वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

पात्रता विकसित करना एक निजी पुरुषार्थ है

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की 8वीं पुस्तिका का शीर्षक “महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण” है। इस दिव्य पुस्तकमाला की अन्य 23 पुस्तकों की तरह यह लघु पुस्तिका  भी केवल 35 पन्नों  और 9000 से भी कम शब्दों में जिस ज्ञान को अपने गर्भ में संजोए हुए हैं उसे गुरुदेव ने अपने जीवन भर के साहित्य का मक्खन कहा है। 36 वर्ष पूर्व उस युगदृष्टा को मालूम था कि आने वाले दिनों में मेरे बच्चों  के पास कोई समय नहीं होगा,उचित रहेगा कि उनके  लिए चीटशीट की तरह एक ऐसा साधन उपलब्ध करा दिया जाए जिसे पढ़ने में कोई भी आनाकानी न करने पाए। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के अनेकों साथिओं ने इन पुस्तिकाओं का अध्ययन किया हुआ है, इन पंक्तिओं के लेखक को वोह सौभाग्य तो प्राप्त नहीं हुआ, हाँ कुछ पुस्तिकाएं इस लेखक के शेल्फ की शोभा अवश्य बढ़ा रही हैं। यहाँ तो यही कहना उचित रहेगा: उचित समय आने पर ही उचित  कार्य हो पाता है। गुरुवर ने तो हमें मक्खन प्रदान कर दिया लेकिन क्या पाठक उस मक्खन को हज़म कर पाए ? इस महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर ढूंढने के लिए, एवं स्वयं के स्वाध्याय  के लिए इस नगण्य से लेखक ने उस मक्खन को तपाकर,मथ कर,घी निकालने का संकल्प लिया हुआ है,इस संकल्प के पीछे हमारी ही सबकी बेटी संजना एक ड्राइविंग फ़ोर्स बन कर  खड़ी है, सौभाग्य है कि DSVV में MA कर रही बेटी व्यस्तता के बावजूद  हर लेख का अमृतपान करके कमेंट करके अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रही है ,बहुत बहुत धन्यवाद् बेटी संजना !!!

अपनी आदत के वशीभूत इस पुस्तक की लेख श्रृंखला का श्रीगणेश करने  से पहले सरसरी सी दृष्टि दौड़ाने पर समझ में आया कि यह प्रतिभा एवं पात्रता के विषय की चर्चा करने वाली है। पांच में से चार चैप्टर में तो प्रतिभा शब्द ही झलक रहा है।

1. सर्वोपरि उपलब्धि-प्रतिभा

2. प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं

3. परिष्कृत प्रतिभा, एक दैवी अनुदान-वरदान

4. प्रचंड मनोबल की प्रतिभा में परिणति

अपनी वेबसाइट की सर्च विंडो में “पात्रता” टाइप करके देखा तो न जाने कितने ही लेख “पात्रता” पर लिखे हुए हैं। ध्यान से देखने पर समझ में आया कि  यह तो उन्हीं लेखों का मक्खन है, रिपीट होना स्वाभाविक है। यह तो कहना अनुचित होगा कि इन्हें दोहराने से क्या लाभ? गुरु का निर्देश कल वाले लेख में ही अंकित किया था, क्या एक ही दिन में भूल गए  कदापि नहीं, गुरुआज्ञा सर्वोपरि !!! आज्ञा के बावजूद इतना भी कहना अनुचित नहीं है कि क्या जो उन लेखों में समाया था,हमें याद है? गायत्री मन्त्र की तरह गुरूसाहित्य को भी  बार-बार दोहराना चाहिए।

हिन्दू धर्म की परंपरा के अनुसार, किसी भी मांगलिक कार्य (जैसे शादी-विवाह, पूजा) से पहले भगवान श्रीगणेश की आराधना की जाती है। भगवान गणेश को सभी विघ्नों (बाधाओं) को दूर करने वाला माना जाता है, इसलिए किसी भी कार्य के निर्बाध पूरा होने के लिए उनका नाम लेकर काम शुरू किया जाता है,तो आइए चलें गुरुकक्षा की और रुख करें,गुरुचरणों में समर्पित हो जाएँ,आज के गुरुज्ञान का श्रीगणेश करें।

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व्यक्तित्व का परिष्कार ही प्रतिभा परिष्कार है। The refinement of personality is, in itself, the refinement of talent.

जहां भी धातुओं की खदानें होती हैं, उस क्षेत्र में  उसी धातु के कण मिट्टी में दबे होते हुए भी उसी दिशा में रेंगते और खदान के चुम्बकीय आकर्षणों से आकर्षित होकर पूर्व संचित खदान का भार, कलेवर और गौरव बढ़ाने लगते हैं।

साथियों ने यह पंक्तियां अखंड ज्योति के दिव्य पृष्ठों पर अनेकों बार पढ़ी होंगी लेकिन आज (लेख लिखने से पहले) इनका विश्लेषण करना बहुत ही आवश्यक है।

आइए देखें इन पंक्तियों का क्या महत्व है ?

यह कथन एक अलंकारिक एवं दार्शनिक विचार है जिसके द्वारा गुरुदेव हमें कुछ समझाना चाहते हैं। “इस तथ्य का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।”

वैज्ञानिक और भौतिक रूप से ऐसा होना संभव नहीं है क्योंकि उसी धातु के कणों को उसकी ओर आकर्षित होना विज्ञान के खिलाफ जाता है क्योंकि Like never attracts like, they repel each other. गुरुदेव की इस बात को समझने के लिए वास्तविकता और इस कथन के पीछे छिपे अर्थ को जानना होगा :

विज्ञान के अनुसार चुंबकीय आकर्षण की एक सीमा होती है। चुंबकत्व (Magnetism) केवल कुछ विशेष धातुओं (जैसे लोहा, निकेल, कोबाल्ट) पर ही असर करता है और वह भी एक निश्चित और सीमित दूरी (Magnetic field) के भीतर। मिट्टी या चट्टानों में दबे हुए धातु के कण ठोस अवस्था में होते हैं। वे जीवित प्राणी की तरह “रेंगकर या चलकर” खुद-ब-खुद किसी खदान की तरफ नहीं जा सकते। Geology के अनुसार, खदानों का निर्माण लाखों-करोड़ों वर्षों की Geological हलचलों, दबाव और रासायनिक प्रक्रियाओं के कारण होता है, न कि कणों के चलकर वहां इकट्ठा होने से।

गुरुदेव इस कथन का दार्शनिक एवं प्रतीकात्मक अर्थ समझाते हुए कहते हैं कि इस पंक्ति का उपयोग मानव स्वभाव और व्यक्तित्व को समझाने के लिए एक रूपक (Metaphor) के रूप में किया गया है:

धातुओं के संदर्भ में जैसे यह एक काल्पनिक बात कही गई है, वैसे ही गुरुदेव यह समझाना चाहते हैं कि एक प्रभावशाली, गुणी या व्यक्तित्ववान व्यक्ति की ओर समाज के वैसे ही लोग खुद-ब-खुद आकर्षित होते हैं।

यह इंसानी क्षमता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है, जिसे भौतिक विज्ञान के नियम की तरह नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायक विचार के रूप में देखा जाना चाहिए।

प्रतिभा के साथ ही पात्रता जुड़ी हुई है।

यदि पात्रता विकसित की जाय तो व्यक्ति असम्भव को सम्भव बना सकता है। प्रतिभा जिधर को मुड़ती है, उधर की परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ लेती है। जो लोग समय और संसाधनों के अभाव का रोना रोते सारा जीवन गुज़ार देते हैं,गुरुदेव ने उन्हें ही कुपात्र कहा है। इसी संदर्भ में गुरुदेव ऐसे बच्चों को सुपात्र कहते हैं जो सब कुछ विपरीत होते हुए भी अपने लिए राहें बना ही लेते हैं। सच पूछा जाय तो सुपात्र होना,पात्रता का होना ही वह सम्पदा है जो व्यक्ति के जीवन में तेजस,ओजस और वर्चस के नाम से प्रकट होती है। यह तीनों शब्द, ज्ञानरथ गायत्री परिवार के इतने प्रिय हो चुके हैं कि  न जाने कितनी ही बार इनको समझने के लिए इंग्लिश के अनुवाद भी लिख देते रहे हैं लेकिन आज यही समझ कर आगे बढ़ते हैं कि हमारे साथी बड़े ही समझदार हैं, यदि उन्हें कोई भी समस्या आती है तो वोह स्वयं ही Chatgpt से पूछ लेंगें,ऐसा हमारा विश्वास है।

गुरुदेव के शब्दों को ही आगे बढ़ाते हुए लिखते हैं कि यदि पात्रता को विकसित किया जा सके तो व्यक्ति असम्भव को सम्भव बना सकता है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से हमेशा ही पात्रता एवं प्रतिभा को उभारने की बात होती रहती है, प्रेरणा मिलती रहती है, अनेकों साथी इस प्रेरणा का लाभ उठाकर न जाने कहां से कहां पहुंच गए हैं, सभी भलीभांति परिचित हैं।

पात्रता के आते ही मनुष्य की संकल्प शक्ति एवं दिव्य संरक्षण पर भरोसा,प्रतिभाशालीयों से ऐसा कुछ करा लेते हैं जिसे देखकर अनेकों को दाँतो तले उँगली दबाने को विवश होना पड़ता है। यह प्राणवान संकल्प शक्ति केवल ऐसे ही व्यक्तित्व की शोभा बनती है जो सुपात्र का मुकुट धारण किए होते हैं।

हमारे गुरुदेव के समेत सभी गुरु यदि शिष्य से किसी एक गुण की अपेक्षा करते हैं तो वह पात्रता ही है। यही पात्रता आगे बढ़कर उत्कृष्टता जुटाने का कारण बनती है। जो कुपात्र होते हैं उन्हें पिछले कर्मों के वशीभूत कोई उपलब्धि मिल भी जाए,वह कभी भी दिव्य सहयोग पाने के उत्तराधिकारी नहीं बन पाते हैं। कुपात्रों के व्यक्तित्व के छिद्र एवं  उनके व्यक्तित्व की दुर्बलताएँ उन्हें बार-बार तकलीफों-परेशानियों में डालते रहते हैं।

बरसात होने पर पानी गड्ढों में भरता है, चट्टानों पर तो बूँदें भी ढँग से नहीं टिक पाती। जो व्यक्ति  अपनी पात्रता विकसित कर लेते हैं, उनके लिए बरसाती गड्ढों में भरा पानी भी भगवान के अनुदान की भांति उपलब्ध हो जाता है, उन्हें किसी भी प्रकार की बहानेबाज़ी नहीं करनी पड़ती, भगवान उनसे हाथ पकड़ कर सब कुछ बटोर करा लेते हैं। दूसरी तरफ वोह हैं जो अपने अहंकार को चट्टान बनकर पड़े रहते हैं, उनको भगवान की उपस्थिति तक अनुभव नहीं हो पाती।

भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा के आगे भगवान सूर्य को भी झुकना पड़ा था। सत्यवान के प्राणों को वापस करने के सावित्री के संकल्प के आगे यमराज को झुकना ही पड़ा था। अर्जुन के तीर के आगे पाताल को गँगा  का प्रवाह छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा था।

यह तीनों उदाहरण “व्यक्तित्व की ताकत” का प्रमाण है।

इसी प्रक्रिया की अगली सीढ़ी व्यक्तित्व के परिष्कार की है जिससे मनुष्य आत्म-निरीक्षण, आत्म-समीक्षा,आत्म-सुधार एवं आत्म-विकास जैसे चरणों से गुजरता है। इन पदों से गुजरने वाले ही अपने व्यक्तित्व को उस योग्य बना पाते हैं कि जिनकी सहायता करने के लिए भगवान दौड़े-दौड़े आते हैं। जब मनुष्य का व्यक्तित्व ऐसा उच्चस्तरीय बन जाता है तो प्रामाणिक बना देने वाले केवल स्वयं का ही कल्याण नहीं करते बल्कि अनेकों के लिए एक आदर्श उदाहरण बनकर प्रस्तुत होते हैं। उच्चस्तरीय व्यक्तित्त्व के मनुष्य ही अनेकों का स्नेह, सहयोग, परामर्श एवं उपयोगी सान्निध्य प्राप्त करते हैं। यह एक निजी पुरुषार्थ है। मनुष्य को अन्य सुविधा-साधन तो दूसरों की अनुकम्पा से भी उपलब्ध हो सकते हैं, रिश्वत आदि देकर भी मनुष्य बड़ा बन सकता है लेकिन प्रतिभा का परिष्कार करने के लिए  अपना संकल्प, अपना समय और अपना पुरुषार्थ ही काम आता है। गीताकार ने इस पौरुष में कोताही न बरतने के लिए कहा है, अनेक उदाहरण देकर विचारशीलों को प्रोत्साहित किया है। एक स्थान पर तो  यहाँ तक कह दिया है  कि मनुष्य स्वयं ही अपना शत्रु और स्वयं ही अपना मित्र है। इसलिए अपनेआप  को गिराओ मत,हमेशा उर्ध्वगामी बनो,ऊपर की ओर बढ़ो,अपना परिष्कार करो, हमेशा यही कहो:मैं किसी से कम नहीं, I can do it.

जब कोई व्यक्ति अपने मन, इंद्रियों और अहम पर नियंत्रण पा लेता है, तो उसका मन,उसकी अंतरात्मा उसकी मित्र बन जाती है और उसका उद्धार करती है। जब व्यक्ति अपने मन को वश में नहीं कर पाता, क्रोध, लालच और बुरी आदतों के वशीभूत रहता है, तो उसका वही मन, उसका आचरण उसके लिए शत्रु की तरह काम करता है और उसके पतन का कारण बनता है, तभी तो  बहाने बनाते हुए अक्सर कहा जाता है कि मैं जानता हूँ की मदिरापान बुरी आदत है,इससे मेरा घर बर्बाद हो रहा है  लेकिन इतना सब कुछ जानने के बाद भी मैं छोड़ने में असमर्थ हूँ,कैसे ऐसे लोगों से किसी संकल्प की कोई आशा की जा सकती है ? कदापि नहीं !!! ऐसे ही लोग धरती माँ पर बोझ बने हुए हैं। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार सुपात्रों से सुशोभित हो रहा है।  हम सबको इस परिवार का सदस्य बनने में गर्व अनुभव  करना चाहिए।

जय गुरुदेव


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