वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

सूर्य विज्ञान और गायत्री मंत्र के महत्वपूर्ण तथ्य  

परम पूज्य गुरुदेव ने हम सबके लिए “क्रंतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की रचना करते समय अवश्य सोचा होगा कि आने वाले दिनों में मेरे बच्चे बहुत व्यस्त हो जायेंगें,उनके पास मेरे द्वारा रचा गया विशाल साहित्य पढ़ने और समझने का कहाँ समय होगा !!! 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्ष 2026 के संकल्प का पालन करते हुए उस विशाल साहित्य को मथने के बाद प्राप्त हुए मक्खन का अमृतपान हो रहा है जिसका आठवां ज्ञानप्रसाद लेख प्रस्तुत किया गया है। 

पिछले लेख की ही तरह आज का लेख भी बड़े परिश्रम से Compile किया गया है, बहुत बड़ी चुनौती सामने खड़ी थी कि किसको शामिल किया जाए और किसको छोड़ा जाए। 

जो कुछ भी बन पाया,साथिओं के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। निवेदन है कि विषय बहुत ही विस्तृत है,जितना संभव हो सके समझने का प्रयास किया जाए,तभी हमारा प्रयास सार्थक होगा। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में गुरुचरणों में समर्पित होकर गुरुज्ञान के अमृतपान के लिए साथिओं को आमंत्रण है। 

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मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता ‘ऊर्जा’ पर अवलम्बित है। भोजन बनाने, ईंट, सीमेन्ट, रसायनें  विनिर्मित करने, धातुएँ पकाने, जलयान, थलयान, वायुयान चलाने, कारखानों को गतिशील रखने, जमीन से पानी निकालने आदि के लिए ईंधन कहाँ से आए, इसके उत्तर में वैकल्पिक ऊर्जा का एकमात्र आधार सूर्य ही रह जाता है।

सूर्य का एक रूप वह है जो अपनी चमक और गर्मी के रूप में हर किसी को प्रत्यक्ष परिचय देता है। उसका दूसरा आध्यात्मिक स्वरूप है, जो अन्त:करण में प्रेरणा, प्रकाश, साहस, उत्साह, पराक्रम आदि दे सकने में सक्षम है। अध्यात्म की भाषा में इस रूप को “सविता” कहते हैं। यह जड़ अग्निपिण्ड नहीं बल्कि “सचेतन प्राणशक्ति” है जिसका आकर्षण साधक में ओजस्, तेजस्, वर्चस् प्रदान करने में समर्थ है। 

वैदिक परंपरा में सविता और सूर्य का संबंध शरीर और आत्मा जैसा बताया गया है। जहाँ सविता उस परम आध्यात्मिक चेतना व प्राण-शक्ति का नाम है, वहीं सूर्य उसका भौतिक व दृश्यमान स्वरूप या प्रतीक है। 

सविता ईश्वर की वह आंतरिक और प्रेरक शक्ति है जो संपूर्ण जगत को उत्पन्न, पोषित और गतिमान करती है। “सवितृ वरेण्यम” का अर्थ उस प्राणशक्ति को धारण करने की प्रार्थना है। सूर्य आकाश में दिखने वाला वह प्रतक्ष्य  गोला  है जो प्राणशक्ति के स्थूल प्रकाश को संसार तक पहुँचाता है। इस आग के गोले का टेम्प्रेचर 5500 से 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस होता है। 

प्रसिद्ध गायत्री मंत्र में भौतिक सूर्य,आग के गोले की नहीं बल्कि उसी सर्वव्यापी प्राण-चेतना सविता के तेज का ध्यान किया जाता है। कुन्ती ने इसी शक्ति का आवाहन करके सूर्यपुत्र कर्ण को जन्म दिया था। कर्ण के शरीर और मन में यही शक्ति कवच, कुण्डल बनकर परिलक्षित हुई थी। अन्य अनेक प्रसंगों में सूर्य के माध्यम से चमत्कारी क्षमताएँ प्राप्त किए जाने के उल्लेख हैं। रघुवंशियों का उपास्य भी सूर्य ही था।

गुरुदेव बताते हैं कि आने वाले समय में जनमानस को परिष्कृत करने के लिए “प्रखर प्रतिभा सम्वर्धन” की आवश्यकता पड़ेगी। महामानवों के उत्पादन-अभिवर्धन में सविता की चेतना शक्ति का प्रयोग अभीष्ट होगा। इसके लिए इन दिनों भी उच्चस्तरीय आत्माएँ अपने सूक्ष्म शरीर से विशेष प्रकार के प्रैक्टिकल कर रही है।

सार्वजनिक प्रयोग के रूप में, युगसन्धि वेला में शांतिकुंज द्वारा  ऐसा ही एक महापुरश्चरण चलाया गया जिसका शुभारम्भ  शारदीय नवरात्र 1988  से हुआ और दिसम्बर 2000 को समापन हुआ। 

प्राचीनकाल के ऋषियों की तरह अगले दिनों में तत्त्वज्ञानी भी अनुभव करेंगे कि मानव प्रकृति में इस महत् शक्ति के आधार पर आवश्यक परिष्कार, परिमार्जन एवं परिवर्तन सम्भव किए जा सकेंगे। पौराणिक ग्रंथों में सूर्य की विशिष्ट क्षमताओं का उल्लेख एवं उसके ऐसे उपचारों का संकेत हैं, जिनमें शरीर, मन एवं भाव सम्वेदनाओं को इस शक्ति से उच्चस्तरीय लाभ मिल सकता है। इन प्रतिपादनों के सम्बन्ध में अब ऐसी शोधें होंगी जिन्हें परीक्षण की कसौटियों पर सही सिद्ध किया जा सकेगा एवं जिन्हें कोई झुठला नहीं  सकेगा। 

आने वाले दिनों में “सूर्य विज्ञान” को प्रमुखता प्राप्त होगी और उनका न केवल “पदार्थ शक्ति” के रूप में प्रयोग होगा बल्कि  मानस उपचार के रूप में भी प्रयोग किया जा सकेगा। सूर्य नमस्कार, सूर्यभेदन प्राणायाम, सूर्योपस्थान जैसी सूर्य साधनाओं से मिल रहे मेडिकल बेनेफिट्स, सभी के समक्ष हैं। लोगों ने सूर्य की शक्ति को समझना और मानना शुरू कर दिया है एवं  सूर्य की शक्ति पर विश्वास जमता दिख रहा है।

गुरुदेव के कथन का पालन करते हुए देव संस्कृति यूनिवर्सिटी में सूर्य विज्ञान पर जिस स्तर की शोध हो रही है उसका विवरण तो किसी अन्य समय देना उचित होगा लेकिन आदरणीय चिन्मय जी की मात्र 5 मिंट की वीडियो देखना बहुत ही उचित रहेगा। DSVV के इलावा IIT Madras के साथ-साथ प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय (माउंट आबू) में भी सूर्य विज्ञान पर रिसर्च हो रही है।

https://youtu.be/XcRolSRKsOg?si=LqRdfXhCV91A6H8r

जिन लोगों को इन Research findings पर दृढ़ विश्वास हो उनके लिए गुरुदेव ने “एक सार्वजनीन उपासना प्रावधान (A Universal Prayer Provision)” बनाया है जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

ब्रह्ममुहूर्त में यथासम्भव शरीर और मन से शुद्ध होकर, नेत्र बन्द करके प्रात:कालीन उदीयमान स्वर्णिम सविता का ध्यान करें। भावना करें कि स्वर्णिम सूर्य की किरणें अपने शरीर में प्रवेश कर रही हैं और उसकी स्थिति चन्द्रमा जैसी बन रही है। सूर्य से प्रकाश ग्रहण करके चन्द्रमा चमकता है और अपने शीतल प्रकाश से रात्रि में प्रकाश उत्पन्न करके अमृत बरसाता है। समझना चाहिए कि ध्यान की स्थिति में सूर्य की किरणों का प्रवेश साधक के शरीर में हुआ है और वह चन्द्रमा की तरह अमृत ज्योति से भर गया है । यह ज्योति संसार में बिखर कर अमृत ज्योति से भरा-पूरा वातावरण बना रही है। इस ज्योति से पदार्थ और प्राणी अनुप्राणित हो रहे हैं, उपयोगी वातावरण बन रहा है और अवांछनीयताएँ (Unwanted,Undesirables) विदा हो रही हैं।

गायत्री मंत्र सूर्य का मंत्र है, जिस किसी को भी गायत्री मंत्र पर श्रद्धा-विश्वास हो वे उपरोक्त ध्यान के साथ मानसिक रूप में गायत्री मंत्र जपते रह सकते हैं। अनेकों ऐसे भी होंगें जिनके गले गायत्री मंत्र की  उपयोगिता न उतरती हो, वे केवल अपने शरीर में “सूर्य का आवाहन” कर सकते हैं और “अमृत ज्योति वितरण” का ध्यान करते रह सकते हैं। गुरुदेव ने ऐसी सूर्य उपासना के लिए मात्र 15  मिनट का समय ही निर्धारित किया है। गुरुदेव कहते हैं कि आज की भागमभाग दुनिया में,जहाँ किसी के पास भी समय नहीं है, यदि 15 मिनट निकाल पाना ही संभव हो सके तो बड़ी बात होगी। इसी संदर्भ में गुरुदेव कहते हैं कि यदि एक ही भावना,एक ही समय, लाखों-करोड़ों लोग मिल-जुलकर कोई साधना करें तो उस “संयुक्त शक्ति” के उद्भव से सूर्य का चेतना पक्ष, मनुष्य समाज पर अधिक अनुग्रह बरसाएगा, ऐसी आशा की जा सकती है।

प्रसिद्ध हंगेरियन-ब्रिटिश दार्शनिक Arthur Koestler का भारत के प्रसिद्ध खोजी पत्रकार आर. के. करंजिया और Koestler के साथ लंदन में हुए इंटरव्यू को आध्यात्मिकता और वैश्विक सुरक्षा के लिहाज से बेहद ऐतिहासिक माना जाता है। इस इंटरव्यू  में परमाणु युद्ध के खतरे से निपटने के लिए भारतीय आध्यात्मिकता, विशेषकर गायत्री मंत्र की शक्ति पर एक चौंकाने वाला और सकारात्मक दृष्टिकोण साझा किया था। इंटरव्यू की मुख्य बातें निम्नलिखित अंकित की गयी हैं:

1.गायत्री मंत्र परमाणु बम से भी शक्तिशाली है : Koestler ने बातचीत के दौरान कहा था कि भारत का महान गायत्री मंत्र हजारों परमाणु बमों से भी अधिक शक्तिशाली है। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से ही 2022 में एक लेख प्रस्तुत किया गया था जिसका लिंक यहां देना उचित समझते हैं। इस लेख का शीर्षक था, “क्या गायत्री मंत्र से ब्रह्मास्त्र विकसित किया जा  सकता है?” इस लेख में स्पष्ट वर्णन किया गया था कि गायत्री उपासना से ब्रह्मास्त्र तो विकसित किया जा सकता है लेकिन उसके लिए जिस लेवल की साधना चाहिए वोह साधारण मनुष्यों के लिए संभव नहीं है। इन पंक्तियों को पढ़ रहे पाठकों के लिए तो गुरुवर का यही सन्देश है कि यथासंभव पात्रता विकसित की जाये,युगधर्म के लिए समय निकाला जाए,ऊँची छलांग लगाने के लिए शिक्षित होने में वर्षों लग जाते हैं।  https://life2health.org/2022/02/15/%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0/

2.गायत्री मंत्र परमाणु प्रलय का तोड़ है :Koestler  का मानना था कि गायत्री मंत्र का जाप परमाणु विनाश (Nuclear Holocaust) के प्रभाव को निष्क्रिय करने के लिए एक अचूक एंटीडोट की तरह काम कर सकता है। किसी बीमारी आदि के प्रभाव को खत्म करने के लिए दी जाने वाली दवा को एंटीडोट कहते हैं। 

3.गायत्री मंत्र सामूहिक चेतना का सुरक्षा कवच है :Koestler ने    सुझाव दिया कि यदि भारत के करोड़ों लोग एक साथ मिलकर गायत्री मंत्र का सामूहिक जाप करते हैं तो उससे उत्पन्न होने वाली सामूहिक चेतना (Collective Consciousness) देश के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच का निर्माण कर सकती है।

4.गायत्री मंत्र वैश्विक खतरों से रक्षा करने में सक्षम है :Koestler के अनुसार, मंत्र साधना से जाग्रत होने वाली सूक्ष्म ऊर्जा न केवल परमाणु युद्ध के खतरों को टाल सकती है, बल्कि पूरी पृथ्वी की रक्षा करने में सक्षम है। 

Koestler के अनुसार जब मनुष्य भौतिकवाद में लिप्त होकर तर्कशील  हो जाता है तो वह जीवन के गहरे अर्थों से कट जाता है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘The Yogi and the Commissar’ में उन्होंने समाज को बदलने एवं युग परिवर्तन के दो तरीके बताए हैं। 

1.पहली विचारधारा का प्रतीक बाहरी बदलाव है जिसका आधार तर्क, विज्ञान और राजनीतिक क्रांतियां है। 

2. दूसरी विचारधारा के अनुसार असली बदलाव व्यक्ति के भीतर से, आत्म-साक्षात्कार और आध्यात्मिक जागृति से आता है। 

गायत्री परिवार में इसी आंतरिक बदलाव की ही तो बात हो रही है।  

Koestler ने आधुनिक समाज की इस बात के लिए आलोचना की कि उसने भगवान और आध्यात्मिकता को अपने जीवन से बाहर कर दिया है। उन्होंने कहा था: “ईश्वर को गद्दी से उतार दिया गया है और अब मनुष्य एक आध्यात्मिक हिमयुग (Spiritual Ice Age) में प्रवेश कर रहा है, जहाँ स्थापित चर्च ठिठुरती हुई भीड़ को बचाने के लिए एस्किमो की झोपड़ियों से अधिक कुछ नहीं दे पा रहे हैं।” 

समापन,जय गुरुदेव 


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