कल वाले अति विस्तृत लेख में गुरुदेव बता रहे थे कि सतयुग कोई बाहरी समय या स्थान नहीं है, यह मनुष्य की आंतरिक स्थिति है। गुरुदेव इतनी प्रगति को देखते हुए, चिंतित होते हुए पूछ रहे हैं कि इतना सब कुछ होने के बावजूद “लेने के देने क्यों पड़ रहे हैं ?” ऐसी स्थिति से निपटने के लिए मनुष्य के पास, हम सबके पास क्या विकल्प है? क्या भीड़ में शामिल होकर हम भी चिल्ला-चिल्ला कर कहना शुरू कर दें:
“अब कुछ नहीं हो सकता,सर्वनाश हो चुका है।” साथिओ यह तो आग में घी डालने जैसा हुआ न, हम तो गुरु के कार्य में सहयोग करने वाले, उनके साथ-साथ चलने वाले हैं, नेगेटिविटी फैलाने वाले नहीं हैं।
गुरुदेव द्वारा अविष्कार की गयी मशाल को हमने ऐसे ही नहीं थामा हुआ है, उनके साथ-साथ चलने का संकल्प लिया हुआ है। गुरुदेव हमें बता रहे हैं कि यदि मनुष्य की मनःस्थिति में सुधार हो, उसके विचारों में सुधार हो, उसकी भाव संवेदनाएँ जग जाएँ, तो यह विश्व-उद्यान फिर से हरा-भरा और सुखी-संपन्न बन सकता है।
वास्तव में यही सतयुग की वापसी है। सतयुग की वापसी का एकमात्र विकल्प और आधार जन-जन की भाव-संवेदनाओं को उत्कृष्ट, आदर्श और उदात्त बनाना है। जहाँ भाव-संवेदना जीवंत और जाग्रत होती है, वहाँ स्वतः ही सतयुगी वातावरण निर्मित होने लगता है।
कैसे जागेगीं भाव संवेदनाएं? कैसे बदलेंगें विचार?
केवल एक ही मार्ग है, और वोह है गुरुदेव के साहित्य का नियमितता से,निरंतरता से अमृतपान करना, स्वयं का सुधार करना एवं अन्य अनेकों को प्रेरित करना:
ज़रा भी कठिन नहीं है, बहुत ही सरल कार्य है।
तो आइए, गुरुदेव की बात को मानते हुए, उनकी शक्ति पर विश्वास करते हुए,उनके श्रीचरणों में समर्पित होकर आज के ज्ञानप्रसाद लेख का अमृतपान करें।
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फूटे घड़े में पानी भरने पर वह देर तक ठहरता नहीं है। छलनी में दूध दुहने पर दुधारू गाय पालने वाला भी खिन्न-विपन्न रहता है। ऐसी ही कुछ भूल मनुष्य से भी बन पड़ी है, जिसके कारण अत्यन्त परिश्रमपूर्वक जुटाई गई उपलब्धियों को हस्तगत करने पर भी, लेने के देने पड़ रहे हैं, परन्तु स्मरण रहे कि असमंजस की स्थिति लम्बे समय तक टिकती नहीं है। मनुष्य की बुद्धि इतनी कमजोर नहीं है कि वह उत्पन्न संकटों का कारण न खोज सके और उनके समाधान न खोज सके।
बड़प्पन को कमाना ही पर्याप्त नहीं होता, उसे सुस्थिर रखने और सदुपयोग द्वारा लाभान्वित होने के लिए और भी अधिक समझदारी, सतर्कता और सूझबूझ चाहिए। इस रीति-नीति को केवल भाव-सम्वेदनाओं से भरे-पूरे व्यक्ति ही समझते हैं, जिनके मार्गदर्शन से ही सम्पदाओं का सदुपयोग करते बन पड़ता है। आज के समय के लोग इन्हीं भाव-सम्वेदनाओं का महत्त्व भूल बैठे और उन्हें गिराते-गँवाते चले जा रहे हैं।
यही है वह कारण, जो उपलब्धियों को भी विपत्तियों में बदले जा रहा है।
वैज्ञानिकों ने आविष्कार तो मानवता की भलाई के लिए, उनके जीवन को सुखमय एवं आसान बनाने की आशा से किए थे लेकिन मनुष्य ने तो उस कथन को साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि बंदर के हाथ में उस्तरा थमा दिया है।
असल यथार्थता है क्या ?
वैभव तो असीम मात्रा में कमाया जा सकता है लेकिन उसे अकेले ही पचाया नहीं जा सकता। मनुष्य का पेट तो छोटा सा ही है, कितना ही खा लेगा। जब भी कभी स्वाद-स्वाद में भूख और पेट की कैपेसिटी से अधिक खा लिया जाता है तो सभी को मालूम है कि क्या होता है। एकस्ट्रा खाने को पेट सहन ही नहीं कर पाता, बेचैन रहता है, अपसेट रहता है आखिरकार Vomit out करके ही चैन मिलता है । धन और संपदा के बारे में भी यही सत्य है। यदि बहुत कमा लिया गया है तो सारे को हज़म कर जाने की ललक-लिप्सा प्रबल होने के बावजूद संभव नहीं हो पाता।
शारीरिक और मानसिक दोनों ही क्षेत्र, “भौतिक पदार्थ संरचना” के आधार पर विनिर्मित हुए हैं। अन्य पदार्थों की तरह शारीरिक और मानसिक क्षत्रों की भी एक सीमा और परिधि है। जीवित रहने और अभीष्ट कृत्यों में निरत रहने के लिए सीमित ऊर्जा, सक्रियता एवं साधन सामग्री ही ठीक रहती है। इस सीमा का उल्लंघन करने की ललक की तुलना,तटबंधों को तोड़कर बहने वाली बाढ़ के साथ की जा सकती है। तटबंधों का सम्मान न करने वाली बाढ़ अपनी उच्छृंखलता के कारण अनर्थ ही अनर्थ करती है, विनाश ही लाती है। ऐसे अनर्थ को और अधिक समझने के लिए, समाज के प्रत्येक व्यक्ति को मर्यादा में रहने की आशा की जाती है। पुरुष-प्रधान समाज होने के कारण यहां भी महिला का ही उदाहरण दिया जाता है कि नारी यदि अपनी मर्यादा की जंजीरें तोड़ दे तो विनाश ही लाती है। क्यों भाई यह मापदंड पुरुषों पर क्यों नहीं लागू होता,सब भलीभांति परिचित हैं।
तटबंधों के उन्माद के कारण पानी तो व्यर्थ जाता ही है, खेत खलिहानों, बस्तियों आदि को भी भारी हानि उठानी पड़ती है।
उपयोग की दृष्टि से थोड़े साधनों में भी भली प्रकार काम चल सकता है लेकिन फिजूलखर्ची की कोई सीमा मर्यादा नहीं होती। कोई चाहे तो लाखों के नोट इकट्ठे करके उनमें माचिस लगाकर, होली जलाने जैसा कौतूहल करते हुए प्रसन्नता भी व्यक्त कर सकता है लेकिन इस फिजूलखर्ची को कोई भी समझदार न तो सराहेगा और न उसका समर्थन करेगा। पाठकों ने विवाह शादियों में नोटों को उड़ाते हुए अवश्य ही देखा होगा,आतिशबाजियों में मेहनत की कमाई को उड़ते किसने नहीं देखा? ऐसे कृत्य देखकर मनुष्य के विवेक पर हंसी न आए तो और क्या कहा जाए? धन की बर्बादी करने वाले ऐसे ही लोग जब आलू प्याज़ की महंगाई की बात करते हैं तो समझ नहीं आता कि उनकी मूर्खता पर हंसें यां रोयें।
ऐसी परिस्थितियों में एक वर्ग बेहद चाटूकारों का भी होता है जो इस फिजूलखर्ची को गलत ठहराने के बजाए सराहना करता दिखता है। “कुल्हाड़ी से अपना ही पैर काटना” ऐसे ही मूर्खो के लिए तो बना है, अरे कुछ तो विवेक का, दिमाग का प्रयोग कर लो।
वासना और तृष्णा की खाई इतनी चौड़ी और गहरी है कि उसे पाटने में कुबेर की सम्पदा और इन्द्र की समर्था भी कम पड़ती है। तृष्णा की रेगिस्तानी जलन को बुझाने के लिए साधन सामग्री का थोड़ा सा पानी कोई काम नहीं करता। अतृप्ति जहाँ की तहाँ बनी रहती है। थोड़े से उपभोग तो उस ललक को और भी तेजी से आग में ईंधन पड़ने की तरह भड़का देते हैं।
मन के छुपे रुस्तम का तो कहना ही क्या, वह यक्ष राक्षस की तरह अदृश्य तो रहता है लेकिन कौतुक-कौतूहल इतने बनाता/दिखाता रहता है कि उस व्यामोह में फँसा मनुष्य दिग्भ्रान्त बनजारे की तरह, इधर-उधर मारे-मारे फिरने में ही अपनी समूची चिन्तन क्षमता गँवा देता है। तृष्णा तो समुद्र की चौड़ाई और गहराई से भी बढ़कर है। उसे तो भस्मासुर, वृत्रासुर, महिषासुर जैसे महादैत्य भी पूरी न कर सके, फिर बेचारे मनुष्य की हैसियत ही क्या है, जो उसे शान्त करके सन्तोष का आधार प्राप्त कर सके।
दिग्भ्रान्त मनुष्य अपनेआप को शरीर तक ही सीमित मान बैठा है क्योंकि प्रत्यक्ष देखने की क्षमता तो सीमित है, वह केवल शरीर तक ही देख सकता है। दूसरी ओर मन अदृश्य है लेकिन वह बहुत दूर तक देख सकता है। मन भी शरीर का ही एक अवयव है, इसे 11वीं इंद्रिय भी कहा जाता है।
दुनिया 11वीं इंद्रिय को भूल गई है लेकिन वेदों ने इसे कभी भी नहीं भुलाया। विज्ञान दस इंद्रियों (5 ज्ञान और 5 कर्म इंद्रियों की गणना करता है। मन (मानस) 11वीं इंद्रिय है और यही सब कुछ नियंत्रित करता है।आँखें देखती हैं,कान सुनते हैं,त्वचा स्पर्श करती है,जीभ स्वाद लेती है,नाक सूंघती है लेकिन मन के बिना इनमें से कुछ भी मायने नहीं रखता। मन के बिना इंद्रियाँ व्यर्थ हैं। वासना,तृष्णा केवल शरीर और मन का मिला-जुला खेल है जो अनन्त काल तक चलते रहने पर भी कभी समाप्त नहीं हो सकता। इसी उलझन के भवबन्धनों में बँधा हुआ जीव, चित्र-विचित्र प्रकार के अभाव अनुभव करता, असन्तुलित रहता और उद्विग्नता, चिन्ता, आशंका के त्रास सहता रहता है।
आश्चर्य इस बात का है कि मनुष्य अवांछनीय जाल-जंजालों से स्वयं को उबारने के लिए कुछ करना तो दूर, सोचने तक का प्रयास नहीं करता, उलटे अनाचारों पर ही उतारू होकर दूसरों को भी वैसा ही करते रहने के लिए उकसाता रहता है, भले ही वह अनर्थ स्तर का ही घृणित क्यों न हो।
आज के समय के मनुष्य का यही है तात्त्विक पर्यवेक्षण।
मूर्खता को कहने-सुनने में तो उपहासास्पद बताया जाता है लेकिन वस्तुत: वह इतनी प्रबल एवं आतुर होती है कि उसके आवेश को रोक सकना अच्छे-अच्छों के लिए भी कठिन हो जाता है। यह उन्माद जब सामूहिकता के साथ जुड़ जाता है तो फिर स्थिति उस विशालकाय पागलखाने जैसी हो जाती है, जिसमें रोगी एक-दूसरे को उकसाने, भड़काने, गिराने, सताने जैसी विडम्बनाओं में ही लगे रहते हैं। वे सभी मात्र हानि ही हानि उठाते हैं।
गीताकार ने सच कहा है कि जब दुनिया सोती है, तब योगी जागते हैं। यह अनबूझ पहेली तभी प्रामाणिक सिद्ध हो सकती है, जब यह सोचा जाए कि असंख्यों अवांछनीयताओं की लहरें उठाते चलने वाले प्रस्तुत प्रवाह के साथ-साथ बढ़ते रहने की अपेक्षा कोई आश्रय दे सकने वाला किनारा खोजा जाए। प्रचलनों से हटकर नए तौर-तरीके अपनाकर, यथार्थता का आश्रय लेने वाली उमंग उठे, अन्यथा अच्छे-भले नदी-नालों वाली जल सम्पदा, खारे समुद्र में गिरकर पीने के अयोग्य ही बनती चली जाएगी
वर्तमान में हर तरफ अंधकार ही छाया दिखता है। पतझड़ की तरह सर्वत्र ठूँठों ही ठूँठों का जमघट दिख पड़ता है। पतन और पराभव का नगाड़ा बजता सुनाई देता है। भविष्य अन्धकारमय प्रतीत होता है और लगता है कि मनुष्य समुदाय अब सामूहिक आत्महत्या करने पर ही उतारू आवेश से बुरी तरह ग्रसित हो रहा है। जब चूहों और खरगोशों की संख्या असाधारण रूप से बढ़ जाती है और उनके लिए खाने, पीने, रहने कि लिए सहारा शेष नहीं रहता, तो वे किसी बड़े जलाशय में डूब मरने के लिए बेतहाशा दौड़ लगाते देखे जाते हैं।
आज के समय में चल रही गतिविधियों की समीक्षा करने पर लगता है मानो एक ऐसा तूफान उभर रहा है कि मानवी सत्ता, महत्ता, सम्पदा और प्रगति जैसे संचय में से कुछ भी उनकी चपेट से बचकर रह नहीं सकेगा।
अहंकारी यदुवंशी आपस में ही लड़-मरकर खप गए थे। उन पर बाहर से कोई भी वज्रपात नहीं हुआ था। आग सबसे पहले उसी स्थान को जलाती है, जहाँ से वह प्रकट होती है। उद्दीप्त वासना, अनियंत्रित तृष्णा और उन्माद जैसी अहंकारिता का त्रिदोष, जब महाग्राह की तरह मानवी गरिमा को निगलता-गटकता चला जा रहा हो, तब बच सकने की आशा यत्किंचित ही शेष रह जाती है। वर्तमान में उफनते तूफानी अनाचार को देखते हुए लगता है कि सचमुच हम महाविनाश प्रलय-प्रक्रिया की ओर सरपट चाल से दौड़े चले जा रहे हैं।
प्रचण्ड प्रवाह को रोक सकने वाला बाँध विनिर्मित करने, जलधारा को नहरों के माध्यम से खेत-बगीचे तक पहुँचाने का कार्य तो निश्चय ही बड़ा कष्टसाध्य और श्रमसाध्य है लेकिन करने वाले उच्चकोटि के व्यक्तित्व जब प्राणपण से अपने पुरुषार्थ को सृजन की सदाशयता के साथ सम्बद्ध करते हैं तो उनकी साधना भी कम चमत्कारी परिणाम उत्पन्न नहीं करती। फरहाद, शीरी को पाने के लिए पहाड़ खोदकर लम्बी नहर निकाल सकने में, अकेले प्रयासों के बलबूते ही सफल हो गया था। गंगा को स्वर्ग से घसीटकर जमीन पर बहने के लिए बाधित करने में भगीरथ अकेले ही सफल हो गए थे। व्यापक अन्धकार पर छोटा दिखने वाला सूर्य ही विजय प्राप्त कर लेता है।
इन उदाहरणों को देख कर आशा की जा सकती है कि जब मनुष्य में उत्कृष्टता का उदय होगा तो यह वातावरण जो हर दृष्टि से भयंकर ही भयंकर दिख रहा है,बदल कर ही रहेगा।
जय गुरुदेव
