“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की 7वीं पुस्तिका “जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र” की 9वीं कक्षा में समर्पित गुरुशिष्यों का स्वागत है। त्रय शताब्दी वर्ष में लिया गया संकल्प सुपर हाई स्पीड से आगे बढ़ता जा रहा है जिसके लिए साथी बधाई के पात्र हैं।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख में चर्चा की गयी है कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग नामों वाले,भांति-भांति के कर्मकाण्डों,क्रिया-कृत्यों का प्रयोग करना कहाँ तक समझदारी है। चर्चा की गयी है कि क्यों न भगवान श्रीराम द्वारा माता शबरी से सम्बंधित “नवधा भक्ति (नौ प्रकार की भक्ति)” का सहारा लिया जाए जिससे प्रतक्ष्य प्रमाण देखे जाते हैं। इसी भक्ति को समझाते हुए गुरुदेव मानवी काया पर नौलखा हार धारण करने की बात कर रहे हैं क्योंकि इस युगदृष्टा ने देख लिया था कि 21वीं सदी में बच्चों को समझाने के लिए कुछ इसी तरह की शिक्षा की ज़रुरत है। युगपरिवर्तन के लिए ऐसे संकल्पों को लेने के सिवाय और कोई विकल्प है ही नहीं।
आइए आज की कक्षा का शुभारम्भ करें।
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अक्सर देखा गया है कि भक्तजन देवता की पूजा अर्चना के लिए,भगवान को प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग नामों वाले,भांति-भांति के कर्मकाण्डों,क्रिया-कृत्यों का प्रयोग करते रहते हैं। गुरुदेव पूछ रहे हैं कि इन क्रिया-कृत्यों के बदले में साधकों को क्या मिला? उसका विवरण तो भक्तजन स्वयं ही बता सकते हैं लेकिन इन साधनाओं को निश्चित रूप से विश्वासपूर्वक “नवधा भक्ति” के साथ एक्सचेंज किया जा सकता है।
कर्मकांडों आदि में विश्वास रखने वाले भक्तजन “नवधा भक्ति” पर कहाँ विश्वास करेंगें लेकिन इस बात को सुनिश्चित तो करना ही पड़ेगा कि जो कुछ भी किया जा रहा है उससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही क्षेत्रों में गरिमामय उपलब्धियों की प्राप्ति हो भी पाई कि नहीं, साधना के इतने कठिन कर्मकांड किये भी लेकिन हाथ क्या लगा? घर-परिवार की डांट-डपट भी सही,गुस्सा-गिला भी सहन किया लेकिन प्राप्त तो कुछ हुआ नहीं। ईश्वर तो कण-कण में विराजमान हैं,हममें, तुममें,यहाँ तक कि ऐसों में भी जो दिखते तक नहीं हैं,अदृश्य हैं तो फिर ऐसा कार्य क्यों न किया जाए जिससे साक्षात् प्रसन्नता,सुख-शांति का आभास हो।
खैर यह एक ऐसा व्यक्तिगत विषय है जिसकी निंदा करना इस लेख का उद्देश्य बिलकुल नहीं है। सभी का सम्मान करना ही सबसे बड़ी विशेषता है इसीलिए इस Controversial टॉपिक को यहीं पर छोड़ कर आगे बढ़ते हुए आइए समझने का प्रयास करें कि “नवधा भक्ति” क्या है !!!
श्रीरामचरितमानस (अरण्यकांड) के अनुसार भगवान श्रीराम, माता शबरी को वर्णित “नवधा भक्ति” के बारे में कहते हैं कि इन नौ प्रकार की भक्तियों में से जिसके पास एक भी भक्ति होती है, वह स्त्री, पुरुष, जड़ या चेतन कोई भी हो, मुझे अत्यंत प्रिय होता है। भगवान श्रीराम ने माता शबरी को जिस “नवधा भक्ति” की बात बताई थी उसके 9 निम्नलिखित चरण इस प्रकार थे:
1.प्रथम भक्ति-संतन कर संगा: संतों और सत्संगियों का सत्संग करना।
2.द्वितीय भक्ति-मम कथा प्रसंगा: भगवान की कथाओं और लीलाओं को प्रेम से सुनना।
3.तृतीय भक्ति-गुरु पद पंज सेवा: निष्काम भाव और श्रद्धा से गुरु के चरणों की सेवा करना।
4.चतुर्थ भक्ति-मंत्र जाप मम गान: कपट छोड़कर भगवान के गुणों और मंत्रों का गान व जप करना।
5.पंचम भक्ति-मंत्र जाप मन दृढ़ विश्वासा: वेद के वचनों और भगवान के नाम में मन से दृढ़ विश्वास रखना (निरंतर शील और विरति में रहना)।
6.षष्ठ भक्ति-दम शील विरति बहु कर्मा: संयम (इंद्रिय दमन), अच्छा शील (स्वभाव), वैराग्य और निरंतर सज्जन धर्म का पालन करना।
7.सप्तम भक्ति-सम जग देखा मोहिते संत अधिक करि लेखा: संपूर्ण जगत को ईश्वर रूप देखना और संतों का आदर करना।
8.अष्टम भक्ति-यथा लाभ संतोष सपनेहूँ नहिं देख परदोषा: जो कुछ भी सहज रूप से मिल जाए उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी दूसरों के दोषों को न देखना।
9.नवम भक्ति-सरल सब सन छलहीना मम,हिए हरस ना दीना(सरलता और छलहीनता): सबके साथ कपट-रहित सरल व्यवहार करना, हृदय में भगवान का भरोसा रखना और किसी भी परिस्थिति में हर्ष या विषाद (दीनता) से विचलित न होना।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के अधिकतर साथी जो हमारे साथ वर्षों से जुड़े हुए हैं एवं ज्ञानप्रसाद लेखों का नियमितता से अमृतपान कर रहे हैं स्वयं ही देख सकते हैं कि भगवान राम ने माता शबरी से जिस भक्ति की बात की, परम पूज्य गुरुदेव उसी की बात करते आये हैं। भगवान के खेत में बोने की बात हो, जो प्राप्त है वही पर्याप्त है की बात हो,भगवान की संतान होने के बात हो,सभी का लक्ष्य एक ही है, भगवत प्राप्ति-ईश्वर के गुणों का संचार करना।
उपरोक्त गुण ऐसे गुण हैं जिन्हें जीवन यात्रा का “एक सुनिश्चित राजमार्ग” कहा जा सकता है। प्रतक्ष्य परिणाम देने वाले कृत्यों को कुछ सोच समझ कर ही “एक सुनिश्चित राजमार्ग”, A definite super highway, express way, शाहराह का नाम देते समय गुरुदेव जानते थे कि 21वीं सदी (जिसके 26वें वर्ष में यह पंक्तियाँ लिखीं जा रही है),विकास के ऐसे स्तर पर होगी कि उनके बच्चे जीपीएस लगाकर, क्रूज कण्ट्रोल से हाइवेज पर गाड़ियां दौड़ा रहे होंगें। सुनिश्चितता इस स्तर की होगी कि (अगर कुछ अनहोनी न हो जाए) तो बच्चे फ़ोन करके माता पिता को बता देंगें कि 6 बज कर साढ़े 23 मिंट (मात्र एक उदाहरण) पर घर पंहुच रहे हैं। जिस Second decimal place तक की सुनश्चितता आधुनिक विकास के कारण प्रतक्ष्य दिख रही है उन्हीं प्रतक्ष्य परिणामों को गुरुदेव हम बच्चों की साधना-भक्ति में देखना चाहते हैं।
यह कैसे हो सकता है कि पाठक ज्ञानप्रसाद लेख का अमृतपान करें और उनके अंतकरण में हलचल न हो? यदि हलचल नहीं होती है तो कारण पाठक का अपना अज्ञान ही है ज्ञानप्रसाद में तो कोई कमी नहीं है, इस पर हमारे गुरुदेव की दिव्य कलम चली हुई है।
तो साथिओ, राजमार्ग पर चलने के यही लाभ होते हैं, न कोई स्टॉप साइन, न कोई उबड़-खाबड़, न कोई गड्ढे, दिशा भी एक ही होती है ,ईस्टबॉउन्ड यां वेस्टबॉउंड, कोई एक्सीडेंट तक का खतरा नहीं, हाँ एक्सीडेंट होते हैं लेकिन इनके पीछे ड्राइवर की गलती होती है, एक्सप्रेसवे में तो कोई कमी नहीं है। यही है भगवान् का सुपर हाईवे जहाँ पर हमें स्पीड पकड़नी है,कोई रिस्क नहीं है, स्टीयरिंग तो गुरुदेव के हाथ में है। सच मानिये भटकने का कोई रिस्क है ही नहीं। भटकते तो केवल वही हैं जिन्हें छलांग लगाकर, तुर्त-फुर्त (हथेली पर सरसों ज़माने वाले, रातोंरात वायरल होने वाले), बिना उचित ट्रेनिंग (पात्रता) का परिचय दिये ही बहुत कुछ पा लेने की हवस सताती है। ऐसे लोगों की प्रवृति इस स्तर की होती है कि आँख मलते ही, कहीं से भी, कैसे भी (By hook or by crook) इन्द्र जैसा वर्चस् (Supremacy) और कुबेर जैसा वैभव उड़ा लाने की, लोगों को हैरान करने की हवस रहती है। गुरुदेव बता रहे हैं कि ऐसे व्यक्ति ही “साधना से सिद्धि” के सिद्धान्त पर लांछन लगाते और आरोप थोपते हुए देखे गये हैं। नौ धागों का,नौ गुणों वाला यज्ञोपवीत धारण करने की विधा इसी संकेत पर ध्यान केन्द्रित किए रखने के लिये बनाई गई है कि पंचतत्त्वों से बनी, रक्त माँस, अस्थि जैसे पदार्थों से अंग-प्रत्यंगों को जोड़-गाँठ कर खड़ी की गयी, इस मानवी काया को यदि “नौलखे हार” से सुसज्जित करना हो तो उन नौ गुणों को चिन्तन,चरित्र, व्यवहार में,गुण-कर्म,स्वभाव में गहराई तक समाविष्ट किया जाए। उन्हें क्रियाकलाप में, अभ्यास में शामिल करने के लिए प्राण-प्रण से प्रयत्न करना चाहिए। पाठक जानते ही होंगें कि यज्ञोपवीत के लड़ तो तीन ही होते हैं लेकिन प्रत्येक लड़ के तीन और धागे होते हैं।
भारतीय अध्यात्म, संतों की वाणियों (जैसे कबीर या लोकभजनों) और फिलॉसॉफी में “मानवी काया का नौ गुणों वाला नौलखा हार” एक बेहद सुंदर अलंकार है। यहाँ ‘मानवी काया’ का मतलब मनुष्य का शरीर है और ‘नौलखा हार’ का मतलब कोई कीमती गहना नहीं, बल्कि जीवन को मूल्यवान बनाने वाले नौ दिव्य गुण या नौ आंतरिक शक्तियाँ हैं।
इस रूपक के अनुसार, जिस प्रकार नौ लाख कीमती रत्नों से बना हार शरीर की बाहरी शोभा बढ़ाता है, उसी प्रकार ये नौ गुण मनुष्य की आत्मा और चरित्र को चमकाते हैं। आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टिकोण से इस “नौलखा हार” के नौ मुख्य गुण निम्नलिखित हैं:
1. विवेक (Wisdom / Right Judgment)
सही और गलत, नश्वर और शाश्वत के बीच अंतर करने की क्षमता होना इस हार का सबसे केंद्रीय रत्न है।
2. सत्य (Truthfulness)
मन, वचन और कर्म में ईमानदारी रखना। सत्य पर टिके रहना ही जीवन का सबसे बड़ा आभूषण है।
3. संतोष (Contentment)
जो प्राप्त है, उसमें खुश रहना। लालच का न होना ही मनुष्य को मानसिक रूप से अमीर बनाता है।
4. क्षमा (Forgiveness)
दूसरों की गलतियों को माफ करने का बड़ा दिल रखना एक ऐसा गुण है जिसका प्रयोग करके मन का बोझ हल्का होता है।
5. दया और करुणा (Compassion & Kindness)
सभी जीव-जंतुओं और मनुष्यों के प्रति दया का भाव रखना और उनके दुख को दूर करने का प्रयास करना मनुष्य का धर्म होना चाहिए।
6. प्रेम (Universal Love)
बिना किसी स्वार्थ के सृष्टि के हर कण से प्रेम करना क्योंकि प्रेम ही आत्मा का वास्तविक स्वभाव है।
7. विनम्रता (Humility)
अहंकार (घमंड) से दूर रहना, विद्या और गुण आने पर जो झुकना जानते हैं, वे ही इस हार को धारण कर पाते हैं।
8. धैर्य (Patience)
कठिन परिस्थितियों और सुख-दुख में अपने मन का संतुलन न खोना और सही समय का इंतजार करने का साहस बहुत ही बड़ी विशेषता है।
9. वैराग्य या पवित्रता (Detachment / Purity)
संसार की बुराइयों और वासनाओं से दूरी बनाए रखना तथा मन को साफ और पवित्र रखना मनुष्य का नौंवा रत्न है
इन नौ गुणों को धारण करते ही मनुष्य का ऐसा कायाकल्प होता है जिसके लिए किसी बाहरी धन्वन्तरि वैध की खुशामद करने की आवश्यकता नहीं। यह च्यवन ऋषि जैसा पुनर्यौवन प्राप्त करने का सुयोग है जिसके लिए अश्विनीकुमारों का अनुग्रह तनिक भी अपेक्षित नहीं। यह पशु को देवता बना देने वाली महान् उपलब्धि है जिसे ‘‘द्विजत्व’’ अर्थात दूसरे जन्म के नाम से जाना जाता है । इसमें आकृति नहीं, केवल प्रकृति बदलती है और मनुष्य जिस भी, जैसी भी स्थिति में रह रहा हो, उसे उसी क्षेत्र में वरिष्ठता की सहज उपलब्धि हो जाती है।
धर्म-धारणा को विभिन्न सम्प्रदायों और मतमतान्तरों ने भिन्न-भिन्न संख्याओं में गिनाया है और स्वरूप तथा प्रयोग अपनी-अपनी मान्यता के अनुरूप बताया-समझाया है, किन्तु आज की स्थिति में अनेक थनों से दुहे गये दूध को सम्मिश्रित करके एक ही मथानी से मथ कर, एक जैसी आकृति का एक ही नाम वाला मक्खन निकालने की उपयोगिता-आवश्यकता समझी जा रही है। कोई कारण नहीं कि उपर्युक्त नौ रत्नों से जड़े गए हार को सर्वप्रिय एवं सर्वमान्य आभूषण न ठहराया जाए। मिठाई-मिठाई रटते रहने से उसके स्वरूप-स्वाद का आलंकारिक वर्णन करते रहने भर से तो मुँह मीठा नहीं होता है। उसका रसास्वादन करने और लाभ उठाने का एक ही तरीका है जिसकी भावभरी चर्चा की जा रही है, उसे खाया ही नहीं, पचाया भी जाये। धर्म उसे कहते हैं, जो धारण किया जाये। उस आवश्यकता की पूर्ति के लिए कथा प्रवचनों को कहते-सुनते रहना भी कुछ कारगर न हो सकेगा। बात तो तभी बनेगी जब जिस प्रक्रिया का माहात्म्य कहा-सुना जा रहा हो, उसे व्यवहार में उतारा जाये। व्यायाम किये बिना कोई पहलवान कहाँ बन पाता है? इसी प्रकार ज्ञानप्रसाद लेखों में समाहित ज्ञान को व्यावहारिक जीवनचर्या में उतारने एवं एक्शन करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प है ही नहीं।
जय गुरुदेव