वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

अद्भुत प्रतिभा के विश्वव्यापी उदाहरण

दो दिन पूर्व प्रकाशित हुए ज्ञानप्रसाद लेख का शीर्षक “प्रतिभा ही लिविंग शक्ति वर्षा” था। प्रतिभावानों के अनुदान साक्षात् “लिविंग शक्ति वर्षा” ही होती है जिसकी बूदों से न जाने कितनों के ह्रदय में शीतलता का आभास होता है।

इसी लेख में एवं अन्य  प्रकाशित लेखों में यह सन्देश प्रसारित हो रहा है कि प्रतिभा किसी भी साधन/सुविधा की मोहताज नहीं है। प्रबल इच्छा-शक्ति,संकल्प-शक्ति से किये गए कार्य में ईश्वर भी सहायता करने दौड़े आते हैं।

आज का ज्ञानप्रसाद लेख इस तथ्य को सार्थक करने में सहायक है। लेख में दिए गए लगभग 30 उदाहरण प्रतिभा-परिष्कार के लिए उठने वाली ज्वलंत अग्नि  को बल देने के लिए पर्याप्त है।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के जिन साथिओं के पास “महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण” पुस्तिका की हार्ड कॉपी उपलब्ध है,देख सकते हैं कि 5 पृष्ठ (8 से 12) केवल और केवल इन 30 विभूतिओं के बारे में संक्षिप्त वर्णन को ही समर्पित हैं। गुरुदेव द्वारा इस कंटेंट को इक्क्ठा करना, हमें इनके बारे में बताकर प्रतिभा-परिष्कार की दिशा में प्रेरित करना है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं कि हो सकता है कि इन बहुचर्चित नामों को देखकर हम यह कह कर छोड़ देते कि  इनके बारे में तो हम वर्षों से पढ़ते आ रहे  हैं, क्या ही नया होगा? लेकिन ऐसा नहीं है, औरों का क्या कहें, हमने तो भगवती प्रसाद वाजपेयी “फेरीवाले” जी का नाम पहली बार सुना है। गोर्की का नाम तो पहले भी सुना था लेकिन गोर्की को रुसी भाषा में “कड़वा” कहते हैं,आज ही जान पाए।

30 विभूतिओं के बारे में लिखना तो संभव नहीं है लेकिन इन दो का चयन कर पाना भी गुरुकृपा ही हो सकती है।

आशा करते हैं कि त्रय शताब्दी में लिए गए संकल्प को पूरा करने के लिए वर्तमान लेख श्रृंखला के 5वें लेख को भी उतना ही सम्मान मिलेगा, गुरूसाहित्य जो ठहरा।

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1.गाँधी जी के परामर्श एवं सान्निध्य से ऐसी प्रतिभाएँ निखरीं, एकत्रित हुईं एवं कार्य क्षेत्र में उतरीं कि उस समुच्चय ने देश के वातावरण में शौर्य-साहस के प्राण फूँक दिये। उनके द्वारा जो किया गया, सँजोया गया, उसकी चर्चा चिरकाल तक होती रहेगी। देश की स्वतन्त्रता जैसी उपलब्धि का श्रेय, उसी परिकर को जाता है, जिसे गाँधी जी के व्यक्तित्व से उभरने का अवसर मिला, उनमें सचमुच जादुई शक्ति थी। इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्री चर्चिल भारत के वायसराय को परामर्श दिया करते थे कि वे गाँधी जी से प्रत्यक्ष मिलने का अवसर न आने दें। उनके समीप पहुँचने से वह उनके जादुई प्रभाव में फँसकर, उन्हीं का हो जाता है।

2.बुद्ध को मार डालने का षड्यन्त्र अंगुलिमाल महादस्यु ने बनाया। वह तलवार निकाले बुद्ध के पास पहुँचा और आक्रमण करने पर उतारू ही था कि सामने पहुँचते-पहुँचते पानी-पानी हो गया। तलवार फेंक दी और प्रायश्चित के रूप में न केवल उसने दस्यु-व्यवसाय छोड़ा बल्कि  बुद्ध का शिष्य बनकर शेष जीवन को धर्मधारणा के लिए समर्पित कर दिया।

3.परम पूज्य गुरुदेव पर भी तो दो बार चाकू और बन्दूक से हमले हुए, क्या हुआ सभी जानते हैं।

4.ऐसा ही कुचक्र अम्बपाली नामक वेश्या रचकर लाई थी लेकिन सामने पहुँचते-पहुँचते उसका सारा बना-बनाया जाल टूट गया, वह चरणों पर गिरकर बोली:पिता जी मुझ नरक के कीड़े को किसी प्रकार पाप-पंक से उबार दें। बुद्ध ने उसके सिर पर हाथ फिराया और कहा कि ‘तू आज से सच्चे अर्थों में मेरी बेटी है। अपना ही नहीं, मनुष्य जाति के उद्धार का कार्यक्रम मेरे वरदान के रूप में लेकर जा।’ सभी जानते हैं कि अम्बपाली के जीवन का उत्तरार्ध किस प्रकार लोकमंगल के लिए समर्पित हुआ।

5.नारद कहीं अधिक देर नहीं ठहरते लेकिन उनके थोड़े से सम्पर्क एवं परामर्श से ध्रुव, प्रह्लाद, रत्नाकर आदि कितनों को ही कितनी ऊँचाई तक चढ़-दौड़ने का अवसर मिला।

6.वेदव्यास का साहित्य-सृजन प्रख्यात है। उनकी सहायता करने गणेशजी लिपिक के रूप में दौड़े थे।

7.भगीरथ का पारमार्थिक साहस धरती पर गंगा उतारने का था। कुछ अड़चन पड़ी, तो शिवजी जटा बिखेरकर उनका सहयोग करने के लिए आ खड़े हुए।

8.विश्वामित्र की आवश्यकता समझते हुए हरिश्चन्द्र जैसों ने अपने को निछावर कर दिया। माता गायत्री का सहयोग उस महाऋषि को जीवन भर मिलता रहा। प्रसिद्ध है कि तपस्विनी अनुसूया की आज्ञा पालते हुए तीनों देवता उनके आँगन में बालक बनकर खेलते रहने का सौभाग्य-लाभ लेते रहे।

9.जापान के गाँधी ‘कागावा’ ने उस देश के पिछड़े समुदाय को सभ्य एवं समर्थों की श्रेणी में ला खड़ा किया था।

10.महामना मालवीय, स्वामी श्रद्धानन्द, योगी अरविन्द, राजा महेन्द्र प्रताप, रवीन्द्रनाथ टैगोर की स्थापित शिक्षा संस्थाओं ने कितनी उच्चस्तरीय प्रतिभाएँ विनिर्मित करके राष्ट्र को समर्पित कीं।

इन घटनाक्रमों को भुलाया नहीं जा सकता। विवेकानन्द, दयानन्द आदि के द्वारा जो जन-कल्याण बन पड़ा, उसे असाधारण ही कहा जाएगा। प्रतिभाएँ सदा ऐसे ही कार्यक्रम हाथ में लेतीं और उसे पूरी करती हैं।

11.रियासतों को भारत-गणतन्त्र में मिलाया जाना था। कुछ राजा सहमत नहीं हो रहे थे और अपनी शक्ति का परिचय देते हुए तलवार हिला रहे थे। सरदार पटेल ने कड़ककर कहा:

इस तलवार से तो मेहतरों की झाडू अधिक सशक्त है, जो कुछ कर तो दिखाती है।’ राजाओं को पटेल के आगे समर्पण करना पड़ा ।

12.राणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, राजा छत्रशाल आदि के पराक्रम प्रसिद्ध हैं, जिन्होंने स्वल्प-साधनों से जो लड़ाइयाँ लड़ीं, उन्हें असाधारण पराक्रम का प्रतीक ही माना जा सकता है।

13.लक्ष्मीबाई ने तो महिलाओं की एक पूरी सेना खड़ी कर ली थी और समर्थ अँग्रेजों के छक्के ही छुड़ा दिए थे।

14.चाणक्य की जीवनी जिन्होंने पढ़ी है, वे जानते हैं कि परिस्थितियाँ एवं साधन नहीं बल्कि मनोबल के आधार पर क्या कुछ नहीं किया जा सकता है।

15.परशुराम ने समूचे विश्व के आततायियों का मानस किस प्रकार उलट दिया था, यह किसी से छिपा नहीं है।

16.नेपोलियन भयंकर युद्ध में फँसा था, साथ में एक साथी था, सामने से गोली चल रही थी। साथी घबराने लगा तो नेपोलियन ने कहा: डरो मत, वह गोली अभी किसी फैक्टरी में ढली नहीं है, जो मेरा सीना चीर सके। वह संकट में घिरा होने के बावजूद दनदनाता चला गया और एक ही हुंकार में समूची शत्रुसेना को अपना सहायक एवं अनुयायी बना लिया। ऐसी होती है प्रतिभा।

17.अमेरिका का अब्राहम लिंकन, जार्ज वाशिंगटन, इटली के गैरीबाल्डी आदि की गाथाएँ भी ऐसी हैं कि वे गई-गुजरी परिस्थितियों का सामना करते हुए जनमानस पर छाए और राष्ट्रपति पद तक पहुँचने में सफल हुए।

18.लेनिन के बारे में जो जानते हैं, उन्हें विदित है कि साम्यवाद के सूत्रधार के रूप में उन्होंने क्या से क्या करके दिखा दिया।

19.विनोबा का भूदान आन्दोलन, जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रान्ति सहज ही भुलाई नहीं जा सकती।

20.भामाशाह की उदारता देश के कितने काम आई। बाबा साहब आमटे द्वारा की गई पिछड़ों की सेवा एक जीवन्त आदर्श के रूप में अभी भी विद्यमान है।

21.विश्वव्यापी स्काउट आन्दोलन को खड़ा करने वाले वेडेन पावेल की सृजनात्मक प्रतिभा को किस प्रकार कोई भुला सकता है।

22.सुभाषचन्द्र बोस की आजाद हिन्द सेना अविस्मरणीय है।

23.भारतीय साहित्यकारों के उत्थान की गाथाओं में कुछ के संस्मरण बड़े प्रेरणाप्रद हैं।

पुस्तकों का बक्सा सिर पर रखकर फेरी लगाने वाले भगवती प्रसाद वाजपेयी किस व्यक्तित्व के मालिक थे उन पर चर्चा करना प्रासंगिक लग रहा है।

भगवती प्रसाद वाजपेयी का सिर पर बक्सा रखकर चलने का किस्सा उनके शुरुआती संघर्षपूर्ण और स्वाभिमानी साहित्यिक जीवन से जुड़ा हुआ है। हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कहानीकार और उपन्यासकार पंडित भगवती प्रसाद वाजपेयी का शुरुआती जीवन अत्यंत अभावों में बीता था।

इस किस्से की मुख्य बातें इस प्रकार हैं:

  • स्वाभिमानी फेरीवाले का रूप: अपने जीवन के शुरुआती दिनों में जब उनके पास आजीविका का कोई ठोस साधन नहीं था, तब उन्होंने दूसरों के सामने हाथ फैलाने या अपनी गरीबी का रोना रोने के बजाय पुस्तकों की फेरी लगाना चुना। वे अपनी लिखी और अन्य प्रकाशकों की पुस्तकों का एक भारी बक्सा अपने सिर पर रख लेते थे और गलियों-मोहल्लों तथा मेलों में घूम-घूमकर उन्हें बेचते थे।
  • प्रतिभा और स्वाभिमान का उदाहरण: उनके इस संघर्ष को हिंदी साहित्य में एक ऐसे प्रेरक प्रसंग के रूप में याद किया जाता है जो यह दिखाता है कि एक महान रचनाकार बनने के लिए किसी सुख-सुविधा की नहीं बल्कि अटूट इच्छाशक्ति और स्वाभिमान  की आवश्यकता होती है। वे भिक्षान्न (मांगकर खाने) जैसी स्थिति से उबरकर अपनी मेहनत के दम पर आगे बढ़े।
  • रचनाओं में प्रभाव (जैसे ‘मिठाईवाला’): माना जाता है कि सिर पर बक्सा या पेटी रखकर गलियों में घूमने के उनके इसी व्यक्तिगत अनुभव ने उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘मिठाईवाला’ (या फेरीवाला) के पात्र को गढ़ने में बहुत मदद की। उस कहानी का फेरीवाला भी बच्चों को देखकर अपनी पेटी खोलता है और बेहद कम दाम में सामान बेचकर आत्मिक सुख पाता है। वाजपेयी जी ने स्वयं उस ज़मीनी जीवन और फेरीवालों के दर्द व मानसिकता को बहुत करीब से जिया था।

आगे चलकर अपनी इसी अटूट लगन के बल पर वे हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति बने, दर्जनों उपन्यासों व कहानियों की रचना की और प्रेमचंद युग के एक शीर्ष कथाकार के रूप में स्थापित हुए।

आगे की पंक्तियों में उस विश्वविख्यात साहित्यकार का संक्षिप्त सा वर्णन है जिन्हें गूगल में “कूड़ों में से चीथड़े बटोरकर गुज़ारा करने वाले,यां गोर्की” टाइप करके सर्च किया जा सकता है। यह वर्णन उस महान रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की का है जो कूड़े के ढेरों में से कागज़ के चीथड़े और हड्डियां ढूंढते थे कि ताकि उन्हें बेचकर कुछ पैसे कमा सकें और अपना गुज़ारा कर सकें। पाठकों के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसा करना केवल गरीबी ही थी यां प्रतिभा के परिष्कार की भूख ।

कूड़े में से गोर्की द्वारा चीथड़े बीनने के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:

  • भयानक गरीबी और अनाथ होना: गोर्की का असली नाम ‘अलेक्सी मैक्सिमोविच पेश्कोव’ था। बचपन में ही उनके पिता और माँ का देहांत हो गया था। उनके नाना का व्यवसाय डूब चुका था और उन्होंने गोर्की को बहुत कम उम्र में ही अपने पैरों पर खड़े होने के लिए घर से बाहर भेज दिया था।
  • रोजी-रोटी का एकमात्र साधन: गोर्की अपने हम-उम्र गरीब दोस्तों के साथ मिलकर दिनभर सड़कों और कूड़ेदानों में कबाड़ ढूंढते थे। उस समय उन चीथड़ों और कागजों को कबाड़ियों को बेचकर जो भी थोड़े-बहुत पैसे मिलते थे, उससे वे अपने लिए खाना जुटाते थे।
  • कठिन जीवन का अनुभव: इस अत्यधिक गरीबी, भूख और अपमानजनक परिस्थितियों का सामना करने के कारण ही उन्होंने बाद में अपना उपनाम ‘गोर्की’ रखा, जिसका रूसी भाषा में अर्थ  “कड़वा” होता है । उन्होंने अपनी इन कड़वी यादों और अनुभवों को अपनी विश्वप्रसिद्ध आत्मकथा ( ‘बचपन’ या ‘My Childhood’) और कहानियों में जीवंत रूप से समेटा है।

आज के इस प्रेरणादायक ज्ञानप्रसाद लेख का समापन हमारे इस बार के वैंकुवर प्रवास के साथ कर रहे हैं :

गोर्की की गरीबी का साक्षात् स्वरूप उस दिन हमने तब देखा जब हम गाड़ी में रेड ट्रैफिक लाइट पर रुके हुए थे। बाईं तरफ से पैदल यात्री आने शुरू हो गए थे। तभी हमने एक पैदल चलते पुरुष को देखा जिसने बड़ी ही पुरानी टूटी-फूटी साइकिल पर दो-तीन प्लास्टिक बैग लादे हुए थे जो कोक के खाली कैन, पानी की खाली प्लास्टिक बोतलें, और न जाने क्या कुछ से भरे हुए थे। घर आकर बेटे से पूछा तो उसने बताया कि यह लोग Recycle प्लांट में बेचते हैं,कुछ पैसे  मिल जाते हैं, जिनसे उनका गुज़ारा हो जाता है। साथिओ, यह वैंकुवर महानगर की बात कर रहे हैं,किसी छोटे-मोटे गाँव की नहीं है।

खैर जो भी हो,साथिओ आज के लेख का सन्देश यही है :

यदि उद्देश्य परिश्रम करना, प्रतिभा का विस्तार करना हो तो दिव्य संरक्षण एवं सहायता भी मिल ही जाती है।

जय गुरुदेव


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