वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

प्रतिभावान उदीयमान सूर्य होते हैं

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की 8वीं पुस्तक के दूसरे लेख में चर्चा की गयी है कि प्रतिभावान उदीयमान सूर्य होते हैं जिसके दर्शन होते ही सर्वत्र चेतना का एक नया माहौल उमड़ पड़ता है।

आज के ज्ञानप्रसाद लेख के अमृतपान के लिए  सभी गुरु शिष्यों को सादर आमंत्रण है,आइए इस दुर्लभ अवसर का लाभ उठाएं एवं अपने जीवन को स्वर्गमय बनाएं।

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प्रतिभा का होना एवं उसका लगातार परिष्कार करते रहना मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जी का निम्नलिखित विश्वप्रसिद्ध Quote है तो अध्यापकों के लिए हैं लेकिन किसी भी प्रतिभाशाली मनुष्य पर भी पूरी तरह से फिट बैठता है :

A teacher can never truly teach unless he is still learning himself. A lamp can never light another lamp unless it continues to burn its own flame. The teacher who has come to the end of his subject, who has no living traffic with his knowledge, but merely repeats his lesson to his students, can only load their minds, he cannot quicken them.

मनुष्य ने सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में वरिष्ठता पाई है। शरीर-संरचना और मानसिक-मस्तिष्कीय विलक्षणता के कारण उसने सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में न केवल स्वयं को सशक्त, समुन्नत सिद्ध किया है बल्कि ऐसी सम्भावनाएँ भी साथ लेकर आया है जिनके सहारे अपने समुदाय को,अपने समग्र वातावरण एवं भविष्य को भी शानदार बना सके। मनुष्य को प्रदान की गयी यह विशेषता प्रयत्नपूर्वक उभारी जाती है। रास्ता चलते किसी गली-कूचे में पड़ी नहीं मिल जाती। इस दिव्य विभूति को “प्रतिभा योग्यता, कौशल, विशेष योग्यता” कहते हैं जिसे इंग्लिश में Talent का नाम दिया गया है। जो इसे अर्जित करते हैं, वे सच्चे अर्थों में वरिष्ठ-विशिष्ट कहलाने के अधिकारी बनते हैं, दूसरे  प्राणी तो भीड़  में एक उथली स्थिति बनाए रहकर किसी तरह जीवनयापन करते हैं।

मनुष्य, गिलहरी की तरह पेड़ पर नहीं चढ़ सकता, बन्दर की तरह कुलाचें नहीं भर सकता। उसमें बैल जितनी भार उठाने  की क्षमता भी नहीं है। दौड़ने में वह चीते की तुलना तो क्या करेगा, खरगोश के बराबर भी अपने को सिद्ध नहीं कर सकता। उसके लिए पक्षियों की तरह आकाश में उड़ना  सम्भव नहीं, न ही वह मछलियों की तरह पानी में डुबकी ही लगा सकता है।

ऐसी अनेकों बातों में मनुष्य कई अन्य प्राणियों से बहुत पीछे है किन्तु विशिष्ट मात्रा में मिली चतुरता, कुशलता के सहारे वह इन सभी प्रणियो को मात देता है और अपने को स्पैशल सिद्ध करता है।

व्यावहारिक जीवन में मनुष्य अन्य प्राणि-समुदाय से अनेक दृष्टियों से कहीं आगे है। अधिकांश मनुष्यों को अन्य प्राणियों की अपेक्षा अधिक सुविधा-सम्पन्न जीवनयापन करते हुए देखा जाता है। इतने पर भी सम्भावना यह भी है कि वह इन उपलब्धियों की तुलना में और भी अधिक समर्थता और महत्ता प्राप्त कर सके लेकिन शर्त एक ही है कि उस अभिवर्धन के लिए वह स्वयं और अधिक शक्ति एवं ऊर्जा से प्रयास करे, अपनी कमियों को पहचाने और दूर करे।आज के मनुष्य के लिए इस तथ्य को समझने की  नितान्त आवश्यकता है। पेट पालने,प्रजनन,धन कमाने, भौतिक संपदा आदि के प्रति अधिक जागरूगता, तत्परता एवं तन्मयता बरतने की बहुत आवश्यकता है।

आज के मनुष्य को इस बेसिक बात को समझने की बहुत आवश्यकता है कि वह अपने पुरुषार्थ से सिद्ध कर सकता है  कि वह केवल दैवी अनुदानों के आधार पर, भगवान के  भरोसे ही नहीं जी रहा है बल्कि उसका निज का पुरुषार्थ भी समुचित मात्रा में शामिल है। तभी तो वर्षों पुराना “ God helps those who help themselves” वाला सिद्धांत आज भी सत्य है, गुरुदेव के संबंध में भी सत्य है। परम पूज्य गुरुदेव यही तो कहते हैं, “तू एक कदम तो उठा, दौड़ा कर ले जाना मेरा काम है। ज्ञान के जिस अंधकार में तू भटक रहा है, उसके कुछ कदम आगे प्रकाश ही प्रकाश है, दीपक लेकर कदम तो उठा,जैसे -जैसे आगे कदम बढ़ाता जाएगा,मार्ग स्वयं ही प्रकाशमय होता जाएगा  !!” भगवान ने मनुष्य को वोह सामर्थ्य प्रदान की है जिससे वो ज्ञान के महासागर की सतह से डुबकी मारकर रत्नों के भंडार अर्जित कर सकता है। यह कोई कोरी शेखी नहीं है, आए दिन चमत्कार देखने को मिल रहे हैं।

ऑनलाइन ज्ञानरथ ज्ञानरथ गायत्री परिवार में ही अनेकों साथियों ने चमत्कार देखे हैं,भौतिक दृष्टि को एक तरफ रख दें, केवल आत्मिक क्षेत्र का ही मूल्यांकन करें तो देखा जा सकता है कि नियमितता से, निरंतर गुरु के साहित्य का अमृतपान करने वाले कितनों को ही आत्मिक शांति प्रदान हुई है। इस आत्मिक शांति का श्रेय केवल और केवल उनकी प्रतिभा को ही जाता है जिसके बल पर वह अनेकों अन्यों की तुलना में अधिक सुसंस्कृत और समुन्नत हैं। हमारे साथी हमारे साथ सहमत होंगे कि भगवान ने प्रतिभा प्रदान करने में किसी के साथ भी, कोई भी पक्षपात नहीं किया है,शायद ही कोई ऐसा प्राणी होगा जिसके पास कोई न कोई अदभुत प्रतिभा न होगी, अरे भगवान ने तो जानवरों तक को अद्भुत प्रतिभाओं से श्रृंगारा हुआ है। साथियो, उठो, देखो, स्वयं का मूल्यांकन करो, अवश्य ही नकारात्मकता से बाहर निकल आओगे। यदि ऐसा हो जाता है तो समझा जाएगा कि ज्ञानप्रसाद लेखों का उद्देश्य सार्थक हो गया।

गोताखोर गहरी डुबकी लगाकर मोती/रत्न ढूंढते हैं। हीरों की तलाश करने वाले खान (Metal mines) का चप्पा-चप्पा ढूँढ़ डालते हैं। यह तथ्य प्रतिभा के रत्नों को ढूंढ निकालने के लिए भी सत्य है। प्रतिभा को उपलब्ध करने के लिए भी खानों की खुदाई, सफाई, चुनाई और परिष्कार की तरह कम प्रयास से काम नहीं चलता। सोच कर देखिए कि जब प्रतिभा का परिष्कार होता है तो मनुष्य अपनेआप में उतना ही गर्व का अनुभव करता है जितना रत्नों से जड़ी एक विश्व सुंदरी करती है। रत्नों की चमक जब देखने वालों की आँखें चुंधिया देती है तो सहसा ही मुँह से निकल पड़ता है, “वाह क्या अनमोल रत्न है!” यही रिएक्शन प्रतिभाशालीयों को मिलते हैं।

गुरुदेव बता रहे हैं कि प्रतिभा एक दिव्य स्तर की विद्युत चेतना ( Electric consciousness) है । इसे Divine consciousness, Cosmic consciousness/ awareness भी कहते हैं जो मनुष्य के व्यक्तित्व और कर्तृत्त्व में असाधारण स्तर की उत्कृष्टता भर देती है। उसी के आधार पर मनुष्य  आश्चर्यजनक सफलताएं उपलब्ध करता जाता है। जैसे-जैसे उसे सफलता मिलती जाती है, संकीर्णता खत्म होती जाती है एवं अन्य लोगों से जुड़ता जाता है, उसका दायरा बढ़ता जाता है,उसे असाधारण श्रेय, सम्मान मिलता जाता है। ऐसा होते ही वोह अपने बारे में कम सोचता है,दूसरों की समृद्धि एवं विकास की बात अधिक करना शुरू कर देता है। दूसरों को घसीट कर अभ्युदय के मार्ग पर चलने वाला मार्गदर्शन देना शुरू कर देता है। ऐसा इसलिए होता है कि उसका अपना तो कुछ रहता ही नहीं है, वोह सब कुछ ईश्वर को ही अर्पित करता जाता है।

पाठकों से निवेदन है कि ज़रा निष्पक्ष होकर सोचें कि क्या ऐसा ही कुछ इस छोटे से ज्ञानरथ परिवार में नहीं हो रहा?

गुरुदेव यहां पर माँझी का उदाहरण देकर हमें समझा रहे हैं कि नाव का खेवनहार नाव को खेकर स्वयं तो पार उतरता ही है लेकिन उस पर बिठाकर अन्यान्यों को भी पार उतारने का श्रेय प्राप्त करता है।

यही है प्रतिभा की जादूगिरी!! गिरों को उठाने, डूबतों को उबारने और जैसे-कैसे टाइम पास करने वालों को उत्कर्ष की ऊँचाई तक उछालने में समर्थ हो पाने की जादूगिरी। कॉलेज के दिनों में “टाइम पास” करने वाला विशेषण बहुत प्रचलित था। जिसको पूछते “क्या हालचाल है,कैसे हो?” तो एक ही रिप्लाई मिलता था, टाइम पास कर रहे हैं। हमारा एक ही रिएक्शन होता था: अरे मूर्ख यह दुर्लभ मनुष्य-जन्म बार-बार नहीं मिलता, बहती गंगा में हाथ धो ले।

सामान्य लोग अक्सर प्रतिभाशाली लोगों को असाधारण,विशिष्ट और वरिष्ठ कहते हैं। अधिकांश साधारणजन तो टाइम ही पास कर रहे होते हैं,जीवन की अंधी दौड़ में लगे होते हैं, झंझटों से निपट रहे होते हैं, बढ़िया जीवनयापन के साधन जुटाते-जुटाते ही इस संसार से विदा ले लेते हैं, सबसे बड़ी संपदा “समय” का अभाव साथ ही लेकर चले जाते हैं।

पशु-पक्षियों,पतंगों, जानवरों आदि से भी इतना ही पुरुषार्थ हो पाता है, इतना ही सुयोग जुट पाता है लेकिन प्रतिभावानों की बात ही कुछ और  है, वे तारागणों के बीच चन्द्रमा की तरह चमकते हैं। उनकी चाँदनी सर्वत्र शान्ति और शीतलता बिखेरती है। वह अपनी छत्रछाया के सम्पर्क में आने वाले अनेकों को शोभा एवं सुन्दरता से जगमगा देते हैं। प्रतिभावानों को उदीयमान सूर्य भी कह सकते हैं जिसके दर्शन होते ही सर्वत्र चेतना का एक नया माहौल उमड़ पड़ता है। वे स्वयं तो ऊर्जा और आभा के उद्गम होते ही हैं,अपनी किरणों का प्रभाव जहाँ तक पहुँचा पाते हैं,वहाँ भी बहुत कुछ उभारते-बिखेरते रहते हैं। सच तो यह है कि नर-वानर अर्थात वन के  वासी नर (वन+नर)  को शक्तिपुंज बनाने का श्रेय प्रतिभा को ही जाता है।

प्रतिभा ही शरीर में ओजस्विता, मानस में तेजस्विता और अन्त:करण में विभूति भरी वर्चस्विता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इन तीनों विशेषताओं  को Fingertips पर स्मरण रखने के लिए एक बार फिर संलग्न स्लाइड सहायक हो सकती है।

प्रतिभा-परिष्कार मनुष्य की अपनी निजी विशेषता का परम पुरुषार्थ ही है,इसके लिए मनुष्य को स्वयं ही परिश्रम करना होगा। जो भी इस पुरुषार्थ से वंचित रह गया,उसे सही मार्ग ढूँढ़ने का अवसर ही नहीं मिलता। ऐसे लोग तो मात्र अन्धी भेड़ों की तरह जैसे-तैसे एक दूसरे के पीछे चलते रहते हैं, भाग्य को कोसते-कोसते ही सारा जीवन व्यतीत कर देते हैं। उनके लिए तो “हाथों की चंद लकीरों का, मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है,तुम्हारा भाग्य तुम्हारी मुट्ठी में है” जैसे स्लोगन मात्र कहने के लिए ही हैं,इनका कोई भी आधार नहीं है। उनके लिए तो इतिहास में अंकित प्रतिभाशालिओं के नाम केवल इतिहास के रोचक किस्से कहानियाँ मात्र ही हैं, उनसे दिल तो बहलाया जा सकता है,शिक्षा एवं प्रेरणा के लिए तो परिश्रम करना पड़ता है,समयदान करना पड़ता है,वोह हमारे पास है ही नहीं। ऐसे लोगों को अशक्त निर्भर  न कहें (Infirm dependent) तो और क्या कहें। Infirm तो वोह लोग होते हैं जो किसी शरीरिक,मानसिक यां विकलांगता के कारण कुछ करने में असमर्थ होते हैं ,उनकी सहायता करना तो हर किसी का कर्तव्य होना चाहिए लेकिन जो लोग बिना किसी कारण ही बेचारे बने हुए हैं, दूसरों की सहायता की और आँख रखे हुए हैं,उनकी सहायता करने  का अर्थ है समाज में Parasites को पालना,ऐसे लोगों को डाँट-डपट कर सीधे रास्ते लाने का बीड़ा ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के समर्थ-समर्पित साथिओं को ही उठाना चाहिए। यह कोई बात हुई,अकारण ही समय-आभाव का बहाना बनाते रहना। ऐसे मनुष्य कठिनाइयों के समय घुटन अनुभव करते हैं और आँसू बहाकर ही रह जाते हैं । संसार असंख्य पिछड़े लोगों से भरा पड़ा है। वे गई-गुजरी जिन्दगी जीते और भूखे-नंगे तिरस्कृत-उपेक्षित रहकर किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते हैं। दुर्व्यसन की अपनी प्रवृति है, वोह भी दुर्बल मनोभूमि वालों पर ही सवार होते हैं, कमज़ोर इच्छा शक्ति वालों पर तो उनका सीधा अटैक होता है, तरह-तरह के व्यसन उन्हें जिधर-तिधर खींचते-घसीटते फिरते हैं। ऐसे लोग अपने लिए, साथी-सहयोगियों के लिए और समूचे समाज के लिए एक समस्या ही बने रहते हैं, धरती पर भार से बढ़कर कुछ नहीं होते। इन्हीं का बाहुल्य देखकर अनाचारी अपने पंजे  फैलाते, दाँत गड़ाते और शिकंजे  कसते हैं। प्रतिभारहित समुदाय का धरती पर लदे भार जैसा आँकलन ही होता है। वे किसी की कुछ सहायता तो क्या कर सकेंगे, अपनेआप को अर्धमृतक की तरह किन्हीं के कन्धों पर लादकर चलने का आश्रय ताकते हैं।

गुरुदेव कह-कह कर थक गए हैं लेकिन भाई हमने तो शपथ खाई हुई है कि हमने उनकी बात नहीं माननी है।

आइए त्रय शताब्दी वर्ष में इतना तो गुरु का कहना मान ही लें कि आज से बल्कि अभी से इन पक्तियों को पढ़ते समय से ही संकल्प लें कि नियमितता से,निरंतरता से गुरु के द्वार में, गुरूद्वारे में अपने श्रद्धा सुमन अवश्य ही अर्पित करेंगें।

इसमें आपका ही भला है, गुरु तो पत्थरों से भी अपना कार्य करवाने की समर्था रखते हैं।

जय गुरुदेव


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