अगर साधक की भक्ति सच्ची एवं निस्वार्थ है तो ईश्वर भी उसमें साथ देने से पीछे नहीं हटते हैं। परम पूज्य गुरुदेव की जीवन झांकी पर दृष्टि दौड़ाने पर यह तथ्य इतना सार्थक दिखता है कि शंका की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती। 15 वर्ष की आयु में दादागुरु द्वारा सौंपे गए कार्यों को पूर्ण निष्ठा एवं समर्पण से सम्पन्न कराने के बाद ही दादागुरु उन्हें अंतिम समय तक ऐसे-ऐसे कार्य सौंपते रहे जिनके लिए आश्चर्यजनक,अविश्वसनीय किन्तु सत्य ही कहना उचित प्रतीत होता है। सफलताएं होती गयीं, दादागुरु के प्रति गुरुदेव का श्रद्धा-विश्वास और भी परिपक्व होता गया, हम तो कहेंगें कि गुरुदेव के इंटरव्यू होते रहे, सिलेक्शन होती रही,पात्रता की Evaluation होती रही,बड़ी से बड़ी ज़िम्मेदारी मिलती रही, श्रेय मिलता रहा -किसी प्रोजेक्ट की सफलता की यही तो कार्यप्रणाली है, करती कोई अदृश्य शक्ति है और श्रेय मिलता है नगण्य से कार्यकर्ता को।
आज के लेख में भौतिक जगत की उपलब्धिओं की सराहना अवश्य की गयी है लेकिन इस बात की भी निंदा की गयी है कि ऐसा कोई आधार नहीं प्रस्तुत किया गया जिससे “मानसिक क्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों का निराकरण हो सके और मानवी व्यवहार में सद्भावना का अभिवर्धन हो सके।” विषवृक्ष की कुछ एक पत्तियां तोड़ने से कुछ नहीं बनेगा,बीमारी को जड़ से ही काटना पड़ता है। बीमारी को जड़ से ही काट फेंकने के लिए दादागुरु ने वर्ष 1990 के वसन्त से सूक्ष्म जगत में भावनात्मक परिवर्तन लाने के लिए विशिष्ट स्तर की तप-साधना करने के लिए निर्देश दिया। इस साधना के बारे में तो सोमवार को समापन लेख प्रस्तुत होगा लेकिन आज के ज्ञानप्रसाद लेख के अमृतपान के लिए सभी समर्पित साथिओं को सादर निमंत्रण है। कल ही प्रकाशित हुई, “अमृत” शब्द की व्याख्या करती आदरणीय डॉ उमाकान्तानंद जी की शार्ट वीडियो हमारे साथिओं ने अवश्य देखी होगी।
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गुरुदेव बता रहे हैं :
1958 के सहस्रकुण्डीय महायज्ञ के सफल प्रयोग परीक्षण ने हमारी श्रद्धा-विश्वास को असंख्य गुना बढ़ा दिया और बाद में निर्देशित हुए कामों का सिलसिला चल पड़ा, जिनका उल्लेख पहले भी हो चुका है। साहित्य सृजन, संगठन, केन्द्रों की खर्चीली व्यवस्था, अभावग्रस्तों की सहायता जैसे काम इस प्रकार चलते रहे, मानो वे सभी कार्य हमने नहीं किसी दूसरे ने किए हों और अपने सिर पर श्रेय अनायास ही लद गया हो। यह वैयक्तिक सफलता का प्रसंग नहीं माना जाना चाहिए कि यह किसी के पुरुषार्थ का प्रतिफल सामने आया बल्कि यह समझा जाना चाहिए कि “भक्ति के साथ शक्ति” का भी अटूट सामंजस्य हैं। निर्देशक द्वारा प्रदान की गई शक्ति अपने संकेतों पर चलने वाले समर्पित व्यक्ति के लिए वैसी ही व्यवस्था करती है जैसी कि मोर्चे पर लड़ने जाने वाले सैनिक के लिए सेनापति आवश्यक सुविधा सामग्री का प्रबन्ध करवाता है। सेनापति जानता है कि सैनिक से विजय प्राप्त करवाने के लिए उपयुक्त साधन सुनिश्चित करना कितना महत्वपूर्ण है।
हमारे डायरेक्टर ने पहले छिटपुट कामों को संपन्न करने में हमारे सामर्थ्य का मूल्यांकन किया,जब हम उस बेसिक टेस्ट में पास हुए उसके बाद ही उसने हमारी कठपुतली में इतनी क्षमता भर दी कि कठपुतली मात्र संकेतों के इशारे भर से मनमोहक नृत्य अभिनय करने के योग्य बन पड़ी। मार्गदर्शक ने जब इशारों से भी कार्य समझने और करने की सामर्थ्य देख ली तो फिर क्या था? उसने तो हमारे ऊपर वोह भारी वजन लाद दिया जिसे सम्पन्न करने की कल्पना कोई व्यक्ति विशेष तक नहीं कर सकता, जिसे वह अदृश्य सत्ता ही कर सकती है। अदृश्य शक्ति ने इतना बड़ा पसारा बनाकर खड़ा कर दिया कि उसने एक सीमा तक तो नटखटपन/व्यंग विनोद बरतने तक की छूट भी न दी। इतनी ज़िम्मेदारी देने वाली अदृश्य शक्ति जब देखती है कि हम किसी कारणवश मर्यादा से बाहर जा रहे हैं तो कान पकड़कर सीधी राह अपनाने के लिए न केवल बाधित ही करती रही बल्कि प्रताड़ित भी करती रही।
अपने मार्गदर्शक द्वारा प्रदान की गयी ऐसी Grooming को ही युग परिवर्तन की पृष्ठभूमि कहा जा सकता है। मार्गदर्शक ने 21वीं सदी-उज्ज्वल भविष्य की परिकल्पना, महाक्रान्ति की अभूतपूर्व परियोजना की नींव हमारी इन्हीं योग्यताओं के देखकर रखी होगी। कमांडर-इन-चीफ को यह सुनिश्चित भी करना होता है जिसके भरोसे युद्व का बिगुल बजाया जाएगा वोह चीफ को निराश तो नहीं करेगा। प्रस्तुत प्रयोजन के लिए जितना कुछ दृश्य रूप में मानवी प्रयत्नों के अन्तर्गत सम्भव था, उसे युग निर्माण योजना के अन्तर्गत पिछले कई वर्षों से किया जाता रहा है। उसमें जो सफलता मिली है, वह लगभग इसी स्तर की मानी जा सकती है जितनी कि मानवी पुरुषार्थ के अंतर्गत आने की परिकल्पना की जा सकती है। मानवी पुरुषार्थ के साथ जब साधना का समन्वय हो जाता है तो संसार के इतिहास में बहुत कुछ ऐसा बन पड़ता है जिसे “असाधारण” के साथ-साथ आश्चर्यजनक ही कहा जा सकता है। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि जिस प्रकार मिशन के दृश्य प्रयास बन पड़े हैं, उस प्रयास से जो प्रतिफल सामने आए, उन्हीं में युगपरिवर्तन को भी गिना जा सकता है। लेकिन यहाँ चिंतन का विषय यह है कि जितना काम किया गया है उससे हजार-लाख गुना और करना अभी बाकी है। बाकी रहा वोह काम है जिसका सम्बन्ध अदृश्य/सूक्ष्म जगत से है। इस अदृश्य कार्य की जड़ें चेतना क्षेत्र के सूक्ष्म जगत में असाधारण गहराई में घुसी हुई हैं, विकृतियाँ भी अभूतपूर्व हैं। इन विकृतिओं के निवारण के लिए जो बदलाव/परिवर्तन/ परिष्कार प्रस्तुत किया जाना है, वह भी ऐसा है जिसे अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है।
भूतकाल में भी अनीति के नाश और नीति की स्थापना की क्रिया साथ-साथ चलती रही है लेकिन वोह स्थिति आज की स्थिति से बिलकुल अलग थी। भूतकाल में साधनों और वाहनों के अभाव में दुनियाँ इतनी निकट नहीं आई थी कि समस्त संसार को एक ग्लोबल विलेज (Global village) की तरह आँका जा सके। आज की स्थिति तो ऐसी है कि विश्व के किसी भी कोने में, कोई भी घटना घटती है तो कुछ ही सेकण्ड्स में सारी दुनिया में जंगल की आग की तरह फैल जाती- Thanks to social media, Thanks to Starlink. स्टारलिंक ने तो कई एयरलाइन्स में फ्री Wi-Fi की सुविधा भी प्रदान करा दी है जिससे ज्ञानप्रसाद वितरण जैसे कार्यों के साथ-साथ सभी कार्य हो सकते हैं। कहने का अर्थ यही निकलता है कि गुरुदेव की युगनिर्माण योजना का दायरा विश्व्यापी हो चुका है, वोह अब केवल शांतिकुंज तक ही सीमित न रहकर विश्व भर में 24/7/365 कार्यरत है, दिन रात का तो कोई चक्र ही नहीं है, कभी भी कोई कार्य किया जा सकता है। परम पूज्य गुरुदेव को युगदृष्टा ऐसे ही नहीं कहा जा रहा, 36 वर्ष पूर्व लिखी पुस्तिका “परिवर्तन के महान क्षण”, जिस पर वर्तमान लेख श्रृंखला आधारित है में उन्होंने लिख दिया था कि
आज के समय का परिवर्तन इतने व्यापक और विस्तृत स्तर का, इतना उलझा हुआ एवं इतना विशाल है कि उसे अब तक के परिवर्तनों की तुलना में अद्भुत, अनुपम एवं अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है। इस अभूतपूर्व कार्य के लिए, हल्के-फुल्के प्रयासों से काम नहीं चलेगा बल्कि वोह प्रयास इतने प्रबल, इतने प्रचण्ड, इतने सशक्त और इतने व्यापक होने चाहिए जिन्हें असाधारण ही कहा जा सके।
विज्ञान के पक्षधरों ने दुनियाँ को अधिक सुखद बनाने के लिए कोई कम परिकल्पनाएँ नहीं की हैं। उन्होंने असाधारण ढाँचे खड़े करने, अद्भुत प्रयोग करने, साधन जुटाने के लिए कम माथा-पच्ची नहीं की है लेकिन उन सबमें “एक ही कमी रही” है कि वे भौतिक क्षेत्र में ही टककरें मारते रहे, भौतिक उपचारों से ही सुधार लाने की बात पर विश्वास करते रहे । आकाश पर कब्जा कर लेने, समुद्र क्षेत्र पर आधिपत्य जमा लेने, प्रकृति-सम्पदाओं में से और भी अधिक छीन लेने, अनुपयुक्त को नष्ट करने वाले उपकरण ढूँढ़ने, सम्पदा-संवर्धन के नए स्रोत खोज निकालने जैसी योजनाएँ बनाते रहे। ऐसी योजनाओं पर कार्य करते रहे जिन्हें 21वीं सदी की समुन्नत योजनाएँ कहा जाता है। अधिकतर लोग विश्वास भी करते हैं कि भौतिक विज्ञान अति समर्थ है, उसने अब तक एक से बढ़कर एक उपलब्धियाँ प्रस्तुत की हैं, अपने आविष्कारों से जादूलोक जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं तो भविष्य के लिए उनकी सोची गयी योजनाएं क्यों पूर्ण नहीं होंगी?
इसी प्रगतिशील झलक-झांकी के दूसरे पक्ष पर भी दृष्टि दौड़ाना उचित लगता है कि वैज्ञानिकों ने भौतिक उपलब्धियों से कुछ एक समर्थों के लिए बढ़-चढ़कर सुविधा-साधन उपलब्ध कराने के अतिरिक्त और कोई ऐसा आधार प्रस्तुत नहीं किया है, जिससे “मानसिक क्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों का निराकरण हो सके और मानवी व्यवहार में सद्भावना का अभिवर्धन हो सके।” ऐसी दशा में आगे भी विज्ञान के आधार पर जो और भी प्रगति होगी, वह वर्तमान प्रचलन को ही उत्तेजित करेगी। उसमें मानवी उत्कृष्टता का न तो कोई पक्ष जुड़ सका होगा और न ही ऐसा कुछ बन पड़ने की सम्भावना है। ऐसी कोई योजना नहीं दिख रही जिससे जनसाधारण को “मानवी गरिमा की मर्यादाओं में अनुबन्धित किया जा सके।” यदि ऐसा न बन पड़ा, तो सम्पन्नता और समर्थता के साथ-साथ अनीति भी बढ़ती ही जाएगी और प्रस्तुत प्रगति योजनाएँ भयानकता के इलावा और कुछ उपलब्ध न कर सकेंगी।
जिन समस्याओं की बात यहाँ हो रही है ,सभी प्रत्यक्षवाद के साथ जुड़ी हुई अनैतिकता के कारण उत्पन्न हुई हैं। जड़ को काटे बिना विषवृक्ष की कुछ एक पत्तियाँ तोड़ देने भर से क्या कुछ बनने वाला है? एक नाम रूप वाली विपत्तियाँ दूसरे नाम रूप से सामने आएँ, इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक उपचारों से और कुछ परिवर्तन बन पड़ने वाला नहीं है। डॉक्टर लोग यही तो कर रहे हैं, एक बीमारी में ली जा रही दवा के साइड इफ़ेक्ट का निवारण करने के लिए और कोई नई दवाई सुझा देते हैं। जड़ तक जाने का,बीमारी को जड़ से ख़तम करने का तो को प्रयास ही नहीं हो रहा।
यहाँ पर पुरातन सतयुग का स्मरण आना स्वाभाविक है जब आज की तुलना में साधनों की कहीं अधिक कमी थी लेकिन सद्भावनाओं के समुन्नत रहने पर लोग उस स्थिति में भी इस प्रकार रह लेते थे जिन्हें आज भी इतिहासकार स्वर्गतुल्य होने का प्रतिपादन करते हैं। उन परिस्थितियों का जन्म तपस्वियों द्वारा सूक्ष्म जगत का परिष्कार, चेतना-क्षेत्र का परिष्कार कर सकने पर ही सम्भव हुआ था। आज भी वही एकमात्र विकल्प है, जिसे अपनाकर मनुष्य की देवोपम सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को उभारा जा सकता है। इसी अवरोध के कारण उत्पन्न हुई सभी विकृतियों का, सभी समस्याओं का समाधान हो सकता है।
सतयुग को ऋषियुग भी कहा जाता रहा है। ऋषियों के पास तपोबल ही एकमात्र शस्त्र था। गुरुवर बता रहे हैं कि पिछले 50 वर्षों में इतने सहयोगी,अनुगामी उत्पन्न हुए हैं कि उनके ऊपर भौतिक स्तर पर महाक्रान्ति की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है और हमें उच्चस्तरीय तपश्चर्या के लिए अवसर मिल सकता है।
सो हमारे लिए मार्गदर्शक से, वर्ष 1990 के वसन्त से एकमात्र कार्य सूक्ष्म जगत में भावनात्मक परिवर्तन लाने के लिए आज की परिस्थितियों के अनुरूप विशिष्ट स्तर की तप-साधना करने का निर्देश मिला है। सो, उसी दिन से उस प्रयोग को तत्काल अपना लिया गया है। सैनिक जैसा अनुशासन पालने वाले के लिए और कोई ननुनच करने जैसा विकल्प है भी तो नहीं है।
जय गुरुदेव
