वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

गुरुदेव की सिद्धियां,गुरुदेव के ही शब्दों में 

आज के लेख के बारे में गुरुदेव लिखते हैं कि इस चर्चा को अप्रासंगिक, अनावश्यक और अहंकार स्तर का उल्लेख न समझा जाए क्योंकि कहने को तो बहुत कुछ है इसीलिए जीवन भर के लम्बे प्रसंग को ऐसे जिज्ञासु बच्चों के लिए छोड़ दिया है जो शरीर न रहने पर कुछ और खोजने-जानने  के लिए उत्सुक होंगे।

आज के लेख में गुरुदेव ने अपने शरीर को एक प्रयोगशाला मान कर जो प्रयोग किए उनसे  जी सिद्धियां (गुरुदेव स्वयं सिद्धिओं की बात कर रहे हैं) प्राप्त हुईं उनका एक बहुत ही संक्षिप्त सा विवरण है। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद जिससे बहुचर्चित Scientific spirituality कहा जा रहा है एक सोची,समझी परखी गयी प्रक्रिया है, ठीक तरीके से अभ्यास करने पर सिद्धियां प्राप्त हो सकती हैं,इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं के लिए कोई बड़ी छलांग लगाने की ज़रुरत नहीं है, जितनी समर्था है उतना ही कर लें तो प्रत्येक पाठक के परिवार में स्वर्ग का अवतरण सुनिश्चित है,यह हमारा व्यक्तिगत अनुभव एवं दावा है। ऐसा इसलिए कहना अनुचित नहीं है कि गुरुदेव जिसे “जीवन साधना” कह रहे हैं उसके  एक-एक शब्द पर चिंतन करने पर पता चल जायेगा कि वोह कैसी प्रवृति के प्राणी थे/हैं, रहन-सहन न्यूनतम,खान-पान न्यूनतम,वस्त्र न्यूनतम स्तर के,महत्वाकाँक्षा न के बराबर, ऐसे हैं हमारे परम पूज्य गुरुदेव। गुरुदेव के बारे में लोगों को बताना हम बच्चों का ही कर्तव्य है,इसके लिए ज्ञानप्रसाद लेखों से बढ़कर कौनसा सरल उपकरण हो सकता है।  

आइए आज के लेख का शुभारम्भ गुरुवर के ही शब्दों में ही करें।

****************  

उपासना का अपना प्रयोगक्रम चला और उसे अनेकानेक परीक्षणों की कसौटियों पर कसे जाने के उपरान्त सही एवं सशक्त पाया गया। इसी आधार पर अब यह सोचने, कहने और करने की व्यवस्था बन गई है कि संसार को एक नया सन्देश दिया जा सके कि “उपेक्षित, तिरस्कृत, विडम्बनाग्रस्त अध्यात्म” को यदि पुनर्जीवित किया जा सके तो विश्व चेतना के साथ एक उच्चस्तरीय माहौल जुड़ सकता है। तब भौतिक विज्ञान के लिए भी यह न सोचना पड़ेगा कि वह लाभ देने की तुलना में हानि, विनाश के अधिक सरंजाम जुटाता है। इसलिए उसके उपयोग को आशंका एवं भयानकता के साथ जुड़ा हुआ न सोचा जाए। वस्तुत: बढ़े हुए विज्ञान के चरणों को आध्यात्मिक प्रगति के साथ जोड़ा जा सके तो हम भूतकाल के सतयुग की अपेक्षा और भी अच्छी स्थिति में पहुँच सकते हैं।यों जिस तरह नया आधार सँजोया गया है, उसे देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि हम अगले दिनों और भी अधिक ऊँचे स्तर का ‘‘महासतयुग’’ इसी धरती पर उतारकर रहेंगे।

आज के  समय का मनुष्य बहुत बौना है। इस बौनेपन को संकीर्ण स्वार्थपरता के रूप में भी लिया जा सकता है। स्वार्थ इतना अधिक होता रहा है कि वैज्ञानिक उपलब्धियों को भी संकीर्ण-स्वार्थों के लिए तथाकथित समर्थ लोगों ने प्रयोग करके असंख्य समस्याएँ उत्पन्न कीं। विज्ञान की ही तरह लूले-लंगड़े अध्यात्म का भी अपने अथवा अपनों की सम्पन्नता, यशलिप्सा, असाधारण सफलता आदि के लिए ही प्रयोग होता रहा। तथाकथित सिद्ध पुरुष भी अपने को वरिष्ठ सिद्ध करने और जिन कुपात्रों ने उन्हें जिस तिस प्रकार प्रसन्न कर लिया, उन्हें उस अध्यात्म द्वारा अधिकाधिक सम्पन्न बनाने में लगे रहे। उस अनुदान का उपयोग निजी विलासिता एवं महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के अतिरिक्त किसी लोकोपयोगी काम में न हो पाया।

गुरुदेव स्वयं किये गए प्रैक्टिकल के बारे में बता रहे हैं:

अपने प्रयोग में आरम्भ से ही यह व्रतशीलता धारण की गई कि परम सत्ता के अनुग्रह से जो भी मिलेगा उसे उसी सत्ता के विश्व उद्यान को अधिक श्रेष्ठ, समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए ही खर्च किया जाता रहेगा। अपना निजी जीवन मात्र ब्राह्मणोचित निर्वाह भर से काम चला लेगा। औसत नागरिक स्तर से बढ़कर अधिक सुविधा,प्रतिष्ठा आदि किसी ललक को पास में न फटकने दिया जाएगा।

इस प्रयोग के अन्तर्गत,लिए गए संकल्प का पालन करते हुए,अपना आहार-विहार वस्त्र-विन्यास, रहन-सहन व्यवहार,अभ्यास ऐसा रखा गया जो न्यूनतम था। आहार इतना सस्ता जितना कि देश के गरीब से गरीब व्यक्ति को मिलता है। वस्त्र ऐसे जैसे कि श्रमिक स्तर के लोग पहनते हैं, महत्त्वाकांक्षा बिलकुल ही न्यूनतम, आत्म प्रदर्शन ऐसा जिसमें किसी सम्मान, प्रदर्शन और अखबारों में नाम छपवाने  जैसी ललक के लिए कोई गुंजायश न रहे, व्यवहार ऐसा जैसा बालकों का होता है। ऐसी  पृष्ठभूमि बना लेने के उपरान्त शारीरिक और मानसिक श्रम इतना जितना कि कोई पुरुषार्थ परायण कर सकता है, “इसे पूजा उपासना तो नहीं पर जीवन-साधना अवश्य कहा जा सकता है।”

इसके उपरान्त “उपासना की निर्धारित पद्धति” की बारी आई। उसमें श्रद्धा-विश्वास का गहरा पुट रहा और इस बात का हमेशा ही पालन करते रहे कि हमारे लिए उपासना से अधिक आवश्यक कोई काम है ही नहीं। हमारा चिन्तन निजी लाभ का नहीं, परमार्थ भलाई  ही रहा। यही कारण है कि अपने पास निजी कहे जाने योग्य एक कानी-कौड़ी की भी कोई संचित सम्पदा नहीं है। पैतृक सम्पदा बहुत बड़ी थी लेकिन उसका भी एक-एक पैसा उपयोगी परमार्थिक कार्यों  में लगा दिया। यह सारा जंजाल सिर पर से उतर जाने के उपरान्त, विषयों एवं पदार्थों से मोह चले जाने के बाद मन इतना खाली हो गया कि  उस वैक्यूम को भरने के लिए ईश्वरीय अनुकम्पा, एक सशक्त चुम्बक की तरह भाग दौड़ी खड़ी हुई, ईश्वर के अजस्र अनुदान स्वतः ही प्राप्त होने शुरू हो गए। विश्वास ही नहीं हुआ कि इतने नगण्य से प्रयत्न से सामर्थ्य की बाढ़ कैसे उमड़ पड़ी।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं ने भी ऐसी अविश्वसनीय घटनाएं होती हुई अनुभव की होंगी। इन पंक्तियों के नगण्य से लेखक के मुख से अनेकों बार निकल जाता है, “हमारे जीवन की गाड़ी को कौन चला रहा है।” हम तो धन्य हो गए गुरुदेव।  

गुरुदेव बताते हैं कि अध्यात्म को सिद्धियों के साथ जुड़ा हुआ माना जाता है। क्या वे हमें हस्तगत हुईं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है ‘‘हाँ’’। 

उनमें से यहाँ कुछ ऐसे प्रसंगों की ही चर्चा की जा सकती है जो सर्वविदित हैं, जिनके लिए हर किसी को अपनी आँखें और अपनी निज की जानकारी ही साक्षी रूप में पर्याप्त हो सकती है। उसके लिए किसी प्रकार की,किसी को भी खोजबीन करने की कोई भी आवश्यकता है ।

गुरुदेव को प्राप्त हुई कुछ एक सिद्धिओं का वर्णन:

सबसे बड़ी सिद्धि तो युग साहित्य के सृजन की ही है। युग साहित्य का सृजन इतनी बड़ी मात्रा में बन पड़ा। उसका इतनी भाषाओं में अनुवाद हुआ कि उस सारे संग्रह को किसी एक मनुष्य के शरीर जितना भारी तोला जा सकता है। इसी लेखन की हर पंक्ति ऐसी है जिसके सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि किसी ने भारी खोज, गहन मन्थन एवं व्यक्तिगत अनुभव की छत्रछाया में ही लिखा है। सामान्य बुद्धि यही कह सकती है कि एक व्यक्ति कम से कम पाँच जन्मों में अथवा पाँच शरीर से ही इतना साहित्य-सृजन कर सकता है। इस प्रयास को भी यदि कोई चाहे तो “सिद्ध स्तर” का गिन सकता है। 

क्या इस सिद्धि पर कोई शंका कर सकता है ? कोई प्रश्नचिन्न लगा सकता है, बिलकुल नहीं, हाथ कंगन को आरसी क्या!!!

नव सृजन में कुछ कारगर भूमिका निभा सकने योग्य साथी-सहयोगियों के विशालकाय परिवार का एकत्रीकरण दूसरा सिद्ध कार्य कहा जा सकता है।  इन दिनों उन सभी की संख्या जो कुछ समय पूर्व पाँच लाख भर थी, अब बढ़कर पच्चीस लाख हो गई है, आज 2026 में तो यह संख्या करोड़ों तक जा पंहुची है।  यह क्रम एक से पाँच, पाँच से पच्चीस, पच्चीस से एक सौ पच्चीस, वाली गुणन-प्रक्रिया के आधार पर द्रुतगति से आगे बढ़ रहा है और आश्वासन दे रहा है कि प्रगति कभी  भी रुकेगी नहीं, क्षेत्रों और देशों की परिधि लाँघते हुए विश्वभर में सज्जनों के संवर्धन की प्रक्रिया पूरी करेगी। विश्वभर की बात आयी है तो बताना उचित समझते हैं कि यह पंक्तियाँ कनाडा से लिखी जा रही हैं। 

गुरुदेव को प्राप्त हुई तीसरी सिद्धि, दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष की असाधारण रणनीति वाली मोर्चाबन्दी है।  साथ ही सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए हजारों प्रज्ञा केन्द्रों की स्थापना और उनकी गतिविधियों में नवसृजन की, सत्प्रवृत्ति संवर्धन की रचनात्मक प्रवृत्तियों की अनवरत अभिवृद्धि भी शामिल है। 

जिन लोगों ने हज़ारों की संख्या में बनाई गयी प्रज्ञापीठों की भव्य इमारतें देखी हैं, वे सोच सकते हैं कि यह प्रयोग आज के समय का “अभिनव सृजन आन्दोलन” है। भारत की  चारों दिशाओं  में सृजन किये गए चार धाम बनाने वालों को जितना श्रेय मिला उसकी तुलना में यह सृजन कार्य कितना महँगा और कितना विस्तृत बन पड़ा है, इसे आश्चर्यजनक एवं अविश्वसनीय ही कहना चाहिए। प्रचलित कुरीतियों एवं अवांछनीयताओं के साथ टक्कर लेने की मोर्चेबन्दी को दूसरे महाभारत के समतुल्य कहा जा सकता है।

ईर्ष्यालुओं दुर्जनों और विद्वेषियों के आक्रमण सच्चाई को किस प्रकार हराने और तोड़ने में असफल होते हैं, इस तथ्य को मात्र वे लोग ही जानते हैं जो हमारे  निकट सम्पर्क में रहे और उन हरकतों से परिचित रहे हैं। गुरुदेव बता रहे हैं कि चूँकि  इन प्रसंगों की कभी चर्चा नहीं की गई, प्रतिरोध के लिए एक पतली छड़ी तक नहीं उठाई गई। भक्त की रक्षा कैसे होती है, इसके प्रमाण में प्रहलाद की, गज की, द्रौपदी आदि की उपमा दी जाती है। ईश्वर ने हमारी भी भरपूर रक्षा की है, यह भी एक सिद्धि है। 

सिद्धिओं की बात हो रही है तो इसी कड़ी में एक और सिद्धि जुड़ जाए तो कोई हर्ज नहीं। इतना विशाल तंत्र खड़ा करने के लिए, सहायता के लिए किसी के आगे हाथ न पसारना पड़ा। इस भावना के पीछे कोई अहंकार प्रदर्शन का भाव नहीं रहा बल्कि यह एक प्रयोग परीक्षण था, यह एक टैस्ट था कि यदि भगवत् प्रयोजन के लिए कहीं से कोई प्रामाणिकता उभरे तो उसकी शक्ति और सम्पदा कितनी बढ़ जाती है। चैक करने के लिए हनुमानजी का पुरातन उदाहरण तो है ही, नया उदाहरण वर्तमान समय का हमारा ही प्रयोग-परीक्षण को समझा जा सकता है। अपनाए गए क्रिया-कलापों में कितनी जनशक्ति की, कितनी धनशक्ति की, कितने साधनों की आवश्यकता पड़ती है तब कहीं सुदामापुरी को द्वारिकापुरी में बदलने का उदाहरण बनता है। ऐसे अनेकों दृश्यों को देख कर सिद्ध स्तर की उपमा दी जा सकती है। 

अपनी अपेक्षा पिछड़ों, दु:खियारों, आवश्यकताओं की सहायता करना मानवी कर्तव्य है। गिरों को उठाने, उठों को उछालने में ही सच्चे सामर्थ्यवानों के हाथ खुलते और सहायता देते रहे हैं। इस लम्बे जीवन की अवधि में कितनों की कितनी भौतिक एवं आत्मिक सहायता बन पड़ी, यह प्रसंग तो असाधारण रूप से विस्तृत है लेकिन  उसकी चर्चा पर इसलिए प्रतिबन्ध लगा दिया है कि देने वाले का अहंकार उभर सकता है और लेने वाला किसी अहसान की अनुभूति में अपनी हेठी समझकर संकोचग्रस्त हो सकता है।

सिद्धियों के और भी किसी प्रत्यक्ष प्रमाण का परिचय प्राप्त करना हो तो उसी गणना में एक कड़ी यह भी है कि 80 वर्ष की आयु तक पहुँचने वाले प्राय: जराजीर्ण हो जाते हैं और मौत के घर जाने की तैयारी करने लगते हैं लेकिन यहाँ तो कोई और ही दृश्य है। शरीर, मन, संकल्प और पुरुषार्थ उसी स्तर का परिचय दे रहा है जैसे कि वयोवृद्ध द्रोणाचार्य  अंतकाल तक धनुष संधानने और लक्ष्य बेधने की शिक्षा देते रहे। यहाँ पर गुरुदेव इतना बड़ा सन्देश दे रहे हैं कि  उसी से आज के ज्ञानप्रसाद लेख का समापन करना उचित रहेगा:

बुढ़ापे में भी जवानी जीवंत रह सकती है, इस स्तर का इस प्रयोक्ता (प्रयोग करने वाला) का एक सघन स्वरूप यह भी है।

जय गुरुदेव 


Leave a comment