वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

अब भगवान की पुकार पर ध्यान देने का अवसर है

आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ तो नाम जप,ध्यान एवं प्राणयाम से हुआ है जिसे लगभग सभी पाठक जानते ही हैं। गुरुदेव बता रहे हैं कि यह सभी कर्मकांडों के पीछे मुख्य उद्देश्य आत्मविकास एवं  उत्कर्ष है न कि सभी कर रहे हैं तो हम भी करते जाएँ,लकीर पीटते जाएँ। गुरुदेव बता रहे हैं कि  जिस प्रकार स्न्नान,भोजन,मल-विसर्जन के लिए रोज़ाना एक निर्धारित समय निश्चित है उसी तरह उपासना-साधना-आराधना के लिए भी कोई फिक्स्ड टाईमटेबल होना चाहिए।

लेख का समापन गुरुदेव की इस शिक्षा से होता है कि अपनी मर्जी से कर्मकांडों आदि का समय बीत चुका है,अब समय सत्प्रवृति संवर्धन का,ज्ञानयज्ञ का,विचार क्रांति का,समय की पुकार का,विश्वात्मा की गुहार का,दूरदर्शी विवेकशीलता का,जनमानस में भाव-संवेदना जगाने का है। यही इस युग का धर्म है,इसे ही महाकाल की चुनौती अथवा दिव्य सत्ता का भावभरा आह्वान कह सकते हैं।

शब्द जो भी प्रयोग किये जाएँ,विशेषण कोई भी लगाए जाएँ,एक बात तो सत्य है कि यह समय जागने और जगाने  का है, भगवान जगन्नाथ जी के रथ को खींच कर श्रेय लेने का है, यह सुअवसर बार-बार नहीं आने वाला, जो इस श्रेय से वंचित रह गया,समझो उससे दुर्भाग्यशाली कोई नहीं है,यही ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की भी पुकार है।

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की सातवीं पुस्तक “जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र- Golden formula of life practice” का समापन अंक कल प्रस्तुत किया जायेगा। आज के ज्ञानप्रसाद के अमृतपान के लिए सभी साथिओं का स्वागत है।

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पूजा-विधि में प्रज्ञा परिवार के परिजन आमतौर से अपनी-अपनी रुचि और सुविधा के अनुरूप “जप, ध्यान और प्राणायाम” के अभ्यास अपनाते हैं। इन तीनों का प्राण-प्रवाह तभी वरदान बन कर अवतरित होता है, जब इन तीनों के पीछे अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई प्रेरणाओं को अपनाया जाये।

नाम जप:

नाम जप का तात्पर्य है कि जिस परमेश्वर को एवं उसके विधान को आमतौर से हम भूले रहते हैं, उसे बार-बार स्मृति पटल पर अंकित करते रहने से,भूलने का कभी अवसर ही नहीं आता। सुर-दुर्लभ मनुष्य जीवन की महती अनुकम्पा और उसके साथ जुड़ी हुई स्रष्टा की आकांक्षा को समझने, अपनाने की मानसिकता बनाए रखना, नित्य प्रयत्न करना ही नाम-जप का महत्त्व और माहात्म्य है। साबुन लगाने से शरीर स्वच्छ होता है। घिसाई से चमकने का अवसर मिलता है। जप करने वाले अपने व्यक्तित्व को इसी आधार पर विकसित करें।

ध्यान:

जिस परमपिता का ध्यान किया जाता है उसे लक्ष्य मानकर उसके जैसा ही  बनने का प्रयत्न किया जाता है। राम, कृष्ण, शिव आदि की ध्यान-धारणा का यही प्रयोजन है कि उस स्तर की महानता से अपने को ओतप्रोत करें। हमारे परिजन प्राय: गायत्री मन्त्र का जप और उदीयमान सूर्य का ध्यान करते हैं। समझा जाना चाहिए़ कि गायत्री अर्थात् सामूहिक विवेकशीलता। इस प्रक्रिया से अनुप्राणित होना ही गायत्री जप है। सूर्य की दो विशेषताएँ सुपरिचित हैं:एक ऊर्जा और दूसरी आभा। हम ऊर्जावान अर्थात् प्रगतिशील, पुरुषार्थ परायण बनें। ज्ञानरूपी प्रकाश से सर्वत्र प्रगतिशीलता का, सत्प्रवृत्तियों का विस्तार करें। स्वयं प्रकाशित रहें, दूसरों को प्रकाशवान् बनाएँ। गर्मी और आलोक की आभा जीवन के हर क्षण में, हर कण में ओत-प्रोत रहे, यही सूर्य ध्यान का मुख्य प्रयोजन है। ध्यान के समय शरीर में ओजस्( जीवनी शक्ति), मस्तिष्क में तेजस्(चमक,तेज़,आभा) और अन्त:करण में वर्चस्(प्रभुत्व) की अविच्छिन्न वर्षा जैसी भावना की जाती है। इस प्रक्रिया को मात्र कल्पना भर मानकर नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए बल्कि अपनेआप को  उसी के अनुरूप विनिर्मित करने का प्राणपण से प्रयत्न भी करना चाहिए।

प्राणायाम:

प्राणायाम में नासिका द्वारा “ब्रह्माण्डव्यापी प्राण-तत्त्व” को खींचने, धारण करने और घुसे हुए अशुभ को बाहर  फेंकने की भावना की जाती है। संसार में भला-बुरा तो सब कुछ भरा पड़ा है लेकिन हम अपने लिए मात्र दिव्यता प्राप्ति को ही उपयुक्त समझें। जो श्रेष्ठ-उत्कृष्ट है, उसी को पकड़ने और सत्ता में प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न करें। नितान्त निरीह, दुर्बल, कायर-कातर न रहें बल्कि ऐसे प्राणवान् बनें कि अपने में और सम्पर्क क्षेत्र में प्राण-चेतना का उभार-विस्तार करते रहने में संलग्न रह सकें।

यदि आप जप, ध्यान और प्राणायाम की क्रिया-प्रक्रिया बहुत दिनों से अपनाते चले आ रहे हैं, कुछ शंका हो तो किसी निकटवर्ती जानकार से पूछकर उस कमी को पूरा किया जा सकता है। अपनी सुविधानुसार समय एवं कृत्य में आवश्यक बदलाव  भी किया जा सकता है लेकिन यह भुलाया नहीं जाना चाहिए कि प्रत्येक कर्मकाण्डों के पीछे “आत्मविकास एवं समाज उत्कर्ष की जो अभिव्यंजनाएँ” भरी पड़ी हैं, उन्हें प्रमुख माना जाये और लकीर पीटने जैसी नहीं बल्कि प्रेरणा से भरी-पूरी मानसिकता को उस आधार पर समुन्नत-परिष्कृत किया जाये।

साधना के साथ एक प्रचलन यह भी जुड़ा हुआ है कि हल्का उपवास किया जाये और ब्रह्मचर्य पाला जाये। दोनों के पीछे चतुर्विध संयम साधना का तत्त्वज्ञान समाविष्ट है। यदि  चतुर्विध संयम के अंतर्गत आने वाली चार-संयम प्रक्रिया( इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम) बढ़ने, फलने-फूलने दी जाये, तो वह उपर्युक्त संयमों की पकड़ अधिकाधिक कड़ी करते हुए साधकों को सच्चे अर्थों में तपस्वी, बनने की स्थिति तक घसीट ले जाती है। ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी बनने के त्रिविध लक्ष्य प्राप्त करने के लिये किये गये प्रयत्नरतों को ही सच्चे अर्थों में तपस्वी कहते हैं। तप की दिव्य शक्ति से अध्यात्म क्षेत्र का हर अनुयायी भली प्रकार परिचित एवं प्रभावित होना चाहिए।

स्नान, भोजन, शयन, मल-विसर्जन आदि नित्य कर्मों की तरह ही, उपासना-साधना-आराधना के लिए भी कुछ निर्धारित समय रिज़र्व रखना चाहिए ताकि जीवन-लक्ष्य को हृदयंगम किये रहने में कोई आलस्य और भूल न उत्पन्न होने पाये। प्रात:काल आँख खुलते ही नया जन्म होने जैसी भावना की जाये और आज के दिन की अवधि को समग्र जीवन मानते हुए इस प्रकार की दिनचर्या बनाई जाये कि आज का समय, श्रम, चिन्तन और व्यवहार में अधिकाधिक उत्कृष्टता का समावेश होता रहे। प्रात:काल बनी उसी रूपरेखा के अनुरूप वह दिन बिताया जाये ताकि प्रमाद और भटकाव की कहीं गुंजायश न रहे। इसी प्रकार रात्रि को सोते समय एक दिन के जीवन की मृत्यु  होते हुए मानना चाहिए और उस दिन के क्रियाकलापों की ऐसी कठोर समीक्षा करनी चाहिए कि बन पड़े व्यतिक्रमों का दूसरे दिन प्रायश्चित्त किया जा सके और अगले दिन अधिक सतर्कतापूर्वक, अधिक शालीनता का उपक्रम अपनाया जा सके।

दान, पुण्य, तीर्थयात्रा, परमार्थ जैसे धर्मकार्यों के लिए अंतर्मन  में मन्द या तीव्र उमंग रहती है। इसे भी ईश्वर का संकेत, मार्गदर्शन एवं परामर्श मानकर अपनाने के लिए कुछ न कुछ प्रयत्न करना ही चाहिए। समय के अनुरूप इन सभी का समन्वय “विवेक-विस्तार” की एक ही प्रक्रिया में केन्द्रित हो जाता है।

ज्ञानयज्ञ, विचार क्रान्ति या लोकमानस का परिष्कार, सत्प्रवृत्ति सम्वर्द्धन आदि नामों से इन्हें ही प्रतिपादित किया जाता है। समय की पुकार, विश्वात्मा की गुहार भी इसी को कह सकते हैं। भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट-आचरण ने ही असंख्य समस्याओं और संकटों के घटाटोप खड़े किये हैं। इन सबका निवारण, निराकरण मात्र एक ही उपाय उपचार से सम्भव हो सकता है कि “दूरदर्शी विवेकशीलता” को जनमानस में उभारने का प्रयत्न किया जाये। चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार में उत्कृष्टता का अभिवर्द्धन, अन्त:करण में भाव-संवेदना जगाने से ही सम्भव हो सकता है। यही अपने समय का युग धर्म है। कोई चाहे, तो इसे महाकाल की चुनौती अथवा दिव्य सत्ता का भाव भरा आह्वान भी कह सकते हैं।

बैटरी चार्ज करने के लिए शांतिकुंज अवश्य आएं

इस प्रयोजन में किस मन:स्थिति और किस परिस्थिति का व्यक्ति क्या करे?

इसका व्यावहारिक मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए शान्तिकुंज में निरन्तर चलते रहने वाले नौ दिवसीय  साधना सत्रों में से हर साल एक बार या कम से कम दो वर्ष में एक बार हरिद्वार जा पहुँचने की योजना बनानी चाहिए। इस उपक्रम को बैटरी चार्ज करने या बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप नया प्रकाश, नया मार्गदर्शन मिलते रहने जैसा सुयोग समझा जा सकता है। आत्मपरिष्कार के लिए यह विधा कारगर सिद्ध होती देखी गयी है।

जिन्हें देवालय, धर्मशाला, सदावर्त, प्याऊ जैसे परमार्थ प्रयोजन चलाने की इच्छा हो, उनके लिए अत्यन्त दूरदर्शिता से भरापूरा हाथों-हाथ सत्परिणाम उत्पन्न करने वाला एक ही परमार्थ हर दृष्टि से उपयुक्त दिखता है कि वे ‘‘मोबाइल  ज्ञान मन्दिर’’ का निर्माण कर सकने जैसा प्रयास जुटाएँ। ऐसे मोबाइल ज्ञान मंदिर की ‘‘ज्ञानरथ’’ के रूप में आमतौर से चर्चा होती रहती है।

साइकिल के या ठोस रबड़ के चार पहियों पर मन्दिरनुमा आकृति की इस धकेल गाड़ी में टेपरिकार्डर एवं लाउडस्पीकर फिट रहने के कारण उसे जहाँ कहीं भी ले जाया जाए, वहीं संगीत सम्मेलन एवं प्राणवान् संक्षिप्त धर्म प्रवचनों की श्रृंखला  चल पड़ती है। नुक्कड़ सभा जैसा जुलूस, प्रभातफेरी जैसा माहौल बन जाता है। इसी में इक्कीसवीं सदी की प्रेरणाओं से भरा पूरा सस्ता किन्तु युगधर्म का पक्षधर साहित्य भी रखा रहता है, जिसे बिना मूल्य, पढ़ने देने और फिर बाद में वापस लेने का सिलसिला चलता रह सकता है। जिनका कुछ खरीदने जैसा आग्रह हो, उन्हें उपलब्ध साहित्य बेचा भी जा सकता है। ऐसे मोबाइल  ज्ञान मन्दिर विनिर्मित करने में प्राय: एक तोले सोने के मूल्य जितनी लागत आती है, जिसे कोई एक या कुछ लोग मिलकर सहज ही जुटा सकते हैं।

असहयोग आन्दोलन के दिनों काँग्रेस के मूर्धन्य नेता, खादी प्रचार की धकेल गाड़ियाँ लेकर निकलते थे और सम्पर्क में आने वालों को उद्देश्य समझाते हुए पूरे उत्साह के साथ खादी प्रचार में संलग्न रहते थे। आज की परिस्थितियों के अनुरूप “मोबाइल ज्ञान मन्दिर” को स्वयं घुमाते हुए वैसा ही पुण्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है जैसा कि विशेष पर्वों पर भगवान् का रथ खींचने वाले भक्तजन अपने को पुण्यफल का अधिकारी हुआ मानते हैं। अपने मिशन ने पिछले दिनों 2400  से अधिक प्रज्ञापीठें खड़ी की हैं। अब उससे भी कई गुने ‘‘मोबाइल ज्ञान मन्दिर’’ बनाने-बनवाने की योजना है। इसे गाँव, मुहल्लों में नव जागरण का अलख जगाने के सदृश युग परिवर्तन का शंखनाद स्तर का उद्घोष जैसा समझा जा सकता है।

गुरुदेव यह पंक्तियां आज से 36 वर्ष पूर्व लिख गए हैं, आज 2026 में जिस स्पीड से विस्तार हुआ है उसे मत्स्यावतार ही कहा जा सकता है।

भगवान् की पुकार पर ध्यान दिया जाए

भगवान से अनुनय-विनय करने की कामना भरी पूजा-अर्चना भी चिरकाल से होती चली आ रही है। अब इन दिनों एक विशेष अवसर है कि आपत्तिकालीन परिस्थितियों में भगवान् की पुकार पर ध्यान दिया जाये और मनमर्जी छोड़कर महाकाल के आमन्त्रण पर उसी के सुझाए मार्ग पर चल पड़ा जाए। हनुमान् और अर्जुन ने यही किया था। शिवाजी, प्रताप, चन्द्रगुप्त, विवेकानन्द, विनोबा आदि से कितनी पूजा-अर्चना बन पड़ी थी ? इस सम्बन्ध में तो कुछ अधिक नहीं कहा जा सकता लेकिन  इतना सर्वविदित है कि उन्होंने दिव्य चेतना के आह्वान को सुना और उसी के अनुरूप कार्यरत हो गए। सम्भवत: उनकी पूजा-उपासना की आवश्यकता उनके इष्टदेव ने स्वयं कर ली होगी और अभीष्ट वरदानों से इन सच्चे साधकों को निहाल कर दिया होगा। हम भी उन्हीं का अनुकरण करें, तो इसमें तनिक भी हर्जा होने या घाटा पड़ने जैसा कुछ भी नहीं है।

इसका साक्षात् उदहारण तो हमारा स्वयं का “ज्ञानरथ परिवार” ही है जिसके समर्पित सदस्य वर्षों से समयदान करके आत्मपरिष्कार की राह पर चल रहे हैं, उन्हीं से पूछा  जाए कि  उन्हें किस बात का घाटा रहा,पूछने की बात ही नहीं उठती, साथी स्वयं ही इस मंच की भूरी-भूरी प्रशंसा करते रहते हैं, यही उनकी महानता है। ऐसे साथिओं का धन्यवाद् करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं।

जय गुरुदेव


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