वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

दिवास्वप्न (Daydreaming) के मायाजाल से बाहिर निकलें 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की सर्वप्रिय बिटिया, देव संस्कृति विश्वविद्यालय में MA साइकोलॉजी की विद्यार्थी,संजना के सुझाव पर आरम्भ किये गए एक विशाल प्रोजेक्ट के अंतर्गत “क्रांतिधर्मी साहित्य” की 23 पुस्तकों के क्रमवार अध्ययन में 7वीं पुस्तिका “जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र” का शुभारम्भ करते जिस प्रसन्नता की अनुभूति हो रही है उसे शब्दों में वर्णन करना असंभव है। आशा करते हैं कि जिस प्रकार पहली 6 पुस्तकों के अध्ययन में सभी सोशल मीडिया साइट्स का सहयोग मिला है इस पुस्तिका को भी भरपूर समर्थन मिलेगा।

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की 23 पुस्तिकाएं परम पूज्य गुरुदेव के विशाल साहित्य का मक्खन है। अपने गुरु के निर्देश का पालन करना हमारा परम कर्तव्य है, इसलिए उनके आग्रह पर इन सभी पुस्तकों को एक बार नहीं 100 बार पढ़ने का,100 लोगों को पढ़ाने का संकल्प लेना चाहिए। इन पुस्तिकाओं में समाहित ज्ञान को पाठकों ने अवश्य ही अखंड ज्योति में एवं कहीं अन्य प्रकाशनों में पहले भी पढ़ा होगा क्योंकि यह उन्हीं प्रकाशनों का ही तो मक्खन है, लेकिन गुरु की बार-बार महिमा गाने से उसकी कीर्ति का प्रचार होता है जिससे गुरु को अपार प्रसन्नता मिलती है। यह प्रसन्नता प्रचार से नहीं बल्कि इस बात से होती है कि गुरु के बच्चे उनके आग्रह का पालन कर रहे हैं एवं उज्जवल भविष्य की ओर कदम बड़ा रहे हैं। 

साथिओं ने नोटिस किया होगा कल रात प्रकाशित हुए दिव्य सन्देश का शीर्षक “गुरुदेव की जीवन साधना” था। इस सन्देश में गुरुदेव की व्रतशीलता की बात की गयी थी कि परमसत्ता के अनुग्रह से जो भी प्राप्त होगा उसे उसी सत्ता के उद्यान में खर्च किया जाता रहेगा, अपना निजी जीवन ब्राह्मणोचित निर्वाह से ही गुज़ार लेगा। ब्राह्मण कौन है,इस पर वंदनीय माता जी, गुरुदेव की कितनी ही वीडियोस उपलब्ध हैं। 

साथी सोच रहे होंगें कि दिव्य सन्देश में दिए गए ज्ञान को फॉलो करके हमें भी गुरुदेव जैसा, संत जैसा जीवन जीने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। कहाँ गुरुदेव और कहाँ हम? लेकिन हम कुछ तो शिक्षा ले ही सकते हैं, भौतिकवाद की अंधी दौड़ से दूर तो हो ही सकते हैं, पदार्थवाद के वशीभूत पदार्थों के अनुचित,अनवांटेड संग्रह से किनारा तो कर ही सकते हैं,अगर पांच Dresses से काम चल सकता है तो 50 का संग्रह करने का क्या लाभ, किसको दिखाना है, किस से वाहवाही लूटनी है, किसी को किसी की कोई परवाह नहीं है, यह सब दुनियादारी है,भ्र्म है,मायाजाल है, Illusion है। यदि ज्ञानप्रसाद लेख इतना भी न कर पाएं तो समझा जाएगा कि प्रयास व्यर्थ गया है। 

आज का Opening  ज्ञानप्रसाद लेख इसी भ्र्म को दर्शा रहा है, लेख छोटा अवश्य है लेकिन  बहुत कुछ कह रहा है। जीवन साधना का अर्थ ही जीवन को सीधा करना है, ठीक उसी तरह जिस प्रकार सर्कस में जंगलों में रह रहे जानवरों को ट्रेनर बार-बार ट्रेनिंग  देकर उस वातावरण को भुला देता है जिसमें वोह वर्षों से रह रहे थे। गुरुदेव इन्हीं स्वर्णिम सूत्रों (Golden points) के द्वारा  उलटे हुओं को उलट  कर सीधा करने का संकल्प लिए गए हैं। गुरूसाहित्य,गुरु का ही स्वरूप है,इस साहित्य को गुरुदेव ने अपने प्राणों की स्याही से लिखा है, यदि इस बेशकीमती हीरे को नकार दिया तो जीवन भर हाथ मलने के सिवा और कुछ प्राप्त नहीं होगा। 

मात्र 35 पन्नों की पुस्तिका के निम्नलिखित 11 छोटे-छोटे चैप्टर देखने में छोटे नहीं हैं, बहुत गूढ़ ज्ञान लिए हुए हैं,प्रयास करेंगें कि ज्ञानप्रसाद लेखों को अधिकमसे अधिक प्रैक्टिकल बनाया जाए। 

1. सुधरें-सँभलें तो काम चले

2. उसे जड़ में नहीं, चेतन में खोजें

3. निकृष्टता से उबरें, महानता अपनाएँ

4. धर्म धारणा की व्यावहारिकता

5. पंचशीलों का अभ्यास करें

6. उच्च मानसिकता के चार सूूत्र

7. सुनिश्चित राजमार्ग अपनाएँ

8. कर्मकाण्डों के साथ भाव सम्वेदना का समावेश

9. प्रतीक पूजा का तत्त्वदर्शन

10. उपासना-ध्यान-धारणा का स्वरूप और मर्म

11. प्रस्तुत अनुपम सुयोग का लाभ उठाएँ

आइए आज के लेख का शुभारम्भ करें 

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ईश्वर ने मनुष्य को न तो अभागा बनाया है और न अपूर्ण। उसमें वे सभी क्षमताएँ बीज रूप से विद्यमान हैं जिनके आधार पर अभीष्ट भौतिक एवं आत्मिक सफलताएँ प्रचुर मात्रा में प्राप्त की जा सकती हैं, आवश्यकता उन क्षमताओं को समझने एवं और उनके सदुपयोग की। 

प्रकृति अलमस्त बच्चे की तरह निरन्तर अपने खेल-खिलवाड़ में लगी रहती है। पंचतत्त्वों के रेत-बालू को बटोरना, सँजोना, बढ़ाना-घटाना बिगाड़ना बस यही उसके क्रिया-कलाप का केन्द्र बिन्दु है। बाजीगर का तमाशा देखने में अपनी सुध-बुध खो बैठने वाले मनचले दर्शकों की तरह लोग उस कौतुक-कौतूहल को देखने के लिए एकत्रित हो जाते हैं। हाथ की सफाई का कमाल उन्हें इतना  अधिक सुहाता है कि मनुष्य यह  भूल ही जाता है कि 

“कहाँ जाना था? क्या करना था? मैं इस धरती पर किस लिए आया था?”

मनुष्य इन मूल उद्देश्यों को  भूल कर बेतुकी कल्पनाओं में उड़ने-तैरने लगता है। इन्हीं कल्पनाओं, प्रपंच-कौतुकों से इतना आकर्षित हो जाता है कि  “मन” एक दोस्त की भांति गले में बाँहें डाले सहायता देता रहता है। इतना ही नहीं,प्रकृति की ड्रामेबाज़ी में, बिना सोचे समझे वोह उसके साथ ही रोता रहता है,हँसता रहता है,यही मनोरंजन करते-करते पता ही ही नहीं चलता कि कब जीवन का अंत आ जाता है, इस सुर-दुर्लभ मनुष्य जीवन को,84 लाख योनियों की यात्रा करने के बाद मिले इस जीवन को खो बैठता है।   

यही है प्रकृति का प्रपंच, जिसमें आम मनुष्य  बेतरह उलझा, उद्विग्न, खिन्न, विपन्न होते देखा जाता है। 

परम पूज्य गुरुदेव ने हम जैसे नादान बच्चों को,वरिष्ठ होते हुए भी अज्ञानी मनुष्यों को समझाने के लिए इसे सिनेमा हाल में पर्दे पर चल रही पिक्चर जैसा बताया है। हमारे साथिओं को पिछले दिनों के वोह दिन स्मरण हो आये होंगें जब इक्क्ठे होकर ग्रुप्स में,पूरा मोहल्ला इक्क्ठे स्पेशल शो देखने जाया करता था। उन दिनों जैसा उत्साह आज तो शायद ही देखने को मिल पाए। उन दिनों सिनेमा का स्पेशल शो देखने का अर्थ मेला देखने जैसा होता था। सीरियस फिल्म हुई तो हाल में सिसकियों की आवाज़ें सुनी जाती थीं,धार्मिक फिल्म हुई तो परदे पर पैसे भी फैंकें जाते थे, सम्पूर्ण रामायण का किस्सा तो सभी को स्मरण होगा जब लोग जूते हाल के बाहिर उतार कर जाते रहे। 

यह दर्शक की आस्था,भावना विश्वास,इन्वॉल्वमेंट दर्शाता है जिससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता लेकिन रियलिटी की बात जब आती है तो इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि यह सारे का सारा कमाल कैमरों का, प्रोजेक्टर का, साउंड सिस्टम का ऐक्टर-डायरेक्टर का रचा हुआ होता है जो दर्शक को न केवल तीन घंटे बांधकर रखता है बल्कि वाहवाही भी लूट लेता है। दर्शक कहाँ समझ पाता है कि यह सारा जाल-जंजाल एक पूरी टीम का फैलाया होता है, उसमें रियल कुछ भी नहीं होता, सब माया है,भ्र्म है, Illusion है,धोखा है। लेकिन दर्शक तो दर्शक ठहरे, उन्हें पर्दे में रेंगती छाया वास्तविक दिखती है। इस मायानगरी से दर्शक इतना प्रभावित हो जाता है कि पाठकों ने अनेकों लोगों को आँसू बहाते, मुस्कराते,आक्रोश व्यक्त करते और आवेश में आते तक देखा होगा। 

ऐसा विचित्र है यह कौतुक-कौतूहल जिसने प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति, अति समझदार कहे जाने वाले मनुष्यों को भी अपने साथ बेतरह जकड़-पकड़ रखा है।

इस दिवास्वप्न (Daydream,Reverie) की माया का पता तब चलता है, जब आँख खुलती है, नशे की खुमारी उतरती है और भगवान् के दरबार में पहुँच कर सौंपे गए कार्य के सम्बन्ध में पूछताछ की बारी आती है। इससे पूर्व यह पता ही नहीं चलता कि जिस माया ने भटकाए रखा, सारा जीवन भर कितनी हावी रही। ऐसे मायाजाल में कोई समझदार तो फँस नहीं सकता केवल वोही फँस सकता है जो सनकी हो,पागल हो,Mentally unstable हो। यहाँ उस क्रिएशन की बात हो रही है जो अपने सिर पर God’s best creation का सेहरा बांधे हुए जगह-जगह फिरता रहता है। गुरुदेव बता रहे हैं कि यही वह भूल-भुलैयों का भटकाव है, जिसे तत्त्वदर्शी,गुरु,ज्ञानी लोग न केवल “मायाजाल” कहते हैं बल्कि उस मायाजाल से  बच निकलने की चेतावनी भी देते रहते हैं। लेकिन उस मनुष्य के दुर्भाग्य को क्या कहा जाये, जो मूर्खता छोड़ने और बुद्धिमत्ता अपनाने की समझ को उगने-उठने ही नहीं देता? सुर दुर्लभ मनुष्य-जीवन की दु:खभरी बर्बादी की यही पृष्ठभूमि है। इस तथ्य को  सपोर्ट करते समय आश्चर्य होता है कि  शिक्षित,अशिक्षित, समझदार, बेअकल सभी अन्धी भेड़ों की तरह एक के पीछे एक चलते हुए गहरे गर्त में गिरते और दुर्घटनाग्रस्त स्थिति में कराहते-कलपते अपना दम तोड़ देते हैं। 

क्या सभी इसी भीड़ में भेड़ों के झुण्ड की भांति गड़रिये की लाठी खाते,हुरड़,हुरड़ (गड़रिये की आवाज़)  सुनते सारा जीवन गुज़ार देते हैं ? नहीं कदापि नहीं !!! महान व्यक्ति, महापुरुष,देवपुरुष छोटे से ही जीवन में ऐसा कर जाते हैं जिन्हें आने वाली अनेकों पीढ़ीओं तक स्मरण किया जाता रहता है। स्वामी विवेकानंद,स्वामी रामतीर्थ ने तो 40 के वर्ष भी नहीं देखे,They never lived 40 years, इस छोटे से जीवनकाल में ही सारी  दुनिया में ज्ञान की ध्वजा फहरा गए।

साथिओ आज के ओपनिंग ज्ञानप्रसाद लेख का यहीं पर समापन होता है। 

जय गुरुदेव  


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