वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परिस्थितियां कभी भी, किसी के लिए भी अनुकूल नहीं थीं 

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की 7वीं पुस्तक “जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र” का दूसरा ज्ञानप्रसाद लेख इतना प्रैक्टिकल है कि लेख में वर्णित किए कंटेंट से लगभग सभी पाठक भलीभांति परिचित हैं। जीवन से जुड़े सभी तथ्य इतने सरल हैं कि इन्हें कोई भी बड़ी ही आसानी से समझ सकता है लेकिन प्रश्न तो यह उठता है कि फिर परिवारों में,दैनिक जीवन में इतनी समस्याएं क्यों हैं? सब कुछ जानते हुए भी मनुष्य दुविधा में है तो इसका कारण गुरुदेव संकल्पशक्ति को कह रहे हैं। 

आज के लेख में ज्ञान से भरपूर “माया के जाल और मकड़ी के जाल” की बात की गयी है। यह भी बात की  गयी है कि परिस्थितियां कभी भी, किसी के लिए भी अनुकूल नहीं थी, यदि किसी को सोने का थाली में परोसा हुआ भोजन मिल भी गया हो तो खाने के लिए हाथ तो उसे ही उठाना होगा। 

खैर जो भी हो,आप खुद ही देख लीजिये,गुरुकक्षा में वितरित हो रहे ज्ञानप्रसाद के अमृतपान के लिए आपको सादर आमंत्रण है। 

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गुरुदेव कह रहे हैं:    

अब आइए, जरा समझदारी अपनाएँ और समझदारों की तरह सोचना आरम्भ करें। मनुष्य जीवन स्रष्टा की बहुमूल्य धरोहर है, जो स्वयं को सुसंस्कृत और दूसरों को समुन्नत करने के दो प्रयोजनों के लिए सौंपा गया है। इसके लिए अपनी योजना अलग बनानी और अपनी दुनिया अलग बसानी पड़ेगी। 

मकड़ी अपने लिए अपना जाल  स्वयं बुनती है। प्रकृति द्वारा प्रदान किए लिक्विड प्रोटीन से बना मकड़ी का जाल स्टील से भी अधिक स्ट्रांग होता है। मकड़ी का भोजन कीड़े मकोड़े होते हैं,उन्हीं को फँसाने के लिए यह जाल बुना जाता है। मौसम,हवा पानी आदि की मार सहता यह जाल समय रहते पुराना हो जाता है, उस समय मकड़ी उसी जाल की गोली बना कर निगल लेती है और फिर से नया जाल बुनती है। इसे प्राकृतिक रीसाइक्लिंग कहते है। नया बनाने की तुलना में रीसाइक्लिंग की इस प्रक्रिया में कम ऊर्जा खर्च होती है। मकड़ी द्वारा पेट पालने के लिए जाल बुनना एक वैज्ञानिक, प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसी जाल को अध्यात्मवेता “अपने ही जाल में फंस जाने” जैसा कहते हैं। उनके अनुसार मकड़ी की तरह, मनुष्य अपना जाल खुद बुनता है, उसी को फिर  Recycle करता है,फिर उसमें फंसता है, बार-बार फंसता ही जाता है, उसे मुक्ति तभी मिलती है जब वह मकड़ी की तरह आकांक्षाओं के जाल को निगल लेता है। 

लेकिन यहां पर विज्ञान और अध्यात्म का टकराव दिखाई दे रहा है।

आइए देखें कैसे?

मकड़ी द्वारा जाल बुनना अपना पेट पालने की प्रक्रिया है, न कि जाल में फंसने जैसा। कीड़े मकोड़े उसका भोजन हैं, उसकी आकांक्षा तो मात्र पेट पालने तक ही सीमित है। लेकिन मनुष्य द्वारा असीमित आकांक्षाओं,इच्छाओं का जाल बुनना उनमें फंसने का द्वार है। कहने को तो मनुष्य भी कह सकता है कि मेरे द्वारा बुना गया असीमित जाल जीवनयापन के लिए ही तो है लेकिन मकड़ी की तुलना में मनुष्य के पास दिमाग है, बुद्धि है, विवेक है। उसके पास  अपनी इच्छाओं पर अंकुश लगाने की अद्वितीय शक्ति है, इसीलिए तो कल वाले लेख में लिखा था यदि पांच कमीजों से काम चल सकता है तो 50 का संग्रह क्यों किया जाए। मनुष्य के ऊपर “लोग क्या कहेंगे” की तलवार हमेशा ही लटकती रहती है क्योंकि वोह लोगों के लिए ही जीता है,उन लोगों के लिए जो श्मशान तक भी साथ नहीं देते। आजकल तो जीवन के अंतिम पल की प्रक्रिया के लिए भी समय का अभाव हो गया है, वीडियो कांफ्रेंस द्वारा की जाने वाली अन्त्येष्टि से हमारे पाठक अवश्य ही अवगत होंगे।

अध्यात्मवेताओं द्वारा मकड़जाल समेट कर उसे गोली बनाकर निगल जाना (वैज्ञानिक प्रक्रिया के बावजूद) शिक्षा देता है कि भौतिक जगत के सारे बन्धन कट गये और जिस स्थिति के कारण अनेकों व्यथा-वेदनाएँ सहनी पड़ रही थीं, उसकी सदा-सर्वदा के लिए समाप्ति हो गई। ऐसी स्थिति आते ही मनुष्य का अंतःकरण कितना खाली, निर्मल और स्वच्छ हो जाता है, उसे स्वतः ही अनुभव किया जा सकता है। यही वोह दिव्य स्थिति होती है जब मनुष्य परमात्मा को स्वच्छ मन मंदिर में आमंत्रित कर सकता है।

दोस्तो,जितनी जल्दी मनुष्य को इस दिव्य स्थिति का ज्ञान हो जाता है, उतनी ही जल्दी वह स्वर्ग के झूले झूलना शुरू कर देता है।

इस दिव्य स्थिति में प्रवेश करने के लिए गुरुवर का साहित्य, उस साहित्य का विश्लेषण करके प्रस्तुत किये जाने वाले ज्ञानप्रसाद लेख बहुत सहायक हैं। इन पंक्तियों का नगण्य सा लेखक अपने व्यक्तिगत अनुभव से दावा कर सकता है कि श्रद्धापूर्वक ज्ञानप्रसाद लेखों का अमृतपान मनुष्य का कायाकल्प करने में समर्थ हैं। पाठकों/समर्पित साथिओं के पास बुद्धि है, दिमाग है, ठीक-गलत चयन करने के लिए विवेक की शक्ति है, गायत्री मंत्र की सन्मार्ग की ओर ले जाने की शक्ति है तो फिर समस्या किस बात की है? इतना सब कुछ होते हुए भी यदि चयन करने में कठिनाई आ रही है  कि मकड़ी के जाल में फंसना है यां स्वर्ग के हिलोरे लेने हैं,तो केवल एक ही कमी आड़े आ रही है, वोह कमी है दृढ़ संकल्पशक्ति की, इच्छाशक्ति की।

ज्ञान के बाज़ार में सब कुछ उपलब्ध है, पैसा फेंको, तमाशा देख लो: Choice is yours!!! 

बार।-बार कहा गया है कि मनुष्य स्वयं ही अपने लिए अपने स्तर की दुनिया रचता है, वह खुद ही अपने भाग्य का निर्माता है। इसमें तनिक भी शंका नहीं है कि उसके हाथ की चंद लकीरें अवश्य ही उसकी तकदीर का खेल हैं लेकिन जीवन इतना ही नहीं है, उससे कहीं और बढ़कर है। तकदीरों को बदलने वाले भी इसी धरती पर, उसी ईश्वर की संतान की तरह अवतरित हुए हैं। तकदीर का रोना रोने वाले तो अनेकों मिल जायेंगे लेकिन ज्ञानप्रसाद का अमृतपान तकदीर से नहीं पुरुषार्थ से प्राप्त होता है, प्राप्त करने के बाद कायाकल्प करने वाले शक्तिशाली अमृत का पयपान भी पुरुषार्थ से ही होता है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से अनेकों बार,आपका द्वारा खटखटाकर आपको नींद से जगाने का प्रयास हो चुका है, जानते हैं कि गुरु की शक्ति का बार-बार बखान करने का अपना ही प्रभाव है लेकिन आज इस विषय को यहीं पर छोड़ कर आगे बढ़ना उचित होगा।     

मनुष्य अपने द्वारा बनाए गए घोंसले में, अपने ही किले में बंद अपनी सारी जिन्दगी बिताता है। उसके जीवन में किसी दूसरे का कोई हस्तक्षेप नहीं है क्योंकि वोह स्वयं हो तो अपना निर्माता है। वोह जो सोचता है वही तो करता है, किसी की भला कहाँ सुनता है ? दुनिया की अड़चनें और सुविधाएँ धूप-छाँव की तरह आती-जाती रहती हैं, उनका सामना भी वोह स्वयं ही करता है। धूप- छांव, उतार-चढ़ाव, दुःख-सुख का सामना करते हुए कोई भी राहगीर, अपने अभीष्ट पथ पर नियमितता से निरन्तर चलता रहता है/चल सकता है। कीर्तियाँ चाहे बुरी हों यां भली, किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं, जो आगे बढ़ने वालों के पैरों में बेड़ी डाल कर पीछे खींच सके। हाँ, बहुत बार इसके उलट  भी होते देखा गया है, साथी-सम्बन्धी, दोस्त आदि गिराने की फिराक में रहते है, निराशा हाथ लगती है लेकिन वोह संकल्पशक्ति कैसी जिसे कोई भी डिगा दे। मिर्ज़ा अज़ीम बेग का कथन “गिरते हैं शह सवार मैदाने जंग में,वोह तिफ़्ल क्या गिरे जो घुटनों के बल चले” ऐसी ही परिस्थितिओं के लिए बना हुआ है।  भले या बुरे स्तर के आश्चर्यजनक काम कर गुजरने वालों में से प्रत्येक की कथा-गाथा ऐसी ही है। परिस्थितिओं,भाग्य,तकदीर का रोना एक तरफ छोड़ कर जिस किसी ने भी प्रतिकूल परिस्थितियों का पतला सा पर्दा  हटाया, वह उस “सब कुछ” को प्राप्त कर पाया जिसकी उसने कामना की थी। 

इसी प्रेरणादायक चर्चा को आगे बढ़ाते हुए गुरुदेव बता रहे हैं कि मनुष्य एक ऐसी धातु का बना हुआ है जिसकी संकल्प शक्ति एवं साहसिकता के आगे कोई भी अवरोध टिक नहीं पाता। तभी तो कहा जाता है कि ‘‘मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप ही है।’’ वही अपने हाथों से ,अपने क्रियाकलापों से,अपने कर्मो से, अपने ही गिरने के लिए खाई खोदता है। वोह चाहे तो उठ कर, संभल कर समतल सीढ़ियों वाली मीनार भी चुन सकता है, Again the choice is yours, चयन केवल और केवल आपका ही है। 

यहाँ पर गुरुदेव एक बहुत ही विचारणीय बात कहते हैं। बहुत से मनुष्यों में अपने को दीन-हीन, बेचारे,दयनीय,दरिद्र,अनगढ़,अभागा, बाधित समझने की प्रवृति होती है। उनको  यही अनुभव होता रहता है कि वे दुरूह परिस्थितियों से जकड़े हुए हैं,परिस्थितियां उनकी प्रगति में आड़े आ रही हैं ,उनकी प्रवृति केवल दूसरों की प्रगति से तुलना करना,ईर्ष्या करते रहना ही होता है। ऐसे लोग हमेशा दूसरों की सहानुभति बटोरने के अवसर  ढूंढते रहते हैं,अपना रोना रोने के बहाने ढूंढ कर अपना मन हल्का करने के अवसर ढूंढने की फिराक में रहते हैं। इसके बिल्कुल ही उलट वोह लोग होते हैं जिनकी मान्यता यह है कि उनमें उठने और महानता की मंज़िल  तक जा पहुँचने की शक्ति है, वे प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदल सकने में भी समर्थ होते हैं। ऐसे लोगों को भी कई बार उठने में सहायता की ज़रुरत पड़ती है लेकिन वस्तुस्थिति ऐसी है कि यदि किसी पर दोषारोपण के बजाए अपने को ही उठने  और गिराने के लिए उत्तरदायी ठहराया जाये, तो यह मान्यता सबसे अधिक इफेक्टिव होगी।

गिरना-उठना-उठकर-फिर गिरना-फिर उठना : यही तो ज़िंदगी है साथिओ 

गई-गुजरी स्थिति में रहने वालों की स्थिति पर आँसू बहाना,सहानुभूति व्यक्त करना, मार्गदर्शन प्रदान करना कदापि अनुचित नहीं है। ऐसे साथिओं की सहायता करना भी मानवोचित कर्तव्य है लेकिन यह भी स्मरण रखना चाहिए कि जब तक “तथाकथित असहाय (जी हाँ तथाकथित असहाय)” कहाने वालों का मनोबल न उठाया जायेगा, उनमें पुरुषार्थपूर्वक आगे बढ़ने का संकल्प न उभारा जायेगा, तब तक ऊपर से थोपी गई सहायता कोई चिरस्थाई परिणाम उत्पन्न न कर पाएगी, ऐसा व्यक्ति  आपका फायदा ही उठाता रहेगा। किसी प्रोजेक्ट को करने की उत्सुकता का चुम्बकत्व अपनेआप में इतना शक्तिशाली है कि उसके सहारे निश्चित रूप से प्रगति का पथ-प्रशस्त किया जा सकता है। इसीलिए तो गुरुदेव कहते आ रहे हैं, “तू  एक कदम तो उठा,दस कदम न चला दूँ तो कहना।” जीवन की दिशा बदलने वाला पहला कदम तो आपको खुद ही उठाना पड़ेगा। ज्ञानप्रसाद पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से, नियमितता से आपका दरवाज़ा खटखटाकर आपके मेलबॉक्स में डाल  दिया जाता है लेकिन उसे खोल कर पढ़ना तो आपको  ही है। वर्षों पुरानी,स्कूल  से पढ़ते आ रही उक्ति भी तो यही कहती है: ‘‘ईश्वर मात्र उन्हीं की सहायता करते हैं जो अपनी सहायता आप करते हैं।’’ तथाकथित दीन-दुर्बलों को तो प्रकृति भी अपनी मौत आप मरने के लिए, मुँह मोड़कर अपनी राह पर चल पड़ती देखी गई है। शास्त्रकारों ने इस तथ्य का पग-पग पर प्रतिपादन किया है।

इसी ज्ञान के साथ आज के लेख का समापन होता है 


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