दादागुरु ने परम पूज्य गुरुदेव को अध्यात्म का कार्य सौंपते हुए अध्यात्म की असाधारण शक्ति का भी बता दिया था लेकिन जिज्ञासु होने के कारण गुरुदेव कहाँ मानने वाले थे, वोह तो इस तथ्य को साबित करने में लगे हुए थे कि क्या भक्ति में सचमुच शक्ति समाई हुई है। यदि ऐसा नहीं है तो पटरी से उतरे इंजन को उठाकर फिर से यथास्थान रख सकने जैसा प्रयोग कैसे बन पड़ेगा? उलटे हुओं को उलट कर सीधा कैसे किया जा सकेगा? युगपरिवर्तन कैसे हो पायेगा? सतयुग की वापसी कैसे हो पायेगी? साथिओ बहुत ही रोचक विषय है, केवल पढ़ने से काम नहीं बनने वाला,घोल कर अमृत की तरह पीकर अमर होना होगा।
आइए गुरुकुल की आज की इस दिव्य गुरुकक्षा का शुभारम्भ गुरुचरणों में समर्पित होकर करें जहाँ किसी भी जिज्ञासु,धर्मनिष्ठ को सादर निमंत्रण है।
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शरीरबल, सम्पत्तिबल, बुद्धिबल, पद और सहायकों का बल बहुत समय से श्रेय एवं चर्चा के अधिकारी रहे हैं लेकिन यह भी भुलाया नहीं जाना चाहिए कि “आध्यात्मिक साधना के सहारे उपजने वाला “आत्मबल” भी कोई छोटा-मोटा बल नहीं है।” यह एक ऐसा बल है जिसके लिए किसी भी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। अध्यात्म के क्षेत्र में यदि कोई गड़बड़ी है तो वह मात्र इतनी ही है कि इस महत्वपूर्ण पौराणिक प्रक्रिया के साथ जुड़े सिद्धान्तों को भुला दिया जाता है और कुछ मंत्र/यंत्र/तंत्र से ही गगनचुम्बी उपलब्धियों की आशा की जाने लगती है, हवाई किलों के सपने लिए जाने लगते हैं। इस तरह के अध्यात्म से सफलता तो कोसो दूर ही रहती है, मिलती है तो केवल निराशा एवं नास्तिकता। ऐसी प्रवृति के लोग केवल अपने व्यक्तिगत लाभ तक ही सीमाबद्ध रहते हैं ।
अध्यात्म प्रक्रिया में जब स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ उभर कर आता है तो मनुष्य संकीर्णता में इतना अधिक लिप्त हो जाता है कि उसकी दूसरी दुष्प्रवृत्तियाँ न केवल इसी आधार पर पनपती हैं बल्कि प्रतक्ष्य प्रकट भी होती दिखती है। अध्यात्म क्षेत्र मेें जो लोग ऐसी स्वार्थी रीति-नीति अपनाते हैं, उनकी गरिमा भी एक प्रकार से समाप्त हो जाती है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से कभी भी स्वार्थ की बात नहीं हुई है, यह सबका मंच है, यहाँ न केवल परिवार की भावना परिभाषित ही होती है बल्कि उस भावना का पालन भी किया जाता है, इस भावना के अनेकों उदाहरण अनेकों बार देखे जा चुके हैं। यहाँ पर सबकी बात होती है न कि किसी एक की। गायत्री मंत्र में भी तो “हमारी बुद्धि” को प्रेरित करने की बात की गयी है,न कि “मेरी बुद्धि” की। मेरा-मेरा,मैं-मैं करने वाली भेड़-बकरियां बहुत मिल जाएँगी,यहाँ तो स्वः से सर्व की ही बात होती है।
अपने, स्वयं के लिए स्वर्ग मांगना, ऋद्धि-सिद्धि मांगना, चमत्कारों के लिए नाक रगड़ना , प्रदर्शन-विज्ञापनबाजी के लिए फेसबुक जैसी अनेकों शक्तियों का प्रयोग करते रहना,वायरल होने के लिए कुछ भी अश्लील तक करते रहना, छोटे-छोटे अनेकों सोशल मीडिया साइट्स ग्रुप्स से अपनेआप की प्रशंसा करवाते रहना,पूजा बटोरना, स्वयं को भगवान के एजेण्ट बताकर ओछे लोगों की ऐसी मनोकामनाएँ पूरी कराने का आश्वासन देना जो उनकी पात्रता से बाहर हों, सारी जगह ऐसे ही लोगों का ही तो बोलबाला है। अध्यात्म की आड़ में कुछ लोगों ने तो भगवान् के एजेंट बनने को एक तरफ छोड़ कर,खुद को भगवान ही सम्बोधित करवाना शुरू कर दिया। ऐसी बातें जिनके मनोरथों में सम्मिलित हो जाएँ तो समझ लेना चाहिए कि उनकी पूजा-आराधना, भजन,कर्मकाण्ड सब ओछे स्तर के हैं। इस ड्रामेबाज़ी से उच्चस्तरीय अध्यात्म पक्ष की गरिमा बढ़ेगी नहीं बल्कि घटेगी ही, अध्यात्म को इस स्थिति तक गिराने में ऐसे ओछे लोगो का बहुत बड़ा योगदान रहता है। ईश्वर के निकटवर्ती संबंधी बनना, ईश्वर को दर्शन देने के लिए तरह-तरह के प्रपंच करना, उनकी कचहरी के दरबारी बनकर सामीप्य-सान्निध्य जैसी मुक्ति का मजा लूटना, औरों से अपने को वरिष्ठ होने की मान्यता बनाना ऐसा ओछापन है जो किसी भी वास्तविक भगवद् भक्त का अनुगामी बनने वाले को तनिक भी शोभा नहीं देता। ऐसे तथाकथित अध्यात्मवादिओं की स्थिति सेठ, साहूकार, राजनेता,फाइव स्टार होटलों में मौज मज़ा करने वालों जैसी होती है। अमीर लोग भी सेवक, चाकर, चारण और चमचों को इनाम-इकराम बाँटते रहते हैं। ऐसे बनावटी अध्यात्मवादिओं को साधक-उपासक कहना ही गलत है। टीवी का बटन दबाओ,ऑन करो, ऐसे अध्यात्मवादिओं की बाढ़ ही लग जाएगी
गुरुदेव बता रहे हैं कि सच्चा अध्यात्मवादी लोकसेवी ही हो सकता है। जनसाधारण की समस्याओं के सामाधान में यदि अध्यात्म का प्रयोग नहीं होगा तो श्रेष्ठता कैसे पनपेगी, दुष्टता कैसे निरस्त होगी। संवेदनहीनता की इस स्थिति में भगवान् का सूखा हुआ, कुम्हलाता हुआ, नष्ट-भ्रष्ट होता उद्यान ही पनपेगा, धरती पर स्वर्ग के अवतरण की बात करना फिज़ूल होगा। ऐसी स्थिति से उभरने के लिए ही गुरुदेव मूर्धन्यजनों को जगाने की बात करते हैं क्योंकि औरों से तो कोई आस रही नहीं है। कुछ दिन पहले आदरणीय गोविंद पाटीदार जी की क्रांतिकारी वाणी में “मूर्धन्यों जागो” प्रज्ञागीत का अमृतपान किया था, आज आदरणीय ओंकार पाटीदार जी की दिव्य एवं क्रांतिकारी वाणी में एक बार फिर से चार्ज होने का, स्वयं को पहचानने का अवसर मिल रहा है। परिवर्तन के जिन क्षणों की वर्तमान लेख श्रृंखला में बात हो रही है,ओंकार जी उसी परिवर्तन के लिए हम सभी को बुला रहे हैं,जगा रहे हैं https://youtu.be/AvbYUNQV0zU?si=90P_z3oHYxijPbC9
परम पूज्य गुरुदेव भी इसी बात पर बल दे रहे हैं कि यदि मूर्धन्य लोग लोकमंगल को अपने कर्तव्य क्षेत्र में सम्मिलित नहीं करेंगे, तो फिर उत्कृष्टता,आदर्शवादिता,सुख-शान्ति और प्रगति के लिए नितान्त आवश्यक सहयोग, सद्भाव, संयम, सदाचार का वातावरण ही न बन सकेगा। प्रत्यक्षवाद और बढ़े हुए वैभव से जो अनाचार बढ़ा है,उस पर अंकुश लगाने के लिए “अध्यात्म तत्त्वज्ञान के पक्षधरों को अगले मोर्चे पर,अगली पंक्ति में ही खड़ा होना चाहिए, यहीं पर उनका स्थान है।” यदि मूर्धन्य इस दिशा में ज़रा सी भी कोताही बरतते हैं तो उनमें और जिन औरों की बात हो रही है, में क्या अंतर् रह जायेगा। पिछले किसी लेख में मूर्धन्य की परिभाषा का वर्णन किया था,उस हिसाब से ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का प्रत्येक साथी मूर्धन्य है ,जिस श्रद्धा और विश्वास से, निस्वार्थ भाव से अपना कर्तव्य निभाया जा रहा है, कोई भी उन्हें ऋषिकल्प योगी,तपस्वी की मान्यता दे सकता है। यह शब्द यूं ही नहीं लिखे जा रहे, आज के युग में इस तरह का परिवार मिल पाना कितना दुर्लभ है, सभी जानते हैं।
गुरुदेव के मार्गदर्शक एवं गायत्री परिवार के दादागुरु परम पूज्य सर्वेश्वरानन्द जी ने उपरोक्त बातें उसी समय समझा दी थीं जब गुरुदेव को इस दिशा में बढ़ने का आदेश दिया था। उसी समय दादागुरु ने यह भी संकेत दे दिया था कि अध्यात्म असाधारण शक्ति लिए हुए है। सैद्धान्तिक तत्त्वज्ञान की दृष्टि से तो यह समझा जा सकता है कि आदर्शवादिता के पालन में अध्यात्म सहायक है लेकिन उससे यह सिद्ध नहीं होता कि अध्यात्म में कोई “असाधारण शक्ति” का भी वास है जो बुराइयों से निपटने और अच्छाइयों को बढ़ाने के लिए “असाधारण परिवर्तन” लाने में समर्थ हो सके। यदि वह विशेषता सिद्ध न की जा सकी तो कोई बड़ा प्रयोजन साधने की आशा नहीं की जा सकती,अध्यात्म प्रक्रिया भी एक धर्मिक कार्य मात्र ही बन कर रह जाएगी, खासकर तब जब संसार में पतन का ही बोलबाला है। इन दिनों बढ़ते हुए पतन की ओर बहते प्रवाह को रोकने और उसे उतनी प्रचण्डता के साथ सृजन प्रयोजनों के लिए नियोजित करना नितान्त आवश्यक प्रतीत हो रहा है। वैयक्तिक प्रखरता उपलब्ध करने के लिए भी ऐसी ही शक्ति चाहिए। वह शक्ति इन दिनों पर्याप्त नहीं मानी जा सकती जो मात्र परलोक (जिसे किसी ने देखा तक नहीं है) की, परोक्ष जगत की ही चर्चा करे और इस लोक को सुधारने, सँभालने, उठाने और सुख-शान्तिमय बनाने में काम न आ सके। यदि उलटे हुओं को उलट कर सीधा करने का संकल्प लिया हुआ है तो आज की परिस्थितिओं में ऐसी ही भक्ति की आवश्यकता है जो शक्ति से भी परिपूर्ण हो। आँख मूँद कर,बिना सोचे-समझे,बिना किसी Explanation के मंत्र जाप, सत्संग,यज्ञ आदि को कोई कहाँ मानने वाला है, आज का मनुष्य तो तर्कों का पराकाष्ठा पर उड़ रहा है, उसे समझाने के लिए कोई ठोस और सार्थक प्रक्रिया चाहिए।
गुरुदेव बता रहे हैं कि अपने मन में भी असमंजस बना ही रहा कि भक्ति का सम्बन्ध मात्र भाव-संवेदनाओं तक ही सीमित तो नहीं है। क्या भक्ति की पूर्णता शक्ति से संयुक्त होने में ही है? क्या इस तथ्य की भी जाँच-पड़ताल करनी चाहिए कि सच में भक्ति में इतनी शक्ति है क्या जो भौतिक विज्ञान द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली उपलब्धियों की तुलना कर सके। यह भी जानना बहुत ही महत्वपूर्ण होगा कि अब तक की विकृतियों को उलट कर उसके स्थान पर उपयोगी वातावरण कैसे प्रस्तुत किया जा सके। उपासना क्षेत्र में कदम तो बढ़े लेकिन यह अदम्य अभिलाषा भी बनी रही कि जैसा कहा जाता है, अध्यात्म में वैसी शक्ति भी तो होनी ही चाहिए नहीं तो पटरी से उतरे इंजन को उठाकर फिर से यथास्थान रख सकने जैसा प्रयोग कैसे बन पड़ेगा?
मार्गदर्शक ने गुरुदेव की उत्सुकता और जिज्ञासा के औचित्य को समझा, साथ ही उसमें अपने निजी उत्कर्ष को भी जोड़ दिया। उन्होंने बता दिया कि समय का प्रवाह बदल सकने वाली किसी ऐसी शक्ति का उद्भव होना चाहिए, जो महाक्रान्ति स्तर का युग बदलने जैसा महान परिवर्तन प्रस्तुत कर सके। सोचने वालों ने सोचा होगा कि किसी को तो आगे आना ही होगा, किसी के कन्धों पर तो यह भार डालना ही होगा। भार डालने के लिए पात्रता तो सुनिश्चित करनी ही होगी,कोई ऐसी वैसी पात्रता नहीं बल्कि जिसके पास जन्म-जन्मान्तरों की सुसंस्कारिता संचित है, उसे ही क्यों न पूर्ण विश्वासी बनाया जाए। ऐसी पात्रता वाले को ही आधुनिक प्रत्यक्षवादी वातावरण की अनास्था को आस्था में बदलने की आवश्यकता को पूरा करना होगा। जिज्ञासु (गुरुदेव) की उत्कण्ठा और शक्ति स्रोत की सहमति का समन्वय बन जाने से ऐसे कदम उठे, ऐसे प्रयोजन सिद्ध हुए, जिनके आधार पर भविष्य निर्माण की दिशा में बड़ा प्रयोजन सधने की आशा किरणें उदय होने लगीं।
परम पूज्य गुरुदेव ने “भक्ति में शक्ति” का सम्मिश्रण होने के कई अनुभव किए और चमत्कार देखे। इन अनुभवों का सिलसिला तब से चला,जब किसी के सामने हाथ पसारे बगैर ऐसे प्रयोजन पूरे कर गुजरने के लिए असाधारण स्तर का जनबल और धनबल अभीष्ट था।
तो साथिओ यह होता है भक्ति में शक्ति का चमत्कार।
जय गुरुदेव
