वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

नए युग का नया मनुष्य कैसे बन पायेगा?

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” पर आधरित लेख श्रृंखला के आज के ज्ञानप्रसाद लेख में गुरुदेव पूर्ण विश्वास से समझा रहे हैं कि नए युग का नया मनुष्य कैसे बन पायेगा। कोई भी नया  प्रोडक्ट बनाने के लिए फैक्ट्री लगानी  पड़ती है, मशीनें इंसटाल करनी होती हैं,और न जाने कौन-कौन सी प्रक्रियाएं करने के बाद ही फिनिश्ड प्रोडक्ट बन पाता है। गुरुदेव ने ऐसी ही एक फैक्ट्री हरिद्वार शांतिकुंज में वर्षो पहले लगाई,उसके बाद DSVV का जन्म हुआ, देखते ही देखते सारे विश्व में  इस फैक्ट्री की शाखाएं स्थापित हो गईं  और देव स्वरुप मानवों का उत्पादन आरम्भ हो गया है।

विश्वास कीजिये आल वर्ल्ड गायत्री परिवार एक इंटरनेशनल स्तर की ऐसी फैक्ट्री है जहाँ देवमानवों का उत्पादन हो रहा है।

इन्हीं प्रेरणादायक  पंक्तिओं  से आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ करते हैं,सभी गुरुशिष्यों का स्वागत करते हैं।

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अधिकतर मनुष्य अपनी इच्छा से परिस्थितियों में जकड़े यां समाज के बंधनों के वशीभूत अभ्यस्त पाए जाते हैं। यही कारण है कि वोह हानि को लाभ और लाभ को हानि समझते जाते है। अक्सर कहा जाता है की आज की पीढ़ी बड़ी ही समझदार है,पिछली पीढ़ी की तुलना में उनके हाथों में बहुत कुछ भरा पड़ा है। यदि सब कुछ है तो फिर  दुर्गति क्यों हो रही है,रोना किस बात का है?

अचम्भा यही है कि बदबूदार नालों में पलने और बढ़ने वाले कीड़े अपनी स्थिति की दयनीयता का अनुभव तक नहीं कर पाते। शायद ही आज की पीढ़ी का कोई सदस्य मिल जाए जो यह न कहता हो कि मैं बहुत ही बिजी हूँ, सांस लेने की भी फुरसत नहीं है। आज का मानव ऐसी स्थिति से किसी प्रकार छुटकारा पाकर इतनी भी नई सोच जुटा नहीं पाता  कि यदि कीड़े की ही स्थिति में रहना था तो फूलों पर उड़ने वाली तितलियों की तरह आकर्षक बनता। जीवन की भागदौड़ एवं परिस्थितिओं का बहाना बनाते-बनाते सारा जीवन गंवा देते हैं, कभी विचार ही नहीं उठता,आकांक्षा ही नहीं उठती कि तितलिओं जैसा सुयोग प्राप्त करने के लिए मनःस्थिति  बनाई जाए।

इसी स्थिति के लोगों के लिए गुरुदेव स्पष्ट कहते हैं:

जब आकांक्षा ही मर गई है तो उत्कर्ष की पक्षधर हलचलें कहाँ से और कैसे उभर सकेंगी?

इसे ऐसे कहा जा सकता है कि आकांक्षा तो बहुत है, आकाश को छूने की है लेकिन मनुष्य बनने की नहीं है।

यदि इतना उत्कृष्ट ज्ञान भी कुछ करने में असमर्थ है तो “फिर तो रब ही राखा !!!” ऐसे नपुंसक मनुष्यों से युगपरिवर्तन की क्या ही आशा की जाए? 

मनुष्य जीवन का एक ही सौभाग्य है कि वह अपनी निकृष्ट मानसिकता से छुटकारा पाये, भ्रष्ट चिन्तन/दुष्ट आचरण से इन्कार कर दे। समझ ले/मान ले कि भूल हो गयी है अब आगे से नहीं होगी, अपनी गलती स्वीकार करने में कैसी शर्म, उलटी दिशा में जा रहे थे,समझ आने पर उलटे पैरों लौट आने में कोई बुराई नहीं है।

बाल्यकाल में अक्सर बच्चे 1,2,3 गिनती गिनना भूल जाते हैं, उन्हें फिर से शुरू से आरम्भ करने को कहा जाता है। नये सिरे से गिनना आरम्भ करने में कोई शर्म नहीं होनी चाहिए, लय बनी रहती है,किसी भी समझदार को इस प्रक्रिया के लिए संकोच नहीं करना चाहिए,मनोविज्ञान भी इसी का समर्थन करता है क्योंकि हमारा मस्तिष्क इसी प्रकार बना हुआ है।

ईश्वर ने तो मनुष्य को सच्चे अर्थों में धरती पर रहने वाला देवता बनाकर भेजा था, भेजा हुआ है। नर-कीटक,नर-पशु,नर-पिशाच जैसी स्थिति तो उसने अपनी मर्जी से स्वीकार की है। यदि वह कायाकल्प जैसे परिवर्तन की बात सोच सके तो उसे नर-नारायण महामानव बनने में ज़रा सी भी देर न लगेगी क्योंकि है तो वह ऋषियों, तपस्वियों, मनस्वियों और मनीषियों का ही वंशधर। मनुष्य के लिए यह शब्द लिखने कोई बढ़ाई/शेखी नहीं है, पाठकों ने अनेकों महामानवों के इतिहास तो अवश्य ही पढ़े हैं,इतिहास में ऐसे भी अनेकों मिल जायेंगें जो अपना मार्ग भूल गए थे लेकिन संकल्पशक्ति एवं प्रभु कृपा से ऐसे कीर्तिमान स्थापित कर गए,हम सबके लिए प्रेरणास्रोत बन गए।

शान्ति के साधारण समय में सैनिकों के अस्त्र-शस्त्र ‘मालखाने’ में जमा रहते हैं लेकिन जब युद्ध सिर पर आ जाता है तो उन्हें निकाल कर दुरुस्त एवं प्रयुक्त किया जाता है, तलवारों पर नये सिरे से धार धरी जाती है। इसी तरह देखा गया है कि आभूषणों को आमतौर पर  तिजोरी या लॉकर में रखा जाता है,विवाह-शादी, उत्सव आदि के समय में उन्हें निकाल कर पॉलिश करा कर चमका दिया जाता है। पॉलिश किये आभूषण नए जैसे ही लगते हैं। परम पूज्य गुरुदेव इन अस्त्र शस्त्रों की,चमकदार आभूषणों  की तुलना प्रतिभाशालिओं से करके हमें युगसन्धि काल का स्मरण करा रहे हैं। यह ऐसा समय है जब अस्त्रों-आभूषणों की तरह प्रतिभाशालियों को पॉलिश करके प्रयुक्त किया जायेगा। व्यक्तित्वों को प्रखर प्रतिभा-सम्पन्न करने के लिए यह आपत्तिकाल जैसा समय है। यह समय प्रतिभाशालिओं की टूट-फूट को तत्परतापूर्वक सुधारने और सही करने का समय है,यही वोह समय है जब उलटे राह पर चल रहे मनुष्यों को उलट कर, सीधे राह पर लाने की आवश्यकता है।

मनुष्य की  समर्थता, दक्षता, प्रामाणिकता और प्रभाव-प्रखरता को निखारने का एकमात्र आधार उसका चिन्तन,करैक्टर और व्यवहार में उत्कृष्टता ही है। अनगढ़,अस्त-व्यस्त लोगों से क्या ही आशा की जा सकती है,वोह तो खुद ही गयी गुज़री ज़िंदगी जी रहे है। दूसरों की सहायता कर सकना तो दूर, वह अपना,स्वयं का गुज़ारा भी किसी के आगे हाथ पसार कर, उठाईगीरी (आँख चुराकर चोरी कर जाना) करके बड़ी कठिनाई से ही कर पाते हैं। गुरुदेव को अपने उन बच्चों पर पूर्ण विश्वास है जिनकी प्रतिभा प्रखर है,जिनकी  विशिष्टताएँ मणि-मुक्तकों की तरह,आभूषणों की तरह  झिलमिलाती हैं, दूसरों को आकर्षित-प्रभावित भी करती हैं और दूसरों को सहारा देने में भी समर्थ हैं। सहयोग और सम्मान भी ऐसे ही प्रतिभाशालिओं के आगे-पीछे चलता है। बदलते समय में अनगढ़ों को कूड़ा-कर्कट की भांति झाड़-बुहार कर कहीं दूर फेंक दिया जायेगा। तूफानों ,कठिनाइओं,बीमारियों से वही बच पाते हैं, जिनकी जीवनी शक्ति सुदृढ़ होती है।

इसीलिए तो शांतिकुंज से प्रज्ञागीत के माध्यम से मूर्धन्यों को जगाने का सन्देश बार-बार प्रसारित किया जा रहा है क्योंकि औरों से कोई आस बाकी नहीं रही है।

समर्थता को ओजस्, मनस्विता को तेजस् और जीवन-शक्ति  को वर्चस् कहते हैं। इन तीनों विशेषताओं की चमक किसी  के लिए भी अनुभव कर पाना कोई कठिन कार्य नहीं है।  यही हैं वे दिव्य सम्पदाएँ, जिनके बदले इस संसार के हाट-बाजार से कुछ भी मनचाहा खरीदा जा सकता है। दूसरों की सहायता भी वे लोग ही कर पाते हैं, जिसके पास अपना वैभव और पराक्रम होता है । अगले दिनों ऐसे ही लोगों की पग-पग पर जरूरत पड़ेगी, जिनकी प्रतिभा सामान्यजनों की तुलना में कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी हो। संसार के मानसिक वातावरण का सुधार ऐसे मानव  ही कर पाएंगें जिन्होंने स्वयं को सुधार कर यह सिद्ध कर दिया हो कि उनकी सृजन-क्षमता असन्दिग्ध है।

परिस्थितियों चाहे कैसी भी हों ऐसे प्रतिभाशालिओं को सहयोग देकर सुधारने की,ऊँचा उठाने की नितान्त आवश्यकता है। यह  अति कठिन कार्य वही कर  सकेंगे जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करके यह सिद्ध कर दिया हो कि वे आड़े समय में कुछ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकने में सफल हो सकते हैं, जिन्होंने अपनी पात्रता विकसित कर ली हो। इस स्तर को उपलब्ध कर सकने के लिए गुरुदेव निम्नलिखित कसौटी की बात करते हैं:

यह वोह लोग होंगें जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को दुर्गुणों से मुक्त करके, सर्वतोमुखी समर्थता से सम्पन्न कर लिया हो। प्रचुर मात्रा में सद्गुणों की सम्पदा अर्जित कर ली हो।

इस प्रक्रिया के लिए एक मण्डल विनिर्मित करना होगा। लोग कैसे बने? कैसे बदलें? उपकरण ढालने के लिए तदनुरूप साँचा बनाए बिना काम नहीं चलता। इस प्रयोग को सर्वप्रथम अपने ऊपर ही किया जाना चाहिए और बताया जाना चाहिए कि कार्य उतना कठिन नहीं, जितना कि समझा जाता है। हाथ-पैरों की हरकतें इच्छानुसार मोड़ी-बदली जा सकती हैं तो कोई कारण नहीं कि अपनी निज की प्रखरता को सद्गुणों से सुसज्जित करके चमकाया-दमकाया न जा सके।

पिछले दिनों किसी प्रकार आलस्य, प्रमाद, उपेक्षा और अनगढ़ता की स्थिति भी सहन की जाती थी लेकिन बदलते युग के अनुरूप अब तो हर किसी को,स्वयं को “नये युग का नया मनुष्य” बनाने की होड़ लगानी पड़ेगी। हम सबको, स्वयं को उस परिवर्तन का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए, एक उदाहरण स्थापित करना होगा,एक रोल मॉडल बनना होगा। हमारा कर्तव्य होगा कि समूचे समाज को, सुविस्तृत वातावरण को बदल जाने के लिए केवल प्रोत्साहित ही नहीं, विवश और बाधित भी करना होगा।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से कितना प्रोत्साहित किया जा रहा है,कितना विवश और बाधित किया जा रहा है,किसी से भी छिपा नहीं है। इसकी पारदर्शिता से सभी साथी भलीभांति परिचित हैं।

गुरुदेव हमें समझते हुए कहते हैं कि पिछले समय से जैसा भी कायकलेवर ढल चुका हो, उसका आकार-प्रकार तो वही रहेगा लेकिन गुण, कर्म, स्वभाव में अभीष्ट उत्कृष्टता का समावेश करते हुए कुछ ऐसा चमत्कार उत्पन्न किया जाएगा जिसके कारण “इसी काया में देवत्व के दर्शन हो सकें।” देवी-देवताओं की कमी नहीं, उन सबकी पूजा-उपासना के अपने-अपने महात्म्य बताये गये हैं किन्तु एक देवता ऐसा भी है, जिसकी समुचित साधना करने पर सत्परिणाम हाथों-हाथ नकद धर्म की तरह उपलब्ध होते देखे जा सकते हैं। मनुष्य ही वह देवता है, पता नहीं ऋद्धि-सिद्धियों से भरा भण्डार मनुष्य  क्यों नहीं खोज पाता?  न जाने क्या कारण है कि लोग घड़े में ऊँट खोजते-फिरते हैं, हथेली पर सरसों जमाना चाहते हैं,चमत्कार चाहते हैं ? अरे भैया चमत्कार भी दिखेंगे,पहले पात्रता तो विकसित कर ले,आत्मविश्वास तो जगा ले,उस परमपिता पर,अपनी शक्ति पर विश्वास तो जगा ले। विश्वास कर ले कि मात्र स्वयं को परिष्कृत कर लेने भर से ईश्वर की शक्तियां ट्रांसफर होना संभव हो जायेगा, ऐसा होते ही मनुष्य को खुद ब खुद ही अपनी सम्पदाओं और विभूतियों पर विश्वास हो जायेगा।

गुरुदेव आज की पीढ़ी के लिए विशेष सन्देश देकर कह रहे हैं कि पुराने ज़माने में आत्मबल, जिसमें सभी बलों का सहज ही समावेश हो जाता है, की उपलब्धि के लिये आध्यात्मिक प्रयोग-अभ्यास करने होते थे। इन सबका आरम्भ तप, साधना और योगाभ्यासों से होता था लेकिन  अब तो व्यक्तित्व की दृष्टि से बिगड़ी पीढ़ी को अध्यात्म की आरम्भिक साधनाएँ कराना ही पर्याप्त होगा। हाईस्कूल पास करने से पहले ही कॉलेज की योजना बनाना व्यर्थ है।

साथिओ आज के लेख का यही सन्देश है, जय गुरुदेव


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