युग परिवर्तन के आधार को यदि एक शब्द में व्यक्त करना हो तो इतना कहने भर से भी काम चल सकता है कि अगले दिनों “निष्ठुर स्वार्थपरता” को निरस्त करके उसके स्थान पर “उदार भाव-सम्वेदनाओं” को अन्त:करण की गहराई में प्रतिष्ठित करने की, उभारने की, खोद निकालने की आवश्यकता पड़ेगी।
परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा जी की दिव्य पुस्तक “सतयुग की वापसी” में बार-बार वर्णित है कि 21वीं सदी भाव संवेदनाओं के उभारने की अवधि है। “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” के अंतर्गत 23 पुस्तकों के संग्रह में मात्र 32 पन्नों की पुस्तक “सतयुग की वापसी” पांचवीं पुस्तक है। इस पुस्तक में आग्रह किया गया है कि आने वाले दिनों में मनुष्य को एक “निष्ठावान माली” की भूमिका निभानी होगी ताकि यह विश्व-उद्यान फिर से हरा-भरा और स्वर्ग के समान बन सके।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख का सन्देश है कि समर्थता, कुशलता और सम्पन्नता की हर जगह जय-जयकार होती है लेकिन मानना ही पड़ेगा कि इन्हीं तीन क्षेत्रों में फैली अराजकता ने कुछ ऐसे संकट खड़े किए हैं जिनसे किसी प्रकार उबरने के लिए व्यक्ति छटपटा रहा है। इस छटपटाहट का निवारण केवल एक ही शक्ति, “चौथी शक्ति,भाव-सम्वेदना की शक्ति” से ही हो पायेगा। आने वाला समय “निष्ठुर स्वार्थपरता” को निरस्त करके “उदार भाव-सम्वेदनाओं” को उभार कर प्रतिष्ठित करने का समय है। अभी दो दिन पूर्व ही एक लेख में लॉजिकल व्याख्या की गयी थी कि इस मार-धाड़ की दुनिया में भाव-संवेदना कैसे उभर पाएगी। युग परिवर्तन के इस महान कार्य के पीछे अदृश्य सत्ता का ही हाथ रहेगा लेकिन कार्य सम्पन्न करने के लिए प्रतिभाशालिओं को ही आगे आना होगा, उन्हीं को श्रेय मिलेगा।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के समर्पित,श्रद्धावान शिष्य इस कार्य को संम्पन्न करने में गुरुसत्ता का सहयोग करने का संकल्प लिए हुए हैं, इस परिवार के सभी कृत्य एक ही उद्देश्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं और वह कृत्य है, “ गुरुदेव के युगनिर्माण प्रोग्राम में भागीदारी करना।
आइये आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ करें।
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गिरने-गिराने की, मिटने-मिटाने की ध्वंसात्मक योजनाओं में, अनेकों मनचले साथ देने, सहायता करने के लिए सहज ही तैयार हो जाते हैं। होली जलाने के कौतूहल के लिए छोटे बच्चों से लेकर किशोर युवकों तक का एक बड़ा समूह लकड़ियाँ इक्क्ठा करते देखा जाता है। जब उस ढेर में आग लगती है तो तालियाँ बजाने और हुल्लड़ मचाने वालों की भी कमी नहीं रहती। कठिनाई तब पड़ती है जब आग बुझाने के लिए पड़ोसी तक आनाकानी और बहानेबाजी करते देखे गए हैं। तब काम अपने बलबूते ही आरम्भ करना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि कोई भी सहायता के लिए आता है, निस्वार्थ सेवा भावना वाले महापुरुषों से अभी भी यह भूमि वंचित नहीं हुई है। कवि टैगोर ने ठीक ही कहा था कि यदि सत्प्रयोजन की दिशा में कुछ करना हो तो, ‘‘एकला चलो रे’’ की नीति अपनानी चाहिए।
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के कालजयी, सुप्रसिद्ध गीत का सन्देश है कि अगर तुम्हारी पुकार पर कोई न आए, तो अकेले चलो। यह सन्देश आज के डिजिटल और जटिल युग में न केवल प्रासंगिक है, बल्कि शायद पहले से कहीं अधिक सत्य और आवश्यक साबित हो रहा है।
1905 में लिखे गए इस गीत का संदेश आत्म-विश्वास, सत्य और नैतिक साहस था जिसकी सत्यता को निम्नलिखित पॉइंट्स से समझा जा सकता है:
1. सोशल मीडिया और ‘भेड़चाल’ (Conformity) के खिलाफ साहस:
आज का मानव इंफ्लूएंसर,लाइक्स, ट्रेंड्स और वायरल के युग में रह रहा है । लोग भीड़ का हिस्सा बनने या समाज में स्वीकार्य होने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं,अपनी वास्तविक सोच को दबा देते हैं। ऐसे समय में, टैगोर की पंक्तियां,”यदि सब डर रहे हैं, तब डरे बिना तू मुक्तकंठ से अपनी बात बोल। “अकेला रे”, हमें यह सिखाती हैं कि चाहे पूरी दुनिया एक तरफ हो,अगर आप सही हैं तो अपनी बात पर अकेले टिके रहने का साहस रखें।
2. मानसिक स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता (Self-Reliance):
आज हम चारों तरफ से आभासी (Virtual) दुनिया से घिरे हैं, फिर भी अकेलापन (Loneliness) एक वैश्विक महामारी बन चुका है। टैगोर का “एकला चलो” अकेलेपन को लाचारी से बदलकर सकारात्मक एकांत (Solitude) और आत्मनिर्भरता की शक्ति में बदल देता है। यह याद दिलाता है कि जब बाहरी सहारा न मिले, तो व्यक्ति को अपने भीतर की ऊर्जा पर भरोसा करना चाहिए। संतों ने एकांत,प्राकृतिक वातावरण में ही अनेकों उपलब्धियां प्राप्त कीं,शोधकर्ता भी एकांतवास में ही,भीड़ से दूर कुछ कर पाने में समर्थ हुए। पूरी दुनिया को जगमग कर रही AC इलेक्ट्रिसिटी के अविष्कारक निकोला टेस्ला 86 वर्ष की आयु में न्यूयॉर्क में अपने होटल के कमरे में ही प्राण त्याग कर गए थे। उनकी मृत्यु की जानकारी अगले दिन मिली थी जब रूम सर्विस वाली ने आकर दरवाज़ा खोला था। दरवाज़े पर तीन दिन से Do not disturb का Sign लटक रहा था।
3. सामाजिक सुधार और स्टार्टअप संस्कृति:
आज के दौर में यदि कोई लीक से हटकर कुछ नया करना चाहता है तो शुरू में उसके आइडिया (Startup) का मज़ाक उड़ता है। दूरदर्शी नेतृत्व (Visionary Leadership) हमेशा अकेले ही शुरू होता है, जो बाद में एक आंदोलन बनता है।
ज्ञानरथ परिवार की स्थापना भी एकमात्र अकेले ही शुरू हुई थी, साथी जुड़ते गए, गिरते-उठते कारवां चलता रहा,काफिला (भीड़ नहीं!!) बढ़ता ही गया, इस परिवार में जुड़े साथिओं की श्रद्धा और समर्पण का क्या ही कहा जाए, सभी परिवारजनों को बधाई हो।
4. नैतिक संकट और अंतरात्मा की आवाज
भ्रष्टाचार/अनैतिकता के सामने अक्सर लोग यह कहकर समझोता कर लेते हैं कि “जब सब ऐसा कर रहे हैं, तो मैं अकेला क्या बदल दूंगा?” टैगोर का गीत इसी मानसिकता पर चोट करता है। यह कहता है कि यदि तूफ़ान में भी कोई राह दिखाने वाली लालटेन लेकर न आए, तो भी “अपने ही सीने की पसलियों को जलाकर खुद प्रकाश बन और अकेला चल”।
उपरोक्त पंक्तियों से यही मार्गदर्शन मिलता है कि आज के युग में “एकला चलो” का मतलब समाज से कट जाना या अहंकारी होना नहीं है। इसका अर्थ है कि सही रास्ते पर चलने के लिए किसी के सर्टिफिकेट या भीड़ की मंजूरी का इंतजार न करना। यह गीत आज भी हर उस व्यक्ति के लिए एक मज़बूत नैतिक कम्पास (Moral compass) है जो दुनिया में एक सकारात्मक बदलाव लाना चाहता है। गुरुदेव इसी सकारात्मक सोच के लिए हमें प्रेरित कर रहे हैं। ज्ञानप्रसाद लेखों से अनेकों लोग लाभ उठा चुके हैं।
अकेले चल पड़ने वालों का उपहास और विरोध शुरू में ही होता है लेकिन जब स्पष्ट हो जाता है कि उच्चस्तरीय लक्ष्य की दिशा में कोई चल ही पड़ा हो तो साथी/सहयोगी मिलते ही चले जाते हैं। साथिओं के मिलते चले जाने वालों के लिए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के ज्ञानरथ को हांकने वालों से उचित उदाहरण भला और क्या हो सकता है।
नवसृजन के महान कार्य में संलग्न व्यक्तियों की कोई सहायता न करे, यह हो ही नहीं सकता। जब हनुमान्, अंगद, नल-नील जैसे रीछ-वानर मिलकर राम को जिताने का श्रेय ले सकते हैं, तो कोई कारण नहीं कि नवसृजन के कार्यक्षेत्र में जुझारू योद्धाओं की सहायता के लिए अदृश्य सत्ता, दृश्य घटनाक्रमों के रूप में सहायता करने के लिए दौड़ती न चली आए।
विपन्नताएँ इन दिनों सुरसा जैसे मुँह बनाए खड़ी दिखती हैं। आतंक रावण स्तर का है। प्रचलनों के चक्रवात, भँवर, अँधड़, तूफान अपनी विनाश क्षमता का नग्न प्रदर्शन करने में कोई कसर रहने नहीं दे रहे हैं। वासना, तृष्णा और अहंता का उन्माद महामारी की तरह जन-जन को भ्रमित कर रहा है। नीति को पीछे धकेलकर अनीति ने उसके स्थान पर कब्जा जमा लिया है। यह विपन्नता संसार व्यापी समूचे जनसमुदाय पर अपने-अपने आकार-प्रकार में बुरी तरह आच्छादित हो रही है।
ऐसी भयावह स्थिति में सम्पूर्ण विश्व के अरबों मनुष्यों का विचार परिष्कार (ब्रेन वाशिंग) कैसे सम्भव हो? गलत प्रचलनों की दिशाधारा उलट देने का सुयोग किस प्रकार मिले? मनुष्य को तो अपने छोटे से घर-परिवार को सँभालने में इतना परिश्रम करना पड़ता है तो नए मानव की रचना करना, नया संसार बसाना और इस धरती पर नए भगवान् को अवतरित करना, कुछ ऐसे संकल्प हैं जिन पर विश्वास करना कुछ कठिन सा लगता है।
इस भ्र्म भरी,असम्भव दिख रही सृजन प्रक्रिया को विजयश्री वरण करने की सफलता कैसे मिले?
नि:सन्देह कठिनाई बड़ी है और उसे पार करना भी कम कठिन नहीं है लेकिन हमें उस परमसत्ता/अपनी गुरुसत्ता के सहयोग पर विश्वास करना चाहिए जो इस समूची सृष्टि को उगाने, उभारने, बदलने जैसे क्रियाकलापों को ही अपना मनोविनोद मानती और उसी में निरन्तर निरत रहती है।
मनुष्य के लिए तो छोटे काम भी कठिन हो सकते हैं लेकिन भगवान् की छत्रछाया में रहते कोई भी काम असम्भव नहीं कहा जा सकता। विषम वेलाओं में अपनी विशेष भूमिका निभाने के लिए ही तो ‘‘सम्भवामि युगे-युगे (अर्थात हर युग में ’’ के सम्बन्ध में भगवान भी तो वचनबद्ध हैं ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे अर्थात
साधूनां परित्राणाय: अच्छे और सज्जन लोगों की रक्षा करने के लिए।
दुष्कृताम् विनाशाय: बुरे और पापी लोगों का नाश करने के लिए।
धर्मसंस्थापनार्थाय: धर्म की पक्की स्थापना करने के लिए।
सम्भवामि युगे युगे: मैं हर युग में अवतार लेता हूँ।
युगों-युगों से ऐसा होता आया है तो फिर इन दिनों समस्त संसार पर छाई हुई विपन्नता की वेला में ईश्वर के परिवर्तन प्रयास गतिशील क्यों न होंगे? जराजीर्ण मरणासन्न में नवजात जैसा परिवर्तन-प्रत्यावर्तन करते रहना जिसका प्रिय विनोद है, उसे इस अँधेरे को उजाले में बदल देने जैसा प्रभात पर्व लाने में कठिनाई क्यों होगी?
युग परिवर्तन में दृश्यमान भूमिका तो प्रामाणिक प्रतिभाओं की ही रहेगी लेकिन उसके पीछे “अदृश्य सत्ता” का असाधारण योगदान रहेगा। कठपुतलियों के दृश्यमान अभिनय के पीछे भी तो बाजीगर की अँगुलियों से बँधे हुए तार ही प्रधान भूमिका निभाते हैं।
सर्वव्यापी सत्ता निराकार है लेकिन घटनाक्रम तो दृश्यमान शरीरों द्वारा ही बन पड़ते हैं। देवदूतों में ऐसा ही उभयपक्षीय समन्वय होता है। शरीर तो मनुष्यों के ही काम करते हैं लेकिन उन श्रेयाधिकारियों का पथ प्रदर्शन, अनुदानों का अभिवर्षण उसी महान् सत्ता द्वारा ही होता है ।
हवाई जहाज के लिए उपयुक्त रनवे पहले से ही बनाने होते हैं। शासनाध्यक्षों के लिए साफ-सुथरे सुरक्षित और उपयुक्त स्थान की पहले से ही व्यवस्था करनी पड़ती है। जिस महान् प्रयोजन में इन दिनों परमेश्वर की महती भूमिका सम्पन्न होने जा रही है, उसका श्रेय तो उन जागरूकों, आदर्शवादियों और प्रतिभा सम्पन्नों को ही मिलेगा जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को, परमसत्ता के साथ जुड़ सकने जैसी स्थिति को विनिर्मित कर लिया है।
इसी आवश्यकता पूर्ति को कोई चाहे तो “युगसाधना” भी कह सकता है।
शरीर और उनकी शक्तियों के भले-बुरे पराक्रम आए दिन देखने को मिलते रहते हैं। समर्थता, कुशलता और सम्पन्नता की जय-जयकार होती है लेकिन साथ ही यह भी मानना ही पड़ेगा कि इन्हीं तीन क्षेत्रों में फैली अराजकता ने कुछ ऐसे संकट खड़े किए हैं जिनसे किसी प्रकार उबरने के लिए व्यक्ति और समाज छटपटा रहा है।
इन तीनों से ऊपर उठकर एक चौथी शक्ति,“भाव-सम्वेदना की शक्ति” है। यही दैवी अनुदान के रूप में जब मनुष्य की स्वच्छ अन्तरात्मा पर उतरती है तो उसे निहाल कर देती है। जब यह शक्ति अन्त:करण के साथ जुड़ती है तो उसे देवदूत स्तर का बना देती है। यह शक्ति भौतिक आकर्षणों, प्रलोभनों एवं दबावों से स्वयं को बचा लेने की भी पूरी-पूरी क्षमता रखती है। इसी एक शक्ति के आधार पर ही साधक में अनेकानेक दिव्य तत्त्व भरते चले जाते हैं।
जय गुरुदेव

