वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

प्रतिभा परिष्कार के 10 प्रयोगों में से 2 का संक्षिप्त वर्णन 

आज के लेख का शुभारम्भ करने से पहले सभी साथिओं से करबद्ध क्षमाप्रार्थी  हैं कि कल हम दिव्य सन्देश प्रकाशित करना ही भूल गए। आदरणीय मंजू मिश्रा बहिन जी ने मैसेज करके पूछा, तब कहीं याद आया। आदरणीय नीरा जी अक्सर पूछ लेती हैं लेकिन आज वोह भी भूल गईं । 

23 छोटी-छोटी पुस्तकों की “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की चौथी पुस्तक “युग की मांग प्रतिभा परिष्कार भाग 2” पर आधारित लेख श्रृंखला अब अपने समापन की ओर  अग्रसर हो रही है। आशा है कि कल इस श्रृंखला का समापन हो जायेगा। 

प्रतिभा परिष्कार के लिए अनेकों प्रयोग दिए गए हैं, उनकी प्रमाणिकता भी टेस्ट की गयी है, इस पुस्तक का अंतिम चैप्टर इन 10 प्रयोगों को वर्णन करता है, आज के ज्ञानप्रसाद लेख में केवल दो (Auto suggestion और दर्पण साधना) को ही समझने का प्रयास किया गया है, बाकि के आठ कल वाले लेख में वर्णित किये जायेंगें। 

तो आइए गुरुकुल की गुरुकक्षा में गुरुचरणों में समर्पित होकर आज के गुरुज्ञान का अमृतपान करें, अपना आज का दिन उज्जवल बनाएं। 

************************** 

प्रतिभा परिष्कार के विषय पर हम सब पिछले कुछ दिनों से डिटेल में चर्चा करते आ रहे हैं। अब इस विषय के समापन का समय आ गया है, उचित रहेगा कि सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर दिया जाए। 

यह वोह प्रश्न है जो हमें बताएगा कि क्या प्रतिभा परिष्कार के लिए कोई ऐसी प्रक्रिया है जिसे हर कोई कर सकता है? इस प्रश्न का स्वाभाविक दूसरा भाग है कि यदि कोई प्रक्रिया है तो उसका वैज्ञानिक बेसिस भी है क्या? ऐसा  कहना इसलिए उचित हो जाता है कि बिना तथ्यों के, Certification के कौन विश्वास करेगा ? 

“युग की मांग प्रतिभा परिष्कार भाग 2” पुस्तक का समापन 10 अति सरल प्रयोगों से होता है जिसे कोई भी साधारण व्यक्ति कर सकता है। यहाँ हम साधारण व्यक्ति उसे कह रहे हैं जिसने इन लेखों का गंभीरता से, शब्द by शब्द अमृतपान किया है क्योंकि कोई भी प्रयोग तब तक अपना प्रभाव दिखाने में असमर्थ रहता है जब तक साधक की  प्रामाणिकता और प्रखरता के दोनों पक्ष समान रूप से मजबूत न हों। ऐसा इसलिए कहना उचित हो जाता है क्योंकि भावभरी उमंग उत्साहों से सनी एकाग्र तन्मयता बहुत ही ज़रूरी है। समय को श्रम के साथ ही अविच्छिन्न रूप से जोड़े रखने वाली तत्परता और श्रमशीलता उजागर करनी होती है। संकीर्ण स्वार्थपरता, मेरा-मेरा, बकरी जैसी मैं-मैं से ऊपर उठना होता है, शालिनता को अपनाना होता है, सादा जीवन-उच्च विचार की नीति अपनानी होती है क्योंकि इन सभी प्रयोगों में साधक को अपने अंदर सोई प्रतिभा को ही तो जगाना होता है, अंतकरण में छिपी प्रतिभा के कोष का ताला ही तो खोलना होता है, ईश्वर ने तो वर्षों पहले सम्पदाओं और प्रतिभाओं का एक Compact बक्सा भेजा था लेकिन समय के आभाव ने इस बक्से को खोल कर देखने तक नहीं दिया । 

आज एक बार फिर ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का Delivery Boy उपरोक्त सम्पदाओं से भरा एक पैकेज आपके दरवाजे पर छोड़ गया है, उसे खोल कर,उसमें भेजे गए अनुदानों का प्रयोग करना आपकी ही जिम्मेदारी है। मात्र इतना ही करने से आपको इतना कुछ प्राप्त हो जायेगा कि आपका जीवन ही बदल जायेगा, आपके पास समय ही समय होगा, समय अभाव जैसी कोई बात रहेगी ही नहीं । 

विश्वास कीजिए ऐसी स्थिति आते ही मनुष्य अपने श्रम और साधनों को सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन में,लोकसेवा में लगाना शुरू कर देता है । स्वयं से कहना शुरू कर देगा 

मनुष्य  इस तथ्य को समझने का प्रयास करता है कि उच्चस्तरीय प्रतिभा का सम्वर्धन इसी प्रकार होता है।

इस लेख के सन्दर्भ में  प्रतिभा का अर्थ सदैव आदर्शोन्मुख बुद्धि व भावना के सामूहिक विकास से लिया जाना चाहिए। ऐसे प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति ही स्वयं को प्रेरणापुञ्ज,आदर्शों  के प्रतीक के रूप में उभारते हैं। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से ऐसे ही आदर्शवान् विभूतियों की आशा की जाती रही है। 

आज के लेख में इसी “प्रतिभा के विकास से सम्बन्धित उपचारों” की बात की गई है।

इन उपचारों एवं Practicals को समझने के लिए बचपन के उन दिनों की ओर चलना पड़ेगा जब हमने लकड़ी की तख्ती का प्रयोग करते हुए ही लिखना सीखा था, राजमाश के दाने सरका कर गिनती सीखने का प्रयास किया था, तीन पहिए की लकड़ी की गाड़ी जिसे हम गड्ढा कहते थे, उसका सहारा लेकर चलना सीखा था। दूसरी पीढ़ी के आते-आते इस लकड़ी के गड्ढे ने वॉकर का रूप ले लिया था। इन सभी प्रचलनों के पीछे विज्ञान और अध्यात्म छिपा था, जिसे किसी अन्य समय के लिए स्थगित करना उचित रहेगा। 

आज के लेख में दिए दो Practicals को करके प्रतिभा के विकास  के लिए स्वयं को एवं जनसाधारण को प्रेरित करना होगा। Gym में जाकर शारीरिक अंगों की पौष्टिकता कायम रखने के बारे में कोई दो राय नहीं है। जिस प्रकार शारीरिक अंगों को सशक्त बनाने के लिए व्यायामों  एवं आहार में परिवर्तन अभीष्ट माना गया है उसी प्रकार  प्रतिभा परिष्कार के लिए कुछ एक साधना प्रैक्टिकल निर्धारित किए गए हैं। अनेकों लोग ऐसे प्रैक्टिकल करके लाभान्वित भी हुए हैं।

आइए Auto suggestion एवं दर्पण साधना को एक-एक करके समझने का प्रयास करें। 

(1) स्वसंकेत (Auto suggestion) :

शान्त वातावरण में स्थिर शरीर और एकाग्र मन में बैठा जाए। भावना की जाए कि अपने मस्तिष्क केन्द्र से निकल रही  प्राण विद्युत (Life electricity) सारे शरीर में प्रवाहित हो रही है। शिथिलता का स्थान सक्रीय हो रहा है, प्रत्येक अंग अवयव पुष्ट हो रहे हैं। इन्द्रियों की क्षमता बढ़ रही  है, चेहरे पर चमक बढ़ रही है, बौद्धिक स्तर में ऐसा उभार आ रहा है जिसका अनुभव प्रतिभा परिवर्धन के रूप में अपने को तथा दूसरों को हो सके। 

देखा जाए तो स्वसंकेतों में ही मानसिक कायाकल्प का मर्म छिपा पड़ा है। श्रुति की मान्यता है कि “यो यदृच्छ: स एव स:” अर्थात् जो जैसा सोचता है और अपने सम्बन्ध में भावना करता है, वह वैसा ही बन जाता है। श्रुति का अर्थ महापुरषों की वाणी से है जो उन्होंने ध्यान की स्थिति में सुनी थी, उन्हें जो सन्देश मिले थे।   

मनोवैज्ञानिक इसी आधार पर व्यक्तित्व में, विचार-प्रवाह में परिवर्तन लाने की बात कहते हैं। उनका मत है कि जैसे पृथ्वी के चारों ओर आयनोस्फीयर (Ionosphere) होती है, उसी प्रकार मानवी मस्तिष्क के चारों ओर भी एक आयडियोस्फीयर (Audiosphere) होती है। यह मनुष्य के चिन्तन-क्रम से सम्बंधित होता है जो  क्षण भर  में बदल सकता है और फिर पहले जैसा ही हो जाता है। आदर्शवादी सोच, श्रेष्ठ संस्कारों के गतिशील होने पर व्यक्ति का मुखमण्डल चमकने लगता है, अनेकों लोग ऐसे श्रेष्ठ, प्रतिभाशाली मनुष्य की ओर  आकर्षित होना शुरू हो जाते हैं। यह भी देखा गया है कि ऐसे व्यक्तिओं के कथन का कोई विशेष  ही प्रभाव होता है। कई बार तो यह प्रभाव उस सीमा तक भी होता है कि अनेकों में परिवर्तन लाने का काम करता है। मनोवैज्ञानिक तो यहाँ तक कह चुके हैं कि उच्चस्तरीय विभूतियों के स्वसंकेतों द्वारा उनके स्वयं के आभामण्डल को एक सशक्त चुम्बक में परिणत किया जाता है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं Think and grow rich  और Adopt a positive attitude  today ,कहने का अर्थ है कि सोचिए, पॉजिटिव सोचिए एवं अभी इसी क्षण सोचिए, ताकि आप स्वयं को श्रेष्ठ बना सकें। सारे महामानव स्वसंकेतों से ही महान् बने हैं। गाँधी जी ने हरिश्चन्द्र के नाटक को देखा, स्वयं को संकेत दिया कि सत्य के प्रयोगों को जीवन में उतारो और उसके उसके परिणाम देखो। उनकी प्रगति में इस चिन्तन की कितनी महान् भूमिका थी, यह सभी जानते हैं। 

Think and grow rich टाइटल से लगभग 100 वर्ष पूर्व एक पुस्तक भी प्रकाशित हुई थी जिसे प्रतिभा परिष्कार के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना  गया है। अनेकों पाठकों ने इस पुस्तक के टाइटल में Rich शब्द देखकर अमीर होने के लिए दौड़धूप करनी शुरू कर दी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ क्योंकि पुस्तक में भौतिक अमीरी की बात नहीं हो रही है।  क्या किया जाए हर कोई अमीर होना चाहता है!!!

ब्रह्मवर्चस् की शोध प्रक्रिया में ऑडियो एवं वीडियो कैसेट का आश्रय लेकर ईयरफोन द्वारा संकेत दिए जाते हैं। कुछ विराम के बाद पुन: उन सभी प्रसंगों पर चिन्तन करते रहने को कहा जाता है। इससे प्रभावशाली Electric flow  जन्म लेने लगता है। इसकी प्रत्यक्ष परिणति GSR (Galvanic skin response) Biofeedback  के रूप में देखी जा सकती है, जिसमें व्यक्ति चिन्तन द्वारा ही अपने Skin resistance  को घटाता-बढ़ाता व स्वयं भी उसे देखता है। इसी प्रकार Breathe rate, हृदय की गति, रक्तचाप आदि  को स्व-संकेतों से प्रभावित किया जा सकता है। यह प्रयोग GSR मशीन से ही होता है। DSVV में इस तरह के अनेकों प्रयोग किये जा रहे हैं,रिसर्च पेपर्स भी प्रकाशित हो रहे हैं लेकिन हमारे लिए अभी के लिए इतना ही पर्याप्त है। 

हमारे साथी सहमत हो सकते हैं कि जो कुछ भी उपरोक्त पंक्तियों में समझने का प्रयास किया गया है उसका Base  विचारों एवं मनुष्य की सोच ही है, तो यही तो है विचार क्रांति अभियान। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से विचारों में दिव्यता लाने  का ही प्रयास तो किया जा रहा है।   

(2) दर्पण साधना:

यहाँ वर्णित दर्पण साधना भटका हुआ देवता से कुछ मिलती जुलती अवश्य है लेकिन उससे अलग है। उस साधना में मनुष्य को ईश्वर के साथ कनेक्ट होने की जानकारी दी जाती है लेकिन यहाँ दी गयी जानकारी में अपना एनालिसिस करना है। 

यह तकनीक मूलत: आत्मावलोकन (Introspection, Self-analysis) की, आत्मपरिष्कार (Self-refinement)  की साधना है। बड़े आकार के दर्पण को सामने रखकर बैठा जाता है। खुले शरीर के प्रत्येक भाग को  विश्वास भरी दृष्टि से अवलोकन किया जाता है, Analyse किया जाता है। सबसे पहले अपने स्वयं  बारे में चिन्तन कर, अन्त: के दोष-दुर्गुणों से मुक्त होते रहने की भावना की जाए। वह परमसत्ता बड़ी दयालु है। भूत को भुलाकर अब यह अनुभूति की जाए कि भीतरी संरचना में प्राण विद्युत बढ़ रही है और उस की तेजस्विता त्वचा के ऊपरी भाग मे चमक बढ़ाती हुई अंग-अंग से फूटी पड़ रही है। पहले जो निस्तेज-क्षीण दुर्बलकाय सत्ता थी, यह बदल गई है एवं शरीर के रोम-रोम में विद्युत शक्ति ही छाई हुई है। विकासक्रम में उभार आ रहा है। प्रतिभा परिवर्धन के लक्षण निश्चित रूप में दिख  पड़ रहे हैं एवं सामने बैठी आकृति में अपना अस्तित्व पूर्णत: विलीन हो रहा है। यह ध्यान प्रक्रिया लय योग की ध्यान साधना कहलाती है और व्यक्ति का भावकल्प कर दिखाती है।

आज के लेख का यहीं पर कल तक के लिए मध्यांतर होता है। 

जय गुरुदेव 


Leave a comment