“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की 23 पुस्तकों के बारे में गुरुदेव कह चुके हैं कि यह हमारे जीवन भर के साहित्य का मक्खन है, हमारे विशाल साहित्य को न पढ़ सको तो कोई बात नहीं लेकिन इन 23 पुस्तकों को बार-बार पढ़ना,100 बार पढ़ना, एक-एक शब्द पढ़ना। गुरुदेव ऐसा भी कह रहे हैं कि गायत्री महाविज्ञान को एक तरफ रख दो,यज्ञ अनुष्ठान न भी हो तो कोई बात नहीं लेकिन इस मक्खन का अमृतपान अवश्य करो।
आज के लेख में गुरुदेव सतयुग की वापसी के लिए मनुष्य में देवत्व के अवतरण की बात कर रहे हैं।
आइए देखें कि यह एक कल्पना ही तो नहीं है।
पदार्थ-सम्पदा की उपयोगिता और महत्ता कितनी ही बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो लेकिन यदि उसका दुरुपयोग चल पड़े तो अमृत भी विष बनकर रहता है। कलम बनाने के काम आने वाला चाकू किसी के प्राण हरण का निमित्त कारण भी बन सकता है। बलिष्ठता, सम्पदा, शिक्षा के सम्बन्ध में भी यही बात है। उनके सत्परिणाम तभी देखे जा सकते हैं, जब सदुपयोग कर सकने वाली सद्बुद्धि सक्रिय हो। यहाँ यह भी समझ लेना चाहिए कि बड़ी-बड़ी डिग्रियां,पद-प्रतिष्ठा लेना ही पर्याप्त नहीं है,मनुष्य में भाव-सम्वेदनाओं का पावन प्रवाह ही भले-बुरे का मूल्यांकन करता है।
गुरुदेव कह रहे हैं कि इस तथ्य का कारण जानने के लिए हमें भाव-सम्वेदनाओं की गहराई में उतरना होगा, समझना होगा कि अन्त:करण में श्रद्धा, सम्वेदना की शीतलता, सरसता भरी रहने पर ही सज्जनता,नेकी,उदारता का वातावरण बनता है। मनुष्य की मानसिकता (मन) को समझना होगा।
मानसिकता उस दासी की तरह है, जो “श्रद्धावान रानी” की सेवा में हर घड़ी हुक्म बजाने के लिए खड़ी रहती है। यह विचार काफी गहरा है। इसे आम तौर पर इस रूप में समझा जाता है कि
“मानसिकता (या मन) एक बेहतरीन सेवक के साथ-साथ एक बहुत ही खतरनाक मालिक भी है।”
जब मनुष्य की मानसिकता(उसका मन) एक दास बनकर काम करती है तो वह अपने विचारों और भावनाओं को नियंत्रित करता है लेकिन जब वह मनुष्य का मालिक ही बन जाता है,उस समय मनुष्य अपने ही विचारों का दास बन जाता है।
इस सिद्धांत को बेहतर तरीके से समझने के लिए इसके दोनों पहलुओं को देखते हैं:
जब मानसिकता ‘दासी’ (सेवक) होती है मनुष्य अपने दिमाग को नियंत्रित करता है, ऐसी स्थिति में मन एक शक्तिशाली उपकरण की तरह काम करता है। यह मनुष्य को ध्यान केंद्रित करने और मुश्किलों से लड़ने की ताकत देता है, विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का रास्ता बताता है और मनुष्य गुस्से, डर या तनाव में बहने के बजाय सोच-समझकर फैसला लेता है।लेकिन जब मानसिकता ‘मालकिन’ बन जाती है, मनुष्य उसके नियंत्रण में आ जाता है तो नुकसान होता है। ऐसी स्थिति में नकारात्मक विचारों का जाल सामने दिखता है। दिमाग मनुष्य को पुरानी गलतियों या भविष्य की चिंताओं में उलझाए रखता है, वह छोटे-छोटे मुद्दों पर भी बहुत अधिक सोचने लगता है, ओवरथिंक करता है जिससे मानसिक थकान होती है। ऐसी स्थिति मनुष्य के अंदर ऐसा डर पैदा कर देती है जो असलियत में मौजूद ही नहीं है।
उपरोक्त चर्चा का निष्कर्ष तो यही निकलता है कि मनुष्य को अपनी मानसिकता को ‘दासी’ बनाए रखना चाहिए ,हमेशा सजग रहना चाहिए ,अपने विचारों पर नजर रखना चाहिए कि वे उसे किस दिशा में ले जा रहे हैं। इस दिशा के लिए गुरुदेव सकारात्मक आदतें अपनाने के लिए कहते हैं, अच्छी किताबें पढ़ने को कहते हैं, ध्यान लगाने को कहते हैं और और खुद से सकारात्मक बातें(Self-talk) करने को कहते हैं। इस मंच से प्रसारित होने वाले लेख इस दिशा में सहायक हो सकते हैं।
गुरुदेव कहते हैं कि मनुष्य को अपने जीवन का नियंत्रण अपने हाथ में लेना चाहिए । जब भी दिमाग में कोई नकारात्मक विचार आए, तो खुद से कहें:
“यह सिर्फ एक विचार है, मेरी हकीकत नहीं।”
स्पष्ट है कि देवमानवों में से प्रत्येक को अपनी सुविधाओं, मनचली इच्छाओं पर अंकुश लगाना पड़ा है और इस तरह बचे हुए समय को उत्कृष्टताओं के समुच्चय समझे जाने वाले भगवान् के चरणों पर अर्पित करना पड़ा है। यदि आज का मानव इस छोटी सी बात को समझ ले तो सतयुग की वापसी तो अपनेआप ही हुई समझो लेकिन क्या किया जाए उसे तो ऐश करनी है, उसके लिए तो जीवन एन्जॉय करने के लिए मिला है, सम्पदा बटोरने के लिए, भौतिकता के अम्भार इक्क्ठे करने के लिए मिला है। आज का अधिकतर मानव इसी भागदौड़ में तो लगा हुआ है, न दिन को चैन है,न रात को,एक ही शब्द आज की पीढ़ी का सबसे प्रचलित शब्द है: भाई साहिब हम तो बहुत ही बिज़ी हैं, मरने तक की फुरसत नहीं है।
अरे भैया, इन Unproductive, फिजूलखर्ची के कुछ ही कृत्यों पर अंकुश लगा कर देखो, समय ही समय है।
यहाँ पर यह कतई ही नहीं कहा जा रहा कि अपने परिवार की जिम्मेदारिओं से मुख मोड़ लिया जाए, वोह मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य है लेकिन जिम्मेदारिओं का नियंत्रण तो किया ही जा सकता है।
हम देवमानव तो हरगिज़ नहीं हैं जिन्हें लोकमंगल के लिए, आत्म परिष्कार के लिए अपनी क्षमता का कण-कण समर्पित करना पड़ा है लेकिन उनसे कुछ प्रेरणा एवं मार्गदर्शन तो ले ही सकते हैं। इतना सा मूल्य चुकाने पर ही मनुष्य दैवी अनुग्रह और उसके आधार पर विकसित होने वाला उच्चस्तरीय व्यक्तित्व का हकदार बन जाता है।
इसी स्थिति को महानता कहते हैं।
महान व्यक्तित्व आकाश से नहीं टपकते, यहीं पर, इसी धरती पर आपके आसपास दिखते रहते हैं। महानता एवं वरिष्ठता को चरितार्थ करने वाले मनुष्यों को ही देवमानव या देवदूत कहते हैं। जब मनुष्य किसी के साथ कोई भी महानता, लोक कल्याण का कार्य करता है तो सहसा ही मुँह से निकल पड़ता है, आप तो देवता हो !!! देवता देने वाले को ही तो कहते हैं। ऐसे ही देवमानवों के प्रबल पुरुषार्थों के आधार पर शालीनता का वातावरण बनता है और समस्त संसार इसी आधार पर सुन्दर व समुन्नत बन पड़ता है।
तो साथिओं हुई न सतयुग की वापसी?
यहाँ पर समझने वाली बात यह है कि जो लोग अपना और दूसरों का जो कुछ भी उपलब्ध हो, उस सब को हड़प जाने की प्रवृति लेकर इस संसार में आये हैं उन्हीं कुछ एक सिरफिरों के कारण यह धरती दूषित हुई है। संकीर्ण स्वार्थपरता, स्वच्छन्द उपयोग की ललक ही निष्ठुरता को जन्म देती है। ऐसी प्रवृति मात्र हड़पने की ही शिक्षा देती है, जिसके लिए भले ही किसी भी स्तर का अनाचार बरतना पड़े। निष्ठुरता इसी स्थिति की देन है जो अनावश्यक संचय और अवांछनीय उपभोग के लिए हर समय उकसाती-उत्तेजित करती रहती है। यही है वह मानसिकता जिसकी छाप जहाँ भी पड़ी है, वहीं चित्र-विचित्र संकट एवं विग्रह उत्पन्न होते चले गए हैं। इसी मानसिकता को दूसरे शब्दों में कुटिलता, नास्तिकता अथवा शालीनता के समतुल्य भी समझा जा सकता है। प्रदूषण, रेडिएशन्स, युद्धोन्माद, दरिद्रता, पिछड़ापन, अपराधों का आधार खोजने पर एक ही निम्नलिखित निष्कर्ष निकलता है:
उपलब्धियों को दानवी स्वार्थपरता के लिए नियोजित किए जाने पर ही यह संकट उत्पन्न हुए हैं।
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को चौपट करने में असंयम और दुर्व्यसन ही प्रधान कारण हैं। मनुष्यों के मध्य चलने वाले छल-छद्म प्रपंच एवं विश्वासघात के पीछे भी यही मानसिकता काम करती है। इनमें जिन अवांछनीयताओं का अभ्यास मिलता है वोह सब बिगड़ी हुई मानसिकता की ही देन हैं।
दोष न तो विज्ञान का है और न बुद्धिवाद का। बढ़ी-चढ़ी उपलब्धियों को भी वर्तमान अनर्थ के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यदि विकसित बुद्धिवाद का, विज्ञान का, वैभव का, कौशल का उपयोग नेकी और सद्भावना के आधार पर बन पड़ा होता तो खाई-खन्दकों के स्थान पर समुद्र के मध्य लाइट हाउस बनकर खड़ी रहने वाली मीनार बनकर खड़ी हो गई होती। कुछ वरिष्ठ कहलाने वाले यदि उपलब्धियों का लाभ कुछ सीमित लोगों को ही देने पर आमादा न हुए होते, तो यह प्रगति जन-जन के सुख सौभाग्य में अनेक गुनी बढ़ोत्तरी कर रही होती। हँसता-हँसाता, खिलता-खिलाता जीवन जी सकने की सुविधा हर किसी को मिल गई होती लेकिन उस विडम्बना को क्या कहा जाए, जिसमें विकसित मानवी कौशल ने उन दुरभिसन्धियों के साथ तालमेल बिठा लिया, जो गिरों को गिराने और समर्थों को सर्वसम्पन्न बनाने के लिए ही उतारू हों।
मनुष्य की बिगड़ी हुई प्रवृति देखने को तो चाहे ऊपर से ही दिखती हो लेकिन जड़ अंतर्मन की कुसंस्कारिता के साथ जुड़ी रहती है। यदि उस बिगड़े हुए अंतर्मन को सुधारा, सँभाला, उभारा जा सके, तो समझना चाहिए कि चिन्तन, चरित्र और व्यवहार बदलने की सम्भावना है। मात्र इतने से ही उच्चस्तरीय परिवर्तन (धरती पर स्वर्ग का अवतरण) सुनिश्चित हो सकता है ,साथिओ यही है सतयुग की वापसी जिसके प्रति परम पूज्य गुरुदेव के विचार को नकारना लगभग असंभव है क्योंकि प्रकृति का भी यही नियम है, परिवर्तन !!! परिवर्तन सुनिश्चित है, हो भी रहा है, होता भी रहेगा।
हम सब जानते हैं भगवान् असंख्य ऋद्धि-सिद्धियों का स्टोर हाउस हैं । संकटों के निवारण और अवांछनीयताओं के निराकरण की समग्र शक्ति उन्हीं में समाई हुई है। ईश्वर अपनी संतान (मनुष्य) के साथ अपने सम्बन्ध घनिष्ठ करने के लिए उसी प्रकार लालायित रहते हैं जैसे माता अपने बालक को गोद में उठाने, छाती से लगाने के लिए लालायित रहती है। मनुष्य ही है जो जीवनभर वासना,तृष्णा आदि के खिलौनों में लिप्त रहता है और उस दुलार की ओर से मुँह मोड़े रहता है, जिसे पाकर वह सच्चे अर्थों में कृतकृत्य हो सकता था। भगवान् को अपने समीप तक बुलाने, उनका उत्तराधिकारी बनने के लिए यह आवश्यक है कि भगवान् के बैठने के लिए साफ-सुथरा स्थान पहले से ही निर्धारित कर लिया जाए।
यह स्थान मनुष्य का अपना अन्त:करण ही है।
गुरुदेव ने हम जैसों के लिए ही उपासना-साधना-आराधना (USA) का कांसेप्ट दिया है।
अन्त:करण की श्रद्धा और दिव्य चेतना के संयोग की उपलब्धि, दिव्य सम्वेदना कहलाती है, जो नए सिरे से, नए उल्लास के साथ उभरती है। यही उसकी यथार्थता वाली पहचान है। ईश्वर की उपस्थिति तो प्रतिमाओं में भी आरोपित की जा सकती है। तस्वीर देखकर भी प्रियजन का स्मरण किया जा सकता है लेकिन वास्तविक मिलन इतना उल्लास भरा होता है कि उसकी अनुभूति शब्दों में वर्णन करना लगभग असंभव ही है। ईश्वर के साथ इस उल्लास का अनुभव करते ही मनुष्य देवोपम स्थिति में जा पहुँचता है, उसे हर किसी में अपना आपा हिलोरें लेता दिख पड़ता है और समग्र लोकचेतना अपने भीतर घनीभूत हो जाती है। ऐसी स्थिति में “परमार्थ ही सच्चा स्वार्थ” बन जाता है। परमार्थ का संधि विच्छेद (परम-अर्थ) करने पर पता चलता है कि यह एक ऐसा कार्य होता है जो Superlative degree का होता है, जैसे कि परोपकार। दूसरों के विकास में ऐसी प्रसन्नता प्रतीत होती है जैसे कि उनका न होकर, अपना ही विकास हो रहा हो। अपनी प्रसन्नता का केन्द्र दूसरों की सेवा-सहायता में घनीभूत हो जाता है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में इस तरह के प्रेरणा एवं प्रोत्साहन के पल अनेकों साथिओं को स्मरण हो आ गए होंगें जब इस लेखक को ऐसा अनुभव होता रहा था कि साथिओं का विकास अपना ही विकास है। जिस किसी साथी में ज़रा सी भी प्रतिभा की झलक दिखी,उसे न केवल प्रोत्साहित करने बल्कि विज्ञापन करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।
गुरुदेव बताते हैं कि जब इस प्रकार की स्थिति आ जाए तो व्यक्ति अपने चिन्तन और क्रियाकलापों को लोक-कल्याण में, सत्प्रवृत्ति-सम्वर्धन में ही नियोजित कर सकता है। व्यक्ति के अंतःकरण में भगवत् सत्ता उतरे तो उसे मनुष्य में देवत्व के उदय के रूप में देखा जा सकता है। यदि यह अवतरण व्यापक हो, तो धरती पर स्वर्ग के अवतरण की परिस्थितियाँ ही सर्वत्र बिखरी दृष्टिगोचर होंगी।
साथिओ, अब तो आपको स्वयं ही निर्णय लेना होगा कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में सतयुग की वापसी हुई है कि नहीं?
धन्यवाद् जय गुरुदेव
