वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

कहीं आप आतंकवाद को प्रतिभा तो नहीं समझ रहे?

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” के दिव्य संग्रह की आठवीं पुस्तिका “महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण” पर आधरित लेख श्रृंखला का आज चौथा लेख प्रस्तुत किया गया है। प्रतिभा के विषय पर इसी मंच से अनेकों लेख प्रसारित हो चुके हैं लेकिन फिर भी वर्तमान श्रृंखला में इस महत्वपूर्ण विषय पर जमकर चर्चा हो रही है,पाठक कमेंट-काउंटर कमेंट की प्रक्रिया का पूरी तरह से लाभ उठा रहे हैं। धन्यवाद् करते हैं।

आज के ज्ञानप्रसाद लेख में साथिओं का स्वागत है। आज समझने का प्रयास है कि कहीं हम आतंकवाद को प्रतिभा समझने की गलती तो नहीं कर रहे ? इसी लेख में श्राप (जिसे भी प्रतिभा ही समझा गया है) की मनोवैज्ञानिक चर्चा की गयी है।

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सभी उपलब्धियों का अपना-अपना महत्त्व है। उन्हें पाने वाले गौरवान्वित भी होते हैं और दूसरों को चमत्कृत भी करते हैं लेकिन स्मरण रखने की बात यह है कि यदि किसी उपलब्धि में “परिष्कृत प्रतिभा” का अभाव हो तो अक्सर उसका दुरुपयोग ही होता है। दुरुपयोग से अमृत भी विष बन जाने की उक्ति अप्रासंगिक नहीं है। शरीरबल,शस्त्रबल यहाँ तक कि बुद्धिबल से सम्पन्न विभूतिओं को आतंकवादी,अनाचारी, आक्रमणकारी,अपराधी के रूप में अपनी  उपलब्धि का दुरुपयोग करते एवं अपने समेत अनेकों  को संकट में धकेलते देखा जाता है। ऐसा भी देखा गया है कि सम्पदा अर्जित करने वाले उसका सही उपयोग न कर पाने  पर विलास, दुर्व्यसन उद्धत् अपव्यय, विग्रह खड़े करने वाले अहंकार-प्रदर्शन आदि में खर्च करते देखे गये हैं। अवांछनीय व्यक्तियों और कार्यों का उसको सहयोग मिल जाने पर अनर्थ ही अनर्थ खड़े होता देखा गया है। बढ़ी हुई शिक्षा या चतुरता एक से बड़े एक प्रपंच रचती है, ऐसे जाल-जंजाल बुनती है जिनमें फँसने वालों को मछुआरों और चिड़ीमारों से पाला पड़ने जैसा भाग्य कोसना पड़ता है।

सौंदर्य भी एक प्रकार की प्रतिभा ही है, उसके परिष्कार में भी तो कितना ही कठिन प्रयास किया जाता है लेकिन बढ़ा हुआ सौन्दर्य भी व्यभिचार(Extra marital affairs) का ही रास्ता पकड़ता है। बड़े साहब,अफसर रिश्वतखोरी से, खोटी कमाई से जिस प्रकार बड़े आदमी बनते हैं,उसे देखकर यही सोचना पड़ता है कि यदि यह लोग शरीर-श्रम भर से पेट भरने वाले श्रमिक रहे होते तो हजार गुना अच्छा था। प्रतिभा ही है,जो वैभव को उपार्जित ही नहीं करती बल्कि उसके सदुपयोग भर के लिए उच्चस्तरीय सुझाव,संकल्प और साहस भी प्रदान करती है। बड़प्पन भी तो इसी पर आश्रित है।

अक्सर कहा गया है कि प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है ही नहीं। आदर्शवादी प्रयोजन, सुनियोजन व्यवस्था और साहसभरी पुरुषार्थ-परायणता को यदि मिला दिया जाए तो उस गुलदस्ते का नाम प्रतिभा रखा जा सकता है।

कहते हैं कि सत्य में हजार हाथी के बराबर बल होता है। सच्चाई तो इस कथन में भी हो सकती है लेकिन यदि उसके साथ प्रतिभाभरी जागरूकता-साहसिकता को भी जोड़ दिया जाए, तो सोना पर सुहागे जैसी बात बन सकती है। यदि सच्चाई-साहसिकता-जागरुकता,तीनो इक्क्ठे हो जाएँ तो हजार हाथियों की अपेक्षा लाख ऐरावतों जैसी शक्ति-सम्पन्नता भी कहा जा सकता है। इस त्रिवेणी को मनुष्य जीवन का  सबसे बड़ा सौभाग्य कहा जा सकता  है।

आतंक का प्रदर्शन करना, किसी गलत काम के लिए दूसरों को डराना, डाकुओं जैसे दुस्साहस का नाम प्रतिभा नहीं है। यदि ऐसा होता तो सभी आतंकवादी, अपराधियों को प्रतिभावान कहा जाता, उनका तो सीधा नाम दैत्य या दानव है। दादागीरी, आक्रमण की व्यवसायिकता अपनी जगह काम करती तो देखी जाती है लेकिन उसके द्वारा उत्पीड़ित किए गए लोग शाप ही देते रहते हैं। हर किसी व्यक्ति के मन में उनके लिए अश्रद्धा ही नहीं,घृणा और शत्रुता ही बनी रहती है। भले ही आम कमज़ोर जनता प्रतिशोध के रूप में कुछ भी कर पाने में असमर्थ होती है लेकिन कभी न कभी तो सेर को सवासेर मिलता ही है, ईंट का जवाब पत्थर से मिलता ही है। भले ही सारी दुनिया डर  के कारण उस अन्याय के आगे झुक जाए, प्रकृति अपनी परम्परा के हिसाब से उठने वाले बबूले की हवा स्वयं निकाल देती है । ईश्वर की लाठी बड़ी बलवान है सही प्रतिभाशाली इस तथ्य से भलीभांति परिचित हैं।

दुविधा के समय में अक्सर ऐसे लोग एक शक्तिशाली मार्गदर्शक का कार्य निभाते हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें अन्याय नहीं दिख रहा होता लेकिन यदि वोह भी घबरा कर हथियार डाल  दें तो कहाँ कुछ होने वाला है। यही कारण है कि आपातकालीन स्थितिओं में वशिष्ठ,वरिष्ठ,प्रतिभाशाली,अनुभवी लोग ही आगे आकर अपना योगदान देते है, ऐसी स्थिति में भगवान् भी साथ देने में पीछे नहीं रहते।

पाठकों ने नोटिस किया होगा कि उपरोक्त पंक्तियों में शाप का ज़िकर हुआ है। इसे श्राप, अभिशाप या बददुआ भी कहा जाता है। यहाँ जब प्रतिभाओं के दुरूपयोग की बात हो रही है तो श्राप भी तो एक प्रतिभा ही है, क्या इसका भी दुरूपयोग हो सकता है? क्या श्राप देने वाले ने अपनी प्रतिभा का इतना परिष्कार कर लिया  है कि धूनी रमाकर बैठे साधु महाराज फूँक मार कर किसी का अनर्थ कर सकते हैं ?  आधुनिक युग में कहाँ कोई इसे मानने को तैयार होगा,यह तो प्रतक्ष्यवाद का युग है,उसी पर विश्वास किया जाता है जो सामने दिखता है। विज्ञान भी प्रतक्ष्यवाद का ही साथ देता है, वोह तो यहाँ तक कह चुका  है कि हम तो उसी को सत्य मानते हैं जिन्हें वैज्ञानिक टूल्स की सहायता से मापा,परखा और बार-बार  रिपीट किया जा सके। वैज्ञानिक तो ऐसा भी कहते देखे गए हैं कि अभिशाप या बददुआ को किसी लैब में टेस्ट नहीं किया जा सकता,इसलिए विज्ञान इसे केवल एक अंधविश्वास या केवल एक मानसिक अवधारणा मानता है।

हमारी जिज्ञासु विज्ञानी प्रवृति ने श्राप की जड़ तक जाने का कदम उठाया और जो कुछ हमें प्राप्त हुआ उसे परिवार में शेयर करना अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं। ज्ञानप्रसाद लेखों द्वारा अन्धविश्वास को हटा कर ज्ञान के आलोक का विस्तार करना ही हमारा एकमात्र लक्ष्य है।

आइए देखें और समझें कि श्राप जैसी प्रतिभा को किस दृष्टि से डील करना चाहिए।

हालाँकि भौतिक विज्ञान, जिसका मुख्य रिश्ता प्रयोगशालाओं और Instruments से ही है श्राप को अन्धविश्वास ही कहकर नकार देता है लेकिन साइकोलॉजी और सोशल साइंस में ऐसा नहीं है। यह दोनों Discipline मनुष्यों से सम्बंधित हैं, इनके सारे प्रयोग मनुष्यों के मस्तिष्क/ह्रदय पर ही केंद्रित हैं तो मनोवैज्ञानिकों के अनुसार श्राप या बददुआ का इंसानी दिमाग और व्यवहार पर गहरा असर पड़ता है। इसके पीछे मनोवैज्ञानिक पक्ष इस प्रकार है: नोसिबो इफेक्ट (Nocebo Effect):

जिस प्रकार प्लेसिबो इफेक्ट (Placebo effect) में व्यक्ति को केवल विश्वास दिलाने से कि वह ठीक हो रहा है, उसकी बीमारी ठीक होने लगती है, उसी तरह इसका उल्टा नोसिबो इफेक्ट होता है। ईश्वर ने मानव को दिमाग एक ऐसा Equipment दिया है जिसे एक छोटे बच्चे की भांति किसी भी राह में डाला जा सकता है। विचारों का ही तो सारा खेल है,इसीलिए परम पूज्य गुरुदेव ने सबसे बेसिक तथ्य (विचारों को बदलना) पर काम करने का बीड़ा उठाया। Placebo effect में बिना दवाई के ही/मीठा पानी पिला कर ही रोगमुक्त किया जा सकता है तो Nocebo effect से रोगग्रस्त क्यों नहीं किया जा सकता? Placebo effect में  दवाई तो दी ही नहीं जा रही यां रोगी को मन बहलाने के लिए मीठी गोली दी जा रही है तो रोगी के विचार ठीक होने की तरफ प्रवृत होते हैं,मनोवैज्ञानिक उसे पाजिटिविटी की ओर लेकर जा रहा है,उसका मन उसी दिशा में ट्रेन हो रहा है, इस शक्तिशाली इफ़ेक्ट से रोगी मौत के मुँह से बाहिर आते देखे गए हैं, मित्रो यही ही गुरुदेव का  विचारक्रांति  अभियान।

Placebo effect की दूसरी तरफ Nocebo effect को देखें तो पता चलेगा की यदि किसी व्यक्ति का अंधविश्वास या धार्मिक मान्यताओं पर गहरा भरोसा है और उसे कोई श्राप  दे देता है, तो उसका दिमाग नेगटिवली सोचने लगता है। इस नकारात्मक सोच, डर और तनाव के कारण उसके शरीर में  स्ट्रेस हार्मोन (Cortisol, Adrenaline) बढ़ने लगते हैं और Feel good hormones (Dopamine,Endorphins आदि) कम  होने लगते हैं।  लंबे समय तक इस मानसिक तनाव में रहने से व्यक्ति सचमुच बीमार पड़ सकता है या घबराहट में उससे गलतियां (जैसे दुर्घटनाएं) हो सकती हैं। व्यक्ति को लगता है कि यह श्राप का असर है जबकि यह केवल उसके अपने दिमाग का डर,नकारात्मक विचारों का घर्षण ही  होता है। यहाँ पर झाड़ू वाले बाबा जी,धूनी वाले बाबा जी आदि का जन्म होता है जो ताबीज़ और न जाने क्या कुछ उपचार बताकर बेचारे मनुष्य से क्या कुछ ऐंठ लेते हैं।

साइकोलॉजी में कन्फर्मेशन बायस (Confirmation Bias) बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। इसके अनुसार इंसानी दिमाग की एक आदत होती है कि वह उसी चीज़ पर ध्यान देता है जिसे वह सच मानना चाहता है अर्थात वोह Biased है। यदि किसी को बददुआ मिली है और उसके बाद उसके जीवन में कोई भी सामान्य बुरी घटना (जैसे नौकरी छूटना, बीमार होना या एक्सीडेंट) होती है तो वह उसे तुरंत उस श्राप से जोड़ देता है। बाबा जी को भिक्षा नहीं दी तो वोह ढोंगी बाबा श्राप देकर चला गया। कन्फर्मेशन बायस के कारण मनुष्य उन सभी अच्छी बातों को भूल जाता है जो उसके साथ घटित हुई थीं। यहीं पर Unwanted sympathy, इमोशनल ब्लैकमेल, बेचारेपन की स्थिति का जन्म होता है। हम तो इतना ही कह सकते हैं कि मनुष्य को भगवान ने ऐसी-ऐसी विभूतिओं से लैस करके इस धरती पर भेजा है कि बेचारेपन की बात ही कहाँ उठती है। स्मरण रहे कि हम एक शक्तिशाली परन्तु फकीर गुरु की संतान हैं, उनका रचित ज्ञान इतना कमज़ोर तो नहीं है।

यहाँ एक और भी बहुत शक्तिशाली एलिमेंट जिसे आत्म-भविष्यवाणी (Self-Fulfilling Prophecy) का नाम दिया गया है समझने की ज़रुरत है। इस सिद्धांत के अंतर्गत जब कोई व्यक्ति मान लेता है कि उसे श्राप मिला हुआ है और उसका बुरा ही होने वाला है,तो वह अवचेतन रूप से (subconsciously) हार मान लेता है या लापरवाही करने लगता है, वोह धारणा बना लेता है कि श्राप मिला हुआ है कुछ होना तो है नहीं तो फिज़ूल में प्रयास क्यों किया जाए। उदाहरण के लिए, वह अपने काम पर ध्यान देना बंद कर सकता है या सेहत का ख्याल रखना छोड़ सकता है। इसके परिणामस्वरूप जब सचमुच कुछ बुरा होता है, तो वह अपनी गलती देखने के बजाय श्राप को दोष देता है।ऐसी प्रवृति के लोग ही धरती माँ पर बोझ हैं।   श्राप का विकासवादी और सामाजिक कारण (Evolutionary Perspective) भी है। पुराने समय में जब कोई मजबूत कानून या पुलिस व्यवस्था नहीं थी,तब समाज को नियंत्रित करने और लोगों को गलत काम करने से रोकने के लिए श्राप या पाप-पुण्य जैसी अवधारणाएं बनाई गईं। यह एक तरह का सामाजिक डर (Social Deterrent) था ताकि लोग दूसरों को धोखा देने या नुकसान पहुंचाने से डरें।बददुआ का डर लोगों को नैतिक रूप से सही काम करने के लिए मजबूर करता था।

गलत काम करने वाले प्रतिभावान नहीं हो सकते यदि लोग उन्हें ऐसा समझते  तो अब तक दुनिया उन्हीं के पेट में समा गई होती और भलमनसाहत को चरितार्थ होने के लिए कहीं स्थान ही न मिलता। काया और छाया दोनों देखने में एक जैसी लग सकती हैं लेकिन उनमें जमीन-आसमान जैसा अंतर् होता है। मूँछें मरोड़ने, आँखें तरेरने और दर्प का प्रदर्शन करने वालों की कमी नहीं। ठगों और जालसाजों की करतूतें भी देखते ही बनती हैं। इतने पर भी उनका अन्त कुकुरमुत्तों जैसी विडम्बना के साथ ही होता है। यों इन दिनों तथाकथित प्रगतिशील ऐसे ही अवाञ्छनीय हथकण्डे अपनाते देखे गए हैं लेकिन उनका कार्यक्षेत्र विनाश ही बनकर रह जाता है। कोई महत्त्वपूर्ण सृजनात्मक उत्कृष्टता का पक्षधर प्रगतिशील कार्य उनसे नहीं बन पड़ता।

यह विवेचना इसलिए की जा रही है कि जिनको बोलचाल की भाषा में प्रगतिशील कहा जाने लगा है,उनकी वास्तविकता समझने में किसी को भ्रम न रह जाए, कोई आतंक को प्रतिभा न समझ बैठे। प्रतिभा  तो उत्कृष्टता के साथ साहसिकता का नाम है, वह जहाँ भी होती है, वहाँ कस्तूरी की तरह महकती है और चन्दन की तरह समीपवर्ती वातावरण को प्रभावित करती है।

जय गुरुदेव


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