“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की दूसरी पुस्तक पर आधारित लेख श्रृंखला का 9वां लेख प्रस्तुत है। परम पूज्य गुरुदेव ने युगसंधि के 12 वर्षों (1989-2000) की बात बार-बार की है,अनेकों पुस्तकों, अखंड ज्योति लेखों में गुरुदेव में विश्व भर में घटित आश्चर्यजनक परिवर्तनों के रिफरेन्स दिए हैं लेकिन हम तो ठहरे तर्कशील,शंकाग्रस्त; ऐसे कैसे बिना किसी प्रमाण के मान लें कि उन 12 वर्षों में परिवर्तन हुए हैं। अपनी शंका के समाधान के लिए गूगल महाराज की सहायता से जर्मनी, अंटार्टिका और भारत के तीन उदाहरण दिए हैं जो केवल एक ही वर्ष में घटित हुए, आशा करते हैं साथिओं के लिए एक रोचक विषय रहेगा।
परम पूज्य गुरुदेव ने इस पुस्तक का सारांश करके हमारा काम सरल कर दिया है, कल वाला लेख सारांश को ही वर्णन करेगा।
तो आइए चलें ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा की ओर जहाँ जीवन का कायाकल्प करने वाला साहित्य-रुपी अमृत वितरित किया जा रहा है, समर्पण,नियमितता एवं निष्ठा इस गुरुकक्षा की Pre condition है।
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मनुष्य की अपनी विचारणा, क्षमता, लगन, हिम्मत, उमंग और पुरुषार्थ परायणता की महत्ता कम नहीं है। इन मानसिक विभूतियों के जुड़ जाने पर मनुष्य की सामान्य दिखने वाली क्रिया-प्रक्रिया (Action-reaction) भी असामान्य स्तर की बन जाती है और दैवी विभूतियों की समानता करने लगती है। फिर भी उन विभूतिओं की सीमा एवं समय निर्धारित है और सफलता का भी एक मापदण्ड है। यदि अदृश्य प्रगति प्रवाह की इच्छा शक्ति उसके साथ जुड़ जाए, तो परिवर्तन इतनी तेजी से होते हैं कि आश्चर्यचकित होना ही पड़ता है। सहस्राब्दियों में बन पड़ने वाला काम दशाब्दियों में, वर्षों-महीनों में सम्पन्न होने लगते हैं। यह अदृश्य उपक्रम अनायास ही नहीं हो जाता बल्कि “किसी विशेष योजना एवं प्रेरणा” के अन्तर्गत होता है क्योंकि उसके पीछे अव्यवस्था को हटाकर व्यवस्था बनाने का लक्ष्य सन्निहित रहता है। इसीलिए इसी मंच से बार-बार सन्देश दिया जाता रहा है “Everything happens for a reason.”
आँधी-तूफान आते हैं, तो उड़ती हुई धूल के साथ मुद्दतों का जमा कचरा कहीं से कहीं पहुँच जाता है। खन्दक भर जाते हैं और भूमि समतल बनने में इतनी फुर्ती दिखती है, मानों जो करना है उसे कुछ ही क्षणों में कर गुजरे। रेगिस्तानी टीले-पर्वत आज यहाँ तो कल वहाँ उड़कर पहुँचते प्रतीत होते हैं। घटाटोप बरसते हैं तो सुविस्तृत थल क्षेत्र जल ही जल से आपूरित दिख पड़ता है। अस्त-व्यस्त झोपड़ों का पता भी नहीं चलता और बूढ़े वृक्ष तेजी से धराशाई होते चले जाते हैं। ऐसे ही न जाने कौनसे अजूबे सामने आ खड़े होते हैं जिनकी कुछ समय पहले तक कल्पना भी न थी।
पिछले दिनों पर दृष्टिपात करें, तो प्रतीत होता है कि सदियों पुरानी परम्पराओं में ओवरआल परिवर्तन होने जैसे घटनाक्रम विनिर्मित हुए हैं। भारत ने हजारों वर्ष पुरानी गुलामी को उतार फेंका। राजा महाराजा कहे जाने वालों का अधिकार छिन गया और प्रजातंत्र का बोलबाला हो गया । दास-दासियों का क्रय-विक्रय और लूट-अपहरण एक कानूनन व्यवसाय की तरह सुप्रचलित था लेकिन अब उसका कहीं अता-पता भी नहीं दिखता ।
विज्ञान की उमंग उभरी तो दो-तीन शताब्दियों में ही रेल, मोटर, जलयान, वायुयान, बिजली, इंटरनेट और आधुनिक युग के AI आदि ने धरती के कोने-कोने में अपनी प्रभुता का परिचय देना आरम्भ कर दिया। अणु आयुधों तक का कहना है कि लाखों-करोड़ों वर्ष पहले बनी इस समृद्ध और सुन्दर धरती को वे चाहें तो क्षण भर में धूलि बनाकर अन्तरिक्ष में अदृश्य कर सकते हैं। इतनी स्पीड से हो रही वैज्ञानिक प्रगति को देख कर आश्चर्यचकित होकर रहना पड़ता है।
यह तो हुई भूतकाल की विवेचना।
अब वर्तमान पर नजर डालें तो प्रतीत होता है कि भागीरथ की, सप्त ऋषियों की, बुद्ध, शंकर, दयानन्द, विवेकानन्द, गाँधी, विनोबा की कथाएँ अब प्रत्यक्ष बनकर सामने आ सकेंगी या नहीं लेकिन हर कहीं निराशा की घड़ी में नियति की “परिवर्तन-प्रत्यावर्तन क्रिया (Transformation- reversal process)” अपना काम किए जा रही है। मनुष्य इस परिवर्तन और प्रत्यावर्तन प्रक्रिया पर कहाँ विश्वास करेगा,वह तो शंका से ग्रस्त है। वोह तो सदियों से शंका करता आ रहा है, औरों को भी गुमराह करता आया है लेकिन नियति ने उसे कभी भी पूछ कर,कोई भी प्रक्रिया नहीं की है। उसने तो सृष्टि का बैलेंस स्थापित करना ही है क्योंकि नियति मनुष्य की तरह स्वार्थी तो नहीं ठहरी। दसों दिशाओं में महाकाल की हुंकारें प्रतिध्वनित हो रही हैं, उन्हें कैसे अनसुना किया जाए? युगचेतना के प्रभात पर्व पर, उदीयमान सविता के आलोक को कैसे भुलाया जाए? इसीलिए तो गुरुदेव ने कहा है “महाकाल पुकार रहा है।”
आने वाले दिनों में क्रांतिधर्मी साहित्य के अंतर्गत “महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण” पुस्तक के अमृतपान की योजना है। मात्र 32 पृष्ठों वाली इस क्रांतिकारी पुस्तक से कितनी ही ऑडियो बुक्स बन चुकी हैं,न जाने कितनी ही बार रीप्रिंट हो चुकी है और कितनों का कायाकल्प कर चुकी है।
हम सबका परम सौभाग्य है कि प्रिय बेटी संजना के सुझाव से “क्रन्तिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” का अमृतपान हो रहा है।
नवयुग के अवतरण की सम्भावना गंगावतरण की तरह अद्भुत तो है लेकिन साथ ही इस तथ्य से भी इंकार कैसे किया जाए कि जो अभी तक चरितार्थ हो चुका है, वह फिर अपनी पुनरावृत्ति (Recurrence) करने में असमर्थ ही रह जाएगा। ऐसी कभी हो ही नहीं सकता कि पुनरावृति न हो, जन्म-मृत्यु की भांति ही परिवर्तन एक शाश्वत सत्य नियम है। इस नियम का पालन करने के लिए नियति को किसी से परमिशन नहीं लेनी पड़ती। लेकिन साथिओ यह भी सत्य है कि युगसन्धि की वेला, 21वीं सदी उथल-पुथलों से भरी हुई है, इससे भयभीत होने एवं औरों को भयभीत करके नेगेटिविटी फैलाना कोई समझदारी नहीं है। “प्रतिभा परिष्कार” इसी का नाम है, प्रतिभा केवल उच्च शिक्षा, बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेना ही नहीं है, मोटे Pay-package ही लेना नहीं है।
मई 1989 में, ग्राम पंचायतों को विशेष अधिकार देने की बात अचानक बन गई थी। ग्रामीण स्वराज्य गाँधी जी के आरम्भिक दिनों का सपना था। उस पर चर्चाएँ होती रहीं, परियोजनाएँ भी बनती रहीं लेकिन यह किसी को भी भरोसा न था कि 1989 में कुछ माह में ही इस सन्दर्भ में क्रान्तिकारी परिवर्तन इतनी सरलता से हो गुजरेंगे। राज्य परिवर्तन, खून-खराबे के बिना, आक्रोश-विद्रोह उभरे बिना कहाँ होते हैं लेकिन समर्थ हाथों से छिन कर निर्धनों के हाथ सत्ता का लगना, पिछड़ों के हाथों इतनी आसानी से चली जाएगी कौन कैसे विश्वास कर सकता है। 1989 में पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के बीच की दीवार बिना किसी खून खराबे के ढह जाएगी, दोनों देश एक हो जाएंगें,कितना अविश्वसनीय है, इतिहास साक्षी है। 1990 में अंटार्टिका की ऐतिहासिक घटना भला कौन भूल सकता है। शीत युद्ध चल रहा था,अमेरिका और रूस एक दुसरे के शत्रु थे,विश्व बटा हुआ था लेकिन उस समय 6 अलग देशों के 6 साहसी लोगों ने 220 दिन,बिना किसी गाड़ी आदि के, 36 Sledge कुत्तों की सहायता से, माइनस 89 डिग्री सेल्सियस में ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया जिसे भुलाया नहीं जा सकता। दक्षिणी ध्रुव को जीतने की कहानी। सभी ने विज्ञान और शांति का सन्देश देते हुए सारे विश्व को Union is strength का पाठ पढ़ा दिया, पढ़ा दिया कि यदि इंसान इक्क्ठे हो जाएँ तो प्रकृति को भी झुका सकते हैं क्योंकि हम उसी की ही तो संतान हैं। इसी समय में भारत में हुए परिवर्तन को कोई कैसे भूल सकता है। 1989 में भारत की पहली गठबंधन सरकार का जन्म हुआ था जिसका स्वाद (पी वी नरसिम्हा राव की सरकार को छोड़ कर) भारतीओं ने 2004 तक चखा और समझ लिया कि गठबंधन कोई विकल्प नहीं है,इन वर्षों में अटल जी की 13 दिन की सरकार एक अविस्मरणीय उदाहरण रही है।
यह सभी उदाहरण गुरुदेव के 12 वर्षों के युग परिवर्तन के केवल एक वर्ष (1989-90) के ही हैं, पाठक स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं कि सभी 12 वर्षों में और क्या-क्या कुछ हुआ होगा।
इन सभी घटनाओं को अन्तराल का उफान या महाकाल का विधान, कुछ भी कहा जाए, जो असम्भव होते हुए भी सम्भव करने जा रहा है।
किसी को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि एक उफान के बाद परिवर्तन की घुड़दौड़ समाप्त हो जाएगी। गुरुदेव जैसे युगदृष्टा की दूरदर्शी आँखें जो देख सकती हैं हम कहाँ देख पाते हैं?
क्रान्तियाँ रेलगाड़ी के डिब्बों की तरह एक के पीछे एक दौड़ती चली आती हैं। इतना सुनिश्चित है कि इक्कीसवीं सदी के साथ जुड़ी हुई सुखद सम्भावनाओं को फलित होते इन्हीं दिनों, इन्हीं आँखों से प्रत्यक्ष देखा जा सकेगा। नियति की अभिलाषा है कि मनुष्यों में से अधिकांश प्रतिभावान उभरें। अपने चरित्र और कर्तृत्व से अनेकों को अनुकरण की प्रबल प्रेरणाएँ प्रदान करें।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से यदि इसमें थोड़ा सा भी योगदान दिया गया तो इस लेख श्रृंखला को सार्थक समझा जायेगा।
हममें से प्रत्येक को गिरह बाँध रखनी चाहिए कि नवयुग का भवन बन रहा है, वह बनकर रहेगा। स्मरण रखा जाना चाहिए कि अगला समय उज्ज्वल भविष्य के साथ जुड़ा हुआ है, जो इसमें अवरोध बनकर अड़ेंगे, वे मात्र दुर्गति ही सहन करेंगे।
विश्वात्मा ने, परमात्मा ने नवसृजन के संकल्प कर लिए हैं, इनके पूर्ण होकर रहने में सन्देह नहीं किया जाना चाहिए। ‘‘इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य’’ का उद्घोष मात्र नारा नहीं है—इसके पीछे महाकाल का प्रचण्ड संकल्प सन्निहित है। उसको चरितार्थ होते हुए प्रतिभा परिष्कार के रूप में देखा जा सकेगा। अगले दिनों इस कोयले की खदान में ही बहुमूल्य मणिमुक्तक उभरते और चमकते दिखाई देंगे।
जय गुरुदेव
