वर्तमान लेख श्रृंखला का 8वां समापन लेख बता रहा है कि इक्कीसवीं सदी भाव-सम्वेदनाओं के उभरने-उभारने की अवधि है। हमें इस उपेक्षित क्षेत्र को ही हरा-भरा बनाने में निष्ठावान माली,ईश्वर की संतान की भूमिका निभानी चाहिए। यह विश्व उद्यान इसी आधार पर हरा-भरा,फला-फूला एवं सुषमा-सम्पन्न बन सकेगा। आश्चर्य नहीं कि वह स्वर्गलोक वाले नन्दन वन की बराबरी कर सके।
“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की पांचवीं पुस्तिका “सतयुग का वापसी” में ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से आठ लेख प्रस्तुत किये गए,मात्र 32 पृष्ठों को लगभग 16000 शब्दों से सुशोभित करके, एक-एक शब्द को समझ कर,उदाहरण देकर समझने का प्रयास किया गया,लेखक और पाठक सभी ने निरंतर,नियमित होकर एक टीम की भांति एक दूसरे को समझाने का प्रयास किया जिसके लिए हमारे ह्रदय से एक ही आवाज़ निकलती है, “धन्यवाद्,धन्यवाद् एवं धन्यवाद।
आइए आज की गुरूकक्षा का, गुरुचरणों में समर्पित होकर शुभारम्भ करें।
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काँच में गोल सुराख़ निकालने के लिए हथौड़े का प्रयोग नहीं किया जाता, बुद्धिमता,ट्रेनिंग एवं उचित औज़ार से ही सुराख़ निकाला जाता है। पहाड़ों में सड़कें बनाने के लिए चट्टानों को डायनामाइट से ब्लास्ट किया जाता है लेकिन सुरंग बनाने के लिए बड़े ही Precision से स्पेशल बरमी से सुराख़ किया जाता है। बेसिक ज्ञान के यह दो उदाहरण बता रहे हैं कि प्रतिभा का क्या महत्व है।
सभी संकटों की एकमात्र जड़ गरीबी बता देने से बात नहीं बनती। समस्या अभावग्रस्तता की नहीं है, समस्या है साधनों के सुनियोजन की। वर्तमान लेख श्रृंखला के पांचवें लेख में इस विषय पर विस्तृत बात हुई थी। गुरुदेव कहते हैं कि समाधान तो तब हो, जब सर्वसाधारण को मनचाही सम्पदाओं के ज्ञान से परिचित कराया जाए,उसके लिए कोई सीधा मार्ग बन सके, यह तो सम्भव नहीं दिखता। इसी प्रकार यह भी दुष्कर प्रतीत होता है कि उच्च शिक्षित चतुर कहलाने वाला व्यक्ति अपनी विशिष्टताओं का दुरुपयोग न करेगा और उपार्जित योग्यता का लाभ सर्वसाधारण तक पहुँचा सकेगा, प्रपंचों से भरी कठिनाइयाँ खड़ी न करेगा।
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि सम्पदा से सुविधा मिलती है लेकिन यह विश्वास कर सकना कठिन है कि सम्पदा का हमेशा सदुपयोग ही बन पड़ेगा एवं उसके कारण दुर्व्यसनों का,आतंकवादी अनाचार का जमघट नहीं खड़ा होगा।
जिन कठिनाइओं से वर्तमान समाज जूझ रहा है उनके निराकरण के लिए आमतौर से उन लोगों से आशा की जाती है जिनके पास सम्पदा, सत्ता और प्रतिभा है। समस्या की घड़ी में मनुष्य,परिवार, समाज, राष्ट्र सभी इन तीनों की तरफ ही ताकता है। जो कोई भी सम्पदा,सत्ता और प्रतिभा से ओतप्रोत है उसी से आशा की जाती है। ऐसा नहीं कि इन तीन शक्तिओं वाले लोग सहायता के लिए आगे नहीं आते हैं,अवश्य आते हैं, इतना ही नहीं अपनेआप को ऑफर भी करते हैं।
लेकिन अपने स्वार्थ के लिए इन तीन शक्तियों का दुरूपयोग भी तो हो ही रहा है। युद्धों के लिए शक्तियों के बीच संधियां हो रही हैं, सारी दुनिया का ठेका लेने का बहाना बनाने वाली शक्तियां कमज़ोरों को Misguide कर रही हैं, उन्हें Use कर रही हैं। समाज,परिवार में भी यही हो रहा है।
इस सन्दर्भ में पिछले कुछ वर्षों का लेखा-जोखा लेने पर निराशा ही हाथ लगती है। देखा गया है कि जिनके पास भी यह तीन शक्तियां अतिरिक्त मात्रा में इक्क्ठी होती हैं, वही एक प्रकार का पागलपन सा उत्पन्न कर देती हैं। उस अधपगलाई मनोदशा के लोग सुविधा मिलने पर उलटे-सीधे आचरण करने लग जाते हैं,अपनी मनमानी करने लगते हैं। यह लोग समाज का तो क्या ही सोचते होंगें,उनके अपने सम्बन्धी,जान-पहचान लाभ लेने के लिए शहद के छत्ते की भांति इक्क्ठे हो जाते हैं। प्रदर्शन और विज्ञापन के लिए कभी-कभार इन सम्पदाओं का उपयोग ऐसे कार्यों में भी लग पाता है जिससे सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन में कुछ योगदान हो सके।
यह बात सभी पाठक जानते हैं कि अन्य नशों की भांति “वैभव का नशा” भी कोई कम पागलपन,मानसिक असंतुलन उत्पन्न नहीं करता। तभी तो कहा जाता है कि अमीरी,उच्च डिग्री उसके सिर चढ़ गयी है, उसका दिमाग ख़राब हो गया है, किसी को कुछ भी समझता/समझती नहीं है। उसकी खुमारी में अधिकाधिक उसका संचय और अपव्यय के उद्धत् आचरण ही बन पड़ते हैं। ऐसी दशा में यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि उपरोक्त त्रिविध समर्थताएँ जुटाने एवं बढ़ाने से समाज का, गरीब का कल्याण हो जाएगा। सच तो यह है कि समर्थता का जखीरा हाथ लगने पर शक्तिशालिओं ने ही सारे संकट खड़े किए हैं। प्रदूषण उगलने वाले कारखाने “सम्पन्न” लोगों ने ही लगाए हैं। आतंक, आक्रमण और अनाचार में संलग्न लोग “शक्तिशाली” ही तो होते हैं। युद्ध कराना खर्चीले माध्यमों के सहारे ही तो बन पड़ता है, निर्धन बेचारा क्या ही कर पाएगा, उसे तो दो रोटी का जुगाड़ ही कहाँ छोड़ पाता है। “प्रतिभा के धनी” कहे जाने वाले वैज्ञानिकों ने ही ऐसे-ऐसे आविष्कार किए हैं जिनसे चुटकी में ही सृष्टि का अंत हो सकता है। “कलाकारों” ने अपनी प्रतिभा दिखाकर ऐसी फिल्में बनाईं, ऐसे टीवी सीरियल बनाए कि कामुकता को धरती से आसमान तक उछाल कर रख दिया। “बुद्धिवादिओं की प्रतिभा” ने अनास्थाओं को जन्म देने का श्रेय प्राप्त किया। “चतुरता के धनी” लोगों ने,अपने फायदे के लिए नशेबाजी को घर-घर तक पहुँचाने में क्या कुछ किया है हम सब जानते हैं।
उपरोक्त तथ्यों का एनालिसिस एवं चिंतन करने पर प्रतीत होता है कि मूर्द्धन्यों, बलिष्ठों, सम्पन्न और प्रतिभाशालियों की छोटी-सी चौकड़ी ने ही ये सारे अनर्थ खड़े किए हैं। लेकिन यहाँ एक अति महत्वपूर्ण तथ्य को भी स्मरण रखना होगा,जिसे कोई भी नकार नहीं सकता। वह तथ्य है कि बाज़ार में तो सब कुछ बिकता है,कोई ज़बरदस्ती तो आपको नशा नहीं करा रहा, मनोरंजन की दुनिया में बहुत कुछ प्रकाशित हो रहा है, ठीक-गलत का चयन तो मनुष्य ने खुद ही करना है।
उपरोक्त चर्चा में न तो साधनों/सम्पन्नता की निन्दा की जा रही है और न ही दुर्बलता के सिर पर शालीनता का सेहरा बाँधा जा रहा है। केवल इतना ही कहा जा रहा है कि पिछड़ेपन को मिटाने का एकमात्र उपाय यही नहीं है कि गरीब पैसे से मालामाल कर दिया जाए,उसे फ्री में ही सब कुछ उपलब्ध करा दिया जाए।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से, परिश्रम/समझदारी/बुद्धिमत्ता से सम्बंधित अनेकों बार गुरुदेव के सन्देश प्रसारित किया जाते रहे हैं, जिन्होंने ने भी गुरुदेव की बात मान ली उनका तो कायाकल्प हो ही गया। यह हम नहीं कह रहे हैं, हमारे साथी स्वयं लिख कर हमें अनेकों बार भेज चुके हैं।
गुरुदेव कह रहे हैं कि इस तथ्य को हज़ार बार समझा और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि मनुष्य की मन:स्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। यदि मनुष्य को अपनी परिस्थितियों को सचमुच ही सुधारना है तो मन:स्थिति में दूरदर्शी विवेकशीलता को उगाना,उभारना और सींचना अति आवश्यक है। यह कार्य एक परिश्रमी किसान की भांति बीज के पालन जैसा ही है।
यहाँ यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि मन:क्षेत्र एवं बुद्धि संस्थान भी स्वतंत्र नहीं हैं। उन्हें भावनाओं, आकांक्षाओं, मान्यताओं के आधार पर अपनी दिशाधारा बनानी होती है। मस्तिष्क और मन का आदर्शवादी उत्कृष्ट स्वरूप ही अन्त:करण में भाव-सम्वेदना बनकर रहता है। यही है वह सूत्र, जिसके परिष्कृत होने पर कोई व्यक्ति ऋषि जैसा देवमानव बन सकता है। भाव संवेदना का यह एक ही तत्त्व इतना समर्थ है कि बाकी सारी असमर्थताएँ बने रहने पर भी केवल इस अकेली विभूति के सहारे न केवल अपना बल्कि समूचे संसार की शालीनता का पक्षधर कायाकल्प किया जा सकता है। 21वीं शताब्दी के साथ जुड़े उज्ज्वल भविष्य का यदि कोई सुनिश्चित आधार है तो वह एक ही है कि
जन-जन की भाव-सम्वेदनाओं को उत्कृष्ट, आदर्श एवं उदात्त बनाया जाए।
इस तत्व की अभिवृद्धि इस स्तर तक होनी चाहिए कि हर मनुष्य धारणा बना ले कि सब अपने हैं और हम सबके हैं। ऐसी भावना रखते ही सारा विश्व एक परिवार जैसा दिखेगा।
हमारे साथी सोच रहे होंगें कि इस मारधाड़ की दुनिया में गुरुदेव कैसी अनहोनी बात सोच रहे हैं लेकिन अपने गुरु में अटूट विश्वास रखने वाले इस तुच्छ लेखक का केवल एक ही मत है :
गुरुदेव ने तो हमेशा अनहोनी को ही होनी करके प्रमाणित किया है, जो प्रमाण माँगते रहे,उनकी शक्ति के प्रति शंका करते रहे,मौसमी पक्षियों की भांति आते गए,जाते गए,कहीं भी कहाँ टिक पाए, दूसरों को तो क्या अपना भी सुधार न कर पाए।
गुरुदेव की मात्र 32 पन्नों की पुस्तक “सतयुग की वापसी” ही नहीं कह रही बल्कि गूगल सर्च भी यही उत्तर दे रही है कि 21वीं सदी भाव-संवेदनाओं की सदी है
वर्तमान में यदि ध्यान से देखा जाए तो समझ आ जाएगा कि जिस अनुपात में इस संसार में सम्पदा विनिर्मित हुई है उसे मिल-बाँटकर खाने की नीति अपनाकर सभी औसत नागरिक स्तर का जीवन जी सकते हैं । इतना ही नहीं, पुरुषार्थ के आधार पर जो कोई भी कुछ अधिक/अतिरिक्त अर्जित कर सकता हो उससे पिछड़े हुओं को बढ़ाने, गिरते हुओं को उठाने एवं समुन्नतों को सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन हेतु प्रोत्साहित किया जा सकता है। अनावश्यक सम्पन्नता की ललक ही बेकाबू होने पर उन अनर्थकारी संरचनाओं में प्रवृत्त होती है, जिनके कारण अनेकानेक रंग-रूप वाले अनाचारों को व्यापक, विस्तृत और प्रचण्ड होते हुए देखा जा रहा है। यदि लिप्साओं में किसी प्रकार की कटौती की जा सके तो ही वह जुझारूपन उभर सकता है, जो गुरुदेव के स्वप्न “सतयुग की वापसी” में हाथ बटा सकता है। जो लोग अभावों से ग्रस्त दिखते हैं,हाय तौबा-हाय तौबा करके जीवन को नरक बनाए जाते हैं उनमें उस प्रतिभा का जागरण किया जाए ताकि वे अपने पैरों पर खड़े होकर, दौड़कर स्पर्द्धा जीतने को तैयार हो सकें। उन्हें समझाया जाए कि किसी के देने से कुछ नहीं बनता,स्वयं पुरुषार्थ करना ही उत्तम है, यदि किसी कारण असफलता ही हाथ लगती है तो “जो प्राप्त है वही पर्याप्त का सिद्धांत” अपनाना उचित है।
गुरुदेव इस बात से सहमत हैं कि आर्थिक अनुदान देने की मनाही नहीं है और न ही यह कहा जा रहा है कि गिरों को उठाने में, सहयोग देने में कोताही बरती जानी चाहिए। इस चर्चा में केवल इतना ही सुझाया जा रहा है कि मनुष्य अपने आप में समग्र और समर्थ है। यदि उसका आत्मविश्वास एवं पुरुषार्थ जगाया जा सके, तो इतना कुछ बन सकता है जिसके रहते याचना का तो प्रश्न ही नहीं उठता, बल्कि इतना बचा रहता है, जिसे अभावों और अव्यवस्थाओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त मात्रा में लगाया जा सके।
इक्कीसवीं सदी भाव-सम्वेदनाओं के उभरने-उभारने की अवधि है। हमें इस उपेक्षित क्षेत्र को ही हरा-भरा बनाने में निष्ठावान माली की भूमिका निभानी चाहिए। यह विश्व उद्यान इसी आधार पर हरा-भरा फला-फूला एवं सुषमा सम्पन्न बन सकेगा। आश्चर्य नहीं कि वह स्वर्गलोक वाले नन्दन वन की बराबरी कर सके।
इस समापन लेख में गुरुदेव भाव-संवेदना का सन्देश दे रहे हैं।
जय गुरुदेव
