वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

भूलोक, स्वर्गलोक से भी बढ़कर कैसे है? 

आज के ज्ञानप्रसाद लेख को समझने के लिए संक्षिप्त सी भूमिका देने की आवश्यकता पड़ रही है। 

“इक्क्सवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य भाग 2” पर आधरित वर्तमान लेख श्रृंखला के सातवें चैप्टर का शीर्षक “अगली शताब्दी का अधिष्ठाता-सूर्य” जितना आकर्षक है उतना ही जिज्ञासापूर्ण भी है। बार-बार पूरे चैप्टर को पढ़ने के बाद भी हम अपनेआप को शीर्षक के साथ Convince नहीं कर पाए। गुरुदेव के लिखने में कोई समस्या हो ही नहीं सकती, समस्या तो हमारे अज्ञान की ही है। 

मूल प्रश्न जिसने हमारे अंदर जिज्ञासा का जागरण किया वोह था “अगली शताब्दी का अधिष्ठाता-सूर्य”, एकदम मन ने प्रश्न किया,अगली ही शताब्दी क्यों, सूर्य तो सदैव ही अधिष्ठाता है, वोह तो अनंत है,सूर्य की शक्ति शताब्दियों से कहाँ नापी जा सकती है? 

इस प्रश्न का उत्तर ढूंढते-ढूंढते, हमने कल के ज्ञानप्रसाद को पोस्ट होने से लेकर अब तक, जब यह पंक्तियाँ लिख रहे हैं, जितना भी समय मिला, उत्तर प्राप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। गुरुदेव का साहित्य,अनेकों क्रॉस रेफरेन्सेस, AI भाई साहिब आदि से जो भी सहायता मिल पायी,उसे पहले खुद समझने के लिए बार-बार पढ़ा,उसके बाद ही साथिओं के समक्ष प्रस्तुत करने का साहस किया। 

साथिओं को बता दें कि आज प्रस्तुत किया गया ज्ञानप्रसाद लेख ज्ञान से भरपूर होने के साथ-साथ इतना रोचक है कि सूर्यदेव और माँ पृथ्वी को पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका की परिभाषा देते हुए बहुत ही आनंद अनुभव हो रहा है। 

आइए आप सब भी हमारे साथ इस आनंद में शामिल हो जाएँ, गुरुचरणों में समर्पित होकर आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करें। 

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ब्रह्माण्ड में भूमंडल स्तर का और कोई ग्रह नहीं खोजा जा सका,यह ग्रह जिस पर हम सब वास कर रहे हैं, इतना  सुन्दर, सुव्यवस्थित, सुनियोजित एवं इतनी विशेषताओं से सम्पन्न है कि इसकी तुलना “स्वर्गलोक” से की जा सकती है। स्वर्गलोक से तुलना करते समय एक बात समझने की आवश्यकता है कि स्वर्ग की केवल कल्पना ही की जा सकती है। सभी लोग स्वर्ग की कामना करते रहते हैं, उस कामना के  लिए न जाने कौन-कौन से कृत्य करते रहते हैं लेकिन “स्वर्गलोक” में भी इतनी विशेषताएँ और विचित्रताएँ आरोपित नहीं की जा सकी हैं जितनी कि भूलोक में विद्यमान हैं। यही कारण है कि भूलोक को  “स्वर्गादपि गरीयसी (स्वर्ग से भी बढ़कर)” कह कर सम्मानित किया  गया है एवं देवता भी इस कर्मभूमि भूलोक में वास करने को उत्सुक रहते हैं। पुराणों में मान्यता है कि देवता भी मानव रूप में अवतार लेकर पृथ्वी पर संतों और भक्तों के साथ रहने की इच्छा रखते हैं। 

आइए, भूलोक को स्वर्ग से बढ़कर मानने के प्रमुख निम्नलिखित कारणों पर चर्चा करें:

  • भूलोक में कर्म करने की स्वतंत्रता है: भूलोक को “कर्मक्षेत्र” कहने के पीछे एक ही तथ्य है कि यह एक ऐसा स्थान है जहाँ मनुष्य अच्छे या बुरे कर्म करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है और अपनी इच्छा से अपने भाग्य का निर्माण कर सकता है। इस वाक्य को देखते ही प्रमाण मिल जाता है कि मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। इसके विपरीत स्वर्ग केवल सुख भोगने अर्थात सत्कर्मों का फल प्राप्त करने का स्थान है।  
  • भूलोक मोक्ष का द्वार है : आध्यात्मिक ग्रंथों के अनुसार, मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य  “मोक्ष प्राप्ति” है, जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त करना है। इस लक्ष्य की पूर्ति केवल भूलोक पर रहकर किए गए सत्कर्मों और ज्ञानार्जन के माध्यम से ही हो सकती है। 
  • भूलोक पर अनुभवों की विविधता है: भूलोक पर दुःख और सुख दोनों का अनुभव होता है। सुख और दुःख का स्वाद ही मनुष्य को जीवन का वास्तविक अर्थ सिखाता है और उसे परिपक्व बनाता है। कल प्रसारित हुआ दैनिक दिव्य सन्देश भी इसी ज्ञान का प्रचार कर रहा था: श्रेष्ठ मनुष्यों का बाहुल्य ही सतयुग है। उसे ही स्वर्ग कहते हैं। नरक और कुछ भी नहीं दुर्बुद्धि का बाहुल्य और उसी का व्यापक प्रचलन है। नरक जैसी परिस्थितियाँ उसी में दृष्टिगोचर होती हैं। पतन और पराभव के अनेक अनाचार उसी के कारण उत्पन्न होते रहे हैं।
  • भूलोक में त्याग और सेवा का महत्व समझा जा सकता है : पृथ्वी पर ही प्रेम, त्याग, परोपकार और सेवा जैसी दिव्य भावनाओं को व्यवहार में लाया जा सकता है, जो उच्च लोकों में संभव नहीं है।

वाल्मीकि रामायण में भी कहा गया है कि “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” अर्थात् जन्मभूमि और माता स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। 

आगे बढ़ने से पहले,आइए अपना आत्मनिरक्षण करते हुए स्वयं से प्रश्न पूछें कि इतना दुर्लभ, मनुष्य जन्म जैसा स्वर्ण अवसर प्राप्त होने के बाद भी क्या कोई इच्छा रह जाती है? केवल एक ही इच्छा रह जाती है कि इस स्वर्ण अवसर (जिसे पाने के लिए देवता तक तरसते हैं) का सदुपयोग करते हुए, गुरुवर की  “युग परिवर्तन योजना” में अपनी भागीदारी रजिस्टर कराएं।    

अपने सौर मण्डल में जितने भी ग्रह-उपग्रह खोजे गए हैं, उनमें आकार की दृष्टि से कई तो पृथ्वी से अनेकों गुने बड़े हैं लेकिन  प्रकृति शोभा, प्राणी समुदाय, वृक्ष, वनस्पति आदि की समता जैसा अन्य कोई भी ग्रह  नहीं है। ऋतुओं का ऐसा परिवर्तन अन्यत्र कहीं भी सम्भव नहीं है। ईश्वर का राजकुमार, मनुष्य जैसा प्राणी,जिसे अगणित क्षमताओं, विशेषताओं और विभूतियों का भण्डार माना जाता है, कहीं और मिल सकना सर्वथा दुर्लभ है। 

यहाँ एक बहुत ही बेसिक प्रश्न समझने की आवश्यकता है कि अन्य ग्रहों की तुलना में इतने छोटे आकार की,हमारी माँ (पृथ्वी) को इतना सौन्दर्य प्रदान करने में किसका हाथ है?

इस प्रश्न का मात्र एक ही प्रमुख तथ्य सामने आता है कि सूर्यदेव से पृथ्वी की एक Definite दूरी ही है जो इस सन्तुलन का कारण है और इसी से हमारी माँ इतनी गौरवमई  है। विज्ञान के आधार पर देखा जाए तो समझा जा सकता है कि यदि सूर्य और पृथ्वी की दूरी कम रही होती, तो पृथ्वी अग्निपिण्ड जैसी बन जाती। अधिक दूरी अधिक होती, तो शीत की अधिकता से यहाँ किसी प्रकार की कोई भी हलचलें दृष्टिगोचर नहीं होतीं। सुनिश्चित दूरी का यह सुयोग ही हमारी माँ में ऐसी विशेषताएँ सम्भव कर सका है, ऐसी विशेषताएं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अन्यत्र कहीं भी खोजी और जानी नहीं जा सकी हैं। 

तत्त्वदर्शियों से लेकर विज्ञानवेत्ताओं तक, सब एक स्वर से यह स्वीकार करते हैं कि 

सूर्य को जगत की आत्मा डिफाइन करने के साथ ही,इसे पृथ्वी का स्वामी भी कहा गया है। स्वामी की परिभाषा के साथ ही इस रिश्ते को पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका, मित्र,सहायक  जैसे अनेक अलंकारों से अभिव्यक्त किया गया है।

यह संबंध  ऐसा-वैसा,सुना-सुनाया तथ्य नहीं है, इस संबंध को मुख्य रूप से तीन दृष्टियों से समझा जा सकता है:

  • आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टि: प्राचीन साहित्य,फिलोसॉफी एवं गुरुदेव जैसी विभूतियों ने सूर्यदेव  को आत्मा और पृथ्वी को प्रकृति/भौतिक शरीर का प्रतीक माना है। इस रूपक में सूर्य को पालनकर्ता (पति) और पृथ्वी को जीवनदायिनी (पत्नी) कहा जाता है।
  • सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक दृष्टि: संस्कृत में ‘पति’ का एक अर्थ ‘पालक’ या ‘स्वामी’ भी होता है। इस आधार पर सूर्य को पूरी पृथ्वी का भरण-पोषण करने वाला और ऊर्जा देने वाला माना गया है। 
  • वैज्ञानिक आधार: पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और सूर्य से ही प्रकाश तथा ऊष्मा प्राप्त करके वनस्पतियों और जीवों को जन्म देती है। इसी प्राकृतिक संबंध को साहित्य में पति-पत्नी के रूप में दर्शाया जाता है।

सूर्य की किरणें जब पृथ्वी पर बरसती हैं तो उस क्षेत्र में उत्साह और पराक्रम दौड़ जाता है। वनस्पतियों, प्राणियों और पदार्थों में हलचलों का दौर चल पड़ता है। सूर्यास्त होते ही सुस्ती, थकान, नींद, अकर्मण्यता आ घेरती है और हलचलों में विराम सा लग जाता है। जहाँ सूर्य की शक्तिशाली किरणें नहीं पहुँचती वहाँ सीलन, सड़न, नीरसता और निस्तब्धता ही अपना डेरा डाले रहती है। जहाँ सौर ऊर्जा की जितनी पहुँच है वहाँ उतनी ही बलिष्ठता, सुदृढ़ता का माहौल दृष्टिगोचर होता है।

पाठक ज़रा नज़र दौड़ा कर देखें तो सृष्टि की रचना से सम्बंधित अनेकों प्रश्नों के उत्तर ढूंढते-ढूंढते सारा जीवन बीत जायेगा क्योंकि यह सब अनंत है,जिसका कोई अंत है ही नहीं। रंगबिरंगी सृष्टि, दुनिया में प्रतक्ष्य दिख रहे रंग कहा से आते हैं, आ रहे हैं ? विज्ञान तो इसका बहुत ही सरल उत्तर देता है कि जो वस्तु अपनी नेचर के अनुरूप इंद्रधनुष के सात रंगों में से जिसको Absorb नहीं कर पाता है,वही उसका रंग बन जाता है, बाकि के 6 रंग रिफ्लेक्ट हो जाते हैं। सृष्टि के रंगमंच पर, हमारे आसपास हो रहे इस नाटक का एकमात्र “रंगकर्मी” अकेला सूर्य ही है। उसी ने इस वसुधा के विभिन्न घटकों को अपनी योजना के अनुसार चित्रशाला की तरह रंग भरकर अद्भुत कलाकारिता का परिचय दिया है।

एक साधारण माँ की भांति, माँ पृथ्वी अपने गर्भ में क्या कुछ लिए बैठी है, वोह भी अनंत है,उसका भी कोई अंत नहीं है। केवल रसायन की ही बात करें तो उन्हीं के आधार पर वनस्पतियों और प्राणियों की काया का निर्माण होता है। जिस प्रकार पति-पत्नी के सहयोग से गर्भधारण होता है ठीक उसी प्रकार इन सभी Chemicals की रचना भी पति सूर्य और पत्नी पृथ्वी के परस्पर सहयोग से ही संभव हो पाती है। दोनों के परस्पर सहयोग से ही खाद्य पदार्थों से लेकर पदार्थ जगत के अनेक क्षेत्रों में उपजते, बढ़ते और अपने ढंग से काम करते देखा जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि माँ पृथ्वी पर जो कुछ भी  “जीवन तत्त्व” विद्यमान है, जितनी भी हलचलें हैं, उसका उद्गम केन्द्र “सूर्यसत्ता” में सन्निहित है। वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि सूर्यप्रभा में सोडियम, कैल्शियम, बेरियम, जिंक, कापर, आयरन, मैंगनीज, कोबाल्ट, कैडमियम जैसी धातुओं के निर्माण की क्षमता है। “मानवी जीवनी शक्ति” सूर्य से ही प्राप्त अनुदान है, इसके अभाव में ही मनुष्य  रोगी होता है।

मनुष्य शरीर में दृश्य-अदृश्य जो कुछ भी व्याप्त है, सब प्रकृति की ही देन है। ग्लोब के अलग-अलग भागों में सूर्य का प्रभाव, स्तर, मात्रा,गति के कारण अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। 

सृष्टि के आदि से लेकर अब तक धरती के वातावरण में प्राणियों, पदार्थों, मौसमों में जो चित्र-विचित्र परिवर्तन होते रहते हैं उनके मूल में “पृथ्वी और सूर्य” के इस पति पत्नी दम्पति के बीच चलने वाले आदान-प्रदान और उसके कारण उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रियाओं में अन्तर आते रहना ही प्रमुख कारण रहा है।” रिसर्च करने पर पता चलता है कि जिस प्रकार प्रकृति का प्राकृतिक इतिहास बदलता रहता है उसका मुख्य कारण दोनों ग्रहों के बीच का अंतर् ही है जिसे आज का मानव खुली आँखों से देख रहा है, आँखों देखे हो रहे विनाश के बावजूद सतर्क नहीं हो रहा है, यही तो आज के मानव की सबसे बड़ी मूर्खता है।

जय गुरुदेव  


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