आज का ज्ञानप्रसाद लेख ऐसे मानवीय मूल्यों की चर्चा कर रहा है जिनका पालन करके आज के युग की अनेकों समस्याओं का निवारण हो सकता है। समाज में मची त्राहि-त्राहि का एक कारण मानवीय मूल्यों का ह्रास ही है। जब ऐसा होता है तो मानवता का लुप्त होना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में युगनिर्माण और धरती पर स्वर्ग का अवतरण एक स्वप्न जैसा ही लगेगा। अगर हमारे आसपास हर कोई अमानवीय हुए जा रहा है,मानवता को भूल रहा है तो मेजोरिटी होने के बावजूद इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि वोह सब ठीक हैं।
गुरुदेव ने आज के समय को देखते हुए क्रांतिधर्मी साहित्य की रचना की,साथ ही एक सरल सा पंचशील सिद्धांत भी दे दिया। उन्हें मालूम था कि आने वाले समय में अष्टांग योग के कठिन साधना सूत्र का पालन करना कहाँ संभव हो पाएगा । इस व्यावहारिक पंच-शीलता का पालन करने से अगर सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ हो सकता है।
परम पूज्य गुरुदेव के गुरुकुल में सभी समर्पित गुरुशिष्यों का आज की ज्ञानकक्षा में स्वागत है।
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पंचशील सिद्धांत को बौद्ध धर्म के साथ जोड़ा अवश्य जाता है लेकिन प्राचीन भारतीय परंपरा में इन पांच नियमों का पहले से ही पालन किया जाता रहा है। कई बार तो संदर्भ के अनुसार पंचशील के अर्थ अलग भी होते रहे हैं। 1954 में भारत-चीन के बीच हुए समझौते को भी पंचशील कहा गया था।
गौतम बुद्ध ने पंचशील मार्ग बताया, यह पांच शील (नैतिक नियम, Ethical rules,Moral rules) है, जिनका अनुसरण करने से जीवन सुगम एवं उज्जवल होता है। प्रत्येक बौद्धों को पंचशील मार्ग का पालन करना जरूरी होता है ।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख में परम पूज्य गुरुदेव जिन नियमों का पालन करने के कह रहे हैं वोह इतने प्रचलित हैं कि लगभग हर किसी ने इनके बारे में कभी न कभी अवश्य सुना ही होगा। हमारे ज्ञानरथ परिवार में ही जिन मानवीय मूल्यों को बार-बार स्मरण कराया जाता है इसी पंचशील के अंतर्गत आते हैं। पंच अर्थात पांच और शील अर्थात नैतिकता के सिद्धांत।
प्राचीनकाल में हर एक साधक को साधना के प्रारम्भ में अति कठिन सिद्धांतों का पालन करना पड़ता था। पतंजलि योग साधना के अंतर्गत अष्टांग योग के आठ सिद्धांत: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,धारणा,ध्यान और समाधि बताए गए हैं लेकिन गुरुदेव को अपने बच्चों को एवं आने वाली पीढ़ी के बारे में पता था कि उनसे ऐसी कठिन साधनाएं कहाँ हो पाएंगीं ? इसलिए उन्होंने एक तरफ अपने जीवन भर का लिखा हुआ सारा ज्ञान मात्र 23 पुस्तकों में समाहित कर दिया वहीँ हमारे लिए व्यावहारिक साधना के सूत्र (आज के समय के पंचशील) की रचना कर दी। जहाँ पुराने नियमों में सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, चोरी-चकारी,अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संग्रह करना) आदि की साधना अनिवार्य थी आज की स्थिति अलग है, उन सिद्धांतों का पालन करना कहाँ संभव दिखता है ? गुरुदेव कहते हैं कि यदि आज के समय में व्यावहारिक पंचशीलों को रोज़मर्रा की आदतों में सम्मिलित किया जा सके तो भी काम चल जायेगा। श्रमशीलता, मितव्ययिता, शिष्टता, सुव्यवस्था और सहकारिता के पंचशील हमारे क्रिया-कलाप में पूरी तरह घुल-मिल सकें तो समझना चाहिए कि प्राचीनकाल की तप-साधना के बराबर का साधनात्मक साहस बन पड़ा। मितव्ययिता (कमखर्ची) को कई बार कंजूसी मान लिया जाता है लेकिन ऐसा है नहीं। बिना सोचे समझे खर्चा करना फिजूलखर्ची होती है जबकि मितव्ययिता का अर्थ सोच समझ कर खर्च करना है । बिना जरूरत महसूस किए, केवल दिखावे के लिए,भौतिक वस्तुओं के अम्बार लगाना कहां की समझदारी है? कंजूस होना और सोच समझ कर खर्च करने में बड़ा फर्क है। सोच समझ कर खर्च करने वाले भी अक्सर जरूरी वस्तुओं पर दिल खोल कर पैसा लुटाते देखे गए हैं। ईश्वरीय कार्यों के लिए भी पेट काट कर पैसा बचाने वाले मितव्ययी अक्सर देखे ही जा सकते हैं। मितव्ययी को अंग्रेजी में “Thrift” कहा जाता है। समझदार लोग Thrift stores, Used stores से सामान खरीद कर पैसा बचाते हैं तो उन्हें कंजूस के स्थान पर समझदार कहा जाए तो ज़्यादा उचित होगा। फिजूलखर्ची, आज के समाज की ऐसी बीमारी है कि यदि इस पर प्रतिबंध लगा लिया जाए तो न जाने कितनी ही बीमारीओं का निवारण हो जाए।
आइए एक-एक करके उन पांच शीलों का ज्ञान प्राप्त करें जिनके लिए गुरुदेव हमें कह रहे हैं :
1. आलस्य, प्रमाद, विलासिता, ठाठ-बाठ आदि के कारण मनुष्य बुरी तरह आरामपस्त बन गया है। वह अपनी उपलब्ध शक्ति का 25% भाग भी उत्पादक श्रम में नियोजित नहीं कर पाता। निठल्लेपन में शारीरिक, मानसिक असमर्थता पनपती है। आर्थिक तथा दूसरी सभी प्रगतियों का द्वार बन्द हो जाता है। श्रम के बिना शरीर निरोग एवं सशक्त भी नहीं रह सकता। श्रम के बिना उत्पादन भी सम्भव नहीं। समाज में विडम्बनाएँ इसी कारण पनपती रही हैं कि नर-नारी श्रम न करने में बड़प्पन अनुभव करने लगे, कामचोरी, कम-से-कम श्रम करके अधिक से अधिक लाभ पाने की प्रवृत्तियाँ समाज को अपंग जैसा बनाए दे रही हैं।
इस भयंकरता को समझते हुए समय को तत्परता और तन्मयता भरे परिश्रम के साथ जोड़ कर दिनचर्या बनाई जाए तो प्रतीत होगा कि उपलब्ध समय एवं साधनों में ही प्रगतिशीलता के साथ जुड़े हुए अनेकानेक सत्परिणाम उपलब्ध होते चले जाते हैं।
2. आय से अधिक खर्च करना आज का दूसरा अभिशाप है। दुर्व्यसनों में, फैशन तथा सजधज जैसे आडम्बरों में उतना समय और पैसा खर्च होता है कि उसे बचा लेने पर अपने तथा दूसरों के अनेक प्रयोजन सध सकते हैं। फिजूलखर्ची का कोई अन्त नहीं। उसे किसी भी सीमा तक किया जा सकता है। जब फिजूलखर्ची की ललक उभरती है, तो पूरा कर सकना साधारण श्रम, कौशल के लिये सम्भव नहीं हो पाता। तब बेईमानी और लूट का आश्रय लिए बिना काम नहीं चलता। इस अमीरी के प्रदर्शन से कभी किसी को भले ही सम्मान मिलता रहा हो लेकिन अब तो उसके कारण ईर्ष्या ही उपजती है। उसके फलस्वरूप मात्र उसकी नकल बनाने या फिर नीचा दिखाने की प्रतिक्रिया उठ पड़ती है। आज के युग का सबसे बड़ा आविष्कार “क्रेडिट कार्ड प्रक्रिया है।” क्रेडिट को हिंदी में उधार,ऋण ही कहते हैं। “बाद में ऋण चुकाने” कि प्रथा ने बहुतों को bankrupt किया है। क्रेडिट पर भौतिकता के सभी सामान खरीद कर ड्राइंग रूम storehouse बन चुके हैं। ‘‘सादा जीवन उच्च विचार’’ वाली उत्कृष्टता का तो एक प्रकार से समापन ही होता जा रहा है। उदारता को चरितार्थ करने का अवसर तो तब मिले,जब फिज़ूलखर्ची से कुछ बच पाए । अनेकों स्रोतों से धन आने के बावजूद लोग Hand to mouth ही रह रहे हैं,गरीबी का रोना रो रहे हैं, महंगाई-महंगाई चिल्ला कर अपना,परिवार का,औरों का सुख चैन तबाह किए जा रहे हैं। इन पंक्तियों में यह कतई नहीं कहा जा रहा कि समस्याएं नहीं हैं,अवश्य हैं लेकिन उनका जन्मदाता भी तो मनुष्य ही है। अगर आय बढ़ नहीं रही तो खर्चा तो कम किया ही जा सकता है। औसत मनुष्य की ज़रूरतें होती ही कितनी हैं? ज़रा सोचिये!!!!
3. शिष्टता ही सभ्यता की आधारशिला है और अशिष्टता अनगढ़पन की सबसे बुरी प्रतिक्रिया है। दूसरों के असम्मान और अपने अहंकार के संयोग से ही ऐसी उद्दण्डता उभरती है कि शिष्ट, मधुर, विनीत एवं सज्जनोचित व्यवहार करते ही नहीं बन पड़ता। यही प्रवृत्ति अशिष्टता बनकर उभरती है। अशिष्टता अपनाने वालों की छवि ही धूमिल होती है। इसके स्थान पर विनम्रता-सभ्यता का परिचय देना ही भलमनसाहत का प्रमुख चिह्न है। यह बर्ताव बड़ों के साथ ही नहीं, छोटों के साथ भी उतनी ही तत्परतापूर्वक किया जाना चाहिए।
यह उक्ति बहुत महत्त्वपूर्ण है कि
‘‘शालीनता बिना मोल मिलती है, परन्तु उससे सब कुछ खरीदा जा सकता है।’’
Moral science,Ethics जैसे विषय फिजिक्स, केमिस्ट्री से किसी प्रकार से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल में सभी गुरु शिष्यों को न केवल मानवीय मूल्यों का पालन करने के लिए प्रेरित किया जाता है,स्मरण कराया जाता है बल्कि सुनिश्चित भी किया जाता है कि पालन हो रहा है।
पाठक हमारे साथ सहमत होंगें कि शालीन परिवारों में कभी कलह नहीं होती, सौमनस्य (प्रसन्नता, संतोष, मन की निर्मलता और आपसी सद्भाव या भाईचारा) का स्वर्गीय वातावरण बना रहता है। सौमनस्य शब्द सु-मन से बना है। शालीन व्यक्ति के मित्र-सहयोगी अनायास ही बढ़ते चले जाते हैं, जब कि अशिष्ट व्यक्ति अपनों को भी पराया कर डालता है। जीवन की सफलता में शालीनता का असाधारण योगदान रहता है।
4. सुव्यवस्था (Proper management) का तात्पर्य है अपने समय, श्रम, मनोयोग, जीवनक्रम, शरीर, सामर्थ्य आदि सभी सम्बद्ध उत्पादनों की सही तरीके से प्लानिंग । उन्हें इस प्रकार सँभाल-सँभाल कर सुनियोजित रखा जाना चाहिए कि उनको अस्त-व्यस्तता से बचाया जा सके और अधिकाधिक समय तक उनका समुचित लाभ उठाया जा सके। यह प्रक्रिया स्वभाव में सुव्यवस्था की दृष्टि रहने पर ही बन पड़ती है। लोकव्यवहार का यह सबसे बड़ा सद्गुण है। जिसे सँभालना, सदुपयोग करना, सुनियोजित रखना आ गया, समझना चाहिए कि उसे गुणवानों मेें गिना जायेगा, सर्वत्र उसका लोहा माना जायेगा। सुनियोजन ही सौन्दर्य है, उसी को कला-कौशल भी कहना चाहिए। मैनेजर, सुपरवाइजर जैसे प्रतिष्ठित पदों का श्रेय उन्हीं को मिलता है, जो न केवल स्वयं को, बल्कि अपने परिकर को भी सुव्यवस्था के अन्तर्गत चलने, अनुशासन में रहने के लिये सहमत करते हैं। प्रगति का प्रमुख आधार सुव्यवस्था ही है न कि अव्यवस्था।
5. पाँचवाँ शील है-सहकारिता मिल-जुलकर काम करना। आदान-प्रदान का उपक्रम बनाये रहने में सतर्कता बरतना। परिवार में, कारोबार में, लोकव्यवहार में सामंजस्य बनाये रह सकना तभी बन पड़ता है जब उदारता भरी सहकारिता को अपने सभी क्रिया-कलापों में सुनियोजित रखा जा सके। जो एकाकीपन से ग्रसित है,उसे असामाजिक,उपेक्षित रहना पड़ता है और उनका जीवन नीरसता,निराशा के बीच ही गुजरता है।
गुरुदेव बताते हैं कि बड़े कार्य संयुक्त शक्ति से ही सम्पन्न हो पाते हैं। देव शक्तियों के संयोग से दुर्गा के प्रादुर्भाव की कथा सर्वविदित है। संकीर्ण स्वार्थपरता के स्थान पर उदार सहकारिता की प्रवृत्ति जगाने से,संघ शक्ति जाग्रत् होती है। योग्य कार्यकर्ता होने पर भी सहकारिता के अभाव में न कोई संस्था पनप सकती है और न कोई व्यवसाय प्रगति करता है। अकेले-अकेले के राग अलापने वालों को इसीलिए Coexistence के पाठ पढ़ाये जा रहे हैं।
यदि उपरोक्त पाँच दुर्गुणों को छोड़ा जा सके और उसके विपरीत सदाशयता-सहकारिता की रीति-नीति को अपनाया जा सके तो समझना चाहिए कि मानवीय गरिमा के अनुरूप मर्यादा पालन बन पड़ा और हँसती-हँसाती, उठती-उठाती जिन्दगी का रहस्य हाथ लग गया है। ऐसे ही लोग धन्य बनते और अपने समय, परिकर एवं वातावरण को धन्य बनाते हैं। व्यावहारिक धर्म-धारणा का परिपालन इतने सीमित सद्गुणों को क्रिया-कलापों का अंग बना लेने पर भी सध जाता है। इन सद्गुणों को अपने दृष्टिकोण, स्वभाव एवं अभ्यास में उतारने का सबसे अच्छा अवसर परिवार-परिकर के बीच मिलता है। यदि घर के आवश्यक कार्य परिवार-परिकर के सभी सदस्य साथ-साथ सहयोगपूर्वक निपटाया करें, उत्साह की प्रशंसा और उपेक्षा की भर्त्सना किया करें, तो इतने छोटे से परिवर्तन से, परिवार के हर सदस्य को सुसंस्कारी बनने का अवसर मिल सकता है। परिवार ही रत्नों की खदान बन सकते हैं । जो लोग परिवार में सद्गुणों का अभ्यास करते हैं, उनके लिये यह तनिक भी कठिन नहीं रहता कि लोक व्यवहार में पग-पग पर शालीनता का परिचय देें और बदले में उत्साह भरी उपलब्धियों का पूरा-पूरा लाभ सहज प्राप्त करते रहेें।
जय गुरुदेव
