वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

युग के मत्स्यावतार का क्या अर्थ है ? समापन लेख

आज “जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र” लघु पुस्तिका का समापन 12वें लेख के साथ हो रहा है, कितना सौभाग्य है कि वर्तमान लेख श्रृंखला में गुरुदेव द्वारा मथे गए मक्खन का अमृतपान हो रहा है।

आज प्रस्तुत किये गए लेख के दो भाग हैं। पहले भाग में युग के मत्स्यावतार (भगवान विष्णु के पहले अवतार-मछली) के पौराणिक एवं वैज्ञानिक पक्ष की चर्चा की गयी है। मनुष्य का विकास Single-celled Amoeba से हुआ था जो एक जल प्राणी है,भगवान् के दस अवतारों की शुरुआत भी एक जलप्राणी (मछली) से हुई है। दूसरा भाग गुरुदेव का निर्देश है जो हम सबके लिए गुरु आज्ञा है।

आइए आज के लेख का शुभारम्भ करें।

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कितना ही अच्छा हो,हम भगवान की महती योजना में भागीदार बनें और अपनी मर्जी की पूजा-उपासना को, “मनचाहे वरदान की विडम्बना पर अंकुश ही लगाएं।” युग के मत्स्यावतार का मुख्य अर्थ “युग परिवर्तन का सुनियोजन या एक नए कालखंड (युग) की शुरुआत” के लिए पुरानी और सड़ चुकी व्यवस्थाओं को साफ करना,पवित्र ज्ञान व जीवन की रक्षा करना है।

पौराणिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इसके कई गहरे अर्थ निकलते हैं:

1. सृष्टि और जीवन का संरक्षण

मत्स्य का हिंदी अर्थ मछली होता है। मत्स्यावतार भगवान विष्णु के 10  अवतारों में से प्रथम अवतार को  माना जाता है। जब संसार अधर्म और नैतिक पतन की ओर बढ़ रहा था और भयानक जलप्रलय आने वाला था तब भगवान ने मछली का रूप धारण किया। उन्होंने राजा सत्यव्रत (वैवस्वत मनु), सप्तऋषियों, पशु-पक्षियों के जोड़ों और सभी प्रकार की वनस्पतियों के बीजों को एक विशाल नौका में सुरक्षित रखा। इस प्रकार, उन्होंने पुरानी सृष्टि के अंत के साथ नए युग में जीवन की निरंतरता सुनिश्चित की।

2. ज्ञान (वेदों) की पुनः स्थापना

जलप्रलय के समय हयग्रीव नामक दैत्य ने ब्रह्मा जी के मुख से निकले चारों वेदों (पवित्र ज्ञान) को चुराकर समुद्र की गहराइयों में छिपा दिया था। मत्स्य रूपधारी भगवान ने उस दैत्य का वध किया और वेदों को पुनः प्राप्त किया। इसका अर्थ है कि युग चाहे बदल जाए लेकिन “शाश्वत (सदा रहने वाला) ज्ञान और संस्कृति कभी नष्ट नहीं होती” दिव्य शक्तियां हमेशा उसकी रक्षा करती हैं।

3. “मत्स्य न्याय” ( Survival of the fittest) को समाप्त करना

“मत्स्य न्याय” को Survival of the fittest, Law of jungle-जंगल राज,जिसकी लाठी उसकी भैंस कहा  गया है।  प्रकृति का एक नियम है कि “बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है।”। जब मनु ने एक छोटी मछली को बड़ी मछलियों से बचाकर उसका पालन-पोषण किया तो उन्होंने इस पाशविक (पशुओं का) नियम को तोड़कर सहानुभूति, करुणा और मानवता की नींव रखी।

युग के मत्स्यावतार का अर्थ समाज में बलवानों द्वारा कमजोरों के शोषण को समाप्त कर “धर्म और न्याय” की स्थापना करना भी है।

जब भी धर्म का शब्द आता है तो हमें उसे क्लियर करना पड़ता है की धर्म का अर्थ जातपात, ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र,हिन्दू, मुस्लिम आदि नहीं है। धर्म की स्थापना का अर्थ मानवीय मूल्यों, ईमानदारी, प्रेम, सद्भावना आदि से है।

4. चेतना और विकास का प्रतीक

विज्ञान की दृष्टि से,आधुनिक विकासवाद (Evolution) के नजरिए से देखें तो जीवन की शुरुआत सबसे पहले पानी में जलीय जीवों (अमीबा) के रूप में (Single-celled Amoeba) हुई थी। भगवान विष्णु के दश अवतारों की शुरुआत भी जलचर (मत्स्य) से होती है। यह दर्शाता है कि प्रत्येक नए युग का चक्र चेतना के आदिम (शुरुआती) स्तर से उठकर सर्वोच्च स्तर तक जाता है। Single celled Amoeba से 37 ट्रिलियन Cells वाले मानव का निर्माण Evolution का चमत्कार नहीं तो और क्या है? इसे नियति का, प्रकृति का, विधाता का चमत्कार न कहा जाए तो और क्या कहें? मानव जीवन में भी हर समय,हर क्षण चमत्कार होते रहते हैं,दुर्भाग्य तो यह है कि हम इन चमत्कारों के समझने में असमर्थ रहते है क्योंकि हमारी दृष्टि की रेंज भी तो बड़ी ही लिमिटेड है,संकुचित है। संकुचित दृष्टि को ज़रा सा विशाल करके देखें तो स्वर्ग ही स्वर्ग है, Again नज़रें बदल के देखें,नज़ारा ही बदल जाएगा।

चेहरा क्या देखते हो,

दिल में उतर कर देखो न

मौसम पल में बदल जाएगा,

पत्थर दिल भी पिघल जाएगा,

मेरी मोहब्बत में है कितना असर देखो ना,

कितना असर देखो ना।

5. नवयुग का मत्स्यावतार

हमारे परम पूज्य गुरुदेव, पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जैसे विचारकों के अनुसार,आज के समय में “नवयुग का मत्स्यावतार” का अर्थ समाज में वैचारिक क्रांति से है। जिस तरह मत्स्यावतार ने प्रलय के बीच से एक नई दुनिया की नींव रखी, उसी तरह आज गिरते नैतिक मूल्यों और अज्ञानता के बीच से एक नए, प्रबुद्ध और सतयुगी समाज का निर्माण करना ही इस विचार का आधुनिक स्वरूप है।

उपरोक्त पंक्तियाँ लिख कर गुरुदेव हम बच्चों से आशा कर रहे हैं  कि हम ऊँचे उठकर, विचारशीलता की दृष्टि से अपेक्षाकृत अधिक परिष्कृत बन चलें। एक से पाँच, पाँच से पच्चीस, पच्चीस से एक सौ पच्चीस वाली गुणन प्रक्रिया अपनाकर, चार और साथी ढूँढ़ें तथा उन्हें अपने प्रयोजनों में सहभागी बनाकर युगमानवों की  एक पंचायत विनिर्मित करें। उन्हें भी समयदान और अंशदान करते रहने के लिए,अपनी जैसी कर्म पद्धति अपनाने के लिए सहमत करें। करने का तो एक ही कार्य है: “विवेक-विस्तार’’ इसके कितने ही कार्यक्रम बन चुके हैं। इनमें से कुछ भी अपनी इच्छानुसार अपनाया जा सकता है। आत्मपरिष्कार, सत्प्रवृत्ति सम्वर्द्धन के अतिरिक्त इन दिनों जिस पुण्य-प्रक्रिया को उतने ही उत्साह से अपनाया जाना है, वह है एक से पाँच की रीति-नीति अपनाते हुए समस्त विश्व को नवजीवन की विचारधारा से अनुप्राणित करना। इसी क्रम में अपने जीवन का असाधारण परिष्कार और विकास भी सुनिश्चित रूप से हो सकेगा। हमें अपनेआप को एक Role model के रूप में प्रस्तुत करना होगा जिसे देखकर लोग स्वयं ही अनुसरण करने लगेंगें, किसी को कुछ भी कहना नहीं पड़ेगा,यह शिकायत की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी कि कोई सुनता ही नहीं है। गुरुदेव तो 36 वर्ष पूर्व की स्थितिओं में विवेक-विस्तार की बात कर रहे हैं लेकिन आज इंटरनेट ने कितना ही सरल कर दिया है,अपनी सुविधा,रूचि,टाईमटेबल के अनुसार हर कोई कितना कुछ ही कर सकता है।

साथिओ यहाँ पर आज के लेख का समापन होता है, परम पूज्य गुरुदेव द्वारा रचित पुस्तिका “जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र” पर आधरित ज्ञानयज्ञ की पूर्णाहुति अर्पित की जाती है लेकिन पिक्चर अभी बाकी है मेरे भाई,निम्नलिखित अवश्य पढ़ें,जीवन में उतारें,यह हम नहीं गुरुदेव कह रहे हैं, उनकी बात मानना तो हमारा धर्म होना चाहिए:

परम पूज्य गुरुदेव द्वारा सूक्ष्मीकरण से पहले मार्च 1984 में लोकसेवी कार्यकर्ता-समयदानी-समर्पित शिष्यों को दिया गया महत्त्वपूर्ण निम्नलिखित निर्देश परमपूज्य गुरुदेव ने स्वयं सभी को एक पत्रक वितरित करते हुए इसे प्रतिदिन पढ़ने और जीवन में उतारने का आग्रह किया था:

यह मनोभाव हमारी तीन उँगलियाँ मिलकर लिख रही हैं लेकिन किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि जो योजना बन रही है, कार्यान्वित हो रही है, उसे कलम, कागज या उँगलियाँ ही पूरा करेंगी। पूरा करने की जिम्मेदारी आप लोगों की, हमारे नैष्ठिक कार्यकर्ताओं की है।

इस विशालकाय योजना में प्रेरणा ऊपर वाले ने दी है। अवश्य ही कोई दिव्य सत्ता बता या लिखा रही है। मस्तिष्क और हृदय का कण-कण, जर्रा-जर्रा उसे लिख रहा है। लिख ही नहीं रहा है बल्कि इसे पूरा कराने का ताना-बाना भी बुन रहा है। योजना की पूर्ति में न जाने कितनों का, कितने प्रकार का मनोयोग और श्रम, समय, साधन आदि का कितना भाग होगा। मात्र लिखने वाली उँगलियाँ न रहें या कागज, कलम चूक जायें तो भी कार्य रुकेगा नहीं क्योंकि रक्त का प्रत्येक कण और मस्तिष्क का प्रत्येक अणु उसके पीछे काम कर रहा है। इतना ही नहीं, वह दैवी सत्ता भी सतत सक्रिय है, जो आँखों से न तो देखी जा सकती है और न दिखाई जा सकती है।

योजना उतनी ही बड़ी है जितना बड़ा उसका नाम है “युग परिवर्तन”। इसके लिए अनेक वरिष्ठों का महा-योगदान लगना है। उसका श्रेय संयोगवश प्रत्येक भागीदार को क्यों न मिले ? यह कैसे हो सकता है।

प्रस्तुत योजना को कई बार पढ़ें। इस दृष्टि से कि उसमें सबसे बड़ा योगदान उन्हीं का होगा, जो इन दिनों हमारे कलेवर के अंग-अवयव बनकर रह रहे हैं।

आप सबकी समन्वित शक्ति का नाम ही वह व्यक्ति है, जो इन पंक्तियों को लिख रहा है।

कार्य कैसे पूरा होगा? इतने साधन कहाँ से आएँगे? इसकी चिन्ता आप न करें। जिसने करने के लिए कहा है, वही उसके साधन भी जुटायेगा। आप तो सिर्फ एक बात सोचें कि अधिकाधिक श्रम व समर्पण करने में एक दूसरे से आगे कौन रहा? साधन, योग्यता, शिक्षा आदि की दृष्टि से हनुमान् उस समुदाय में कुछ भी नहीं थे। उनका भूतकाल भगोड़े सुग्रीव की नौकरी करने में बीता था लेकिन  जब महती शक्ति के साथ, सच्चे मन और पूर्ण समर्पण के साथ लग गए, तो लंका दहन, समुद्र छलांगने और पर्वत उखाड़ने का, राम, लक्ष्मण को कंधे पर बिठाये फिरने का श्रेय उन्हें ही मिला। आप लोगों में से प्रत्येक से एक ही आशा और अपेक्षा है कि कोई भी परिजन अपनेआप को हनुमान् से कम न समझे, कोई भी अपने कर्तृत्व में अपने अनजान सहचर से पीछे न रहे।

काम क्या करना पड़ेगा?

यह निर्देश और परामर्श आप लोगों को समय-समय पर मिलता रहेगा। काम बदलते भी रहेंगे और बनते-बिगड़ते भी रहेंगे। आप लोग तो सिर्फ एक बात स्मरण रखें कि जिस समर्पण भाव को लेकर घर से चले थे, पहले लेकर आए थे (हमसे जुड़े थे), उसमें दिनोंदिन बढ़ोत्तरी होती रहे। कहीं राई-रत्ती भी कमी न पड़ने पाये।

कार्य की विशालता को समझें।

लक्ष्य तक निशाना न पहुँचे, तो भी वह उस स्थान तक अवश्य पहुँचेगा, जिसे अद्भुत, अनुपम, असाधारण और ऐतिहासिक कहा जा सके। इसके लिए बड़े साधन चाहिए, सो ठीक है। उसका भार दिव्यसत्ता पर छोड़ें। आप तो इतना ही करें कि आपके श्रम, समय, गुण-कर्म, स्वभाव में कहीं भी कोई त्रुटि न रहे।

विश्राम की बात न सोचें

अहर्निश एक ही बात मन में रहे कि हम इस प्रस्तुतीकरण में पूर्णरूपेण खपकर कितना योगदान दे सकते हैं, कितना आगे रह सकते हैं, कितना भार उठा सकते हैं, स्वयं को अधिकाधिक विनम्र, दूसरों को बड़ा मानें। स्वयंसेवक बनने में गौरव अनुभव करें। इसी में आपका बड़प्पन है।

अपनी थकान और सुविधा की बात न सोचें।

जो कर गुजरें, उसका अहंकार न करें बल्कि इतना ही सोचें कि हमारा चिंतन, मनोयोग एवं श्रम कितनी अधिक ऊँची भूमिका निभा सका, कितनी बड़ी छलाँग लगा सका, यही आपकी अग्नि परीक्षा है। इसी में आपका गौरव और समर्पण की सार्थकता है। अपने साथियों की श्रद्धा व क्षमता घटने न दें। उसे दिन दूनी-रात चौगुनी करते रहें।

स्मरण रखें कि मिशन का काम अगले दिनों बहुत बढ़ेगा, अब से कई गुना अधिक। इसके लिए आपकी तत्परता ऐसी होनी चाहिए, जिसे ऊँचे से ऊँचे दर्जे की कहा जा सके। आपका अन्तराल जिसका लेखा-जोखा लेते हुए अपने को कृत-कृत्य अनुभव करे हम फूले न समाएँ और प्रेरक सत्ता आपको इतना घनिष्ठ बनाए, जितना की राम पंचायत में छठे हनुमान् भी घुस पड़े थे।

कहने का सारांश इतना ही है:

नित्य आप अपनी अन्तरात्मा से पूछें कि जो हम कर सकते थे,उसमें कहीं कोई  त्रुटि तो नहीं रही? आलस्य-प्रमाद को कहीं चुपके से आपके क्रिया-कलापों में घुस पड़ने का अवसर तो नहीं मिल गया? अनुशासन में व्यतिरेक तो नहीं हुआ? अपने कृत्यों को दूसरे से अधिक समझने की अहंता कहीं छद्म रूप में आप पर सवार तो नहीं हो गयी?

यह विराट् योजना पूरी होकर रहेगी। देखना इतना भर है कि इस अग्नि परीक्षा की वेला में आपका शरीर, मन और व्यवहार कहीं गड़बड़ाया तो नहीं। ऊँचे काम सदा ऊँचे व्यक्तित्व करते हैं। कोई लम्बाई से ऊँचा नहीं होता, श्रम,मनोयोग, त्याग और निरहंकारिता ही किसी को ऊँचा बनाती है। अगला कार्यक्रम ऊँचा है। आपकी ऊँचाई उससे कम न पड़ने पाए, यह एक ही आशा, अपेक्षा और विश्वास आप लोगों पर रखकर कदम बढ़ रहे हैं। आप में से कोई इस विषम वेला में पिछड़ने न पाए, जिसके लिए बाद में पश्चात्ताप करना पड़े।

धन्यवाद्,जय गुरुदेव


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