आज के ज्ञानप्रसाद लेख का सन्देश, “जो उसकी सुनता है,गुरुदेव की सुनता है उसे अन्य किसी की भी सुनने का आवश्यकता नहीं पड़ती है।”
“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की पांचवीं पुस्तक “सतयुग की वापसी” में गुरुदेव जिस सतयुग की बात कर रहे हैं उसे हम सबने इक्क्ठे होकर,अपनी आँखों के ऊपर चढ़े हुए चश्मे को बदल कर,नकारात्मकता को सकरात्मकता में बदल कर स्थापित करना है। इसको करने के लिए केवल गुरुदेव के दिव्य साहित्य को समझकर,अंतर्मन में उतार कर लोगों के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत करना है।
इसी दिव्य अमृतपान के लिए आप सब गुरुकक्षा में सादर आमंत्रित हैं।
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“सतयुग की वापसी” में सबसे बड़ी अड़चन Unwanted धन का संग्रह ही है। हर किसी को “स्वार्थ सिद्धि” का आधार केवल धन ही प्रतीत हो रहा है। स्वार्थ सिद्धि को बहुत ही सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए कुछ भी किया जा सके। इसीलिए राजनेताओं के लिए समय-समय पर स्लोगन आविष्कार किया जाते रहे हैं , उन्ही में से एक स्लोगन यह भी है : हम तो हैं जुगाड़ में जनता जाए भाड़ में। लोगों में अक्सर धारणा बन चुकी है कि धन संग्रह से, फिज़ूल की वाहवाही के लिए, अपार धन-शक्ति से सब कुछ (सब कुछ?) प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन सही अर्थों में ऐसा है नहीं। इन पंक्तियों के पाठक पर ही किसी ने कटाक्ष करते कहा था, धन से कुछ भी खरीदा जा सकता है, धन के बिना तो कोई पूछता तक नहीं है।
पाठकों से निवेदन है कि तनिक दृष्टि घुमा कर देख लें कि धन-वैभव से लदे मानव कितने सुखी एवं संतुष्ट हैं। महंगाई के लिए सबसे अधिक चिल्लाने वाले ऐसे ही लोग बहुतयात में मिलेंगे। सड़क पर कड़ी धूप में पसीना बहाने वाला,महंगाई से सबसे अधिक प्रभावित होना चाहिए,हो भी रहा है लेकिन उसके विचारों और दूसरी कैटेगरी के लोगों में जमीन आसमान का अंतर है। उसका प्रत्येक कार्य ईश्वर को समर्पित है एवं उसके साथ ईश्वर की शक्ति है लेकिन धनी मनुष्य हाय-तौबा मचाते,रोते चिल्लाते, हर चीज़ के नुक्स निकालते ही काटे जा रहा है।
यदि एक पीढ़ी पीछे की ओर दृष्टि घुमाएं तो स्पष्ट दिख जायेगा कि आज के लोकमानस के अंतःकरण पर संग्रह और उपभोग की ललक-व्याकुलता ऐसे उन्माद के रूप में छाई हुई है कि उसे धन प्राप्ति के इलावा,पदार्थ-संग्रह के इलावा और कुछ दिखता ही नहीं है। धन-प्राप्ति से अमीर होने की तृष्णा में यदि मनुष्य को कोई गलत मार्ग भी अपनाना पड़े तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, उसे गरीब की लाशों को रौंद कर भी आगे बढ़ना पड़े तो कोई आश्चर्य नहीं।
“मानवी दिव्य चेतना” के लिए ऐसे प्रचलन को अपनाना सर्वथा अवांछनीय है, Unwanted है,Undesirable है। जो कुछ आज का मनुष्य कर रहा है ऐसा कुछ तो कृमि-कीटक और पशु-पक्षी भी नहीं करते। वे शरीरचर्या के लिए आवश्यक सामग्री प्राप्त करने के उपरान्त, अन्न का एक दाना तक ग्रहण नहीं करते। पेट भरने के बाद कीड़े-मकोड़े भी प्रकृति द्वारा सौंपे उन कार्यों में लग जाते हैं जिसमें उनका स्वार्थ भले ही न सधता हो लेकिन विश्व व्यवस्था के सुनियोजन में कुछ तो योगदान मिलता ही है।
ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति की पदवी से सुशोभित मनुष्य से तो यह कीड़े-मकोड़े ही बेहतर हैं क्योंकि मनुष्य का पेट तो कभी भरता ही नहीं है, वोह मरते दम तक मृगतृष्णा में भागा फिरता है, इस भागमभागी में, एक दिन इस संसार से अतृप्त ही विदा ले लेता है।
यदि ईश्वर ने मनुष्य को उत्कृष्टता का दर्जा दिया है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपनी विशिष्टता को साधनों के संग्रह एवं फिजूलखर्ची में विसर्जित करता रहे। अन्य प्राणीओं की भांति, ईश्वर ने मनुष्य के लिए अनेकों बड़े कर्तव्य निर्धारित किये हैं। अपनी प्रिय संतान बनाते हुए ईश्वर आशा करते हैं कि मनुष्य संयम साधना द्वारा ऐसा आत्म परिष्कार करे जिसके आधार पर विश्व उद्यान का माली बनकर वह सर्वत्र शोभा का वातावरण बना सके। यहाँ एक अति सोचनीय विषय समझने की आवश्यकता है कि जब सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुरूप अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाते हैं तो मनुष्य के लिए ऐसी क्या विवशता आन पड़ी है कि उसे अनावश्यक संग्रह के लिए आकुल-व्याकुल होकर, पग-पग पर अनर्थ करना पड़ रहा है, उत्तर केवल एक ही है: उसका पेट ही नहीं भरता, आँखें ही नहीं तृप्त होतीं !!!!
गुरुदेव ने गहरी डुबकी लगा कर निम्नलिखित शब्दों में इस उलटी रीति का निमित्त कारण भी समझाया है:
“भाव-सम्वेदनाओं का स्रोत सूख जाने पर मनुष्य के अंतःकरण में सूखे तालाब जैसी शुष्कता ही शेष बचती है।”
सूखे तालाब जैसी स्थिति को चेतना क्षेत्र की निष्ठुरता या नीरसता भी कह सकते हैं। इस प्रकार उत्पन्न हुई संकीर्ण स्वार्थी प्रवृति के कारण मनुष्य को केवल अपना ही वैभव सब कुछ प्रतीत होता है, उसे सूझता ही नहीं है कि इस स्वार्थ-सिद्धि से आगे भी बहुत कुछ हो सकता है। धनबल से वैभव कमाने के साथ ही यदि मनुष्य यथासंभव दूसरों की सेवा-सहायता भी कर दे तो आत्मसन्तोष और लोकसम्मान जैसी उपलब्धियाँ संग्रहित हो सकती हैं। यह ऐसी उपलब्धियां हैं जिनका अनुमान लगाना एवं अनुभव करना तक कठिन हो जाता है। आँख खराब हो जाने पर दिन में भी मात्र अन्धकार ही दिख पड़ता है। कान के पर्दे जवाब दे जाएँ तो कहीं से कोई आवाज आती सुनाई नहीं पड़ती। ऐसी ही स्थिति उनकी बन पड़ती है, जिनके लिए “अनर्थ स्तर की स्वार्थ पूर्ति” ही सब कुछ बनकर रह जाती है।
गुरुदेव ऐसे मनुष्यों के लिए एक बहुत ही प्रैक्टिकल निम्नलिखित उदाहरण देकर समझा रहे हैं,ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के समर्पित साथिओं के लिए यह उदाहरण बहुत ही लाभदायक हो सकता है:
सभी जानते हैं कि शरीर से चेतना निकल जाने पर, कुछ ही क्षणों में चलता-फिरता, बातचीत करता शरीर एक लाश का नाम (Dead body) ग्रहण कर लेता है। इतना ही नहीं, कुछ ही क्षण पहले जिसके साथ भांति-भांति के वायदे किये थे, जीने-मरने की कसमें खायी थीं, उस लाश को ठिकाने लगाने की जल्दी पड़ जाती क्योंकि वह लाश सड़ने लगती है, घिनौना वातावरण उत्पन्न कर देगी। शर्मा जी, वर्मा जी, पापा, मम्मी सब नाम भूलकर एक Dead body एक नया नाम जन्म ले लेता है। सभी पाठक जानते हैं कि जब तक शरीर में चेतना विद्यमान थी, वह जीवित शरीर को समर्थ एवं सुन्दर बनाए हुए थी, प्राण निकलते ही वह काया पत्थर की भांति निर्जीव (Lifeless),नीरस (रसहीन,बोरिंग) और निष्ठुर(कठोर) हो जाती है, यह सभी विशेषताएं पत्थरों की ही तो हैं!!!
यदि पाठक इस स्थिति को अपने ह्रदय की आँखों से देख पाएं तो अवश्य ही समझ जायेंगें कि मृतक शरीर तो समीप बैठे सम्बन्धियों,मित्रों आदि का रोना-धोना भी नहीं सुन पाता,उन पर कुछ ध्यान भी नहीं दे पाता, मानो उन सबसे उसका कभी दूर का सम्बन्ध भी न रहा हो।
यह सारी स्थिति प्राण निकलने का बाद, पत्थर जैसी काया में परिवर्तित होने के बाद ही तो हुई है। गुरुदेव तो बार-बार भाव-सम्वेदनाओं की बात करते आ रहे हैं यहाँ तो उन्होंने इतना भी कह दिया कि भाव संवेदनाओं का स्रोत सूख जाने पर मनुष्य भी ऐसा ही घिनौना,निष्प्राण हो जाता है।
जीवितों और मृतकों की दुनिया अलग-अलग है।मुर्दे श्मशान में, कब्रिस्तान में जगह घेरकर जा बैठते हैं और उधर से निकलने वालों को भूत-प्रेतों की तरह डराते-भगाते रहते हैं। क्या जीवित प्राणी भला ऐसा कुछ कर पाएगा? कभी नहीं, यदि कोई करता है तो उसे संवेदनहीन मुर्दों की केटेगरी में शामिल किया जाना चाहिए। जीवित व्यक्ति तो आवश्यक प्रयासों में ही निरत देखे जाते हैं ।
गुरुदेव का दिव्य सन्देश यही है कि
“इन दिनों सम्वेदनाहीनों को प्रेतों जैसी और सम्वेदनशीलों को जीवितों जैसी गतिविधियाँ अपनाए हुए प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।”
विश्लेषण हमें ही करना है कि हम कौनसी केटेगरी में हैं।
संवेदनहीनता से ही कहा जा सकता है कि करुणा उभरे बिना दूसरों की स्थिति और आवश्यकता का भान ही नहीं होता। करुणा के अभाव में लकड़ी चीरना और किसी निरपराध की बोटी-बोटी नोंच लेना प्राय: एक जैसा ही लगता है। किसी के साथ अन्याय बरतने में, सताने-शोषण करने में कुछ भी अनुचित प्रतीत नहीं होता। भावना के अभाव में मनुष्य का अन्तराल चट्टान की तरह नीरस-निष्ठुर हो जाता है। सम्वेदना-शून्य व्यक्तिओं को नर-पशु भी तो नहीं कहा जा सकता क्योंकि पशुओं की भी अपनी मर्यादाएँ होती हैं। मनुष्य के कारनामे देख कर तो कई बार आँखें शर्म से झुक जाती हैं क्योंकि पशुओं को अविकसित कहने वाला मनुष्य जो कुछ कर रहा है उससे कोई भी अपरिचित नहीं है। शायद ही कोई पशु हो जो प्राकृतिक अनुशासन के विपरीत एक भी कदम उठाता हो।
गुरुदेव व्यथित होकर कह रहे हैं कि लगता है भावविहीनों,श्रद्धाविहीनों के लिए नर-पिशाच, ब्रह्म राक्षस, मृत्युदूत, दुर्दान्त दैत्य जैसे नामों में से ही किसी का चयन करना पड़ेगा क्योंकि ऐसी ही Species की आपाधापी उस स्तर तक पहुँचती है जिनमें दूसरों के विकास/विनाश से, उत्पीड़न/अभिवर्धन से कोई वास्ता नहीं रहता। उनके लिए ‘स्व’ ही सब कुछ बनकर रह जाता है। ऐसे लोगों का बस चले तो वे हिरण्याक्ष दैत्य की तरह दुनिया की समूची सम्पदा समेटकर ले उड़ें, भले ही उसे समुद्र में छिपाकर निरर्थक बनाना पड़े। पौराणिक कथाओं के इलावा,पाठकों में से शायद ही किसी ने हिरण्याक्ष दैत्य को देखा हो लेकिन सोशल मीडिया पर,सड़क पर चलते,इधर-उधर न जाने कितने ही दैत्य देखे जा सकते हैं। स्वार्थ के अंधे इतना भी नहीं सोच पाते कि ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना अनेकों अन्य प्राणिओं के लिए भी की है, उन्हें भी जीने का हक है । सब कुछ अपने लिए समेट लेने, हड़प जाने को ही विशिष्टता का फलितार्थ नहीं मान बैठना चाहिए।
हर युग की तरह आज के युग की समस्याएँ भी अगणित हैं, उलझनों, संकटों, विग्रहों का अन्त आज भी कम नहीं है ,पौराणिक युग में भी कम नहीं था। यह सब संकट कहाँ से उत्पन्न होते हैं और कैसे निपट सकते हैं इसकी विवेचना करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मात्र अपनेआप तक, गिने-चुने अपनों तक सीमित रहने वाला मनुष्य किन्हीं अन्यों की चिन्ता कहाँ कर सकता है, उदार न्यायनिष्ठा का परिचय ही कहाँ दे सकता है?
ऐसी दशा में अनाचार के अतिरिक्त और कुछ पनपेगा ही नहीं और उसका प्रतिफल अनेकानेक विग्रहों के रूप में ही आकर रहेगा। यही दुष्प्रवृत्ति जब बहुसंख्यक लोगों द्वारा अपनाई जाती है, तो उसका परिणाम वातावरण को विक्षुब्ध किए बिना नहीं रहता। यह एक Chain reaction है, एटम बम की भांति विस्फोट करने की शक्ति रखता है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के एक-एक साथी से गुरुदेव इसी Chemical reaction की शक्ति को सकारात्मकता के लिए प्रयोग करने की आशा कर रहे हैं।
जहाँ आत्मीयता होती है,संवेदना वहीँ पर जन्म लेती है, तब मनुष्य दूसरों के दु:ख को अपना दु:ख,दूसरों के सुख को अपना सुख मानने लगता है। सहानुभूति के रहते ऐसा व्यवहार करना सम्भव नहीं होता जिससे किसी के अधिकारों का अपहरण होता हो, किसी को शोषण का शिकार बनना पड़ता हो। जब प्रचलन इसी प्रकार का रहेगा तो न तो दुर्व्यवहार बन पड़ेगा और न ही किसी को अकारण त्रास सहना पड़ेगा।
यदि भाव-सम्वेदना जीवन्त और सक्रिय बनी रहे तो सृजन और सहयोग के आधार पर उत्थान और कल्याण का सुयोग सर्वत्र ही बन पड़ेगा। अपना और अपनों के हितसाधन की First priority अवश्य होनी चाहिए लेकिन यदि यह आत्मभाव सुविस्तृत होता चला जाए, जनसमुदाय को भी अपने आँचल में लपेट ले, अन्य प्राणियों को भी अपने कुटुम्बी जैसा माने,अपने जैसा समझे तो सुख-शान्ति का पथ स्वयं ही बनता जाएगा। सतयुग की वापसी के लिए कोई बड़े अनुष्ठान नहीं करने पड़ेंगें, मंत्रों की मालाओं की गणना के पीछे नहीं भागना पड़ेगा, मंदिरों में घंटियाँ बजाकर भगवान को जगाना नहीं पड़ेगा, असफलता के लिए भगवान पर सारा दोष डाल कर झगड़ा नहीं करना पड़ेगा क्योंकि अब मनुष्य ने “उसको, गुरुदेव को” सुनना शुरू कर दिया है। जो उसकी सुनता है, उसे किसी और की सुनने की ज़रूरत ही नहीं है।
यही है आज के लेख का सन्देश।
जय गुरुदेव
