“क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” गुरुदेव द्वारा रची गयी 23 छोटी-छोटी पुस्तकों की एक अद्भुत प्रस्तुति है। इस पुस्तकमाला की चौथी पुस्तक “युग की मांग प्रतिभा परिष्कार भाग 2” पर आधारित लेख श्रृंखला का आज समापन हो रहा है। हमारा विश्वास है कि अनेकों लेखों की इस दिव्य श्रृंखला को आत्मसात करके पाठकों के अनेकों भ्र्म,शंकाओं का निवारण हुआ होगा, गुरुदेव के मक्खन रुपी साहित्य को और भी Refine करना केवल साथिओं के सहयोग से ही संभव हो पाया है जिसके लिए हम उनका ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं।
उपरोक्त पुस्तक के अंतिम चैप्टर में प्रतिभा परिष्कार के लिए 10 प्रयोग दिए गए हैं, कल वाले ज्ञानप्रसाद लेख में पहले दो (Auto suggestion और दर्पण साधना) प्रयोग समझने का प्रयास किया गया था, आज बाकी के 8 प्रयोगों का बहुत ही संक्षिप्त सा वर्णन प्रस्तुत है।
सभी प्रयोगों को देख कर ऐसा अनुभव होता है कि प्रतिभा के परिष्कार का अर्थ शक्ति संवर्धन ही है। चाहे प्राणायाम हो, चुम्बक स्पर्श हो, नाद योग हो यां फिर प्रतिभावानों के सानिध्य में बैठना हो,सभी व्यक्ति को ऊर्जावान, Elighted करने की दिशा में एक प्रयास हैं। हो भी क्यों न? प्रतिभा और शक्ति, प्रतिभा और एनर्जी एक दूसरे के साथ जिस प्रकार से गुथे हुए हैं, दोनों का साथ-साथ चलना स्वाभाविक है। यह तो कॉमन सेंस की बात है कि प्रतिभाशाली ही शक्तिशाली होते हैं, यह शक्ति चाहे धन की हो, शरीर की हो, बुद्धि की हो, ज्ञान की हो यां फिर राजनीति के क्षेत्र में जनशक्ति ही क्यों न हो। जनशक्ति कैसी भी हो , किसी भी स्तर की हो,गलत हो, ठीक हो व्यक्ति को प्रतिभाशाली बना ही देती है, चाहे ऐसी मिली प्रतिभा कुछ दिनों की ही क्यों न हो!!!
खैर राजनीति की चर्चा तो ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का विषय ही नहीं है, यह तत्व इस परिवार के DNA में ही नहीं है, फिर भी पाठक इसे रिजेक्ट करने में पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। इस परिवार का प्रत्येक सदस्य निष्ठापूर्वक एनर्जी/शक्ति का संवर्धन करते हुए ही प्रतिभाशाली होने के पक्ष में हैं क्योंकि सभी साथी Ill-got-Ill-spent (इल-गॉट,इल-स्पेंट) के सिद्धांत का पालन करते हैं।
तो आइए गुरुकुल की गुरुकक्षा में गुरुचरणों में समर्पित होकर आज के गुरुज्ञान का अमृतपान करें, अपना आज का दिन उज्जवल बनाएं।
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(3) रंगीन वातावरण का ध्यान:
हर रंग में सूर्य की किरणों के अपने-अपने स्तर की रेडिएशंस प्रवाह होती हैं। वे शरीर और मस्तिष्क पर अपना प्रभाव डालती हैं। जब भी किसी का अनुपात घट/बढ़ जाता है तो असंतुलन हो जाता है जिससे कई प्रकार के रोग उठ खड़े होते हैं। इन रोगों के निवारण के लिए विभिन्न रंगों के बल्बों द्वारा पीड़ित अंग पर निर्धारित अवधि तक लेने का विधान है। इन्फ्रारेड बल्ब द्वारा जोड़ों की दर्दों का निवारण कितना प्रचलित है, सभी जानते हैं।
प्रतिभा परिवर्धन के लिए रंगों का मस्तिष्क के सूक्ष्म केन्द्र संस्थानों पर प्रभाव एक बहु-प्रचलित प्रक्रिया है। नियमित रूप से कुछ देर ध्यान करते रहने पर वांछित परिवर्तन प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। इस प्रक्रिया में ध्यान किया जाता है कि संसार में सर्वत्र उसी एक रंग की सत्ता व्याप्त है, जो मनुष्य के शरीर में प्रवेश करके अभीष्ट विशेषताओं की ऊर्जा प्रवाहित करती है। यह ध्यान 5 से 10 मिनट तक किया जाता है। विशेषज्ञों द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकृति के साधकों के लिए भिन्न-भिन्न वर्णों का निर्धारण करके ही यह प्रक्रिया आरम्भ की जाती है।
(4) प्राणाकर्षण:
पाठक जानते हैं कि सारा ब्रह्माण्ड प्राणतत्त्व से भरा पड़ा है। इस विशाल कोश में से साधारण प्राणी को उतनी ही मात्रा मिलती है जिससे उसका जीवन-निर्वाह चलता रहे। अधिक मात्रा में प्राणतत्व खींचने की आवश्यकता तब पड़ती है जब उच्च चेतना प्राप्त करना उद्देश्य हो। चेतना जगत् में प्राण ही एक ऐसी शक्ति है जो विद्युत ऊर्जा के रूप में ‘‘निगेटिव आयंस (Negative ions)’’ के रूप में विद्यमान हैं। इन Ions की कमी व्यक्ति को रोगी, निस्तेज, प्राणहीन बनाती है और प्रचुर मात्रा उसे निरोग, तेजस्वी, प्राण सम्पन्न बनाती है।
प्रतिभा परिवर्धन के लिए प्राणायाम बहुत ही महत्वपूर्ण है। विधि-विधान पूर्वक किया गया प्राणायाम लाभदायक होता है।
कमर सीधी,हाथ गोदी में, मेरुदण्ड सीधा रखकर बैठा जाए, ध्यान किया जाए कि बादलों जैसी आकृति के प्राण का उफान हमारे चारों ओर उमड़ता चला आ रहा है और हम उसके बीच निश्चिन्त प्रसन्न मुद्रा में बैठे हैं। नासिका के दोनों छिद्रों से धीरे-धीरे साँस खींचते हुए भावना की जाए कि साँस के साथ ही प्रखर प्राण की मात्रा भी घुली हुई है और वह शरीर में प्रवेश कर रही है, अंग-अवयवों द्वारा वह धारण की जा रही है। खींचते समय प्राण के प्रवेश करने की व साँस रोकते समय अवधारण की भावना की जाए। धीरे-धीरे साँस बाहर निकालने के साथ यह विश्वास किया जाए कि हमारे अंदर जो भी अवांछनीयताओं के, दुर्बलताओं के तत्त्व थे, वे साँस के साथ घुलकर बाहर जा रहे हैं, फिर लौटने वाले नहीं हैं। इस प्राणायाम को आरम्भ में 5 से 10 मिनट ही करना पर्याप्त है, बाद में यह अवधि बढ़ाई जा सकती है। शोध संस्थान द्वारा यह जाँचा जाता है कि प्राण धारण क्षमता कितनी बढ़ी, रक्त में से दूषित तत्त्व कितनी मात्रा में निकले तथा रक्त में ऑक्सीजन का अनुपात कितना बढ़ा।
यही निरोगता का, प्रतिभाशीलता का चिह्न है।
(5) सूर्य वेधन प्राणायाम:
ध्यान मुद्रा में बैठा जाए। शरीर पर कम-से-कम कपड़े रहें। पूर्व की ओर मुख हो,अरुणोदय का समय हो। ध्यान किया जाए कि आत्मसत्ता शरीर में से निकलकर सीधे सूर्यलोक तक पहुँच रही है। जिस प्रकार सुई में पिरोया हुआ धागा कपड़े से होकर जाता है,उसी प्रकार आत्मचेतना प्रातःकालीन सूर्य का वेधन करती हुई आर-पार जा रही है। साधक की चेतना सूर्य ऊर्जा से भर रही है। दायीं नासिका से खींचा श्वास अन्दर तक जाकर सूर्यचक्र को आन्दोलित-उत्तेजित कर रहा है। ओजस्, तेजस्, वर्चस् की बड़ी मात्रा अपने अंदर धारण करके वापस बाईं नासिका से सारे कल्मष निकल रहे हैं। पहले की अपेक्षा अब प्राण ऊर्जा की मात्रा भी अधिक बढ़ गई है, जो प्रतिभा परिवर्धन के रूप में अनुभव की जा रही है। क्रिया की ओर ध्यान कम लेकिन भावना को प्रधान मानते हुए नियमितता से की गई यह प्रैक्टिस निश्चित ही फलदायी होती है।
(7) चुम्बक स्पर्श:
चिकित्सकों में अनेकों बीमारियों के निवारण में चुम्बक का बहुत बड़ा योगदान माना है। एक्युपंक्चर, एक्युप्रेशर तकनीक द्वारा शरीर के सूक्ष्म संस्थानों को प्रभावित करने की प्रक्रिया वर्षों से प्रचलित है।
हमारी धरती मां अपने गर्भ में एक विशाल चुम्बक लिए हुए है। चुम्बक चिकित्सा में लोहे के मैगनेट को धीरे-धीरे मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और हृदय पर बाईं से दाईं ओर गोलाई में घुमाया जाता है। कण्ठ से लेकर नाभि छिद्रों के ऊपर होते हुए जननेन्द्रियों तक उस चुम्बक को पहुँचाया जाता है। किस कमी के लिए, किस रूप में, किस प्रकार प्रयोग किया जाना है, इसका निर्णय विशेषज्ञ ही करते हैं।
(7) प्राणवानों का सान्निध्य:
शक्तिपात को इंग्लिश में Transmission of spiritual energy कहा जाता है। परम पूज्य गुरुदेव द्वारा किए गए प्राण प्रत्यावर्तन सत्र, दीक्षा, चरण स्पर्श एवं दृष्टि संपर्क इसी कैटेगरी में आते हैं।
हमें स्मरण आता है कि 1980s के दिनों में जब शांतिकुंज में हमारे आरंभिक दिन थे,गुरुदेव-माता जी के चरण स्पर्श के लिए लंबी लाइन लगती थी। वर्षों के अध्ययन एवं व्यक्तिगत अनुभव के बाद ही अब इन प्रक्रियाओं पर विश्वास होता दिख रहा है।
शक्तिपात की तांत्रिक क्रिया तो कठिन व जोखिम भरी है लेकिन वरिष्ठों, प्राण चेतना सम्पन्न व्यक्तियों के निकट बैठने से ही बहुत लाभ हो सकता है। भारतीय संस्कृति में चरण स्पर्श के वैज्ञानिक/आध्यात्मिक लाभों पर वर्षों से विश्वास किया जा रहा है। आधुनिक फैशनपरस्त दुनिया में भले ही हेलो/हाय का प्रचलन तेज़ी से बढ़ा है लेकिन चरण स्पर्श अभी भी पूरी तरह से जीवित है।
शक्तिपात प्रक्रिया में अप्रत्यक्ष रूप से यह ध्यान किया जाता है कि हनुमान्, भगीरथ जैसी प्राणवान् सत्ता के साथ हमारी भावनात्मक एकता बन रही है और पारस्परिक आदान-प्रदान का सिलसिला चल रहा है। भावना की जाती है कि जिस प्रकार साबुन कपड़े का मैल निकाल देता है, उसी प्रकार संपर्क की यह प्रक्रिया हमारे दुर्गुण निकाल रही है।
हम अपने व्यक्तिगत विश्वास से कह सकते हैं कि पूजास्थली में स्थापित चित्र/प्रतिमा दैनिक शक्तिपात का सबसे सरल विकल्प हैं। गुरुदेव/ माता जी के चित्र के साथ आँख से आंख मिला कर बात करने से ऊर्जा न मिले तो कहना !!! शर्त केवल एक ही है कि यह प्रक्रिया चेतना स्तर की हो।
(8) नाद योग:
वाद्य यंत्रों और उनकी ध्वनि लहरियों के प्रभाव से शायद ही कोई अपरिचित हो। कोलाहल रहित स्थान में,दिव्य लाइट म्यूजिक सुनना प्रतिभा परिवर्धन में सहायक होता है। शब्द शक्ति, (जो चेतना का ईंधन है) के श्रवण से अंतर्मन के ऊर्जा केन्द्रों को उत्तेजित व जगाना सम्भव है। उच्चारित मंत्रों/संगीत पर ध्यान लगाने से लाभ मिलना संभव है। अभी दो दिन पूर्व ही प्रकाशित हुई वीडियो जिसका शीर्षक “रूहानी वाणी में गायत्री मंत्र” है, द्वारा आंख बंद कर अनुभव किया जा सकता है कि चयन किया गया म्यूजिक कैसे अंतर्मन को छू रहा है। रूह तक पहुंचने वाले संगीत से प्रेरित होकर ही इस वीडियो का शीर्षक चुना गया था। यहाँ पर इस वीडियो का लिंक देना उचित समझते हैं :
(9) प्रायश्चित:
व्यभिचार, छल, धन अपहरण जैसे दुष्कर्मों से प्राणशक्ति क्षीण होती है और प्रतिभा का अनुपात घट जाता है। इसके लिए दुष्कर्मों के अनुरूप प्रायश्चित किया जाए। क्रिश्चियन धर्म में ‘कन्फेशन’ की बड़ी महत्ता बताई गई है। दुष्कर्मों की भरपाई कर सकने जैसे कोई सत्कर्म किए जाएँ। चान्द्रायण जैसे व्रत उपवास भी इस भार को उतारने में सहायक होते हैं। कौन-किन दोषों के बदले क्या प्रायश्चित करे, इसके लिए गुरुसत्ता जैसे विशेषज्ञों से अपनी पूरी बात कहकर काफी हलकापन आ जाता है व आगे कुछ नया करने की दिशा मिलती है।
प्रायश्चित, धुलाई की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता पूरी करता है। प्रतिभा सम्वर्धन हेतु अन्तरंग की धुलाई जरूरी भी है।
(10) अंकुरों का घोल एवं वनौषधि सेवन:
जड़ी-बूटीओं एवं अन्य वनस्पतियों के अपने-अपने प्रभाव होते हैं लेकिन जब वे अंकुरित स्थिति में फूटते हैं तब इनमें अभिनव एवं अतिरिक्त गुण होता है। गुरुदेव अंकुरित वनस्पतिओं को पीसकर उसका पेय बनाकर प्रात:काल खाली पेट लेने की सलाह देते हैं । ये टॉनिक मनुष्य के तेजस् की अभिवृद्धि, मेधावृद्धि,जीवनी शक्ति सम्वर्धन में सहायक होते हैं।
समापन, जय गुरुदेव
