ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की आज की गुरुकक्षा में सभी गुरुशिष्यों का अभिवादन करते हैं। मात्र 1500 शब्दों का बहुत ही संक्षिप्त, आज का लेख कुछ ऐसा कह रहा है जिसे रेगुलर लेख के दौरान कहना कठिन रहता है। ज्ञानप्रसाद लेखों के दौरान,अनेकों प्रकार की ज़ंजीरों (शब्द सीमा,साथिओं की समय सीमा, ग्रहण करने की सीमा आदि) में जकड़े होने के कारण उतनी ही बात हो सकती है जितनी ज़रूरी होती है ।
आज के लेख का सबसे आकर्षक वाक्य “शांतिकुंज अब क्रान्तिकुंज हो गया है” चिंतन योग्य है।
तो आइए आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ करें, अपने जीवन का कायाकल्प करें।
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“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” 23 छोटी-छोटी पुस्तकों का एक दिव्य संग्रह है। यह संग्रह, हमारे गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा जी द्वारा रचित विशाल साहित्य का निचोड़ है। गुरुदेव ने स्वयं इन पुस्तकों के बारे में लिखा है:
बेटे,क्रांतिधर्मी साहित्य मेरे अब तक के लिखे साहित्य का मक्खन है,मेरे अब तक के साहित्य को पढ़ पाओ यां न पढ़ पाओ, इसे ज़रूर पढ़ना, इसे समझे बिना तुम मिशन को नहीं समझ पाओगे। बेटे यह इस युग की युगगीता है, इसे एक बार नहीं 100 बार पढ़ना।
गुरुदेव कहते हैं कि आवश्यकता और समय के अनुरूप मैंने गायत्री महाविज्ञान लिखा था। इसे अब अल्मारी में बन्द करके रख दो। अब केवल इन्हीं (क्रान्तिधर्मी साहित्य को, युग साहित्य को) किताबों को पढ़ना। समय मिल जाए तो उन्हें भी पढ़ना। महाकाल ने स्वयं मेरी उँगलियाँ पकड़कर ये साहित्य लिखवाया है।
मेरे उत्तराधिकारियों के लिए यह हमारी वसीयत है। इन पुस्तकों में जीवन को, चिन्तन को बदलने के सूत्र हैं। इनमें हमारी पीड़ा लिखी हुई है, इन्हें अवश्य पढ़ो,बार-बार पढ़ो।
हमारे विचार, क्रान्ति के बीज हैं, जो दुनिया में ज़रा से भी फैल गए, तो अगले दिनों धमाका करेंगे। बस, तुम हमारा यह काम कर दो, हम तुम्हारा काम करेंगे। यह पुस्तकें 1940 से अब तक के साहित्य का सार हैं।
जिस प्रकार श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को सभी तीर्थों की यात्रा कराई थी, ठीक वैसे ही आप भी हमारे विचार रुपी साहित्य को संसार के प्रत्येक घर में ले चलो ताकि हर घर स्वर्ग बन जाए।
इसी संदर्भ में पूज्यवर, 1990 की वसंत पंचमी को वंदनीय माता जी से कहते हैं: मेरे जाने के बाद मेरा ज्ञान शरीर ही जिन्दा रहेगा। ज्ञान शरीर का प्रकाश जन-जन के बीच में पहुँचना ही चाहिए। आप सबसे कहियेगा, सब बच्चों से कहियेगा कि मेरे ज्ञान शरीर को, मेरे क्रान्तिधर्मी साहित्य के रूप में जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास करें।’’
साथिओ, उपरोक्त पंक्तियाँ हमारे गुरुदेव द्वारा लिखी गयी ऐसी पंक्तियाँ हैं जिनमें किसी के भी अंतःकरण को झकझोड़ने की क्षमता है। आज जब हम “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की पांचवीं पुस्तक “सतयुग की वापसी” के शुभारम्भ की भूमिका पर चिंतन कर रहे हैं तो हमारी आँखें स्वयं ही शर्म से झुके जा रही है। आठ वर्ष पूर्व आदरणीय ओ पी शर्मा जी के सुझाव पर हमने शांतिकुंज के बुकस्टाल से कुछ पुस्तकें लाई थीं लेकिन इस पुस्तक को खोल कर भी नहीं देखा था। आठ वर्ष में कुछ एक घंटों का समय भी नहीं मिला कि मात्र 32 पन्नों की इस लघु पुस्तिका ( Booklet) को न पढ़ पाए, धिक्कार है ऐसी बनावटी श्रद्धा को, बनावटी समर्पण को।
इन पंक्तियों को लिखते समय एक ही संकल्प लेने की इच्छा हो रही है कि हमारे द्वारा अनजाने में हुए इस महापाप की भरपाई तभी हो पायेगी जब हम “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” में समाहित ज्ञान के एक-एक शब्द को पढ़ कर,समझ कर, विश्व के घर-घर में प्रसारित करने में सफल होंगें। हमें विश्वास है कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का एक-एक साथी हमारे संकल्प को पूरा करने में सहयोग देगा क्योंकि कोई भी संकल्प अकेले कभी भी पूरा नहीं होता और मनुष्य निवेदन उन्हीं से करता है जिन पर उसे पूरा विश्वास है, अधिकार होता है: हमारे ह्रदय में बसे हमारे सबसे प्रिय एवं समर्पित साथी। हमारे द्वारा लिखे गए यह शब्द, हमारे साथिओं की भलाई के लिए ही हैं, कहीं ऐसा न हो कि उनमें से किसी को भी हमारी तरह महापाप का सामना करना पड़े, ज्ञान की कलकल बहती गंगा में डुबकी मारने का दुर्लभ सौभाग्य किसी को भी मिस नहीं करना चाहिए।
हमारी ही तरह पुस्तकें तो अनेकों लेकर आते हैं, कइयों की अलमारियां ही शोभा बढाती होंगीं, बहुत सारे पढ़ते तो होंगें ही लेकिन धारणा क्या बनाते हैं, अर्थ क्या निकालते हैं,सभी की अपनी-अपनी समर्था पर निर्भर करता है। यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि यदि किसी ने कोई पुस्तक पढ़ी, उसके कंटेंट ने उसे प्रभावित किया तो वोह भाग-भाग कर अनेकों को बताने का प्रयास करेगा। कई बार हमें प्रज्ञामण्डल में स्वाध्याय के लिए जाने का अवसर मिला, वहां जाकर देखा कि बिना समझे,चर्चा किये गायत्री महाविज्ञान पढ़ा जा रहा है। एक-एक पन्ना सभी पढ़ रहे थे, हमारी बारी आयी तो हमने मात्र दो ही पंक्तियाँ पढ़ीं और उसी पर चर्चा करनी शुरू कर दी। हमारी बारी समाप्त होने के बाद सभी कहने लगे कि आप तो बिलकुल ही यूनिवर्सिटी प्रोफेसर की भांति पढ़ा रहे थे। वही साथी जानें कि यह कमेंट था यां Criticism, ज्ञानप्रसाद लेखों के लिए कमेंट-काउंटर कमेंट की प्रक्रिया का जन्म इसी घटना से हुआ था। हमारी धारणा है कि ज़रूरी यह नहीं है कि 10 पन्नें पढ़े जाएँ, कितने अंतर्मन को छू पाते हैं, वोह महत्वपूर्ण है। अगर प्रसाद ग्रहण करके आत्मिक शक्ति न प्राप्त हो तो क्या लाभ?
अपने सहयोगिओं को स्मरण कराना उचित समझते हैं कि हमारी सर्वप्रिय बेटी,देव संस्कृति यूनिवर्सिटी की विद्यार्थन के सुझाव पर गुरुदेव के इस अद्भुत संग्रह को अमृतपान करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। त्रय शताब्दी वर्ष 2026 में जब गायत्री परिवार को तीन-तीन शताब्दिओं को मनाने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है,इन पुस्तकों का अमृतपान करके हम गुरुदेव की श्रवण कुमार वाली प्रतिज्ञा को पूर्ण करने का प्रयास कर रहे हैं। साथिओं को यह भी स्मरण कराना अपना कर्तव्य समझते हैं कि ज्ञानप्रसाद लेख (प्रतक्ष्य दिखने वाले पाठकों के इलावा) अनेकों जगहों पर शेयर हो रहे हैं, विश्व के अनेकों घरों को जगमगा चुके हैं/जगमगा रहे हैं।
Small format में प्रकाशित हुई, मात्र 32 पन्नों की एक छोटी सी पुस्तिका “सतयुग की वापसी” ऑनलाइन/ऑफलाइन अनेकों प्लॅटफॉर्मस पर उपलब्ध है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर, “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की पहली चार पुस्तकों के समापन के बाद इस 5वीं पुस्तक के स्वाध्याय का शुभारम्भ होना एक परम सौभाग्य है।
पुस्तक के शीर्षक ने इतने जिज्ञासा भरे प्रश्न किये कि उनके उत्तर ढूंढने के लिए, ऑफलाइन/ऑनलाइन न जाने कितना ही स्वाध्याय कर डाला, पिछले दो दिनों में पुस्तक के 32 पन्नों को न जाने कितनी बार उलट -पलट कर देखा,अब तो यह भी याद नहीं आ रहा कि प्रश्न क्या थे। आदरणीय नीरा जी के साथ भी चर्चा की कि गुरुदेव कौनसे “सतयुग की वापसी” की बात कर रहे हैं।
विश्व में न जाने कितने ही युद्ध चल रहे हैं, संयुक्त परिवार प्रचलन लगभग लुप्त ही हो चला है, हर कोई नुक्लिअर परिवार का समर्थन कर रहा है, गुंडाराज का बोलबाला है, जहाँ देखो “जिसकी लाठी उसकी भैंस” का राज है, तकनीकी प्रगति शिखर पर है, मनुष्य आकाश में छलांग लगा रहा है। इतना सब कुछ होने के बावजूद,आज का मानव इतना दुःखी एवं असंतुष्ट क्यों है? चिड़चिड़ापन, Short-tempered, भागदौड़ आदि से आज का मनुष्य इतना ग्रस्त क्यों है ? वर्क फ्रॉम होम जैसी सुविधाजनक,एयर कंडिशन्ड वातावरण में, सप्ताह के मात्र एक दिन ही ऑफिस जाने की सुविधा के बावजूद मानव इतना भागा-भागा, Stressed क्यों है।
हमें तो यही समझ आया कि
“इसी उलटे हुए मनुष्य को उलट कर सीधा करने की आवश्यकता है, उसे उसका असली रूप एवं अस्तित्व बताने की आवश्यकता है।”
कैसे संभव हो पायेगा, इतना बड़ा विश्व्यापी कार्य? कहाँ से शुरू होगा सतयुग की वापसी का कार्यक्रम ?
तो हमारे अंतर्मन ने यही उत्तर दिया:
“सतयुग की वापसी का कार्य स्वयं से शुरू होगा। इस वापसी के क्या-क्या निर्धारण होंगें, कैसे उनका पालन करना होगा ? ज्ञानप्रसाद लेखों से मार्गदर्शन मिलेगा। विश्व का सबसे छोटा यूनिट मनुष्य ही है। उसे अपने अस्तित्व एवं क्षमता का ज्ञान होगा तो समझो सब कुछ हो गया। ऐसा होते ही परिवार में स्वर्गीय वातावरण होगा। परिवार से समाज,समाज से देश और फिर देश से विश्व, सतयुग का आनंद उठाएगा।”
यही तो है “विचार क्रांति अभियान,युग निर्माण योजना,धरती पर स्वर्ग का अवतरण, 21वीं सदी उज्जवल भविष्य”
नाम चाहे जो भी दे दो, है सारा आज के मानव से ही सम्बंधित!!!! हमारा सौभाग्य है कि हम 21वीं सदी के 26वें वर्ष में गुज़र रहे हैं और हमें गुरुदेव की युग निर्माण योजना में सहयोग देने का अभूतपूर्व अवसर मिल रहा है। परम पूज्य गुरुदेव का प्रत्येक बच्चे को निर्देश है कि मेरे साहित्य को आज से ही समझ कर पढ़ना शुरू कर दें, अन्यों को पढ़ाना शुरू कर दें, युग निर्माण के अगले चरण की आधारशिला यही है।
परम पूज्य गुरुदेव इसी सन्दर्भ में कहते हैं कि शांतिकुंज अब क्रान्तिकुंज हो गया है। यह केवल पूजा-पाठ,यज्ञ, साधना, मानसिक शांति का ही केंद्र नहीं है बल्कि नैतिक,वैचारिक और सांस्कृतिक क्रांति का केंद्र बन गया है। उच्चकोटि के विद्वान, जीवनदानी इसी दिशा में मार्गदर्शन प्रदान का रहे हैं।
आज के इस संक्षिप्त से लेख का यहीं पर समापन करना उचित रहेगा, कहीं ऐसा न हो कि एक ही Sitting में, बिना रुके लिखा गया यह कंटेंट, कुछ और लिखने के लालच में गुड़ गोबर न हो जाए।
जय गुरुदेव, धन्यवाद्
