गायत्री परिवार में वर्ष 2026 को त्रय शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है, इसी उपलक्ष्य में ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार ने भी 2026 का सारा वर्ष इन तीन शताब्दियों को समर्पित किया हुआ है। इस संकल्प का एक भाग “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की 23 पुस्तिकाओं का एक-एक करके न केवल अध्ययन किया जा रहा बल्कि सरलीकरण एवं समझीकरण की प्रक्रिया को फॉलो करके इस मंच पर प्रस्तुत किया जा रहा है।
इसी श्रृंखला में प्रस्तुत किये गए आज के ज्ञानप्रसाद में इस पुस्तकमाला की आठवीं रचना का तीसरा लेख प्रस्तुत किया गया है। आज के लेख में, उदाहरणों के साथ समझने का प्रयास है कि “प्रतिभा लिविंग शक्ति वर्षा कैसे है।” आशा करते हैं कि इस लेख को भी पूर्ण श्रद्धा एवं सम्मान प्राप्त होगा।
सभी साथिओं का आज का गुरुकक्षा में स्वागत है।
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आधुनिक युग का अति विकसित दिख रहा संसार सुन्दर, सुसज्जित, सुसंस्कृत,समुन्नत विकसित सदा से ऐसा नहीं था । आदिकाल का मनुष्य तो वनमानुषों की तरह भूखा-नंगा फिरता था। ऋतु-प्रभावों से मुश्किल से ही जूझ पाता था। जीवित रहना और पेट भरना ही उसकी सबसे बड़ी समस्या थी। यह जुगाड़ बन पड़ने के बाद ही वह चैन की साँस भी लेता था। तब संसार इतना सुन्दर कहाँ था? यहाँ तहाँ खाई-खंदक टीले, ऊसर, बंजर, निविड़ वन और अनगढ़ जीव-जन्तु ही दिख पड़ते थे। आहार, जल और निवास तक की सुविधा न थी। ऐसी स्थिति में अन्य साधनों का उत्पादन और उपयोग बन पड़ने की बात ही कहाँ बन पाती होगी।
आज के संसार में जो कुछ दिख रहा है,अनुभव किया जा रहा है अपनेआप तो बन नहीं पाया है। उद्योग-व्यवसायों, विज्ञान-आविष्कारों, सुविधा-साधनों,अस्त्र-शस्त्र,सज्जा-शोभा, शिक्षा और सम्पदा से भरे-पूरे संसार की प्रगति के पीछे प्रतिभा का बहुत बड़ा योगदान रहा है। आदिमानव ने आधुनिक मनुष्य तक की लम्बी यात्रा सम्पन्न करने के लिए प्रतिभा के विकास के साथ-साथ अपने कलेवर का विस्तार भी किया है। श्रेय मनुष्य को दिया जाता है लेकिन सारा विश्व जानता है कि यह सब सम्पदा और बुद्धिमत्ता का ही खेल है। इससे दो कदम आगे और बढ़ाया जा सके तो सर्वतोमुखी प्रगति का एक ही दिख आधार दिख पड़ता है और वह है परिष्कृत प्रतिभा, There appears to be only one foundation for all-around progress, and that is a refined intellect.
“परिष्कृत प्रतिभा” के अभाव में अस्तित्व जीवित लाश से बढ़कर और कुछ नहीं रह जाता। आजकल तो धन,जायदाद, समृद्धि, विरासत आदि सम्पदाओं का बहुत महत्त्व समझा जाता है,जनमानस में अक्सर यह धारणा बनी हुई है कि समृद्धि ही सभी प्रकार की प्रगति की ड्राइविंग फ़ोर्स है लेकिन ऐसा है नहीं। हर तरफ से समृद्ध व्यक्ति भी असफल होते देखे जाते हैं क्योंकि प्रगति की अगली सीढ़ी समर्थता, बुद्धिमत्ता का महत्व भुला दिया जाता है। समृद्धि और बुद्धिमता की दो सीढ़ियों से अगली ऊँचाई की ओर दृष्टि दौड़ाई जाए तो दार्शनिक, शासक, कलाकार, वैज्ञानिक, निर्माता एवं जागरूक लोगों में ही “परिष्कृत प्रतिभा” का ही चमत्कार दिखता है। समाज में ऐसे लोगों का होना एक सौभाग्य समझा जाता है क्योंकि इन लोगों की दृष्टि इतनी पैनी होती है कि जो यह लोग देख सकते हैं साधारण मनुष्य नहीं देख सकते। हर तथ्य का विश्लेषण करना,मीन-मेख निकालना, बाल की खाल उधेड़ना,हर बात का चीड़-फाड़ करना,हर बात की जड़ तक जाना उनकी प्रवृति होती है। ऐसे लोगों के लिए जीवन एक अमूल्य उपहार तो है ही,एक चैलेंज भी होता है। उनको सरल कामों में कहाँ मज़ा आता है, हर कठिन काम उनके लिए एक हॉबी होता है। उपरोक्त सभी कार्यों के लिए एक बहुत बड़ी विशेषता एवं विशिष्टता की आवश्यकता होती है और उस विशेषता का नाम है “साहसिकता”, इसी विशेषता को अक्सर दूरदर्शिता और विवेकशीलता के रूप में जाना जाता है।
यदि किसी व्यक्ति को वरिष्ठता या विशिष्टता का श्रेय मिल रहा हो, तो समझना चाहिए कि यह उसकी “विकसित प्रतिभा का ही चमत्कार” है। ज्ञान का अर्जन,प्रतिभा का विकास, बुद्धिमता का होना ही सच्चे अर्थों में वह वैभव है जिसे पाकर गर्व और गौरव का अनुभव किया जाता है। यह एक ऐसा गौरव होता है जिसे पाकर व्यक्ति सही अर्थों में मालामाल हो जाता है, वह याचक न रहकर दानवीर बन जाता है, उसका हमेशा देने में ही प्रयास रहता है। परिवार के वरिष्ठों में तो यह प्रवृति साक्षात् दिखाई देती है। बाल्यकाल से दादा-दादी,नाना-नानी “कहानियों के वैभव” से बच्चों को संरक्षण प्रदान करते आ रहे हैं। उनके पास सारे जीवन के अनुभव एवं प्रतिभा का ऐसा पिटारा होता है जिसे वोह बिना मांगे ही (कोई मांगे या न मांगे) एक दानवीर की भांति लुटाने को तैयार रहते हैं।
यहाँ एक बात समझने वाली है कि प्रतिभा का परिष्कार किताबों के ज्ञान के साथ-साथ अनुभव की बहुत बड़ी माँग करता है। यदि यह दोनों (ज्ञान और अनुभव) अंग साथ-साथ होकर चलें तो ऐसी क्षमता (Capability) जन्म लेती है जो बड़े से बड़े बलिष्ठों को भी धराशायी कर देती है। शक्ति की सर्वत्र सराहना होती है लेकिन यदि उसका “बहुमूल्य अंश” खोजा जाए, तो उसे प्रतिभा के अतिरिक्त और कोई नाम नहीं दिया जा सकता। विज्ञान प्रतिभा का अनुयायी है और सम्पदा उसी की दासी है। यही दासी जहाँ-तहाँ से अपने साथ श्रेय और सम्मान घसीट लाती है,ऐसा होते ही गौरव-गाथाएं भी गायी जाने लगती हैं। प्रतिभा के मूल स्टैप से चली हुई यह यात्रा व्यक्ति को ऐसे स्तर तक ले आती है कि वही साधारण सा व्यक्ति अनुकरणीय और अभिनन्दनीय की केटेगरी में शामिल हो जाता है, ऐसे ही लोगों को विभूतिवान कहा जाता है।
पाठकों में से शायद ही कोई भारत के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय कलाम साहिब के नाम से अपरिचित होगा। संपदा के अभाव के बावजूद प्रतिभा ने उन्हें वैभव के उस शिखर पर पंहुचा दिया जिससे हर भारतीय को गर्व है। गणित के वैज्ञानिक श्रीनिवास रामानुजन के पास भी कोई सम्पदा नहीं थी लेकिन अपनी प्रतिभा के आधार पर रॉयल सोसाइटी में सबसे कम आयु के वैज्ञानिकों में से एक थे। 1887 में तमिलनाडु के छोटे से गाँव इरोड में जन्में रामनुजन के पास गणित के बड़े-बड़े फॉर्मूले सॉल्व करने के लिए,कागज़ खरीदने के लिए पैसे तक नहीं थे, उन्होंने इसका विकल्प धरती एवं स्लेट पर लिखना निकला। मात्र 33 वर्ष का जीवन जीने वाले इस वैज्ञानिक पर इसी मंच से एक लेख प्रकाशित हो चुका है।
आइए प्रतिभा को बल देती रामानुजन के स्कूल दिनों की एक घटना का अवलोकन कर लें।
यह घटना उनकी प्रारंभिक शिक्षा की एक रोचक घटना है। गणित के अध्यापक कक्षा में भाग (Division) की क्रिया समझा रहे थे। अध्यापक ने प्रश्न किया कि अगर तीन केले तीन विद्यार्थियों में बांटे जाये तो हरेक विद्यार्थी के हिस्से में कितने केले आयेंगे? विद्यार्थियों ने तत्काल उत्तर दिया कि हरेक विद्यार्थी को एक-एक केला मिलेगा। इस प्रकार अध्यापक ने समझाया कि यदि किसी संख्या को उसी संख्या से डिवाइड कर दिया जाये तो उसका उत्तर 1 होगा जैसे कि 8 को 8 से डिवाइड करने पर उत्तर 1 है, यां कोई और डिवीज़न। लेकिन तभी कोने में बैठे रामानुजन ने प्रश्न किया कि, यदि कोई भी केला किसी को न बाँटा जाए, तो क्या तब भी प्रत्येक विद्यार्थी को एक केला मिल सकेगा? सभी विद्यार्थी इस प्रश्न को सुनकर हँस पड़े, क्योंकि उनकी दृष्टि में यह प्रश्न मूर्खतापूर्ण था। लेकिन बालक रामानुजन द्वारा पूछे गए इस गूढ़ प्रश्न पर गणितज्ञ सदियों से विचार कर रहे थे। प्रश्न था कि अगर ज़ीरो(0) को ज़ीरो (0) से विभाजित किया जाए तो परिणाम क्या होगा? 10वीं शताब्दी के भारतीय गणितज्ञ भास्कराचार्य ने कहा था कि अगर किसी संख्या को शून्य से विभाजित किया जाये तो परिणाम “अनन्त” होगा, Infinite (∞ Infinity symbol ) होगा। रामानुजन ने इसका विस्तार करते हुए कहा कि शून्य को शून्य से विभाजन करने पर परिणाम कुछ भी हो सकता है अर्थात् वह डिफाइन नहीं है। रामानुजन की प्रतिभा से अध्यापक बहुत प्रभावित हुए। स्कूल टाइम के बच्चे की इस रिसर्च ने विश्व को एक ऐसी राह दी जिसे समझने के लिए गणित का ज्ञान होना आवश्यक है,इसलिए इसे यहीं पर छोड़ना उचित रहेगा।
यह होती है प्रतिभा की शक्ति जो संपदा की मोहताज नहीं है। इतिहास के पन्नों का यह उदाहरण उन व्यक्तियों के लिए एक मार्गदर्शन का कार्य कर सकता है जो संपदा का रोना रोते-रोते,अपने अंदर छिपी प्रतिभा को पहचान ही नहीं पाते। आसपास के लोगों की संपदा देखकर ईर्ष्या तो कर सकते हैं लेकिन अपनी प्रतिभा को पहचानने के लिए न तो उनके पास समय होता है और न ही सामर्थ्य। कल वाले लेख में ही वर्णन था कि प्रतिभा की दृष्टि से ईश्वर ने किसी के साथ भी कोई भेदभाव/पक्षपात नहीं किया है। परम पूज्य गुरुदेव का उदाहरण तो और भी विलक्षणता से भरपूर है। उन्होंने तो पूवजों से मिली सारी संपदा ही दान कर दी,वंदनीय माता जी,जिनकी इन दिनों जन्म शताब्दी मनाई जा रही है उन्होंने ने भी अपनी सारी संपदा दान कर दी और प्रतिभा और समर्पण से ही लोगों के ह्रदय में एक अद्भुत स्थान बना लिया।
साथिओ, उपरोक्त चर्चा केवल इस तथ्य पर मोहर लगाने के लिए की गयी है कि यदि व्यक्ति के पास प्रतिभा हो तो संपदा स्वयं ही पीछे-पीछे रेंगती आएगी। अपने ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में सभी को समयरुपी संपदा का एक जैसा (24 घंटे) अनुदान प्राप्त हुआ है, कोई पक्षपात नहीं किया गया है लेकिन अज्ञानतावश इस संपदा का सदुपयोग न कर पाने की क्षमता के कारण बहुत से साथी इस अभाव का बहाना बनाते हुए गुरूसाहित्य के अमृतपान से वंचित रह रहे हैं। लेकिन हम आग्रह एवं प्रेरित करने से कहाँ रुकने वाले हैं ? हम जानते हैं कि कार्य कठिन है, कठिन ही तो है- असंभव तो नहीं !!! हमारे साथी बार-बार कहते आए हैं कि गुरुदेव ने पात्रता जाँच कर ही हमें ज्ञानरथ परिवार का कार्य सौंपा है,गुरुदेव ने क्या सोचा, वोह तो वही जाने लेकिन हमें कठिन कार्यों से जूझ कर ही आनंद आता है, सरल कार्य तो हर कोई कर लेगा। गुरु का दिया निर्देश न मानें तो वोह कान भी खींचते हैं।
गुरुदेव बता रहे हैं कि दूध को तपाने पर मलाई तैरकर ऊपर आ जाती है। उस मलाई को जब ज़ोर-ज़ोर से मिक्सर के थप्पड़ पड़ते हैं तो मक्खन की उत्पति होती है, मक्खन को भट्ठी की आग में तपने के बाद ही घी का जन्म होता है। हमारे साथी समझ सकते हैं दूध से मक्खन और मक्खन से घी की यात्रा करते-करते किस स्तर का परिष्कार होता जाता है, हर स्टैप पर प्रोडक्ट का मूल्य बढ़ता ही जाता है। साथिओ,यही है प्रतिभा का परिष्कार। परिष्कृत प्रतिभा को जब जीवन से जुड़े महत्त्वपूर्ण प्रसंगों से निपटने का अवसर आता है तो प्रतिभा ही मुख्य सहयोगी की भूमिका निभाती देखी गयी है। प्रतिभा परिष्कार के कठिन कार्य में सहयोग देने के लिए दूरदर्शिता,साहसिकता,नीति-निष्ठा जैसी सहयोगनियाँ स्वतः ही आगे आ जाती हैं। ओजस, तेजस् और वर्चस भी उन्हीं सहयोगियों के दूसरे नाम हैं। जब किसी मनुष्य को सफलता मिलती है तो उसकी उपलब्धियों के योगदान की चर्चा होती है, अनेकों सर्टिफिकेट्स, ताम्र पत्र, स्वर्ण पदक आदि की सराहना होती है,गणना होती है लेकिन यदि उन सबको एकत्रित करके एक ही शब्द में केन्द्रित किया जाए तो “प्रतिभा” कहने भर से काम चल जाएगा। यदि इन उपलब्धिओं का खुलासा करना हो,स्वयं गौरव अनुभव करना हो, दूसरों को, संसार को प्रभावित करना हो तो “लिविंग शक्ति वर्षा” भी कह सकते हैं।
जय गुरुदेव
