“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की सातवीं पुस्तिका पर आधारित 8वें ज्ञानप्रसाद लेख के अध्ययन के लिए सभी गुरुशिष्यों का स्वागत है। पहली 6 पुस्तिकाओं की भांति इस पुस्तिका को भी सभी उपलब्ध स्रोतों की सहायता से समझने का प्रयास किया जा रहा है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार ने गुरुकृपा से 23 पुस्तिकाओं के दिव्य संग्रह की बाकी पुस्तिकाओं के अमृतपान का संकल्प लिया हुआ है। त्रय शताब्दी वर्ष 2026 में गुरुसत्ता द्वारा ऐसा दिव्य संकल्प प्रदान होना इससे बड़ा अनुदान क्या हो सकता है।
आज के लेख में मुख्य तीन बिंदुओं पर चर्चा की गयी है। पहला बिंदु “पंचशील के पांच सूत्र श्रमशीलता, मित्व्यतिता,शिष्टता,सहकारिता, सुव्यवस्था” है जिनकी जानकारी कल वाले लेख में दी गयी थी, दूसरा बिंदु “उच्च मानसिकता के चार सूत्र-1.समझदारी, 2.ईमानदारी, 3.जिम्मेदारी 4.बहादुरी” है जिसकी जानकारी 22 जुलाई 2026 के ज्ञानप्रसाद लेख में विस्तृत रूप में दी गयी थी आज संक्षेप में फिर से दी गयी है। इन दोनों बिंदुओं को जोड़ लेने से एक मैजिक नंबर 9 (5+4) मिलता है। तीसरा बिंदु यही 9 है जिसका महत्व ही आज का यह दिव्य ज्ञानप्रसाद लेख है।
गुरुदेव बता रहे हैं कि यदि कल्पनाओं की उड़ान से ज़रा नीचे उतर कर “व्यावहारिक धर्म-कर्म” में नौ सूत्रीय उत्कृष्टता का समावेश किया जाये तो जीते जी भी हर घड़ी स्वर्ग और मुक्ति का रसास्वादन करते रहा जा सकता है। इतना ही नहीं, इन दो के अतिरिक्त एक और तीसरा लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है और वोह है सिद्धियों के चमत्कार, सफलताएँ खिंचती हुई चली आती हैं और मनस्वी के पैरों तले लोट पोट होने लगती हैं।
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भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में अंक 9 (नवरात्रि,नवग्रह,नवदुर्गा,नवरस,शरीर के नवद्वार) को पूर्णता, दिव्यता और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। आइए 9 के अलग-अलग महत्व के आधार का अवलोकन करें।
1.नवदुर्गा (माँ दुर्गा के नौ रूप): शक्ति की उपासना के पर्व में नौ दिनों तक माँ दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री) की पूजा होती है।
2.नवग्रह (नौ ग्रह): वैदिक ज्योतिष और खगोल विज्ञान में नौ ग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु) को मानव जीवन और भाग्य का संचालक माना गया है। इन्हीं नौ ग्रहों की ऊर्जा को संतुलित करने के लिए पहने जाने वाले नौ रत्नों के समूह का महत्व है। नीचे दिए गया नौ रत्नों को ग्रहों से जुड़े होते हुए देखा जा सकता है कि भारतीय फिलॉसफी और ज्ञान कितना गूढ़ है।
-माणिक्य (Ruby) सूर्य ग्रह का रत्न है, जो आत्मविश्वास, मान-सम्मान और ऊर्जा बढ़ाता है।
-मोती (Pearl) चंद्रमा का रत्न है, जो मन की शांति, शीतलता और मानसिक संतुलन प्रदान करता है।
-मूँगा (Red Coral) मंगल ग्रह का रत्न है, जो साहस, पराक्रम और शारीरिक शक्ति में वृद्धि करता है।
-पन्ना (Emerald) बुध ग्रह का रत्न है, जो बुद्धि, संचार कौशल, व्यापार और स्मरण शक्ति को मजबूत करता है।
-पुखराज (Yellow Sapphire) बृहस्पति (गुरु) का रत्न है, जो ज्ञान, समृद्धि, सौभाग्य और आध्यात्मिक उन्नति लाता है।
-हीरा (Diamond) शुक्र ग्रह का रत्न है, जो भौतिक सुख-सुविधाओं, आकर्षण, प्रेम और ऐश्वर्य का प्रतीक है।
-नीलम (Blue Sapphire) शनि ग्रह का रत्न है, जो अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है और करियर में सफलता व सुरक्षा प्रदान करता है।
-गोमेद (Hessonite) राहु ग्रह का रत्न है, जो भ्रम दूर करने, आकस्मिक लाभ और रणनीतिक क्षमता में मदद करता है।
-लहसुनिया (Cat’s Eye) केतु ग्रह का रत्न है, जो आध्यात्मिक स्पष्टता बढ़ाता है और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है।
3.पूर्णता और अंक ज्योतिष: अंक 9 को गणित और अंकशास्त्र में एक पूर्ण और दिव्य अंक माना जाता है क्योंकि किसी भी संख्या को 9 से गुणा करने पर प्राप्त अंकों का योग भी अंततः 9 ही आता है। उदाहरण से देखा जा सकता है कि 9 x 2 =18 होते हैं और 8 और 1 का योग 9 होता है। इसी तरह 9 x 4 =36 होता है और 6 और 3 का योग भी 9 ही होता है। इसी तरह और नंबर भी चैक किये जा सकते हैं।
4 .108 की परंपरा: सनातन परंपरा में जप या माला के लिए 108 संख्या का प्रयोग होता है, जिसका कुल योग (1 + 0 + 8) भी 9 होता है।
5.मानव शरीर और तत्व: योग और प्राचीन शास्त्रों के अनुसार मानव शरीर में नौ द्वार (दो आंख,दो कान,दो नासिकाएं,एक मुख,एक मूत्र द्वार,एक मल त्याग द्वार) माने गए हैं।
इसके अलावा भारतीय साहित्य और कला में नवरस (श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक , बिभत्स, अद्भुत और शांत) भी नौ ही हैं।
9 की महानता एवं उस महानता के आधार आइए 4 और 5 को फिर से दोहरा लें।
उच्च मानसिकता के चार सूत्र:
व्यवहार की धर्मधारणा और सेवा-साधना उपर्युक्त सद्गुणों को जीवन में उतारने भर से बन पड़ती है। इसके अतिरिक्त दूसरा क्षेत्र मानसिकता का रह जाता है। उसमें चरित्र और भावनात्मक विशेषताओं का समावेश किया जा सके तो समझ लेना चाहिए कि लोक-परलोक दोनों को ही समुन्नत स्तर का बना लिया गया।
जिस प्रकार चार वेद, चार धर्म, चार कर्म, को चार दिव्य वरदान कहा जाता है,उसी प्रकार चार मानसिक विशेषताओं (1.समझदारी, 2.ईमानदारी,3.जिम्मेदारी 4.बहादुरी) का अपना ही महत्व है।
समझदारी का अर्थ तात्कालिक आकर्षण पर संयम बरतना, कण्ट्रोल करना होता है। Long-term, Permanent परिणतियों, प्रतिक्रियाओं का स्वरूप समझना एवं उसके बाद हो निर्णय करना भी समझदारी ही है। चटोरेपन के लालच में लोग अभक्ष्य-भक्षण कर लेते हैं, कामुकता के जोश में शरीर और मस्तिष्क को खोखला करते रहते हैं। अदूरदर्शिताएँ ऐसे ही दुष्परिणाम उत्पन्न करती हैं। ऐसे ही लालच और ललक से लोग, अनाचार पर उतरते, कुकर्म करते और प्रताड़ना सहते हैं । अदूरदर्शिता के कारण ही लोग मछली की तरह सामान्य से प्रलोभनों के लोभरुपी कांटे में फँस कर बहुमूल्य जीवन गँवा देते हैं। यदि मनुष्य समझदारी को अपना मित्र समझ कर उसके साथ-साथ चले तो इंद्रिय संयम,समय संयम,अर्थ संयम अपनाते हुए उन छिद्रों को सरलतापूर्वक रोका जा सकता है, जो जीवन सम्पदा को अस्त-व्यस्त और खोखला करके रख देते हैं।
ईमानदारी बरतना सरल है, जबकि बेईमानी बरतने में अनेक प्रपंच रचने और छल-छद्म अपनाने पड़ते हैं। स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि ईमानदारी के सहारे ही कोई व्यक्ति प्रामाणिक और विश्वासी बन सकता है। ईमानदारों को ही जन-जन का सहयोग एवं सम्मान पाने का अवसर मिलता है। उत्कर्ष अभ्युदय के लिए इतना अवलम्बन बहुत है,आगे की गतिशीलता तो खुद ही चल पड़ती है। जिन लोगों ने बेईमानी बरती उन्होंने अपना विश्वास गँवाया। कैसी विडंबना है कि घोर बेईमान व्यक्ति भी नौकर ईमानदार ही रखना चाहता है। इससे प्रकट होता है कि ईमानदारी की सामर्थ्य कितनी बढ़ी-चढ़ी है। जिनकी प्रतिष्ठा एवं गरिमा अन्त तक अटूट बनी रहती है, उनमें से प्रत्येक ने सच्चे मन से ईमानदारी की रीति-नीति अपनाई। झूठों की बेईमानी तो काठ की हाँड़ी की तरह एक बार ही चढ़ती है।
तीसरा भाव पक्ष जिम्मेदारी है। हर व्यक्ति शरीर रक्षा, परिवार व्यवस्था, समाज निष्ठा, अनुशासन का परिपालन जैसे कर्तव्यों से बँधा हुआ है। जिम्मेदारियों को निबाहने पर ही मनुष्य का शौर्य निखरता है,विश्वास बनता है। विश्वसनीयता के आधार पर ही वह व्यवस्था बनने लगती है, जिसके अनुसार उन्हें अधिक महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ सौंपी जाती हैं, प्रगति के उच्च शिखर पर जा पहुँचने का सुयोग खिंचता चला आता है, लोग उन्हें आग्रहपूर्वक बुलाकार और सिर पर बिठाते हैं। जिम्मेदार लोगों का व्यक्तित्व ही निखरता है एवं बड़े पराक्रम उन्हीं से बन पड़ते हैं।
चौथी आध्यात्मिक सम्पदा बहादुरी है। हिम्मत भरी साहसिकता,जोखिम उठाते हुए भी, निर्भीक पुरुषार्थ-परायणता से उस मार्ग पर चल पड़ना जो नीति-निष्ठा के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है सही अर्थों में बहादुरी है। बुराइयाँ संघर्ष के बिना जलती नहीं और संघर्ष के लिए साहस अनिवार्य होता है। कायर, कृपण, डरपोक, दीन-हीन अक्सर इसीलिए अपने ऊपर आक्रमण और शोषण करने वालों को चढ़ दौड़ने के लिए न्योता देते रहते हैं कि उनमें अनीति के आगे सिर न झुकाने की हिम्मत नहीं होती। जिन लोगों ने दबने, बच निकलने और जैसे-तैसे मुसीबत टालने की वृत्ति अपनाई हुई होती है, वे किसी के द्वारा भी, कहीं भी, पीसे और दबोचे जाते हैं। ऐसे ही लोग हैं, जो दुष्टता के सामने भी सिर झुकाते और नाक रगड़ते देखे गये हैं। इतने पर भी उन्हें सुरक्षा मिल नहीं पाती। सभी जानते हैं कि बहादुर की अपेक्षा कायरों पर आततायियों के आक्रमण हजार गुने अधिक होते हैं। ऐसे ही लोगों की Take it easy की प्रवृति बन जाती है क्योंकि Who will bell the cat के लिए, साहस तो उठता है लेकिन बहुत कुछ दाव पर भी लग जाता है,अपनी सुखमय ज़िंदगी को रिस्क में कौन डालना चाहेगा? सिस्टम के साथ समझौता करने वाले नपुंसक लोगों से गुरुदेव को कोई आस नहीं है,इसीलिए गुरुदेव मूर्धन्यों पर विश्वास बनाए हुए हैं।कठिनाइयों को पार करना और प्रगति-पथ पर आगे बढ़ने के लिए साहस ही एकमात्र ऐसा साथी है, जिसको साथ लेकर मनुष्य अकेले भी दुर्गम दिखने वाले पथ पर चल पड़ने एवं लक्ष्य तक जा पहुँचने में समर्थ हो सकता है।
तो साथिओ यह हुए उच्च मानसिकता के चार सूत्र, आइये देखें पंचशील (Five principles of coexistence) के पांच सूत्र।
जब उपरोक्त चार वर्चस् (Four sources of brilliance, glory and splendor) और पंचशील (Five principles of coexistence) के पांच सूत्र मिल जाते हैं तो यह संख्या 9 बैठती है जो युगधर्म के अनुरूप मानी गयी है।
मनुष्य को लिए अति महत्वपूर्ण है कि इन नौ गुणों में से जितनों को भी जिस अनुपात में अपना सके,अवश्य अपनाए। ईश्वर भक्त और धर्मात्मा कहलाने वालों का ऐसे ही मूल्यांकन होता है, यही एकमात्र Yard stick है। यदि इन 9 सूत्रों को “योगाभ्यास और तपसाधना” कहा जाये तो भी कोई अत्युक्ति न होगी क्योंकि इनका पालन करना कहाँ आसान है लेकिन एक बात तो सत्य है कि यह हाथों-हाथ समर्थ होने वाली प्रक्रिया है। परोपकार करने वाला ही गूंगे के गुड़ की भांति अपनी आत्मिक शांति को अनुभव कर सकता है।
ज्ञानप्रसाद लेखों को लिखना,उससे सम्बंधित साहित्य द्वारा ज्ञान प्राप्त करना, साथिओं के विचार जानने,जिस आत्मिक संतुष्टि का आभास कराते है उसे इन पंक्तिओं का नगण्य सा लेखक ही जान पाता है।
पिछले समय से धर्म और कर्म में अपनाई गई उत्कृष्टता/आदर्शवादिता ही स्वर्ग जैसा जीवन और मुक्ति जैसी तृप्ति, तुष्टि एवं शान्ति प्रदान कराता आया है। प्रचलित धारणाओं के अनुसार स्वर्ग की प्राप्ति मरने के उपरान्त ही संभव होती है लेकिन यदि कल्पनाओं की उड़ान से ज़रा नीचे उतर कर “व्यावहारिक धर्म-कर्म” में नौ-सूत्रीय उत्कृष्टता का समावेश किया जाये तो जीते जी भी हर घड़ी स्वर्ग और मुक्ति का रसास्वादन करते रहा जा सकता है। इतना ही नहीं, इन दो के अतिरिक्त एक और तीसरा लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है और वोह है सिद्धियों के चमत्कार, सफलताएँ खिंचती हुई चली आती हैं और मनस्वी के पैरों तले लोटपोट होने लगती हैं।
है न सरासर झूठ,शेखचिल्ली जैसी अविश्वसनीय बातें लेकिन क्या करें ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में अविश्वसनीय,आश्चर्यजनक किन्तु सत्य का ही बोलबाला है,कई बार स्वयं ही टेस्ट किया है, सच में विश्वसनीय है।
धन्यवाद् जय गुरुदेव
