आज के ज्ञानप्रसाद लेख में इस विषय पर चर्चा की गयी है कि समाज में दिख रही समस्याओं का आधार “साधनों का अभाव” है लेकिन ऐसा नहीं है। साधन-सम्पन्न अमीरों को देख कर दरिद्रों को भी उलटे-सीधे मार्ग अपनाकर अमीर होने की ललक लगती जा रही है। जब उलटे-सीधे मार्ग की बात हो रही है तो सद्बुद्धि-दुर्बुद्धि के विषय से भला कैसे दूर रहा जायेगा? दुर्बुद्धि ही है जो मनुष्य को इस तथ्य को समझने से दूर करती जा रही है कि साधनों और पदार्थों के बाहुल्य से कभी भी कोई सुखी नहीं हुआ है। यदि यह सत्य होता तो कोई भी साधन-सम्पन्न व्यक्ति दुःखी न होता !!! समस्या अभावग्रस्तता की नहीं है, जो कुछ मिला हुआ है उसके ठीक तरीके से नियोजन करने की है, यदि मनुष्य इतना सीख लेता है तो बहुत कुछ हो सकता है,स्वतः ही दुर्गति से सद्गति की प्राप्ति हो सकती है।
परम पूज्य गुरुदेव के विशाल साहित्य के मक्खन जिसे उन्होंने “क्रांतिधर्मी साहित्य” का नाम दिया, की पांचवीं पुस्तक “सतयुग की वापसी” के पांचवें ज्ञानप्रसाद लेख के अमृतपान के लिए गुरुशिष्यों को सादर आमंत्रण है। आइए शुद्ध अंतःकरण से,श्रद्धापूर्वक आज के लेख का अमृतपान करें एवं समझने का प्रयास करें कि सतयुग की वापसी का सही अर्थ क्या है। क्या गुरुदेव किसी ऐसे युग की कल्पना कर रहे हैं जहाँ गोपियाँ फिर से भगवान कृष्ण की मुरली पर नृत्य करेंगीं, गवाले माखन चोरी करेंगें?
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इन दिनों की सबसे बड़ी तात्कालिक समस्या यह है कि समाज परिकर में छाई समस्याओं से किस प्रकार छुटकारा पाया जाए और उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए क्या किया जाए, जिससे निरापद और सुविकसित जीवन जी सकना सम्भव हो सके।
समाज विज्ञानियों द्वारा प्रस्तुत कठिनाइयों का कारण “अभावग्रस्तता” को मान लिया गया है। इसी मान्यता के आधार पर यह सोचा जा रहा है कि साधन-सुविधाओं वाली सम्पन्नता की अधिकाधिक वृद्धि की जाए, जिससे अभीष्ट सुख-साधन उपलब्ध होने पर प्रसन्नतापूर्वक रहा जा सके। मोटे तौर पर अशिक्षा, दरिद्रता एवं अस्वस्थता को प्रमुख कारणों में गिना जाता है और इनके निवारण के लिए कुछ नए नीति निर्धारण का औचित्य भी है लेकिन देखना यह है कि वस्तुस्थिति समझे बिना और वास्तविक व्यवधानों की तह तक पहुँचे बिना जो प्रबल प्रयत्न किए जा रहे हैं या किए जाने वाले हैं वे कारगर हो भी सकेंगे या नहीं?
दरिद्रता को ही लें। मनुष्य की शारीरिक, मानसिक समर्थता इतनी अधिक है कि उसके सहारे अपना ही नहीं, परिकर के अनेकों का भली प्रकार गुजारा किया जा सके और बचत को सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकने वाले पुण्य परमार्थ में भी लगाया जा सके। प्रगतिशील जनों में से असंख्यों ऐसे हैं, जिनके पास न तो कोई पैतृक सम्पदा थी और न बाहर वालों की ही कोई कहने लायक सहायता, फिर भी वे अपने “मनोबल और पुरुषार्थ के आधार पर” आगे बढ़ते गए और ऊँचे उठते चले गए, सफलता के उस उच्च शिखर पर जा पहुँचे जिसे जादुई ही कहा जा सकता है।
वस्तुत: उन सफलताओं के पीछे एक रहस्य काम कर रहा होता है और वोह रहस्य है कि उन्होंने अपनी उपलब्धियों का सुनियोजन किया और बिना भटके, नियमितता का पालन करते रहे। जनसहयोग भी उन्हीं को मिलता है जिनके पास सद्गुणों का, सत्प्रवृत्तियों का बाहुल्य होता है। नियमितता का मंत्र एक ऐसा अद्भुत गुरुमंत्र है जिसका अनुकरण करने के लिए यदि तथाकथित दरिद्रों को भी सहमत किया जा सके तो वे आलस्य-प्रमाद की, दीनता-हीनता की केंचुली उतारकर, अभीष्ट दिशा में अपने ही बलबूते इतना कुछ कर सकते हैं, जिसे सराहनीय और सन्तोषप्रद कहा जा सके।
उपरोक्त के सम्बन्ध में परम पूज्य गुरुदेव कह रहे हैं कि इसके विपरीत यदि मनुष्य बाहरी अनुदानों पर ही निर्भर रहता रहे, यही आशा करता रहे कि भगवान् छप्पर फाड़ कर अनुदानों की बारिश कर देंगें तो जो मिलता रहेगा, वह फूटे घड़े में पानी भरते जाने की तरह व्यर्थ रहेगा और कुछ पल्ले पड़ेगा नहीं। ऐसा नहीं है कि भगवान के अनुदान नहीं मिलते अवश्य मिलते हैं लेकिन केवल उन्हीं को जो गुरुदेव के सिद्धांत का पालन करते है कि तू मेरा कार्य कर, बाकी सब मेरे पर छोड़ दे, केवल मेरा ही कहना सुन ले फिर तुझे किसी की भी सुनने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी, यहाँ तक कि मेरे प्रति समर्पित होने के बाद तू अपनी भी नहीं सुनेगा, अंतर्मन से केवल मेरी ही आवाज़ आएगी।
साथिओ यह कोई ऐसे वैसे शब्द नहीं हैं, इन पक्तियों को लिख रहे नगण्य से लेखक के स्वयं के Tried,tested and certified (TTC) शब्द हैं।
जब तक मनुष्य दुर्व्यसनों के आक्रमण से मुक्त नहीं होगा आसमान से बरसने वाली कुबेर की सम्पदा भी अनगढ़ व्यक्तियों के पास ठहर न सकेगी,अनुदानों का वांछित लाभ न मिल सकेगा। इतिहास उदाहरणों से भरा पड़ा है कि जब कभी भी किसी पैतृक संपत्ति को अनगढ़, गलत हाथों में सौंपा गया है, उसका दुरूपयोग ही हुआ है, उस दुरूपयोग ने विनाश ही किया है, घरों के घर उजाड़ दिए हैं। अपनी सर्वश्रेष्ठ संतान मनुष्य को ईश्वर द्वारा प्रदान किए गए संपदाओं के अथाह भंडार का दुरुपयोग हो और ईश्वर चुपचाप देखते रहें, ऐसा हो ही नहीं सकता। मनुष्य को इस दुरूपयोग की भरपाई तो करनी ही होगी,ईश्वर के दंड को तो सहना ही पड़ेगा, आजकल मनुष्य को ऐसी ही सज़ा मिल रही है।
अशिक्षा का कारण यह नहीं है कि पुस्तकें, कापियाँ, कलमें मिलना बन्द हो गई हैं या इतनी निष्ठुरता भर गई है कि शिक्षा के लिए कोई तैयार नहीं होता बल्कि वास्तविक कारण यह है कि शिक्षा का महत्त्व ही समझ नहीं आता और उसके लिए उत्साह ही नहीं उमगता। शिक्षा ग्रहण करने के लिए उत्सुकता तो उठे, उसे ग्रहण करने के लाभ का ज्ञान तो हो, केवल Rat-race से कुछ भी नहीं होने वाला। पिछड़े क्षेत्रों में खोले गए स्कूल प्राय: छात्रों के अभाव में खाली पड़े रहते हैं और नियुक्त अध्यापक रजिस्टरों में झूठी हाजिरी लगाकर, खाली हाथ वापस लौट जाते हैं। यदि मनुष्य में उत्साह उमगे तो जेल में लोहे के तसले को पट्टी और कंकड़ को कलम बनाकर विद्वान् बन जाने वालों का उदाहरण हर किसी के लिए वैसा ही चमत्कार प्रस्तुत कर सकता है। गुरुदेव के साहित्य ने, आदरणीय चिन्मय जी के उद्बोधनों ने,ज्ञानप्रसाद लेखों ने न केवल शिक्षा के महत्व को बल्कि शिक्षा और विद्या के अंतर को भी समझाने का प्रयास किया है। सरकारों द्वारा शिक्षा के वितरण में आ रही समस्याओं से हमारे पाठक भलीभांति परिचित हैं।
शिक्षा की ही भांति “समर्थता” भी एक ऐसी प्रतिभा है जिसे व्यायामशालाओं में या टॉनिक बेचने वालों की दुकानों में नहीं पाया जा सकता। उसके लिए संयम, साधना और सुनियोजित दिनचर्या, नियमितता अपनाने से ही अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है। दूसरों का रक्त अपने शरीर में प्रवेश करा (Blood transfusion) लेने पर भी उस उपलब्धि का अन्त थोड़े ही समय में हो जाता है। अपने निजी रक्त उत्पादन के सुव्यवस्थित हो जाने पर ही काम चलता है।
अधिक उत्पादन, अधिक वितरण के लिए किए गए बाहरी प्रयास तब तक सफल न हो सकेंगे, जब तक कि मनुष्य का विश्वास ऊँचे स्तर तक उभारा न जाए। भूल यही होती रहती है कि मनुष्य को दीन, दुर्बल, असहाय, असमर्थ मान लिया जाता है और उसकी अनगढ़ आदतों को सुधारने की अपेक्षा,अधिक साधन उपलब्ध कराने की योजनाएँ बनती और चलती रहती हैं। लम्बा समय बीत जाने पर भी, सभी साधन प्रदान किये जाने के बावजूद भी जब स्थिति यथावत् बनी रहती है, तब प्रतीत होता है कि साधनों से लादने का कोई औचित्य नहीं है, समस्या का मूल कुछ और ही है जिसे समझा ही नहीं जा रहा।
एक भ्रम यह भी जनसाधारण पर हावी हो गया है कि सम्पदा के आधार पर ही प्रगति हो सकती है। यह भ्रम इसलिए भी पनपता और बढ़ता जा रहा है कि धनवान लोगों को ठाठ-बाट से रहते, गुलछर्रे उड़ाते देखकर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि वह सुखी और समुन्नत है लेकिन लबादा उतारकर जब इस वर्ग को नंगा किया जाता है तो पता चलता है कि उसके भीतर एक अस्थिपंजर ही किसी प्रकार साँसें चला रहा है। प्रसन्नता के नाम पर उन्हें चिन्ताएँ ही खाए जा रही हैं। ईर्ष्या-आशंका से लेकर अपने एवं अपनों के दुर्गुण-दुर्व्यसन स्थिति को पूरी तरह उलट कर रख दे रहे हैं। औसत नागरिक की तुलना में, यह स्थिति धनवानों को कहीं अधिक उद्विग्न, रुग्ण और चिन्तित बनाए रखती है, उनके जीवन के आनन्द का ही बुरी तरह अपहरण कर लेती है।
पिछली सदी की ओर दृष्टि दौड़ाकर देखने पर प्रतीत होता है कि जब तथाकथित शिक्षा का, सम्पदा का, विज्ञान स्तर की चतुरता का इतना अधिक विकास नहीं हुआ था, तब मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ, सुखी, सन्तुष्ट और हिल-मिलकर मौज मनाने की स्थिति में था। बढ़ी हुई समृद्धि ने तो वह सब भी छीन लिया, जिसे मनुष्य ने लाखों वर्षों के परिश्रम के सहारे, सभ्यता और सुसंस्कारिता के उच्चस्तरीय संयोग से दूरदर्शिता के साथ अर्जित किया था।
यहाँ सुविधा-साधनों,प्रगति को दुर्गति का कारण नहीं बताया जा रहा है बल्कि यह कहा जा रहा है कि यदि उनका सदुपयोग बन पड़ा होता तो स्थिति उस समय की अपेक्षा कहीं अधिक अच्छी होती, जिस समय साधन कम थे। तब विकसित भावचेतना के आधार पर स्वल्प उपलब्धियों का भी श्रेष्ठतम उपयोग कर लिया जाता था और अपने साथ समूचे समुदाय को, वातावरण को, सच्चे अर्थों में समृद्ध-समुन्नत बनाए रहने में सफलता मिल जाती थी।
परम पूज्य गुरुदेव ऐसे ही वातावरण को सतयुग कह रहे हैं।
तथाकथित प्रगति का विशालकाय सरंजाम जुट जाने पर भी, भयानक स्तर की अवगति का वातावरण क्यों कर बन गया? इसका उत्तर यदि गम्भीरता से सोचा जाए तो एक ही तथ्य हाथ लगेगा कि यह सभी अनर्थ बुद्धि भ्र्म ने ही सँजोए हैं। जब बुद्धि भ्र्ष्ट हो जाती है तो कुछ ऐसे ही परिणाम देखने को मिलते हैं।
यहाँ एक बहुत ही लॉजिकल प्रश्न उठता है कि ऐसी स्थिति के लिए बुद्धि को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाए, उसी को कोसा जाए? नहीं ऐसा करना उचित न होगा !!!! बुद्धि का निर्धारण तो भाव-सम्वेदनाओं के आधार पर होता है। भावनाओं में नीरसता, निष्ठुरता जैसी निकृष्टताएँ घुल जाए तो फिर तेज़ाबी तालाब में जो कुछ गिरेगा, देखते-देखते अपनी स्वतंत्र सत्ता को उसी में जला-घुला देगा। उस क्षेत्र में विकृतियों का जखीरा जम जाना ही एकमात्र ऐसा कारण है, जिसके रहते समृद्धि और चतुरता का विकास-विस्तार होते हुए भी उल्टी सर्वतोमुखी विपन्नता ही हाथ लग रही है। कीचड़ के ऊपर तैरने वाला पानी भी तो पीने के काबिल नहीं होता है, उसे भी तो Treat करके पीने लायक बनाया जाता है। जब तक मनुष्य दुर्भावनाओं का शिकार होता रहेगा, दुर्बुद्धि ही पनपेगी,दुर्बुद्धि से दुर्गति के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगेगा ही नहीं।
इसलिए साथिओ, आज के लेख का निम्नलिखित सन्देश है:
भाव संवेदनाओं को जागृत करें,सद्बुद्धि का विकास करें,दुर्गति से सद्गति की ओर कदम बढ़ाएं,सामूहिक सुख शांति की कामना करें, यही सतयुग की वापसी है।
नियमितता से, निरंतरता से गुरुज्ञान का अमृतपान एक उत्कृष्ट सहयोगी का कार्य करेगा।
जय गुरुदेव
