वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

वर्तमान असमंजस की स्थिति का क्या समाधान है ?  

हम सब जानते हैं कि आजकल ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की  23 छोटी-छोटी पुस्तिकाओं को आधार बना कर ज्ञानप्रसाद लेख प्रस्तुत किये जा रहे हैं। परिवारजनों द्वारा लिए गए संकल्प के अंतर्गत पहली 5 पुस्तिकाओं के  समापन के बाद कुछ दिन पहले ही छठी पुस्तक “परिवर्तन के महान क्षण” का शुभारम्भ हुआ था। मात्र 35 पृष्ठों की इस पुस्तक पर आधारित आज चौथा लेख प्रस्तुत किया गया है, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि न जाने कितने ही और लेख प्रस्तुत होंगें। शायद यह कहना गलत न होगा  कि पुस्तक को पढ़ना और पढ़कर समझना,उसको सरल भाषा में प्रकाशित करना,उससे सम्बंधित विषयों की रिसर्च करना बिलकुल ही एक रिसर्च प्रोजेक्ट जैसा होता है। गुरुदेव द्वारा क्रांतिकारी साहित्य को  “मक्खन” कहना तभी सार्थक होगा जब हम इन “Researched” लेखों को पढ़कर मक्खन खाने जैसी ऊर्जा अनुभव करेंगें। 

बार-बार इस नगण्य से लेखक के मन में यह प्रश्न करवटें मार रहा था कि गुरुदेव परिवर्तन के किन महान क्षणों की बात कर रहे हैं?  इन महान क्षणों में हमारी क्या भूमिका होनी चाहिए? क्या गुरुदेव हमें कुछ कार्य सौंप रहे हैं ? इन सभी प्रश्नों का सारांश निम्लिखित पंक्तियाँ वर्णन का रही है : 

गुरुदेव 20 वीं सदी के अंत में समय और चेतना में आए ऐतिहासिक परिवर्तन के कालखंड (संक्रमण काल) की बात कर रहे हैं।  जिन प्रमुख स्थितियों और क्षणों का गुरुदेव वर्णन कर रहे हैं, वे इस प्रकार हैं:

गुरुदेव भाव-संवेदनाओं के काल के उदाहरण से समझा रहे हैं कि अतीत में वे महान दिन थे जब भावनाएँ और चेतना इतनी शक्तिशाली थीं कि शाप वरदान, श्रद्धा और आंतरिक बल भौतिक हथियारों से अधिक प्रभावी हुआ करते थे।

गुरुदेव भौतिकवाद और प्रत्यक्षवाद के वर्तमान दौर की बात कर रहे हैं जहाँ केवल भौतिक जगत को ही सब कुछ  मान लिया गया है और आत्मा तथा परमात्मा की उपेक्षा होने लगी है।

मानवीय मूल्यों के ह्रास और अनुशासनहीनता की बात हो रही है जब प्रत्यक्ष न दिखने वाली चीजों (जैसे नीति,आदर्श,धर्म और मानवीय गरिमा) को अस्वीकार किए जाने के कारण उत्पन्न संकट मनुष्य की मनःस्थिति पर हावी हो रहे हैं।

गुरुदेव युग परिवर्तन के उस महत्वपूर्ण मोड़ की बात कर रहे हैं जहाँ पुराने समय और प्रवृत्तियों का अंत होकर एक नए युग का प्रवेश होना है।

साथिओ यह तो हुआ इस पुस्तक का सारांश लेकिन आज का लेख मनुष्य की वर्तमान असमंजस भरी  स्थिति की चर्चा कर रहा है जिसमें आज का मानव फंसा हुआ है। एक तरफ भौतिकवाद और प्रतक्ष्यवाद ने घेरा है तो दूसरी तरफ अध्यात्मवादी अपनेआप को ही एकमात्र समाधान बता रहे हैं, अध्यात्मवादी इस बात को भी नकार रहे हैं कि अध्यात्म भी दूध का धुला नहीं है। पदार्थवाद ने जहाँ मनुष्य को मृगतृष्णा की ऐसी स्थिति पर लाकर रख दिया है कि बिना देखे वोह पदार्थों का संग्रह किये जा रहा है,धारणा बना चुका है कि यही खिलोने उसका  सब कुछ हैं तो वहीँ अध्यात्मवादी प्रपंचों में वोह पड़ना ही नहीं चाहता उसे वह सारा अंधविश्वास ही प्रतीत होता है। गुरुदेव बताते हैं कि ऐसी असमंजस की स्थिति का निवारण केवल अध्यात्म से ही होने वाला है, हाँ उसी को ठीक करके प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। इस आवश्यकता को कौन पूरी कर पायेगा ? निश्चय ही हमारे गुरुदेव ही भागीरथ की तरह ज्ञान की गंगा का अवतरण कराएंगें। इसी तथ्य को प्रमाणित करेगा हमारा कल का ज्ञानप्रसाद जहाँ गुरुदेव अपनी ही काया को प्रयोगशाला बनाकर उन बातों को बताएंगें जिन्हें हम अनेकों बार पढ़ चुके होंगें। हमारे विचार में कल वाला लेख “परिवर्तन के महान क्षण” पुस्तिका का सबसे रोचक एवं महत्वपूर्ण लेख है। 

तो आज के इस उत्कृष्ट लेख का अमृतपान करने के लिए सभी गुरुशिष्यों का आज की गुरुकक्षा में सादर आमंत्रण है। 

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असमंजस की स्थिति और समाधान

सुविधाएँ सुहावनी लग सकती हैं। उनकी समय-समय पर आवश्यकता भी हो सकती है लेकिन  यह तथ्य भी ध्यान में रखने, गाँठ में बाँध लेने योग्य है कि पारस्परिक श्रद्धा, सद्भावना, सहकारिता, नीति-निष्ठा अपनाए बिना सद्भाव एवं स्नेह संवेदना नहीं उभर सकती और इसके बिना उस आचरण को पनपने की कोई सम्भावना नहीं बनती, जिसमें मनुष्य अपना ही नहीं दूसरों का भी हित सोचता है। न्याय को प्रश्रय देता है और अनीति के आधार पर उद्भूत सुविधाओं को स्वीकारने से इंकार कर देता है। सर्वजनीन सुख, शान्ति के लिए इससे कम में काम चलता नहीं और इससे अधिक की कुछ और आवश्यकता नहीं।

यह संसार, विश्व ब्रह्माण्ड जड़ और चेतन दोनों के ही सम्मिश्रण से बना है। यहाँ प्रकृति और प्राण का ही सामंजस्य है। चेतना  को परिष्कृत करने पर जो उपलब्धियाँ प्राप्त  होती हैं, उन्हें ऋषि युग में, सतयुग में लम्बी अवधि तक जाना परखा जा चुका है। इस देश की गौरव-गरिमा का इतिहास उसी वर्चस्व से ऐतिहासिक बना और प्रख्यात रहा है। अब 20वीं शताब्दी में भौतिकता की सत्ता को प्रमुखता मिली है। इस अवधि में दो विश्व युद्ध और 100 से अधिक क्षेत्रीय युद्ध हो चुके हैं। भौतिकवादी ललक की ही यह संरचना है, जिसके कारण अपार धन-जन की हानि हुई है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार सभी कुछ लड़खड़ा गया है। “प्रगति युग” के अगले चरण कितने भयावह हो सकते हैं, इसकी कल्पनामात्र से दिल दहल जाता है।

यह विचारने के लिए नए सिरे से बाधित होना पड़ रहा है कि भौतिक मान्यताओं के आधार पर संसार को क्या इसी गति से चलने दिया जाना है या अतीत में बरते गए उन सिद्धान्तों को फिर से अपनाया जाना है, जिनके आधार पर मनुष्यों में देवत्व और धरती पर स्वर्ग जैसा वातावरण बना रहा।

इस असमंजस में एक और नई कठिनाई आती  है कि पुरातन की साक्षी को ध्यान में रखकर यदि जीवनचर्या और लोक व्यवहार को अध्यात्म तत्त्वज्ञान के स्तर पर विनिर्मित करने की बात सोची जाए तो यहाँ भी भारी विडम्बना सामने खड़ी होती है। प्रचलित अध्यात्म सिद्धान्तों और प्रचलनों में भी विकृतियों का, इतना अधिक अनुपात घुस पड़ा है कि कसौटी पर कसते ही वह भी खोटे सिक्के की तरह अप्रामाणिक ही सिद्ध होते हैं। लाखों सन्त-साधु लाखों भजनानन्दी, लाखों कर्मकाण्डी, पूजा व्यवसाई जिस स्थिति में रह रहे हैं, उनके स्तर को उलट-पुलट कर जाँचने से प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र में विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ शेष बचता नहीं  है। किसी जमाने में थोड़े-से सन्त न केवल भारत को बल्कि समस्त विश्ववसुधा को हर दृष्टि से समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाए रखने में समर्थ हुए थे लेकिन अब तो उनकी संख्या हजारों-लाखों गुना  हो गई है। इतने पर भी विश्वकल्याण की गरिमा को बनाए रखने की बात तो दूर आज का मनुष्य अपने  व्यक्तित्व को भी इतना गया-गुजरा बना बैठा है कि सहज विश्वास नहीं होता कि जिसे हम अध्यात्म कहते हैं, Spirituality कहते हैं, में भी कुछ उत्कृष्टता एवं विशिष्टता शेष रह गई है।

कुछ दिन पूर्व बुद्ध, विवेकानंद,परम पूज्य गुरुदेव  जैसी कुछ ही प्रतिभाएँ प्रकट हुई थीं जो  अपने व्यक्तित्व तथा कृत्यों से संसार भर में आस्था, उत्साह और उल्लास की एक नई लहर चला सकने में समर्थ हुई थीं लेकिन अब तो उनकी गणना आश्चर्यजनक गति से बढ़ जाने पर भी वातावरण को परिष्कृत करना तो दूर स्वयं को भी प्रामाणिक एवं प्रतिभावान बना पाना दिख नहीं पड़ता। 

इस निरीक्षण-परीक्षण से प्रतीत होता है कि जैसे लांछन भौतिकवाद पर लगाए जाते हैं, उससे भी अधिक तथाकथित अध्यात्मवाद पर लगाए जा सकते हैं। आज के युग में प्रतीत हो रहा है कि दोनों ही क्षेत्रों में अपने-अपने ढंग की कुरीतियों ने आधिपत्य जमा लिया है। धर्म के नाम पर जितनी विडम्बनाएँ चलती हैं, उन्हें देखते हुए उसे भी अपनाने योग्य मानने के लिए मन नहीं करता।

दोनों ही रास्ते अनुपयुक्त दिखने पर प्रश्न यह उठता है कि इनके अतिरिक्त कोई तीसरा विकल्प भी है क्या? 

आस्तिकता और नास्तिकता के, श्रेष्ठता और निकृष्टता के बीच क्या कोई मध्य मार्ग भी है ? आज के संवेदनशील मनुष्य को  कुछ भी सूझता नहीं। जीवन और मरण दोनों ही अनुपयुक्त,अविश्वस्त दिखते हैं, ऐसी स्थिति में चयन करना सरल नहीं है।

इस असमंजस के बीच एक हल उभरता है कि भौतिक विज्ञान को अध्यात्म तत्त्वज्ञान (Spiritual philosophy) के साथ जुड़ना चाहिए था और अध्यात्मवाद का स्वरूप ऐसा होना चाहिए था जिसे प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर भी खरा सिद्ध किया जा सके।

भौतिकवादी मान्यताओं का अपना आकर्षण ही इतना बड़ा है कि उसने 99 प्रतिशत क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है। उसकी अच्छाई-बुराई भी आँखों के सामने है। मात्र अध्यात्म ही ऐसा है फील्ड है जो रहस्य बनकर रह रहा है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि  शास्त्रकारों,आप्तजनों और ऋषिकल्प व्यक्तियों के आधार पर जो उत्कृष्टतावादी निष्कर्ष निकलता है, उसे अमान्य ठहराने का कोई कारण दिखता नहीं है,उसकी प्रामाणिकता में कोई शंका नहीं है। योगी अरविन्द, महर्षि रमण, समर्थ रामदास, रामकृष्ण परमहंस आदि प्रतिभाएँ उस पक्ष को अपनी वरिष्ठता के बल पर भी सही सिद्ध करती रही हैं। रहस्य क्या है? यह खोजने की बात सामने आने पर भूतकाल की साक्षी और वर्तमान की दूरदर्शी विवेचना यही बताती है कि जन कल्याण अध्यात्म पर ही अवलम्बित हो सकता है। खोट इतना भर है कि आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान और प्रयोग परीक्षण में कहीं कुछ ऐसा अनुपयुक्त अड़ गया है जिसके कारण सूर्योदय रहते हुए भी पूर्णग्रहण जैसा कुछ लग जाने के कारण, दिन होते हुए भी अन्धेरा सा छाया दिख रहा है। सब कुछ होते हुए भी कंगाली जैसी स्थिति बनी हुई दिख रही है,दावे तो विश्वगुरु बनने के हो रहे हैं लेकिन बुजुर्ग वृद्धाश्रमों में अंतिम श्वासों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। दिख तो ऐसा रहा है कि गलत किए गए प्रयोग में विशिष्टता निकृष्टता में बदल गई है। जिस प्रकार आदर्शों के अनुशासन को अस्वीकृत कर देने के कारण भौतिक विज्ञान की उपयोगिता और यथार्थता विनाशकारी परिणाम उत्पन्न कर रही हैं उसी तरह अध्यात्म ने भी उलटबांसी अपनाई है। इस उलटबांसी के कारण असली के स्थान पर नकली के आ विराजने पर आध्यात्मिकता की प्रामाणिकता एवं उपयोगिता भी खतरे में पड़ गई है।

जय गुरुदेव 


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