साथिओ “परिवर्तन के महान क्षण” पुस्तिका पर आधारित श्रृंखला का नौंवा एवं समापन लेख गुरुदेव का आश्वासन एवं भविष्यवाणी को वर्णन कर रहा है। मात्र 35 पन्नों की छोटी सी पुस्तिका ने गुरुदेव के मार्गदर्शन में हमसे 9 लेख लिखवा लिए,यह सब कैसे हुआ केवल गुरुवर ही जानते हैं।
आइए, सभी गुरुशिष्यों के स्वागत के साथ आज की गुरुकक्षा का शुभारम्भ करें।
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परम पूज्य गुरुदेव ने वर्ष 1990 की वसन्त पंचमी से “एकान्त स्तर की समूचे समय चलने वाली-समग्र अध्यात्म साधना” का शुभारम्भ किया। इस की जानकारी के बाद जो लोग अभी-अभी युग निर्माण की अभिनव योजनाओं में शामिल हुए थे उन्हें कुछ हड़बड़ी उभरी दिखने लगी। उन्हें यह कठिनाई दिखी कि समर्थ सेनानायक से सीधा सम्पर्क रहने पर जो प्रयास सफलतापूर्वक चल रहे थे, वे आगे किस प्रकार चल पाएँगे? साधन कैसे जुटेंगे? प्रोत्साहन और सहयोग कहाँ से मिलेगा?
गुरुदेव इस विषय पर कहा:
ऐसे सभी लोगों तक सन्देश पहुँचा दिया गया है कि सूक्ष्म स्तर की गतिविधियाँ आरम्भ कर लेने पर भी हम अपने प्रत्यक्ष उत्तरदायित्वों को निभा सकने में समर्थ रहेंगे। वह कार्य स्थूल शरीर द्वारा अपनाई जाने वाली प्रत्यक्ष गतिविधियों जैसा भले ही न हो लेकिन सूक्ष्म चेतना में इतनी क्षमता मानी ही जानी चाहिए कि वह मात्र सूक्ष्म जगत तक ही सीमाबद्ध नहीं रह जाती, उसकी सशक्त भूमिका प्रत्यक्ष जगत को प्रभावित करने में भी निभती रह सकती है।
शान्तिकुंज हमारे प्रत्यक्ष शरीर के रूप में विद्यमान है,उससे सम्बन्धित लोगों को हमारी आवश्यक प्रेरणाएँ और प्रकाश किरणें भी मिलती रहेंगी। इन्हीं किरणों की ऊर्जा और आभा से संसार भर के महत्त्वपूर्ण प्रयोजन गतिशील बने रहेंगे। अगले दिनों सम्भवत: किसी को हमारी अनुपस्थिति अखरेगी नहीं बल्कि वह दृश्य दृष्टिगोचर होगा, जिसमें एक बीज वृक्ष बनकर हजारों-लाखों नए फल पैदा करता है जिनके अंदर अनेकों बीज छिपे रहते हैं । प्रत्यक्ष भूमिका निभाने की कमी को कोई यह न माने कि मृत्यु हो गई। दिव्य तत्त्व कभी मरते नहीं। शरीर बदल लेने पर आत्मसत्ता का अस्तित्त्व नहीं बदल जाता। यदि वह सशक्त हो तो स्थूल शरीर का भार एवं बन्धन हट जाने से वह और भी अधिक गतिशीलता का परिचय देने लगता है। यही कारण है कि भारतीय परम्परा में मात्र जन्मदिवस ही मनाए जाते हैं। मृत्यु दिवस की तो आश्विन पितृपक्ष में ही एक हल्की-फुल्की चर्चा होती हैं।
कैसा संयोग है कि इन पक्तियों को लिखने के मात्र दो दिन पूर्व ही,लेखक को श्राद्ध तर्पण जैसे आयोजन में शामिल होकर इसकी दिव्यता को समझने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
स्वामी रामतीर्थ ने मृत्यु के कुछ ही समय पूर्व ‘‘मौत के नाम खत’’ नाम से एक दस्तावेज लिखा है। वह है तो लम्बा और मार्मिक लेकिन उसका सारांश इतना ही है कि ‘‘शरीर का भार लदा रहने से मैं वह नहीं कर पा रहा हूँ, जो कर सकता था। इसलिए इस वजन के अपने ऊपर से हटते ही हवा के साथ, चाँदनी के साथ, किरणों के साथ, वसन्त वर्षा के साथ मिलकर बहुत उपयोगी बन सकूँगा और अधिक प्रसन्नता भरे उल्लास का रसास्वादन कर सकूँगा।’’
लेख के अंत में स्वामी रामतीर्थ जी की कुछ और बात भी करेंगे लेकिन अभी के लिए गुरुदेव पर ही केंद्रित रहना उचित रहेगा।
गुरुदेव बता रहे हैं :
80 वर्ष जी लेने के उपरान्त और अधिक जीने की इच्छा तो तनिक भी नहीं है लेकिन यदि जीना अपनी मर्जी से न हो सका और मरना कैसे हो सकता है? हमारे नियंता, हमारे गुरु, हमारे मार्गदर्शक की मर्जी ही प्रमुख है। गुरु का निर्देश तो यही कह रहा है कि निश्चित है कि शरीर के बिना भी बहुत कुछ किया जा सकता है और किया जाएगा। इसका पूर्वाभ्यास इन दिनों चल रहा है। एकान्त सेवन के साथ जुड़ी हुई निष्क्रियता दिख पड़ने पर भी यह जाँचा जा रहा है कि स्फूर्तिवान शरीर से लदे रहने पर जितना कुछ करते बन पड़ा करता था कहीं उसमें कुछ कमी तो नहीं आ गई है।
निष्कर्ष यही निकल रहा है कि इस स्थिति में “सीमित को असीमित” बनाने में सहायता मिल रही है। इस आधार पर विश्वास परिपक्व हो गया है कि जीवित रहने की अपेक्षा शरीर न रहने पर समर्थता एवं सक्रियता और भी अधिक बढ़ जाती है। इसी मान्यता के आधार पर प्रज्ञा परिजनों से विशेष रूप से कहा जा सकता है कि आँखों से न दिख पड़ने पर तनिक भी उदास न हों और निरन्तर यह अनुभव करें कि हम उन्हें अधिक प्यार,अधिक उत्कर्ष और अधिक समर्थ सहयोग दे सकने की स्थिति में तब भी होंगे,जब यह पंच भौतिक ढकोसला मिट्टी में मिल जाएगा। जो पुकारेगा, जो खोजेगा उसे हम सामने खड़े और समर्थ सहयोग करते दिख पड़ेंगे।
यहां यह समझना बहुत जरूरी है कि:
“अदृश्य अध्यात्म” की तुलना में “दृश्यमान विज्ञान” की शक्ति किसी भी ओर से कम नहीं है।
इस असमंजस को इतने दिनों जीकर, अभीष्ट प्रयोग की दिशा में निरत रहकर यह भलीभाँति जान लिया है कि “आत्मबल” संसार के समस्त बलों की तुलना में कहीं अधिक सामर्थ्यवान है। विज्ञान की पहुँच तो मात्र जड़ पदार्थों तक है, जबकि अध्यात्म केवल जड़ पदार्थों को ही नहीं, चेतना को भी प्रभावित, परिष्कृत करने में समर्थ है।अध्यात्म को अमृत, पारस, कल्पवृक्ष, कामधेनु आदि आलंकारिक नामों से सम्बोधित किया जाता है। यह चारों सच में Exist करते भी हैं यां नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता,हाँ पुराणों में वर्णन अवश्य है।
“परिवर्तन के महान क्षण” पुस्तिका का समापन गुरुदेव निम्नलिखित भविष्यवाणिओं से करते हैं :
गुरुदेव ऐसा भविष्य देख रहे हैं जहाँ दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन और सदाशयता का अभिवर्धन प्रमुख होगा। इस कार्य को विज्ञान कितने ही प्रयत्न कर लेने पर भी पूरा न कर सकेगा। विश्वास तो यही किया जा रहा है कि लोगों के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का असाधारण मात्रा में अभिवर्धन होगा। जब ऐसा होगा तो वे सभी समस्याएँ अनायास ही सुलझती चलेंगी, जिन्हें इन दिनों सर्वनाशी माना जा रहा है। चेतना में ऐसी शक्ति उभरने पर मनुष्य की भावना और क्रिया-प्रक्रिया में ऐसा आश्चर्यजनक परिवर्तन होगा कि दुरुपयोग में लगी हुई क्षमताएँ सदुपयोग की ओर मुड़ चलेंगी। ऐसा होने पर ऐसे सत्परिणाम उत्पन्न होंगें , जिन्हें “सतयुग की वापसी” का नाम दिया जा सके।
विज्ञान आगे भी अनर्थ पैदा करता रह सकेगा, ऐसी आशंकाएँ किसी को भी नहीं करनी चाहिए क्योंकि खनिज तेल, विद्युत उत्पादन जैसे स्रोत ही सूख जाएँगे, तब विज्ञान कैसे जीवित कैसे रह सकेगा? लोगों को लौटकर फिर प्राकृतिक जीवन अपनाना पड़ेगा जिसमें विकृतियों की वृद्धि की कोई गुंजायश ही नहीं है। विज्ञान तो जीवित रहेगा लेकिन उसका नाम “भौतिक विज्ञान” न होकर “अध्यात्म विज्ञान” हो जाएगा। अध्यात्म तो हजारों वर्ष पुराना है लेकिन वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का फील्ड गुरुदेव ने 1960 के दशक में ही दिया। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद को अपनाते ही वे सभी समस्याएँ सुलझ जाएँगी, जो इन दिनों अत्यन्त भयावह दिख पड़ती हैं। उन आवश्यकताओं को प्रकृति ही पूरा करने लगेगी, जिनके अभाव में मनुष्य अतिशय उद्विग्न, आशंकित, आतंकित दिख रहा है। अगली शताब्दी में न युद्ध होंगे, न महामारियाँ फैलेंगी और न ही जनसंख्या की अभिवृद्धि से वस्तुओं में कमी पड़ने के कारण चिन्तित होने की आवश्यकता पड़ेगी। जागृत नारी अनावश्यक सन्तानोत्पादन से स्वयं इंकार कर देगी और अपनी शक्ति को उन प्रयोजनों के लिए नियोजित करेगी, जो समृद्धि और सद्भावना के लिए अति आवश्यक है। नारी प्रधान 21वीं सदी का वातावरण ऐसा होगा, जिसे सरस्वती (ज्ञान),लक्ष्मी(धन) और दुर्गा (शक्ति) की संयुक्त शक्ति द्वारा अपनाया गया क्रिया-कलाप कहा जा सकेगा। शिक्षा मात्र उदरपूर्णा न रहेगी बल्कि उसका अभिनव स्वरूप व्यक्तियों को प्रामाणिक, प्रखर एवं प्रतिभा सम्पन्न बनाने की अपनी जिम्मेदारी पूरी करेगा।
यह सब कैसे होगा, इसकी प्रत्यक्षदर्शी योजनाओं का स्वरूप पूछने या जानने की जरूरत नहीं है।
अदृश्य जगत में संव्याप्त दैवी चेतना का अनुपात वर्तमान परिस्थितियों की प्राणचेतना के आधार पर असाधारण रूप में उभरेगा और ऐसे परिवर्तन अनायास ही करता चला जाएगा, जिसे वसन्त का अभिनव अभियान कहा जा सके या ‘‘सतयुग की वापसी’’ कहा जा सके। 21वीं सदी का उज्ज्वल भविष्य इन्हीं आधारों को साथ लेकर अवतरित होगा, इन दिनों इसी की पृष्ठभूमि बन रही है। साथिओ इस भाग का समापन आदरणीय गोविंद पाटीदार भाई साहिब की क्रांतिकारी वाणी में प्रज्ञागीत से करना अपना सौभाग्य समझते हैं।
आइए चलते-चलते स्वामी रामतीर्थ के मौत के नाम खत के बारे में भी जान लें।
साथिओं के स्मरण हो आया होगा कि 9 और 10 अगस्त 2021 को हमने स्वामी रामतीर्थ पर दो लेख लिखे थे, उन दिनों उनके उस खत को ढूंढने का बहुत प्रयास किया था लेकिन नहीं मिला। Chatgpt का धन्यवाद् करते हैं कि डिस्क्लेमर के बावजूद इसने आज 2026 में सब कुछ इतना सरल कर दिया है कि वोह खत मिल गया है। यहाँ हम उन लेखों का भी लिंक दे रहे हैं,उन्हें फिर से दोहराने में कोई हर्ज़ नहीं होना चाहिए, डॉ उमाकान्तानंद जी तो बहुत बार कह चुके हैं कि ज्ञान को बार-बार, अनेकों बार पढ़ने से परिपक्वता बढ़ती है,अमृत जितनी बार भी ग्रहण किया जाए,कम ही होगा।
मौत के नाम खत:
मात्र 33 वर्ष की आयु में ही स्वामी रामतीर्थ ने 17 अक्टूबर 1906 (दिवाली के दिन) उत्तराखंड के टिहरी में भिलंगना नदी में जल समाधि ली थी। शरीर त्यागने से ठीक पहले उन्होंने “मृत्यु के नाम एक संदेश” (खत) लिखा था। यह खत उनके “अद्वैत वेदांत” के सर्वोच्च ज्ञान, निर्भयता और अमर आत्मा के आनंद को दर्शाता है।
स्वामी रामतीर्थ का “मृत्यु के नाम” खत
“ओ मृत्यु! तुम चाहो तो इस शरीर को ले जाओ, मुझे इसकी कोई परवाह नहीं है। मेरे पास ऐसे हजारों शरीर और भी हैं। मैं तो बस अपनी पुरानी पोशाक बदल रहा हूँ। तुम मेरे इन हाथों को मुझसे नहीं छीन सकती, क्योंकि मैं हर हाथ से काम कर रहा हूँ। तुम मेरी इन आँखों को बंद नहीं कर सकती, क्योंकि मैं हर आँख से देख रहा हूँ।
ओ मृत्यु! तुम मुझे डरा नहीं सकतीं। तुम सिर्फ इस मिट्टी के ढेर (शरीर) को नष्ट कर सकती हो, मुझे नहीं। मैं तो हवाओं में बह रहा हूँ, मैं ही लहरों में मचल रहा हूँ, मैं ही पहाड़ों की अडिगता हूँ और मैं ही सूरज की रोशनी बनकर चमक रहा हूँ।
मैं ब्रह्मांड का स्वामी हूँ, मैं ही सच्चिदानंद हूँ। तुम आओ और इस पिंजरे को तोड़ दो, पंछी तो कब का उड़ चुका है और वह असीम आकाश का हिस्सा बन चुका है। तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं, क्योंकि मैं अमर हूँ, अजन्मा हूँ और सर्वव्यापी हूँ।”
स्वामी रामतीर्थ का निम्नलिखित संदेश व्यावहारिक वेदांत (Practical Vedanta) का सबसे बड़ा उदाहरण है:
शरीर और आत्मा का भेद: वह मृत्यु को केवल एक पुरानी पोशाक या वस्त्र बदलने जैसा मानते थे। उनके लिए शरीर का अंत, आत्मा का अंत नहीं है।
परम निर्भयता: वेदांत ज्ञान से ओतप्रोत होने के कारण उनके मन में मृत्यु का कोई भय (Fear of Death) नहीं था, बल्कि वे उसे चुनौती दे रहे थे।
सर्वव्यापकता (अद्वैत): उन्होंने स्वयं को केवल एक सीमित शरीर नहीं बल्कि पूरी प्रकृति और ब्रह्मांड की चेतना (Cosmic Consciousness) माना।
समापन

