“परिवर्तन के महान क्षण” पुस्तिका में “लेखक का निजी अनुभव” शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित हुए कंटेंट पर आज का ज्ञानप्रसाद लेख आधरित है। कहाँ मिलेगा ऐसा गुरु जिसने अपनी संतान के लिए,अपने शरीर को ही प्रयोगशाला बना लिया और जो भी रिजल्ट्स मिले उन्हें हम सबको (बिना किसी कोर्ट पेपर,कोर्ट फीस के) वसीयत के तौर पर सौंप दिए। हमारे पाठकों ने आज के लेख जैसे विवरण अनेकों बार पहले भी पढ़े होंगें लेकिन बार-बार पढ़ाने के पीछे साथिओं का ही भला है।
आइए आज की गुरुकक्षा का शुभारम्भ करें
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सत्य और तथ्य को कैसे जाना, परखा जाए? इसके लिए भौतिक क्षेत्र को आदर्शों के साथ जोड़ने पर क्या परिणाम निकल सकता है, इसकी खोजबीन करने का काम दूसरों के जिम्मे छोड़कर इन पंक्तियों के लेखक (गुरुदेव) ने अपनी अभिरुचि, जानकारी एवं रुझान के अनुरूप यही उपयुक्त समझा कि वह अपने छोटे-से जीवन और थोड़े-से समय, साधन का उपयोग इस स्पेशल प्रयोजन के लिए कर गुजरे। परम पूज्य गुरुदेव ने सोचा कि जब प्राण शरीर से श्रेष्ठ हैं तो फिर भौतिक-सम्पदा की तुलना में “प्राण चेतना को वरिष्ठता का गौरव” क्यों न प्राप्त होना चाहिए? आने वाले समय में जिस “सतयुग की वापसी” की प्रतीक्षा हो रही है उसके लिए नए सिरे से नया प्रयत्न, प्रयोग क्यों नहीं होना चाहिए?
गुरुदेव कहते हैं कि वैज्ञानिक की भांति इस प्रयोग के लिए भी सबसे पहला और महत्वपूर्ण कार्य “प्रयोगशाला को खोज” होना चाहिए,रिसर्च तो प्रयोगशाला में ही होती है। जब प्रयोगशाला मिल गई तो उसके बाद साधन और उपकरण भी तो चाहिएं। जिस रिसर्च की यहाँ बात हो रही है उसका सम्बन्ध मानवी प्राण चेतना से है। प्रयोगशाला, उपकरण एवं साधन तीनों ही मानवी काय-कलेवर में ही उपलब्ध किये जाने चाहिए और देखा जाना चाहिए कि “परिष्कृत अध्यात्म (Refined spirituality) का प्रैक्टिकल” व्यक्ति एवं संसार के लिए कितना उपयोगी हो सकता है।
यदि भौतिक क्षेत्र के वैज्ञानिकों ने कुछ खोजने के लिए प्राय: पूरी जिन्दगी लगा दी, लक्ष्य प्राप्त करने में कोई उतावली नहीं बरती, तो “परिष्कृत अध्यात्म” का स्वरूप खोजने और परिणामों की जाँच-पड़ताल करने के लिए किसी एक व्यक्ति का यदि पूरा जीवन भी पूरी तरह से लग जाए तो उसे घाटे का सौदा नहीं कहा जा सकता।
गुरुदेव लिखते हैं कि शोधकर्ता अपनी जिन्दगी के प्राय: 80 वर्ष पूरे करने जा रहा है। उसने पुरातन अध्यात्म को खोज निकालने के लिए अपने चिन्तन, समय, श्रम एवं पुरुषार्थ को मात्र एक ही निम्नलिखित प्रश्न पर केन्द्रित किया है:
“यदि पुरातन काल का सतयुगी अध्यात्म सत्य है, यदि ऋषियों की उपलब्धियाँ सत्य हैं, तो उस आध्यात्म का वास्तविक स्वरूप क्या रहा होगा और उसके प्रयोग से ऋद्धि-सिद्धि जैसे परिणामों को प्राप्त कर सकना कैसे सम्भव हुआ होगा?
यदि आज के युग में अध्यात्म से उपलब्धियां प्राप्त नहीं हो रही हैं तो अनुमान किया जा सकता है कि प्रैक्टिकल में कोई खोट घुस गया होगा जिससे “पुरातन अध्यात्म के शाश्वत सत्य” को झुठलाये जाने का अनर्थ हो रहा है।
अध्ययन,अनुभव,प्रयोग और विशेषज्ञों की पूछताछ से पता चला कि अध्यात्म का प्रथम पक्ष
“साधक का “परिष्कृत व्यक्तित्व” है और दूसरा पक्ष साधना-उपासना स्तर का उपक्रम है ।”
मनुष्य के जीवन में साधना को स्वास्थ्य और कर्मकांडों को मात्र श्रृंगार कहा गया है,आत्मा का स्वास्थ्य Balanced रहेगा तो शायद की किसी चिकित्सक की ज़रूरत पड़ेगी। लेकिन वर्तमान समय के असमंजस एवं भटकाव ने लोगों के मन में एक धारणा सी बना दी है कि “जीवन साधना की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है।” मात्र घंटी बजा कर, शोर मचा कर,ऊँची वॉल्यूम में कर्मकाण्डों के बलबूते ही उस सारी महत्ता को प्राप्त किया जा सकता है जिसको शास्त्रकारों ने अपने जीवनक्रम में समाविष्ठ करके वस्तुस्थिति की यथार्थता का पूरी तरह रहस्योद्घाटन किया है।
परम पूज्य गुरुदेव को समस्त विश्व के समुदायों की,विशेषकर मानव समुदाय के भाग्य और भविष्य की बड़ी चिंता थी/है। गुरुदेव के मार्गदर्शक,हम सबके दादा गुरु जो हम सबके भले-बुरे का निर्धारण करने वाले हैं, उन्होंने इस प्रसंग पर अत्यन्त गहराई तक शोध करने के लिए गुरुदेव को संकेत किया। आज के मनुष्य की द्रवित एवं असमंजस भरी मनःस्थिति को समझते हुए गुरुदेव को निर्देश मिला कि
‘‘इस तथ्य को प्रारम्भ से ही समझ लेना चाहिए कि अध्यात्म को अंकुरित, पल्लवित एवं पुष्पित होने के लिए नितान्त आवश्यक है कि इस प्रयोजन में प्रवेश करने वाले का व्यक्तित्व “उत्कृष्टता से सुसम्पन्न” हो।
उत्कृष्ट व्यक्तित्व सुनिश्चित होने के बाद ही उपासनापरक कर्मकाण्डों की कुछ उपयोगी प्रतिक्रिया उपलब्ध होती है। यदि मनोभूमि और जीवनचर्या गन्दगी से भरी हो तो समझ लेना चाहिए कि मन्त्र की, पूजा उपचार की प्रक्रिया प्राय: निरर्थक ही सिद्ध होगी। समय, श्रम और साधन सामग्री निरर्थक गँवाने के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।
यहाँ पर यह समझ लेना बहुत ही ज़रूरी है कि अध्यात्म दिव्य शक्ति के आधारभूत पुंज स्त्रोत हैं।
इस शक्ति स्रोत के समझ लेने के लिए इतना ज्ञान तो होना ही चाहिए कि अध्यात्म केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड तक सीमित नहीं है, यह स्वयं के भीतर छिपी असीम ऊर्जा, शांति और चेतना को जगाने का विज्ञान है। अनेकों कारणों से माना जाता है कि अध्यात्म मनुष्य को बाहरी दुनिया की भागदौड़ से हटाकर उसके भीतर छिपे ‘स्व’ से जोड़ता है। जब कोई व्यक्ति ध्यान, चिंतन या साधना करता है, तो उसके भीतर सकारात्मक ऊर्जा और आत्मबल (Will Power) का संचार होता है, उसकी आंतरिक ऊर्जा जागृत होती है। आज के तनावपूर्ण जीवन में हर कोई मानसिक और आत्मिक शांति की तलाश में लगा हुआ है। इस शांति के लिए उसे जो भी करना पड़े करने को तैयार है,भारी धन खर्च करके भांति-भांति के मदारी तमाशे/करतब करने से भी कतराता नहीं है। लेकिन उसे एक बेसिक तथ्य की समझ नहीं है कि
“अध्यात्म एक ढाल की तरह काम करता है। यह मन को शांत करता है, जिससे क्रोध, अहंकार, लोभ जैसे विकारों का नाश होता है और पवित्र विचारों का उदय होता है।”
अध्यात्म मनुष्य को अहसास कराता है कि हम सब उस एक ही परमपिता परमेश्वर या ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) के अंश हैं। इस दिव्य पुंज से जुड़ते ही व्यक्ति के भीतर करुणा, प्रेम और निस्वार्थ भाव जैसी ईश्वरीय शक्तियां प्रकट होने लगती हैं। मनुष्य के जीवन में जब विपरीत परिस्थितियां आती हैं, तब आध्यात्मिक बल ही व्यक्ति को टूटने से बचाता है। यह हमें सिखाता है कि सुख-दुख आने जाने हैं, हमें उस परमसत्ता पर विश्वास नहीं छोड़ना चाहिए। इसी विश्वास के कारण मनुष्य हर हाल में समभाव (संतुलित) रहना सीख जाता है।
संक्षेप में कहना चाहिए कि जिस प्रकार सूर्य पूरी पृथ्वी के लिए प्रकाश का स्रोत है, वैसे ही अध्यात्म हमारी आत्मा के लिए दिव्य प्रकाश और शक्ति का पुंज है।
लेकिन सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि इस शाश्वत तथ्य पर विश्वास कौन व कैसे करे ?
हर कोई व्यक्ति अपने-अपने दुःखों,चिंताओं एवं असमंजसों का पुलिंदा सिर पर उठाए इधर-उधर भटक रहा है,अपना रोना रो रहा है लेकिन करना कुछ भी नहीं चाहता। सब कुछ गुरुदेव पर छोड़ कर बैठा है कि सारे कष्टों का निवारण वही करेंगें। यदि गुरुदेव को अपना नौकर समझ बैठे हैं तो उनकी छोटी सी बात तो सुन लो, उनके एक छोटे से निवेदन पर तो ध्यान दे दो, न जी न, उनकी बात कोई भी नहीं माननी है और उनसे सब कुछ करवाना है, ऐसा कभी हुआ है? फ्री में तो चाय का कप तक नहीं मिलता, चाय लेने के लिए पहले पैसे देने पड़ते हैं फिर चाय मिलती है,हाँ फ्री के लंगर में मिल सकती है। फ्री के लंगर में लम्बी लाइन लगनी पड़ती है, लगे रहे लाइन में, जब बारी आएगी चाय मिल जाएगी।
आजकल तो राजनैतिक पार्टियां भी फ्री में लॉलीपोप बांटकर वोट बटोर रही हैं लेकिन सभी ने देख लिया है कि ऐसी पार्टियां कितनी देर टिक पाती हैं। साथिओ यह युग परिवर्तन का समय है,मानवता के अन्तःकरण में छाई कालिख को धो डालने का समय है, स्थाई समाधान ढूंढने का समय है,ड्रामेबाज़ी/विज्ञापनबाजी का समय नहीं है। गुरुदेव ने देखा की ड्रामेबाज़ी में बालबुद्धि को फुसलाने के लिए खिलौने जैसी चमक-दमक के इलावा और कुछ है ही नहीं। छोटे बच्चों को हम सबने देखा होगा जो खिलौनों के अम्भार लिए बैठे होते हैं लेकिन और प्राप्त करने की मृगतृष्णा कहाँ शांत होती है।
संसार की इस स्थिति से गुरुदेव को मार्गदर्शन मिला, विश्वास जमा। विश्वास को प्रमाणित करने के लिए, भ्रान्तियों के जाल-जंजाल से निकलने के लिए गुरुदेव ने आवश्यक समझा गया कि मार्गदर्शन के तथ्य का निरीक्षण-परीक्षण करके देखने के लिए क्यों न अपनी ही काया की लेबोरेटरी को प्रयोग किया जाए,अपने ही शरीर की लेबोरेटरी में प्रयोग किये जाएँ। यदि अपने प्रयोग Tried and tested उतरते हैं तो उन्हें Certify करने में क्या हर्ज़ है? यदि इस TTC पर अन्य लोग भी श्रद्धा विश्वास करते हैं, टेस्ट करते हैं तो ईश्वर की ISI Certified स्टैम्प तो स्वयं ही लग जाएगी। यदि गुरुदेव की रिसर्च मिथ्या सिद्ध होती है तो हानि केवल इतनी ही होगी कि जैसे करोड़ों लोग अधकचरे ज्ञान की स्थिति में, शंका भरी स्थिति में पहले ही रह रहे हैं, उन्हीं में एक और की वृद्धि हो जाएगी। फिर विश्वास और साहसपूर्वक अपनी मान्यता बनाने या दूसरों से साहसपूर्वक कुछ कहने की स्थिति तो समाप्त हो जाएगी।
मन्त्र विज्ञान के सम्बन्ध में जितना कुछ पढ़ा, सुना और गुना था,उसके आधार पर प्रारम्भिक दिनों में ही यह विश्वास जम गया था कि “आदि शक्ति” के नाम से जानी जाने वाली गायत्री की श्रेष्ठता-वरिष्ठता असंदिग्ध है। संचित संस्कार और संबद्ध वातावरण भी इसी की पुष्टि करते रहे हैं । उपासना क्रम सरल भी लगा और उत्साहवर्धक भी। गाड़ी चली सो अपनी पटरी पर आगे बढ़ती और लुढ़कती ही चली गई। तब से अब तक न उसकी गति ने विराम लिया और न ही कोई अवरोध ही आड़े आया, सरपट दौड़े जा रही है। 80 वर्ष की आयु होने तक वह मान्यता,भावना, श्रद्धा आगे ही आगे बढ़ती चली आई है।
मानवी गरिमा के अनुरूप जीवनयापन कैसे किया जा सकता है, उसके साथ जुड़ी हुई मर्यादाओं का परिपूर्ण निर्वाह कैसे हो सकता है और वर्जनाओं से कैसे बचा जा सकता है, यह समझ अन्तराल की गहराई से निरन्तर उठती रही और उसका परिपालन भी स्वभाव का अंग बन जाने पर बिना किसी कठिनाई के होता रहा। गुण, कर्म, स्वभाव, चिन्तन, चरित्र, व्यवहार में जो तथ्य गहराई तक उतरकर परिपक्व हो जाते हैं, वे छोटे-मोटे आघातों से डगमगाते नहीं। देखा गया कि सघन संकल्प के साथ जुड़ी हुई व्रतशीलता अनायास ही निभती रहती है। सो सचमुच बिना किसी दाग-धब्बे के निभ भी गई।
ईश्वर के प्रति सुनिश्चित आत्मीयता की अनुभूति उपासना, जीवन में शालीनता की अविच्छिन्नता अर्थात् ‘‘साधना’’ तथा करुणा और उदारता से ओतप्रोत अन्तराल में निरन्तर निर्झर की तरह उद्भूत होती रहने वाली ‘‘आराधना’’, यही है वह त्रिवेणी जो मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाती है। उस संगम तक पहुँचने पर कल्मष कषायों, दोष-दुर्गुणों के प्रवेश कर सकने जितनी गुंजाइश भी शेष नहीं रहती। त्रिपदा कही जाने वाली गायत्री, प्रज्ञा, मेधा, और श्रद्धा बनकर ऐसे स्तर तक आत्मसात हो गई कि लगने लगा कि सचमुच ही वैसा मनुष्य जीवन उपलब्ध हुआ है। जिसे सुरदुर्लभ कहा और देवत्व के अवतरण जैसे शब्दों से जिसका परिचय दिया जाता रहा है।
साधारण स्तर के नर-वानर कोल्हू के बैल की तरह पिसते रहकर जिन्दगी के दिन गुजार देते हैं लेकिन जब भीतर से उत्कृष्टता का पक्षधर उल्लास उभरता है तो अन्तराल में बीज रूप में विद्यमान दैवी क्षमताएँ, जागृत, सक्रिय होकर अपनी महत्ता का ऐसा परिचय देने लगती हैं जिसे
“अध्यात्म का वह चमत्कार कहा जा सकता है, जो भौतिक शक्तियों की तुलना में कहीं अधिक समर्थ है।”
उपासना में श्रद्धा का Role:
उपासना प्रकरण में श्रद्धा-विश्वास की शक्ति ही प्रधान है। वही उस स्तर की बन्दूक है जिस पर किसी भी फैक्टरी में विनिर्मित कारतूस चलाए जा सकते हैं। उस दृष्टि से मात्र गायत्री मंत्र ही नहीं, साधक की आस्था के अनुरूप अन्यान्य मंत्र एवं उपासना विधान भी अपनी सामर्थ्य का वैसा ही परिचय दे सकते हैं। श्रद्धा और विश्वास के अभाव में उपेक्षापूर्वक अस्त-व्यस्त मन से कोई भी उपासना क्रम अपनाया जाए, असफलता ही हाथ लगेगी।
परीक्षण के लिए प्रयोगशाला की तथा उसके लिए आवश्यक यन्त्र उपकरणों की जरूरत पड़ती है। इस सन्दर्भ में अच्छाई एक ही है कि मानव शरीर में विद्यमान चेतना ही उन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर देती है, जो अत्यन्त सशक्त प्रयोग परीक्षणों के लिए भौतिक विज्ञानियों को मूल्यवान यन्त्र उपकरणों से सुसज्जित प्रयोगशाला को जुटाने पर सम्भव होते हैं।
इन दिनों विज्ञान के प्रतिपादन पत्थर की लकीर बनकर जन-जन की मान्यताओं को अपने प्रभाव क्षेत्र में समेट चुके हैं। आज की मान्यताएँ और गतिविधियाँ उसी से आच्छादित हैं और तदनुरूप प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर रही हैं। अध्यात्म का स्वरूप विडम्बना स्तर का बनकर रह गया है, फलस्वरूप उसका न किसी साधनारत पर प्रभाव पड़ता है और न वातावरण को उच्चस्तरीय बनाने में कोई सहायता ही मिल पाती है।
इस दुर्गति के दिनों से यही उपयुक्त लगा है कि जिस प्रकार विज्ञान के प्रत्यक्षवाद ने मनुष्य पर काबू कर लिया है, यदि उसी प्रकार अध्यात्म को भी सशक्त एवं प्रत्यक्ष फल देने वाला माना जा सकने का सुयोग बन सके तो सोने पर सुहागा जैसा सुयोग होगा।
प्रस्तुत ज्ञानप्रसाद लेख का यही सन्देश है कि यदि विज्ञान शरीर और अध्यात्म प्राणचेतना मिलकर काम कर सकें तो समझना चाहिए कि सब कुछ जीवन्त हो गया। एक प्राणवान दुनियाँ समग्र शक्ति के साथ नए सिरे से, नए कलेवर में उद्भूत हो गई। न विज्ञान झगड़ालू रहा और अध्यात्म के साथ जो कुरूपता जुड़ गई है, उसके लिए कोई गुंजाइश ही शेष रह गई है।
जय गुरुदेव
