वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ईश्वर को एक कुशल माली की ज़रुरत आन पड़ी है

“महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण” एक बहुत ही छोटी सी पुस्तिका है जिसमें प्रतिभा-परिष्कार के विषय पर अनेकों पहलुओं से चर्चा की गयी है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से 23 पुस्तकों के पैकेज “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला”  की इस 8वीं पुस्तिका का अमृतपान होना एक सौभाग्य है। समर्पित साथी इसमें अपनी रूचि दर्ज करा रहे हैं जिसके लिए धन्यवाद करते हैं।

आज का लेख भी कुछ ऐसा कंटेंट लेकर आया है जिसका अमृतपान करके ही अनुभव किया जा सकता है क्योंकि यह गूंगे का गुड़ जो ठहरा।

आइए, गुरुकुल की गुरुकक्षा की तरफ रुख करें।

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मनुष्य के लिए उन्नति के अनेकों  क्षेत्र उपलब्ध हैं लेकिन उनमें प्रगति करना  प्रतिभा के सहारे ही होता है। आज हम जिन सफल व्यक्तियों को  देख रहे हैं उनके पुराने दिनों के इतिहास में दृष्टि दौड़ाएं तो अधिकांश लोग आरम्भिक दिनों में साधनरहित स्थिति में ही रहे हैं। नियमितता से परिश्रम करने से, सूझ-बूझ से काम करना  ही प्रधान रूप से उनके लिए सहायक रही है। उनके लिए  कठोर श्रमशीलता, एकाग्रता एवं लक्ष्य के प्रति सघन तत्परता ही सच्चे अर्थों में सहायक सिद्ध हुई है। किसी को यदि अनायास ही भाग्यवश या पैतृक सम्पत्ति के रूप में कुछ मिल जाए, तो यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि उसे सुरक्षित रखा जा सकेगा या बढ़ने की दिशा में अग्रसर होने का अवसर मिल ही जाएगा। हर व्यक्ति की अपनी निजी विशिष्टताएँ हैं जो कठिनाइयों से उबरने, साधनों को जुटाने, मैत्री स्तर का सहयोगी बनाने में सहायता करती हैं। सद्गुणों का यही समुच्चय ही मिलकर ऐसा “प्रभावशाली व्यक्तित्व” विनिर्मित करता है, जिसे प्रतिभा कहा जा सकता है। यह प्रतिभा ही है  जिसे जहाँ भी प्रस्तुत  किया जाए वहीँ  विकास एवं उत्कर्ष का श्रेय एवं सुयोग का अवसर मिल जाता है ।

प्रतिभा-परिष्कार में जिसकी भी अभिरुचि बढ़ती रही है, जिसने भी अपने गुण, कर्म, स्वभाव को सुविकसित बनाने के लिए प्रयत्नरत रहने में अपनी विशिष्टता की सार्थकता को समझा है,उसे देखकर समझ लेना चाहिए कि उसी को अपना भविष्य उज्ज्वल बनाने का अवसर मिला है। उसी को जन साधारण का स्नेह-सहयोग मिला है। संसार भर में जहाँ भी खरे स्तर की प्रगति दृष्टिगोचर हुई हो, समझना चाहिए कि उसमें समुचित प्रतिभा का ही प्रमुख योगदान रहा है।

सैनिकों को युद्ध मोर्चों पर पराक्रम दिखाने के लिए, तैयार कराने के लिए, उन्हें भेजने वाला विभाग  यह व्यवस्था भी करता है कि उन्हें आवश्यक सुविधाएँ मिल सकें। अगर सुविधाएँ ही न मिली तो सैनिक अपनी ड्यूटी ठीक प्रकार से पूरी करने में असमर्थ रहेंगे। युग परिवर्तन का सरंजाम  जुटाने वाली सत्ता ने भी नवसृजन के दोहरे मोर्चे पर सफल होने के लिए इसी प्रकार की व्यवस्था कर रखी है। सफलता के उच्च लक्ष्य तक पहुँचने में अनेकों बाधाएँ पड़ सकती हैं,उन बाधाओं को पार करने के लिए,वांछित प्रगति के लिए अनेक आवश्यकताएँ पूरी करनी होती हैं। इस सन्दर्भ में समझना लेना चाहिए कि किसी भी अग्रगामी एवं आदर्शवादी को निराश नहीं होना पड़ेगा क्योंकि उसकी पीठ पर सर्वशक्तिमान सत्ता का हाथ जो रहेगा।

इन पंक्तिओं को पढ़ रहे पाठकों को समझ लेना चाहिए कि गुरुसत्ता की शक्ति हमारे साथ है,वोह निष्ठावान बच्चों से वोह सब कुछ करवा लेगी जिस पर वोह आस लगाए बैठे हैं। गुरुसत्ता के साथ-साथ प्रकृति भी अग्रगामिओं का ही साथ देती है। जब तेज हवा पीछे से चलती है तो पैदल चलने वालों से लेकर साइकिल आदि के सहारे लोग कम परिश्रम करके भी आगे बढ़ते जाते हैं, मंज़िल  सरल हो जाती है। नवसृजन का लक्ष्य, कल्पना करने वालों को कठिन दिखता तो है लेकिन उस स्रष्टा को विदित है कि उनकी नवसृजन योजना को पूरा करने के लिए जो व्यक्ति अपने प्राण हथेली पर रखकर अग्रगमन का साहस दिखा रहे हैं उन्हें सफलता का लक्ष्य प्रदान करने के लिए क्या-क्या आवश्यकताएँ जुटानी हैं और क्या जिम्मेदारी निभानी चाहिए। यहाँ पर फिर God helps those who help themselves वाला सिद्धांत स्मरण रखना चाहिए, उस पर विश्वास करना चाहिए। तभी तो गुरुदेव ने बार-बार कहा है, “तू एक कदम तो उठा,अगले 10 कदम उठाने में में तेरा सहायक बना रहूँगा।

परम पूज्य गुरुदेव यहाँ पर दो तरह के व्यक्तिओं का उदाहरण देकर  समझा रहे हैं कि

माँगने वाले भिखमंगे दर-दर पर  झोली पसारते, दाँत निपोरते, गिड़गिड़ाते और दुत्कारे जाते हैं। मनोकामनाएँ पूरी कराने वाले, ईश्वर भक्ति का आडम्बर ओढ़ने वाले निराश रहते हैं और बदनामी  सहते हैं लेकिन  जिन्हें ईश्वर का काम करना होता है उनका हर जगह सम्मान होता है, आदरपूर्वक बुलाया जाता है और अभीष्ट साधनों का उपहार भी दिया जाता है। इस समय ईश्वर को ऐसे ही प्रतिभावाणों की ज़रूरत आन पड़ी है, ऐसे ही प्रतिभाओं को महाकाल ने आमत्रित किया है। अपने उद्यान को समुन्नत बनाने  के लिए ईश्वर को एक  कुशल माली की ज़रुरत आन पड़ी है। सारे विश्व  को समुन्नत, सुसंस्कृत, सुसम्पन्न बनाने के लिए कुशल कलाकारों और शूरवीर सैनिकों की आवश्यकता पड़ रही है। जो व्यक्ति ईश्वर की इस पुकार को सुन कर  अपनी क्षमता को प्रस्तुत करेंगे, प्रमाणित करेंगे वे किसी भी प्रकार के दैवी अनुग्रह से वंचित न रहेंगे बल्कि इतना कुछ प्राप्त कर लेंगे जिसे पाकर वे निहाल हो जाएंगे।

सीता माता की खोज के लिए भगवान  को हनुमान जी की जरूरत पड़ी। हनुमान जी ने  भगवान का अनुरोध स्वीकारा तो बदले में ऐसी समर्था के धनी बन गए जो उनकी बेसिक  विशेषताओं में सम्मिलित नहीं थी। उन्होंने समुद्र छलांगने, लंका को जलाने, पर्वत उखाड़कर लाने जैसे असाधारण काम भगवान से अतिरिक्त शक्ति प्राप्त करके ही सम्पन्न किये।

आड़े समय में ईश्वर का सहयोग करने वालों को भी ऐसे ही उपहार-अनुदान मिलते हैं। विभीषण को लंका का सम्राट् बनने का सुयोग मिला। सुग्रीव ने अपना खोया राज्य पाया। भगवान के काम के लिए देवपुत्र माँगने वाली कुन्ती को उत्कृष्ट स्तर के पुत्र रत्न देने में उन्होंने आनाकानी नहीं की। भक्ति का प्रचार करने वाले नारद “देवर्षि” कहलाए। सूरदास/तुलसी ने ईश्वर के काम के लिए प्रतिज्ञारत होकर ऐसी प्रतिभा पाई जिसके सहारे वे अनन्त कीर्ति पा सकने के अधिकारी बने।

इन दिनों भी स्रष्टा ने  विश्व-कल्याण के लिए,नवसृजन के लिए कर्मवीरों को पुकारा है। जो व्यक्ति उस हेतु हाथ बढ़ाएँगे,वे भला खाली कैसे रह सकते हैं।  भगीरथ,गाँधी,बुद्ध आदि को जो  सामर्थ्य मिला, वह इसलिए मिला कि उन्होंने अपना स्वार्थ छोड़कर लोकहित के लिए कार्य किया, मेरा-मेरा नहीं किया, बकरी की भांति मैं-मैं नहीं किया।

प्रकृति ने इस दुनियाँ में ऐसी भी सुविधा बनाई हुई है कि बहुत-सी उपयोगी वस्तुएँ बिना मूल्य फ्री में मिल जाती हैं। हवा, पानी, छाया, खुशबू आदि हम बिना मूल्य ही पाते हैं लेकिन जौहरी या हलवाई की दुकान पर सजाकर  रखी हुई वस्तुएँ उठाकर चल देने का कोई नियम नहीं है। उन अमूल्य वस्तुओं को पाने के लिए  मूल्य चुकाना ही पड़ता है। चुपचाप उठा कर भाग निकलने वाले को चोर कहा जाता है। क्या आप भगवान की अमूल्य सम्पदाओं  के चोर बनना चाहते हैं? नहीं न !! तो फिर उठो,प्रतिभा परिष्कार करो,पात्रता बढ़ाओ, कमाई करो, पेमेंट करो, flood lights से चमकते, दमकते भगवान के शोरुम से मनचाहा आभूषण खरीद ले जाओ, ज्ञान के उस आभूषण को पहन कर जब लोगों के बीच में जाओगे तो वाहवाही न हो, प्रशंसा न हो ऐसा हो ही नहीं सकता!!

आज इसी “ज्ञान की मिठाई” की जरूरत है। तकनीकी विकास बहुत हुआ है, इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन तकनीकी खिलौनों ने, मशीनों आदि ने जिस तरह लोगों के दिमागों को खाली किया है,साक्षात दिख रहा है। गुरुदेव ने कहीं लिखा था कि आज का मानव हर समय जंगली जानवरों की भांति काटने को क्यों आतुर रहता है? किसी से भी बात करके देख लो, फोन पर उंगलियां घुमा कर इन्फॉर्मेशन तो ढूंढ लेगा लेकिन जब विश्लेषण और चर्चा की बात आती है तो काटने को दौड़ता है। क्या यही ज्ञान है? ज्ञान तो मनुष्य को शीतलता प्रदान करता है, झुकना सिखाता है। “बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर, पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर” वाली बात कहां किसी को समझ आए? समाज में एक और बात बड़ी तेज़ी से पनप रही है: जिस बात की समझ न लगे, चर्चा करने की असमर्थता दिखे उस पर ढीठ बनकर दाँत निकाल दो, हँसी मजाक में टाल दो, इसी को “चर्चा हाईजैक” का नाम दिया गया है। घर में, परिवारों में, पॉलिटिकल चर्चाओं में ,आए दिन बाल की खाल उधेड़ने का वातावरण देखने को मिलता है। हमारे साथिओं ने बाल्यकाल में सांप-सीढ़ी वाली लूडो, ताश के पत्तों के अनेकों खेल खेले होंगें। जब भी किसी चतुर खिलाडी को अपनी हार दिख रही होती थी वह सारे पत्ते मिक्स करके भाग निकलता था, ऐसे खेल को हाईजैक  का नाम देना शायद गलत न हो।

तो साथिओ,ज्ञान प्राप्त करना,प्रतिभा का परिष्कार करना,पात्रता की विकास करना, यह सब दैवी अनुदानों के बिना कहाँ संभव हो पाए हैं। गाय से दूध प्राप्त करना है तो घास तो खिलाना ही पड़ेगा। इसी को Give and take कहते हैं।  चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को अपनी शक्ति प्रदान की तभी वह चक्रवर्ती कहलाया था। भवानी की अक्षय तलवार शिवाजी को मिली थी। अर्जुन को दिव्य गाण्डीव, धनुष एवं बाण देने वालों ने जाँच लिया था कि उस समर्थता को किस काम में प्रयुक्त किया जाएगा।

भगवान ने मनुष्य का काय-कलेवर तो जन्म से ही बिना मूल्य (पूर्व जन्मों के कर्मों के आधार पर) दे दिया है लेकिन उसके बाद का दूसरा वरदान है ‘‘परिष्कृत प्रतिभा’’ उसी को मिलती है जो इसका सम्मान करता है। इसी सम्पदा के  सहारे कोई साधारण सा मनुष्य महामानव स्तर का बड़प्पन उपलब्ध करता है। इतनी बहुमूल्य सम्पदा प्राप्त कराने से पहले भगवान सुनिश्चित करते हैं कि जिस व्यक्ति को अनुदान मिल रहे हैं वोह इसके लिये पात्रता भी रखता है यां नहीं, भगवान इंटरव्यू लेते हैं, सुनिश्चित करते हैं तभी अपॉइंटमेंट लैटर थमाते हैं।

गुरुदेव बता रहे हैं कि वर्तमान समय बड़ी परीक्षा की वेला है,हमें  सिद्ध करना होगा कि जो कुछ भी विशेष रूप से, दैवी-अनुग्रह से उपलब्ध होगा, उसे उच्चस्तरीय प्रयोजन में ही प्रयुक्त किया जायेगा। नवयुग के अवतरण का पथ-प्रशस्त करना एक बहुत ही  बड़ा काम है, जिसके लिए कटिबद्ध होने पर “परिष्कृत प्रतिभा” का बड़ी मात्रा में, अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। उसे धारण करने पर “नौलखा हार” पहनने वाले की तरह शोभायमान बना जा सकता है।

ईश्वरीय व्यवस्था में यही निर्धारण है कि बोया जाए और उसके बाद काटा जाए। पहले काट लें, उसके बाद बोएँ, यह नहीं हो सकता। लोकसेवी उज्ज्वल छवि वाले लोग ही प्राय: वरिष्ठ, विश्वस्त गिने और उच्चस्तरीय प्रयोजनों के लिए प्रतिनिधि चुने जाते हैं।

विशिष्ट पुरुषार्थ का परिचय देने के उपरान्त ही पुरस्कार मिलते हैं। परिष्कृत प्रतिभा ऐसी सम्पदा है, जिसकी तुलना में मनुष्य को गौरवान्वित करने वाला और कोई साधन है ही नहीं। उसे प्राप्त करने के लिए यह सिद्ध करने की आवश्यकता है कि मानवी गरिमा को गौरवान्वित करने वाली धर्म-धारणा के क्षेत्र में कितनी उदारता और कितनी सेवा-साधना का परिचय देने का साहस जुटा पाया।

दूसरों के हाथ सजाने के लिए, मेंहदी के पत्ते पीसने पर अपने हाथ स्वयमेव लाल हो जाते हैं। समय की माँग के अनुरूप पुण्य-परमार्थ का परिचय देने वालों को भी सदा नफे में ही रहने का सुयोग मिलता है। बाजरा, मक्का आदि का बोया हुआ एक दाना हजार दाने से लदी बाल बनकर इस तथ्य को प्रमाणित और परिपुष्ट करता है। भगवान के बैंक में जमा की हुई पूँजी इतने अधिक ब्याज समेत वापस लौटती है, जितना लाभ अन्य किसी व्यवसाय या पूँजी-निवेश में कदाचित् ही हस्तगत होती हो।

अगले लेख के लिए सोमवार तक प्रतीक्षा करनी होगी।

जय गुरुदेव


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