वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

एक ही प्रवाह में लिखी गयी थी “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला”

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के समर्पित साथिओं को बताना चाहेंगें  कि आज का ज्ञानप्रसाद लेख बहुत ही छोटा है लेकिन बहुत ही बड़ा ज्ञान लिए हुए है। 23 पुस्तकों का  संग्रह जिसे “क्रांतिधर्मी साहित्य” का टाइटल दिया गया है, आज का लेख इस विषय पर चर्चा कर रहा है कि “एक ही प्रवाह में” लिखे जाने का क्या अर्थ है। इस तथ्य को समझने के लिए एक शार्ट वीडियो, बिना पानी पिए फोल्डर और ब्रिटिश उपन्यासकार बारबरा कार्टलैंड के कीर्तिमान का सहयोग लिया है। 

आइए आज की गुरुकक्षा का शुभारम्भ,हर बार की तरह गुरुचरणों में समर्पित होकर करें। 

सभी गुरुशिष्यों का इस दिव्य गुरुकक्षा में सहृदय स्वागत है। 

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परम पूज्य गुरुदेव की दिव्य लघु पुस्तिका “परिवर्तन के महान क्षण” पुस्तिका के अध्ययन का शुभारम्भ आज भी करना संभव नहीं हो पा रहा है। इसका मुख्य कारण कल वाले लेख का एक  वाक्य है जिसने हमें ऐसा आकर्षित किया कि हमें उस वाक्य के कंटेंट ने न केवल रिसर्च करने के लिए कहा बल्कि जो ज्ञान प्राप्त हुआ उसे ज्ञानरथ परिवार के समक्ष लाने को भी कहा। 

ज्ञान जब तक समझा नहीं जाता, शेयर नहीं होता, साथिओं के साथ चर्चा नहीं होती, विचारों का आदान-प्रदान नहीं होता, तब तक ज्ञान अपने तक ही सीमित रहता है। अपने तक सीमित रखने के चक्र में, Inhibition के वशीभूत, डर के कारण ज्ञान बंधा सा रह जाता है। ज्ञान तो अनंत है, असीमित है, ज्ञान का विस्तार होना तो प्रकृति का नियम है, ज्ञानरथ परिवार में प्रकृति के इसी का पालन हो रहा है। गुरुदेव भी तो इसीलिए कह रहे हैं, “इन पुस्तकों को 100 बार पढ़ना” क्योंकि वोह जानते हैं कि मेरे बच्चे गम्भीरता से पढेंगें नहीं, समझेंगें नहीं और कह देंगें कि हमने 23 पुस्तकें तो क्या गुरुदेव द्वारा लिखित अनेकों पुस्तकें पढ़ी हुई हैं। यदि ऐसा होता तो जिन्होंने यह पुस्तकें पहले पढ़ी हुई हैं उन्हें नया क्यों “नोटिस” हो रहा,लेख के सब्जेक्ट पर ही इतने उत्कृष्ट कमेंट-काउंटर क्यों हो रहे हैं। कमैंट्स-काउंटर-कमैंट्स से साफ़ दिख रहा है कि लाभ तो हो ही रहा है। खैर इस चर्चा को यहीं पर रोक कर उस वाक्य की बात करनी होगी जिसने हमें इतना आकर्षित किया और क्यों किया। वह वाक्य निम्नलिखित था:

इस वाक्य में लिखे गए शब्द “एक वर्ष की अवधि में एक ही प्रवाह में” इतने महत्वपूर्ण थे कि इनकी बारीकी में जाने के लिए ऑनलाइन रिसर्च करने पर मालूम हुआ कि “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की 23 पुस्तिकाओं का सृजन गुरुदेव ने एक ही प्रवाह में, एक ही फ्लो में किया था। बड़ी ही सावधानी एवं अपने ही व्यक्तिगत विचारों से लिख रहे हैं कि “क्या एक ही प्रवाह का अर्थ बिना रुके, बिना कलम उठाए है?”, यह हमारे ही व्यक्तिगत विचार हैं, इनका कोई भी तथ्य उपलब्ध नहीं है ,इसलिए इसे मानना/न मानना पाठकों की अपनी मर्ज़ी है, लेख पर मिलने वाले कमेंट-काउंटर कमेंट इस विषय पर सहायता प्रदान कर सकते हैं-ऐसा हमारा अनुभव है।

23 पुस्तकों के एक ही प्रवाह में लिखे जाने का कोई प्रमाण तो न मिला लेकिन साथिओं ने “गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे फोल्डर” के बारे में तो सुना ही होगा। गुरुदेव ने लघु साहित्य,पत्रक/पुस्तिकाओं को ट्रैक्ट/फोल्डर के नाम से पुकारा है। गुरुदेव से जुडी यह एक  ऐसी घटना और साधना है जहाँ गुरुदेव रोज़ सुबह तब तक पानी की एक भी बूँद नहीं पीते थे जब तक कि वह  समाज के कल्याण के लिए एक पूरा फोल्डर नहीं लिख लेते थे। इस  कृत्य  के पीछे गुरुदेव की कठिन साधना,संकल्पशीलता तो थी ही साथ में अपने बच्चों के लिए “पॉकेट साहित्य” का सृजन करना भी था। इस प्राणवान और जीवंत साहित्य में रेगुलर लेखों की तुलना में कहीं अधिक आध्यात्मिक तड़प थी,यही कारण है कि  इस साहित्य में पाठक के अंतःकरण को छूने की क्षमता थी। 

तो साथिओं यह तो हुई उस वाक्य की बात जिसके कारण (गुरुदेव के निर्देश अनुसार) हमें उनकी दिव्य पुस्तिका “परिवर्तन के महान क्षण” के अध्ययन को कल तक के लिए पोस्टपोन करना पड़ा। 

यहीं पर एक और बात जिसने हमारा ध्यान आकर्षित किया साथिओं की आज्ञा से शेयर कर रहे हैं। 

परम पूज्य गुरुदेव ने अपने छोटे से जीवनकाल में क्या कुछ कर डाला, कितने कीर्तिमान स्थापित किये,इसके बावजूद उनका नाम Guinness book Of records  में दर्ज नहीं है। दूसरी तरफ ब्रिटिश उपन्यासकार बारबरा कार्टलैंड ने अपने जीवनकाल में 723 उपन्यास लिखे जिनमें  से 23 उपन्यास एक ही वर्ष में “एक ही प्रवाह” में लिखे जिसके लिए उनका नाम Guinness book में शामिल है। बारबरा ने कोई भी पुस्तक टाइपराइटर या पैन से नहीं लिखी है,वे अपने सोफे पर आराम से बैठकर पूरी कहानी अपने सेक्रेटरीज को डिक्टेट कराती थी। हर दोपहर लगभग 6000 शब्द बोलकर लिखाती, इस तरह एक सप्ताह में पूरा उपन्यास पूरा कर लेती।  

एक ही प्रवाह में लिखना,अर्थात लेखक  के विचारों में कोई रुकावट न आना एक गहरी प्रेरणा,आध्यात्मिक आवेश/आवेग से ही होता है, यही वोह आवेश है जो रचनाकार से बिना किसी रुकावट से  लिखवाता ही जाता है। ऐसा करना लेखक की असाधारण/अत्यधिक   उत्पादकता (Productivity) और मानसिक क्षमता को दर्शाता है जो बिना थके या बिना ब्रेक  लिए इतनी बड़ी संख्या में पुस्तकों का लेखन करने की सामर्थ्य रखते हैं। 

हमें नहीं मालूम कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं के पास ऐसी असाधारण लेखन क्षमता कहाँ से आ गयी कि जो लोग केवल “जय गुरुदेव” लिख कर पल्ला जाड़ लेते थे,आज इतने बड़े कमेंट के साथ-साथ लेख से सम्बंधित उत्कृष्ट कमेंट लिख रहे हैं। ऐसे साथिओं में गुरुशक्ति साक्षात् अवतरित हुई है, गुरु ने खुद ही तो कहा है, “तू एक कदम तो उठा, उड़ा कर न ले जाऊं तो कहना।”

हमारे पाठकों ने आज के लेख में एक बात नोटिस की होगी कि बारबरा के उपन्यासों की संख्या 723, एक वर्ष के उपन्यास 23 और क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला का नंबर भी 23, भैया हम तो ठहरे वैज्ञानिक प्रवृति के प्राणी, नम्बरों पर, Numerology पर कहाँ विश्वास करने वाले हैं, हमारी शंका-प्रवृति  तो इस स्तर की है कि मृतक शरीर को जब तक छू न लें, सांस चैक  न कर लें तो कहाँ विश्वास कर पायेंगें कि मृत्यु हो चुकी है। 

अंक ज्योतिष और रहस्य की दुनिया में “23” को इतना चमत्कारी माना गया है कि इसे 23 Enigma (चमत्कार) कहा जाता है।हॉलीवुड में तो “23 Enigma” पर मूवी भी बन चुकी है। मानव शरीर में 23 क्रोमोसोम्स होते हैं, माता और पिता दोनों के 23-23 मिलते हैं /पृथ्वी भी अपनी धुरी पर 23.5 डिग्री झुकी हुई है। 23 नंबर के बारे में ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जायेंगें लेकिन जो भी हो, जैसा भी हो हमारे पाठकों की मनःस्थिति में अवश्य ही चमत्कार दिख रहा है, गुरु के साहित्य का अध्ययन किया जाए और चमत्कार न हो,ऐसा हो ही नहीं सकता। 

तो साथिओ आज के लेख का यहीं पर समापन करना उचित रहेगा, लेख छोटा अवश्य है लेकिन ज्ञान और सन्देश बहुत बड़ा है। 

हाँ चलते-चलते, परिवर्तन के क्षण पुस्तक के बारे में इतना तो बता ही दें कि मात्र 35  पन्नों की छोटी सी पुस्तिका 11 छोटे-छोटे चैप्टर लिए हुए है लेकिन छठा चैप्टर जिसका शीर्षक “लेखक का निजी अनुभव है” एक ऐसा चैप्टर है जिसकी  दिव्यता पढ़ने पर ही अनुभव हो सकेगी, हमें तो ऐसा अनुभव हो रहा था कि हम साक्षात् गुरुवर के सामने ही बैठकर सुन रहे हैं। 

धन्यवाद्, जय गुरुदेव       


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