वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

क्या दिख रही प्रगति सच में प्रगति ही है ?

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की छठी पुस्तिका  “परिवर्तन के महान” है। आज  इस पुस्तिका पर आधारित लेख श्रृंखला के दूसरे लेख का अमृतपान करने के लिए साथिओं को सादर निमंत्रण है। 

सभी जानते हैं कि परिवर्तन एक शाश्वत नियम है, इस तथ्य को कोई भी नकार नहीं सकता। प्रश्न यह उठता है कि एक शताब्दी से दूसरी शताब्दी की यात्रा में नेगेटिव और पॉजिटिव का कहाँ तक बैलेंस है। आज का लेख 20वीं और 21वीं शताब्दियों की तुलना से आरम्भ हो रहा है जिसमें तकनीकी परिवर्तन के साथ-साथ आध्यात्मिक पक्ष को भी छूने का प्रयास किया गया है। लेख का समापन ऐसी चर्चा से किया गया है जिससे वर्तमान की स्थिति दिख तो स्पष्ट रही है लेकिन मनुष्य आँख मूँद कर बैठा है, सच्चाई मानने को तैयार ही नहीं है। खैर सच्चाई को मानने, स्वयं का मूल्यांकन करने में ही समझदारी है। 

आइए आज के लेख का शुभारम्भ करें 

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“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” हमारे गुरुदेव परम पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा जी द्वारा रचा गया 23 छोटी-छोटी पुस्तकों का एक दिव्य संग्रह है। गुरुदेव ने अपने 80 वर्ष के जीवनकाल में, लगभग सभी विषयों पर 3200 पुस्तकें लिखीं लेकिन 21वीं सदी की ज़रूरतों को देखते हुए गुरुदेव ने अपनी दिव्य दृष्टि से देख लिया था कि आने वाले समय में मेरे बच्चों के पास इन 3200  पुस्तकों को पढ़ने,समझने एवं औरों को समझाने के लिए समय नहीं होगा,इसलिए उन्होंने अपने जीवन भर का विशाल ज्ञान इन छोटी-छोटी 23 पुस्तकों में Summarize कर दिया। इन पुस्तकों के बारे में गुरुदेव कहते हैं कि यह हमारे जीवन भर के लिखे साहित्य का मक्खन है, आप हमारी सभी पुस्तकों को न पढ़ सको तो कोई बात नहीं है लेकिन इन 23 पुस्तकों को अवश्य पढ़ना, बार-बार पढ़ना,100 बार पढ़ना,अन्य 100 लोगों को पढ़ाना। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं ने वर्ष 2026 का पूरा वर्ष ही त्रय शताब्दी (परम वंदनीय माता जी की जन्म शताब्दी,अखंड दीप के प्राकट्य की शताब्दी एवं परम पूज्य गुरुदेव की साधना की शताब्दी) को समर्पित करने का संकल्प लिया हुआ है। अभी तक इस  संकल्प का 75 प्रतिशत भाग पूर्ण हुआ है एवं वर्ष के बचे समय में बाकी के 25 प्रतिशत भाग के सम्पन्न होने की सम्भावना है। 

इसी संकल्प के अंतर्गत गुरुवर के निर्देश का पालन करते हुए “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की सभी 23 पुस्तकों को  एक-एक करके न केवल पढ़ना बल्कि एक-एक शब्द को पढ़ना, समझना,समझने के बाद परिवार में ज्ञानप्रसाद लेखों की फॉर्म में न केवल पोस्ट करना बल्कि उनके कमैंट्स और काउंटर कमैंट्स के द्वारा सुनिश्चित करना कि यह प्रयास कितना सफल हो रहा है एवं साथिओं में गुरु के प्रति कैसी श्रद्धा जागृत हो रही है। गुरु की शिक्षा को आत्मसात करने से पहले गुरु को एवं उनकी शक्ति को जानना बहुत ही महत्वपूर्ण है। 

अभी तक पुस्तकमाला की पांच पुस्तकों का स्वाध्याय पूरा हुआ है और कल ही छठी पुस्तिका “परिवर्तन के महान क्षण” का प्रथम लेख के साथ शुभारम्भ हुआ था। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं के Age group को ध्यान से देखने पर प्रतीत होता है कि बहुत सारे साथी( हमारे समेत) ऐसे होंगें जिन्होंने 20वीं और 21वीं, दोनों शताब्दिओं का स्वाद चखा होगा। इन पक्तियों के लेखक ने 20वीं सदी के 48 वर्ष और 21वीं सदी के 26 वर्ष देख लिए हैं,इस जीवन अवधि में दोनों शताब्दिओं के अंतर् एवं परिवर्तन को भी बड़े ध्यान से देखा है। 

उपरोक्त पंक्तियों को देख कर एक स्वाभाविक प्रश्न उभर कर आता है कि गुरुदेव जिन  परिवर्तन के महान क्षणों का बात कर रहे हैं, पहले उन्हें ही देख लिया जाए कि यह दोनों शताब्दियाँ एक दूसरे से कैसे अलग थीं, एक शताब्दी से दूसरी शताब्दी के अवतरण में क्या-क्या परिवर्तन देखने को मिले, कितना नेगेटिव था,कितना पॉजिटिव था, सभी तथ्यों का मूल्यांकन करना बहुत ही उचित रहेगा। हमारा विश्वास है कि जब पाठकों को, हम सबको इस बेसिक अंतर् का ज्ञान हो जायेगा तो गुरुदेव की पुस्तक समझने में सहायता मिलेगी। 

आइए एक-एक करके Pointwise दोनों सदिओं की तुलना करने का प्रयास करें।

20वीं सदी (1901–2000) और 21वीं सदी (2001–वर्तमान) के बीच टेक्नोलॉजी सोशल साइंस, साइंस और कार्यशैली में अनेकों बुनियादी और महत्वपूर्ण अंतर हैं।

प्रौद्योगिकी और संचार (Technology and communication):

20वीं सदी में रेडियो, टेलीविजन, टेलीफोन और बेसिक कंप्यूटरों का विकास हुआ। सूचना का प्रसार धीमा और एकतरफा था।

21वीं सदी डिजिटल युग, इंटरनेट, स्मार्टफोन तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की सदी है। आज पलभर में पूरी दुनिया में इनफार्मेशन उपलब्ध है।

शिक्षा और ज्ञान (Education and knowledge):

20वीं सदी मुख्य रूप से शिक्षक-केंद्रित थी। इसमें तथ्यों को याद रखने (रटने) और एक ही तरह के पाठ्यक्रम पर जोर दिया जाता था।

21वीं सदी की शिक्षा छात्र-केंद्रित और प्रोजेक्ट-आधारित हो गई है। इसमें केवल रट्टा लगाने एवं याद रखने के बजाय कौशल विकास (Skills Development ) और तकनीक के इस्तेमाल पर ध्यान दिया जाता है।

कार्यशैली और प्रबंधन (Management):

20वीं सदी में दफ्तरों और उद्योगों में प्रबंधन का तरीका सख्त था, जिसमें आदेश देने, नियमों का पालन कराने और नियंत्रण (Control) पर जोर था।

21वीं सदी में कार्यशैली सहयोग (Collaboration), सहभागिता और टीम वर्क पर आधारित है, जहां विचारों का आदान-प्रदान और Flexibility महत्वपूर्ण है।

विज्ञान और पर्यावरण दृष्टिकोण (Science and environment):

20वीं सदी में विज्ञान और औद्योगिकीकरण का मुख्य उद्देश्य तीव्र विकास और उत्पादन था, जिसमें पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को कम आंका गया।

21वीं सदी में विज्ञान में आत्मलोचना और पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी है। अब हर रिसर्च में जलवायु परिवर्तन और स्थिरता (Sustainability) का ध्यान रखा जाता है।

हमारे साथी सोच रहे होंगें कि उपरोक्त परिवर्तन तो एक हाई स्कूल के विद्यार्थी के लिए,परीक्षा/असाइनमेंट के लिए लाभदायक है, हमें भला इससे क्या लाभ मिलेगा, हम तो अध्यात्म के विद्यार्थी हैं तो साथिओ आइए देखें कि दोनों सदिओं में अध्यात्म कहाँ से कहाँ तक पंहुचा है।  

आध्यात्मिकता (Spirituality) की दृष्टि से 20वीं और 21वीं सदी में एक बहुत बड़ा वैचारिक और व्यावहारिक परिवर्तन हुआ है। जहाँ 20वीं सदी में आध्यात्मिकता काफी हद तक पारंपरिक धर्मों और गुरुओं के इर्द-गिर्द घूमती थी, वहीं 21वीं सदी में यह पूरी तरह से व्यक्तिगत,Technology-oriented और Global हो चुकी है।

20वीं सदी में आध्यात्मिकता (Spirituality) और धर्म (Religion) को एक ही सिक्के के दो पहलू माना जाता था। लोग आध्यात्मिक शांति के लिए धर्म का सहारा लेने के लिए चर्च, मंदिर, धार्मिक संस्थाओं और आश्रमों से जुड़ते थे। 21वीं सदी में “स्पिरिचुअल लेकिन रिलिजियस नहीं” (Spiritual but not Religious – SBNR) का चलन तेजी से बढ़ा है। लोग किसी एक धर्म के कड़े नियमों में बंधने के बजाय अपनी “आत्मा की शांति” के लिए खुद का रास्ता चुनना पसंद करते हैं।

20वीं सदी आध्यात्मिक गुरुओं (जैसे ओशो, परमहंस योगानंद, स्वामी विवेकानंद के विचार, और बाद में इस्कॉन व अन्य आंदोलन) के प्रभाव की थी। लोग मार्गदर्शन के लिए पूरी तरह गुरु पर निर्भर थे। 21वीं सदी में गुरुओं का महत्व तो है, लेकिन लोग “स्वयं की खोज” (Self-Help) पर ज्यादा ध्यान देते हैं। किताबें, पॉडकास्ट और इंटरनेट के माध्यम से लोग खुद ही विभिन्न पद्धतियों को सीख रहे हैं।

20वीं सदी में आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने का जरिया किताबें, सत्संग, प्रवचन या व्यक्तिगत मुलाकातें थीं। 21वीं सदी ने तकनीक ने आध्यात्मिकता का लोकतांत्रीकरण (Democratization) कर दिया है। आज मेडिटेशन ऐप्स (जैसे Headspace, Calm), यूट्यूब चैनल्स और ऑनलाइन कोर्सेज के जरिए लोग घर बैठे ध्यान और योग सीख रहे हैं। आभासी दुनिया (Virtual classes) में भी आध्यात्मिक सत्र आयोजित हो रहे हैं।

20वीं सदी में आध्यात्मिकता को अक्सर रहस्यवाद, चमत्कारों या केवल बुढ़ापे की चीज के रूप में देखा जाता था। विज्ञान और आध्यात्मिकता में अक्सर टकराव रहता था। 21वीं सदी में आध्यात्मिकता को मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health), न्यूरोसाइंस (Neuroscience) और वेलनेस (Wellness) से जोड़कर देखा जाता है। माइंडफुलनेस (सजगता) और ध्यान को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी तनाव और डिप्रेशन से लड़ने का एक प्रभावी जरिया मानता है।

20वीं सदी में लोग आमतौर पर अपनी संस्कृति या देश की पारंपरिक आध्यात्मिक पद्धतियों तक ही सीमित थे (जैसे पश्चिम में ईसाई रहस्यवाद और पूर्व में योग-वेदांत)। हालांकि 20वीं सदी के उत्तरार्ध में पूर्व का ज्ञान पश्चिम में फैलना शुरू हुआ था लेकिन 21वीं सदी “हाइब्रिड या मिश्रित आध्यात्मिकता” का दौर है। कोई व्यक्ति ईसाई या हिंदू धर्म का पालन करते हुए भी बौद्ध धर्म की ‘विपश्यना’ तकनीक अपना सकता है और साथ ही सूफी संगीत से भी शांति पा सकता है।

तो साथिओ,साफ दिख रहा है कि दो शताब्दिओं की यात्रा में परिवर्तन तो हुआ ही है, हो भी क्यों न,यह तो प्रकृति का नियम है, ऋतुएँ बदलती हैं, जीवन बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं यहाँ तक कि सम्बन्ध भी बदलते हैं। 

समय के बदलाव, वैज्ञानिक उपलब्धियों के तर्क के आधार पर बहस होनी शुरू हो चुकी है कि तप, संयम, परमार्थ,मानवीय मूल्यों,Ethics,आस्तिकता, आध्यात्मिकता एवं धार्मिकता जैसी मान्यताएं  कितनी ही सराही क्यों न जाती हों,आँख मूँद कर क्यों स्वीकार कर लिया जाए। नए समय के नए तर्क, अपराधियों से लेकर हवा के साथ बहने वाले मनीषियों तक को समान रूप से अनुकूल दिखते पड़ते हैं और मान्यता के रूप में अंगीकार करने में भी सुविधाजनक प्रतीत होते हैं,तो हर कोई उसी को स्वीकार क्यों न करे? जिस दिशा में भीड़ चल रही है उसी दिशा में क्यों न चलें? जर्मन मनीषी Friedrich Nietzsche ने 19वीं सदी में ही दृढ़तापूर्वक घोषणा कर दी थी  कि “तर्क के इस युग में पुरानी मान्यताओं पर आधारित ईश्वर मर चुका। अब उसे इतना गहरा दफना दिया गया है कि भविष्य में कभी उसके जीवित होने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।’’ 

नीत्शे का अर्थ यह नहीं था कि आकाश में बैठा कोई वास्तविक ईश्वर मर गया है बल्कि उनका अभिप्राय था कि वर्षों से जिन मानवीय मूल्यों के पालन के लिए डरा  धमका कर पालन करने को कहा जाता रहा था, आज विज्ञान, टेक्नोलॉजी और तर्कशील भावना के कारण समाप्त हो गयी हैं। उनका कहना था कि जब समाज भगवान यां किसी अन्य बाहरी शक्ति पर निर्भर रहना बंद कर देता है तो उसे अपने भले बुरे का ज्ञान हो जाता है,अपने सभी कर्मों के लिए वह खुद ही ज़िम्मेदार होता है। 

धर्म के सम्बन्ध में भी प्रत्यक्षवाद (Positivism) ने यही कहा है कि वह अफीम की गोली भर है, जो पिछड़ों को सारी उम्र दुःख सहते रहने और गरीबी/अत्याचार के विरुद्ध मुँह न खोलने के लिए बाधित करता है, साथ ही वह अनाचारियों को निर्भय बनाता है ताकि लोक में अपनी चतुरता और समर्थता के बल पर वे उन कार्यों को करते रहें, जिन्हें अन्याय कहा जाता है। परलोक का प्रश्न यदि आड़े आता हो तो वहाँ से बच निकलना और भी सरल है। किसी देवी-देवता की पूजा-पत्री कर देने या धार्मिक कर्मकाण्ड का सस्ता-सा आडम्बर बना देने भर से पापकर्मों के दण्ड से सहज छुटकारा मिल जाता है। जब इतने सस्ते में तथाकथित पापों की प्रतिक्रिया से बचा जा सकता है तो रास्ता बिल्कुल साफ है। मौज से मनमानी करते रहा जा सकता है और उससे कोई कठोर प्रतिफल की आशंका हो तो पूजा-पाठ के सस्ते से खेल-खिलवाड़ करने से वह आशंका भी निरस्त हो सकती है।

सच तो यह है कि जो लोग धर्म और अध्यात्म को चर्चा-प्रसंगों में मान्यता देते हैं, वे भी निजी जीवन में प्राय: अधर्मी और नास्तिक करते देखे जाते हैं। धर्मोपदेशक से लेकर धर्मध्वजियों के निजी जीवन का निरीक्षण-परीक्षण करने पर प्रतीक होता है कि अधिकांश लोग उस स्वार्थ को ही अपनाए रहते हैं जो अधार्मिकता की परिधि में आती है। 

आडम्बर,पाखण्ड और प्रपंच एक प्रकार से घोर नास्तिकता ही है। होना तो यह चाहिए था कि जो लोग आस्तिकता और धार्मिकता की महत्ता भी बखानते हैं, उन्हें खुद  तो भीतर और बाहर से एकरस होना ही चाहिए था लेकिन जब उनकी स्थिति आडम्बर भरी होती दिखती है, तो प्रतीत होता है कि “प्रत्यक्षवादी नास्तिकता” ही नहीं, “घोर धर्माडम्बर” भी लगभग उसी मान्यता को अपनाए हुए हैं। लोगों की आँखों में धूल झोंकने या उनसे अनुचित लाभ उठाने के लिए ही धर्म का ढकोसला गले बाँधा जा रहा है। धर्म के ऐसे ठेकेदार ईश्वर को भी न्यायकारी-सर्वव्यापी नहीं मानते। यदि ऐसा होता तो धार्मिकता की वकालत करने वालों में से कोई भी परोक्ष रूप से अवांछनीयता अपनाए रहने के लिए तैयार नहीं होता। तथाकथित धार्मिक और खुलकर इंकार करने वाले नास्तिक लगभग एक ही स्तर के बन जाते हैं।

पदार्थ  की जिस कमी को विज्ञान ने पूरा किया है यदि वह कमी बनी ही रहती तो पिछली पीढ़ियों की तरह सादा जीवन अपनाकर भी हँसी-खुशी के साथ निर्वाह चलता रह सकता था। ऋषियों, तपस्वियों, महामानवों, लोकसेवियों में से अधिकांश ने कठिनाइयों और अभाव वाला भौतिक जीवन जिया है, फिर भी उनकी भौतिक या आध्यात्मिक स्थिति खिन्न-विपन्न नहीं रही। 

सच तो यह है कि वे आज के तथाकथित सुखी समृद्ध लोगों की तुलना में कहीं अधिक सुख-शान्ति भरा प्रगतिशील जीवन जीते थे एवं ऐसा हँसता-हँसाता वातावरण बनाए रखते थे, जिसे सतयुग के रूप में जाना जाता था और जिसको पुन: प्राप्त करने के लिए आज का मानव तरस रहा है। लेकिन क्या किया  जाए,इस सच्चाई को मानने के लिए कोई भी तैयार नहीं है। साफ़ दिख रहा है कि पदार्थवाद ने आंतरिक प्रसन्नता से वंचित रखा हुआ है लेकिन मैं न मानूं !!!! 

इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि भौतिकता के सुविधा-साधन बढ़ाने वाले पक्ष ने समर्थजनों के लिए लाभ उठाने के अनेकों आधार उत्पन्न एवं उपस्थित किए हैं, बाहिर से दिख रही चमक-दमक को देखकर ऐसा  लगता है कि विज्ञान ने आधुनिक समय को बहुत सुविधा-सम्पन्न बनाया है लेकिन दूसरी ओर तनिक-सी दृष्टि मोड़ते ही पर्दा उलट सा दिखता है। दूसरी तरफ देखने पर दृश्य बिल्कुल ही  विपरीत दिखता है। सुसम्पन्न, समर्थ लोगों की संख्या बहुत ही कम है। विश्व की सारी सुविधा एवं अमीरी कुछ एक लोगों के हाथ तक ही सीमित रह गई है। यहां यह भी जानना बहुत ज़रूरी है कि उन्होंने जो बटोरा है वह भी कहीं आसमान से नहीं टपका बल्कि दुर्बल,भोले भावुकों को पिछड़े हुए समझकर/बनाकर  उन्हीं के अधिकारों का अपहरण करके वह सम्पन्नता थोड़े लोगों के हाथों में एकत्रित हुई है। इस एक पक्ष की बढ़ोत्तरी ने अधिकांश लोगों का बड़ी मात्रा में Abuse किया है। जिस प्रकार गरीब Abuse हुए हैं, इसे देखते हुए विवेकवानों को असमंजस में डूबना पड़ता है कि दृष्टिगोचर होने वाली प्रगति क्या वास्तविक प्रगति है? इसके पीछे अधिकांश को पीड़ित शोषित,अभावग्रस्त रखने वाला कुचक्र तो काम नहीं कर रहा है।

जय गुरुदेव 


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