पिछले लेख में दर्पण प्रक्रिया के बारे में चर्चा की गयी थी,आज का लेख उसी सिद्धांत की एक्सटेंशन है। वर्तमान लेख में इस एक्सटेंशन को ऐसे स्तर तक बढ़ा दिया गया है कि मंदिर में प्रतिमा के स्थान पर एक विशालकाय दर्पण का सुझाव भी आन पड़ा है। लेख में इस उदाहरण का आनंद तो मिलेगा ही लेकिन बेसिक तथ्य को समझने की भी बहुत बड़ी ज़रुरत है कि गायत्री सद्बुद्धि की देवी तो है लेकिन कैसे?
“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की सातवीं पुस्तिका जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र, (Golden formula of life practice) के चौथे लेख की कक्षा में गुरुशिष्यों का स्वागत है।
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ईश्वर जड़ नहीं, चेतन है। इसे प्रतिमाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता। चेतना का मिलन चेतना से ही संभव हो सकता है, ठीक उसी तरह जिस तरह दूध को पानी में ही मिलाया जा सकता है, न कि तेल में। तेल और पानी Insoluble हैं।
ईश्वर का सबसे निकटवर्ती और सुनिश्चित स्थान मनुष्य का अंतःकरण ही हो सकता है। जिस किसी को भी ईश्वर का दर्शन करना हो,उनके साथ वार्तालाप करना हो,प्रभु का सान्निध्य जैसी उच्च स्थिति का आनंद उठाना हो,उन्हें बाहरी दुनिया से आँखें बन्द करनी होंगीं। मनुष्य को अपने ही अन्तराल में प्रवेश करना चाहिए और देखना चाहिए कि जिसको पाने और देखने के लिए अत्यन्त कष्ट साध्य, श्रमसाध्य प्रयत्न (व्रत, तप,अनुष्ठान आदि) किये जा रहे थे, वह तो अपने अंदर ही अत्यंत निकटवर्ती स्थान पर विराजमान-विद्यमान है।
यह पंक्तियाँ कोई कपोल कल्पना के वशीभूत नहीं लिखी गयी हैं, इसके साक्षात् अनेकों उदाहरण यहाँ कहाँ मिल ही जायेंगें लेकिन सबसे सटीक और विश्वसनीय उदाहरण स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी का है जिससे शायद ही कोई अपरिचित हो। न जाने कितनी ही बार ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से ही चर्चा की जा चुकी है कि गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस माँ काली से साक्षात् बाते करते थे,उन्हीं के साथ रोते थे,नृत्य करते थे। इसी संदर्भ में साथिओं को वाराणसी और कोलकाता वाला संस्मरण भी स्मरण हो आया होगा जहाँ वह कहते हैं कि अगर वाराणसी जाना है तो कोलकाता पीछे छोड़ना ही होगा। ईश्वर को पाना है तो संसार से आँखें बंद करनी हो होंगीं।
हमारे पाठक सोच रहे होंगें कि गृहस्थ में रहकर यह कैसे संभव हो पायेगा? संसार से आंखें कैसे मूँदीं जा सकती हैं? परिवार है, समाज है,संतान है अगर हम उन सबसे मुंह मोड़ लेते हैं तो ईश्वर द्वारा ही सौंपी गयी ज़िम्मेवारी का पालन कैसे हो पायेगा? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर हर किसी के लिए उसकी परिस्थिति के अनुसार व्यक्तिगत तो अवश्य है लेकिन ज्ञानप्रसाद लेखों से मिल रहे आलोक एवं अपने स्वयं का विवेक अवश्य सहायक हो सकता है,ऐसा विश्वास से कहा जा सकता है।
हम सब जानते हैं कि हमारे अन्तराल में विराजमान परमेश्वर उस क्षमता से सम्पन्न है, जिससे अभीष्ट वरदान पाना और निहाल बन सकना सम्भव है। विडंबना तो यह है कि मनुष्य इस पंक्ति को तो पढ़ लेता है लेकिन उसके साथ जुडी शर्तों को नकार देता है। फिर दे दनादन एक मंदिर,दूसरा मंदिर, एक पुजारी दूसरा पुजारी, एक गुरु दूसरा दूसरा गुरु का क्रम चल पड़ता है, इसी भागदौड़ में, इसी लालच में सारा जीवन व्यतीत हो जाता है, मिलता कुछ भी नहीं है। जिन लोगों के पीछे मनुष्य फिरता रहता है वोह लोग अन्त:स्थिति चेतना का स्मरण तो दिला सकते हैं,किसी प्रकार मन को बहलाने के माध्यम भी बन सकते हैं लेकिन पुरुषार्थ तो मनुष्य को स्वयं ही करना होगा।
यहाँ पर एक बहुत ही रोचक सा प्रासंगिक वृतांत स्मरण हो आया है,आगे बढ़ने से पहले आइए उसे ही देख लें।
किसी अतिशय व्याकुल भक्त ने मंदिर बनाने की सोची,उसके लिए एक सूफी संत की सलाह लेकर रूपरेखा बनाना उचित समझा। सूफी संत ने अत्यन्त गम्भीरता से कहा: ‘‘इमारत अपनी इच्छानुरूप, कारीगरों की सलाह से बजट के अनुरूप बना लेना लेकिन मेरी एक बात मान लो,मंदिर में प्रतिमा के स्थान पर केवल एक विशालकाय दर्पण ही प्रतिष्ठित करना ताकि आने वाले लोग उस दर्पण में अपनी छवि देखकर इस सच्चाई का बोध कर सकें कि या तो ईश्वर का निवास उसके लिए विशेष रूप से बने इसी काय कलेवर के भीतर विद्यमान है अथवा यह समझें कि आत्मसत्ता को यदि परिष्कृत किया जाये,तो वही परमात्म सत्ता में विकसित हो सकती है। इतना ही नहीं, वह परिष्कृत आत्मसत्ता,पात्रता के अनुरूप दिव्य वरदानों की अनवरत वर्षा भी करती रह सकती है।’’
भक्त तो कुछ और ही सोच कर गया था। उसने सोचा था कि भव्य मंदिर की इमारत बनाऊंगा,भव्य मूर्ति स्थापित करूँगा,प्राणप्रतिष्ठा के लिए भव्य आयोजन करूँगा, देश विदेश से विभूतियाँ आएंगीं,वाहवाही होगी लेकिन सूफी ने तो कुछ और ही कर दिया,सस्ते में ही सब कुछ करवा दिया। उसने एक बड़ा हाल बनाकर सचमुच ही ऐसे स्थान पर एक बड़ा दर्पण प्रतिष्ठित कर दिया जिसे देखकर दर्शक अपने भीतर के भगवान् को देखने,उसे निखारने,उभारने का प्रयत्न करते रह सकें।
साइकोलॉजी के विज्ञानी कहते हैं कि मन:स्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही करता है एवं वैसा ही बन जाता है। भले-बुरे कर्म ही संकट एवं सौभाग्य बनकर सामने आते हैं और उन्हीं के आधार पर रोने-हँसने का संयोग आ धमकता है।
जहाँ तक मनुष्य का सम्बन्ध है संसार की सब से बड़ी शक्ति “विचार शक्ति” ही है। विचार के कारण ही मनुष्य श्रेष्ठ बन जाता है और इसी के कारण वह नीच और अधर्मी हो जाता है। मनुष्य भ्रम में रहता है कि उन्नति, समाज में आदर व सत्कार किसी पॉवरफुल व्यक्ति की कृपा से, परस्थितियों द्वारा प्राप्त होता है लेकिन असल में ऐसा है नहीं । मनुष्य की उन्नति/अवनति उसके विचारों पर ही आधारित है एवं विचारों से ही “आत्मबल” पाया जाता है। बहुत बार दोहरा चुके हैं कि मनुष्य अपने विचारों का फल है। महर्षियों ने तो यह तथ्य स्वर्ण अक्षरों की भांति वर्षों पहले बता दिए थे लेकिन बड़ा ही अचरज है कि इतना समय बीत जाने पर भी मनुष्य को इस विचित्र सत्यता का पता ही नहीं लगा। यहाँ विचित्र शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया है कि इसका सम्पूर्ण अर्थ ही विचित्र है। मनुष्य का जीवन उसकी विरासत,संस्कार, स्थिति, वंशावली, बाह्यक्षेत्र पर आधरित है। इन्हीं पैरामीटर्स से उसका चरित्र, सौभाग्य और दुर्भाग्य बनता है। वर्षों से यही प्रथा चलती आ रही है लेकिन जीवन में पूर्णता प्राप्त करने के लिए, प्रत्येक घटना के लिए मनुष्य कभी किसी को दोष देता है तो कभी भगवान को, हर स्थिति के लिए वह सदा अपने बाहर ही कारणों को ढूंढता फिरता है। लेकिन उसे इस बात का ज्ञान ही नहीं है कि वह स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माता है, हर समय वह स्वयं को बनाता और बिगाड़ता रहता है। यह उन मनुष्यों को बात है जो भगवान में विश्वास करते हैं, मूर्ख अविश्वासी भी अपने ही विचारों का उत्पादन है। अपने ही नीच, घृणित और बुरे विचारों के कारण मनुष्य नीच, घृणित और बुरा बन जाता है। कमज़ोर और अस्थिर विचारों के कारण मनुष्य निर्बल और Fluid प्रवृति का बन जाता है। मनुष्य के चेहरे को देख कर एकदम पता चल जाता है कि मनुष्य किस प्रवृति का है,चापलूसी तो छिपती ही नहीं है।
उदासी, ख़ुशी ग़मी आदि जैसे विचार एक के पीछे एक बादलों की भाँति भागते हुए चले जाते हैं। कोई भी विचार क्षण भर के लिए भी नहीं ठहरता एक ओर से आता है और दूसरी ओर चला जाता है। जानकारी तो ऐसी भी प्रचलित है कि औसत मनुष्य के मस्तिष्क में एक दिन में 60000 विचार उठते लेकिन इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है।
यदि विचारों से ही मनुष्य बनता है तो क्या ही अच्छा हो कि एक-एक मनुष्य को पकड़ा जाए और कहा जाए कि तुम्हारे पास पारस पत्थर है, एक ऐसी अमूल्य शक्ति जिसकी सहायता से तुम अपने जीवन की सभी नीच धातुओं को स्वर्ण में परिवर्तित कर सकते हो। यह सत्य है कि मनुष्यत्व में परिवर्तन करने वाली शक्ति है लेकिन अफ़सोस है कि उसे पता ही नहीं है,यदि पता भी है तो उसे प्रयोग करना नहीं आता। हर प्रवचन में यही बताया जाता है कि गायत्री सद्बुद्धि की देवी है लेकिन देवी का वरण कैसे करना है, उसके लिए कितना तप करना है,कैसे करना है,निष्ठा क्या है,पात्रता कैसे प्राप्त की जाती है, इसके लिए कोई भी संकल्प क्यों नहीं दिलाता। गायत्री की शक्ति को जानने, पहचानने,अनुभव करने की बहुत आवश्यकता है। बार-बार एक ही बात दोहराने से बेहतर है कि ढंग बताने और अनुभव करने का होमवर्क दिया जाए और अगले दिन उसका टेस्ट लिया जाए, विचार क्रांति का सबसे पहला सूत्र यही होना चाहिए।
इस तरह के होमवर्क से मस्तिष्क में विशेष प्रकार के विचार केंद्र (Thought centres) बन जाएंगे जिन्हें अनवरत, नियमितता से Activate करते रहना बहुत ज़रूरी है।
हमारा विश्वास है कि हमारे अनेकों साथी इस प्रक्रिया को जानते होंगें लेकिन अनेकों ऐसे भी होंगें जो अनजान होंगें। दोहराने में क्या हर्ज़ है?
जय गुरुदेव
