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मनुष्य को दैवी अनुदान/वरदान कैसे प्राप्त होते हैं 

23 छोटी-छोटी पुस्तकों की “क्रांतिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला” की चौथी पुस्तक “युग की मांग प्रतिभा परिष्कार भाग 2” पर आधारित आज के ज्ञानप्रसाद के अमृतपान के लिए आपको सादर आमंत्रण है। 

आज के लेख में मार्गदर्शन मिल रहा है कि अनेकों सम्पदाओं से लैस मनुष्य अपनेआप को भवसागर में धँसाता ही क्यों जाता है, क्यों नहीं उसे समझ आता कि यह दुर्लभ मनुष्य जीवन बार-बार नहीं मिलेगा। भगवान् से वरदान लेने की क्या प्रक्रिया है? क्या मनुष्य दैवी अनुदान जन्मजात लेकर पैदा होता हैं यां ऊपर से बरसते हैं ? इन सभी प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने के लिए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में सभी समर्पित गुरुशिष्यों का स्वागत है, आइए एक-एक शब्द का अमृतपान करें अपने जीवन को सफल बनाएं।

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बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया जा रहा है कि मनुष्य की आंतरिक सत्ता में प्रतिभा के अनंत भंडार भरे पड़े हैं लेकिन कषाय-कल्मषों (दुर्गुण/बुराइओं) के कारण वोह उभर ही नहीं पाते। मनुष्य अपनी ही इच्छा और कामना के वशीभूत आत्मसत्ता के ऊपर वर्षों से जमी कालिख को पोंछ पाने में असमर्थ रहता है।

आइए इसे एक सरल से उदाहरण से समझने का प्रयास करें:

लकड़ी की Chemical composition बताती है कि वह अंदर से काफी खाली होती है ,उसका शरीर खोखला (Porous) होता है,इन Pores में हवा  भरी होती है जो लकड़ी को हल्का बनाती है जिसके कारण वह पानी के ऊपर तैरती है, डूबती नहीं है। यह तो हुआ लकड़ी का प्राकृतिक गुण, प्राकृतिक स्वभाव, लेकिन यदि उस पर भारी पत्थर बाँध दिए जाएँ तो उसका स्वाभाविक गुण (तैरना) दबकर रह जाता है। पत्थर उसके स्वाभाविक गुण पर भारी पड़ जाते हैं और उसकी प्रकृतिता, उसका स्वभाव लगभग समाप्त ही हो जाता है और लकड़ी पानी में डूब जाती है।  

मनुष्य के साथ भी यही बात होती है। ईश्वर से अनुदानों का भंडार लेकर इस धरती पर अवतरित हुआ मनुष्य,विभूतिवान् होते हुए भी,अज्ञानवश, विवेकहीनता के वशीभूत हर दिन जीवन यात्रा में निकृष्टता की चट्टान सिर पर लादता जाता है। उसे उन विभूतियों का स्मरण ही नहीं रहता जो ईश्वर ने देकर अपने उत्तराधिकारी के रूप में इस संसार में भेजा था।  यह सब कुछ जीवन यात्रा के साथ-साथ चलते हुए होता है। जन्म के समय तो मनुष्य पूर्णतया खाली ही आया था,पूर्णतया हल्का,पूर्णतया ईश्वर का रूप, ईर्ष्या,द्वेष, लोभ,मोह, माया का ज्ञान ही नहीं था। जिसने प्रेम किया उसी का हो लिया। जैसे-जैसे जीवन बीतता गया,हर दिन,हर पल आस-पास के लोगों से, साथिओं से, परिवार से, सगे सम्बन्धिओं से, भार उठाता रहा, एक दिन ऐसा आया कि वोह भव-सागर में, संसार-रूपी सागर में इतना डूब गया कि उसे भूल ही गया  कि उसे भगवान ने अपना उत्तराधिकारी बना कर भेजा था, सुंदर सी प्रकृति की रक्षा के लिए भेजा था। ऐसा करते-कराते जीवन के अंतिम पल पास आने लगे,इस संसार से जाने का डर सताने लगा,तब भगवान् की याद आयी,डर से निकलने के लिए भगवान् से फ़रियाद करने लगा, समाज में बहुत बड़ा भक्त बनने का ढोंग रचने  लगा, भगवान् पूछते हैं अरे स्वार्थी किसे मुर्ख बना रहा है, कर्मफल कोई इंस्टेंट कॉफ़ी का कप नहीं है जो Tap खोलते ही भर लेगा। 

ऐसे व्यक्ति जीवन की गंगा में  तैरने और अपना वास्तविक स्वरूप दिखा पाने की स्थिति से हाथ  धो बैठते हैं, भव-सागर में लगातार डूबते ही जाते हैं। ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी अमूल्य सम्पत्ति, अनुदान आदि सब वैसे के वैसे ही, बिना खजाना खोले ही इस संसार से कूच कर जाते हैं। 

ज्ञानप्रसाद लेखों के माध्यम से नियमितता एवं निरंतरता से अपनी सोई हुई (प्रसुप्त) प्रतिभा जगाने का प्रयास करें। ज्ञान से भरपूर गुरुदेव के साहित्य द्वारा निकृष्ट चिन्तन से अन्तराल को और दुष्ट आचरण से काय कलेवर को बचाए रखने  का प्रयत्न करें। सच मानिए गुरु साहित्य को समझ कर, अंतर्मन में उतार कर अनेकों साथिओं का जीवन बदल चुका है, अब आपकी (जो इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं) बारी है। इसके लिए गुरुदेव का सबसे महत्वपूर्ण निर्देश है कि “अवांछनीय महत्त्वाकांक्षाओं की हथकड़ी-बेड़ी से हाथ पैर खुले किए जाएँ। अधिकतर लोगों की अभिलाषा  धनाढ्य बनने में रहती है, ताकि विलासिता के विपुल साधन जुटाए जा सकें। शायद ही कोई ऐसा मिल पाए जिसे अमीर होने की इच्छा न हो, अमीरी किसको अच्छी नहीं लगती। तो फिर गुरुदेव का सूत्र,“जो प्राप्त है वही पर्याप्त है” सिर्फ प्रचार के लिए ही है। अमीर लोग समाज में अपनी वाहवाही लूट कर बहुत ही खुश होते हैं, अभावग्रस्तों की बिरादरी में अपने को बढ़ा-चढ़ा कर सिद्ध करके मूँछें मड़ोड़ने में उन्हें जो शांति मिलती है उसका तो वही जानें लेकिन एक बात से तो कोई इंकार नहीं कर सकता कि उनका सर्किल इतना छोटा होता है कि वोह उसी में Centralise होकर रह जाते हैं। ऐसे लोगों को विश्व स्तर के महान् कार्यों की कहाँ जानकारी/चिंता होती है, उनके बारे में कहाँ जानकारी होती है जो मानवी गरिमा में चार चाँद लगाते हैं। वोह तो खूँटे से बँधी नाव का चप्पू चलाते रहने से आगे कहाँ बढ़ पाते हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता से ग्रसित ऐसे व्यक्ति न तो आदर्शवादिता अपना सकते हैं और न ही ऐसा कुछ कर सकते हैं जिसे उत्कृष्ट कहा जा सके। इस सन्दर्भ में गुरुदेव कुरूप वैश्याओं का उदाहरण देते हैं जो सज धज कर परी जैसी सुन्दर दिखने के भ्र्म से ग्रसित रहती हैं। 

प्रतिभा परिष्कार पर आधरित पूर्व प्रकाशित लेखों में बार-बार लिखा गया है कि प्रतिभा कहीं बाहर से नहीं बटोरनी पड़ती,ऊपर से नहीं बरसती,उसे भीतर से ही उभारा जाता है। ईश्वर द्वारा दिए गए अनुदानों को जगाना पड़ता है। इसे जगाने का एकमात्र मार्ग यही है कि उन अवरोधों को हटाया जाए  जो भारी चट्टान की तरह उत्कृष्टता के मार्ग में भयानक स्पीड  ब्रेकर की भांति अड़े होते हैं। इस सन्दर्भ में स्मरण रखने योग्य तथ्य है कि औसत नागरिक स्तर का निर्वाह अंगीकार किया जाए, जो “प्राप्त है वही पर्याप्त” के सिद्धांत का पालन किया जाए। ऐसा न कर पाने की स्थिति में  तृष्णा और वासना का आकर्षण इतनी सघनता से छाया रहेगा  कि अपनी सामर्थ्य की तुलना में अकिंचन जितना परमार्थ भी करते न बन पड़ेगा। तृष्णा,वासना,मोहमाया आदि की  खाइयाँ इतनी चौड़ी और गहरी हैं  कि छोटे-से जीवन का समूचा साधन, श्रम, कौशल खपा देने पर भी उन्हें भरा नहीं जा सकता। 

गुरुदेव का सन्देश है कि लालसा-जन्य महत्त्वाकांक्षाओं में कटौती किए बिना किसी के पास भी इतना समय, श्रम, साधन बच नहीं सकता, जिसके सहारे आत्मकल्याण और लोक कल्याण की दिशा में कुछ कहने लायक कदम उठ सकें। साधु और ब्राह्मणों (जाति वाले ब्राह्मण नहीं) को पृथ्वी के देवता की उपमा दी जाती रही है। वह इसलिए कि उन्होंने  संयम, अपरिग्रह, सन्तोष की राह अपनाई। जिस मनुष्य की अपने निजी बड़प्पन में जितनी अधिक  अभिरुचि होगी, वह उतना ही व्यस्त और अभावग्रस्त अनुभव करेगा। सदा यही कहता रहेगा कि अपनी समस्याओं से ही घिरा हुआ हूँ, समय तो है ही नहीं परमार्थ कहाँ से करूँ, जबकि वास्तविक समस्याएँ  होती ही कितनी हैं? इन थोड़ी से समस्याओं को विवेक और बुद्धि से सुलझाया जाए, तो इतनी सरलतापूर्वक सुलझ जाती हैं, मानों वे थीं ही नहीं।

आहार-विहार की शुद्धि, सज्जनता, सद्भावना, श्रमशीलता, मितव्ययिता, स्वच्छता, सहकारिता, अनुशासन प्रियता आदि प्रमुख संयम नियम  हैं। इनके विपरीत असंयम चटोरपन, आलस्य, प्रमाद, निष्ठुरता, स्वच्छन्दता, अपव्यय, व्यसन आदि ऐसे  दुर्गुण हैं  जो प्रगति में बाधक बनते हैं। देखने में तो यह दुर्गुण नहीं लगते लेकिन संकीर्ण स्वार्थपरता और स्वेच्छाचार की पैदा की हुई औलाद ही हैं । इनमें से एक-एक को गिनना और रोकथाम करना मेंढक तोलने के समान है। बिस्तर को धूप में डाल देने के उपरान्त खटमल और उनके अण्डे-बच्चे सभी मर जाते हैं। इसी प्रकार दृष्टिकोण को बदलने लेने के उपरान्त अपना स्वरूप, लक्ष्य और कर्तव्य तीनों ही सूझ पड़ते हैं। उस प्रकाश के जलते ही उन भूत-पलीतों से छुटकारा मिल जाता है, जो अन्धेरे के कारण सामान्य होते हुए भी, डरावने बनकर भयभीत करते और त्रास देते थे।

इस तथ्य को इतिहास प्रसिद्ध सभी महामानवों से लेकर सामयिक श्रद्धाभाजन व्यक्तियों के ऊपर बरसती हुई सद्भावना को देखकर सहज समझा जा सकता है, कि व्यक्तिगत लाभ की बात सोचने वाले भी यदि दूरदर्शी हों, तो उन्हें परमार्थ प्रयोजनों में अपनी क्षमता लगाने के उपरान्त बदले में कई गुना होकर लौटता है। महामानवों की यही नीति रहती है। वे समाज के खेत में पुण्य-परमार्थ के बीज बिखेर देते हैं और उस फसल को अपने लिए ही नहीं, समाज के लिए भी काटते व विश्ववसुधा को लाभान्वित करते हैं। 

प्रतिभा को तेजस्विता (तेजस!!) भी  कहते हैं। यह चेहरे की चमक या चतुरता नहीं बल्कि  मनोबल पर आधारित ऊर्जा है। गाँधी जी 46 किलो  वजन और 5  फुट 2  इंच के व्यक्ति थे। रंग भी इतना आकर्षक नहीं था लेकिन  उनका तेजस् ऐसा था कि जनसाधारण से लेकर देश के वरिष्ठ मूर्द्धन्यों तक को उनका आदेश शिरोधार्य करते देखा गया  था। यहाँ तक कि अंग्रेज भी उनसे प्रभावित होकर बिस्तर गोल करके चले ही गए। यह तेजस् निजी और सामूहिक जीवन के हर पक्ष को जगमगाता है। उसे प्रखरता भरी ऊर्जा से उज्जवल  बना देता है।

प्रतिभा-परिष्कार में तेजस्विता तपश्चर्या की उपलब्धि है, जो निजी जीवन में संयम-साधना और सामाजिक जीवन में परमार्थ परायणता के फलस्वरूप उद्भूत होती हैं। इसके लिए मनुष्य को तृष्णा, वासना और अहंता के त्रिविध नागपाशों से छूटना पड़ता है। “सादा जीवन उच्च विचार” का ब्राह्मणोचित औसत नागरिक स्तर का जीवनयापन करना पड़ता है। जो इतना कर सके, उन्हीं से परमार्थ सधता है और योगियों में पाई जाने वाली सिद्धियों, शक्तियों और विभूतियों का अन्तराल में उद्भव और अखिल अन्तरिक्ष से Resonate  होता है। 

सर्वसुलभ प्रक्रिया यही है कि निजी जीवन इतना हलका-फुलका रखा जाए कि उसका निर्वाह न्यूनतम श्रम और समय में ही सम्भव होता रहे। इसके उपरान्त ही श्रम, समय और साधन इतनी मात्रा में बच पाते हैं कि उनके आधार पर परमार्थ में निरत रहकर परब्रह्म के साथ एकात्म होने का रसास्वादन किया जा सके, देवोपम जीवन जीने का आनन्द लाभ उठाया जा सके।

किस प्रयोजन के लिए, किस अवसर पर, किस प्रकार, क्या संयम बरता जाय, यह निर्णय-निर्धारण तो व्यक्ति विशेष की परिस्थिति और मन:स्थिति को देखते हुए ही करना पड़ता है लेकिन इतना ज़रूर है कि शरीर और मन दोनों को ही शालीनता अपनाए रहने के लिए अभ्यस्त करना पड़ता है। संयम योग यही है। जो इतना कर सका, वही पुण्य-परमार्थ अर्जित करने का भी अधिकारी है। शालीनता और परमार्थ परायणता मिलकर ही तपश्चर्या बनती हैं और उन्हीं के आधार पर प्रतिभा की ऊर्जा अपनी प्रचण्डता का परिचय देती है। 

जय गुरुदेव 


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