वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

क्या मनुष्य तेज़ी से सामूहिक आत्महत्या की ओर  बढ़ रहा है।?

परम पूज्य गुरुदेव की दिव्य रचना “परिवर्तन के महान क्षण” पर आधारित लेख श्रृंखला का आज तीसरा ज्ञानप्रसाद लेख प्रस्तुत है, सभी साथिओं को ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के ज्ञानकलश से निकले अमृत को ग्रहण करने के लिए  सादर निमंत्रण है। हमारे अनेकों साथिओं ने यह पुस्तिका एक बार नहीं,कई बार पढ़ी होगी लेकिन जिस उद्देश्य को लेकर यह लेख श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है वह उद्देश्य तभी सफल माना जाएगा जब इन लेखों को कमैंट्स करके अधिक से अधिक Interactive और Meaningful बनाया जायेगा। सभी के कमैंट्स पढ़कर,ह्रदय से स्वतः ही धन्यवाद निकलता है कि इतनी Meaningful virtual चर्चा किसी अन्य परिवार में,किसी अन्य चैनल पर होती हो। यदि ऐसा नहीं होता है तो ऐसा लगेगा की एक बार और इन पुस्तकों को पढ़ लिया। हम भी यथासंभव प्रयास करके प्रत्येक लेख की पूरी सर्जरी करके प्रस्तुत कर रहे हैं। 

आज के ज्ञानप्रसाद लेख में गुरुदेव भौतिकवाद से उत्पन हुई वर्तमान परिस्थितिओं एवं मानवीय मूल्यों की गिरावट  संदर्भ में चर्चा कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि किसी सामूहिक आत्महत्या के लिए भूमि तैयार की जा रही है, इसका क्या अर्थ है लेख खुद ही बताएगा।  

पाठकों का सोचना सही हो सकता है कि ऐसे विवरण,गुरुदेव के ही साहित्य में पहले भी पढ़ चुके हैं, यह सत्य भी हो सकता है क्योंकि क्रांतिधर्मी साहित्य उसी विशाल ज्ञान का ही तो मक्खन है !!!

तो आइए आज की गुरुकक्षा का,गुरुचरणों में समर्पित होकर शुभारम्भ करें। 

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नीतिरहित भौतिकवाद से उपजी दुर्गति:

नीति रहित का सीधा और सरल अर्थ होता है “नीति से हीन” या जिसमें कोई नीति (नियम, सिद्धांत या नैतिकता) न हो। नीति का अर्थ होता है नियम, सिद्धांत, मर्यादा, सही तरीका या नैतिकता (Morality/Ethics) जब चारों ओर चोरबाज़ारी और गुंडाराज हो तो अनैतिक (Unethical/Immoral), सिद्धांतहीन (Principled-less),मर्यादाहीन शक्तियों का ही बोलबाला होता है। नीति रहित सरकार ऐसी व्यवस्था खड़ी कर देगी जो बिना किसी सही नियम, न्याय या प्रजा के हित के काम करती है। नीति रहित व्यापार  का अर्थ होगा ऐसा बिजनेस जो सिर्फ मुनाफे के लिए गलत तरीकों (जैसे मिलावट, धोखाधड़ी) का इस्तेमाल करता है।

ऐसी स्थिति में  तो “जैसा राजा वैसी प्रजा” वाली बात सार्थक होती दिखती है, जब घर का मुखिया ही नीतिरहित शासन में विश्वास रखता हो तो प्रजा को क्या कण्ट्रोल करेगा। 

भौतिकवाद ने जिस दुर्गति को निमंत्रण दिया है उसका एक कारण  अमीर का और अमीर होना और गरीब का और अधिक गरीब होना ही है। अमीर और गरीब के बीच की खाई को पाटने  की बात तो अनेकों सरकारों ने की, क्या उस खाई को दूर कर पाए, नहीं, क्योंकि उनकी मंशा ही नहीं थी। वोह तो इस स्लोगन को लेकर चले थे: “अपना काम बनता,भाड़ में जाए जनता।” इससे भी बड़ी बात यह है कि गरीब ने अपना खून-पसीना देकर अमीरों को अमीर बनाया है, अमीर ने गरीब को कभी भी आत्मनिर्भर नहीं होने दिया,और तो और ऊँची कक्षा के पंडितों ने महिलाओं को गायत्री मंत्र तक भी नहीं जपने दिया ताकि हमारी बहिनें गायत्री मंत्र की शक्ति न प्राप्त कर लें, पुरुषों के बराबर एवं उनसे ऊँची न हो जाएँ। हमारे गुरुदेव घोर प्रयत्न करके बहिनों को न केवल गायत्री मंत्र जपने का अधिकार दिलाया बल्कि देव मंच पर भी विराजमान कर दिया। कहाँ मिलेगा ऐसा गुरु? 

परम पूज्य गुरुदेव द्वारा रचित साहित्य ऐसी ही अनेकों समस्याओं के निवारण के लिए लिखा गया था, आत्मनिर्भरता,नारी सशक्तिकरण आदि अनेकों प्रोग्राम गुरुदेव ने परिवारों को ऊँचा उठाने के लिए ही शुरू किये थे।

गुरुदेव बता रहे हैं कि ऊंच-नीच समाज के हर वर्ग में देखी जा सकती है लेकिन इसका दुरूपयोग कभी भी सहन नहीं होना चाहिए। 

ऊँचा महल खड़ा करने के लिए किसी दूसरी जगह गड्ढे बनाने पड़ते हैं। मिट्टी, पत्थर, चूना आदि जमीन को खोदकर ही निकाला जाता है। एक जगह टीला बनता है तो दूसरी जगह खाई बनती है। 

संसार में दरिद्रों, अशिक्षितों, दु:खियों, पिछड़ों की विपुल संख्या देखते हुए विचार उठता है कि यदि उत्पादित सम्पदा सभी में,ठीक तरीके से  बँट गई होती तो सभी लोग लगभग एक ही तरह का, समान स्तर का जीवन जी रहे होते। 

लेकिन यह कैसे संभव हो? अमीर लोग,ऊँचे वर्ग के लोग कहाँ सहन कर सकेंगें कि सभी खुशहाल हो, सुखी-समृद्ध हों। किसी वस्तु का अभाव इन्हीं कुछ एक लोगों का बनाया हुआ है, यह कृत्रिम है। कुछ एक लोगों ने अधिक बटोरने की विज्ञान एवं प्रत्यक्षवाद की विनिर्मित मान्यता के अनुरूप यह उचित समझा है कि नीति, धर्म, कर्तव्य सदाशयता, शालीनता, समता, परमार्थ परायणता जैसे उन अनुबन्धों को मानने से इंकार कर दिया जाए। मानवता को कायम रखने वाली Moral values,जिसे  पिछली पीढ़ियों में आस्तिकता और धार्मिकता के आधार पर आवश्यक माना जाता था अब उन्हें प्रत्यक्षवाद ने अमान्य ठहरा दिया, तो सामर्थ्यवानों को कोई किस आधार पर मर्यादा में रहने के लिए समझाए। इन लोगों को शालीनता और समता की नीति अपनाने के लिए कैसे बाधित किया जाए। 

गुरुदेव यहाँ पर एक बहुत ही सुन्दर Comparison करके हमें समझाने का प्रयास कर रहे हैं : 

जब हम पशुओं को नीतिवान/ परोपकारी बनाने के लिए बाधित नहीं कर सके तो बन्दर की औलाद कहे जाने वाले  मनुष्य को किस आधार पर समझाएं कि उसे उपार्जन तो करना चाहिए लेकिन फिज़ूल खर्ची में ही समाप्त नहीं कर देना चाहिए। सदुपयोग की उन परम्पराओं को भी अपनाना चाहिए जो न्याय, औचित्य, सद्भाव एवं बाँटकर खाने की नीति अपनाने की बात कहती है। यदि अध्यात्मवादी प्रचलन जीवित रहा होता तो प्रस्तुत भौतिकवादी प्रगति के आधार पर बढ़ते हुए साधनों का लाभ सभी को मिला होता। सभी सुखी एवं समुन्नत पाए जाते। न कोई अनीति बरतता और न किसी को उसे सहने के लिए विवश होना पड़ता ।

जिनको परम पूज्य गुरुदेव की कार्यप्रणाली एवं जीवन शैली का ज्ञान नहीं है वोह कहेंगें कि गुरुदेव किस  Ideal world में जी रहे हैं,Idealism की बात कर रहे हैं। 

विज्ञान ने जहाँ एक से एक अद्भुत चमत्कारी साधन उत्पन्न किए वहाँ दूसरे हाथ से उन्हें छीन भी लिया। यदि इन संसाधनों का सदुपयोग किया होता तो ऐसा न होता कि कुछ समर्थ लोग स्वर्ग का आनंद  लूटते हैं  और शेष सभी दोषारोपण की सड़न में सड़ते रहते। यदि विज्ञान के साथ सद्ज्ञान का समावेश भी  रह सका होता तो भौतिक और आत्मिक सिद्धान्तों पर आधारित प्रगति सामने होती और उसका लाभ हर किसी को समान रूप से मिल सका होता। लेकिन किया क्या जाए भौतिक विज्ञान जहाँ शक्ति और सुविधा प्रदान करता है वहीँ  भौतिकवाद/पदार्थवाद को भी बढ़ावा देता है। ऐसी स्थिति आने पर जब मनुष्य को केवल पदार्थवाद ही उचित दिखाई देता है तो उसे नीति, धर्म, संयम, स्नेह, कर्तव्य आदि कुछ भी नहीं दिखता। पदार्थ संचय के लिए उद्दण्डता अपनाए हुए समर्थ मानवों  का दैत्य-दानव बन जाना स्वाभाविक है। लगातार भौतिकवाद और पदार्थवाद से उनका बढ़ता वर्चस्व उन दुर्बलों का शोषण ही करेगा जिन्होंने उनका वर्चस्व कायम किया। क्या साहूकारों,जागीरदारों की प्रथा समाप्त हो गयी है ? नहीं। पिछली सदी के निर्धन,जो आज अमीर दिख रहे हैं,यदि वोह सही अर्थों में अमीर है तो फिर शिकायतें करते क्यों फिरते हैं,आलू-प्याज़ के भावों में ही क्यों अटके फिरते हैं। सच बात तो यह है की इस युग की भागदौड़ ने, रेस ने उन्हें तथाकथित अमीर तो बना दिया लेकिन अंतर्मन से गरीब के गरीब ही रहे। आज के युग की सबसे बड़ी विडंबना ही यही है जिसको समझना ही वर्तमान लेख श्रृंखला का उद्देश्य है।   

प्रगति के नाम पर मिली उपलब्धियों को चकाचौंध में नहीं, उनकी वस्तुस्थिति में खुली आँखों से देखा जा सकता है की क्या कुछ हुआ है। औद्योगीकरण के नाम पर बने कारखानों ने संसार भर में वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण भर दिया है। अणु शक्ति की बढ़ोत्तरी ने Radiations  से वातावरण को इस कदर भर दिया है कि थर्ड वर्ल्ड वार न भी हो तो भी भावी पीढ़ियों को अपंग स्तर की पैदा होना पड़ेगा/पड़ रहा है। जन्म लेते बच्चों में दिख रही बीमारियां वातावरण के दुष्प्रभाव की साक्षी हैं। गोलबल वार्मिंग से हिम प्रदेश पिघल जाने पर समुद्रों में बाढ़ आने और ओजोन नाम से जानी जाने वाली गैस पृथ्वी के कवच के फट जाने पर ब्रह्माण्डीय किरणें धरती की समृद्धि को भूनकर रख सकती हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाइयां मिलकर पृथ्वी की उर्वरता को विषाक्तता में बदलकर रखे दे रहे हैं। खनिजों का उत्खनन जिस तेजी से हो रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि कुछ ही दशाब्दियों में धातुओं का, खनिज तेलों का भण्डार समाप्त हो जाएगा। बढ़ते हुए कोलाहल से तो व्यक्ति और पगलाने लगेंगे। शिक्षा का उद्देश्य मात्र उदरपूर्ति ही रहेगा, मानवीय मूल्यों के पालन से कोई वास्ता न रहेगा। आहार में समाविष्ट होती हुई स्वादिष्टता प्रकारान्तर से रोग-विषाणुओं की तरह धराशायी बनाकर रहेगी। कामुक उत्तेजनाओं को जिस तेजी से बढ़ाया जा रहा है, उसके फलस्वरूप न मनुष्य में जीवनी शक्ति का भण्डार बचेगा,न बौद्धिक प्रखरता और शील-सदाचार का कोई निशान बाकी नहीं रहेगा। पशु-पक्षियों और पेड़ों का जिस दर से कत्लेआम हो रहा है, उसे देखते हुए यह प्रकृति नष्ट  होकर ही  रहेगी। मानवीय व्यवहार में नीरसता, निष्ठुरता, नृशंसता, निकृष्टता के अतिरिक्त और कुछ ऊँचाई शायद ही दिख पड़े। 

ऐसी स्थिति को देखकर समझा जा सकता है कि मूर्धन्यों का यह निष्कर्ष गलत नहीं है कि “मनुष्य सामूहिक आत्म-हत्या की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।” नशेबाजी जैसी दुष्प्रवृत्तियों की बढ़ोत्तरी देखते हुए कथन कुछ असम्भव नहीं लगता। गुरुदेव के शब्द कड़वे तो अवश्य लगेंगें लेकिन हैं सत्य: 

स्नेह सौजन्य और सहयोग के अभाव में मनुष्य पागल कुत्तों की तरह एक-दूसरे पर आक्रमण करने के अतिरिक्त और कुछ कदाचित ही कर सके। कोई किसी की बात सुनने को राज़ी ही नहीं है,अपना रोना घंटों रोता रहेगा,ज्यों ही आपने अपनी बात कहना चाही, एकदम फ़ोन बंद कर दिया जाता है। क्या यही है सहकारिता, सहभागिता ?

आज के समय में मनुष्य जाति जिस दिशा में चल पड़ी है, उससे उसकी महत्ता ही नहीं, सत्ता का भी समापन होते दिखता है। संचित बारूद के ढेर में यदि कोई पागल एक माचिस की तीली फेंक दे, तो समझ लेना चाहिए कि “स्वर्गोपम” कहा जाने वाला  हमारा धरालोक धूलि बनकर आकाश में एक पल में ही छितरा जाएगा। विज्ञान की बढ़ोत्तरी और ज्ञान की घटोत्तरी ऐसी ही विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में बहुत विलम्ब नहीं लगने देंगी।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार एक ऐसा परिवार है जो इन निराशावादी परिस्थितिओं से मुक्ति पाने एवं मुक्त कराने के लिए संकल्पित है। हमारे आसपास, चारों तरफ,प्रत्येक मंडली में, प्रत्येक Get-together में रोने धोने वाले, कोसने वाले अनेकों मिल जायेंगें, शायद ही कोई ऐसा मिल जाए जो आपकी बात से सहमत हो कि नया युग आ रहा है,नया सूर्य उग रहा है, सतयुग की वापसी हो रही है, युग परिवर्तन हो रहा है,21वीं सदी उज्जवल भविष्य को दस्तक दे रही है, परिवर्तन के महान क्षण आपको आमंत्रण दे रहे हैं। यह सभी बातें उनके सिर से ऊपर ही निकल जाएँगी क्योंकि भौतिकवाद और फैशनपरस्ती ने उनकी आँखों पर तो पट्टी बाँधी ही हुई है, उनके दिमाग पर भी ताला लगाया हुआ है। दुनिया चाहे कुछ भी कहे,गायत्री परिवार का प्रत्येक साथी स्वर्ग के अवतरण एवं सतयुग की वापसी का साक्षी है,बाहें खोल कर स्वागत करने को तैयार है। हर घर स्वर्ग जैसा आज ही दिख रहा है, सतयुग का जीता-जागता उदाहरण है।  

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से यदि ऐसा ही सकारात्मक सन्देश प्रसारित होता  है तो इन ज्ञानप्रसाद लेखों का उद्देश्य सफल होता दिखेगा, हम सबका प्रयास रंग लाएगा,ऐसा हमारा अटूट विश्वास है।  


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