जून 2026 के अंतिम शनिवार के बाद आज सितम्बर 2026 के अंतिम शनिवार का सेगमेंट साथिओं के समक्ष प्रस्तुत है। जुलाई,अगस्त के सेगमेंट प्रस्तुत न होने के कारणों पर चर्चा किये बिना सीधा आज के सेगमेंट की और रुख करना उचित होगा।
अपने ह्रदय से भी निकट,हमारे अंतर्मन में विराजमान,हमारे प्रिय साथिओं का आज के इस विशेष विशेषांक में ह्रदय से स्वागत है। साथिओं के लिए इस तरह के विशेषणों का प्रयोग करना ही बता देता है कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में उन सभी का कितना विशेष स्थान है, शब्दों के माध्यम से हम अपनी भावनाएं व्यक्त करने का प्रयास तो करते हैं लेकिन कितनी,किस के ह्रदय तक पंहुच पाती है उसका अनुमान साथिओं के भावभरे कमैंट्स एवं अन्य संपर्क साधनों से कुछ-कुछ तो हो ही जाता है। कई बार तो बिना कहे ही सब कुछ कहा जाता है क्योंकि शब्द विज्ञान तो यही कहता है कि विश्व में कहीं से भी प्रसारित हुआ भावभरा सन्देश रिसीवर तक स्वयं ही पंहुच जाता है। इस संपर्क के लिए कोई तार आदि की ज़रुरत नहीं होती क्योंकि यह भौतिक विज्ञान से कहीं ऊँचे स्तर का विज्ञान है, वहां तक पंहुचने के लिए मनुष्य को क्या कुछ करना पड़ता है,किस प्रकार की साधना करनी पड़ती है,ज्ञानप्रसाद लेखों ने कुछ-कुछ तो समझा ही दिया है। साधना केवल हिमालय पर जाकर,शांतिकुंज की यज्ञशाला में आहुतियां प्रदान करके,सत्र करके,अनुष्ठान करके,गंगा में डुबकी लगा कर ही नहीं होती, गुरुकार्य में नियमितता एवं निरंतरता से समयदान करके भी होती है। इस वाक्य में जिन कृत्यों की चर्चा की गयी है उनके प्रति हमारे ह्रदय में अटूट सम्मान है लेकिन यज्ञ/अनुष्ठान आदि करने से ही सब कुछ हो जायेगा, इसके लिए हम Respectfully disagree करने का निवेदन करते हैं। यदि ऐसा होता तो आदरणीय चिन्मय जी विश्व का एक एक कोना न छानते, शांतिकुंज में ही बैठकर, समाधिस्थल के आगे, गुरुसत्ता के चरणों में गायत्री माता की आरती गए रहे होते। स्माट विश्व में ज्ञानगंगा बहाने का कार्य उन्हीं द्वारा संभव हो प् रहा है। हामरे साथिओं के पास भी तो उनकी गतिविधियों की सूचनाएं पंहुचती ही होंगीं। इसी संदर्भ में साथिओं को पहाड़िया का संस्मरण स्मरण कराना अपना कर्तव्य समझते हैं। तपोभूमि मथुरा में परम पूज्य गुरुदेव ने वंदनीय माता जी को प्रथम दीक्षा देने के बाद जब पहाड़िया जी को बुलाकर दीक्षा दी तो वोह उस समय भी हैंड पंप से पानी निकाल कर लोगों के हृदयों को शीतल कर रहे थे। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से भी ज्ञान की यही शीतलता की धारा बहाना हमारा ही कर्तव्य है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के समर्पित साथिओं द्वारा की जा रही साधना को अनुभव करके केवल हैरानगी ही नहीं,आँखों में आंसू भी टपकने शुरू हो जाते हैं। ऐसी स्थिति को देखकर आदरणीय नीरा जी हमेशा ही हमें सहारा देती रहती हैं, शक्ति देती रहती हैं, अक्सर कहती हैं कि ऐसे कैसे काम चलेगा? संवेदनशील तो हम बचपन से ही थे लेकिन आयु के इस पढ़ाव पर हमारी स्थिति को देखकर हमारा सारा ही परिवार बहुत चिंतित है। वैंकुवर से, बेटे ने स्पेशल तौर पर फ़ोन करके इतना समझाया लेकिन क्या करें यह भाव-संवेदना का विषय है,शब्दों से परे है। छोटी पोती तो हमारा अपना खून है उसके लिए सिसकियाँ भरना तो स्वाभाविक है लेकिन हमारी आदरणीय बड़ी बहिन रेणु श्रीवास्तव जी से हमारा केवल भावना का ही तो सम्बन्ध है, आज तक इन्हें भौतिकता से देखा तक नहीं है लेकिन उनके द्वारा एक वाक्य में लिख कर व्यक्त करना कि कल भाई साहिब का सेगमेंट है,कैसे दिल को छू गया,हम ही जानते हैं। भाव-संवेदना को केवल ज्ञानप्रसाद लेखों में पढ़कर,बिना किसी फीलिंग के, मन में उतारे बगैर देखने में कोई भी लाभ नहीं होने वाला !!! बार-बार लिखते आ रहे हैं कि हम परम सत्ता ईश्वर की संतान हैं, परम पूज्य गुरुदेव के बच्चे हैं,शिष्य हैं तो उनका कुछ तो अंश हमारे अंदर उतरना ही चाहिए, जिस वीडियो में गुरुदेव कह रहे हैं “हम कुत्ते बिल्ली से भी गए -गुज़रे हैं ?” हम सबने कितनी ही बार देखी होगी, गुरुदेव की रुआँसी सी वाणी अनेकों ने अनुभव की होगी, तो हम उनसे अलग कैसे हो सकते हैं? आज के युग में इस तरह के,इस स्तर के गुरु मिलना एक बहुत बड़ा,दुर्लभ सौभाग्य ही माना जा सकता है।
अपने साथिओं की साधना की बात को आश्चर्यजनक,अविश्वसनीय किन्तु सत्य कहें तो शायद अतिश्योक्ति न हो क्योंकि भागदौड़ के जिस युग में हम सब रह रहे हैं,हमारे साथी इतने बड़े-बड़े लेख न केवल पढ़ रहे हैं, बल्कि लेखों से भी बड़े कमेंट भी कर रहे हैं, जी हाँ हमने अनेकों कमेंट सेव करके अमूल्य रत्नों की भांति रखे हुए हैं, वोह सच में बहुत ही बड़े हैं। 15 मिंट की वीडियो देखने के लिए किसी के पास समय नहीं है, शार्ट वीडियो को देखने तक ही समय रह गया है तो साथिओं की साधना को आश्चर्यजनक न कहें तो और क्या कहें। कल ही किसी ने अपनी बात बताने के लिए फ़ोन किया,अपना रोना रोते-रोते आधा घंटा लगा दिया लेकिन जब हमने पूछा कि आप हमारे लेख पढ़ते हैं तो मात्र 3 सेकंड में यह कह कर “भैया जी फिर बात करेंगें” फ़ोन बंद कर दिया। ऐसे हैं वोह लोग जिन पर गायत्री परिवार गर्व करता है कि हम 15 करोड़ का परिवार हैं। यह भाई साहिब पिछले 10 वर्षों से हमारे साथ जुड़े हुए हैं। तभी तो हम कहते रहते हैं,गुरुदेव ने कभी भी भीड़ इक्क्ठी करने के लिए नहीं कहा था।
आदरणीय रेणु बहिन जी का नाम तो कल वाले कमेंट के रेफरेन्स में आ गया लेकिन बाकी सभी जो इस परिवार के सदस्य हैं कहाँ कोई कम हैं? लेख लिखना,पोस्ट करना, साथिओं द्वारा पढ़े जाना, कमेंट करना,कमैंट्स को पढ़कर,लेख को पढ़कर,बिलकुल सम्बंधित काउंटर कमेंट करना कोई सरल कार्य नहीं है,जितना परिश्रम,श्रद्धा, समर्पण और समयदान दिख रहा है उसके लिए हम साथिओं के लिए कौन से शब्द प्रयोग करें,कुछ भी समझ नहीं आ रहा। अपने सामने साक्षात् आदरणीय नीरा जी को साक्षात् Bench mark मान कर समझ सकते हैं कि हमारे सभी साथी उनकी ही तरह इस पावन कृत्य को ड्यूटी समझ कर निभाते होंगें।
हाँ अपना समझ कर एक सुझाव देना चाहते हैं कि कृपया Newest में कमेंट अवश्य देखा करें,ऐसा न करने से अनेकों कमेंट मिस हो जाते हैं।
अक्सर आदरणीय सुजाता बहिन जी का फुल कमेंट सबसे पहले पोस्ट हुआ होता है, आदरणीय संध्या जी शेष फिर करके – – – अपने समय अनुसार बाकी का कमेंट लिखती है, औरों के कमेंट भी हमें अपनी तरफ आकर्षित करते रहते हैं। हो सकता है हमारी तरह हमारे साथिओं की भी आदत बन चुकी हो कि आँख खुलते ही,बिस्तर में लेटे-लेटे ही पहला काम पोस्ट हुए लेख के कमेंट देखना होता है। सुबह 4 बजे से 7 बजे तक साथिओं के साथ वायरलेस संपर्क साधना ही होती है। इसी समय में उस दिन के लेख का खाका भी तैयार करना होता है,शार्ट वीडियो को मिले व्यूज देखकर खुश भी होना होता है,कई बार तो 24 घंटे में 50000 व्यूज देखकर इतनी प्रसन्नता होती है कि साथिओं के साथ शेयर किये बिना नहीं रहते। कई बार मात्र 500 देख कर मन बैठ भी जाता है। मन को बहुत समझाते हैं कि यह सब गुरुदेव का ही तो है, हमारा तो कुछ भी नहीं है, हम तो मात्र रंगमंच की कठपुतली हैं जिसकी डोर उनके हाथों में हैं, वही सबकुछ कर रहे हैं लेकिन लॉजिक तो यही कहता है चाहे सब कुछ गुरुवर का ही है उन्हें साथिओं के ह्रदय में स्थापित करने के लिए कर्म तो हमें ही करना है,हमारे कर्म से यदि किसी एक घर में भी स्वर्ग का/सतयुग का अवतरण हो गया तो हमें सब कुछ मिल गया। साथिओं के कमेंट और हमारी भावनाएं जितना भी समझ पाई हैं उससे यही दिख रहा है सतयुग का अवतरण होना एक मनस्थिति है जो हमें सही मार्ग दिखाती है ,प्रसन्नता प्रदान करती है आदि आदि। प्रसन्नता के लिए ही तो सारी दुनिया भागदौड़ कर रही है। कल पोस्ट हुए अति उत्कृष्ट कमैंट्स के माध्यम से साथिओं ने हमें समझाने में बहुत बड़ी सहायता की है।
अपनी सराहना न हमने कभी की है, न ही किसी द्वारा की हुई अच्छी लगी है लेकिन 4-7 के टाईमटेबल के बाद रात 11 बजे तक सारा दिन इतना टाइट रहता है कि क्या कहें? पारिवारिक जिम्मेदारिओं से लगभग मुक्त ही हैं, बच्चे कोई भी कार्य करने नहीं देते, कई बार हम हंसी-मज़ाक में कह भी देते हैं कि हम कोई बूढ़े थोड़े ही हैं, लेकिन परिवार में यही धारणा बनी है कि पापा को ज्ञानरथ को हांकने के इलावा कोई भी कार्य अच्छा नहीं लगता, हो भी क्यों न,इस आयु में हमारे पिताजी की दिनचर्या भी ऐसी ही थी। यदि हमने Tagline में “अंतिम श्वास” लिखा हुआ तो उसका पालन करना भी तो हमारा ही कर्तव्य है, अपने ही द्वारा लिखे संकल्प की अवहेलना करने में गुरु द्वारा दिए जाने वाले दंड को अनेकों बार भुगत चुके हैं। जिस दिन भी, जब कभी भी किसी कारणवश गुरुकार्य करने में असमर्थ होते हैं तो बेचैनी और दिल का ज़ोर-ज़ोर से धड़कना गुरुदण्ड ही तो है। यही कारण है कि जल में,थल में,नभ में,हाईवे पर, शॉपिंग स्टोर में ज्ञानरथ को हांकना हमारी सबसे बड़ी Priority बन चुकी है।
हर बार आदरणीय सुमनलता बहिन जी द्वारा हमारे लिए रिज़र्व किये गए सेगमेंट के लिए लिखना शुरू करते हैं तो व्यक्त करते हैं कि हम कोई लेखक नहीं हैं, जैसे-जैसे,जो-जो विचार आते जाते हैं हम लिखते जाते हैं,बार-बार रुक कर पढ़ते हैं, देखते हैं कि कहीं साथिओं का अमूल्य समय तो नहीं नष्ट हो रहा, साथी हमारी राम कहानी से बोर तो नहीं हो रहे। साथिओं को पूर्ण स्वतंत्रता है कि वह बिना किसी झिझक के,इस संदर्भ में अपने भाव कमेंट करके हम तक पंहुचा सकते हैं।
अक्सर कहा जाता है कि ज्ञानरथ परिवार के कार्यों में योगदान करना गुरु का कार्य है, गुरुकार्य है लेकिन बहुत बार विचार कर चुके हैं कि यह गुरु का कार्य कैसे हुआ ?
आइए इस विषय की थोड़ी सर्जरी कर लें शायद जो लोग ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में समयदान करने को कतराते हैं उन्हें कुछ शिक्षा मिले। गुरुदेव द्वारा रचा गया विशाल साहित्य एक Blank cheque की भांति है ,गुरुदेव ने इस पर साइन किये हुए हैं और कह रहे है अपनी इच्छा के अनुसार इसमें रकम भर लो,ज्ञान के भण्डार से अपना अंतःकरण( अपना आत्मिक घर) भर लो, उस घर की Renovation करा लो, सफेदी करा लो,रंग रोगन करा लो। यह सारे काम तो आपके हैं, आपका काम हो रहा है और आप कह रहे हो कि गुरु का कार्य हो रहा है।भक्त मंदिर में जाता है,प्रसाद के रूप में फल-फ्रूट से ,रुपए-पैसे से,अच्छे-अच्छे कपड़े-पोशाकों से भगवान् का श्रृंगार करता है, क्यों ? क्योंकि उसे अच्छा लगता है,भक्त खुश होता है, तो हुआ न अपनी ही ख़ुशी का साधन। भगवान कोई भूखे तो हैं नहीं कि आपके दो केलों/संतरों से उनकी भूख शांत हो जाएगी। जो समस्त सृष्टि का पेट भरते हैं उन्हें किसी की क्या ज़रुरत है, वोह तो केवल श्रद्धा के ही भूखे हैं,लेकिन भक्त तो उनके साथ भी सौदा ही करता है। क्या करें, उसकी सोच ही इतनी है,इससे आगे वोह कहाँ बढ़ पाता है।
ज्ञानप्रसाद लेखों का मुख्य उद्देश्य मनुष्य का अपना सुधार ही है और गुरुदेव अपने बच्चों की खुशहाली के लिए तरह-तरह के खिलौनों से उनको समझाने का प्रयास करते हैं, इसी प्रयास में एक प्रयास यह भी है “तुम हमारा काम करो,हम आपका करेंगें।” गुरुदेव बेचारे भी क्या करें,जब बिगड़े हुए बच्चे समझ ही नहीं पाते तो उनके साथ Give and take की सौदेबाज़ी भी करनी पड़ती है। लेकिन जैसा भी कहें,जो भी Explanation दें कार्य हम सबका ही है, गुरुकार्य का बहाना बनाकर गुरु को रिझाने वाली बात नहीं है, गुरु सब देखते हैं, सब समझते हैं।
तो साथिओ आप सबसे यहीं पर विदा लेते हैं, हमारे विचारों को पढ़कर,हमें समय देने के लिए ह्रदय से धन्यवाद करते हैं। आदरणीय सुमनलता बहिन जी के सुझाव और साथिओं के समर्थन के कारण ही यह सेगमेंट संभव हो पाया है।
जय गुरुदेव