीर्षक के अंतर्गत हमने 24 लेखों की श्रृंखला प्रस्तुत की, हमारे सूझवान सहकर्मियों ने हर लेख की तरह इन लेखों के लिए भी  सक्रियता दिखाते  हुए कमैंट्स की बाढ़ लगा दी, आभार व्यक्त करने के लिए हमारे लिए जैसे शब्दों का  दुर्भिक्ष ही पड़  गया हो । आज इस शृंखला का इतिश्री करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। आशा करते हैं कि संध्या कुमार जी, अनिल मिश्रा जी ,सरविन्द कुमार जी जैसे और भी समर्पित सहकर्मी इसी तरह सहकारिता, सहभागिता का प्रमाण देते रहेंगें जो ऑनलाइन ज्ञानरथ को शिखर तक ले जाने में सहायक होंगें।  इन अद्भुत लेखों की प्रस्तुत की गयी  श्रृंखला आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के स्वाध्याय पर आधारित थी । ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  रामकृष्ण मिशन मायावती,अल्मोड़ा के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी का आभारी है जिन्होंने  यह अध्भुत  ज्ञान उपलब्ध कराया। इन लेखों का  सम्पूर्ण श्रेय इन महान आत्माओं को जाता है -हम तो केवल माध्यम ही हैं।

हमारे सहकर्मियों ने पिछले कई दिनों से बहुत ही कठिन परिश्रम किया है। उन्हें राहत  देने के लिए सारांश से अगला ज्ञानप्रसाद (शुक्रवार प्रातः) केवल  साढ़े तीन मिंट की वीडियो होगी। इस वीडियो में आदरणीय चिन्मय भैया गुरुदेव के प्रथम शिष्यों में से एक, शिष्य शिरोमणि शुक्ला बाबा के समर्पण के बारे में बता रहे हैं। जब  भी हम कोई वीडियो अपलोड करते हैं तो निवेदन करते हैं कि वीडियो के साथ दी गयी Description अवश्य देखें जो आपको कमेंट करने में सहायक हो सकती है। एक और निवेदन कर रहे हैं कि जब भी कोई लेख य वीडियो देखते हैं तो like बटन के अवश्य प्रेस करें क्योंकि असाधारण सा प्रतीत होती है कि कमैंट्स तो 400 हैं और likes केवल 40 

तो चलते है आज के ज्ञानप्रसाद की ओर :   

सारांश:

मन:संयम एक वीर पुरुष के लिए भी सदैव से कठिन कार्य रहा है ; किन्तु वह असम्भव नहीं है। उसके लिए सुनिर्दिष्ट उपाय हैं। 

मन:संयम का सारा रहस्य श्रीकृष्ण ने ‘अभ्यास ‘ और ‘ वैराग्य ‘ इन दो शब्दों में व्यक्त कर दिया है। 

इन दोनों को जीवन में उतारने के लिए हमें मन:संयम हेतु दृढ़ इच्छाशक्ति का विकास करना चाहिए; हमें अपने मन का स्वभाव समझना चाहिए; हमें कुछ प्रक्रियाएँ जान लेनी चाहिए  और उनका अभ्यास करना चाहिए। 

इच्छाशक्ति को दृढ़ करने के लिए हमें अपनी सुखभोग की स्पृहा पर विजय पानी पड़ती है तथा यह भी समझ लेना पड़ता है कि मनोनिग्रह में किस बात की आवश्यकता है।

हिन्दू- दृष्टिकोण के अनुसार मन का स्वभाव  विवेकानन्द-साहित्य में समझाया गया है। 

मनोनिग्रह में समर्थ होने के लिए  हमें यह जानना आवश्यक है कि अपने कार्य को अनावश्यक रूप से कठिन होने से कैसे बचायें। मन:संयम सम्बन्धित मनुष्य का व्यक्तिगत कार्य है। मन:संयम का लक्ष्य ईश्वर के साथ  अपने पूर्ण एकत्व का अनुभव करना है। इसके लिए कोई भी कीमत कम ही है। 

मनोनिग्रह की साधनाओं का प्रभावी रूप से अभ्यास करने में  समर्थ होने के लिए हमें एक अनुकूल आभ्यन्तरिक वातावरण की आवश्यकता होती है।  जीवन की कतिपय बातों को अपरिहार्य मानकर चलने का सामर्थ्य भी इसी के अन्तर्गत आता है। 

मन:संयम के लिए हमें दो प्रकार के भीतरी अनुशासनों की आवश्यकता होती है: एक, मन को स्वस्थ सामान्य दिशा प्रदान करने के लिए और दो, आपातकालीन स्थिति में हमारी रक्षा के लिए। 

मन जितना शुद्ध होगा, उसे वश में करना उतना ही सरल होगा।  अतएव हमें मन को शुद्ध करने की  साधनाओं का अभ्यास करना होगा। अपने भीतरी स्वभाव में  सत्व की प्रधानता लाना और  तत्पश्चात प्रामाणिक साधनाओं के अनुसार सत्व को शुद्ध करके लांघ जाना -यही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। पर इसको साधने का सबसे सरल उपाय है सत्संग। 

वेदान्तिक साधनाओं को अधिक फलप्रद बनाने के लिए उनके साथ महर्षि पतंजलि द्वारा उपदिष्ट योग-साधनाएँ जोड़ी जा सकती हैं। 

योग की साधनाओं के अभ्यास के साथ ही विवेक का अभ्यास भी चलना चाहिए।  तभी हम मन को वर्तन सिखलाने में समर्थ हो सकेंगे। जब मन वर्तन करना सीख लेता है, तो इन्द्रियाँ भी यह सीख लेती हैं कि  अपने विषयों के सम्पर्क में आने से कैसे बचा जाय तथा मन की आज्ञा का पालन कैसे किया जाय। तब प्रत्याहार में हमारी स्थिति हो जाती है। 

प्रमुख साधनाओं के सफल अभ्यास में उल्लेखनीय सहायता प्रदान करने वाले और भी   कई  अनुषांगिक उपाय होते हैं, जिनकी ओर हमें ध्यान देना चाहिए। ये उपाय हैं -अपने मानवीय सम्बन्धों को ठीक रखना, मन को स्वस्थ रूप से सक्रिय बनाये रखना , कल्पना का सम्यक् उपयोग करना और हताशा से बचना। 

ध्यान के अभ्यास से मनोनिग्रह में बड़ी सहायता मिलती है और मनोनिग्रह ध्यान में सहायक होता है। 

भीतर की विस्फोटक परिस्थितियों में उच्चशक्ति सम्पन्न आपातकालीन रोक लगाने के लिए पतंजलि की शिक्षा यह है: विपरीत विचारों को उठाने का अभ्यास करो।  भगवान के नाम का अनवरत जप और कीर्तन करो और उनकी शरण में चले जाओ।

प्रणाली बद्ध रूप से विचार का संयम करना  मनोनिग्रह का एक बड़ा रहस्य है। 

अवचेतन को बिना वश में किये  मन को वश में नहीं किया जा सकता है। मन में मानो पवित्र विचारों को ढालते हुए तथा प्राणायाम एवं भक्ति आदि की साधना करते हुए अवचेतन मन को निग्रह में लाया जा सकता है।  इससे मनुष्य में निहित कुण्डलिनी रूपी आध्यात्मिक शक्ति जाग उठती है। 

हम हानिप्रद कल्पना से सावधान रहें। केवल इस क्षण के लिए पूरी तरह नैतिक होने से और फिर दूसरे क्षण  उस दूसरे क्षणभर के लिए नैतिक होने से हम हानिकारक कल्पनाओं से बच सकते हैं। मनोनिग्रह में विश्वासी व्यक्ति लाभ में रहते हैं। 

मनोनिग्रह का सबसे सरल और अचूक उपाय है ईश्वर पर अनुराग। 

जो ईश्वर में  विश्वास नहीं करते, वे पुरुषार्थ  के  द्वारा गुणों  को लांघकर मन: संयम  कर ले सकते हैं। 

मन:संयम महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि  यह उच्चतम मंगल की -आत्मा की ज्ञानमय अवस्था की प्राप्ति कराता है। 

धन्यवाद् ,जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

अगला ज्ञानप्रसाद – गुरुदेव के शिरोमणि शिष्य शुक्ला  बाबा की वीडियो  

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24 आहुति संकल्प सूची :

15  दिसंबर के  ज्ञानप्रसाद के अमृतपान उपरांत आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की 9 समर्पित दिव्य आत्माओं ने विचार परिवर्तन हेतु अपने विचारों की हवन सामग्री से कमेन्ट्स रूपी आहुति डाल कर 24 आहुतियों का संकल्प  पूर्ण किया है। वह महान वीर आत्माएं निम्नलिखित हैं:  (1) सरविन्द कुमार पाल -25, (2) रेनू श्रीवास्तव बहन जी -34, (3 ) डा.अरुन त्रिखा-30, (4 ) अरूण कुमार वर्मा जी – 26, (5 ) संध्या बहन जी-27, (6 ) प्रेरणा कुमारी बेटी-30, (7 ) कुसुम बहन जी-24, (8 ) अनिल मिश्रा  जी-26, (9 ) बेटा धीरप सिंह-24

उक्त सभी दिव्य आत्माओं को हम सब की ओर से  ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ व  बधाई हो और आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ भगवती गायत्री माता दी की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे।  आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरु सत्ता से विनम्र प्रार्थना एवं  मंगल कामना है l

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अध्याय 30. मनोनिग्रह का सबसे सरल और अचूक उपाय  

15  दिसंबर 2021  का ज्ञानप्रसाद – अध्याय 30. मनोनिग्रह का सबसे सरल और अचूक उपाय      

आज का ज्ञानप्रसाद केवल दो ही  पन्नों का है। मनोनिग्रह के विषय पर पिछले कई दिनों से हम स्वाध्याय कर रहे हैं। आज का अध्याय इस श्रृंखला का अंतिम अध्याय है जिसमें हम देखेंगें  कि मनोनिग्रह का सबसे अचूक उपाय ईश्वर भक्ति में रमना, ईश्वर से प्यार करना और अभ्यास करना ही है। कल वाले ज्ञानप्रसाद में हम सारे अध्यायों का सारांश  प्रस्तुत करेंगें और  ज्ञान से भरपूर इस अद्भुत  श्रृंखला की  इतिश्री करेंगें। ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार आदरणीय अनिल मिश्रा जी का ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं।      

मनोनिग्रह विषय की  30 लेखों की अद्भुत श्रृंखला आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के स्वाध्याय पर आधारित हैं । ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  रामकृष्ण मिशन मायावती,अल्मोड़ा के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी का आभारी है जिन्होंने  यह अध्भुत  ज्ञान उपलब्ध कराया। इन लेखों का  सम्पूर्ण श्रेय इन महान आत्माओं को जाता है -हम तो केवल माध्यम ही हैं।

ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार के  योजनाबद्ध टाईमटेबल में कुछ परिवर्तन :

पिछले “अपनों से अपनी बात” segment में हमने सहकर्मियों के साथ  शेयर  किया था कि मनोनिग्रह लेखों की शृंखला के बाद हम प्रेरणा बिटिया की दो ऑडियो बुक्स अपलोड करेंगें ,लेकिन अब इन ऑडियो बुक्स को 20 दिसंबर के ज्ञानप्रसाद में शामिल किया जायेगा।  ऐसा करने का कारण है कि हमारी सबकी स्नेहिल प्रेरणा बिटिया का शुभ जन्मदिवस 20 दिसंबर को है और हमें  अपनी शुभकामनायें प्रदान करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। यह शुभ सूचना आज ही बिटिया ने फ़ोन करके बताई है। 

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तो आइये चलें आज के लेख की ओर :    

मनोनिग्रह का सबसे सरल और अचूक उपाय 

हमने मनोनिग्रह के कुछ उपायों पर चर्चा की है। पर एक सत्य को फिर से दुहराया जा सकता है। श्रीरामकृष्ण और श्रीमाँ सारदा इन दोनों ने इस सत्य पर बड़ा जोर दिया है। श्रीरामकृष्ण कहते हैं:

“जिन लोगों का मन इन्द्रिय- विषयों में आसक्त है, उनके लिए सबसे उत्तम यही है कि वे द्वैतवादी दृष्टिकोण अपनाये और भगवान् के नाम का ‘नारद- पंचरात्र’ के निर्देशानुसार जोरों से कीर्तन करें।

एक दूसरे अवसर पर श्रीरामकृष्ण ने एक भक्त से कहा था :

“भक्ति-पथ के द्वारा इन्द्रियाँ शीघ्र और स्वाभाविक रूप से नियन्त्रण मे आती हैं। जैसे-जैसे तुम्हारे हृदय में ईश्वरीय-प्रेम बढेगा, वैसे- वैसे तुम्हें दुनिया के सुख अलोने मालूम पड़ेंगे।जिसदिन अपना बच्चा मर गया हो, उसदिन देह का सुख क्या पति और पत्नी को आकर्षित कर सकता है?” 

भक्त: “पर मैंने ईश्वर को प्यार करना तो सीखा ही नहीं ?” 

श्रीरामकृष्ण: “सतत् उनका नाम लो। इससे तुम्हारा सारा पाप, काम और क्रोध धुल जायेगा तथा दैहिक- सुखों की लालसा दूर हो जायेगी।

भक्त: “पर मुझे उनके नाम में तो कोई रस नहीं मिलता।”

श्रीरामकृष्ण: “उन्हीं के पास व्याकुल होकर प्रार्थना करो, जिससे तुममें उनके नाम के लिए रुचि उत्पन्न हो। उनसे कहो – प्रभो मुझे तुम्हारे नाम में कोई रुचि नहीं होती है -। तुम देखोगे, वे अवश्य ही तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करेंगे। यदि सन्निपात का रोगी भोजन का सारा स्वाद गंवा बैठे, तो उसके बचने की आशा नहीं। पर यदि वह भोजन में तनिक भी रस लेता है, तो तुम उसके अच्छे होने की आशा रख सकते हो। इसीलिए मैं कहा करता हूँ – उनके नाम में रस का अनुभव करो। कोई भी नाम ले लो -दुर्गा, कृष्ण, चाहे शिव। यदि दिनों-दिन तुम अपने भीतर उनके नाम के प्रति अधिकाधिक आकर्षण अनुभव करो और तुम्हें अधिक आनन्द मिलने लगे, तो फिर डरने की कोई बात नहीं. सन्निपात को दूर करना ही होगा; देखोगे, तुम पर उनकी कृपा अधिक बरसेगी। 

यही सत्य श्रीमाँ सारदा देवी के जीवन और उपदेशों से भी समान शक्ति के साथ ध्वनित होता है:

श्रीमाँ अपने खाट पर बैठी हुई थीं। शिष्य भक्तों से आयीं चिट्ठियाँ उन्हें पढ़कर सुना रहा था। चिट्ठियों में कुछ ऐसे कथन थे – मन को वश में नहीं किया जा सकता आदि आदि। श्रीमाँ ने इन पत्रों को सुना और आवेगभरे स्वर में कहने लगीं: “यदि कोई रोज पन्द्रह-से-बीस हजार का जप करता है, तो मन स्थिर होता है। यह बिल्कुल सत्य है। मैंने स्वयं इसका अनुभव किया है। पहले ये लोग इसका अभ्यास तो करें और यदि असफल हो जायँ तो भले ही शिकायत करें। भक्तिपूर्वक जप का अभ्यास करना चाहिए पर यह तो करेंगे नहीं ; वे करेंगे कुछ नहीं और केवल शिकायत करते रहेंगे- मैं सफल क्यों नहीं हो रहा हूँ ?”

श्रीमाँ ने मन को वश में करने का यह जो उपाय बताया है, उससे सरल और सशक्त उपाय और कोई भी नही है। पर इसको सरल हृदय से स्वीकार करना चाहिए और इसका अभ्यास करना चाहिए। हम स्वयं अपने तंई श्रीमाँ के इन शब्दों की परीक्षा कर लें और देखें कि हमारे जीवन में उनकी बातें सत्य घटित हैं या नहीं। किन्तु यहाँ पर एक चेतावनी अवश्य दे देनी चाहिए कि जो अभी-अभी साधना प्रारंभ कर रहा है, उसके लिए अचानक एक दिन में बीस हजार बार भगवान् के नाम का ज्ञान करना उचित नहीं है। साधक को सामान्य रूप से यथासंभव संख्या लेकर प्रारम्भ करना चाहिए और नियमित अभ्यास करते हुए, गुरू के निर्देशानुसार, उसे धीरे-धीरे बढ़ाते जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि अभी से ठीक दिशा में कुछ करना प्रारंभ कर देना चाहिए। 

ईश्वर के समीप नियमित समय पर प्रतिदिन सत्प्रवृत्ति और मन की शुद्धता के लिए आकुल प्रार्थना बड़ी सहायक होगी। मन की शुद्धता और मन की निरूद्ध अवस्था ये दोनों एक ही है। श्रीरामकृष्ण कहते हैं कि हृदय से निकली हुई प्रार्थना का उत्तर प्राप्त होता है। ज्यों-ज्यों प्रार्थना का हमारा अभ्यास तीव्र होता है, तो एक परिणाम दृष्टिगत होगा। क्रमशः हम देखेंगे कि हमारी प्रार्थना का स्वरूप बदलता रहा है: पहले वह अधिक वस्तु-केन्द्रित थी , अब वह अधिक ईश्वर- केन्द्रित हो गयी है. हमारी रुचि ईश्वर से मांग की जानेवाली वस्तु में केन्द्रित न होकर, अब ईश्वर में अधिक केन्द्रित हो गयी है। ईश्वर के प्रति यह प्रेम ही मन के निग्रह में सबसे महत्वपूर्ण अंग है। 

प्रारंभ में ऐसा लग सकता है कि हमारे हृदय में वह प्रेम बिल्कुल है ही नहीं और यदि है तो बिल्कुल अस्पष्ट सा। पर सत्संग, भगवन्नाम का जप, सन्त- महापुरुषों के जीवन और उपदेशों का अध्ययन, विधिपूर्वक पूजा-उपासना तथा भजन-कीर्तन आदि से यह प्रेम क्रमशः बढ़ाया जा सकता है। जब वह एक प्रबल शक्ति के रूप में हमारे भीतर खड़ा हो जाता है, तो हम मन:संयम की बाधक शक्ति को सरलतापूर्वक परास्त करने में समर्थ हो जाते हैं। व्यक्ति के जीवन में एक ऐसा समय आता है, जब मन अपने ही आप हमारे परम-प्रेम के विषय की ओर झुकने लगता है। मन की ऐसी अवस्था में आनन्द की उपलब्धि होती है। जब हम इस अवस्था में दृढ़ रूप से स्थित हो जाते हैं, तो अपने ही आप मन का निग्रह हमारे लिए सध जाता है। 

अतः मन को नियंत्रित कैसे करें, इस प्रश्न का सबसे पूरा उत्तर यह है: ईश्वर से प्यार करो। पर यदि तुम ईश्वर में विश्वास नहीं करते, तो अपने आप पर विश्वास करो। अपनी इच्छाशक्ति का सहारा लेकर पुरुषार्थ के द्वारा गुणों को लांघ जाओ। इस तरह से भी तुम मनोनिग्रह करने में समर्थ होंगें। 

किसी भी दशा में चाहे कोई ईश्वर में विश्वासी हो या अविश्वासी, मनोनिग्रह का एक न एक उपाय सदैव खुला रहता है। जीवन में मन: संयम की अवस्था से बढ़कर और कोई मंगल नहींं। हम इस अवस्था को पाने के लिए यथासंभव प्रयास करें, क्योंकि यही तो हमें सर्वोच्च मंगल की ओर ले जायेगी। 

धन्यवाद् ,जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

अगला लेख : सारांश 

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24 आहुति संकल्प सूची :

14 दिसंबर के  ज्ञानप्रसाद के अमृतपान उपरांत आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की  12  समर्पित दिव्य आत्माओं ने विचार परिवर्तन हेतु अपने विचारों की हवन सामग्री से कमेन्ट्स रूपी आहुति डाल कर 24 आहुतियों का संकल्प  पूर्ण किया है। वह महान वीर आत्माएं निम्नलिखित हैं:  (1) सरविन्द कुमार पाल – 46, (2) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 28, (3) सुमन लता बहन जी – 27, (4) डा.अरुन त्रिखा जी – 26, (5) अरूण कुमार वर्मा जी – 26, (6) संध्या बहन जी – 26, (7) प्रेरणा कुमारी बेटी – 25, (8) कुसुम बहन जी – 25, (9) उमा सिंह बहन जी – 25, (10) नीरा त्रिखा बहन जी – 24, (11) रजत कुमार जी – 24, (12) लता गुप्ता बहन जी – 24

उक्त सभी दिव्य आत्माओं को हम सब की ओर से  ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ व  बधाई हो और आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ भगवती गायत्री माता दी की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे।  आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरु सत्ता से विनम्र प्रार्थना एवं  मंगल कामना है l

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अध्याय  28.मन  के  छल  से  सावधान  29.मन: संयम में ईश्वर-विश्वासी लाभ में रहते हैं।

14  दिसंबर 2021  का ज्ञानप्रसाद – अध्याय  28.मन  के  छल  से  सावधान  29.मन: संयम में ईश्वर-विश्वासी लाभ में रहते हैं। आज का ज्ञानप्रसाद केवल डेढ़ ही पन्नों का है। अध्याय 28 और 29 दोनों हैं  तो  बहुत ही छोटे  लेकिन ज्ञान और सन्देश की दृष्टि से  बहुत ही बड़े हैं। मन को अक्सर कपटी ,छलिया ,चंचल ,दर्पण आदि की परिभाषाएँ  देकर बदनाम किया गया है लेकिन जब हम पिछले कई दिनों से मनोनिग्रह पर चर्चा कर रहे हैं, अब तक इतना अनुभव तो अवश्य ही हो गया होगा कि यह सब हमारी अपनी ही धारणा  है। मन के छल -कपट से बचने की स्थिति में हम अक्सर सोच कर भयभीत होते रहते हैं कि “अगर ऐसा हो गया तो क्या होगा”  अर्थात हम कल के बारे में  सोचने पर विवश  हो जाते हैं – इसका परिणाम यह होता है कि हम अपना “आज” यानि वर्तमान ख़राब कर देते हैं। तो मैसेज यही हुआ “ Try to live for today only” इसी परिपेक्ष्य में हमारा आज का कमेंट अवश्य पढ़ें, हो सकता है कई वरिष्ठ सहकर्मी 5-6 दशक पुरानी  रोमांचकारी यादों का आनंद उठा सकें।      

आजकल प्रकाशित किये जा रहे ज्ञानप्रसाद, मनोनिग्रह विषय की  30 लेखों की अद्भुत श्रृंखला आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के स्वाध्याय पर आधारित हैं । ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  रामकृष्ण मिशन मायावती,अल्मोड़ा के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी का आभारी है जिन्होंने  यह अध्भुत  ज्ञान उपलब्ध कराया। इन लेखों का  सम्पूर्ण श्रेय इन महान आत्माओं को जाता है -हम तो केवल माध्यम ही हैं।

प्रस्तुत है आज का ज्ञानप्रसाद :

मन  के  छल  से  सावधान:

हमें जान  रखना चाहिए कि कभी कभी मन  अपने  साथ  छल करता है, यानि   अवचेतन मन   चेतन मन  से  कपट  करता है।  जब  हम  चेतन  स्तर  पर  किसी   पर  किसी  प्रलोभन  या  दुर्बलता  से  संघर्ष  करते  होते  हैं,  तो  अचानक  हमारे  मानसपटल  पर  एक अधिक  दुर्दशापूर्ण  अवस्था का   चित्र  कौंध  जाता  है और  हम  भयभीत  होकर  हैरत  में पड़ जाते हैं: ‘ऐसी  कठिनाइयाँ  अगर  मुझे  घेर  लें,   तो   मैं  क्या  करुँगा? ‘   अपने  भविष्य  की  चिन्ता  करने से हम  वर्तमान  को  गँवा  बैठते हैं। असावधान  रहने  के  कारण  हम  वर्तमान  के  प्रलोभन  द्वारा  बहा  लिये  जाते  हैं। 

हम इस  तोड़फोड़ से अपनी रक्षा  कैसे  करें?  हम  काल सम्बन्धी  अपनी धारणा को स्पष्ट  बनाकर  ऐसा  कर  सकते हैं। जर्मन रहस्यवादी     मीस्टर एकहार्ट     का  कथन  है: ‘इस  क्षण  के  हृदय  में  शाश्वत  समाया  हुआ है। ‘  हमें स्पष्ट रूप से देखना  चाहिए कि   हर क्षण  केवल  ‘यह  क्षण’  ही  है।   यदि हमने   इस  क्षण  की  जिम्मेदारी  निभा ली, तो  हमने  समस्त  भविष्य   की  भी  जिम्मेदारी  निभा  ली। यदि  हम इस  क्षण  प्रलोभन के  फेर  में  नहीं  पड़ते हैं तो  हम कभी भी  उसके  फेर  में  नहीं  पड़ेंगे। 

अतएव  परिस्थिति  चाहे  जैसी  हो,   हम    इस  क्षण  अपने  संकल्प  में  दृढ़  रहें   और  हमें  सफलता   मिलेगी  ही।   भविष्य   माया   को  छोड़कर   कुछ  नहीं  है।   जब  शैतान   हमारे  वर्तमान  को  खा  जा  रहा  है,   तो  उसे  बचाना  छोड़  भविष्य  की  चिंता  करना   केवल   मूर्खता  ही   है।  

आध्यात्मिक जीवन  की  चुनौती बड़ी  सरल  है और  वह  यह  कि    केवल  इस  क्षण  के  लिए  हम  भले, यथार्थ  में   नैतिक,  और अपने आप  के  स्वामी  बन जायँ।  भला इस  क्षण के   बाहर  दूसरा  समय  है  कहाँ , जिसकी  हम  चिन्ता  करें ? 

मन: संयम में ईश्वर-विश्वासी लाभ में रहते हैं:

जहाँ तक मन: संयम का प्रश्न है, जो ईश्वर में विश्वास करते हैं उन्हें उनकी अपेक्षा एक स्पष्ट  लाभ होता है जो  ईश्वर में  विश्वास  नहीं  करते। जब  ईश्वर में  विश्वास  पैदा करने का  हृदय से अभ्यास किया जाता है, तो मन के संयम  में  हमें  सशक्त  सहायता  मिलती है।   भक्ति  के  अभ्यास द्वारा  ईश्वर के लिए अनुराग बढ़ता है; और  ईश्वर  के  प्रति  यह  अनुराग   मन: संयम  की  बाधाओं  को    दूर  करने का  आश्चर्यजनक काम  करता है।  श्रीरामकृष्ण  के  शब्दों में :

“बाघ जैसे  दूसरे पशुओं को खा जाता है, वैसे ही  ‘अनुराग रूपी बाघ ‘ काम- क्रोध आदि रिपु को खा जाता है।  एक बार ईश्वर पर अनुराग  होने से फिर  काम-क्रोध आदि नहीं रह जाते।   गोपियों  की  ऐसी  ही  अवस्था  हुई  थी।  श्रीकृष्ण  पर  उनका  ऐसा ही  अनुराग  था।” 

जब काम,  क्रोध, आदि अन्य  रिपु  दूर  होते  हैं, तो  मन  शुद्ध  हो  जाता है।   शुद्ध मन  सरलतापूर्वक नियंत्रण में आ जाता है।   पर  अविश्वासी  को  बड़ी कठोर  और  लम्बी मेहनत करनी पड़ेगी, क्योंकि   जबतक वह अपना अविश्वास  नहीं  छोड़ता, ईश्वर के लिए  उसमें  अनुराग  नहीं  पेदा  हो  सकता।   श्रीकृष्ण  उपदेश  करते हैं:

मेरा  जो भक्त अभी  जितेन्द्रिय नहीं  हो सका है और  संसार  के  विषय  जिसे  बार-बार बाधा पहुंचाते रहते हैं–अपनी ओर  खींच  लिया  करते हैं, वह  भी  मेरी प्रगल्भ भक्ति के प्रभाव से प्राय: विषयों  से   पराजित  नहीं  होता।”

ईश्वर-विश्वासी  के जीवन में  मन  की  पवित्रता जिस  मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया में से  होकर आती है,वह सरल है। जब  उसमें  ईश्वर के प्रति  अनुराग  उत्पन्न होता है, तब उसका  मन  उसी  पर  रमता  रहता है  क्योंकि हम  स्वाभाविक ही  अपने  प्रेमास्पद में  रम  जाते हैं।  हमारा  मन  जिस पर केन्द्रित होता है, हम उसके गुणों  को  आत्मसात् कर लेते हैं।   अतएव  हम  जब  ईश्वर पर   अपने  मन  को  केन्द्रित करते हैं, तो गीता  की  भाषा में, हम अपने भीतर  दैवी- सम्पद्    को  आत्मसात् करते हैं।   हृदय की पवित्रता, इन्द्रियों का दमन, क्रोध का  अभाव,  मन  की  प्रशान्ति और बुद्धि की स्थिरता  ये दैवी सम्पदों में से कुछ  सम्पद्  हैं, जिनकी प्राप्ति  ईश्वर  का  एक  सच्चा भक्त बिना  किसी  विशेष प्रयत्न के  कर  लेता है।  दूसरे शब्दों में  वह  अपने आप  ही  मन  पर  नियंत्रण पा  लेता  है।

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24 आहुति संकल्प सूची:

13 दिसंबर 2021 के ज्ञानप्रसाद के अमृतपान उपरांत आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की  8 समर्पित दिव्य आत्माओं ने विचार परिवर्तन हेतु अपने विचारों की हवन सामग्री से कमेन्ट्स रूपी आहुति डाल कर 24 आहुतियों का संकल्प  पूर्ण किया है। वह महान वीर आत्माएं निम्नलिखित हैं: (1) सरविन्द कुमार पाल – 32, (2) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 30, (3) नीरा बहन जी – 28, (4) अरूण कुमार वर्मा जी – 27, (5) संध्या बहन जी – 26, (6) डा.अरुन त्रिखा जी – 24, (7) रजत कुमार जी – 24, (8) प्रेरणा कुमारी बेटी –

उक्त सभी दिव्य आत्माओं को हम सब की ओर से  ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ व  बधाई हो और आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ भगवती गायत्री माता दी की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे।  आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरु सत्ता से विनम्र प्रार्थना एवं  मंगल कामना है l धन्यवाद l

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अध्याय  27. अवचेतन मन का संयम भाग  2   

13   दिसंबर 2021  का ज्ञानप्रसाद – अध्याय  27. अवचेतन मन का संयम भाग  2   

आज का ज्ञानप्रसाद केवल दो ही पन्नों का अध्याय 27 का द्वितीय भाग है। भाग 1 में हमने  अचेतन (unconscious), चेतन(conscious), अवचेतन( subconscious) एवं अतिचेतन (superconscious) मन को समझने का प्रयास किया। हमारे सूझवान पाठकों ने हर बार की तरह इस लेख को भी बहुत सराहा। आदरणीय JB Paul जी ने  तो सराहना में यहाँ तक लिख दिया कि “यह लेख मेरे लिए ही लिखा है, मेरे मनरुपी  दवात की स्याही धीरे -धीरे साफ़ हो रही है।” आज के लेख के  अंतिम वाक्यों में कर्मयोग की कठिनता और भक्तियोग की सरलता की बहुत ही संक्षिप्त चर्चा है। 

आजकल प्रकाशित किये जा रहे ज्ञानप्रसाद, मनोनिग्रह विषय की  30 लेखों की अद्भुत श्रृंखला आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के स्वाध्याय पर आधारित हैं । ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  रामकृष्ण मिशन मायावती,अल्मोड़ा के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी का आभारी है जिन्होंने  यह अध्भुत  ज्ञान उपलब्ध कराया। इन लेखों का  सम्पूर्ण श्रेय इन महान आत्माओं को जाता है -हम तो केवल माध्यम ही हैं।

आज का  लेख आरम्भ करने  से पूर्व हम अपने सहकर्मियों के साथ एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति साँझा कर रहे हैं। हमारे आदरणीय एवं परमप्रिय सहकर्मी अरुण कुमार वर्मा जी के  मोटरबाइक स्किड होने से दाईं टाँग में दो fracture आये हैं। आज प्रातः आँख खुले ही इस दुर्भाग्यपूर्ण मैसेज  को देख लिया था लेकिन बाद में लगभग 42 मिंट बात करके सारी जानकारी प्राप्त की।  पलस्तर लगा हुआ है जो लगभग  6 सप्ताह तक रहेगा। हम सभी सहकर्मियों से निवेदन करते हैं कि प्रतिदिन एक माला गायत्री मन्त्र की अवश्य करें और  परमपूज्य गुरुदेव से उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रार्थना करें। ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार का सदैव कर्तव्य रहा है कि चाहे वह विनीता जी की बहिन हो य प्रेम शीला मिश्रा जी की बेटी हो ,य कोई भी सहकर्मी हो हमारे अन्तःकरण से निकली भावना उन सभी तक  अवश्य  पहुंचे।

प्रस्तुत है आज का ज्ञानप्रसाद :                           

पर  ‘अचेतन’  के  संयम  से  हमारा  पूरा  कार्य   नहीं  बन  जाता।   उससे  भी  अधिक  कुछ  है।  अत:  स्वामी विवेकानन्द  कहते हैं:

“अचेतन  को  अपने  अधिकार  में  लाना  हमारी  साधना  का  पहला  भाग है।    दूसरा है  चेतन  के  परे  जाना।   जिस  तरह  चेतन  अचेतन  के  नीचे  उसके  पीछे  रहकर  कार्य  करता  है,  उसी  तरह  चेतन  के  ऊपर  उसके  अतीत  भी  एक  अवस्था  है।  जब  मनुष्य  इस   अतिचेतन  अवस्था  को  पहुँच  जाता  है, तब  वह  मुक्त  हो  जाता  है, ईश्वरत्व  को  प्राप्त  हो  जाता है।  तब  मृत्यु  अमरत्व  में  परिणत  हो  जाती  है, दुर्बलता    असीम  शक्ति  बन  जाती  है  अतिचेतन  का  यह  असीम  राज्य  ही  हमारा  एकमात्र  लक्ष्य है।” 

इस विषय में  अपनी   शिक्षा  को  और  भी शक्तिशाली  ढंग   से  खोलते  हुए,  वे  कहते हैं:

“अतएव  यह  स्पष्ट   है कि   हमें  दो  कार्य  अवश्य   ही  करने  होंगे।    एक  तो  यह  कि   ‘इड़ा  और  पिंगला’  के  प्रवाहों  का  नियमन कर    अचेतन  कार्यों  को  नियमित  करना; और  दूसरा,  इसके  साथ  ही  साथ  चेतन  के भी  परे  चले  जाना।”

ग्रन्थों में कहा है कि   योगी  वही  है  जिसने  दीर्घकाल  तक  चित्त  की   एकाग्रता  का  अभ्यास करके    इस  सत्य  की  उपलब्धि कर  ली  है। अब  सुषुम्ना  का  द्वार  खुल  जाता  है  और इस  मार्ग  में  वह  प्रवाह  प्रवेश  करता  है  जो  इसके  पूर्व  इसमें  कभी नहीं  गया  था, वह  ( जैसा  की  अलंकारिक भाषा में कहा है)  धीरे धीरे  विभिन्न  कमल चक्रों  में से  होता  हुआ,  कमल दलों  को  खिलाता  हुआ, अन्त  में  मस्तिष्क  तक  पहुँच  जाता है।   तब  योगी  को  अपने  सत्य स्वरूप का  ज्ञान  हो  जाता है, वह  जान  लेता  है कि  वह  स्वयं  परमेश्वर  ही  है। 

यहाँ  पर  राजयोग  के  माध्यम से  प्राणायाम  के  द्वारा   कुणडलिनी  को  जगाने का  उल्लेख हुआ है। यह  प्राणायाम  मन  के  संयम  में सहायक  होता है। जैसा  हम ऊपर  कह चुके हैं, इस  प्राणायाम  की  शिक्षा  किसी  जानकार और  पटु  शिक्षक  से  ग्रहण  करनी  चाहिए।   पर  ऐसे  शिक्षक  का  मिलना  सरल  नहीं  है।  जो  यथार्थ  में साधक  हैं और  संयमी  हैं और  जिन्हें  भाग्य से  ऐसा शिक्षक  प्राप्त  हो  गया है, वे  उससे  प्राणायाम  सीख  सकते हैं।   इससे  उनका  मनोनिग्रह  का कार्य सरल हो  जायेगा।   किन्तु  ऐसे  लोगों की  संख्या  अधिक  है  जो  अपने  मन  से  संघर्ष  करते  रहते हैं और  उसे  अपने  वश  में  करना  चाहते हैं   पर  जिन्हें  प्राणायाम  के  अभ्यास के लिए   न  तो  अनुकूल  वातावरण -धुआं  तथा  कुहरे  से  भरे  शहरों  से   अलग स्थान- मिलता है और   न किसी  निपुण  शिक्षक  से    वह  सब  सीखने  का  अवसर ही प्राप्त  होता है।  इसलिए  उनमें  से  बहुतों  को    दूसरी  साधनाओं  पर  निर्भर  रहना चाहिए जो  श्रद्धा और  अध्यवसाय के साथ  की  जाने  पर  समान रूप से ही  प्रभावी  होती है।   इन  साधनाओं  में    ऊँँ      के  अर्थ  का  ध्यान   करते  हुए  उसका  जप  करना    सबसे  अधिक  फलदायी  है।  

जब  किसी  व्यक्ति  की  कुण्डलिनी   जग  जाती है,  तो  अवचेतन मन के संयम का  कठिन  कार्य  भी  अपनेआप  सध  जाता है।  पर  सच  तो  यह  है कि राजयोग  के  माध्यम से कुण्डलिनी  को  जगाने  का  अभ्यास  अधिकांश  लोगों के द्वारा  सहज  ही  नहीं  किया  जा  सकता। 

सौभाग्य से  दूसरी अन्य  साधनाएँ भी हैं, जिनके  अभ्यास से  मनुष्य की  आध्यात्मिक  चेतना  को  जगाया  जा  सकता है। श्रीरामकृष्ण  उपदेश देते हैं:

“केवल  पुस्तक  पढ़ने  से  चैतन्य  नहीं  होता।  भगवान  को  पुकारना  चाहिए।   व्याकुल  होने पर  कुल-कुण्डलिनी  जाग्रत  होती है। भक्तियोग  से  कुल -कुण्डलिनी  शीघ्र  जाग्रत  होती  है।”

एक दिन  किसी  शिष्य  ने  स्वामी   ब्रह्मानन्द  से पूछा: “महाराज, कुण्डलिनी  को  कैसे  जगाया  जाता   है?”

उन्होंने  उत्तर  दिया:

“कुछ  लोग  कहते हैं कि  उसके  लिए  कुछ  प्रक्रियाएँ हैं, पर   मैं  मानता  हूँ कि    भगवन्नाम  के  जप  और  ध्यान  के  द्वारा    यह  सबसे  अच्छा  सध  सकता  है।   हमारे  इस  युग  के लिए  जप  का  अभ्यास   और  ईश्वर  का  ध्यान  विशेष  अनुकूल है।  इससे  बढ़ कर   सरल  साधना  और  नहीं  है।    पर   स्मरण  रखो,  मन्त्र  के  जप  के  साथ साथ  ध्यान भी  अवश्य चलना  चाहिए।” 

इस प्रकार  भक्तियोग के माध्यम से प्रार्थना, भगवन्नाम  का  जप  और  ध्यान  आदि के द्वारा  हमारी  आध्यात्मिक  संभावनाएँ   प्रकट  हो  जाती  हैं।   इससे  अवचेतन  मन  की  गड़बड़ियाँ  अपने  आप  ठीक  होने  लगती  हैं।   अत:  किसी को   यह  सोचकर  हताश  नहीं  होना  चाहिए कि  राजयोग  का  अभ्यास  करने  में  समर्थ  न  होने के  कारण    उसके लिए  अवचेतन मन  को  नियंत्रण में  लाने  का  रास्ता  बन्द  हो  गया है।   संसार  में  इतना  असहाय  कोई  नहीं है कि वह  भगवन्नाम  का  जप  न  कर  सके।  यदि  कोई  है  तो  समझ  लेना चाहिए कि  उसके लिए  मनोनिग्रह  का  समय  अभी  नहीं  आया  है। 

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24 आहुति संकल्प सूची :

11 दिसंबर 2021 के प्रकाशित लेख में आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के 9 सूझवान व समर्पित नव सृजन सेनानियों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर मन और उसका निग्रह पर अपनी विजय पताका फहराकर हम सबका उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन कर मनोबल बढ़ाने का परमार्थ परायण कार्य किया है। निम्नलिखित  सभी सृजन सैनिकों  को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत-बहुत साधुवाद व  हार्दिक शुभकामनाएँ। सब पर आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ भगवती गायत्री माता  की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे यही आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरु सत्ता से विनम्र प्रार्थना व पवित्र शुभ मंगल कामना है। (1) नीरा बहन जी – 35, (2) सरविन्द कुमार पाल – 35, (3) अरूण कुमार वर्मा जी – 32, (4) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 26, (5) डा.अरुन त्रिखा जी – 25, (6) प्रेरणा कुमारी बेटी – 25, (7) रजत कुमार जी – 25, (8) संध्या बहन जी – 24, (9) कुसुम बहन जी – 24

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अध्याय 27. अवचेतन मन का संयम भाग  1  

 11   दिसंबर 2021  का ज्ञानप्रसाद – अध्याय  27. अवचेतन मन का संयम भाग  1  

आज का  ज्ञानप्रसाद भी कल वाले  ज्ञानप्रसाद की तरह कुछ बड़ा  (3 पन्नों का) है।  बहुत ही उत्तम जानकारी और शिक्षा से भरपूर इस लेख को भी अपने अन्तःकरण में उतारते हुए अभ्यास करने की आवश्यकता है।हमारा विश्वास है कि हमारे पाठकों को  आज के लेख में अचेतन (unconscious), चेतन(conscious), अवचेतन( subconscious) एवं अतिचेतन (superconscious) मन को समझने में सहायता मिलेगी। मनोनिग्रह विषय की  30 लेखों की इस अद्भुत  श्रृंखला में आज प्रस्तुत हैं  अध्याय 26   हर लेख की तरह आज भी हम लिखना चाहेंगें यह अद्भुत श्रृंखला आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के स्वाध्याय पर आधारित  प्रस्तुति है।ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  रामकृष्ण मिशन मायावती,अल्मोड़ा के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी का आभारी है जिन्होंने  यह अध्भुत  ज्ञान उपलब्ध कराया। इन लेखों का  सम्पूर्ण श्रेय इन महान आत्माओं को जाता है -हम तो केवल माध्यम ही हैं।  तो आइए चलें आज के लेख  की ओर : 

27. अवचेतन मन का संयम 

मन के चेतन और अवचेतन स्तरों के बीच निष्ठापूर्वक सीमारेखा खींचना कठिन है। तथापि व्यवहार में, हाथ में ली गयी समस्या का विचार करते समय इन शब्दों का उपयोग सुविधाजनक होगा। जिन अनुशासनों का पालन चेतन मन के संयम हेतु करना पड़ता है, वे अवचेतन मन को बिलकुल अछूता नहीं छोड़ सकते। इसका उल्टा भी सत्य है। फिर भी अभी तक जो हमने विचार किया, वह प्रत्यक्षतः चेतन स्तर से ही सम्बंधित है। 

अब हम अवचेतन मन के संयम पर आते हैं। वह चेतन स्तर पर किये गए कार्य का ही एक स्वाभाविक बढ़ाव है। हममें से सभी ने अपने जीवन में ऐसी घटना का अनुभव किया होगा कि हम जानते तो हैं कि ठीक क्या है, फिर भी हम उसका पालन नहीं कर पाते; इसी प्रकार हम जानते तो हैं कि गलत क्या है, फिर भी उससे विरत नहीं हो पाते। हम बहुत अच्छे-अच्छे संकल्प करते हैं, पर उनके प्रति सजग होने के पहले ही वे उसी प्रकार घुल जाते हैं, जैसे प्रचण्ड जलप्रवाह के सामने रेत का पूल। हम चकित, भ्रमित और हताश-से खड़े रह जाते हैं। 

इस अवस्था की जांच- पड़ताल हमें यह बतायेगी कि हम मन के चेतन भाग से तो संकल्प कर रहे हैं और हम ही उसके दूसरे भाग अवचेतन से उन संकल्पों को नष्ट कर दे रहे हैं। हम इस अवचेतन के सम