वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

क्या दुर्गति से भरी दुर्दशा ही मानव जीवन की नियति है?

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” 23 छोटी-छोटी पुस्तिकाओं का एक ऐसा संग्रह है जिसे परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा जी ने अपने जीवन भर के साहित्य का मक्खन कहा है। इन 23 पुस्तकों को मात्र 23 दिनों में पढ़ा जा सकता है लेकिन ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से पिछले तीन माह से इस संग्रह पर आधरित लेख श्रृंखला लिखी जा रही है और अभी तक मात्र सातवीं पुस्तक पर ही पंहुच पाए हैं। इस धीमी गति का एकमात्र कारण गुरुदेव के मक्खन को दोबारा मथ कर शुद्ध देसी घी बनाकर परोसने में अपना ही आनंद है,सभी साथिओं को इस शुद्ध देसी घी से जो ऊर्जा मिल रही है उससे अनेकों उठ कर चलने में सफल हुए हैं,चलने वाले  हुए दौड़ने को सफल हुए हैं। यह हम नहीं कह रहे हैं,साथिओं के कमेंट इस तथ्य के साक्षी हैं। हमें भी तसल्ली हो रही है कि पुस्तक को पढ़ना और समझना दो अलग-अलग बातें हैं। साथिओं के पास इस पुस्तकमाला की कईं पुस्तकें उपलब्ध हैं,कइयों ने पहले पढ़ी भी हुई हैं लेकिन ज्ञानरथ परिवार के मंच से एक बार फिर से पढ़ने में कोई हर्ज़ नहीं है,रिविज़िन ही सही।

आज के ज्ञानप्रसाद लेख में गुरुदेव नीचता और महानता का अंतर् बताते हुए पूछ रहे हैं कि  क्या मनुष्य जीवन की नियति दुर्गति ही है? क्या उसे भाग्य मैं दुर्गति ही लिखी है ?

आइए उदाहरणों के साथ इस अंतर् पर चर्चा करें।

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मनुष्य की फितरत है कि किसी प्रकार परिस्थितियों की अनुकूलता का बहाना बनाते रहा जाए, बाहरी सहायता प्राप्त की जाती रहे,अपना उल्लू सीधा किया जाता रहे लेकिन गुरुदेव कहते हैं कि इस स्थिति से  हजार दर्जे अच्छा है कि मनुष्य भावना, मान्यता, आकांक्षा, विचारणा और गतिविधियों को परिष्कृत करे। नया साहस जुटाकर, नया कार्यक्रम बनाकर प्रयत्नरत हुआ जाए और स्वयं बोई गयी फसल  को काटने के सुनिश्चित तथ्य पर विश्वास किया जाये। यदि बिना भटकाव के जीवनयापन करना है तो इससे सुनिश्चित मार्ग कोई नहीं  है।

अध्यात्मवेत्ता वर्षों से इसी प्रतिपादन पर तर्क, तथ्य, प्रमाण और उदाहरण प्रस्तुत करते रहे हैं कि “मनुष्य अपने स्वरूप को, सत्ता एवं महत्ता का, लक्ष्य एवं मार्ग को भूलकर ही आए दिन असंख्य विपत्तियों में फँसते हैं।” यदि अपने को सुधार लें तो अपना सुधरा प्रतिबिम्ब व्यक्तियों और परिस्थितियों में झलकता चमकता दिखाई पड़ने लगेगा।

यह संसार गुम्बज की तरह अपने ही उच्चारण को प्रतिध्वनित करता है। अपने जैसे लोगों (Like minded) का ही जमघट साथ में जुड़ जाता है और भली-बुरी अभिरुचि को अधिकाधिक उत्तेजित करने में सहायक बनता है। दुष्ट-दुर्जनों के इर्द-गिर्द ठीक उनके ही  स्तर की मण्डली बनने लगती है। इसके साथ ही यह भी उतना ही सुनिश्चित है कि शालीनता-सम्पन्नों को, सज्जनों को, उच्चस्तरीय प्रतिभाओं के साथ जुड़ने और महत्त्वपूर्ण सहयोग प्राप्त कर सकने का समुचित लाभ मिलता है। शालीनता को इंग्लिश में decency, courtesy, grace, decorum या graciousness कहते हैं। ईश्वर ने मनुष्य को अपनी सर्वश्रेष्ठ संतान बना कर,अपना राजकुमार/राजकुमारी बनाकर इस धरती पर अवतरित किया है। हम में से हर किसी का कर्तव्य बनता है कि शालीनता को भलीभांति समझ कर,उपरोक्त दिखाए गए बिन्दुओं का पालन किया जाए। यह बात तो भूल ही जाएं कि समय बदल गया है, सभी ऐसा ही कर रहे हैं तो ऐसे समाज में हम कैसे अछूते रह सकते हैं। ऐसा करके हम गुरुदेव का उद्घोष “हम बदलेंगे युग बदलेगा” की शक्ति में शंका कर रहे होंगे। ऐसी स्थिति में ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के सारे प्रयास असफल हो जाएंगे जिसे सोचना भी, किसी भी परिवारजन  के लिए असहनीय होगा। हम अपने गुरू से कैसे आँखें मिलाएंगे?

मानवी मूल्यों की पालना करके ही तो हम लाइक माइंडेड साथियों को इस छोटे से परिवार से जोड़ने में सफल हो पाए हैं/हो रहे हैं। इस मंच से और कोई संदेश प्रसारित हो सके या न हो, कम से कम मानवता की, मानवीय मूल्यों की बात तो अवश्य ही हो, यह तो हमारे ही हाथ में है।

निकृष्टता का अर्थ नीचता,हीनता,घटियापन,खोटापन,ओछापन,दिखावेबाजी आदि हैं। गुरुदेव ने हम बच्चों को इन सभी तरह के प्रपंचों से दूर रखने के लिए भांति-भांति के बहुत ही सरल से उदाहरण दिए, ठीक उसी तरह जिस प्रकार एक माता-पिता अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने के लिए क्या कुछ नहीं करते। गायत्री परिवार द्वारा चलाई  जा रही बालसंस्कार शालाएं गुरुदेव के इसी उद्देश्य को सार्थक होती दिखती हैं। वंदनीय माता जी की वाणी में एक वीडियो देख रहे थे जिसमें माता जी कह रही थीं कि हमारे बच्चों की दाढ़ी मूंछ आ गयी है,अब वोह बड़े हो गए हैं,उन्हें अपनेआप को संभालना चाहिए,क्षेत्र में जाकर गुरूजी का सन्देश प्रसारित करना चाहिए। माता जी द्वारा दाढ़ी मूछ को रेफर करना एक प्रीतात्मक संदर्भ में कहा जा रहा है। माता जी उन बच्चों के लिए बोल रही थी जो गायत्री परिवार से वर्षों से जुड़े हुए थे। कहने को तो इन पंक्तियों के लेखक को भी गायत्री परिवार से जुड़े हुए  कितने ही वर्ष हो चुके हैं लेकिन ज्ञान के संदर्भ में अभी घुटनों पर चला जा रहा है, अभी तो अपने माता-पिता की भावना ही समझने का प्रयास हो रहा है।     

हम जैसे अनजान बच्चों को समझाने के लिए गुरुदेव बादलों का उदाहरण देकर बता रहे हैं कि पृथ्वी के प्रत्येक भाग पर बादल समान रूप से बरसते हैं लेकिन पानी का जमा होना पात्र की गहराई पर निर्भर करता है। जितनी अधिक गहराई उतनी अधिक जमाई (जमा होना), जितनी अधिक गहराई उतनी ही अधिक पात्रता होती है। आदरणीय चिन्मय जी अपने उद्बोधनों में चमच,गिलास,तालाब,झील,सागर आदि उदाहरण देकर बार-बार समझा रहे हैं। बादलों के ही विषय को पात्रता से जोड़ते हुए कहा जाता है कि वर्षा के अनुग्रह से व्यापक भू-क्षेत्र में हरियाली उगती और लहराती है लेकिन रेगिस्तानों और चट्टानों में एक तिनका भी पैदा नहीं होता, दृष्टिगोचर नहीं होता है। बादल तो किसी के साथ भी पक्षपात नहीं करते,इसमें तो मरुस्थल की भूमि की अनुर्वरता ही उत्तरदायी है। यदि मनुष्य का अंतःकरण ही मरुस्थल की भांति शुष्क है तो वहां गुरु के अनुदान क्या कार्य कर पायेंगें? गुरु तो देने के लिए तैयार है, वोह तो भागा-भागा,मारा-मारा फिर रहा है.कहीं से तो कोई विवेकानन्द मिल पाए !!!!

रगरेज़ जानता है कि कपडे को रंगने से पहले धोना बहुत आवश्यक है, मैले कपडे पर कहाँ रंग चढ़ पायेगा? अगर गलती से चढ़ भी गया तो रंगाई कहाँ निखरेगी? मनुष्य के अन्तःस्थल पर वर्षों पुरानी मूढ़ मान्यताएं कहाँ कुछ करने देती हैं ? भैया हम तो ऐसे ही हैं !!! वर्षों से ऐसे ही करते आये हैं। तब से आजतक एक सदी बदल गयी है,युग बदल गया है,स्वयं को बदले बिना युग को बदल पाना कैसे संभव हो पायेगा?

धातुओं को गलाने के बिना ढलाई कभी कोई कर पाया है ? यह एक रासायनिक प्रक्रिया है, इसे पूरा करना ही होगा, शॉर्टकट से कोई कहाँ पहुँच पाया है?

माँ अपने बच्चे को अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करती है, उसमें उसकी आत्मा बसी होती है लेकिन मल-मूत्र से सने बच्चे को माँ साफ़ करने के बाद ही गोदी में उठाती है, फिर तो गले से लगाकर,पुचकारती नहीं थकती। ईश्वर भी निर्मल-स्वच्छ बच्चे को ही गले लगाते हैं, पुचकारते हैं।

मैले दर्पण में छवि कहाँ दिख पड़ती है? जलते अंगारे पर जमा हुई राख की परत न केवल अंगारों की गर्मी को कम ही करती है बल्कि चमक भी गायब हो जाती है। हम सबको चाहिए कि  अपने ऊपर की मैल को हटाकर दर्पण की भांति चमक पैदा करें, अंगारों की तरह अपनी ऊष्मा से सम्पर्क में आने वाले किसी भी साथी को आत्मीयतता की गर्माहट प्रदान करें,साथी के मुंह से स्वयं ही शब्द निकल आएं, “वाह,क्या बात है? किसी संस्कारित माता पिता की संतान हैं !!!”

बादलों से ढक जाने पर सूर्य-चन्द्र तक अपना प्रकाश धरती तक नहीं पहुँचा पाते। कुहासा छा जाने पर दिन में भी लगभग रात जैसा अँधेरा छा जाता है और कुछ दूरी की वस्तुएँ तक सूझ नहीं पड़तीं।

उपरोक्त सभी उदाहरणों से अनुमान लगाया जा सकता है कि मनुष्य यदि लोभ की हथकड़ियाँ, मोह की बेडिय़ों और अहंकार की जंजीरों में जकड़ा रहे तो उसकी समस्त क्षमताएँ नकारा बन कर रह जाएँगी। यही वोह बेड़ियाँ हैं जो मनुष्य को बँधुआ मजदूर की केटेगरी में शामिल करती हैं, मनुष्य कोई भी कार्य अपनी मर्ज़ी से,विवेक से, बुद्धि से करने में असमर्थ रहता है,सारा जीवन एक नपुंसक की तरह ही गुज़ार देता है। बोंडेड लेबर (बंधवा मज़दूर) की तरह कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों का चुपचाप पालन करते ही जीवन बिता देता है। लेकिन Exceptions are always there, शिवदास साधु भी तो बंधवा मज़दूर के कॉन्ट्रैक्ट पर ही भारत से 14000 किलोमीटर दूर Trinidad में गए थे, उनकी कहानी पाठकों को अवश्य ही स्मरण हो आयी होगी।

रस्सी में बँधे पशुओं की भांति मनुष्य इतने बाधित और विवश बने रहते हैं कि वे अपना मौलिक पराक्रम ही गवाँ बैठते हैं। ऐसे मनुष्य उसी प्रकार चलने एवं करने को विवश होते हैं जैसा बाँधने वाला उन्हें चलने के लिए दबाता-धमकाता है। कठपुतलियाँ अपनी मर्जी से न उठ सकती हैं, न चल सकती हैं, मदारी ही उन्हें नचाता-कुदाता है।

मनुष्य के अंतःकरण पर एक तरफ से कुसंस्कारों का प्रहार और दूसरी तरफ से  कुप्रचलनों की अंधी आंधी उसके मौलिक चिंतन में भारी स्पीड ब्रेकर बनकर खड़े रहते हैं। ऐसी स्थिति में उत्कृष्टता की दिशा में सहज सम्भव हो सकने वाली प्रगति, बुरी तरह रुक कर  रह जाती है। मनुष्य अपनेआप को दो स्थितिओं में लटका हुआ अनुभव करता है। अन्तरात्मा ऊँचा उठने के लिए कहती है लेकिन सिर पर छाया हुआ दुष्प्रवृत्तियों का विशाल नर्क नीचे को खींचता है। ऐसी ही स्थिति को त्रिशंकु स्थिति कहा गया है। त्रिशंकु का शाब्दिक अर्थ लटका हुआ होता है। यह शब्द इतना कॉमन है कि जब कोई भी पार्टी सरकार बनाने के लिए बहुमत साबित करने में असमर्थ होती है तो ऐसी पार्लियामेंट को Hung पार्लियामेंट कहा जाता है अर्थात ऐसी सरकार का असमंजस बना हता है कि उसका क्या होगा? भविष्य न जाने कैसा बन कर रहेगा?

इस विषम विडम्बना से छूटने का एक ही उपाय है कि दोष-दुर्गुणों की जो भारी चट्टानें सिर पर लदी हैं, उन्हें किसी भी कीमत पर हटाया-गिराया जाए, अन्यथा उतनी बोझिल विपन्नता को सिर पर लादे हुए, कुछ दूर तक भी आगे चल सकना सम्भव न होगा। वासनाएँ मनुष्य को नीबू की तरह निचोड़ कर रख देती  हैं। जीवन में से स्वास्थ्य, संतुलन, आयुष्य जैसा सब कुछ निचोड़ कर, उसे छिलके जैसा निस्तेज बनाकर रख देती हैं।

तृष्णाओं की खाई, स्वार्थ सिद्धि के लोभ में अनर्थ के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगता । मनुष्य अपने लिए एक ऐसा जादुई राजमहल बनाया बैठता है  जिसमें प्रवेश करने पर जल के स्थान पर थल और थल के स्थान पर जल दिखने लगता है । जो करना चाहिए था उसका निरन्तर तिरस्कार -बहिष्कार करता रहता है और अपनी चतुरता की डींग हाँकते हुए वोह करता जाता है जो नहीं करना चाहिए था । इस मानसिकता को, व्यामोह का सम्मोहन (Paranoid mesmerism)  नाम देने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। यह एक ऐसी स्थिति होती है जब मनुष्य को अतार्किक भय, दूसरों के प्रति भय,असंतोष सताता रहता है।

क्या दुर्गति से भरी दुर्दशा ही मानव जीवन की नियति है?

स्वयं सोचिये, इसके आगे कल चलेंगें।

जय गुरुदेव


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