वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

कर्मकाण्ड, प्रतीक पूजा की फिलॉसॉफी क्या है ?

परम पूज्य गुरुदेव ने कर्मकांडों को समझने,उनके पीछे छिपे तथ्यों को समझने के लिए बार -बार बल दिया है, संसार में अंधविश्वास का तो  पहले ही बोलबाला है, यदि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से इस दिशा में कोई सार्थक परिणाम निकल पाते हैं, गुरूसाहित्य को समझा जाता है तो बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। हम सब इसी दिशा में, इसी एक उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ रहे हैं जिसके लिए सभी साथिओं का धन्यवाद् करते हैं।

आज की दिव्य गुरुकक्षा में सभी गुरुशिष्यों को सादर आमंत्रण है,स्वागत है। आज का ज्ञानप्रसाद लेख उन छोटी-छोटी बातों का विश्लेषण कर  रहा है जिन्होंने  गुरुदेव के आग्रह के बावजूद अनेकों को भ्रमित किया हुआ है,भगवान जो सबको देने वाले हैं उनको उपहारों से,धन से,भौतिक वस्तुओं से रिझाना कहाँ की समझदारी है?

ईश्वर को कभी भी किसी ने देखा नहीं है और न वह सर्वव्यापी निराकार होने के कारण देखने की वस्तु है। मंदिरों की शोभा बढ़ाती हुई भव्य प्रतिमाओं की स्थापना के पीछे एक ही उद्देश्य है  कि प्राण-प्रतिष्ठित प्रतिमा “मानवीय कलेवर में उत्कृष्टता” की पक्षधर है। मनुष्य उस परमपिता परमात्मा का ही अंश है,उसी की संतान है तो उसकी शक्ल सूरत भी तो प्रतिमा जैसी ही होनी चाहिए। ईश्वर की संतान होने के लिए मनुष्य को किसी DNA टैस्ट की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, इस पर विश्वास करने के लिए अटूट श्रद्धा,समर्पण एवं भावना की ज़रुरत है। जब यह सारे Element उस पत्थर की प्रतिमा के साथ जुड़ जाते हैं तो साधकों को परब्रह्म की विशिष्टताओं की परिकल्पना करना आसान हो जाता है ।

इस बात को समझाने के लिए गुरुदेव राष्ट्र ध्वज का उदाहरण देकर बता रहे हैं कि मात्र एक कपडे के टुकड़े में जब देशभक्ति की भावना और श्रद्धा का समावेश हो जाता है एवं उसके बाद जिस गर्व-गौरव के साथ, समुचित सम्मान प्रदान करते हुए फहराया जाता है तो बात कुछ और ही होती है। यही वोह पल एवं संकल्प होते हैं जिनसे प्रभावित होकर मातृभूमि के लिए जीवन तक  बलिदान करने की बात उठती है।

उसी प्रकार सर्वव्यापी, न्यायनिष्ठ सत्ता का प्रतिमा में आरोपण करके, भाव-श्रद्धा को इस स्तर का सुविकसित बनाया जाता है कि वह सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय “परब्रह्म” के साथ जुड़ सकने योग्य बन सके।

भगवान् के दर्शन करने के लिये लालायित अर्जुन,यशोदा, कौशल्या आदि के आग्रह का जब किसी प्रकार समाधान होते न दिख पड़ा और साकार दर्शन का आग्रह बना ही रहा, तो उन्हें तत्त्वज्ञान की, प्रकाश की प्रेरणा ने इस विशाल विश्व को ही विराट् ब्रह्म की,ईश्वर की  प्रतिमा बताया। गीताकार  ने इस विराट् स्वरूप का आलंकारिक ढंग से दर्शन वर्णन, विवेचन समझाते हुए यह बताने का प्रयत्न किया है कि “विश्वव्यापी उत्कृष्टता ही उपासना योग्य ईश्वरीय सत्ता है।” यों तो उसे समस्त विश्वब्रह्माण्ड में एक नियामक सूत्र संचालक के रूप में जाना जा सकता है लेकिन अनुशासन, सन्तुलन, सुनियोजन आदि के रूप में ही वैज्ञानिक दृष्टि से समझा जा सकता है। उसकी अनुभूति भाव एवं  श्रद्धा के रूप में ही हो सकती है। भगवान् को पाने के लिए, उसका अनुभव करने के लिए तन्मयता एवं भगवान्  जैसा होना बहुत ही ज़रूरी है क्योंकि पानी में ही पानी का विलय हो पाता है, तेल तो पानी के ऊपर तैरता ही रहता है,कहाँ मिल पाता है?

अग्नि के साथ एकात्मता प्राप्त करने के लिये ईंधन को आत्मसमर्पण करना पड़ता है और अपना स्वतन्त्र अस्तित्व मिटाकर अग्नि जैसा ही होने का साहस जुटाना पड़ता है। ईश्वर और जीव के मिलन की भी यही प्रक्रिया है। नाले को नदी में स्वयं का विलय करना ही पड़ता है। पानी को दूध में घुलना ही पड़ता है और वैसा ही स्वाद स्वरूप धारण करना पड़ता है, पति और पत्नी समर्पण की मानसिकता को अपनाकर ही द्वैत (दो) से अद्वैत (एक) की स्थिति में पहुँचते हैं। मनुष्य भी जब देवत्व से सम्पन्न होता है तो देवता बन जाता है और जब उसमें परमात्मा जैसी व्यापकता ओतप्रोत हो जाती है, तो आत्मा की स्थिति परमात्मा जैसी हो जाती है। उसमें बहुत कुछ उलट-फेर करने की अलौकिकता भी समाविष्ट हो जाती है। ऋषियों और सिद्ध पुरुषों को इसी दृष्टि से देखा-परखा जाता है एवं और उसी आधार पर श्रेय-सम्मान भी दिया जाता है।

प्रतीक पूजा की फिलॉसोफी

भगवान् को पूजने के लिए, जानने के लिए अनुभव करने के लिए प्रतीक पूजा का बहुत बड़ा योगदान है।  प्रत्येक सम्प्रदाय,क्षेत्र में विभिन्न मत−मतान्तरों के अनुरूप विभिन्न प्रकार की पूजा पद्धतियाँ, प्रचलित पाई जाती हैं। उन सब के पीछे एक ही तथ्य और रहस्य काम करता है कि अपनेआप को परिष्कृत एवं सुव्यवस्थित बनाया जाये। ईश्वर की एकमात्र पूजा,उपासना और अभ्यर्थना स्वयं को परिष्कृत करना ही है। विश्व व्यवस्था में निरन्तर संलग्न परमेश्वर को फुर्सत नहीं कि वह भक्तजनों के इतने विशाल परिवार की मनुहार सुनने में अपने अमूल्य समय को नष्ट करे। भक्तजनों द्वारा प्रदान किये गए भांति-भांति के उपहारों को ग्रहण करने में ईश्वर अपना अमूल्य समय कैसे नष्ट करे? भक्तजनों द्वारा प्रार्थना के माध्यम से किये गए कृत्यों को,अपनेआप को उत्कृष्टता के मार्ग पर चल पड़ने के लिए स्व-संकेत (Self-indication) के रूप में रचा और किया जाता है।

ईश्वर पर न किसी की प्रशंसा का कोई असर पड़ता है और न निन्दा का। पुजारी लोग नित्य प्रशंसा के पुल बाँधते रहते हैं  और नास्तिक लोग हजारों गालियाँ सुनाते रहते हैं। इनमें से किसी की भी बकझक का भगवान  पर कोई असर नहीं पड़ता। पाठक भलीभांति जानते हैं कि गिड़गिड़ाने से, नाक रगड़ने से भी सिलेक्शन कमेटी किसी को ऑफिसर नियुक्त नहीं कर पाती। स्कालरशिप  प्राप्त करने के लिए अच्छे नंबर लाने और कम्पटीशन जीतने से कम में किसी प्रकार भी काम नहीं चलता।

ईश्वर की भी यही सुनिश्चित रीति-नीति है। उसकी प्रसन्नता भी एक केंद्रबिन्दु पर केंद्रित है कि किसने उसके विश्व उद्यान को सुन्दर समुन्नत बनाने के लिए कितना अनुदान प्रस्तुत किया।

उपासनात्मक कर्मकाण्ड इसी एक सुनिश्चित व्यवस्था को जानने-मानने के लिये किये और अपनाये जाते हैं। यदि लकीर पीटने भर की तरह उपसनात्मक कार्य पूरे किये जायें और परमात्मा के आदेश/अनुशासन की अवज्ञा की जाती रहे तो समझना चाहिए कि यह मात्र बाल-क्रीड़ा खेल-खिलवाड़ ही है। ऐसा करने से कब किसी का भला हुआ है?

विडंबना तो यह है कि आज के युग का मानव रिश्वतखोरी का,घूस देने का आदि हो गया है, जानता है कि पैसा,उपहार आदि चढ़ाने से काम बन ही जाते हैं  तो भगवान कौन से किसी अन्य ग्रह से अवतरित हुए हैं,उन्हें भी तो रिश्वत देकर बहलाया-फुसलाया जा सकता है,अपना कार्य निकाला जा सकता। लेकिन साथिओ यह हम कह रहे हैं, दूसरी प्रवृति के लोग तो हम पर व्यंग ही कसेंगे !!!! लेकिन जो सत्य है वोह सत्य ही है,भगवान् किसी के लालच में आने वाले नहीं, उन्हें कोई बहका नहीं सकता,ऐसा हमारा अटल विश्वास है।

देवपूजा के कर्मकाण्डों को “प्रतीक उपासना” कहते हैं जिसका तात्पर्य संकेतों के आधार पर क्रिया-कलापों को निर्धारित करना है । देवता की प्रतिमा मनुष्य की सरासर एक पूर्ण परिकल्पना है जिसके उपासक को हर स्थिति में सर्वांग सुन्दर एवं नवयुवकों जैसी मन:स्थिति में बने रहना चाहिए। देवियाँ मातृसत्ता की प्रतीक हैं। तरुणी एवं सौन्दर्यमयी होते हुए भी उन्हें कुदृष्टि से नहीं देखा जाता बल्कि पवित्रता की मान्यता विकसित करते हुए उन्हेें श्रद्धापूर्वक नमन-वन्दन ही किया जाता है। गुरुदेव इस प्रतीक उपासना को रैफर करते हुए बताते है कि सार्वजानिक जीवन में भी नारी के प्रति ऐसी ही मान्यताएँ, इस स्तर की भावना  विनिर्मित/विकसित होनी चाहिए। मंदिर में प्रतिमा के ऊपर तो पुष्प भेंट किये जाते हैं लेकिन रियल लाइफ में कुछ और ही देखने को मिलता है।

पूजा-अर्चना में जल,चावल,पुष्प,चन्दन,धूप,दीप,नैवेद्य आदि को सँजोकर रखा जाता है। इन सबका तात्पर्य उन माध्यम संकेतों को ध्यान में रखते हुए जीवन की  रीति-नीति का निर्धारण करना होता है। जल को शीतलता का प्रतीक माना गया है,यह यही सन्देश देता है कि हम सदैव शान्त, सौम्य और सन्तुलित रहें। रियल लाइफ में जब कोई बड़ा उत्तेजित होकर भांति-भांति के एक्शन करने लगता है तो उसे शीतल जल पिला कर ही ठंडा किया जाता है, उसका क्रोध, तेज़ी से भाग रहा रक्त पल भर में शांत हो जाता है। धूप-अगरबत्ती के पीछे का दिशा निर्देश यह है कि हम वातावरण को सत्प्रवृत्तियों से भरा-पूरा सुगन्धित बनाएँ,अपने आसपास सदैव सुख-शांति का वातावरण चरितार्थ करें। पूजा पाठ में दीपक का प्रयोग यह संकेत देता है कि ज्ञान का प्रकाश व्यापक बनाने के लिए हम अपने साधनों, विभूतियों में से कुछ भी बलिदान करने के लिए तैयार रहें। चन्दन के वृक्ष पर वास करने वाले  सर्प भी इस दिव्य वृक्ष की सुगंध से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते तो पूजा-अर्चना में चंदन तिलक से कोई साधक शांत और शीतल हुए बिना कैसे रह सकता है। चंदन के घिसने के पीछे यही सन्देश है कि बार-बार, लगातार घिसे जाने जैसी विकट परिस्थितियाँ आने पर भी मनुष्य को सुगन्धित रहने के स्वभाव को न छोड़ा जाए। पुष्प हमेशा ही हँसते-हँसाते, खिलखिलाते रहने की नेचर का सन्देश देते हैं। पूजा उपासना में अक्षत (चावल) का प्रयोग किया जाता है। अक्षत (अ+क्षत) का अर्थ होता है जो टूटा हुआ न हो,अटूट हो, अतः चावल अटूट निष्ठा का प्रतीक है, अपने उपार्जन का एक अंश दिव्य प्रयोजनों के लिए नियोजित करने में अटूट निष्ठा बनाए रखने, उदार बने रहने का सन्देश देता है।

भगवान् को उपरोक्त किसी भी वस्तु की कोई भी आवश्यकता पड़ रही हो, ऐसी बात नहीं है। इन प्रतीक-समर्पणों के माध्यम से मनुष्य स्वयं को  प्रशिक्षित करता है कि देवत्व के अवतरण के लिए व्यक्तित्व को “पात्रता” से सुसज्जित रखें।

रेलवे गार्ड लाल और हरी झण्डियाँ दिखा कर रुकने और चलने का सन्देश देता है। उसी को समझने और क्रियान्वित करने पर रेल व्यवस्था बन पड़ती है। क्या कभी किसी ने सोचा है कि जब ट्रैफीक सिग्नल्स, स्टॉप signs आदि का आविष्कार नहीं हुआ था तो सड़कों की कितनी अस्तव्यस्त दशा होती होगी,गूगल सर्च से उस ज़माने के अनेकों चित्र मिल जायेंगें जिन्हें  देख कर एकदम यही शब्द निकल पड़ेंगें, “Oh my God हम कहाँ से कहाँ आ पहुंचे है ?” उन चित्रों पर शायद ही कोई विश्वास कर पाए। मनुष्य जीवन का भी यही सन्देश है,उसके जीवन में भी Stop sign, Red,Amber और Green lights का वही महत्व है जो सड़क पर दौड़ती गाडिओं को नियंत्रित करने में हैं। एक बार छोटी सड़कों पर गाड़ी चलाने का लाइसेंस मिल गया तो ही जीवन की एक्सप्रेसवे पर बिना किसी रोक टोक के जीवन की गाड़ी चलाई जा सकता है,वहां तो कोई ट्रफिक सिग्नल ही नहीं है।

भांति-भांति के उपासनात्मक क्रिया-कृत्यों में, ड्रामेबाज़ियां करके भगवान् को रिझाने-फुसलाने में कुछ भी प्राप्त होने वाला नहीं है। पात्रता प्रमाणित किए बिना,पुरुषार्थ अपनाए बिना भगवान से मनचाही कामनाएँ पूरी करा लेना प्रपंच नहीं तो और क्या है? लोग तो आमतौर पर इसी भ्रम में उलझे रहते हैं,उन्हें इस बात का ज्ञान ही नहीं है कि फसल काटने से पहले बीज बोना पड़ता है, सींचने के बिना काम चलता ही नहीं है, चाहे कोई कितना ही अनुनय-विनय कर ले, कुछ भी उछल-कूद क्यों न कर ले, कुछ भी बनने वाला नहीं है।

साथिओ यही है आज के लेख का सन्देश, इससे अलग-अलग रूपों में अनेकों बार इस मंच से प्रसारित करके स्मरण कराया जाता है।

जय गुरुदेव


Leave a Reply