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अवश्य ही सतयुग की वापसी हो रही है !!!

आज के लेख का मुख्य सन्देश : 

“20वीं सदी ने हमें ‘दिमाग’ (Intelligence quotient-IQ ) दिया, लेकिन 21वीं सदी हमसे ‘दिल’ (Emotional quotient-EQ) की मांग रही है। मशीनें तब तक इंसान की जगह नहीं ले सकतीं, जब तक इंसान खुद मशीन की तरह सोचना बंद न कर दे।”

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परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी “सतयुग की वापसी” पुस्तक में किसी बाहरी काल या युग परिवर्तन की नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक स्थिति, उसकी मनःस्थिति और विचारों में सुधार वाले सतयुग की बात करते हैं।

गुरुदेव कहते हैं कि सतयुग कोई कैलेंडर या समय का चक्र नहीं, बल्कि इंसानी चेतना का उन्नत स्तर है। 

उपरोक्त सभी शब्द एक ही दिशा में संकेत दे रहे हैं कि विचार क्रांति से ही युग परिवर्तन होगा,उसी से धरती पर स्वर्ग का अवतरण होगा।

आज का मनुष्य परिस्थितिओं से इतना व्यथित है कि सतयुग जैसी बात गले उतारने  में कठिन लगती है।

इस कठिनता को समझने के लिए शायद निम्नलिखित पंक्तियाँ कुछ सहायता कर सकें:

सारस पक्षी को आहत-विलाप करते देखकर वाल्मीकि की करुणा जिस क्षण उभरी, उसी समय वे आदि कवि के रूप में परिणत हो गए। ऋषियों के अस्थि-पंजरों की पर्वतमाला देखकर भगवान् राम की करुणा मर्माहत हो गई और उनसे भुजा उठाकर यह प्रण करते ही बन पड़ा कि ‘‘निशिचर हीन करौं महि’’। बाढ़, भूकम्प, दुर्भिक्ष, महामारी जैसे आपत्तिकाल में जब असंख्यों को देखा जाता है, तो निष्ठुर भले ही मूकदर्शक बने रहें, सहृदयों को तो अपनी सामर्थ्य भर सहायता के लिए दौडऩा ही पड़ता है। इसके बिना उनकी अन्तरात्मा आत्म-प्रताडऩा से व्याकुल हो उठती है। निष्ठुरों को नर-पिशाच कहते हैं, मनुष्य समुदाय में उनका भी अभाव नहीं है।

विकास की अन्तिम सीढ़ी “भाव-सम्वेदना” को मर्माहत कर देने वाली करुणा के विस्तार में ही है। इसी को आन्तरिक उत्कृष्टता भी कहते हैं। सम्वेदना उभरने पर ही सेवा साधना बन पड़ती है। धर्म-धारणा का निर्वाह भी इससे कम में नहीं होता। तपश्चर्या और योग साधना का लक्ष्य भी यही है कि किसी प्रकार सम्वेदना जगाकर उस देवत्व का साक्षात्कार हो सके, जो जरूरतमन्दों को दिए बिना रह ही नहीं सकता। 

देने की प्रकृति वाली आत्माओं का जहाँ संगठन-समन्वय होता रहता है, उसी क्षेत्र को “स्वर्ग” के नाम से सम्बोधित किया जाने लगता है। इस प्रकार का लोक या स्थान कहीं भले ही न हो लेकिन सत्य है कि सहृदय, सेवाभावी, उदारचेता न केवल स्वयं देवमानव होते हैं बल्कि कार्यक्षेत्र को भी ऐसा कुछ बनाए बिना नहीं रहते जिसे स्वर्गोपम अथवा सतयुग का सामयिक संस्करण कहा जा सके।

आज 2026 के नौंवें माह में जब यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं, इस समय को “अभूतपूर्व प्रगतिशीलता” का युग कहा जा रहा है। आज के समय में जितने सुविधा साधन उपलब्ध हैं, इससे पहले इतने कभी भी हस्तगत नहीं हो सके। जलयान, वायुयान, रेल, मोटर जैसे द्रुतगामी वाहन, तार, रेडियो, फिल्म, दूरदर्शन जैसे संचार साधन, इससे पूर्व कभी कल्पना में भी नहीं आए थे। कल-कारखानों का पर्वताकार उत्पादन, सर्जरी-अङ्ग प्रत्यारोपण जैसी सुविधाएँ भूतकाल में कहाँ थीं?

बुद्धिवाद की प्रगति भी कम नहीं हुई है। ज्ञान, पुरातन एकाकी धर्मशास्त्र की तुलना में अब अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, तर्क शास्त्र, समाज शास्त्र, मनोविज्ञान शास्त्र जैसे अनेकानेक कलेवरों में असाधारण रूप से बढ़ा और भविष्य में और भी अधिक खोज लेने का दावा कर रहा है। शोध संस्थानों की, प्रयोगशालाओं की उपलब्धियाँ घोषणा कर रही हैं कि निकट भविष्य में मनुष्य इतना अधिक ज्ञान-विज्ञान खोज लेगा कि पुरातन काल की समस्त उपलब्धियों को उसके सामने बौना ठहराया जा सके।

इस तथाकथित प्रगति ने इतना तक कहना शुरू कर दिया है कि “ईश्वर की मृत्यु हो गयी है या उसे मार दिया जाना चाहिए।” धर्म के सम्बन्ध में नई व्याख्या विवेचना यह है कि वह अन्धविश्वासों का जमघट मात्र है। उसे यथास्थिति स्वीकार करने के लिए गले के नीचे उतारी जाने वाली अफीम की गोली भर कहा जाना चाहिए।

यह स्पष्ट है कि इन दिनों विभिन्न क्षेत्रों में जो प्रगति हुई वह असाधारण एवं अभूतपूर्व है। विकास विस्तार तो हर भले-बुरे उपक्रम पर लागू हो सकता है। इन अर्थों में आज की प्रगतिशीलता की दावेदारी को स्वीकार करना ही पड़ता है।

फिर भी एक प्रश्न सर्वथा अनसुलझा ही रह जाता है कि

प्रदूषण, युद्धोन्माद, खाद्य-संकट अपराधों की वृद्धि आदि समस्याएँ समस्त तटबन्ध क्यों तोड़ती चली जा रही हैं? अस्वस्थता, दुर्बलता, कलह, विग्रह, छल-प्रपञ्च जैसे दोष, व्यवहार तथा चिन्तन को धुआँधार विकृतियों से क्यों भरते चले जा रहे हैं?

आश्चर्य इस बात का है कि आखिर यह सब हो क्यों रहा है एवं कैसे हो रहा है? इसे कौन करा रहा है? आखिर वह चतुराई कैसे चुक गई, जो बहुत कुछ पाने का सरंजाम जुटाकर अलादीन का नया चिराग जलाने चली थी। पहुँचना तो उसे प्रकृति विजय के लक्ष्य तक था, लेकिन यह क्या हुआ कि तीनों लोक तीन डगों में नाप लेने की दावेदारी, करारी मोच लगने पर सिहरकर बीच रास्ते में ही पसर गई। उसे भी आगे कुआँ पीछे खाई की स्थिति में आगे पग बढ़ाते नहीं बन रहा है। साँप-छछून्दर की इस स्थिति से कैसे उबरा जाए, जिसमें न निगलते बन रहा है और न उगलते।

हिन्दू पौराणिक ग्रंथों और सनातन धर्म के अनुसार, सतयुग (जिसे कृत्ययुग भी कहा जाता है) चार युगों में से पहला और सबसे श्रेष्ठ युग है।

सत्य की प्रधानता: सतयुग शब्द ‘सत्य’ और ‘युग’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है वह कालखंड जहाँ शत-प्रतिशत (100%) सत्य, धर्म और नैतिकता का बोलबाला हो। क्या सत्य बोलने से सतयुग की प्राप्ति हो जाएगी, खासकर उस समय में जब झूठ का बोलबाला हो? धर्म की बात करो तो एकदम हिन्दू,मुस्लिम, सिख, ईसाई जैसे शब्द सामने आ खड़े होते हैं। यह अज्ञानता ही है जो आज के मनुष्य को भटका रही है। सोशल मीडिया,टीवी, AI से प्राप्त हुआ ज्ञान सुपरफिशल होने के कारण मनुष्य को भटका रहा है। जब धर्म की बात होती है तो इसके चारों स्तंभों, सत्य, तप, दया और दान की बात होनी चाहिए। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सतयुग की कुल अवधि लाखों वर्ष मानी गई है। यह वह काल था जब मनुष्य अत्यधिक बलशाली, निरोगी, ज्ञानी और लंबी आयु (लगभग 1 लाख वर्ष या उससे अधिक) वाले होते थे। इस युग में ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, अहंकार, छल-कपट, रोग, और किसी भी प्रकार के दुःख या भय का कोई स्थान नहीं था। सभी लोग समता और शांति के साथ केवल परमात्मा के स्मरण में लीन रहते थे।

क्या गुरुदेव ऐसे सतयुग की कल्पना कर रहे हैं? यह एक ऐसी कल्पना है जिस पर विश्वास करना कठिन है लेकिन है बिलकुल विश्वसनीय। आने वाले लेखों में इस अविश्वसनीय तथ्यों को तर्कों के साथ समझने और विश्वास करने का प्रयास करेंगे, उसके कुछ चिन्न तो आज भी देखने में मिल रहे हैं।

“20वीं सदी ने हमें ‘दिमाग’ (Intelligence quotient-IQ ) दिया, लेकिन 21वीं सदी हमसे ‘दिल’ (Emotional quotient-EQ) की मांग रही है। मशीनें तब तक इंसान की जगह नहीं ले सकतीं, जब तक इंसान खुद मशीन की तरह सोचना बंद न कर दे।”

उपरोक्त पंक्तियाँ केवल लिखने और पढ़ने के लिए ही नहीं हैं, ऐसा हो रहा है, हम साक्षात् देखेंगें लेकिन उससे पहले यह जानना आवश्यक है कि सतयुग को कृत्ययुग क्यों कहा जाता है।

सतयुग को “कृत्ययुग” इसलिए कहा जाता है कि इस युग में सभी मनुष्य अपने धर्म और कर्मों का पूरी तरह से पालन करते थे। “कृत्य” शब्द का अर्थ है “किया हुआ या ‘पूर्ण” जिसका अर्थ है कि इस काल में धर्म अपने पूर्ण रूप में स्थापित था और लोगों के सारे कार्य प्राकृतिक रूप से उत्तम और धार्मिक होते थे। इस युग में धर्म के चारों चरण (सत्य, तप, पवित्रता और दान) पूरी तरह मौजूद थे। समाज में अधर्म, पाप या झूठ का कोई नामोनिशान नहीं था। लोग बिना किसी स्वार्थ या लालच के अपने कर्तव्यों का पालन करते थे। सभी कार्य समाज और धर्म की भलाई के लिए किए जाते थे। इस युग के मनुष्यों को स्वतः ही मोक्ष और ईश्वर की कृपा प्राप्त थी। उन्हें पूजा-पाठ या कठिन अनुष्ठानों को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी क्योंकि उनके कर्म पहले से ही शुद्ध और पूर्ण (कृत) होते थे।

आइये देखें कैसे

21वीं सदी को भाव संवेदनाओं (Human Emotions & Sensibilities) का युग कहा जा रहा है।

इस युग को भावसंवेदनाओं के उभार की सदी माना जा सकता है क्योंकि आज के डिजिटल और तकनीक-प्रधान युग में मानवीय भावनाओं, मानसिक स्वास्थ्य और संवेदनशीलता पर पहले से कहीं अधिक चर्चा हो रही है। यह सच है कि जब भाव संवेदना का बात आती है तो सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों पक्षों की बात करनी चाहिए।

1. सकारात्मक पक्ष (संवेदनाओं का उभार)

आज के समय में लोग अपनी आंतरिक भावनाओं, तनाव, और अवसाद (Depression) पर, जिसे पहले दबा दिया जाता था, आज खुल कर बात कर रहे हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने में होने वाले अन्याय या आपदा पर लोग तुरंत भावुक होते हैं और मदद के लिए आगे आते हैं। आज का सिनेमा, संगीत और साहित्य इंसानी रिश्तों की बारीकियों और मानसिक उलझनों को अधिक गहराई से दिखा रहा है। यहाँ यह भी कहना अनुचित नहीं है कि बाजार में सब कुछ बिकता है, मनुष्य पर निर्भर करता है की उसे क्या खरीदना है।

2. नकारात्मक पक्ष (संवेदनाओं का संकट)

आज भावनाएँ स्क्रीन (Likes, Emojis, Shares) तक सिमट कर रह गई हैं। लोग सोशल मीडिया पर तो सहानुभूति दिखाते हैं, लेकिन असल जिंदगी में अकेलेपन और संवेदनहीनता का शिकार हो रहे हैं। Netiquette को तो भूल ही चुके हैं, फ़ोन का रिप्लाई करना, ईमेल-मैसेज आदि का रिप्लाई बैक तभी होता है जब उनका अपना स्वार्थ होता है। पूछने पर अक्सर यही उत्तर मिलता है: बहुत बिजी थे, याद नहीं रहा, देखा नहीं आदि आदि बहानेबाज़ी। ऐसी स्थिति में जब ज्ञानरथ परिवार अपने मानवीय मूल्यों की तूती बजाता  फिरता है तो कुछ अटपटा नहीं लगता ? साथिओ गुरुदेव को ज्ञानरथ परिवारजनों जैसे शिष्यों पर ही भरोसा है, उन्हीं को साथ लेकर सतयुग की घोषणा कर चुके हैं।

कभी-कभी छोटी-छोटी बातों पर समाज में अत्यधिक आक्रामक या भावुक प्रतिक्रियाएं (Cancel Culture) देखने को मिलती हैं, जिससे तार्किक सोच पीछे छूट जाती है। इस अति-संवेदनशीलता (Hyper-sensitivity) जिसे ‘कॉल-आउट कल्चर’ (Call-out Culture) भी कहा जाता है, आधुनिक सामाजिक और डिजिटल ट्रेंड है। इसके तहत किसी सार्वजनिक हस्ती, ब्रांड या आम व्यक्ति को समाज से पूरी तरह बहिष्कृत (Boycott) कर दिया जाता है क्योंकि उन्होंने कोई ऐसी बात कही होती है या ऐसा काम किया होता है जिसे समाज में आपत्तिजनक या अस्वीकार्य माना जाता है। यह बहिष्कार मुख्य रूप से सोशल मीडिया (जैसे X/Twitter, Instagram, Facebook) पर शुरू होता है और देखते ही देखते एक बड़े आंदोलन का रूप ले लेता है।

इतनी नकारात्मकता होने के बावजूद 21वीं सदी भाव संवेदनाओं (Emotional Intelligence & Human Sensitivities) की सदी न केवल समझी जा रही है बल्कि साबित भी हो रही है। 

पिछली दो सदियाँ (19वीं और 20वीं) जहाँ औद्योगिक क्रांति, मशीनीकरण, भौतिक विकास और बौद्धिक क्षमता की थीं, वहीं यह सदी मानवीय भावनाओं, मानसिक स्वास्थ्य और आपसी जुड़ाव की है। नुक्लिअर परिवारों के प्रचलन को देख कर यह बात हज़म तो नहीं होती लेकिन बाज़ार में सब बिकता है, चॉइस आपकी है।

आइए भाव संवेदनाओं की सदी की थोड़ी और चीड़फाड़ करें, निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं से समझने का प्रयास करें:

1. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उदय और मानवीय मूल्य:

आज कंप्यूटर, रोबोट और AI इंसानों से बेहतर गणना, कोडिंग और तार्किक काम कर सकते हैं इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन जो चीज़ AI कभी नहीं कर सकता, वह है: सच्ची सहानुभूति (Empathy), करुणा और भावनाएं। इस तकनीक के दौर में वही इंसान सबसे अलग और मूल्यवान होगा जिसके पास गहरी भाव संवेदनाएं होंगी। मशीनें दिमाग का काम संभाल रही हैं, इसलिए इंसानों को अब अपने “दिल और संवेदनाओं” का इस्तेमाल करने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।

2. मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) के प्रति बढ़ती जागरूकता

21वीं सदी में डिप्रेशन, तनाव और अकेलेपन जैसी समस्याएं वैश्विक स्तर पर बढ़ी हैं। आज दुनिया यह मान चुकी है कि केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ होना काफी नहीं है, भावनात्मक रूप से मजबूत होना भी जरूरी है। अब लोग अपनी भावनाओं पर खुलकर बात कर रहे हैं, जो इस बात का सबूत है कि यह सदी संवेदनाओं को समझने और उन्हें संभालने की सदी है।

3. ‘वर्कप्लेस’ और लीडरशिप में बदलाव

पहले कंपनियों में सिर्फ काम और टारगेट देखा जाता था लेकिन आज की कॉर्पोरेट दुनिया में भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) को सबसे बड़ा गुण माना जाता है। आज वही लीडर (नेता या बॉस) सफल है जो अपनी टीम की भावनाओं को समझता है, उनके साथ संवेदनशील व्यवहार करता है और उनके सुख-दुख में शामिल होता है।

4. पर्यावरण और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता

ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में इंसानों के अंदर प्रकृति, पशु-पक्षियों और आने वाली पीढ़ियों के प्रति संवेदना जागी है। आज का इंसान केवल अपना फायदा नहीं सोच रहा बल्कि वह पृथ्वी के प्रति भी संवेदनशील हो रहा है। ‘इको-फ्रेंडली’ जीवनशैली अपनाना इसी भाव संवेदना का हिस्सा है।

5. सोशल मीडिया और वैश्विक जुड़ाव

आज सोशल मीडिया के जरिए दुनिया के किसी भी कोने में बैठा इंसान किसी दूसरे कोने में हो रहे अन्याय या दुःख (जैसे युद्ध या प्राकृतिक आपदा) पर भावुक हो उठता है। एक छोटी सी भावुक कहानी पूरी दुनिया के लोगों को एक साथ जोड़ देती है। यह वैश्विक सहानुभूति (Global Empathy) 21वीं सदी की ही देन है।

तो साथिओ, अगले दिनों में इन्ही पॉइंट्स को लेकर “गुरुदेव की सतयुग की कामना” पर चर्चा होती रहेगी।

जय गुरुदेव


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