वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

अंतःकरण में झाँकने की दर्पण प्रक्रिया 

आज के लेख में अंतकरण को समझने का प्रयास किया गया है। “अंतःकरण” शब्द न जाने हज़ारों बार सुन चुके हैं,पढ़ चुके हैं। आज मन में विचार उतरा कि शरीर का कौन सा भाग है जिसे अंतःकरण कहा जाए? दिल, दिमाग,फेफड़े आदि तो शरीर के भाग हैं ही,क्या इन्हीं की तरह अंतःकरण भी शरीर का कोई भाग है? अंतःकरण के परिष्कार को समझने से पहले यह समझना  महत्वपूर्ण हो जाता है की अंतःकरण क्या है। दर्पण के सामने खड़े होकर लगभग सभी सजते संवरते हैं,खुश भी होते हैं लेकिन कभी मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को भी देखकर खुश हुए हैं। इन चारों के समिश्रण को ही अंतःकरण का नाम दिया गया है,इनमें से कोई भी Human body organ नहीं है लेकिन यही मनुष्य का सारा जीवन कण्ट्रोल करते हैं। 

तो साथिओ आज का लेख पाठकों को फिलॉसॉफी के स्तर पर सोचने का निमंत्रण दे रहा है। शांतिकुंज स्थित विश्व के एकमात्र “भटका हुआ देवता” के मंदिर में लगे दर्पण मनुष्य को स्वयं को जानने में सहायता करते हैं, आज के लेख में उसी जानकारी को रोचक एवं  सरल भाषा में समझने का प्रयास है। 

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की 7वीं पुस्तक “जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र” की तीसरी कक्षा में सभी गुरुशिष्यों का स्वागत है। 

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हीरा और कुछ नहीं, कोयले का ही रिफाइंड  स्वरूप है। पानी को उबालने पर बनी भाप को ठंडा करने पर Condensation से जो पानी प्राप्त होता है उसे डिस्ट्रिल्ड वाटर कहते हैं। इस डिस्टिल्ड वाटर की शुद्धता पर इतना विश्वास किया जाता है कि उसे इंजेक्शन जैसे जोखिम भरे कार्य में प्रयुक्त किया जाता है। पाठकों ने अवश्य देखा होगा कि इंजेक्शन लगाते  समय डॉक्टर डिस्टिल्ड वाटर की शीशे की Vial को तोड़कर उसमें से पानी निकाल कर दवाई को घोल कर सलूशन बनाते हैं। 

गुरुदेव अनेकों बार दोहरा चुके हैं कि मनुष्य और कुछ नहीं, मात्र एक भटका हुआ देवता है। भटका हुआ देवता इसलिए कि यदि वह अपने अंतःकरण पर गंदगी एवं मल के आवरण,अनचाही भटकन को,कषाय-कल्मषों (लोभ,क्रोध,अहंकार, मानसिक अशुद्धि आदि ) को उतार फेंके, तो उसका एक ऐसा रूप निकल कर आता है जिसका अतुलित सौंदर्य न केवल देखते ही बनता है बल्कि मन को भी मंत्रमुग्ध कर देता है।

शरीर के आठ स्थानों पर टेढ़ा होने वाले अष्टावक्र की दृश्यमान कुरूपता उनकी आकर्षकता, प्रतिभा, प्रामाणिकता और प्रभाव गरिमा में राई-रत्ती भी अन्तर न डाल सकी। यह इस तथ्य का साक्षात् प्रमाण है कि मनुष्य जानता ही नहीं है कि उसके अंतःकरण में कैसी-कैसी विभूतियाँ छिपी बैठी हैं, ईश्वर ने उसे क्या कुछ देकर इस पृथ्वी पर अपना राजकुमार बनाकर भेजा है। जब मनुष्य के अन्त:करण का सौंदर्य खुलता है, तो बाहरी सौन्दर्य का कोई महत्त्व नहीं रह जाता। चेहरे पर जो आभा, तेज, प्रतिभा का प्राकट्य दिखता है कि मनुष्य स्वयं ही  दाँतो तले ऊँगली दबाए बिना नहीं रह पाता।   

मनुष्य के बारे में उपरोक्त तथ्यों की गीताकार ने अनेक स्थानों पर पुष्टि की है। वे कहते हैं:

“मनुष्य स्वयं ही अपना शत्रु है और स्वयं ही अपना मित्र भी है’’ 

‘‘बन्धन और मोक्ष का एकमात्र कारण मन ही है ’’। 

‘‘अपने आप को ऊँचा उठाओ, उसे गिराओ मत।’’

महापुरुषों का कथन है:

“मनुष्य की एक मुट्ठी में स्वर्ग और दूसरी मुट्ठी में नरक है। वह अपने लिए इन दोनों में से किसी को भी खोल सकने में पूर्णतया स्वतन्त्र है।’’

यहाँ पर एक बहुत ही Confusing सी स्थिति का समाना करना पड़ रहा है। एक तरफ तो यह सन्देश दिया जा रहा है मनुष्य ही अपने भाग्य का निर्माता है तो दूसरी तरफ यह कहा जा रहा है कि विधाता ही एकमात्र निर्माता है,उसकी इच्छा के बिना पत्ता तक नहीं हिलता। दोनों प्रतिपादनों से भ्रमित होने से बचने के लिए एक और स्टेटमेंट जोड़ लेनी चाहिए कि उस विधाता या ईश्वर से मिलने/निवेदन करने/उसकी रज़ा में रहने के लिए/उसकी बात सुनने के लिए मनुष्य के शरीर का सबसे निकटवर्ती स्थान मनुष्य का  “अंत:करण” ही है। 

पाठक कहेंगें कि ईश्वर तो सर्वव्यापी है और उसे कहीं भी स्थित माना/देखा जा सकता है लेकिन यदि दूरवर्ती भागदौड़ करने से बचना हो,अँधेरे में तीर मारने से बचना हो तो मनुष्य को अपना अन्त:करण ही टटोलना चाहिए। मनुष्य के अंतःकरण के पर्दे के पीछे बैठे परमात्मा को जी भरकर देखने की, हृदय खोलकर मिलने-लिपटने की अभिलाषा सहज ही पूरी कर लेनी चाहिए। 

अंतःकरण का वर्णन करते हुए ही तो कबीर साहिब ने लिखा हुआ है:

मैं तो तेरे पास में, ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकान्त निवास में ना मंदिर में, ना मस्जिद में ना काबे कैलास में, मैं तो तेरे पास में बन्दे मैं तो तेरे पास में, ना मैं जप में ना मैं तप में ,ना मैं बरत उपास में, ना मैं किरिया करम में रहता नहीं जोग सन्यास में, न हीं प्राण में न हीं पिंड में, ना ब्रह्याण्ड आकाश में ना मैं प्रकृति प्रवार गुफा में, न हीं स्वांसों की स्वांस में खोजि होए तुरत मिल जाऊं इक पल की तलाश में, कहत कबीर सुनो भई साधो मैं तो हूं विश्वास में !!!

कबीर जी के इस पद के अनुसार, ईश्वर (परमात्मा) कहीं बाहर खोजने से नहीं मिलते,बल्कि वह इंसान के भीतर मौजूद होते हैं। ईश्वर तीर्थों, मूर्तियों या एकांत निवास में नहीं हैं, मंदिर, मस्जिद, काबा या कैलाश में नहीं हैं, जप, तप, व्रत-उपवास, क्रिया-कर्म या योग-संन्यास में नहीं हैं। वह तो मनुष्य के हर एक श्वास  में निवास करते हैं। अगर मनुष्य सच्चा खोजी हो,तो वह पल भर की तलाश में अपने भीतर, अपने अंतःकरण को टटोलने से  ही मिल जाते हैं। 

अंतःकरण के बारे में अनेकों बार पढ़ा है,सुना है आइए आगे बढ़ने से पहले यह भी जान  लें कि अंतःकरण किसे कहते हैं एवं यह शरीर के किस भाग में रहता है। अंतकरण का संधिविच्छेद करने पर पता चलता है कि यह दो शब्दों “अंतः” और “करण” को जोड़ कर बना है। “अंतः” का अर्थ अंदर/भीतर  और “करण” का अर्थ साधन होता है। यह मनुष्य का वोह मानसिक और आंतरिक प्रोसेसिंग सेंटर है जिसके द्वारा मनुष्य सोचना,विचार करना, उचित-अनुचित का निर्णय लेता है और बाहरी दुनिया के साथ व्यवहार करना सीखता है। अंतःकरण उस मानसिक शक्ति का नाम है जो नैतिक नियमों के आधार पर सही और गलत का भेद करती है। हमारा अंतःकरण चार तत्वों (मन,बुद्धि,चित्त और अहंकार) से बना है। मन में विचारों का प्रवाह उठता है,विचारों को उचित/अनुचित समझने का कार्य बुद्धि करती है। पुरानी यादों,अनुभवों,संस्कारों का कार्य चित्त को सौंपा गया है और कर्ता की ज़िम्मेवारी अहंकार में समाहित है। यहाँ अहंकार को ईगो से जोड़ना अनुचित होगा क्योंकि ईश्वर ने अपने राजकुमार को कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी हुई है तो फिर कर्ता का सेहरा भी तो राजकुमार के सिर पर ही बंधना चाहिए। एक वरिष्ठ पिता भी तो सन्तान को पूर्ण स्वतंत्रता देकर उसकी प्राप्ति का श्रेय सन्तान को ही देता है।  कैसी विडंबना है कि हमारी आँखें संसार को देख सकती हैं लेकिन अपने को देखने में,अपने अंदर झाँकने में  असमर्थ हैं। इस असमर्थता को दूर करने के लिए “दर्पण की विधि” का आविष्कार हुआ।

दर्पण में चेहरा देखना सुन्दरता का भाव है, इसका श्रृंगार रस से संबन्ध है, मान और शान का भी भाव है, लोक-लज्जा से भी इसका बड़ा सम्बन्ध है । हमें दर्पण में अपना मुंह केवल इस अभिप्राय से नहीं देखना है कि देखने के काबिल है या नहीं। ईश्वर ने अनेक प्रकार के मुख बनाए हैं। रंग और रूप में आयु के आधार पर भी परिवर्तन होता रहता है । स्वास्थ्य और रोग की दशा का भी मुख की आकृति पर प्रभाव पड़ता है। संसार में जितने प्राणी है, सबके मुखों की आकृति निराली है । यदि एक जैसी आकृति वाले दो व्यक्ति मिल जाते हैं तो बड़ा आश्चर्य होता है । ईश्वर के पास न मालूम कितने सांचे हैं, जिनमें उसने अनेकों प्रकार के चेहरे ढाल दिये है। 

दर्पण देखकर अपने चेहरे की सुन्दरता पर, आकृति पर गर्व करना भूल है । ईश्वर की रचना में एक से एक सुन्दर आकृति वाले प्राणी व्याप्त  हैं ।

दर्पण देखने का असली उद्देश्य यह होना चाहिए कि दर्पण देखते समय यह भावना सम्मुख रहे कि चेहरा  दिखाने योग्य है या नहीं | चरित्र की जांच के लिए भी दर्पण का प्रयोग आवश्यक है । चेहरा  देखते समय यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि कोई दाग-धब्बा तो अनुचित रूप से नहीं लगा। कोई ऐसा चरित्र-दोष तो नहीं है, जिससे चेहरे  पर कलंक लग गया हो या लगने की संभावना हो । वैदिक संस्कृति में विचारों के परिवर्तन पर बहुत बल दिया गया है।जिस व्यक्ति से पाप या अपराध हो जाता है उसे लज्जा के कारण चेहरा छिपाना पड़ता है । दंड देने वाले या न्याय देने वाले से आँख छिपानी पड़ती है । दर्पण में चेहरा  देखते समय  यह ध्यान रहे कि हम अपनी दिनचर्या या किये काम पर एक दृष्टि डालकर यह जांच लें कि कोई ऐसा काम तो नहीं हुआ, जिससे चेहरा छिपाना पड़े । 

यदि दर्पण देखते समय यह भावना रहेगी, तो अपराधों व पापों से बचने का स्वभाव हो जायेगा। यदि यह भावना नहीं रही, तो दर्पण देखने की प्रथा निष्प्रयोजन है ।

जब हम शान व मान के लिए दर्पण देखें तो ईमान पर ध्यान रखना चाहिए । ईमान के बिना न शान रहती है, न मान रहता है । अपने मन की स्थिति (हाल) देखने के लिए भी दर्पण की आवश्यकता है। चेहरे का रंग कैसा है ? चेहरा उतरा हुआ तो नहीं है ? आवश्यकता से ज्यादा दुर्बल तो प्रतीत नहीं हो रहा । यदि इस प्रकार अपने हाल पर चिन्तन करना है, तो इसके साथ चाल पर ध्यान भी देना होगा । हमारा हाल हमारी चाल से सम्बन्धित है । जैसा चाल-चलन (करैक्टर) होगा, वैसी दशा होगी। अपने हाल पर दुखी होना और चाल की ओर ध्यान न देना बड़ा हानिकारक है । हमें सुख व दुःख दोनों स्थितियों में अपनी चाल पर दृष्टि रखनी होगी । सुख में अभिमान से बचे रहना चाहिए और दुःख में असंतोष से । दर्पण का सम्बन्ध तन-मन-धन तीनों से है । धन से अभिप्राय आर्थिक परिस्थिति से है। यदि अर्थ के नाम पर अनर्थ करके अर्थ का संचय किया गया तो फिर धन प्राप्त हो जाने पर दर्पण देखते समय दु:ख ही होगा। तन के सम्बन्ध में भी यही बात है । यद्यपि तन पर पहने वस्त्रों को  देखने से आनन्द होता है लेकिन यदि दुराचार इत्यादि में तन की शक्ति की फिजूलखर्ची की गयी है  तो दर्पण आपको धिक्कारेगा। दर्पण का असली सम्बन्ध मन की पवित्रता से है। एक पुरानी कहावत है: मुखड़ा क्या देखे दर्पण में, जाके दया धर्म नहीं मन में। एक रोमांटिक गीत भी स्मरण हो आया: चेहरा क्या देखते हो,दिल में उतर कर देखों न। 

मन का दर्पण हमारा चरित्र और ईमान है । धन का दर्पण हमारा व्यवहार है और व्यापार की विधि है।

चेहरा उसी दर्पण में देखा जा सकता है, जो टूटा हुआ न हो, साफ हो और अस्थिर न हो । आत्मा के लिए मन दर्पण है । मन को स्थिर रखना, पवित्र और शान्त रखना ही अंतःकरण का परिष्कार है। ऐसा करते ही आत्मा के स्वरूप का भान होगा और आत्मा के स्वरूप से परमात्मा के स्वरूप का भान होगा । यदि दर्पण के प्रयोग में इस प्रकार का मनोविज्ञान रहेगा, तो दर्पण हमारे चरित्र का आधार और भक्ति का साधन बन सकता है । यदि दर्पण को केवल तन की दृष्टि से देखा जाए, तो मन अपवित्र हो सकता है और तन भी संकट में आ सकता है। 

आशा करते हैं कि अंतकरण में झाँकने की यह प्रक्रिया पाठकों को पसंद आयी होगी। 

यहीं पर आज के लेख का समापन होता है।

जय गुरुदेव 


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