वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

दानव नहीं, देवता बनें, सतयुग स्वतः ही अवतरित हो जायेगा 

Fortune knocks at your door at least once. भाग्य एक बार अवश्य ही हर मनुष्य का द्वार खटखटाता है, सफलता हर किसी के लिए उपलब्ध है उसका वरन करने के लिए उचित समय और अवसर का नाम ही संयोग है। एक बार यह संयोग क्लिक हो गया, आपने उस दिव्य शक्ति के लिए द्वार खोल कर Welcome कर लिया,फिर तो वारे-न्यारे ही हैं। तभी तो कहा गया है मनुष्य स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माता एवं भविष्य का अधिष्ठाता है। यह नींद से उठ कर जागने का समय है,अपनी शक्ति के पहचानने का समय है। 

आइए “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की पांचवीं पुस्तिका “सतयुग की वापसी” पर आधारित 7वें लेख का अमृतपान करें एवं ईमानदारी से स्वयं का मूल्यांकन करें कि हम कौन हैं:देवता यां दानव

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सृजन और विनाश की, उत्थान और पतन की शक्तियाँ इस संसार में निरन्तर अपने-अपने काम करती  रहती हैं। इन्हीं को देव और दानव के नाम से जाना जाता है  और उनकी प्रतिक्रियाओं को स्वर्ग-नरक कहा जाता है। मनुष्य को यह छूट है कि वह अपनी समझदारी के आधार पर दोनों में से किसी का भी वरण कर ले और उसी के अनुरूप उत्पन्न होने वाली सुख-शान्ति/ पतन-पराभव की प्रतिक्रिया अनुभव कर ले। उठने या गिरने का संकल्प लेने पर,निश्चय करने पर  उसी के अनुसार इस संसार में सहायता-सुविधा जहाँ-तहाँ  बिखरी मिल ही  जाती है। संयोग इसी को तो कहते हैं !!! मनुष्य अपने संकल्प अनुसार, इच्छा अनुसार वरदान में मिली हुई  इस सहायता-सुविधा को बटोर सकता है, धकेल सकता है यां भगा सकता है। तभी तो कहा गया है, Fortune knocks at your door at least once. भाग्य एक बार अवश्य ही हर मनुष्य का द्वार खटखटाता है, सफलता हर किसी के लिए उपलब्ध है उसका वरन करने के लिए उचित समय और अवसर का नाम ही संयोग है। एक बार यह संयोग क्लिक हो गया, आपने उस दिव्य शक्ति के लिए  द्वार खोल कर Welcome कर लिया,फिर तो वारे-न्यारे ही हैं। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से बार-बार निम्नलिखित  वाक्य को दोहराया गया है:

इसी मंच से बार-बार यह भी कहा जाता रहा है कि Recognise your potentials, your power; God has loaded you with exceptional virtues, ईश्वर की संतान होने के कारण मनुष्य में उसी के गुण ही तो हैं। अपने लिए,अपने समुदाय के लिए एवं संसार के लिए कंजूसी यां  सुसम्पन्नता अर्जित कर लेना मनुष्य की  अपनी इच्छा-आकांक्षा पर ही निर्भर है। सच्चे मन से, पूर्ण सामर्थ्य से किये गए कार्य में ईश्वर का वरद हाथ एवं वरदान अवश्य ही रहता है लेकिन क्या करें मनुष्य स्वार्थी और अहंकारी जो ठहरा, इस प्रवृति के वशीभूत  ईश्वर को भी कहाँ बक्श देता है !!! 

अक्सर देखा गया है कि मनुष्य अपनी सफलताओं का श्रेय स्वयं लेता है  लेकिन हानि,असफलता आदि का दोषारोपण दूसरों पर, खासकर ईश्वर पर ही मढ़ देता है। भगवान् के समक्ष गिड़गिड़ाते,लड़ते-झगड़ते,Threat करते, उलाहने देते भला किसी से छिपे हैं क्या ? मैंने तुम्हारे मंदिर की सीढ़ियां घिसा दीं, मैंने आज तक कुछ भी नहीं माँगा आदि आदि जैसे वाक्य बहुत ही प्रचलित हैं, ऐसे वाक्यों में कोरा व्यापार ही झलकता है। अरे मूर्ख  हर जगह व्यापार ही करता है, भगवान् को तो बख्श दे !!!

अरे मुर्ख समझ ले, सच्चाई तो सच्चाई ही रहेगी, ईश्वर से झगड़ा करके अपना मन हल्का करना एक बात है और अपनेआप को धोखा देना दूसरी बात । भगवान तो तेरे अंदर, ह्रदय में विराजमान है,मंदिर में उस पत्थर से क्यों झगड़ रहा है ?  बुद्धिमान तो वोह होते हैं जो असफलता के कारणों का विश्लेषण करके सुधार/परिवर्तन करने का संकल्प ले लेते हैं,ऐसी क्षमता तो है नहीं, तो फिर आवेश में ही आएगा, लूडो गेम की गोलियां गिराकर,मिक्स करके गेम का नाश ही करेगा, हार स्वीकार करने का साहस तो है नहीं   

परम पूज्य गुरुदेव उपरोक्त चर्चा से उस कारण को जानने और समाधान निकालने को कह रहे हैं जिससे उस स्थिति का जन्म हुआ है। गहरी रिसर्च   इसी निष्कर्ष पर पहुँचाती है कि मनुष्य ही है जो अपने लिए इच्छित स्तर की परिस्थितिओं को न्यौता देकर बुलाता है। मन में उठ रहे विचार ही उसके कर्म होते हैं, बैंक बैलेंस नेगेटिव में चल रहा है और बना रहा है हवाई किले। जब असफ़लता  आती है तो भगवान तो दोष देता है, अरे मुर्ख भगवान् कहाँ से आ गए, किया तूने परिणाम भी तेरा। भगवान् बेचारे फिर भी चुपचाप सुनते रहते हैं।    यदि हानि को लाभ और लाभ को हानि समझने की सामर्थ्य ही नहीं है तो कोई क्या करे? कुरूप चेहरा देखकर दर्पण पर आक्रोश तो झाड़ा जा सकता है लेकिन ऐसा करने से चेहरे पर छाई कुरूपता या कालिख को भगाया नहीं जा सकता। यह सरासर मूर्खता है !!!

गुरुदेव कह रहे हैं:

उचित रहेगा मनुष्य अपनी कठिनाइयों के कारण-समाधान अपने भीतर खोजें और यदि उत्कर्ष अभीष्ट हो तो उसकी  तैयारी के रूप में आत्मसत्ता को उसी के अनुरूप  बनाने के लिए,बिना किसी बहानेबाज़ी के,यथासंभव पुरुषार्थ नियोजित करें।

क्रियाएँ, शरीर के माध्यम से बनती हैं, इन क्रियाओं के सम्बन्ध में सोचने की खिचड़ी मस्तिष्क में पकती है लेकिन शरीर और मस्तिष्क को आवश्यक प्रेरणा, ऊर्जा की प्रक्रिया अन्तराल की गहराई से आरम्भ होती है। जब अंतर्मन ही हार कर बैठा हुआ है भगवान् क्या कर लेंगें? पुरुषार्थ तो मनुष्य को ही करना होगा। ज्वालामुखी फूटने, धरती हिलने जैसी घटनाओं का उद्गम स्रोत पृथ्वी के गर्भ की गहराई में ही कहीं होता है। बादल बरसते तो अपने खेत या आँगन में  हैं लेकिन उनका उद्गम समुद्र से उठने वाली भाप है।

भली-बुरी परिस्थितियों के सम्बन्ध में भी ऐसा ही सोचा जा सकता है। क्रिया करने और योजना बनाने में शरीर एवं मस्तिष्क को बहुत कुछ करते देखा जा सकता है लेकिन  यह सारा तंत्र कहाँ से खड़ा हुआ, यह जानने की उत्कण्ठा हो तो अन्त:चेतना में अवस्थित आकांक्षाओं को ही सूत्रधार मानना पड़ेगा।

विज्ञान ने प्रदूषण उगलने वाले विशालतम कारखाने बनाए सो ठीक है लेकिन  उसके द्वारा उत्पन्न होने वाली विषाक्तता के सम्बन्ध में भी तो विचार किया जाना चाहिए था। ऐसा नहीं हो सकता कि यह प्रश्न उभरा न हो लेकिन उस योजना को कार्यान्वित करने वालों के अन्तराल में अधिक कमाने की ललक ही प्रधान रही होगी। हानिकारक प्रतिक्रिया के विचार उठने पर उन्हें यह कहकर दुत्कार दिया गया होगा कि सर्वसाधारण से हमें क्या लेना-देना अपने लाभ को ही सब कुछ मान लेने में भलाई है। “अपना काम बनता,भाड़ में जाए जनता” स्लोगन का जन्म ऐसी ही परिस्थितिओं के लिए हुआ है।  ऐसे कार्यों में संलग्न टीम ने अपना लाभ प्रधान रखा  होगा अन्यथा प्रचार साधनों में अवांछनीयता का समावेश करते समय हज़ार  बार विचार करना पड़ता है कि निजी लाभ कमाने के अत्युत्साह से लोकमानस को विकृत करने का खतरा उत्पन्न नहीं किया जाना चाहिए।

युद्धोन्माद का वातावरण बनाने और उसके लिए सरंजाम जुटाने में किसी वर्ग विशेष को लाभ-ही-लाभ सूझा होगा नहीं तो  उस आक्रमण-प्रत्याक्रमण के माहौल से असंख्यों मनुष्यों की, परिवारों की भयंकर बरबादी सूझ ही न पड़ती। अपने को सर्वसमर्थ, सर्वसम्पन्न बनाने के लिए उभरे उन्माद ने शोषण से लेकर आक्रमण तक के अनेकों कुचक्र रचे हैं। इतना दुस्साहस तभी बन पड़ा, जब मनुष्य ने अपनी चेतना को इतना निष्ठुर बना लिया कि दानव भी अपने आँखें शर्म से झुका ले। इस समय संसार में हो रहे युद्धों  के पीछे इस मानसिकता के कुछ एक लोग ही हैं, उनकी तो तूती बोल रही है लेकिन अनेकों को इस त्रास से भारी कष्ट सहना पड़ रहा है। शरीर और मस्तिष्क के समन्वय से उठने वाले विचार और कर्म ही अपराधी,आक्रामक एवं आतंकवादी बनाते हैं ।

यदि नशों के उत्पादक एवं व्यवसायी, तस्कर आदि यदि अनुमान लगा सके होते कि उनका व्यक्तिगत लाभ किस प्रकार असंख्य अनजानों का विनाश करेगा, यदि उनके अन्तराल में संवेदना उमगी होती तो निश्चय ही वे इस अनर्थ से हाथ खींच लेते और अपने जीवनयापन के अनेकों  साधन खोज लेते।

यदि पशु-पक्षियों को उदरस्थ करते रहने वालों के मन में ऐसा कुछ सूझ पड़ा होता कि उन निरीहों की तरह हम इतनी भयंकर पीड़ा सहते हुए जान गँवाने के लिए बाधित किए गए होते, तो कैसी बीतती, उस छटपटाहट को निजी अनुभूति से जोड़ सकने वाला कदाचित् ही छुरी का निर्दय प्रयोग न कर पाता।

यदि पति महोदय,अपनी जीवनसाथिनी पर प्रजनन का असाधारण भार लादने में  किए जा रहे उत्पीड़न को ध्यान में रख सके होते, तो उन्हें अपने इस स्वेच्छाचार पर अंकुश लगाना ही पड़ता। निजी मस्ती उतारने से पूर्व उसका भावी परिणाम क्या होगा, यह भी विचार लेते । अपनी आर्थिक बरबादी और बच्चों की अनगढ़ जिन्दगी के लिए भी अपने को उत्तरदायी ठहराते हुए स्वेच्छाचार पर अंकुश लगाने के लिए सहमत होते।

दोष-घटनाओं को ही देखकर निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए। सोचना यह भी चाहिए कि यह अवांछनीयताओं का प्रवाह प्रचलन, जिस भावना क्षेत्र की विकृति के कारण उत्पन्न होता है, उस पर रोकथाम के लिए भी कुछ कारगर प्रयत्न किए जाएँ। 

सम्वेदनाओं में करुणा का समावेश होने पर दूसरे भी अपने जैसे दिखने  लगते हैं। यदि करुणा का भाव  समूचे समाज तक विस्तृत हो सके तो किसी को भी हानि पहुँचाने, सताने की बात सोचते ही हाथ-पैर काँपने लगेंगे। अपने आपे को दैत्य स्तर का निष्ठुर बनाने के लिए ऐसा कोई व्यक्ति तैयार न होगा जिसकी छाती में हृदय नाम की कोई चीज है। जिस मनुष्य ने अपनी करनी को,विचारों  को मात्र मशीन न समझकर आत्मसत्ता का भी समावेश किया होता तो उसका  अंतःकरण आत्मीयता,करुणा,सहकारिता और सेवा-साधना के लिए निरन्तर आकुल-व्याकुल रहता। 

साथिओ आज के ज्ञानप्रसाद लेख का समापन निम्नलिखित शिक्षा से हो रहा है : मनुष्य समस्याओं का तात्कालिक समाधान तो नशा पीकर, बेसुध होकर भी कर सकता है लेकिन जब होश-हवास ही दुरुस्त नहीं, तो क्या समस्या और क्या समाधान? मानवी गरिमा की गहराई तक उतरने की स्थिति पर हर आत्मा में माता जैसा वात्सल्य उभर सकता है। ऐसी स्थिति में हित-साधना के अतिरिक्त और कुछ सोचते बन ही नहीं पड़ता। 

साथिओ कर के देख लो तब उन उलझनों में से एक भी बच नहीं सकेगीं जो आज हर किसी को उद्विग्न-आतंकित किए हुए हैं।

जय गुरुदेव 


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