वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

“परिवर्तन के महान क्षण” पुस्तिका पर आधरित लेख श्रृंखला का प्रथम लेख

“परिवर्तन के महान क्षण” मात्र 35 पन्नों की एक बहुत ही छोटी सी पुस्तिका है। 23 पुस्तकों के अद्भुत संग्रह “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की यह छठी पुस्तिका है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार ने इन सभी 23 पुस्तकों को,एक-एक करके, एक-एक शब्द को पढ़ कर,समझ कर ज्ञानप्रसाद लेखों के रूप में प्रस्तुत करने का संकल्प लिया हुआ है ,हमें बताते हुए बहुत ही गर्व अनुभव हो रहा है पहली पांच पुस्तिकाओं को बहुत ही अच्छा सहयोग मिला है, बाकी के लेखों के लिए भी उसी तरह के सहयोग की आशा करते हैं। 

पिछली शताब्दी की वर्तमान शताब्दी के साथ तुलना करते हैं तो स्पष्ट परिवर्तन दिखता है, हो भी क्यों न? परिवर्तन तो सृष्टि का नियम है। प्रश्न तो यह उठता है कि परिवर्तन नेगेटिव हो यां पॉजिटिव। आज का लेख इसी प्रकार की चर्चा कर रहा है। 

आओ सभी गुरुशिष्य मिल कर,गुरुचरणों में समर्पित होकर आज के गुरुज्ञान का अमृतपान करें। 

*******************      

20वीं  सदी का अंत आते-आते समय सचमुच बदल गया है। कभी तो विश्वास ऐसे अटूट स्तर का था कि मिट्टी के द्रोणाचार्य ने ही एकलव्य को धनुष विद्या में प्रवीण-पारंगत कर दिया था। मीरा का अटूट विश्वास ही था कि  उसके बुलाते ही भगवान साथ में नृत्य करने लगते थे। 

यह बातें उस समय की हैं जब शाप-वरदान भी शस्त्र प्रहारों और बहुमूल्य उपहारों जैसा काम करते थे।वोह भाव-संवेदनाओं का समय था,चमत्कारों का समय था। परम पूज्य गुरुदेव ने चमत्कारों की कभी भी सराहना की, सदैव उनकी निंदा ही की है। लेकिन उन्होंने बार-बार इस तथ्य को समझाया है कि जब श्रद्धा अटूट होती है, भक्ति और समर्पण उच्चस्तरीय होते हैं तो भगवान भी भक्त के पास दौड़े-दौड़े आते हैं। 

15 वर्षीय बालक श्रीराम की साधना कोठरी में प्रकाशपुंज से हिमालय गुरु का प्रकट होना कोई पौराणिक कथा नहीं, कुछ वर्ष पूर्व ही घटित हुई बात है। यह गुरुदेव का समर्पण ही था जिसने एक ऐसी सच्चाई को देखा जिसे  हर कसौटी पर सही पाया जा सकता है। यह घटना 1916 के वसंत की, 20वीं शताब्दी के आरम्भ की है, इसी शताब्दी के अंत तक पहुंचते-पंहुचते  संसार भौतिक जगत में ही सिमट कर रह गया, समर्पण,विश्वास,श्रद्धा जैसे शब्द मात्र शब्द ही बन कर रह गए, जो दिखता है वही सत्य है, वही सब कुछ है। इन पक्तियों को पढ़ रहे पाठक अपनी आँखों से स्वयं ही इस शताब्दी के परिवर्तन के साक्षी होंगें, उन्होंने स्वयं ही देखा है कि मात्र कुछ वर्ष पहले से ही (जब उनका जन्म हुआ होगा) आज कैसा परिवर्तन दिख रहा है। 

इस परिवर्तन का सबसे बड़ा Outcome प्रतक्ष्यवाद और भौतिकवाद ही रहा है।  हमारे पाठकों को स्मरण हो आया होगा कि इस विषय में हमने कितने ही लेख लिखे हुए हैं। प्रतक्ष्यवाद के महत्वपूर्ण विशाल विषय को यहीं पर छोड़ना होगा लेकिन उस  प्रज्ञागीत को कैसे छोड़ दें जिसमें आदरणीय गोविन्द पाटीदार जी अपनी टोली के साथ मूर्धन्यों को जागने के लिए कह रहे हैं क्योंकि औरों से उन्हें कोई आस नहीं है। आशा की जाती है कि हमारे साथी गोविन्द जी की क्रांतिकारी वाणी में डूब जाने के साथ ही प्रज्ञागीत के लिरिक्स का भी अमृतपान करेंगें,गीत के लेखक और गायक मण्डली अवश्य ही हमारे साथिओं की आत्मा को झंकृत करेंगें।  

लिरिक्स:

परिवर्तन के बिना न होता विभीषिका का नाश। मूर्धन्यों जागो औरों से, रही न कोई आस ॥

मानव के चिन्तन चरित्र में आज असुरता छाई। पाप पतन की कुंठा भावों बीच समाई।।

है अभाव से दुःखी राष्ट्र, जनसंख्या बढ़ती जाती। अणु युद्धों की होड़ लग रही, मानवता अकुलाती॥

प्रकृति क्षुब्ध हो उठी आज फिर, सहा न जाता त्रास॥मूर्धन्यों जागो औरों से, रही न कोई आस ॥

ऋतु बसन्त आने से पहले, पतझड़ हो जाती है। नव शिशु को पाने से पहले, माँ पीड़ा पाती है॥

नये भवन के लिए पुराने, खण्डहर ढाये जाते। ढाये खण्डहर की छाती पर नये उठाये जाते ॥

चन्द्रगुप्त चाणक्य बदलते, इसी तरह इतिहास॥ मूर्धन्यों जागो औरों से, रही न कोई आस ॥

अवतारों की परम्परा है, परिवर्तन लाने को, दिव्य चेतना धारण करती इस मानव बाने को॥

परिवर्तन हो गया जरूरी, हम भी शिवा समर्थ सरीखा, भरें नया विश्वास॥ मूर्धन्यों जागो औरों से, रही न कोई आस ॥

जन मानस के दृष्टिकोण को फिर बदला जाना है। परशुराम का और बुद्ध का, क्रम फिर दोहराना  है॥

मानव में देवत्व उदय कर, धरती स्वर्ग बनाना। मानवता को पाप पतन से, अब है मुक्त कराना॥

तो साथिओ प्रज्ञागीत का आनंद तो सबने उठा लिया, वर्षों पहले रिलीज़ हुआ यह गीत बता रहा है कि हमारे गुरु किस स्तर के युगदृष्टा थे/हैं। आज की भयावह परिस्थितिओं को उन्होंने वर्षों पहले देख किया था और आज 2026 में जब यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं तो आने वाला समय कैसा होने वाला है गुरुदेव देख रहे हैं। गुरुदेव उस समय को देखते हुए ही हमसे आग्रह  कर रहे हैं, हम जैसे नगण्य से मानवों से ज्ञान का प्रचार-प्रसार करवा रहे हैं। जब हमारे गुरु ने हमें यह कार्य सौंप ही दिया है,एक समर्पित टीम भी दे दी है तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता कि हम कोई बहाना बनाएं, गुरुदेव के कार्य में अपना हाथ न बटाएँ। मूर्धन्य कोई विशेष प्रकार के,विशेष बुद्धि वाले,उच्च डिग्रीयों वाले, वरिष्ठ प्राणी ही नहीं होते, ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का एक-एक साथी अपनी पूरी सामर्थ्य-शक्ति से गुरुकार्य के लिए संकल्पित है, ऐसा हमारा अटूट विश्वास है।    

लेख का शुभारम्भ 20वीं शताब्दी के अंत तक, प्रतक्ष्यवाद और भौतिकवाद से ग्रस्त मानव को रेफर कर रहा था। अधिकतर मनुष्य उसी पर विश्वास करते थे जो उन्हें दिखता था।इस संदर्भ में एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि न तो आत्मा दिखती है और न ही परमात्मा दिखता है तो क्या इन दोनों का कोई अस्तित्व ही नहीं? कैसा मूर्खों वाला प्रश्न है!!! भला आत्मा और परमात्मा के बिना भी सृष्टि का अस्तित्व हो सकता है, मूर्धन्यों ने पिछली शताब्दी से ही इन मूर्खों को समझाना शुरू कर दिया था, तभी तो 21वीं शताब्दी को भाव-संवेदना की शताब्दी  कहा जा रहा है। कोई हैरानगी वाली बात नहीं कि आज भी भगवान में विश्वास न करने वाले अनेकों मनुष्य मिल जायेंगें।    

ठीक है आत्मा तो दिखती नहीं है इसीलिए 20वीं शताब्दी के अंत में यह ओझल हो गयी थी। वोह प्रत्यक्षवाद का समय था, परिवर्तन का समय था, गुरुदेव ने इसी को परिवर्तन के महान क्षण कहा। मात्र 35 पन्नों की लघु पुस्तक “परिवर्तन के महान क्षण” में यही सब कुछ चित्रित किया हुआ है।

हमारे वरिष्ठ साथिओं ने अपने जीवनकाल में  परिवर्तन के महान क्षण अवश्य देखे होंगें, अवश्य देखा होगा कि कहाँ से शुरू हुए थे और कहाँ पहुँच गए हैं। यह कोई अचम्भे वाली बात नहीं है क्योंकि परिवर्तन तो सृष्टि का अटल नियम है।    

गुरुदेव उस समय की बात करते हुए बता रहे हैं कि मनुष्य शरीर के लिए ही जी रहा है, उसी के पालन के लिए सब कुछ किये जा रहा है। फैशन-परस्ती,भोग-विलास, वैभव आदि  ही सब कुछ,सबसे महत्वपूर्ण  बन कर रह गए हैं। जो सामने प्रतक्ष्य, इंस्टेंट दिख रहा है वही सब कुछ है। जिस किसी भी पदार्थ को देखने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़े, जिसको समझने के लिए गहराई में उतरना पड़े, परिणाम के लिए प्रतीक्षा करनी पड़े, वोह सब झूठ है, मिथ्या है। 

आत्मा दिखाई नहीं देती, परमात्मा को भी अमुक शरीर धारण किए, अमुक स्थान पर बैठा हुआ और अमुक हलचलें करते नहीं देखा जाता इसलिए उन दोनों की ही मान्यता समाप्त कर दी गई।

फिजिकल साइंस का आधार प्रतक्ष्य ही है, वोह तो उतने को ही सच मानता है जो प्रत्यक्ष देखा जाता है। तो यहाँ पर एक और प्रश्न उठता है: Mathematical/Chemical  equations के बिना फिजिकल साइंस का अस्तित्व ही नहीं,उनको Solve किये बिना वैज्ञानिक एक कदम भी नहीं चल सकते, यह भी तो नहीं दिखतीं, सभी Equations अप्रतक्ष्य हैं तो फिर इतनी बड़ी उपलब्धियां, इतने बड़े अविष्कारों को क्यों माना जा रहा है? उसी सदी के अंत के मानव की यही सबसे बड़ी विडंबना थी कि मनुष्य को जो सूट किया, उसने उसे ही ठीक मान लिया,साबित करने के लिए तरह-तरह के तर्क दिए, ऐसे मानव को ही तो गुरुदेव ने भटका हुआ देवता कहा है। हम तो कहेंगें कि जहाँ भौतिक साइंस फेल  होती है वहीँ मनुष्य की सहायता के लिए आध्यात्मिक साइंस आती है। भौतिक साइंस की तुलना में आध्यात्मिक साइंस काम्प्लेक्स और साधारण मनुष्य के लिए न समझ आने के कारण इसे यह कह कर नकार दिया जाता है कि I don’t believe in this rubbish.है न कितनी मूर्खतापूर्ण स्थिति!!! अरे भैया इसे समझने का प्रयास तो करो,समझने के लिए समय तो लगाओ, आप तो हथेली पर सरसों ज़माने निकले हो।     

पुरातन काल में चेतना और श्रद्धा में “शक्ति (Power) की मान्यता को स्वीकारा जाता रहा था आधुनिक काल में वोह शक्ति अविश्वस्त हो गई है, स्विच ऑन करने पर पंखा चलना तो अवश्य दिखता लेकिन इलेक्ट्रिक पावर दिखाई नहीं देती इसलिए वोह अमान्य है। प्रतक्ष्यवाद की इस धारा के आधार पर हुए परिवर्तन से अन्धविश्वास जैसी मूढ़-मान्यताओं से नजात पाने का लाभ तो हुआ लेकिन और हानि यह हुई कि नीतिमत्ता (Morality), आदर्शवादिता (Idealism),धर्म-धारणाओं को अस्वीकार ही कर दिया गया। इसलिए मानवी गरिमा (Human dignity) के अनुरूप अनुशासन भी लगभग समाप्त ही हुआ जा रहा है। शायद ही किसी ग्रुप में,मण्डली में मानवीय मूल्यों की बात होती हो।  

नई मान्यता के अनुसार मनुष्य एक चलता-फिरता कंप्यूटर मान लिया गया है। कमांड दो, उसे प्रोग्राम करो,बस इतना ही है, ज़्यादा बात मत करों। इस मान्यता के कारण  प्राणीवध, जिसे  निर्दयता और निष्ठुरता का आरोपलगाकर  लोग अनुचित और अधार्मिक माना करते थे, अब वह असमंजस का विषय रह ही नहीं गया है। ऐसा दिखता है कि कद्दू-बैंगन की तरह किसी भी पशु-पक्षी को माँसाहार के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। मांसाहारी आहार में अधिक प्रोटीन होने और प्रतक्ष्यवादी अपने शरीर को लाभ मिलने की बात कहने लगें तो कोई प्राणीवध को इसलिए क्यों अस्वीकार करे कि उसके कारण नीति का अनुशासन बिगड़ता है तथा भावनाएँ विचलित होती हैं। ठीक यही बात अन्य मानवी मर्यादाओं के सम्बन्ध में भी हैं। अपराधों के लिए द्वार इसीलिए खुला कि उसमें केवल दूसरों की ही हानि होती है। अपने को तो तत्काल लाभ उठाने का अवसर मिल जाता है। अन्य विचारों में भी पशु-प्रवृत्तियों को अपनाए जाने के सम्बन्ध में जो तर्क दिए गए और प्रतिपादन प्रस्तुत किए गए हैं, उन्हें देखते हुए यौन सदाचार के लिए भी किसी पर कोई दबाव नहीं पड़ता। जब इस सम्बन्ध में पशु पूरी तरह से  स्वतन्त्र हैं तो मनुष्य के लिए ही क्यों इस सन्दर्भ में प्रतिबन्ध होना चाहिए। जीव जगत में जब धर्म, कर्तव्य दायित्व जैसी कोई मान्यता नहीं तो फिर मनुष्य ही उन जंजालों में अपने को क्यों बाँधे।  जब बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है, जब बड़ी चिड़िया को छोटी चिड़ियों पर आक्रमण करने में कोई हिचक नहीं होती,जब चीते हिरन स्तर के कमजोरों को दबोच लेते हैं तो फिर समर्थ मनुष्य ही अपने असमर्थजनों का शोषण करने में क्यों चूकें?

प्रत्यक्षवाद ने, भौतिक विज्ञान ने सुविधा-संवर्धन के लिए कितने ही नए-नए आधार दिए हैं, तो उसकी उपयोगिता और यथार्थता पर क्या किसी को सन्देह करना चाहिए? यदि आत्मा, परमात्मा, धर्म, कर्तव्य पुण्य, परमार्थ जैसी मान्यताओं के आधार पर कोई इंस्टेंट लाभ नहीं मिलता तो फिर व्यर्थ ही उन बन्धनों को क्यों माना जाए जिनके कारण मनुष्य को घाटा ही घाटा दिखे। प्रतक्ष्यवाद की वकालत कर रहे  समाज ने तो समर्थों को मानवीय मूल्यों का पालन करने पर संत्रस्त और शोषण ही कहा है।

जय गुरुदेव 


Leave a comment