वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

“परिवर्तन के महान क्षण” पुस्तक के शुभारम्भ से पूर्व गुरुदेव के सन्देश एक बार फिर से रिवीजन 

वर्ष 2026 गायत्री परिवार के लिए एक अविस्मरणीय वर्ष स्मरण किया जायेगा। यह वर्ष परम वंदनीय वंदनीय माता जी के जन्म दिवस के 100 वर्ष,अखंड दीप के प्राकट्य के 100 वर्ष एवं परम पूज्य गुरुदेव की साधना के 100 वर्ष को समर्पित है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के समर्पित साथिओं ने इस त्रय शताब्दी वर्ष में घटित हो रहे तीनों दिव्य अवसरों को मनाने का संकल्प लिया हुआ है। इस संकल्प के अंतर्गत वंदनीय माता जी के जीवन को समर्पित लेख प्रस्तुत किये गए,फिर अखंड दीप को समर्पित लेखों की श्रृंखला का समापन हुआ उसके  बाद परम पूज्य गुरुदेव को समर्पित लेखों की श्रृंखला चल रही है। अभी तक अनेकों लेख प्रस्तुत किये जा चुके हैं ,हमारे समर्पित साथी इन लेखों का अध्ययन करके, समझ कर अपने विचारों को कमैंट्स एवं काउंटर कमैंट्स प्रक्रिया से परिवार में शेयर कर रहे हैं। सभी साथी भलीभांति जानते हैं कि गुरुदेव द्वारा रचित साहित्य केवल पढ़ने वाला कोष नहीं है, अलमारी में सजाने वाली पुस्तकें नहीं हैं, लोगों से बढ़ाई बटोरने का साधन नहीं हैं कि हमने इतनी पुस्तकें खरीद कर रखी हैं बल्कि समझ कर, अंतर्मन में उतार कर,चिंतन मनन करके, अनेकों के साथ शेयर करने वाला अद्भुत ज्ञान है। दैनिक जीवन की शायद ही कोई समस्या हो जिसका निवारण इस ज्ञान से न हो सकता हो।

“क्रांतिधर्मी साहित्य” की लगभग सभी पुस्तकों को अनेकों साथिओं ने पढ़ा है, लेकिन उन्हें एक बार फिर पढ़वाने के पीछे केवल गुरुदेव को जानने का ही लॉजिक है, गुरुदेव ने भी हर पुस्तक में इस लॉजिक पर बल दिया है। हमारा भी कर्तव्य बनता है कि 6वीं पुस्तक “परिवर्तन के महान क्षण” का शुभारम्भ करने से पहले “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” के प्रति गुरुदेव के विचारों को फिर से दोहरा लें।

आइए सभी गुरुशिष्यों को, गुरुवर की गुरुकक्षा में आमंत्रित करें और आज के ज्ञानप्रसाद का शुभारम्भ करें।

**********************  

“परिवर्तन के महान क्षण” परम पूज्य गुरुदेव द्वारा रचित 23 पुस्तकों की दिव्य पुस्तकमाला “क्रांतिधर्मी साहित्य” की  6वीं पुस्तिका है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से 23 पुस्तकों की लिस्ट में से पांच पुस्तकों का जिस प्रकार अध्ययन हुआ है यदि कहें कि उस सामूहिक परिश्रम को व्यक्त करने के लिए शब्दों का दुर्भिक्ष सा पड़ गया है तो शायद अतिश्योक्ति न हो। ऐसा कहना इसलिए अनुचित नहीं समझा जा रहा है कि एक-एक शब्द को पढ़कर, समझकर,उदाहरणों के साथ प्रस्तुत करने के पीछे परम पूज्य गुरुदेव की ही प्रेरणा एवं निर्देश रहा है।

इन पुस्तिकाओं के बारे में गुरुदेव ने स्वयं लिखा है:

‘‘बेटे हमारे विचार, क्रान्ति के बीज हैं। ये थोड़े से भी दुनियाँ में फैल गए तो अगले दिनों धमाका कर देंगे। सारे विश्व का नक्शा बदल देंगे।….. मेरे अभी तक के रचे गए विशाल साहित्य का सार हैं।….. मेरे सारे जीवन का लेखा-जोखा हैं।….. इन पुस्तकों में जीवन और चिंतन को बदलने के सूत्र हैं।….. हमारे उत्तराधिकारियों के लिए, हमारे बच्चों के लिए यही हमारी वसीयत हैं।…..

गुरुदेव हमें कह रहे हैं:

मेरे द्वारा रचा गया अभी तक का साहित्य पढ़ पाओ या न पढ़ पाओ,कोई बात नहीं लेकिन क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला की 23 छोटी-छोटी पुस्तकों को अवश्य पढ़ना।

इन पॉकेट बुक्स को आप बस में बैठे, कार में यात्रा करते समय बड़े आराम से पढ़ सकते हो। इन्हें छोटे आकार में प्रिंट करने के पीछे गुरुदेव की यही धारणा थी कि आने वाले दिनों में हर कोई यही कहता मिलेगा, “समय किसके पास है?” ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार ने इन पॉकेट बुक्स को और भी छोटे -छोटे ज्ञानप्रसाद लेखों में  प्रस्तुत करने का प्रयास किया है ताकि कोई भी समय का बहाना न बना सके। इन लेखों को पढ़कर पाठक थोड़े से ही समय का दान करके भूत कुछ प्राप्त कर सकते हैं।

इन पुस्तकों में  समाहित ज्ञान को समझे बिना आप भगवान के इस मिशन को न तो  समझ सकते हो और न ही किसी को समझा सकते हो।

गुरुदेव निर्देश देते हैं:

युग के निर्माण के लिए, प्रत्येक कार्यकर्ता को नियमित रूप से इन सभी पुस्तकों को पढ़ना और जीवन में उतारना बहुत ही जरूरी है, इन्हें पढ़ने के बाद ही हमारी संतानें अगले चरण में प्रवेश कर सकेंगीं।

इन पुस्तकों की महत्ता को समझाते हुए गुरुदेव लिखते हैं:

यह इस युग की गीता है। एक बार पढ़ने से न समझ आए तो 100 बार पढ़ना,अन्य 100  लोगों को पढ़ाना एवं उनसे भी कहना कि वोह 100 और लोगों का पढ़ाएं।

गुरुदेव कहते हैं कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि हम लिखें तो उसका असर न हो। जैसे अर्जुन का मोह गीता से भंग हुआ था, वैसे ही तुम्हारा मोह इस युग-गीता से भंग होगा। मेरे द्वारा रचा गया साहित्य मेरे शरीर के वजन से भी ज्यादा भारी है। जीवन भर के इस साहित्य को तराजू के एक पलड़े में रखें और क्रान्तिधर्मी साहित्य को दूसरे पलड़े में रखें, तो इनका वजन ज्यादा होगा। महाकाल ने स्वयं मेरी उँगलियाँ पकड़कर ये साहित्य लिखवाया है। इस साहित्य पर कोई कॉपीराइट नहीं है, कोई प्रतिबंध नहीं है, सभी पाठकों को पूर्ण छूट है कि इन्हें छपवाकर प्रचार/प्रसार करके मेरे “ज्ञान शरीर” को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास करें।

युगद्रष्टा-युगसृजेता प्रज्ञापुरुष पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने यह पुस्तकमाला  1989-90  में महाप्रयाण के एक वर्ष पूर्व की अवधि में एक ही प्रवाह में लिखी थीं।

आज जब हम 2026 में इन पंक्तियों को लिख रहे हैं तो सभी जानते हैं कि टेक्नोलॉजी ने इस ज्ञान का प्रचार-प्रसार कितना सरल कर दिया है।, पाठकों को अपने फ़ोन पर एक क्लिक ही तो करना है,सेकंड्स में यह ज्ञान विश्व के कोने-कोने में प्रसारित हो जायेगा। पुराने दिनों की तरह, गुरुदेव माताजी की तरह घर-घर नहीं जाना पड़ेगा, उनको Convince नहीं करना पड़ेगा। हाँ इतना अवश्य ही सुनिश्चित करना होगा कि जिन लोगों को फॉरवर्ड कर रहे हैं वोह लोग न पढ़कर गुरु साहित्य का अनादर तो नहीं कर रहे। यही एकमात्र प्रक्रिया है जिससे गुरुदेव का 100x100x100  वाला फॉर्मूला सार्थक होगा। आज हम जिस स्थान पर पंहुचे हैं उसमें इस फॉर्मूले के साथ-साथ मुट्ठी भर साधकों का बहुत बड़ा योगदान है, जिसके लिए हम सदैव आभारी रहेंगें।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से प्रत्येक लेख, यूट्यूब,फेसबुक, Quora,Pinterest, Tumblr, इंटरनेट आर्काइव, https://life2health.org/ वेबसाइट पर एक साथ न केवल पोस्ट ही होते हैं बल्कि यथासंभव फॉलो भी किये जाते हैं।

“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” के बारे में गुरुदेव ने स्वयं कहा हुआ है:

‘‘बेटे ! क्रान्तिधर्मी साहित्य मेरे अब तक के सभी साहित्य का मक्खन है। हमारे विचार बड़े पैने हैं, तीखे हैं। हमारी सारी शक्ति हमारे विचारों में समाहित है। दुनिया को हम पलट देने का जो दावा करते हैं, वह सिद्धियों से नहीं, अपने सशक्त विचारों से करते हैं। आप इन विचारों को फैलाने में हमारी सहायता कीजिए। हमको आगे बढ़ने दीजिए, सम्पर्क बनाने दीजिए। समय और आवश्यकता के अनुरूप मैंने गायत्री महाविज्ञान लिखा था। अब इसे अल्मारी में बन्द करके रख दो। अब केवल इन्हीं (क्रान्तिधर्मी साहित्य को,युग साहित्य को) किताबों को पढ़ना। समय आने पर उसे भी पढ़ना। इस पुस्तकमाला में जीवन को,चिन्तन को बदलने के सूत्र हैं। जिस प्रकार श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को सभी तीर्थों की यात्रा कराई, वैसे ही आप भी हमें (विचार रूप में – क्रान्तिधर्मी साहित्य के रूप में) संसार भर के तीर्थ, प्रत्येक गाँव, प्रत्येक घर में ले चलें। गुरुदेव इन पुस्तकों की ओर इशारा करके कहते हैं:

बेटे ये गायत्री महाविज्ञान के बेटे-बेटियाँ हैं, प्रज्ञापुराण के बेटे-बेटियाँ हैं।”

1990 की वसंत पंचमी को गुरुदेव माताजी से कहते हैं:

‘‘मेरा ज्ञान शरीर ही जिन्दा रहेगा। ज्ञान शरीर का प्रकाश जन-जन के बीच में पहुँचना ही चाहिए और आप सबसे कहिए, सब बच्चों से कहिए  कि मेरे ज्ञान शरीर को,मेरे क्रान्तिधर्मी साहित्य के रूप में जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास करें।’’

“परिवर्तन के महान क्षण” पुस्तिका में गुरुदेव बताते हैं कि  20वीं सदी के अंत तक समय और युग की परिस्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। इस महान परिवर्तन के दौर में उनके मुख्य विचार निम्नलिखित हैं:

भौतिकता और प्रत्यक्षवाद का प्रभाव: गुरुदेव कहते हैं कि वर्तमान युग में केवल भौतिक जगत और शरीर का विलास-वैभव ही सब कुछ बनकर रह गया है। लोग केवल उसी को सच मानते हैं जो आँखों से प्रत्यक्ष दिखाई दे।

आत्मा और परमात्मा की उपेक्षा: भौतिकता की अंधी दौड़ में आत्मा तिरोहित हो गई है। जो चीज़ें प्रत्यक्ष या आँखों से दिखती नहीं हैं, जैसे आत्मा और परमात्मा, उन्हें अमान्य मान लिया गया है।

नीतिमत्ता और आदर्शवाद का ह्रास: इस बदलाव का परिणाम यह हुआ कि जहाँ एक ओर अंधविश्वास कम हुए, वहीं दूसरी ओर धर्म, नैतिकता, और मानवीय आदर्शों जैसी शाश्वत मूल्य,धारणाओं को भी अस्वीकार कर दिया गया, जिससे मानवीय अनुशासन समाप्त हो रहा है।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से इन मानवी मूल्यों को न केवल शेयर ही किया जाता है बल्कि पालन करने के लिए आग्रह भी किया जाता है।

चेतना और भविष्य का संकेत: गुरुदेव ने यह भी संकेत दिया है कि नीति-रहित भौतिकवाद से उपजी दुर्गति का समाधान केवल चेतना के परिष्करण और आंतरिक पुनरुत्थान से ही संभव है।

आज के ज्ञानप्रसाद लेख का यहीं पर समापन करने की आज्ञा चाहते हैं। कल से “परिवर्तन के महान क्षण” पुस्तक पर आधारित लेख श्रृंखला का शुभारंभ होगा।

जय गुरुदेव 


Leave a comment